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शनिवार, 11 सितंबर 2021

परमेश्वर का वचन, बाइबल – पाप और उद्धार - 17

 

पाप का समाधान - उद्धार - 13

       हमने उद्धार से संबंधित तीसरे और सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न किइसके लिए यह इतना आवश्यक क्यों हुआ कि स्वयं परमेश्वर प्रभु यीशु को स्वर्ग छोड़कर सँसार में बलिदान होने के लिए आना पड़ा?” पर विचार करते हुए पिछले लेख में देखा है कि परमेश्वर द्वारा उपलब्ध करवाए गए समाधान के लिए जिस पवित्र और सिद्ध मनुष्य की आवश्यकता थी, वह मनुष्यों के जन्म और जीवन की प्रणाली के अनुसार पाया जाना असंभव था। उसका पृथ्वी पर आना और अस्तित्व अलौकिक विधि से ही संभव हो सकता था, और परमेश्वर ने ही यह प्रावधान करके दिया; उस प्रावधान के लिए आवश्यक सिद्ध मनुष्य के जन्म और जीवन से संबंधित सभी अनिवार्य गुण प्रभु यीशु मसीह में हैं। परमेश्वर का पुत्र, प्रभु यीशु मसीह, मनुष्यों के पापों के लिए बलिदान होने के लिए, अपने परमेश्वरत्व की सामर्थ्य, वैभव और महिमा को छोड़कर, एक साधारण और सामान्य मनुष्य बनकर इस संसार में आ गयाजैसा मसीह यीशु का स्वभाव था वैसा ही तुम्हारा भी स्वभाव हो। जिसने परमेश्वर के स्वरूप में हो कर भी परमेश्वर के तुल्य होने को अपने वश में रखने की वस्तु न समझा। वरन अपने आप को ऐसा शून्य कर दिया, और दास का स्वरूप धारण किया, और मनुष्य की समानता में हो गया। और मनुष्य के रूप में प्रगट हो कर अपने आप को दीन किया, और यहां तक आज्ञाकारी रहा, कि मृत्यु, हां, क्रूस की मृत्यु भी सह ली” (फिलिप्पियों 2:5-8)

       यद्यपि प्रभु यीशु मसीह त्रिएक परमेश्वर का दूसरा व्यक्तित्व, परमेश्वर पुत्र है, किन्तु, जैसा उपरोक्त बाइबल खंड से प्रकट है, पृथ्वी पर मनुष्य बनकर जन्म लेने में उन्होंने अपने आप को ईश्वरीय नहीं वरन मानवीय स्वरूप एवं व्यवहार के अंतर्गत कर लिया, और एक साधारण मनुष्य समान ही जीवन व्यतीत किया:

  • उन्होंने एक सामान्य शिशु के समान जन्म लिया, और अन्य बच्चों के समान ही उनका पालन पोषण हुआ, वे बड़े हुए (लूका 2:6-7) 
  • वे अपने सांसारिक माता-पिता की अधीनता में और उन के आज्ञाकारी रहे (लूका 2:51) 
  • उनके इलाके के लोग उन्हें एक सामान्य मनुष्य, अपने सांसारिक पिता के समान एक बढ़ई का काम करने वाले के रूप में जानते थे (मरकुस 6:3)
  • लोगों के अविश्वास से उन्हें अचंभा हुआ (मरकुस 6:6)
  • सभी मनुष्यों के समान, पैदल यात्रा से उन्हें भी थकान होती थी, भूख और प्यास लगती थी (यूहन्ना 4:6-8), वे भी भोजन करते थे (यूहन्ना 13:4; लूका 24:42-43) 
  • सभी मनुष्यों के समान उनमें भी भावनाएं थीं:
    • वे बच्चों से प्रेम करते थे (मत्ती 19:14)
    • दुखियों और समाज के तिरस्कृत लोगों पर उन्हें तरस आता था (लूका 7:12-13; मत्ती 20:34)
    • वे प्रिय जनों के देहांत और उनके परिवार के दुख से दुखी होकर स्वयं भी रोए (यूहन्ना 11:35-36)
    • वे धार्मिकता और परमेश्वर के वचन के प्रति दोगलेपन के व्यवहार को सहन नहीं कर सकते थे (मत्ती 15:1-9; 23 अध्याय)
    • धार्मिकता के प्रति अनुचित ढिठाई के व्यवहार से उन्हें क्रोध आया (मरकुस 3:5)
    • अधर्मियों और अविश्वासियों पर आने वाले प्रकोप और विनाश से भी वे दुखी हुए और रोए (लूका 19:41-44; मत्ती 23:37)
  • सभी मनुष्यों के समान उन्हें भी नींद की आवश्यकता होती थी (लूका 8:23)
  • उन्हें भी लोगों के विरोध, बैर, और मार डाले जाने की बातों का सामना करना पड़ा (यूहन्ना 5:18, 41; 8:40-41,50, 59)
  • यह जानते हुए भी कि उनका शिष्य यहूदा इस्करियोती उन्हें मार डाले जाने के लिए पकड़वाने वाला है, प्रभु ने यहूदा के विरुद्ध एक भी बात नहीं की, कोई कटाक्ष नहीं किया, उसे औरों के सामने उजागर और अपमानित नहीं किया, वरन उसके प्रभु को छोड़ कर चले जाने तक प्रभु उससे प्रेम का ही व्यवहार करता रहा (यूहन्ना 13:21-30) 
  • पकड़वाए जाने के समय भी प्रभु ने उन्हें पकड़ने आए हुए लोगों के विरुद्ध कुछ नहीं किया, जबकि उन्हें नाश कर देना उसकी सामर्थ्य में था; वरन वहाँ पर भी प्रभु ने अपना बुरा चाहने वाले को चंगाई दी (मत्ती 26:51-53; लूका 22:51) 
  • पकड़वाए जाने के बाद से लेकर क्रूस पर उनकी मृत्यु तक, प्रभु को लगातार उपहास, अपमान, लांछन, यातनाओं और मिथ्या आरोपों का सामना करना पड़ा; किन्तु वे चुपचाप सब सहते रहे, किसी के विरुद्ध कुछ नहीं कहा, किसी को कोई अपशब्द नहीं कहा, कोई श्राप नहीं दिया। वरन उन्हें क्रूस पर चढ़ाने वालों के लिए भी उन्होंने क्षमा की प्रार्थना की, और उनकी निन्दा करने वाले डाकू ने जब पश्चाताप किया, तो उसे भी उन्होंने तुरंत क्षमा कर दिया, स्वर्ग में होने का आश्वासन दे दिया।  

       इन सभी बातों में से होकर निकलने पर भी, जो एक सामान्य मनुष्य से यदि शब्दों और कार्यों में नहीं, तो कम से कम मन या विचारों में पाप करवा सकती हैं, प्रभु यीशु ने कभी कोई पाप नहीं किया। इसीलिए इब्रानियों की पत्री का लेखक उनके लिए लिखता है, “सो जब हमारा ऐसा बड़ा महायाजक है, जो स्वर्गों से हो कर गया है, अर्थात परमेश्वर का पुत्र यीशु; तो आओ, हम अपने अंगीकार को दृढ़ता से थामें रहे। क्योंकि हमारा ऐसा महायाजक नहीं, जो हमारी निर्बलताओं में हमारे साथ दुखी न हो सके; वरन वह सब बातों में हमारे समान परखा तो गया, तौभी निष्पाप निकला” (इब्रानियों 4:14-15)। उनके शिष्य यूहन्ना ने, जो लगभग साढ़े तीन वर्ष उनके साथ रहा था, जिसने उन्हें और उनके कार्यों को निकटता से देखा था, उनकी बातों और शिक्षाओं को सुना था, और जो प्रभु से बहुत घनिष्ठ था (यूहन्ना 13:23;21:7) अपनी पत्री में उनके लिए लिखा, “और तुम जानते हो, कि वह इसलिये प्रगट हुआ, कि पापों को हर ले जाए; और उसके स्वभाव में पाप नहीं” (1 यूहन्ना 3:5) 

       प्रभु यीशु मसीह, हर बात में, हर रीति से पूर्णतः मनुष्य थे; साथ ही वे पूर्णतः परमेश्वर भी थे, जिन्होंने अपने परमेश्वरत्व को, अपनी सामर्थ्य को, पृथ्वी की उनकी सेवकाई के दिनों में केवल औरों की भलाई के लिए ही प्रयोग किया, कभी अपने लिए नहीं (प्रेरितों 10:38; मत्ती 4:1-11)। केवल वो ही वह एकमात्र ऐसे उपयुक्त व्यक्ति थे जो औरों के पापों को अपने ऊपर लेकर उनके लिए दण्ड सह सकते थे, क्योंकि उनमें कभी किसी प्रकार का कोई पाप नहीं था इसलिए उन्हें अपने पाप के विषय कुछ नहीं करना था, जो भी करना था औरों के पापों के लिए ही करना था। इस प्रेमी, अनुग्रहकारी, धीरजवंत प्रभु ने मेरे और आपके पापों के निवारण और पाप की समस्या का समाधान तैयार कर के सेंत-मेंत उपलब्ध करवा दिया है। क्या आप उसके इस समाधान को स्वीकार नहीं करेंगे? आपके प्रति उसके प्रेम और कृपया में ऐसी क्या कमी, क्या बात है जो आपको उसके प्रेम भरे आमंत्रण को स्वीकार करने से रोकती है? उसके निमंत्रण को स्वीकार करने के लिए आपको सच्चे और समर्पित मन से एक प्रार्थना ही तो करनी है, जो आपके मन और जीवन को बदल कर नया कर दे, परमेश्वर के साथ आपका मेल-मिलाप करवा दे।  

यदि आप ने अभी भी नया जन्म, उद्धार नहीं पाया है, अपने पापों के लिए प्रभु यीशु से क्षमा नहीं मांगी है, तो अभी आपके पास अवसर है। स्वेच्छा से, सच्चे और पूर्णतः समर्पित मन से, अपने पापों के प्रति सच्चे पश्चाताप के साथ एक छोटे प्रार्थना, “हे प्रभु यीशु मैं मान लेता हूँ कि मैंने जाने-अनजाने में, मन-ध्यान-विचार और व्यवहार में आपकी अनाज्ञाकारिता की है, पाप किए हैं। मैं मान लेता हूँ कि आपने क्रूस पर दिए गए अपने बलिदान के द्वारा मेरे पापों के दण्ड को अपने ऊपर लेकर पूर्णतः सह लिया, उन पापों की पूरी-पूरी कीमत सदा काल के लिए चुका दी है। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मेरे मन को अपनी ओर परिवर्तित करें, और मुझे अपना शिष्य बना लें, अपने साथ कर लें।आपका सच्चे मन से लिया गया मन परिवर्तन का यह निर्णय आपको जगत के न्याय से बचाकर स्वर्ग की आशीषों का वारिस बना देगा। क्या आप आज, अभी यह निर्णय लेंगे

बाइबल पाठ: फिलिप्पियों 2:1-11 

फिलिप्पियों 2:1 सो यदि मसीह में कुछ शान्ति और प्रेम से ढाढ़स और आत्मा की सहभागिता, और कुछ करुणा और दया है।

फिलिप्पियों 2:2 तो मेरा यह आनन्द पूरा करो कि एक मन रहो और एक ही प्रेम, एक ही चित्त, और एक ही मनसा रखो।

फिलिप्पियों 2:3 विरोध या झूठी बड़ाई के लिये कुछ न करो पर दीनता से एक दूसरे को अपने से अच्छा समझो।

फिलिप्पियों 2:4 हर एक अपनी ही हित की नहीं, वरन दूसरों की हित की भी चिन्ता करे।

फिलिप्पियों 2:5 जैसा मसीह यीशु का स्वभाव था वैसा ही तुम्हारा भी स्वभाव हो।

फिलिप्पियों 2:6 जिसने परमेश्वर के स्वरूप में हो कर भी परमेश्वर के तुल्य होने को अपने वश में रखने की वस्तु न समझा।

फिलिप्पियों 2:7 वरन अपने आप को ऐसा शून्य कर दिया, और दास का स्वरूप धारण किया, और मनुष्य की समानता में हो गया।

फिलिप्पियों 2:8 और मनुष्य के रूप में प्रगट हो कर अपने आप को दीन किया, और यहां तक आज्ञाकारी रहा, कि मृत्यु, हां, क्रूस की मृत्यु भी सह ली।

फिलिप्पियों 2:9 इस कारण परमेश्वर ने उसको अति महान भी किया, और उसको वह नाम दिया जो सब नामों में श्रेष्ठ है।

फिलिप्पियों 2:10 कि जो स्वर्ग में और पृथ्वी पर और जो पृथ्वी के नीचे है; वे सब यीशु के नाम पर घुटना टेकें।

फिलिप्पियों 2:11 और परमेश्वर पिता की महिमा के लिये हर एक जीभ अंगीकार कर ले कि यीशु मसीह ही प्रभु है।

 

एक साल में बाइबल:

·      नीतिवचन 10-12

·      2 कुरिन्थियों 4

शुक्रवार, 10 सितंबर 2021

परमेश्वर का वचन, बाइबल – पाप और उद्धार - 16

 

पाप का समाधान - उद्धार - 12

       हमने उद्धार से संबंधित तीसरे और सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न किइसके लिए यह इतना आवश्यक क्यों हुआ कि स्वयं परमेश्वर प्रभु यीशु को स्वर्ग छोड़कर सँसार में बलिदान होने के लिए आना पड़ा?” पर विचार आरंभ किया है। आदम और हव्वा के पापा के कारण उत्पन्न हुई इस विडंबना के लिए कि पाप को दण्डित भी किया जाए, किन्तु मनुष्य मृत्यु में, अर्थात, परमेश्वर की संगति से अनन्तकाल के लिए अलग भी न हो, परमेश्वर ने जो समाधान दिया, उसके लिए सभी मनुष्यों के लिए उनके पापों को अपने ऊपर उठा लेने और उन पापों के दण्ड को उनके स्थान पर सहन कर लेने वाले ऐसे मनुष्य की आवश्यकता थी, जो पृथ्वी पर ही जन्मा हो, जिसने अपने गर्भ में आने से लेकर अपनी मृत्यु तक अन्य मनुष्यों के समान ही हर परिस्थिति को सहन किया हो, और फिर भी उसने कभी कोई पाप नहीं किया हो। साथ ही इस मनुष्य में कुछ और विशेष गुण भी होने चाहिए थे; परमेश्वर को कोई ऐसा मनुष्य चाहिए था जिसका जीवन माता के गर्भ में आने के समय से ही पूर्णतः निष्पाप और निष्कलंक हो, इतना सामर्थी हो कि मृत्यु उसे वश में न रख सके, और इतना कृपालु हो कि मनुष्यों के पापों को स्वेच्छा से अपने ऊपर लेकर, उनके दण्ड को मनुष्यों के स्थान पर सह ले, और फिर प्रतिफल को मनुष्यों में सेंत-मेंत बाँट दे। केवल ऐसा मनुष्य ही पाप के दण्ड को सभी के लिए चुका सकता था, और मनुष्य को मृत्यु से स्वतंत्र कर के, उनका मेल-मिलाप परमेश्वर से करवा सकता था, अदन की वाटिका में खोई गई स्थिति को मनुष्यों के लिए वापस बहाल कर सकता था। अन्यथा, यदि उस मनुष्य में अपना स्वयं का कोई भी पाप होता, तो फिर वह जो भी बलिदान देता, जो भी कार्य करता, वह उसके अपने पाप के लिए ही होता; वह औरों के पाप के लिए अपना बलिदान नहीं दे सकता था। 

       किन्तु ऐसा पूर्णतः सिद्ध मनुष्य, पाप में पतित मनुष्यों में से आ पाना संभव नहीं था, क्योंकि आदम और हव्वा के पाप के बाद से प्रत्येक मनुष्य पाप के स्वभाव के साथ ही अपनी माता के गर्भ में आता है और शिशु अवस्था से ही पाप की प्रवृत्ति को प्रकट करता रहता है। इसलिए मनुष्यों की प्रणाली के अनुसार माता के गर्भ में पड़ने और जन्म लेने वाला कोई भी मनुष्य पूर्णतः निष्पाप, पवित्र, और निष्कलंक, इस बलिदान के लिए सिद्ध नहीं ठहर सकता। इसीलिए, उत्पत्ति 3:15 में परमेश्वर ने जब इस उद्धारकर्ता की भविष्यवाणी की, तो उसेस्त्री के वंशका बताया; अर्थात, वह मनुष्यों के प्रणाली के अनुसार, किसी पुरुष के कारण माता के गर्भ में नहीं आएगा, वरन केवल स्त्री से ही होगा। इसी लिए यह करने के लिए परमेश्वर ने एक कुँवारी, मरियम को चुना, और उसे बताया गया कि पवित्र आत्मा की सामर्थ्य के द्वारा परमेश्वर उसकी कोख में एक आश्चर्यकर्म करेगा; उसमें से सारे जगत का उद्धारकर्ता जन्म लेगा, और मरियम ने अपने आप को प्रभु परमेश्वर के कार्य के लिए समर्पित कर दिया (लूका 1:26-38)। मरियम की स्वीकृति के बाद, परमेश्वर ने इस महान कार्य के लिए तैयार की गई एक विशेष देह (इब्रानियों 10:5) को मरियम की कोख में डाला। वहाँ से मरियम की कोख में किसी भी अन्य मनुष्य के समान विकसित होकर, समय के अनुसार प्रभु यीशु मसीह ने एक शिशु के रूप में जन्म लिया। उनके गर्भ में आने के समय से लेकर के उनके पृथ्वी के जीवन पर्यंत वे निष्पाप, निष्कलंक, पवित्र, और सिद्ध रहे; उनकी देह में मनुष्य के किए गए पाप का प्रभाव नहीं था। 

       न केवल प्रभु यीशु के मनुष्य बनने की प्रक्रिया पाप के प्रभाव से अछूती थी, वरन उनका जीवन भी पूर्णतः पाप से अछूता थाऔर तुम जानते हो, कि वह इसलिये प्रगट हुआ, कि पापों को हर ले जाए; और उसके स्वभाव में पाप नहीं” (1 यूहन्ना 3:5); “न तो उसने पाप किया, और न उसके मुंह से छल की कोई बात निकली” (1 पतरस 2:22)। प्रभु यीशु ने अपनी आलोचना करने वालों को खुली चुनौती दी, “तुम में से कौन मुझे पापी ठहराता है? और यदि मैं सच बोलता हूं, तो तुम मेरी प्रतीति क्यों नहीं करते?” (यूहन्ना 8:46)। वह हमेशा, सभी का भला करता और परमेश्वर के राज्य की शिक्षा देता हुआ स्थान-स्थान पर जाता रहा, लोगों से मिलता रहा, “कि परमेश्वर ने किस रीति से यीशु नासरी को पवित्र आत्मा और सामर्थ्य से अभिषेक किया: वह भलाई करता, और सब को जो शैतान के सताए हुए थे, अच्छा करता फिरा; क्योंकि परमेश्वर उसके साथ था” (प्रेरितों 10:38)

       उस समय के धर्म के अगुवे – फरीसी, शास्त्री, सदूकी, व्यवस्थापक, आदि, उसे पसंद नहीं करते थे, क्योंकि वह सत्यवादी एवं स्पष्टवादी था, और उनके दोगलेपन को तथा परमेश्वर के वचन के अपने स्वार्थ के लिए दुरुपयोग को खुलकर प्रकट कर देता था। किन्तु फिर भी वे उसके विषय जानते और समझते थे कि परमेश्वर उसके साथ है, और वह परमेश्वर की ओर से बोलता तथा कार्य करता है, और उसकी इस बात को स्वीकार करते थे:फरीसियों में से नीकुदेमुस नाम एक मनुष्य था, जो यहूदियों का सरदार था। उसने रात को यीशु के पास आकर उस से कहा, हे रब्बी, हम जानते हैं, कि तू परमेश्वर की ओर से गुरु हो कर आया है; क्योंकि कोई इन चिन्हों को जो तू दिखाता है, यदि परमेश्वर उसके साथ न हो, तो नहीं दिखा सकता” (यूहन्ना 3:1-2); “सो उन्होंने अपने चेलों को हेरोदियों के साथ उसके पास यह कहने को भेजा, कि हे गुरु; हम जानते हैं, कि तू सच्चा है; और परमेश्वर का मार्ग सच्चाई से सिखाता है; और किसी की परवाह नहीं करता, क्योंकि तू मनुष्यों का मुंह देखकर बातें नहीं करता” (मत्ती 22:16)। किन्तु साथ ही, प्रभु यीशु के विषय यह जानते-मानते हुए भी वे उससे शत्रुता रखते थे, उसे पत्थरवाह करना चाहते थेयहूदियों ने उसको उत्तर दिया, कि भले काम के लिये हम तुझे पत्थरवाह नहीं करते, परन्तु परमेश्वर की निन्दा के कारण और इसलिये कि तू मनुष्य हो कर अपने आप को परमेश्वर बनाता है” (यूहन्ना 10:33) 

उसकी सच्चाई को जानते हुए भी उन्होंने उसे मार डालने का षड्यंत्र बनाया, क्योंकि उसकी ख्याति के कारण उन्हें अपनी कुर्सी हिलती हुए दिखने लगी थीइस पर महायाजकों और फरीसियों ने मुख्य सभा के लोगों को इकट्ठा कर के कहा, हम करते क्या हैं? यह मनुष्य तो बहुत चिन्ह दिखाता है। यदि हम उसे यों ही छोड़ दे, तो सब उस पर विश्वास ले आएंगे और रोमी आकर हमारी जगह और जाति दोनों पर अधिकार कर लेंगे। तब उन में से काइफा नाम एक व्यक्ति ने जो उस वर्ष का महायाजक था, उन से कहा, तुम कुछ नहीं जानते। और न यह सोचते हो, कि तुम्हारे लिये यह भला है, कि हमारे लोगों के लिये एक मनुष्य मरे, और न यह, कि सारी जाति नाश हो” (यूहन्ना 11:47-50) 

प्रभु यीशु का जन्म और जीवन, निष्पाप, निष्कलंक, पवित्र, और सिद्ध था; और वह अपने अनुयायियों को भी अपने इसी स्वरूप में ढालता चला जाता है “...तो प्रभु के द्वारा जो आत्मा है, हम उसी तेजस्वी रूप में अंश अंश कर के बदलते जाते हैं” (2 कुरिन्थियों 3:18); परमेश्वर पिता प्रभु यीशु के सभी शिष्यों, मसीही विश्वासियों को, अपने पुत्र, प्रभु यीशु के स्वरूप में देखना चाहता है, “क्योंकि जिन्हें उसने पहिले से जान लिया है उन्हें पहिले से ठहराया भी है कि उसके पुत्र के स्वरूप में हों ताकि वह बहुत भाइयों में पहलौठा ठहरे” (रोमियों 8:29)। प्रभु यीशु न तो कोई धर्म देने आया, न अपने शिष्यों से चाहा कि वे उसके नाम में कोई धर्म आरंभ करें, या लोगों का धर्म परिवर्तन करें। वह पापी मनुष्यों के मन और जीवन को बदलने, उन्हें अपने स्वर्गीय स्वरूप और स्वभाव में ढालने, और परमेश्वर के साथ रहने वाले बनाने के लिए आया। और यह किसी धार्मिक प्रक्रिया अथवा कर्म-कांड के द्वारा नहीं, प्रभु यीशु में विश्वास, पापों के लिए पश्चाताप, और प्रभु के प्रति समर्पण करने के द्वारा संभव है।

यदि आप ने अभी भी नया जन्म, उद्धार नहीं पाया है, अपने पापों के लिए प्रभु यीशु से क्षमा नहीं मांगी है, तो अभी आपके पास अवसर है। स्वेच्छा से, सच्चे और पूर्णतः समर्पित मन से, अपने पापों के प्रति सच्चे पश्चाताप के साथ एक छोटे प्रार्थना, “हे प्रभु यीशु मैं मान लेता हूँ कि मैंने जाने-अनजाने में, मन-ध्यान-विचार और व्यवहार में आपकी अनाज्ञाकारिता की है, पाप किए हैं। मैं मान लेता हूँ कि आपने क्रूस पर दिए गए अपने बलिदान के द्वारा मेरे पापों के दण्ड को अपने ऊपर लेकर पूर्णतः सह लिया, उन पापों की पूरी-पूरी कीमत सदा काल के लिए चुका दी है। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मेरे मन को अपनी ओर परिवर्तित करें, और मुझे अपना शिष्य बना लें, अपने साथ कर लें।आपका सच्चे मन से लिया गया मन परिवर्तन का यह निर्णय आपको जगत के न्याय से बचाकर स्वर्ग की आशीषों का वारिस बना देगा। क्या आप आज, अभी यह निर्णय लेंगे

बाइबल पाठ: यूहन्ना 10:9-18 

यूहन्ना 10:9 द्वार मैं हूं: यदि कोई मेरे द्वारा भीतर प्रवेश करे तो उद्धार पाएगा और भीतर बाहर आया जाया करेगा और चारा पाएगा।

यूहन्ना 10:10 चोर किसी और काम के लिये नहीं परन्तु केवल चोरी करने और घात करने और नष्ट करने को आता है। मैं इसलिये आया कि वे जीवन पाएं, और बहुतायत से पाएं।

यूहन्ना 10:11 अच्छा चरवाहा मैं हूं; अच्छा चरवाहा भेड़ों के लिये अपना प्राण देता है।

यूहन्ना 10:12 मजदूर जो न चरवाहा है, और न भेड़ों का मालिक है, भेड़िए को आते हुए देख, भेड़ों को छोड़कर भाग जाता है, और भेड़िया उन्हें पकड़ता और तित्तर-बित्तर कर देता है।

यूहन्ना 10:13 वह इसलिये भाग जाता है कि वह मजदूर है, और उसको भेड़ों की चिन्ता नहीं।

यूहन्ना 10:14 अच्छा चरवाहा मैं हूं; जिस तरह पिता मुझे जानता है, और मैं पिता को जानता हूं।

यूहन्ना 10:15 इसी तरह मैं अपनी भेड़ों को जानता हूं, और मेरी भेड़ें मुझे जानती हैं, और मैं भेड़ों के लिये अपना प्राण देता हूं।

यूहन्ना 10:16 और मेरी और भी भेड़ें हैं, जो इस भेड़शाला की नहीं; मुझे उन का भी लाना अवश्य है, वे मेरा शब्द सुनेंगी; तब एक ही झुण्ड और एक ही चरवाहा होगा।

यूहन्ना 10:17 पिता इसलिये मुझ से प्रेम रखता है, कि मैं अपना प्राण देता हूं, कि उसे फिर ले लूं।

यूहन्ना 10:18 कोई उसे मुझ से छीनता नहीं, वरन मैं उसे आप ही देता हूं: मुझे उसके देने का अधिकार है, और उसे फिर लेने का भी अधिकार है: यह आज्ञा मेरे पिता से मुझे मिली है।

एक साल में बाइबल:

·      नीतिवचन 8-9

·      2 कुरिन्थियों

गुरुवार, 9 सितंबर 2021

परमेश्वर का वचन, बाइबल – पाप और उद्धार - 15

 

पाप का समाधान - उद्धार - 11

कल से हमने उद्धार से संबंधित तीसरे और सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न किइसके लिए यह इतना आवश्यक क्यों हुआ कि स्वयं परमेश्वर प्रभु यीशु को स्वर्ग छोड़कर सँसार में बलिदान होने के लिए आना पड़ा?” पर विचार आरंभ किया था। पाप और उसके प्रभावों, तथा सभी मनुष्यों के लिए उद्धार की अनिवार्यता के संदर्भ में हमने देखा था कि पाप के कारण उत्पन्न परिस्थिति से यदि परमेश्वर निष्पक्ष, खरे, न्यायी के समान व्यवहार करता, तो मनुष्य नाश हो जाते; और यदि वह उनके प्रति अपने प्रेम में होकर उनके पाप को अनदेखा कर देता, तो उसका निष्पक्ष, खरा, न्यायी होने की प्रतिष्ठा जाती रहती। इस विडंबना के समाधान के लिए परमेश्वर को कोई ऐसा मनुष्य चाहिए था जो पूर्णतः निष्पाप और निष्कलंक हो, इतना सामर्थी हो कि मृत्यु उसे वश में न रख सके, और इतना कृपालु हो कि मनुष्यों के पापों को स्वेच्छा से अपने ऊपर लेकर, उनके दण्ड को मनुष्यों के स्थान पर सह ले, और फिर प्रतिफल को मनुष्यों में सेंत-मेंत बाँट दे। केवल ऐसा मनुष्य ही पाप के दण्ड को सभी के लिए चुका सकता था, और मनुष्य को मृत्यु से स्वतंत्र कर के, उनका मेल-मिलाप परमेश्वर से करवा सकता था, अदन की वाटिका में खोई गई स्थिति को मनुष्यों के लिए वापस बहाल कर सकता था। 

साथ ही हमने देखा था ऐसा मनुष्यों में से यह हो पाना संभव नहीं था, क्योंकि आदम और हव्वा के पाप के बाद से प्रत्येक मनुष्य पाप के स्वभाव के साथ ही अपनी माता के गर्भ में आता है और शिशु अवस्था से ही पाप की प्रवृत्ति को प्रकट करता रहता है। इसलिए मनुष्यों की प्रणाली के अनुसार माता के गर्भ में पड़ने और जन्म लेने वाला कोई भी मनुष्य पूर्णतः निष्पाप, पवित्र, और निष्कलंक नहीं ठहर सकता। अब समस्या थी कि पाप का निवारण करने वाले को मनुष्य भी होना था, और अपने अस्तित्व के बिल्कुल आरंभ से ही पाप से पूर्णतः विहीन भी होना था। 

परमेश्वर ने यह समाधान अदन की वाटिका में ही प्रदान कर दिया था। शैतान द्वारा सर्प के शरीर में होकर आदम और हव्वा को पाप में गिराने के कारण, परमेश्वर की ओर से पहला श्राप और दण्ड सर्प पर आयातब यहोवा परमेश्वर ने सर्प से कहा, तू ने जो यह किया है इसलिये तू सब घरेलू पशुओं, और सब बनैले पशुओं से अधिक शापित है; तू पेट के बल चला करेगा, और जीवन भर मिट्टी चाटता रहेगा” (उत्पत्ति 3:14)। फिर अपनी इसी बात को आगे ज़ारी रखते हुए शैतान को संबोधित करते हुए, उसे उसका अंत बताया, “और मैं तेरे और इस स्त्री के बीच में, और तेरे वंश और इसके वंश के बीच में बैर उत्पन्न करूंगा, वह तेरे सिर को कुचल डालेगा, और तू उसकी एड़ी को डसेगा” (उत्पत्ति 3:15)। यहाँ पर परमेश्वर द्वारा कही गई बात में शैतान द्वारा उद्धारकर्ता को डसे जाने - मृत्यु चखने, और शैतान के सिर को कुचले जाने, अर्थात शैतान के अंत होने की बाइबल की पहली भविष्यवाणी दी गई है - शैतान जिस उद्धारकर्ता की एड़ी को डसेगा, अर्थात उसे मृत्यु चखाएगा, वही उद्धारकर्ता शैतान के सिर को कुचल डालेगा। हम इस बात को बाद में और विस्तार से देखेंगे। अभी ध्यान देने के लिए हमारे संदर्भ से संबंधित एक बहुत महत्वपूर्ण वाक्यांश यहाँ पर भविष्यवाणी के रूप में दिया गया है -इसके वंश”, अर्थात स्त्री का वंश!

सामान्यतः, संसार भर के सभी लोगों में वंश पिता से माना जाता है, इसीलिए लोग पुत्रों की इतनी लालसा रखते हैं - ताकि उनका वंश चलता रहे। किन्तु यहाँ पर परमेश्वर ने स्त्री के वंश की बात की; अर्थात वह उद्धारकर्ता संसार की सामान्य रीति के अनुसार जन्म नहीं लेगा, उसके स्त्री के गर्भ में आने और जन्म लेने में किसी पुरुष का कोई कार्य नहीं होगा। साथ ही, क्योंकि उस जगत के उद्धारकर्ता को एक सामान्य मनुष्य के समान ही होना था, मनुष्यों के अनुभवों में से होकर निकलना था, और उन परिस्थितियों में भी अपने निष्पाप, पवित्र, निष्कलंक होने को बनाए रखना था, इसलिए उसका जन्म भी मनुष्यों के समान ही होना था। मानवीय जीवन का कोई ऐसा अनुभव नहीं बचना था, जिससे होकर वह न निकले और फिर भी पूर्णतः निर्दोष और पवित्र रहे। 

प्रभु यीशु मसीह ही संसार के इतिहास में एकमात्र हैं जो मनुष्यों की रीति से तो गर्भ में नहीं आए, किन्तु फिर भी किसी भी अन्य मनुष्य के समान गर्भ में रहने, जन्म की पीड़ा और अनिश्चितता सहने, असहाय और माँ पर पूर्णतः निर्भर शिशु होने, फिर बाल्यावस्था से लेकर वयस्क होने के सभी अनुभवों में से होकर निकले। प्रभु यीशु मसीह का अपनी माँ के गर्भ में आना परमेश्वर का किया आश्चर्यकर्म था: उन के संसार में आने के लिए परमेश्वर की ओर से एक देह तैयार की गईइसी कारण वह जगत में आते समय कहता है, कि बलिदान और भेंट तू ने न चाही, पर मेरे लिये एक देह तैयार किया” (इब्रानियों 10:5), और फिर उस देह को मरियम के गर्भ में रखा गया, जहाँ वह किसी भी अन्य मनुष्य के समान उन सभी परिस्थितियों से होते हुए विकसित हुई और फिर उन्होंने एक सामान्य मनुष्य के समान संसार में जन्म लियाअब यीशु मसीह का जन्म इस प्रकार से हुआ, कि जब उस की माता मरियम की मंगनी यूसुफ के साथ हो गई, तो उन के इकट्ठे होने के पहिले से वह पवित्र आत्मा की ओर से गर्भवती पाई गई” (मत्ती 1:18)। उत्पत्ति 3:15 में कही गई परमेश्वर की बात और भविष्यवाणी, सारे जगत के उद्धारकर्ता कास्त्री का वंशहोना पूरी हुई। 

परमेश्वर कभी झूठ या गलत नहीं बोलता है, उसका कहा कभी नहीं टलता है, वह असंभव लगने वाली स्थिति में से भी मार्ग बना देता है। जैसे उसने समस्त जगत के उद्धारकर्ता की भविष्यवाणी की, वैसे ही जगत के अंत और न्याय की भी भविष्यवाणी की है, और यह भी बात दिया कि जब ऐसा होना निकट होगा, उस समय संसार के क्या हाल होंगे, क्या परिस्थितियाँ होंगी (मत्ती 24 अध्याय) जिससे वह समय लोगों पर अनायास और अनपेक्षित न आ जाए, लोग सचेत हो जाएं, अपने आप को उसके पुनः आगमन, और न्याय के लिए उसके सामने खड़े होने के लिए तैयार कर लें। आज की संसार की परिस्थितियाँ और बातें स्पष्ट दिखा रहे हैं कि हम अंत और न्याय के समय के बहुत निकट हैं। क्या आपने अपने आप को परमेश्वर के सम्मुख खड़े होने के लिए तैयार कर लिया है? जैसा हम पीछे देख चुके हैं, केवल वे ही बचाए जाएंगे जिन्होंने नया जन्म, उद्धार पाया है; धर्म के निर्वाह, धार्मिकता के कामों, वचन का ज्ञान आदि पर भरोसा रखने वाले यहीं पीछे छूट जाएंगे। 

यदि आप ने अभी भी नया जन्म, उद्धार नहीं पाया है, अपने पापों के लिए प्रभु यीशु से क्षमा नहीं मांगी है, तो अभी आपके पास अवसर है। स्वेच्छा से, सच्चे और पूर्णतः समर्पित मन से, अपने पापों के प्रति सच्चे पश्चाताप के साथ एक छोटे प्रार्थना, “हे प्रभु यीशु मैं मान लेता हूँ कि मैंने जाने-अनजाने में, मन-ध्यान-विचार और व्यवहार में आपकी अनाज्ञाकारिता की है, पाप किए हैं। मैं मान लेता हूँ कि आपने क्रूस पर दिए गए अपने बलिदान के द्वारा मेरे पापों के दण्ड को अपने ऊपर लेकर पूर्णतः सह लिया, उन पापों की पूरी-पूरी कीमत सदा काल के लिए चुका दी है। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मेरे मन को अपनी ओर परिवर्तित करें, और मुझे अपना शिष्य बना लें, अपने साथ कर लें।आपका सच्चे मन से लिया गया मन परिवर्तन का यह निर्णय आपको जगत के न्याय से बचाकर स्वर्ग की आशीषों का वारिस बना देगा। क्या आप आज, अभी यह निर्णय लेंगे?

बाइबल पाठ: लूका 1:26-38 

लूका 1:26 छठवें महीने में परमेश्वर की ओर से जिब्राईल स्वर्गदूत गलील के नासरत नगर में एक कुंवारी के पास भेजा गया।

लूका 1:27 जिस की मंगनी यूसुफ नाम दाऊद के घराने के एक पुरुष से हुई थी: उस कुंवारी का नाम मरियम था।

लूका 1:28 और स्वर्गदूत ने उसके पास भीतर आकर कहा; आनन्द और जय तेरी हो, जिस पर ईश्वर का अनुग्रह हुआ है, प्रभु तेरे साथ है।

लूका 1:29 वह उस वचन से बहुत घबरा गई, और सोचने लगी, कि यह किस प्रकार का अभिवादन है?

लूका 1:30 स्वर्गदूत ने उस से कहा, हे मरियम; भयभीत न हो, क्योंकि परमेश्वर का अनुग्रह तुझ पर हुआ है।

लूका 1:31 और देख, तू गर्भवती होगी, और तेरे एक पुत्र उत्पन्न होगा; तू उसका नाम यीशु रखना।

लूका 1:32 वह महान होगा; और परमप्रधान का पुत्र कहलाएगा; और प्रभु परमेश्वर उसके पिता दाऊद का सिंहासन उसको देगा।

लूका 1:33 और वह याकूब के घराने पर सदा राज्य करेगा; और उसके राज्य का अन्त न होगा।

लूका 1:34 मरियम ने स्वर्गदूत से कहा, यह क्योंकर होगा? मैं तो पुरुष को जानती ही नहीं।

लूका 1:35 स्वर्गदूत ने उसको उत्तर दिया; कि पवित्र आत्मा तुझ पर उतरेगा, और परमप्रधान की सामर्थ्य तुझ पर छाया करेगी इसलिये वह पवित्र जो उत्पन्न होनेवाला है, परमेश्वर का पुत्र कहलाएगा।

लूका 1:36 और देख, और तेरी कुटुम्बिनी इलीशिबा के भी बुढ़ापे में पुत्र होने वाला है, यह उसका, जो बांझ कहलाती थी छठवां महीना है।

लूका 1:37 क्योंकि जो वचन परमेश्वर की ओर से होता है वह प्रभाव रहित नहीं होता।

लूका 1:38 मरियम ने कहा, देख, मैं प्रभु की दासी हूं, मुझे तेरे वचन के अनुसार हो: तब स्वर्गदूत उसके पास से चला गया।

एक साल में बाइबल:

·      नीतिवचन 6-7

·      2 कुरिन्थियों

बुधवार, 8 सितंबर 2021

परमेश्वर का वचन, बाइबल – पाप और उद्धार - 14

 

पाप का समाधान - उद्धार - 10

आज से हम अपने तीसरे प्रश्नइसके लिए यह इतना आवश्यक क्यों हुआ कि स्वयं परमेश्वर प्रभु यीशु को स्वर्ग छोड़कर सँसार में बलिदान होने के लिए आना पड़ा?” को देखना आरंभ करते हैं। पहले के लेखपाप का परिणाममें हम ने देखा था कि मनुष्य के पाप ने परमेश्वर के सामने एक विडंबना लाकर रख दी - उसका न्यायी, निष्पक्ष और खरा होना माँग करता था कि पाप करने वाले मनुष्य को उसके किए का दण्ड भुगतना होगा; किन्तु मनुष्य के प्रति उसका प्रेम मनुष्य कोमृत्युअर्थात उससे अनन्त विछोह में, नरक में देखना नहीं चाहता था। अब उसे कोई ऐसा मार्ग चाहिए था जिससे उसका न्याय की माँग भी पूरी हो जाए, और मनुष्य को नाश में भी न जाना पड़े। 

इस समाधान के लिए उसे कोई ऐसा मनुष्य चाहिए था हो जो पूर्णतः निष्पाप और निष्कलंक हो, इतना सामर्थी हो कि मृत्यु उसे वश में न रख सके, और इतना कृपालु हो कि मनुष्यों के पापों को स्वेच्छा से अपने ऊपर लेकर, उनके दण्ड को मनुष्यों के स्थान पर सह ले, और फिर प्रतिफल को मनुष्यों में सेंत-मेंत बाँट दे। ऐसा मनुष्य पाप के दण्ड को सभी के लिए चुका सकता था, और मनुष्य को मृत्यु से स्वतंत्र कर के, उनका मेल-मिलाप परमेश्वर से करवा सकता था, अदन की वाटिका में खोई गई स्थिति को मनुष्यों के लिए वापस बहाल कर सकता था।

मनुष्यों के पाप का समाधान प्रदान करने वाले में इन बातों का होना अनिवार्य था:

  • वह एक मनुष्य हो 
  • वह अपना जीवन और सभी कार्य परमेश्वर की इच्छा और आज्ञाकारिता में होकर, उसे समर्पित रहकर करे  
  • वह अपने जीवन भर मन-ध्यान-विचार-व्यवहार में पूर्णतः निष्पाप, निष्कलंक, और पवित्र रहा हो
  • वह स्वेच्छा से सभी मनुष्यों के पापों को अपने ऊपर लेने और उनके दण्ड - मृत्यु को सहने के लिए तैयार हो 
  • वह मृत्यु से वापस लौटने की सामर्थ्य रखता हो; मृत्यु उस पर जयवंत नहीं होने पाए
  • वह अपने इस महान बलिदान के प्रतिफलों को सभी मनुष्यों को सेंत-मेंत देने के लिए तैयार हो 

 

       इन सभी बातों की पूर्ति किसी मनुष्य के लिए कर पाना असंभव था। आदम और हव्वा के पाप ने उनमें और फिर उनकी संतान में पाप करने के प्रवृत्ति डाल दी थी। हर मनुष्य पाप करने के स्वभाव के साथ ही जन्म लेता है, जैसा दाऊद ने अपने एक भजन में कहादेख, मैं अधर्म के साथ उत्पन्न हुआ, और पाप के साथ अपनी माता के गर्भ में पड़ा” (भजन 51:5); दाऊद ने यह नहीं कहा कि मैं पाप के द्वारा या पाप के कारण अपनी माता के गर्भ में पड़ा, वरन माता के गर्भ में पड़ने के समय से ही उस में पाप विद्यमान था। यह केवल कहने की बात नहीं है, एक व्यावहारिक तथ्य है; बच्चे पाप के स्वभाव के साथ ही जन्म लेते हैं। एक शिशु जो अभी बोलना भी नहीं जानता है, वह क्रोध करता है, लालच करता है - अपनी पसंद की चीज़ को छोड़ना या किसी और देना नहीं चाहता है, अपने किए किसी अनुचित कार्य के लिए इनकार करना, उसे अस्वीकार करना जानता है, आदि। किसी ने भी उसे ऐसा करना नहीं सिखाया है, वह स्वतः ही ऐसा करने की समझ और क्षमता रखता है। हम अकसर इन बातों कोबाल-व्यवहारकह और समझ कर, हंस कर टाल देते हैं। किन्तु जब यहीबाल व्यवहारकी बातें कोई थोड़ा बड़ा बच्चा या वयस्क करता है तो इसी को हम ही बुरा, आपत्तिजनक, अस्वीकार्य कहते हैं; और जो बारंबार ऐसा करता रहता है उसे बुरा या पापी मानते हैं। व्यवहार और मनसा वही है, केवल आयु का अंतर है। इसलिए हम उस मनसा और व्यवहार को संज्ञा चाहे कोई भी दे लें, वास्तविकता तो अपरिवर्तनीय है, बनी ही रहेगी - प्रत्येक मनुष्य पाप की प्रवृत्ति, पाप के दोष के साथ जन्म लेता है। यह प्रवृत्ति और मनसा सभी के मन में बनी रहती है, और समय तथा अवसर के अनुसार प्रकट होकर व्यवहार में दिखने लगती है। तब हम व्यक्ति को पापी कहना आरंभ कर देते हैं। 

मनुष्य अपने प्रयासों से अपनी इस प्रवृत्ति को दबा सकता है, नियंत्रित कर सकता है, बाहर प्रकट होने से रोक सकता है; किन्तु मन-ध्यान-विचारों में इस प्रकार का पाप आने को नहीं रोक सकता है। हम देख चुके हैं कि परमेश्वर की दृष्टि में मन के अप्रत्यक्ष पाप भी, व्यवहार में किए गए प्रत्यक्ष पापों के समान ही दण्डनीय हैं। इसीलिए बाइबल में अय्यूब की पुस्तक में लिखा गया है:

  • अशुद्ध वस्तु से शुद्ध वस्तु को कौन निकाल सकता है? कोई नहीं” (अय्यूब 14:4)
  • मनुष्य है क्या कि वह निष्कलंक हो? और जो स्त्री से उत्पन्न हुआ वह है क्या कि निर्दोष हो सके? देख, वह अपने पवित्रों पर भी विश्वास नहीं करता, और स्वर्ग भी उसकी दृष्टि में निर्मल नहीं हैफिर मनुष्य अधिक घिनौना और मलीन है जो कुटिलता को पानी के समान पीता है” (अय्यूब 15:14-16)
  • फिर मनुष्य ईश्वर की दृष्टि में धमीं क्योंकर ठहर सकता है? और जो स्त्री से उत्पन्न हुआ है वह क्योंकर निर्मल हो सकता है? देख, उसकी दृष्टि में चन्द्रमा भी अन्‍धेरा ठहरता, और तारे भी निर्मल नहीं ठहरतेफिर मनुष्य की क्या गिनती जो कीड़ा है, और आदमी कहां रहा जो केंचुआ है!” (अय्यूब 25:4-6)

       और यशायाह नबी ने लिखा, “हम तो सब के सब अशुद्ध मनुष्य के से हैं, और हमारे धर्म के काम सब के सब मैले चिथड़ों के समान हैं। हम सब के सब पत्ते के समान मुर्झा जाते हैं, और हमारे अधर्म के कामों ने हमें वायु के समान उड़ा दिया है” (यशायाह 64:6)

       तो अब परमेश्वर को एक ऐसा मनुष्य चाहिए था जो गर्भ में पड़ने के समय से लेकर जीवन पर्यंत मन-ध्यान-विचार-व्यवहार में निष्पाप, पवित्र, और निष्कलंक रहा हो। मनुष्य की स्वाभाविक जन्म-प्रणाली के अनुसार यह असंभव था। 

       इसीलिए बाइबल और मसीही विश्वास की यह शिक्षा है कि प्रत्येक मनुष्य पापी है; प्रत्येक मनुष्य को पापों की क्षमा और उद्धार की आवश्यकता है। यदि आप ने अभी भी उद्धार नहीं पाया है, अपने पापों के लिए प्रभु यीशु से क्षमा नहीं मांगी है, तो अभी आपके पास अवसर है। स्वेच्छा से, सच्चे और पूर्णतः समर्पित मन से, अपने पापों के प्रति सच्चे पश्चाताप के साथ एक छोटे प्रार्थना, “हे प्रभु यीशु मैं मान लेता हूँ कि मैंने जाने-अनजाने में, मन-ध्यान-विचार और व्यवहार में आपकी अनाज्ञाकारिता की है, पाप किए हैं। मैं मान लेता हूँ कि आपने क्रूस पर दिए गए अपने बलिदान के द्वारा मेरे पापों के दण्ड को अपने ऊपर लेकर पूर्णतः सह लिया, उन पापों की पूरी-पूरी कीमत सदा काल के लिए चुका दी है। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मेरे मन को अपनी ओर परिवर्तित करें, और मुझे अपना शिष्य बना लें, अपने साथ कर लें।आपका सच्चे मन से लिया गया मन परिवर्तन का यह निर्णय आपके इस जीवन तथा परलोक के जीवन को स्वर्गीय जीवन बना देगा।

बाइबल पाठ: अय्यूब 14:1-10 

अय्यूब 14:1 मनुष्य जो स्त्री से उत्पन्न होता है, वह थोड़े दिनों का और दुख से भरा रहता है।

अय्यूब 14:2 वह फूल के समान खिलता, फिर तोड़ा जाता हे; वह छाया की रीति पर ढल जाता, और कहीं ठहरता नहीं।

अय्यूब 14:3 फिर क्या तू ऐसे पर दृष्टि लगाता है? क्या तू मुझे अपने साथ कचहरी में घसीटता है?

अय्यूब 14:4 अशुद्ध वस्तु से शुद्ध वस्तु को कौन निकाल सकता है? कोई नहीं।

अय्यूब 14:5 मनुष्य के दिन नियुक्त किए गए हैं, और उसके महीनों की गिनती तेरे पास लिखी है, और तू ने उसके लिये ऐसा सिवाना बान्धा है जिसे वह पार नहीं कर सकता,

अय्यूब 14:6 इस कारण उस से अपना मुंह फेर ले, कि वह आराम करे, जब तक कि वह मजदूर के समान अपना दिन पूरा न कर ले।

अय्यूब 14:7 वृक्ष की तो आशा रहती है, कि चाहे वह काट डाला भी जाए, तौभी फिर पनपेगा और उस से नर्म नर्म डालियां निकलती ही रहेंगी।

अय्यूब 14:8 चाहे उसकी जड़ भूमि में पुरानी भी हो जाए, और उसका ठूंठ मिट्टी में सूख भी जाए,

अय्यूब 14:9 तौभी वर्षा की गन्‍ध पाकर वह फिर पनपेगा, और पौधे के समान उस से शाखाएं फूटेंगी।

अय्यूब 14:10 परन्तु पुरुष मर जाता, और पड़ा रहता है; जब उसका प्राण छूट गया, तब वह कहां रहा?

एक साल में बाइबल:

·      नीतिवचन 3-5

·      2 कुरिन्थियों