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शनिवार, 30 अगस्त 2025

The Holy Communion – 80 - God’s Dealing With Sin (2) / प्रभु भोज – 80 - परमेश्वर द्वारा पाप से व्यवहार (2)

 

प्रभु भोज 80

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प्रभु की मेज़ - परमेश्वर द्वारा पाप से व्यवहार (2)


    इससे पिछले लेख में हमने देखा था कि पाप से व्यवहार के लिए, परमेश्वर के केवल दो विकल्प हैं - या तो उन्हें क्षमा कर दे, या उन्हें दण्डित करे। और, प्रत्येक मनुष्य के पास, उन के पापों लिए केवल यही दो विकल्प ही लागू हैं; या तो परमेश्वर से उनकी क्षमा प्राप्त कर ले, या उनके लिए परमेश्वर के न्याय का सामना करे। हमने देखा था कि क्योंकि पापों को केवल परमेश्वर ही क्षमा कर सकता है, इसलिए यह होना, उसी के तरीके और मानकों के अनुसार ही सम्भव है; न कि मनुष्य द्वारा बनाए गए किसी रीति या विधि के द्वारा। परमेश्वर का तरीका है कि पापों के लिए सच्चा पश्चाताप करके, परमेश्वर के सामने उनका अंगीकार करके, उनके लिए परमेश्वर से क्षमा माँगना, और प्राप्त करना। किसी भी मनुष्य के द्वारा बनाई गई कोई भी अन्य रीति या विधि, परमेश्वर के द्वारा दिये गए इस तरीके का स्थान नहीं ले सकता है, इसका विकल्प नहीं बन सकता है। आज हम इसे परमेश्वर के नबी, यशायाह के जीवन से देखेंगे।

    इस बात का एक उत्तम उदाहरण यशायाह नबी का जीवन है, यशायाह 6:1-8 देखिए। ध्यान रखिए कि इस स्वर्गीय दर्शन से पहले भी यशायाह परमेश्वर का नबी था, जैसा कि हम इस पुस्तक के आरंभ से ही देखते हैं। यद्यपि पहले भी यशायाह ने परमेश्वर से दर्शन और निर्देश पाए थे, किन्तु यशायाह 6 का परमेश्वर के अपनी महिमा में अपने सिंहासन पर बैठे होने का दर्शन यशायाह ने पहली बार देखा था। जब यशायाह ने परमेश्वर को उसकी पवित्रता और महिमा के साथ सिंहासन पर बैठे होने के दर्शन को देखा, यद्यपि वह परमेश्वर का नबी और संदेशवाहक था, फिर भी वह तुरन्त ही अपनी पापमय दशा के लिए कायल हो गया, और विशिष्ट रीति से अपने पाप का अंगीकार किया, “मैं अशुद्ध होंठ वाला मनुष्य हूं, और अशुद्ध होंठ वाले मनुष्यों के बीच में रहता हूं(6:5)। जब यशायाह अपने विशिष्ट पाप का अंगीकार करता है, एक सराप परमेश्वर की वेदी से अँगारा उठाकर उसके शरीर के पाप करने वाले स्थान - उसके होंठों को छू लेता है (6:6-7), और उसे उसके अधर्म दूर होने, पाप क्षमा होने का आश्वासन दिया जाता है, वह प्रभु परमेश्वर के लिए काम पर जाने के लिए तैयार हो जाता है। लगभग यही बात अय्यूब के साथ भी देखने को मिलती है (अय्यूब 40:3-5; 42:1-6), जो इस सारी पुस्तक में बड़े घमण्ड के साथ अपनी धार्मिकता का और अपने अनुचित रीति से दुख भोगने की दावे करता आ रहा था। किन्तु जैसे ही परमेश्वर अपनी महिमा और पवित्रता में उसका सामना करता है, तुरन्त ही अय्यूब को अपनी वास्तविक पापमय दशा का एहसास होता है, और वह मान लेता है कि उसे अब अपने पर ही घृणा आती है, और वह पश्चाताप करता है।

    यही 2 कुरिन्थियों 7:10 का “परमेश्वर-भक्ति का शोक” है, जो पश्चातापी मनुष्य को उद्धार पर ले जाता है, जिसके लिए फिर कोई पछतावा नहीं होता है। यह होने का प्रमाण, व्यक्ति का बदला हुआ और परमेश्वर को समर्पित एवं आज्ञाकारी जीवन है (रोमियों 12:1-2); और यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले ने बपतिस्मा देने से पहले और बाद में इसी परिवर्तित जीवन की माँग की थी (मत्ती 3:7-9; लूका 3:7-14)। किन्तु रीति के समान, औपचारिक रीति से किया गया पश्चाताप, जिसे इस पद में “संसारी शोक” कहा गया है, वह मृत्यु लेकर आता है, क्योंकि वह कभी भी सच्चे मन से किया गया शोक और खरा पश्चाताप था ही नहीं। उस व्यक्ति के वे पाप परमेश्वर के सामने कभी माने ही नहीं गए, कभी परमेश्वर से उनकी क्षमा प्राप्त ही नहीं हुई, और वे अभी भी उस व्यक्ति के जीवन का उतना ही भाग हैं जितना प्रभु भोज में भाग लेने से पहले थे, क्योंकि उसने कभी उन्हें छोड़ने का कोई निर्णय लिया ही नहीं था। वह व्यक्ति तो केवल एक रीति का निर्वाह करने के लिए, एक औपचारिकता को पूरा करने के लिए आया था, और उसके डिनॉमिनेशन की रीति के अनुसार यह करने के बाद वह इस संतुष्टि के साथ चला गया कि अब वह परमेश्वर के साथ ठीक दशा में आ गया है, क्योंकि उसके पास्टर ने उससे यह कह दिया है। किन्तु वास्तविकता में तो वह जिस हाल में आया था, उससे किसी भी बेहतर स्थिति में नहीं लौटा, वरन संभवतः और बिगड़ी हुई दशा में लौटा, क्योंकि अब उसपर एक और अयोग्य रीति से मेज़ में भाग लेने और परमेश्वर का मज़ाक उड़ाने का पाप भी जुड़ गया है।

    अगले लेख में हम इसके बारे में थोड़ा और देखेंगे, और पाप के साथ व्यवहार के परमेश्वर के दूसरे तरीके - न्याय और दण्ड के बारे में भी देखेंगे। यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं, और प्रभु की मेज़ में भाग लेते रहे हैं, तो कृपया अपने जीवन को जाँच कर देख लें कि आप वास्तव में पापों से छुड़ाए गए हैं तथा आप ने अपना जीवन प्रभु की आज्ञाकारिता में जीने के लिए उस को समर्पित किया है। आपके लिए यह अनिवार्य है कि आप परमेश्वर के वचन की सही शिक्षाओं को जानने के द्वारा एक परिपक्व विश्वासी बनें, तथा सभी शिक्षाओं को वचन की कसौटी पर परखने, और बेरिया के विश्वासियों के समान, लोगों की बातों को पहले वचन से जाँचने और उनकी सत्यता को निश्चित करने के बाद ही उनको स्वीकार करने और मानने वाले बनें (प्रेरितों 17:11; 1 थिस्सलुनीकियों 5:21)। अन्यथा शैतान द्वारा छोड़े हुए झूठे प्रेरित और भविष्यद्वक्ता मसीह के सेवक बन कर (2 कुरिन्थियों 11:13-15) अपनी ठग विद्या और चतुराई से आपको प्रभु के लिए अप्रभावी कर देंगे और आप के मसीही जीवन एवं आशीषों का नाश कर देंगे।

    यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।


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The Holy Communion – 80

English Translation

The Lord’s Table - God’s Dealing With Sin (2)


    In the previous article we have seen that God has only two options about dealing with sins – forgive them, or punish them. Only these two options are applicable to each and every person, for their sins, either seek God’s forgiveness, or face God’s judgement for them. We had seen that since it for God to forgive sins, therefore, this has to be done by His method and His standards; not through any man-made rituals or method. God’s method is that sins have to be sincerely repented of, confessed before God, and God’s forgiveness for them has to be asked and obtained. No man-made ritual or procedure can ever replace or be an alternative to this God given method. Today, we will see this illustrated in the life of God’s prophet, Isaiah.

    This is well illustrated from the life of Isaiah, in Isaiah 6:1-8. Remember, even before this heavenly vision seen by Isaiah, he already was a Prophet of God, as we see right from the beginning of this book. While, Isaiah had been receiving visions and instructions from God, but the vision of God in His majesty, seated on His throne, was first seen by Isaiah in chapter 6. When Isaiah sees the Lord God in His holiness and majesty, though a Prophet and spokesperson of God, he is immediately convicted of his own sins, and cries out confessing specifically that “I am a man of unclean lips, And I dwell in the midst of a people of unclean lips” (6:5). When Isaiah specifically confesses his sin, a seraph takes a coal from the altar of God and touches the specific sinning part of Isaiah’s body - his lips (6:6-7), and he is assured of his sin being forgiven and iniquity removed, and he is now ready to go to work for the Lord God. Much the same happened to Job (Job 40:3-5; 42:1-6), who throughout the book, till this point, had been proudly declaring his being righteous and suffering unjustly. But the moment God in His majesty and holiness confronts him, Job immediately realizes his actual sinful condition, and confesses that he is vile, abhors himself and repents.

    This is the “godly sorrow” of 2 Corinthians 7:10, that leads to salvation of the penitent person, and for which there will not be any regrets later. The proof of this having happened is the changed life of the person, now submitted and obedient to God (Romans 12:1-2); and it is this that John the Baptist had demanded before and after baptism (Matthew 3:7-9; Luke 3:7-14). But the ritualistic, perfunctory repentance, spoken in this verse as “sorrow of the world” produces death, since it never was a sorrow of the heart, never was a true repentance. Those sins still remained unconfessed, unforgiven, and still very much a part and parcel of the person’s life; they were never actually regretted for, and the person never meant to cast them away. All he had come to do was fulfill a religious ritual, an obligation, and having done it in the denominationally prescribed manner, he went back content that he had become right with God since his Pastor told him that; but actually no better than the condition he had come in, maybe somewhat worse, since now another sin of unworthily participating in the Communion and mocking God had also been added to his list of sins.

    In the next article, we will see more about this, and the second way of God handling sin - by judgment. If you are a Christian Believer and have been participating in the Lord’s Table, then please examine your life and make sure that you are actually a disciple of the Lord, i.e., are redeemed from your sins, have submitted and surrendered your life to the Lord Jesus to live in obedience to Him and His Word. You should also always, like the Berean Believers, first check and test all teachings that you receive from the Word of God, and only after ascertaining the truth and veracity of the teachings brought to you by men, should you accept and obey them (Acts 17:11; 1 Thessalonians 5:21). If you do not do this, the false apostles and prophets sent by Satan as ministers of Christ (2 Corinthians 11:13-15), will by their trickery, cunningness, and craftiness render you ineffective for the Lord and cause severe damage to your Christian life and your rewards.

    If you have not yet accepted the discipleship of the Lord Jesus, then to ensure your eternal life and heavenly rewards, take a decision in favor of the Lord Jesus now. Wherever there is surrender and obedience towards the Lord Jesus, the Lord’s blessings and safety are also there. If you are still not Born Again, have not obtained salvation, or have not asked the Lord Jesus for forgiveness for your sins, then you have the opportunity to do so right now. A short prayer said voluntarily with a sincere heart, with heartfelt repentance for your sins, and a fully submissive attitude, “Lord Jesus, I confess that I have disobeyed You, and have knowingly or unknowingly, in mind, in thought, in attitude, and in deeds, committed sins. I believe that you have fully borne the punishment of my sins by your sacrifice on the cross, and have paid the full price of those sins for all eternity. Please forgive my sins, change my heart and mind towards you, and make me your disciple, take me with you." God longs for your company and wants to see you blessed, but to make this possible, is your personal decision. Will you not say this prayer now, while you have the time and opportunity to do so - the decision is yours.


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