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शुक्रवार, 13 अगस्त 2010

नियमों का प्रेम

लेखन कला सिखाते समय मैं अपने विद्यार्थियों को समझाता हूं कि छोटे और संक्षिप्त वाक्यों का प्रयोग ज़्यादा अच्छा होता है जैसे "कला और लेखन" अथवा "जीवन, स्वतन्त्रता और आनन्द की खोज" आदि। अपनी जीविका के इस कार्य के आरंभिक दिनों में, उन के लेखों की समीक्षा करते समय मुझे लेखकों को समझाना और मनना पड़ता था कि बस ऐसा करना अच्छा होता है; कुछ समय बाद मुझे इस बारे में एक "नियम" मिल गया। मैंने पाया कि मेरा कहना कि "इस बारे में बस मेरा विश्वास करो" की अपेक्षा, अब इस "नियम" के आधार पर मेरा उन लेखकों के लेखों की समीक्षा एवं सम्पादन करना उनको सहजता से ग्रहण योग्य होता था।

यह मानव स्वभाव का एक भाग है। नियमों के साथ हमारा एक प्रेम/बैर का संबंध है। हमें नियम पसन्द नहीं लेकिन नियमों के बिना हम सही-गलत की पहचान करने और मानने के लिये भी असमंजस में रहते हैं।

परमेश्वर का, हमारे आदी पूर्वज, आदम और हव्वा से संबंध प्रेम पूर्ण विश्वास पर आधारित था। उन्हें केवल एक ही नियम दिया गया था जो उन्हें ऐसे ज्ञान से बचाने के लिये था जिसका अन्त मृत्यु था। लेकिन जब अनाज्ञाकारिता के कारण विश्वास का यह संबंध टूट गया तो उस भटके हुए दम्पति और उनकी आने वाली सन्तान की सुरक्षा के लिये, परमेश्वर ने और कई नियम दिये।

प्रभु यीशु मसीह में एक बार फिर परमेश्वर ने प्रगट किया कि जो उत्तम जीवन वह हमारे लिये चाहता है वह नियमों पर नहीं वरन उसके साथ बने संबंध पर आधारित है। जैसा पौलुस ने लिखा, परमेश्वर के सारे नियमों का सार एक शब्द - प्रेम, में निहित है। क्योंकि हम मसीह - जो प्रेम का प्रतिरूप है, "में हैं" इसलिये हम परमेश्वर और मनुष्य, दोनों के साथ शांति और मेल मिलाप का आनन्द ले सकते हैं - किसी नियम के कारण नहीं, परन्तु प्रेम में होने के कारण। - जूली एकरमैन लिंक


संसार की सबसे शक्तिशाली सामर्थ किसी नियम की मजबूरी नहीं वरन प्रेम की अनुकम्पा है।

प्रेम पड़ोसी की कुछ बुराई नहीं करता, इसलिये प्रेम रखना व्यवस्था को पूरा करना है। - रोमियों १३:१०

बाइबल पाठ: रोमियों १३:१-१०
हर एक व्यक्ति प्रधान अधिकारियों के आधीन रहे, क्‍योंकि कोई अधिकार ऐसा नहीं, जो परमेश्वर की ओर से न हो; और जो अधिकार हैं, वे परमेश्वर के ठहराए हुए हैं।
इस से जो कोई अधिकार का विरोध करता है, वह परमेश्वर की विधि का साम्हना करता है, और साम्हना करने वाले दण्‍ड पाएंगे।
क्‍योंकि हाकिम अच्‍छे काम के नहीं, परन्‍तु बुरे काम के लिये डर का कारण हैं, सो यदि तू हाकिम से निडर रहना चाहता है, तो अच्‍छा काम कर और उस की ओर से तेरी सराहना होगी।
क्‍योंकि वह तेरी भलाई के लिये परमेश्वर का सेवक है। परन्‍तु यदि तू बुराई करे, तो डर, क्‍योकि वह तलवार व्यर्थ लिये हुए नहीं और परमेश्वर का सेवक है कि उसके क्रोध के अनुसार बुरे काम करने वाले को दण्‍ड दे।
इसलिये आधीन रहना न केवल उस क्रोध से परन्‍तु डर से अवश्य है, वरन विवेक भी यही गवाही देता है।
इसलिये कर भी दो, क्‍योंकि वे परमेश्वर के सेवक हैं, और सदा इसी काम में लगे रहते हैं।
इसलिये हर एक का हक चुकाया करो, जिस कर चाहिए, उसे कर दो, जिसे महसूल चाहिए, उसे महसूल दो, जिस से डरना चाहिए, उस से डरो, जिस का आदर करना चाहिए उसका आदर करो।।
आपस के प्रेम को छोड़ और किसी बात में किसी के कर्जदार न हो, क्‍योंकि जो दूसरे से प्रेम रखता है, उसी ने व्यवस्था पूरी की है।
क्‍योंकि यह कि व्यभिचार न करना, हत्या न करना, चोरी न करना, लालच न करना, और इन को छोड़ और कोई भी आज्ञा हो तो सब का सारांश इस बात में पाया जाता है, कि अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रख।
प्रेम पड़ोसी की कुछ बुराई नहीं करता, इसलिये प्रेम रखना व्यवस्था को पूरा करना है।

एक साल में बाइबल:
  • भजन ८७, ८८
  • रोमियों १३

गुरुवार, 12 अगस्त 2010

वह पर्याप्त है

कभी कभी हम जीवन की कुछ बातों से हताश और उदास हो जाते हैं, जैसे, किसी न किसी कारण चढ़ते रहने वाल कर्ज़, निराशाएं, बीमारीयां, लोगों से मनमुटाव आदि। ऐसा प्रभु यीशु के चेलों के साथ हुआ और मेरे साथ भी हुआ।

ऐसे में, इन परिस्थितियों पर जयवन्त होने के लिये, प्रभु यीशु विभिन्न तरीकों से हमें आश्वासन देता है। मत्ती रचित सुसमाचार के चौथे अध्याय में तीन बार प्रभु यीशु शैतान द्वारा उसपर लाई गई परीक्षाओं पर यह कह कर विजयी हुआ, (परमेश्वर के वचन के संदर्भ में) कि "लिखा है..." (पद ४, ७, १०)। प्रभु यीशु ने इस प्रकार हमें प्रमाण दिया कि परमेश्वर का वचन खरा है और हर प्रकार की परीक्षा पर जयवन्त करने में सक्षम है।

गरजते तूफान और उफनते समुद्र को शांत करके (मत्ती १४:२७) प्रभु यीशु ने भयभीत चेलों को दिखाया कि उसकी उपस्थिति उन पर आने वाले परेशानी के हर तूफान को रोकने के लिये काफी है।

क्रूस पर से यह कह कर कि "पूरा हुआ" (यूहन्ना १९:३०) प्रभु यीशु ने आशव्स्त किया कि उसकी मृत्यु हमारे पापों की कीमत चुका कर हमें पाप की गुलामी से आज़ाद करने के लिये पर्याप्त है।

हमारी कोई भी परिस्थिति हो, प्रभु यीशु अपने प्रेम, अनुकंपा और अनुग्रह के साथ, सर्वदा हमारे साथ बना रहता है। जीवन की हर परिस्थिति के पार ले जाने के लिये, हमारे साथ सदा बनी रहने वाली उसकी उपस्थिति पर्याप्त है। - डेव एगनर


परमेश्वर का प्रेम हमें परीक्षाओं में पड़ने से नहीं बचाता, वरन उन में से जयवन्त होकर निकलने में हमारी सहायता करता है।

बाइबल पाठ: मत्ती १४:२२-३३
और उस ने तुरन्‍त अपने चेलों को बरबस नाव पर चढ़ाया, कि वे उस से पहिले पार चले जाएं, जब तक कि वह लोगों को विदा करे।
वह लोगों को विदा कर के, प्रार्थना करने को अलग पहाड़ पर चढ़ गया, और सांझ को वहां अकेला था।
उस समय नाव झील के बीच लहरों से डगमगा रही थी, क्‍योंकि हवा साम्हने की थी।
और वह रात के चौथे पहर झील पर चलते हुए उन के पास आया।
चेले उस को झील पर चलते हुए देखकर घबरा गए! और कहने लगे, वह भूत है; और डर के मारे चिल्ला उठे।
यीशु ने तुरन्‍त उन से बातें की, और कहा, ढाढ़स बान्‍धो, मैं हूं; डरो मत।
पतरस ने उस को उत्तर दिया, हे प्रभु, यदि तू ही है, तो मुझे अपने पास पानी पर चल कर आने की आज्ञा दे।
उस ने कहा, आ: तब पतरस नाव पर से उतरकर यीशु के पास जाने को पानी पर चलने लगा।
पर हवा को देखकर डर गया, और जब डूबने लगा, तो चिल्लाकर कहा हे प्रभु, मुझे बचा।
यीशु ने तुरन्‍त हाथ बढ़ाकर उसे थाम लिया, और उस से कहा, हे अल्प-विश्वासी, तू ने क्‍यों सन्‍देह किया?
जब वे नाव पर चढ़ गए, तो हवा थम गई।
इस पर जो नाव पर थे, उन्‍होंने उसे दण्‍डवत कर के कहा, सचमुच तू परमेश्वर का पुत्र है।

एक साल में बाइबल:
  • भजन ८४-८६
  • रोमियों १२

बुधवार, 11 अगस्त 2010

चिंता या परमेश्वर

क्या आप अपने खर्चों, भविष्य, स्वास्थ्य, कर्ज़, पारिवारिक जीवन आदि बातों के कारण सदा चिंतित रहते हैं? क्या कोई न कोई चिंता आप पर सदा हावी रहती है? यदि ऐसा है तो संभवतः आपको चिंता करने का मानसिक रोग है। इस रोग का रोगी लगातार, जीवन की लगभग हर बात के लिये, चिंता करता रहता है। थोड़ी सी चिंता करना तो स्वभाविक है, परन्तु हर बात के लिये लगातार अनियंत्रित चिंता करते रहना असामान्य और अस्वभाविक है।

क्लेश और उत्पीड़न से प्रताड़ित प्रथम शताब्दी के मसीही विश्वासी यरुशलेम से खदेड़े जकर सारे एशिया में फैल गए (१ पतरस १:१-७)। प्रभु यीशु के इन अनुयायीयों में से कई, जीवन के खतरे और इधर उधर भटकने के कारण चिंतित थे। पतरस ने उन्हें प्रोत्साहित किया कि वे स्व्यं चिंता न करें, वरन अपनी सारी चिंता परमेश्वर पर डाल दें (१ पतरस ५:७)। उसने उन्हें समझाया कि उनका अपनी चिंताओं का बोझ उठाकर चलना व्यर्थ है जबकि वे अपनी सारी चिंता परमेश्वर पर छोड़ सकते हैं, जो उनके साथ घटित होने वाली हर बात का ध्यान रखता है।

क्या आप को चिंता करने की आदत है? अपनी चिंताएं परमेश्वर को उठाने दीजिए। चिंता करना छोड़िये, परमेश्वर पर विश्वास करना आरंभ कीजीए। - मारविन विलियम्स


हम चिंताओं का बोझ उठाएं, परमेश्वर की कभी ऐसी मन्सा नहीं रही।

और अपनी सारी चिन्‍ता उसी पर डाल दो, क्‍योंकि उस को तुम्हारा ध्यान है। - १ पतरस ५:७


बाइबल पाठ: १ पतरस ५:६-११

इसलिये परमेश्वर के बलवन्‍त हाथ के नीचे दीनता से रहो, जिस से वह तुम्हें उचित समय पर बढ़ाए।
और अपनी सारी चिन्‍ता उसी पर डाल दो, क्‍योंकि उस को तुम्हारा ध्यान है।
सचेत हो, और जागते रहो, क्‍योंकि तुम्हारा विरोधी शैतान गर्जने वाले सिंह की नाईं इस खोज में रहता है, कि किस को फाड़ खाए।
विश्वास में दृढ़ होकर, और यह जान कर उसका साम्हना करो, कि तुम्हारे भाई जो संसार में हैं, ऐसे ही दुख भुगत रहे हैं।
अब परमेश्वर जो सारे अनुग्रह का दाता है, जिस ने तुम्हें मसीह में अपनी अनन्‍त महिमा के लिये बुलाया, तुम्हारे थोड़ी देर तक दुख उठाने के बाद आप ही तुम्हें सिद्ध और स्थिर और बलवन्‍त करेगा।
उसी का साम्राज्य युगानुयुग रहे। आमीन।

एक साल में बाइबल:
  • भजन ८१-८३
  • रोमियों ११:१९-३६

मंगलवार, 10 अगस्त 2010

सुसमाचार का केन्द्र बिन्दु

भारत में कार्य करने वाले प्रसिद्ध सुसमाचार प्रचारक स्टैनली जोन्स को महात्मा गांधी से मिलने का अवसर मिला। उन्होंने गांधीजी से पूछा "आपके देश में मसीही विश्वास और अधिक प्रभावकारी कैसे हो सकता है?" गांधीजी ने कुछ समय विचार कर उत्तर दिया कि इसके लिये तीन बातों की आवश्यक्ता होगी।

पहली, मसीहियों को मसीह के समान जीवन जी कर दिखाना होगा; दूसरा, मसीही विश्वास को बिना किसी मिलावाट या लालच के प्रस्तुत करना होगा; तीसरा, मसीहियों को वह प्रेम दिखाना होगा जो मसीही शिक्षा का केंद्र बिन्दु है।

ये तीन महत्वपूर्ण सुझाव संसार भर में प्रभावकारी रीति से सुसमाचार प्रचार के लिये आवश्यक हैं। परमेश्वर के प्रेम के सन्देशवाहक होने के कारण, हमें ऐसे मानवीय दर्पण बनना है, जो अपने निज जीवन को लगातार प्रभु के स्वरूप में ढलते हुए, बिना किसी बिगाड़ के, प्रतिबिंबित करते हैं। ना ही हमें कुटिलता के साथ जीवन व्यतीत करना है (२ कुरिन्थियों ४:२)। यदि हमारे जीवन प्रभु का एक धुंधला आत्मिक स्वरूप प्रतिबिंबित करेंगे तो अनुग्रह से मिले उद्धार का सत्य स्पष्ट रूप से प्रतिपादित नहीं हो सकेगा (पद ३-५)। हमें अपने विश्वास की प्रमुख बातों को सफाई से, बाइबल द्वारा बताना है। हमें परमेश्वर के वचन को खराई से प्रयोग करना है, किसी मिलावट के साथ नहीं (पद २)। साथ ही, हमारे जीवन परमेश्वर और दूसरों के प्रति प्रेम का चित्रण होने चाहियें (१ युहन्ना ५:१, २)।

हम यह सुनिश्चित करें कि क्या हम मसीह के स्वरूप और परमेश्वर के प्रेम का सत्य अपने जीवनों द्वारा साफ साफ प्रतिबिंबित करते हैं? - वेर्नन ग्राउंड्स


विश्वासी के लिये संसार में जीने का मुख्य उद्देश्य मसीह की समानता को दिखाना है।

परन्‍तु जब हम सब के उघाड़े चेहरे से प्रभु का प्रताप इस प्रकार प्रगट होता है, जिस प्रकार दर्पण में, तो प्रभु के द्वारा जो आत्मा है, हम उसी तेजस्‍वी रूप में अंश अंश कर के बदलते जाते हैं। - २ कुरिन्थियों ३:१८


बाइबल पाठ: २ कुरिन्थियों ४:१-६

इसलिये जब हम पर ऐसी दया हुई, कि हमें यह सेवा मिली, तो हम हियाव नहीं छोड़ते।
परन्‍तु हम ने लज्ज़ा के गुप्‍त कामों को त्याग दिया, और न चतुराई से चलते, और न परमेश्वर के वचन में मिलावट करते हैं, परन्‍तु सत्य को प्रगट करके, परमेश्वर के साम्हने हर एक मनुष्य के विवेक में अपनी भलाई बैठाते हैं।
परन्‍तु यदि हमारे सुसमाचार पर परदा पड़ा है, तो यह नाश होने वालों ही के लिये पड़ा है।
और उन अविश्वासियों के लिये, जिन की बुद्धि को इस संसार के ईश्वर ने अन्‍धी कर दी है, ताकि मसीह जो परमेश्वर का प्रतिरूप है, उसके तेजोमय सुसमाचार का प्रकाश उन पर न चमके।
क्‍योंकि हम अपने को नहीं, परन्‍तु मसीह यीशु को प्रचार करते हैं, कि वह प्रभु है, और उसके विषय में यह कहते हैं, कि हम यीशु के कारण तुम्हारे सेवक हैं।
इसलिये कि परमेश्वर ही है, जिस ने कहा, कि अन्‍धकार में से ज्योति चमके, और वही हमारे हृदयों में चमका, कि परमेश्वर की महिमा की पहिचान की ज्योति यीशु मसीह के चेहरे से प्रकाशमान हो।

एक साल में बाइबल:
  • भजन ७९, ८०
  • रोमियों ११:१-१८

सोमवार, 9 अगस्त 2010

हां, परन्तु...

विश्वविद्यालय के छात्रों के परीक्षा पत्र जांचते समय कई बार अचंभित करने वाली बातें लिखी मिलती हैं। कभी अनपेक्षित रूप से कोई छात्र बड़ी अच्छी तरह से विष्य को समझने का प्रमाण देता है और उसके उत्तर की लेखन शैली भी अच्छी होती है, और तब लगता है कि मेरा पढ़ाना सफल हुआ।

किन्तु कुछ अन्य अचंभे की बातें ऐसे प्रसन्न करने वाली नहीं होतीं। जैसे, एक छात्र ने लिखा, "बाइबल कहती है, ’तू ....मत करना।’" उसने रिक्त स्थान में वह कार्य लिखा जिसमें वह संलग्न था, यद्यपि पवित्र शास्त्र में ऐसा कोई पद नहीं है। उसका पर्चा पढ़ते समय, आरंभ में मुझे लगा कि वह पवित्र शास्त्र भली भांति नहीं जानता है, जब तक मैं उसके निष्कर्ष तक नहीं पहुंचा। उसके द्वारा लिखे अन्तिम वाक्य, "यद्यपि बाइबल इस को गलत कहती है, परन्तु मैं ऐसा नहीं समझता, मैं तो उसे ठीक मानता हूं" ने उसकी वास्तविक्ता स्पष्ट करी।

किसी भी व्यक्ति का यह समझना कि वह किसी भी विष्य के बारे में परमेश्वर से अधिक या बेहतर जानता है, उसमें विद्यमान बहुत खतरनाक अहंकार का सूचक है। पवित्र शास्त्र ने भविष्य में ऐसी विचारधारा लोगों में पनपने की भविष्यद्वाणी पहले से ही कर रखी है। पौलुस ने २ तिमिथियुस ४:३, ४ में चिताया "क्‍योंकि ऐसा समय आएगा, कि लोग खरा उपदेश न सह सकेंगे पर कानों की खुजली के कारण अपनी अभिलाषाओं के अनुसार अपने लिये बहुतेरे उपदेशक बटोर लेंगे। और वे अपने कान सत्य से फेरकर कथा-कहानियों पर लगाएंगे।" यह बात ऐसे लोगों के सन्दर्भ में लिखी गई है जो पवित्र शास्त्र की खरी शिक्षा नहीं अपितु अपनी दृष्टि में सही और अपनी पसन्द के अनुसार शिक्षाएं चाहते हैं, और नहीं मानते कि संपूर्ण पवित्र शास्त्र परमेश्वर की प्रेरणा से रचित है (२ तिमिथियुस ३:१६)।

जब बाइबल किसी बात अथवा सिद्धान्त को स्पष्ट दिखा देती है, तो उसका पालन करके हम परमेश्वर का आदर करते हैं। विश्वासियों के लिये "हां, परन्तु..." जैसे प्रत्युत्तर का कोई स्थान नहीं है। - डेव ब्रैनन


बाइबल को पढ़िये, उसपर विश्वास कीजिये और उसका पालन कीजिये।

और वे अपने कान सत्य से फेरकर कथा-कहानियों पर लगाएंगे। - २ तिमिथियुस ४:४


बाइबल पाठ: २ तिमिथियुस ४:१-८

परमेश्वर और मसीह यीशु को गवाह करके, जो जीवतों और मरे हुओं का न्याय करेगा, उसे और उसके प्रगट होने, और राज्य को सुधि दिलाकर मैं तुझे चिताता हूं।
कि तू वचन को प्रचार कर, समय और असमय तैयार रह, सब प्रकार की सहनशीलता, और शिक्षा के साथ उलाहना दे, और डांट, और समझा।
क्‍योंकि ऐसा समय आएगा, कि लोग खरा उपदेश न सह सकेंगे पर कानों की खुजली के कारण अपनी अभिलाषाओं के अनुसार अपने लिये बहुतेरे उपदेशक बटोर लेंगे।
और वे अपने कान सत्य से फेरकर कथा-कहानियों पर लगाएंगे।
पर तू सब बातों में सावधान रह, दुख उठा, सुसमाचार प्रचार का काम कर और अपनी सेवा को पूरा कर।
क्‍योंकि अब मैं अर्घ की नाईं उंडेला जाता हूं, और मेरे कूच का समय आ पहुंचा है।
मैं अच्‍छी कुश्‍ती लड़ चुका हूं मैं ने अपनी दौड़ पूरी कर ली है, मैं ने विश्वास की रखवाली की है।
भविष्य में मेरे लिये धर्म का वह मुकुट रखा हुआ है, जिसे प्रभु, जो धर्मी, और न्यायी है, मुझे उस दिन देगा और मुझे ही नहीं, वरन उन सब को भी, जो उसके प्रगट होने को प्रिय जानते हैं।

एक साल में बाइबल:
  • भजन ७७, ७८
  • रोमियों १०

रविवार, 8 अगस्त 2010

ग्रैनविल शार्प

ग्रैनविल शार्प (सन १७३५-१८१३) युनानी भाषा का एक प्रख्यात विद्वान था। जब मैं बाइबल कॉलेज में पढ़ता था तो युननी भाषा की कक्षा में उसका नाम भी लिया जाता था। युनानी भाषा के उसके अध्ययन द्वारा ही उन सिध्दांतों का प्रतिपादन हुआ जिनके आधार पर नए नियम का उसकी मूल युनानी भाषा से अनुवाद और व्याख्या संभव हो सकी।

पवित्र शास्त्र को पढ़ना और उसके सामर्थी सत्यों को जानना श्रेष्ठ कार्य है, लेकिन हम चाहे जितनी भी गहराई से उसे पढ़ लें, केवल उसे पढ़ना ही काफी नहीं होता है। याकूब ने इस बात को समझने की चुनौती दी जब उसने लिखा: "परन्‍तु वचन पर चलने वाले बनो, और केवल सुनने वाले ही नहीं जो अपने आप को धोखा देते हैं। क्‍योंकि जो कोई वचन का सुनने वाला हो, और उस पर चलने वाला न हो, तो वह उस मनुष्य के समान है जो अपना स्‍वाभाविक मुंह दर्पण में देखता है। इसलिये कि वह अपने आप को देख कर चला जाता, और तुरन्‍त भूल जाता है कि मैं कैसा था" (याकूब १:२२-२४)।

ग्रैनविल शार्प ने इस बात को समझा और अपने विश्वास को व्यावाहरिक रूप दिया। वह न केवल बाइबल का विद्वान था वरन इंगलैंड में दास प्रथा के विरुद्ध सन्घर्ष करने वाला भी बना। उसने कहा, "दास प्रथा का समर्थन करना अमानवीय व्यवहार का समर्थन करना है।" बाइबल से उसे प्राप्त हुए मानवीय आत्मा की कीमत के बोध और पवित्र परमेश्वर के न्याय की समझ ने उसे अपने विश्वास को कार्यन्वित करने पर बाध्य किया।

वचन की ज्ञान के प्रति शार्प के जोश और उसके सत्य का पालन करने की उसकी कटिबद्धता से हमें शिक्षा लेनी चाहिये। - बिल क्राउडर


यदि हम बाइबल के वचनों का पालन नहीं करते तो हम बाइबल को जानते ही नहीं।

परन्‍तु वचन पर चलने वाले बनो, और केवल सुनने वाले ही नहीं जो अपने आप को धोखा देते हैं। - याकूब १:२२


बाइबल पाठ: याकूब १:१९-२७

हे मेरे प्रिय भाइयो, यह बात तुम जानते हो: इसलिये हर एक मनुष्य सुनने के लिये तत्‍पर और बोलने में धीरा और क्रोध में धीमा हो।
क्‍योंकि मनुष्य का क्रोध परमेश्वर के धर्म का निर्वाह नहीं कर सकता है।
इसलिये सारी मलिनता और बैर भाव की बढ़ती को दूर करके, उस वचन को नम्रता से ग्रहण कर लो, जो ह्रृदय में बोया गया और जो तुम्हारे प्राणों का उद्धार कर सकता है।
परन्‍तु वचन पर चलने वाले बनो, और केवल सुनने वाले ही नहीं जो अपने आप को धोखा देते हैं।
क्‍योंकि जो कोई वचन का सुनने वाला हो, और उस पर चलने वाला न हो, तो वह उस मनुष्य के समान है जो अपना स्‍वाभाविक मुंह दर्पण में देखता है।
इसलिये कि वह अपने आप को देखकर चला जाता, और तुरन्‍त भूल जाता है कि मैं कैसा था।
पर जो व्यक्ति स्‍वतंत्रता की सिद्ध व्यवस्था पर ध्यान करता रहता है, वह अपके काम में इसलिये आशीष पाएगा कि सुन कर नहीं, पर वैसा ही काम करता है।
यदि कोई अपने आप को भक्त समझे, और अपनी जीभ पर लगाम न दे, पर अपने हृदय को धोखा दे, तो उस की भक्ति व्यर्थ है।
हमारे परमेश्वर और पिता के निकट शुद्ध और निर्मल भक्ति यह है, कि अनाथों ओर विधवाओं के क्‍लेश में उन की सुधि लें, और अपने आप को संसार से निष्‍कलंक रखें।

एक साल में बाइबल:
  • भजन ७४-७६
  • रोमियों ९:१६-३३

शनिवार, 7 अगस्त 2010

अनुसरण

जब मैं कॉलेज में था तो मेरा सहकर्मी बड अपनी तीक्षण बुद्धिमता की बातों द्वारा अकसर मेरे जीवन को नई रौशनी से रौशन करता रहता था। एक दिन हम एक साथ बैठे भोजन कर रहे थे और मैंने बड से कहा कि मैं एक दूसरे कॉलेज में दाखिला ले रहा हूँ।

उसने पूछा, "क्यों?"

मैंने उत्तर दिया, "क्योंकि मेरे सारे दोस्त ऐसा ही कर रहे हैं।"

वह कुछ देर अपने भोजन को चबाता रहा, फिर दबी आवाज़ में व्यंग्य के साथ बोला, "शायद कॉलेज चुनने का यही सही तरीका है।"

उसके शब्द मेरे मन में गड़ गए। मैंने सोचा, " हो सकता है, लेकिन क्या कॉलेज चुनने का यही एक तरीका है? क्या मैं अपनी सारी उम्र अपने मित्रों का अनुसरण करता रहूंगा, या मसीह यीशु का अनुसरण करूंगा? क्या मैं प्रभु यीशु के दर्शन और उसकी इच्छा का खोजी होकर वहां जाऊंगा जहां वह मुझे भेजना चाहता है?"

नए नियम में प्रभु यीशु ने पच्चीस बार अपने चेलों से कहा कि वे उसका अनुसरण करें। मरकुस ८:३४ में यीशु ने कहा, "...जो कोई मेरे पीछे आना चाहे, वह अपने आपे से इन्‍कार करे और अपना क्रूस उठाकर, मेरे पीछे हो ले।" और लोग चाहे जो भी करें, या उनके जीवन चाहे किसी भी दिशा में जाएं, हमें वही करना है जो प्रभु हम से करने को कहता है।

इस संदर्भ में एक पुराने गीत की पंक्ति स्मरण आती है, "मेरा प्रभु जंगल से होकर निकलने का मार्ग जानता है; मुझे केवल उसका अनुसरण करना है।" - डेविड रोपर


जीवन में सही मार्ग पाने के लिये, प्रभु यीशु का अनुसरण करें।

यदि कोई मेरी सेवा करना चाहे, तो मेरे पीछे हो ले; और जहां मैं हूं वहां मेरा सेवक भी होगा। - यूहन्ना १२:२६


बाइबल पाठ: मरकुस ८:३४-३८

उस ने भीड़ को अपने चेलों समेत पास बुलाकर उन से कहा, जो कोई मेरे पीछे आना चाहे, वह अपने आपे से इन्‍कार करे और अपना क्रूस उठाकर, मेरे पीछे हो ले।
क्‍योंकि जो कोई अपना प्राण बचाना चाहे वह उसे खोएगा, पर जो कोई मेरे और सुसमाचार के लिये अपना प्राण खोएगा, वह उसे बचाएगा।
यदि मनुष्य सारे जगत को प्राप्‍त करे और अपके प्राण की हानि उठाए, तो उसे क्‍या लाभ होगा?
और मनुष्य अपके प्राण के बदले क्‍या देगा?
जो कोई इस व्यभिचारी और पापी जाति के बीच मुझ से और मेरी बातों से लजाएगा, मनुष्य का पुत्र भी जब वह पवित्र दूतों के साथ अपने पिता की महिमा सहित आएगा, तब उस से भी लजाएगा।

एक साल में बाइबल:
  • भजन ७२, ७३
  • रोमियों ९:१-१५