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सोमवार, 6 सितंबर 2021

परमेश्वर का वचन, बाइबल – पाप और उद्धार - 12

 

पाप का समाधान - उद्धार - 8

      पिछले दो लेखों में हम दो लोगों के जीवनों के उदाहरण देख चुके हैं जो बहुत धर्मी थे, धार्मिकता का निर्वाह करते थे, परमेश्वर के वचन और आज्ञाओं को जानते थे और उनका पालन करने का दावा करते थे, समाज में उच्च ओहदा रखते थे। किन्तु दोनों ही अपने अंदर जानते थे कि अपने इस धर्म के निर्वाह, वचन की बातों को मानने, लोगों के दृष्टि में धर्मी और आदरणीय होने के बावजूद, वे परमेश्वर के सम्मुख खड़े हो पाने और उसके राज्य में प्रवेश कर पाने के अयोग्य थे। उनके मन और विवेक उन्हें चेतावनी दे रहे थे कि अभी, समय रहते, जब प्रभु का अनुग्रह उन्हें उपलब्ध है, इस स्थिति को ठीक कर लें; और इसी लिए समाधान को ढूँढने के लिए वे प्रभु यीशु मसीह के पास आए थे। उनमें से एक, नीकुदेमुस तो संभवतः आगे चलकर प्रभु यीशु मसीह का विश्वासी बन गया था, उसने अरमतियाह के यूसुफ के साथ मिलकर प्रभु यीशु की देह को क्रूस पर से उतरवाकर दफनाया था (यूहन्ना 19:38-39); किन्तु दूसरा व्यक्ति, जो धनी जवान सरदार था, सांसारिक संपत्ति के मोह से अपने आप को अलग नहीं कर पाया और वापस संसार में लौट गया। 

आज हम तीसरे व्यक्ति के जीवन के उदाहरण से देखेंगे कि धर्म का निर्वाह कैसे व्यक्ति को सत्य के प्रति अंधा एवं सत्य का पालन करने वालों के प्रति क्रूर और निर्मम, अमानवीय, बना देता है। किन्तु जब सत्य से व्यक्ति की पहचान हो जाती है, तो जिस वचन की गलत समझ के कारण वह अनुचित व्यवहार करता था, उसकी सही समझ आ जाने से उसका जीवन, दृष्टिकोण, और व्यवहार कैसे अद्भुत रीति से बदल जाता है। यह तीसरा उदाहरण नए नियम के जाने-माने नायक पौलुस प्रेरित का है, जो मसीही विश्वासी होने से पहले शाऊल के नाम से जाना जाता था (प्रेरितों 13:9)। अपनी परवरिश और शिक्षा से पौलुस एक कट्टर फरीसी था; उसने अपने समय के बहुत आदरणीय और उत्तम शिक्षक गमलीएल (प्रेरितों 5:34) से शिक्षा पाई थी (प्रेरितों 22:3) 

इस कट्टर फरीसी, पौलुस का मानना था कि यीशु मसीह तथा मसीही विश्वासी विधर्मी हैं, परमेश्वर और उसकी व्यवस्था का अपमान कर रहे हैं, और उन्हें इसके लिए पकड़ना और दंड दिलवाना चाहिए। इसके लिए वह स्थान-स्थान पर जाकर प्रभु यीशु मसीह के शिष्यों को पकड़ कर लाया करता था, जिससे धर्म के ठेकेदार उन्हें विधर्मी होने के लिए दंडित कर सकें (प्रेरितों 7:60; 8:2-3; 26:12)। उसके दृष्टिकोण और विचारों को उसके ही शब्दों में देखते हैं:मैं ने भी समझा था कि यीशु नासरी के नाम के विरोध में मुझे बहुत कुछ करना चाहिए। और मैं ने यरूशलेम में ऐसा ही किया; और महायाजकों से अधिकार पाकर बहुत से पवित्र लोगों को बन्‍दीगृह में डाला, और जब वे मार डाले जाते थे, तो मैं भी उन के विरोध में अपनी सम्मति देता था। और हर आराधनालय में मैं उन्हें ताड़ना दिला दिलाकर यीशु की निन्दा करवाता था, यहां तक कि क्रोध के मारे ऐसा पागल हो गया, कि बाहर के नगरों में भी जा कर उन्हें सताता था” (प्रेरितों 26:9-11)

उसे मिली उसके धर्म की शिक्षा और धार्मिकता के निर्वाह तथा व्यवहार के आधार पर, पौलुस की समझ उसे प्रेरित करती थी कि:

  • उसे यीशु नासरी के विरुद्ध बहुत कुछ करना चाहिए;
  • उसे पवित्र लोगों को बंदीगृह में डालना चाहिए
  • वह उन लोगों के मसीही विश्वास के लिए मार डाले जाने में सहमत रहे
  • हर आराधनालय में वह उनकी ताड़ना करता और उनसे जबरन यीशु की निन्दा करवाए;
  • बाहर के नगरों में भी जाकर मसीही विश्वासियों को सताए

उनके विरुद्ध क्रोध के मारे वह पागल सा हो गया था। 

पौलुस के धर्म, और धर्म के उसके ज्ञान ने उसका यह अमानवीय व्यवहार करवाने वाला हाल बना दिया था। किन्तु जब ऐसे ही एक अभियान पर दमिश्क जाते समय प्रभु यीशु मसीह से, उनके महिमित स्वरूप में, उसका साक्षात्कार हुआ, तो उसका जीवन, समझ, दृष्टिकोण, और व्यवहार सभी बदल गए (प्रेरितों 9:2-6; 26:13-15)। उस पहले साक्षात्कार में ही पौलुस ने यीशु कोप्रभुमान लियाउसने पूछा; हे प्रभु, तू कौन है? उसने कहा; मैं यीशु हूं; जिसे तू सताता है” (प्रेरितों 9:5)। प्रभु यीशु ने उसके समर्पण को स्वीकार किया और उद्धार के सुसमाचार के प्रचार की सेवकाई सौंपी, परंतु साथ ही यह भी बता दिया कि इस सेवकाई के निर्वाह में उसे बहुत दुख उठाने होंगेपरन्तु प्रभु ने उस से कहा, कि तू चला जा; क्योंकि यह, तो अन्यजातियों और राजाओं, और इस्राएलियों के सामने मेरा नाम प्रगट करने के लिये मेरा चुना हुआ पात्र है। और मैं उसे बताऊंगा, कि मेरे नाम के लिये उसे कैसा कैसा दुख उठाना पड़ेगा” (प्रेरितों के काम 9:15-16); साथ ही यह आश्वासन भी दिया कि उन सभी कठिन और दुखदाई परिस्थितियों में प्रभु उसकी रक्षा करेगा, उसके साथ रहेगाऔर मैं तुझे तेरे लोगों से और अन्यजातियों से बचाता रहूंगा, जिन के पास मैं अब तुझे इसलिये भेजता हूं। कि तू उन की आंखें खोले, कि वे अंधकार से ज्योति की ओर, और शैतान के अधिकार से परमेश्वर की ओर फिरें; कि पापों की क्षमा, और उन लोगों के साथ जो मुझ पर विश्वास करने से पवित्र किए गए हैं, मीरास पाएं” (प्रेरितों के काम 26:17-18)। और तुरंत ही पौलुस इस सेवकाई में लग गयाऔर वह तुरन्त आराधनालयों में यीशु का प्रचार करने लगा, कि वह परमेश्वर का पुत्र है” (प्रेरितों 9:20) 

जिस धर्मशास्त्र की अपनी समझ के अनुसार वह प्रभु यीशु और उसके शिष्यों का घोर विरोध करता था, प्रभु से उसी धर्मशास्त्र की सही समझ प्राप्त करने के बाद वह उसी धर्मशास्त्र में से यीशु के मसीह होने को प्रमाणित करने लगापरन्तु शाऊल और भी सामर्थी होता गया, और इस बात का प्रमाण दे देकर कि मसीह यही है, दमिश्क के रहने वाले यहूदियों का मुंह बन्द करता रहा” (प्रेरितों 9:22); “जब सीलास और तीमुथियुस मकिदुनिया से आए, तो पौलुस वचन सुनाने की धुन में लगकर यहूदियों को गवाही देता था कि यीशु ही मसीह है” (प्रेरितों 18:5); “और पौलुस अपनी रीति के अनुसार उन के पास गया, और तीन सबत के दिन पवित्र शास्त्रों से उन के साथ विवाद किया। और उन का अर्थ खोल खोल कर समझाता था, कि मसीह को दुख उठाना, और मरे हुओं में से जी उठना, अवश्य था; और यही यीशु जिस की मैं तुम्हें कथा सुनाता हूं, मसीह है” (प्रेरितों 17:2-3)

अपने जीवन, तथा परमेश्वर के वचन के प्रति अपने दृष्टिकोण के इस अद्भुत परिवर्तन के विषय पौलुस ने फिलिप्पी की मसीही मंडली को लिखा, कि व्यवस्था की जिन बातों को वह पहले अति महत्वपूर्ण समझता था, अब मसीह यीशु द्वारा मानव जाति के उद्धार और मनुष्यों को परमेश्वर को स्वीकार्य बनाने के लिए प्रभु यीशु द्वारा किए गए कार्य की सही पहचान हो जाने के बाद, वह अपनी उन पिछली धारणाओं के गलत एवं व्यर्थ होने को समझ गया, वचन और व्यवस्था के प्रति उसका दृष्टिकोण सुधर कर ठीक हो गया, और अब वह केवल मसीह यीशु के ज्ञान में बढ़ने की चाह रखने लगा, व्यवस्था से धर्मी माने जाने की नहीं (फिलिप्पियों 3:4-14) 

शाऊल/पौलुस के धर्म, शिक्षा, और उसकी अपनी समझ ने उसे उसी परमेश्वर और उस परमेश्वर के शिष्यों का बैरी और नाश करने वाला बना दिया, जिसकी वह सेवा करना चाहता था। किन्तु प्रभु यीशु मसीह पर लाए विश्वास ने उसे धर्मशास्त्र की सही समझ दी, उसकी सेवा को सही उद्देश्य और दिशा दी, उसे हर परिस्थिति में प्रभु परमेश्वर का साथ और सहायता को प्रदान किया। उसकी मसीही सेवकाई का जीवन बहुत कठिन और दुखों से भरा हुआ था; किन्तु अपने जीवन के अंत के समय उसके पास अभूतपूर्व शांति थी, उसे एक आश्वासन था, जो उसने सभी मसीही विश्वासियों के लिए भी व्यक्त कियाक्योंकि अब मैं अर्घ के समान उंडेला जाता हूं, और मेरे कूच का समय आ पहुंचा है। मैं अच्छी कुश्ती लड़ चुका हूं मैं ने अपनी दौड़ पूरी कर ली है, मैं ने विश्वास की रखवाली की है। भविष्य में मेरे लिये धर्म का वह मुकुट रखा हुआ है, जिसे प्रभु, जो धर्मी, और न्यायी है, मुझे उस दिन देगा और मुझे ही नहीं, वरन उन सब को भी, जो उसके प्रगट होने को प्रिय जानते हैं” (2 तीमुथियुस 4:6-8) 

पौलुस के जीवन में जो काम उसकी परवरिश एवं परमेश्वर के वचन के बारे में तथा धर्म के निर्वाह के लिए उसे मनुष्यों से मिली शिक्षा नहीं कर सकी; इन बातों पर आधारित उसकी समझ के अनुसार किए गए उसकेधर्म के कामनहीं कर सके, वह प्रभु यीशु मसीह के प्रति सच्चे समर्पित विश्वास ने एक पल में करवा दिया; उसका जीवन, व्यवहार, और दृष्टिकोण बिल्कुल बदल दिया। पौलुस के धर्म ने उसे अनजाने में ही पागलों के समान मनुष्यों और परमेश्वर का विरोधी, उनका सताने वाला, प्रभु परमेश्वर का निरादर करने वाला बना दिया था। मसीही विश्वास ने उसे दुख उठा कर भी धीरज, सहनशीलता, और प्रेम के साथ मनुष्यों की भलाई और प्रभु परमेश्वर की सेवकाई करने वाला बना दिया, परमेश्वर के वचन के ऐसी गहरी, सच्ची, और ठोस समझ प्रदान की जो उसे और कहीं से नहीं मिल सकती थी। पौलुस में होकर परमेश्वर के वचन की वह व्याख्या हमें उपलब्ध हुई है, जो आज दो हज़ार साल बाद भी लोगों के दर्शनों को खोल रही है, उनके जीवन बदल रही है, और संसार के अंत तथा न्याय के लिए मसीही विश्वासियों को तैयार कर रही है। 

अपने जीवन का आँकलन करके देखिए। कहीं आप भी धर्म और धार्मिकता के नाम पर मनुष्यों के बैरी, उन्हें सताने वाले, और परमेश्वर की निन्दा का कारण तो नहीं बन रहे हैं? प्रभु यीशु मसीह के सच्ची पहचान में आइए, उसे अपना प्रभु स्वीकार कीजिए, आपके जीवन का दृष्टिकोण और व्यवहार ही बदल जाएगा; परमेश्वर के वचन के प्रति आपकी समझ खुल जाएगी, नई हो जाएगी; आप परमेश्वर की निन्दा के नहीं, प्रशंसा के कारण, उसके गवाह बन जाएंगे। स्वेच्छा से, सच्चे पश्चाताप और समर्पण के साथ एक छोटी प्रार्थना, “हे प्रभु यीशु मैं स्वीकार करता हूँ कि मैं पापी हूँ और आपकी अनाज्ञाकारिता करता रहता हूँ। मैं स्वीकार करता हूँ कि आपने मेरे पापों को अपने ऊपर लेकर, मेरे बदले में उनके दण्ड को कलवरी के क्रूस पर सहा, और मेरे लिए अपने आप को बलिदान किया। आप मेरे लिए मारे गए, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए तीसरे दिन जी उठे। कृपया मुझ पर दया करके मेरे पापों को क्षमा कर दीजिए, मुझे अपनी शरण में ले लीजिए, अपना आज्ञाकारी शिष्य बनाकर, अपने साथ कर लीजिए।सच्चे मन से की गई पश्चाताप और समर्पण की एक प्रार्थना आपके जीवन को अभी से लेकर अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय जीवन बना देगी, स्वर्गीय आशीषों का वारिस कर देगी। 

 

बाइबल पाठ: फिलिप्पियों  3:4-14

फिलिप्पियों 3:4 पर मैं तो शरीर पर भी भरोसा रख सकता हूं यदि किसी और को शरीर पर भरोसा रखने का विचार हो, तो मैं उस से भी बढ़कर रख सकता हूं

फिलिप्पियों 3:5 आठवें दिन मेरा खतना हुआ, इस्राएल के वंश, और बिन्यमीन के गोत्र का हूं; इब्रानियों का इब्रानी हूं; व्यवस्था के विषय में यदि कहो तो फरीसी हूं

फिलिप्पियों 3:6 उत्साह के विषय में यदि कहो तो कलीसिया का सताने वाला; और व्यवस्था की धामिर्कता के विषय में यदि कहो तो निर्दोष था

फिलिप्पियों 3:7 परन्तु जो जो बातें मेरे लाभ की थीं, उन्‍हीं को मैं ने मसीह के कारण हानि समझ लिया है

फिलिप्पियों 3:8 वरन मैं अपने प्रभु मसीह यीशु की पहचान की उत्तमता के कारण सब बातों को हानि समझता हूं: जिस के कारण मैं ने सब वस्तुओं की हानि उठाई, और उन्हें कूड़ा समझता हूं, जिस से मैं मसीह को प्राप्त करूं

फिलिप्पियों 3:9 और उस में पाया जाऊं; न कि अपनी उस धामिर्कता के साथ, जो व्यवस्था से है, वरन उस धामिर्कता के साथ जो मसीह पर विश्वास करने के कारण है, और परमेश्वर की ओर से विश्वास करने पर मिलती है

फिलिप्पियों 3:10 और मैं उसको और उसके मृत्युंजय की सामर्थ्य को, और उसके साथ दुखों में सहभागी होने के मर्म को जानूँ, और उस की मृत्यु की समानता को प्राप्त करूं

फिलिप्पियों 3:11 ताकि मैं किसी भी रीति से मरे हुओं में से जी उठने के पद तक पहुंचूं

फिलिप्पियों 3:12 यह मतलब नहीं, कि मैं पा चुका हूं, या सिद्ध हो चुका हूं: पर उस पदार्थ को पकड़ने के लिये दौड़ा चला जाता हूं, जिस के लिये मसीह यीशु ने मुझे पकड़ा था

फिलिप्पियों 3:13 हे भाइयों, मेरी भावना यह नहीं कि मैं पकड़ चुका हूं: परन्तु केवल यह एक काम करता हूं, कि जो बातें पीछे रह गई हैं उन को भूल कर, आगे की बातों की ओर बढ़ता हुआ

फिलिप्पियों 3:14 निशाने की ओर दौड़ा चला जाता हूं, ताकि वह इनाम पाऊं, जिस के लिये परमेश्वर ने मुझे मसीह यीशु में ऊपर बुलाया है

 

एक साल में बाइबल:

·      भजन 148-150

·      1 कुरिन्थियों 15:29-58

रविवार, 5 सितंबर 2021

परमेश्वर का वचन, बाइबल – पाप और उद्धार - 11


पाप का समाधान - उद्धार - 7

       पिछले लेख में हमने परमेश्वर के वचन बाइबल में से एक उदाहरण देखा था कि धर्म का अगुवा, परमेश्वर के वचन का विद्वान और शिक्षक होने, तथा समाज में उच्च स्थान रखने के बावजूद, फरीसियों के सरदार नीकुदेमुस के मन में परमेश्वर के सम्मुख अपने धर्मी स्वीकार होने के विषय संदेह था, जिसके निवारण के लिए वह प्रभु यीशु मसीह से मिलने आया था। यहूदियों के इस धर्मी और संभ्रांत धार्मिक अगुवे से प्रभु यीशु मसीह ने तीन बार दो टूक कह दिया कि उसे नया जन्म लेना अनिवार्य है, क्योंकि इसके बिना न तो कोई परमेश्वर के राज्य में प्रवेश कर सकता है, और न ही उसे देख सकता है। साथ ही उसे यह भी जता दिया कि यह प्रभु यीशु द्वारा दी जाने वाली कोई नई शिक्षा नहीं है, वरन बाइबल के पुराने नियम खंड, जिसका नीकुदेमुस ज्ञाता और शिक्षक था, में परमेश्वर द्वारा दी गई शिक्षाओं के अनुसार है - केवल शुद्ध मन वाले, न कि धार्मिक क्रिया-कर्म करके भी सांसारिक बातों में लगे रहने वाले, परमेश्वर के साथ संगति करने पाएंगे (भजन 15; 51:6, 10; 73:1; आदि)।

आज इसी संदर्भ में बाइबल में से एक और उदाहरण देखेंगे, कि जैसे परमेश्वर के वचन का ज्ञाता और उस की व्यवस्था का पालन करने के बावजूद नीकुदेमुस के मन में अपने उद्धार के विषय शंका थी, वैसे ही एक अन्य धनी जवान सरदार द्वारा व्यवस्था की बातों का पालन करने के बावजूद, उसके मन में भी अनन्त जीवन का भागी होने के विषय संदेह था। इस धनी जवान सरदार का वृतांत हमको पहले तीनों सुसमाचारों में मिलता है (मत्ती 19:16-29; मरकुस 10:17-30; लूका 18:18-27)। यहाँ पर हम मरकुस रचित सुसमाचार के लेख को लेकर चलेंगे, किन्तु साथ ही अन्य दोनों वृतांतों में से भी कुछ बातों को देखते जाएंगे। मरकुस रचित सुसमाचार का वृतांत इस प्रकार है:

 

मरकुस 10:17 और जब वह निकलकर मार्ग में जाता था, तो एक मनुष्य उसके पास दौड़ता हुआ 

आया, और उसके आगे घुटने टेककर उस से पूछा हे उत्तम गुरु, अनन्त जीवन का अधिकारी होने के लिये मैं क्या करूं?

मरकुस 10:18 यीशु ने उस से कहा, तू मुझे उत्तम क्यों कहता है? कोई उत्तम नहीं, केवल एक अर्थात परमेश्वर

मरकुस 10:19 तू आज्ञाओं को तो जानता है; हत्या न करना, व्यभिचार न करना, चोरी न करना, झूठी गवाही न देना, छल न करना, अपने पिता और अपनी माता का आदर करना

मरकुस 10:20 उसने उस से कहा, हे गुरु, इन सब को मैं लड़कपन से मानता आया हूं

मरकुस 10:21 यीशु ने उस पर दृष्टि कर के उस से प्रेम किया, और उस से कहा, तुझ में एक बात की घटी है; जा, जो कुछ तेरा है, उसे बेच कर कंगालों को दे, और तुझे स्वर्ग में धन मिलेगा, और आकर मेरे पीछे हो ले

मरकुस 10:22 इस बात से उसके चेहरे पर उदासी छा गई, और वह शोक करता हुआ चला गया, क्योंकि वह बहुत धनी था



  • पद 17 - लूका 18:18 से हम देखते हैं कि यह एक सरदार अर्थात, अधिकारी, समाज में उच्च स्थान रखने वाला था; मत्ती 19:20 हमें बताता है कि वह जवान था; और मरकुस 10:22 बताता है कि वह बहुत धनी था। फिर भी यह व्यक्ति सार्वजनिक मार्ग पर जा रहे प्रभु यीशु के पास दौड़ता हुआ आया और उसे आदर मान देते हुए उसके सामने घुटने टेके, उसेउत्तम गुरुकह कर संबोधित किया। उसने प्रभु से अपने मन की व्यथा के विषय प्रश्न पूछाअनन्त जीवन का अधिकारी होने के लिये मैं क्या करूं?”; अर्थात उसे अपने विषय आभास था कि वह अनत जीवन का अधिकारी नहीं है; अभी उसके जीवन में कुछ है जो उसे अनन्त जीवन का वारिस होने से रोक रहा है, और उसका मन, उसका विवेक उसे इसके विषय सचेत कर रहा है। 
  • पद 18 - प्रभु ने उसके प्रश्न का उत्तर देने से पहले उसके मन के अंदर प्रभु के वास्तविक स्थान को उजागर कर दिया। प्रभु ने पलट कर उससे प्रश्न किया, “तू मुझे उत्तम क्यों कहता है? कोई उत्तम नहीं, केवल एक अर्थात परमेश्वरअर्थात, “मुझे उत्तम गुरु कहकर संबोधित करने के द्वारा क्या तू स्वीकार करता है कि मैं प्रभु परमेश्वर हूँ? प्रभु के प्रश्न के लिए उस जवान के उत्तर पर बहुत कुछ निर्भर था; हम इसे कुछ आगे, जहाँ उसका उत्तर है, वहाँ पर फिर देखेंगे।
  • पद 19 - प्रभु ने अपने बात को आगे जारी रखते हुए उससे आज्ञाओं का पालन करने के विषय कहा। मत्ती 19:18 बताता है कि उस जवान ने प्रभु से प्रश्न किया, “कौन सी आज्ञाएँ?, जो उसके अंदर विद्यमान उसकी धार्मिकता के प्रति दंभ का सूचक है। उसके उत्तर में प्रभु ने जिन आज्ञाओं का उल्लेख किया वे परमेश्वर द्वारा इस्राएलियों के लिए मूसा में होकर दी गईदस आज्ञाओंका भाग हैं। प्रभु ने उन दस आज्ञाओं में से पहली चार आज्ञाओं को, जो मनुष्य के परमेश्वर के प्रति व्यवहार से संबंधित हैं, उससे नहीं कहा; वरन बाद की छः आज्ञाएँ, जो मनुष्य के मनुष्य के साथ व्यवहार से संबंध रखती हैं, केवल उन्हें ही उसके सामने कहा।
  • पद 20 - यहाँ दिया गया उस जवान व्यक्ति का एक वाक्य का संक्षिप्त उत्तर, उसके विषय बहुत कुछ प्रकट कर देता है। मत्ती 19:20 में लिखा है कि उस जवान ने स्पष्ट यह भी कहा, “अब मुझ में किस बात की घटी है?” अर्थात उसका विवेक गवाही दे रहा था कि उसका लड़कपन से आज्ञाओं को जानने और मानने का दावा, उसकी अपनी धार्मिकता उसे अनन्त जीवन का अधिकारी बनाने के लिए पर्याप्त नहीं है। 
    • प्रभु ने उससे कहा था कि उत्तम केवल परमेश्वर है, तू क्यों मुझे उत्तम कहता है? उस जवान द्वारा इसके बाद भी प्रभु को उत्तम कह कर संबोधित करना यह प्रकट कर देता कि वह प्रभु यीशु को परमेश्वर स्वीकार करता है। किन्तु उसने यह नहीं किया; यहाँ पर अब वह उसेउत्तम गुरुनहीं, केवलहे गुरुसंबोधित करता है; अर्थात, उसके लिए प्रभु यीशु आदरणीय तो था, आराध्य नहीं था। वह एकगुरुसेज्ञानप्राप्त करने आया था, प्रभु से उद्धार का मार्ग सीखने नहीं। यदि वह यीशु को प्रभु स्वीकार करता होता, तो आगे प्रभु द्वारा उसे दिए गए समाधान के प्रति उसकी प्रतिक्रिया भिन्न होती। 
    • उसने यह तो तुरंत कह दिया कि मैं इन आज्ञाओं को लड़कपन से मानता आया हूँ, किन्तु यह नहीं कहा किप्रभु इन्हें ही नहीं, वरन पहली चार आज्ञाओं को भी लड़कपन से मानता आया हूँ।उसका मन, जो उसे उद्धार के विषय बेचैन करता था, यह जानता था कि वह मनुष्यों को दिखाने वाला व्यवहार तो ठीक से निभा रहा है, किन्तु परमेश्वर के प्रति उसका व्यवहार जैसा होना चाहिए, वैसा नहीं है। 
    • उसको लगा होगा किबच गया! यदि यीशु ने मुझसे पहली चार आज्ञाओं के लिए भी कहा होता, तो मैं फंस जाता।किन्तु प्रभु ने उसके सामने एक दर्पण रख दिया था, जिसमें उसे अपनी सच्ची छवि दिख रहे थी, कि वह परमेश्वर की दृष्टि में कैसा दिखता है।
  • पद 21 - उसके इस दिखावे के दोगले जीवन के बावजूद, प्रभु ने उससे फिर भी प्रेम किया; उसका तिरस्कार नहीं किया, वरन उसे उसकी समस्या का समाधान और सिद्धता का मार्ग बता दिया। मत्ती 19:21 से हम देखते है कि प्रभु ने उसे सिद्ध होने के आह्वान के साथ उत्तर दिया, “यीशु ने उस से कहा, यदि तू सिद्ध होना चाहता है; तो जा, अपना माल बेचकर कंगालों को दे; और तुझे स्वर्ग में धन मिलेगा; और आकर मेरे पीछे हो ले। अब आगे की प्रतिक्रिया उस जवान के निर्णय पर, उसकी मनसा पर निर्भर थी - वह किस धन को अधिक महत्व देता था, स्वर्गीय धन को अथवा सांसारिक धन को।
  • पद 22 - प्रभु द्वारा दिए गए समाधान, सांसारिक संपत्ति के मोह से निकलकर, यीशु को अपना प्रभु मानकर, उसके पीछे हो ले, को सुनकर वह उदास हो गया, उस समाधान को अस्वीकार करके, वह शोक करता हुआ वापस लौट गया। उसके वचन के ज्ञान, वचन के पालन, सारी धार्मिकता, दिखाने को प्रभु के प्रति आदर, आदि के बाद भी उसकी वास्तविकता कुछ और ही थी। धर्म के निर्वाह ने उसके मन को नहीं बदला था, उसका मन वास्तव में परमेश्वर से बहुत दूर था। वह अनन्त जीवन के स्रोत के पास आकर भी, उस स्रोत से प्रेम, अनन्त जीवन का निमंत्रण एवं मार्ग प्राप्त करने के बाद भी, अपने अपरिवर्तित मन के कारण वापस नाशमान संसार और विनाश में लौट गया।  
    • यदि प्रभु उसके लिए वास्तव मेंउत्तम गुरुहोता, तो उसके लिए प्रभु की बात को स्वीकार करना अधिक सहज होता। किन्तु यीशु उसके लिए प्रभु नहीं था; केवल एकगुरुथा। 
    • यदि उसकी धार्मिकता ने उसके मन को बदला होता तो वह परमेश्वर द्वारा दी गई सभी आज्ञाओं का ईमानदारी से पालन कर रहा होता, वह इस बात को प्रकट भी करता, और उसके मन की स्थिति दोष भावना वाली नहीं होती। 
    • वह एक बाहर से मनुष्यों को प्रसन्न करने वाला जीवन जी रहा था, किन्तु अंदर से परमेश्वर को प्रसन्न नहीं कर पा रहा था, और इसीलिए वह प्रभु यीशु के पास समाधान के लिए आया था। 
    • उसने प्रभु के प्रति भी बाहर से बहुत आदर दिखाया, किन्तु प्रभु ने उसके सामने उसके मन की स्थिति खोल कर रख दी। 
    • उस सारी धार्मिकता, आज्ञाओं को जानने, उन्हें मानने का दावा करने, स्वर्गीय अनन्त जीवन पाने की इच्छा रखने के बावजूद, मन में वह अभी भी संसार से बंधा हुआ था, और संसार को छोड़ना नहीं चाहता था। उसके धर्म के निर्वाह और वचन के ज्ञान ने उसे संसार के मोह से मुक्ति नहीं दी थी, उसके मन की बेचैनी को शान्त नहीं किया था। 

 

आज परमेश्वर की दृष्टि में, जिससे कोई बात छुपी नहीं है, आपकी वास्तविक स्थिति क्या है? कहीं आपकी दिखने वाली धार्मिकता और अच्छा सामाजिक व्यवहार एक बाहरी आवरण तो नहीं है, जिसे आप अपने अंदर की परमेश्वर से दूरी को ढाँपने के लिए प्रयोग कर रहे हैं? धर्म और धार्मिक बातों के पालन के बावजूद, परमेश्वर की आज्ञाओं को आदर देने और मानने का दावा करने के बावजूद, वह जवान जानता था कि वह अनन्त जीवन से दूर है; उसके अंदर कमी है, जिसका समाधान आवश्यक है। कहीं आप भी तो उस जवान के समान अपने धर्म, धार्मिकता और कर्मों के द्वारा अपने आप को सही और अनन्त जीवन का अधिकारी समझने का प्रयास तो नहीं कर रहे हैं? जैसे उस जवान के लिए, वैसे ही आपके लिए भी ये सभी प्रयास व्यर्थ होंगे।

जैसे प्रभु ने उस जवान से उसकी प्रभु को परमेश्वर अस्वीकार करने, उसके मन की दोगलेपन की स्थिति में भी प्रेम किया, वैसे ही वह आपकी वास्तविकता जानने के बावजूद आज आप से भी प्रेम करता है, आपको भी अनन्त जीवन का मार्ग, आपकी समस्या का समाधान देना चाहता है, आपको सिद्धता का मार्ग दिखाना चाहता है। क्या आपने प्रभु यीशु को वास्तव में अपना प्रभु, अपना स्वामी, अपना उद्धारकर्ता माना है? क्या आप उसके कहे के अनुसार करने के लिए तैयार हैं? आप से भी उसका आह्वान है, इस नश्वर संसार और संसार की नाशमान बातों, आकर्षण, संपदा आदि के मोह से निकलकर, सच्चे और समर्पित मन से, स्वेच्छा से यीशु को अपना प्रभु स्वीकार कर लें, उसके पीछे हो लें। उसके पक्ष में लिए गए निर्णय के पल से लेकर अनन्तकाल के लिए आपके दोनों लोक संवर जाएंगे, आप स्वर्गीय सुरक्षा और आशीषों के भागी हो जाएंगे। स्वेच्छा से, सच्चे पश्चाताप और समर्पण के साथ एक छोटी प्रार्थना, “हे प्रभु यीशु मैं स्वीकार करता हूँ कि मैं पापी हूँ और आपकी अनाज्ञाकारिता करता रहता हूँ। मैं स्वीकार करता हूँ कि आपने मेरे पापों को अपने ऊपर लेकर, मेरे बदले में उनके दण्ड को कलवरी के क्रूस पर सहा, और मेरे लिए अपने आप को बलिदान किया। आप मेरे लिए मारे गए, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए तीसरे दिन जी उठे। कृपया मुझ पर दया करके मेरे पापों को क्षमा कर दीजिए, मुझे अपनी शरण में ले लीजिए, अपना आज्ञाकारी शिष्य बनाकर, अपने साथ कर लीजिए।सच्चे मन से की गई पश्चाताप और समर्पण की एक प्रार्थना आपके जीवन को अभी से लेकर अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय जीवन बना देगी, स्वर्गीय आशीषों का वारिस कर देगी। 

 

बाइबल पाठ: भजन 15 

भजन संहिता 15:1 हे परमेश्वर तेरे तम्बू में कौन रहेगा? तेरे पवित्र पर्वत पर कौन बसने पाएगा?

भजन संहिता 15:2 वह जो खराई से चलता और धर्म के काम करता है, और हृदय से सच बोलता है;

भजन संहिता 15:3 जो अपनी जीभ से निन्दा नहीं करता, और न अपने मित्र की बुराई करता, और न अपने पड़ोसी की निन्दा सुनता है;

भजन संहिता 15:4 वह जिसकी दृष्टि में निकम्मा मनुष्य तुच्छ है, और जो यहोवा के डरवैयों का आदर करता है, जो शपथ खाकर बदलता नहीं चाहे हानि उठानी पड़े;

भजन संहिता 15:5 जो अपना रुपया ब्याज पर नहीं देता, और निर्दोष की हानि करने के लिये घूस नहीं लेता है। जो कोई ऐसी चाल चलता है वह कभी न डगमगाएगा।

 

एक साल में बाइबल:

·      भजन 146-147

·      1 कुरिन्थियों 15:1-28

शनिवार, 4 सितंबर 2021

परमेश्वर का वचन, बाइबल – पाप और उद्धार - 10

 

पाप का समाधान - उद्धार - 6

पिछले लेखों में हम बाइबल की प्रथम पुस्तक, उत्पत्ति के 3 अध्याय में दिए गए प्रथम पाप और उसके परिणामों और प्रभावों के विवरण पर आधारित, पाप के समाधान और उस समाधान से संबंधित तीन महत्वपूर्ण प्रश्नों में से पहले दो, “उद्धार किससे और क्यों”; तथाव्यक्ति इस उद्धार को कैसे प्राप्त कर सकता है?” को, और उनके निष्कर्षों को विस्तार से देख चुके हैं। हमने देखा कि पाप का मनुष्य जीवन और सृष्टि में प्रवेश परमेश्वर के प्रति अविश्वास, और इस कारण उसकी अनाज्ञाकारिता के द्वारा हुआ। पाप के मानव जीवन में आने और बस जाने के समय न तो कोई धर्म था, न किसी धर्म, और न किसी धार्मिक अनुष्ठान अथवा या रीति की कोई अवहेलना हुई। इसलिए पाप के समाधान के लिए भी किसी भी धर्म की कोई आवश्यकता नहीं है। परमेश्वर द्वारा दिए गए पाप के समाधान में न तो कोई धर्म, और न ही कोई धार्मिक प्रक्रिया सम्मिलित है। परमेश्वर का समाधान, मनुष्य का उसके प्रति विश्वास और उस विश्वास पर आधारित परमेश्वर की सम्पूर्ण आज्ञाकारिता एवं समर्पण पर निर्भर है। इस पूरी प्रक्रिया में मनुष्य को केवल परमेश्वर द्वारा उपलब्ध करवाए गए समाधान को अपने जीवन में कार्यान्वित करना है; उसमें अपनी कोई बात, योजना, विधि आदि नहीं सम्मिलित करनी है, और न ही किसी अन्य मनुष्य की मध्यस्थता अथवा योगदान को सम्मिलित करना है। बिना किसी धर्म अथवा किसी धार्मिक प्रक्रिया को किए, केवल और केवल प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास, समर्पण, और आज्ञाकारिता पर आधारित परमेश्वर द्वारा दिया गया यह सीधा, साधारण समाधान बहुत से लोगों को अटपटा और अस्वीकार्य लगता है, क्योंकि उन्हें लगता है कि यह अपर्याप्त होगा; अथवा उनके धर्म के काम और धर्म का निर्वाह उन्हें परमेश्वर को स्वीकार्य बनाने के लिए पर्याप्त और उचित है, इसलिए उन्हें और किसी बात की कोई आवश्यकता नहीं है। 

उद्धार से संबंधित तीसरे महत्वपूर्ण प्रश्न, “इसके लिए यह इतना आवश्यक क्यों हुआ कि स्वयं परमेश्वर प्रभु यीशु को स्वर्ग छोड़कर सँसार में बलिदान होने के लिए आना पड़ा?” को देखने से पहले आज से हम परमेश्वर के वचन बाइबल में से तीन बड़े धर्मी और परमेश्वर की व्यवस्था का गंभीरता से पालन करने वाले लोगों के जीवन से देखेंगे कि उनके द्वारा अपने धर्म का निर्वाह, उन्हें उद्धार प्रदान करने और परमेश्वर को स्वीकार्य होने के लिए अपर्याप्त था; स्वयं उनका विवेक उन्हें बता रहा था कि उनकी इस धर्म-परायणता के बावजूद, वे अभी परमेश्वर के सम्मुख खड़े नहीं हो सकते। 

पहला उदाहरण है यहूदियों के उच्च धार्मिक अगुवे, नीकुदेमुस का है:

यूहन्ना 3:1 फरीसियों में से नीकुदेमुस नाम एक मनुष्य था, जो यहूदियों का सरदार था।

यूहन्ना 3:2 उसने रात को यीशु के पास आकर उस से कहा, हे रब्बी, हम जानते हैं, कि तू परमेश्वर की ओर से गुरु हो कर आया है; क्योंकि कोई इन चिन्हों को जो तू दिखाता है, यदि परमेश्वर उसके साथ न हो, तो नहीं दिखा सकता।

यूहन्ना 3:3 यीशु ने उसको उत्तर दिया; कि मैं तुझ से सच सच कहता हूं, यदि कोई नये सिरे से न जन्मे तो परमेश्वर का राज्य देख नहीं सकता।

यूहन्ना 3:4 नीकुदेमुस ने उस से कहा, मनुष्य जब बूढ़ा हो गया, तो क्योंकर जन्म ले सकता है? क्या वह अपनी माता के गर्भ में दूसरी बार प्रवेश कर के जन्म ले सकता है?

यूहन्ना 3:5 यीशु ने उत्तर दिया, कि मैं तुझ से सच सच कहता हूं; जब तक कोई मनुष्य जल और आत्मा से न जन्मे तो वह परमेश्वर के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकता।

यूहन्ना 3:6 क्योंकि जो शरीर से जन्मा है, वह शरीर है; और जो आत्मा से जन्मा है, वह आत्मा है।

यूहन्ना 3:7 अचम्भा न कर, कि मैं ने तुझ से कहा; कि तुम्हें नये सिरे से जन्म लेना अवश्य है।

यूहन्ना 3:8 हवा जिधर चाहती है उधर चलती है, और तू उसका शब्द सुनता है, परन्तु नहीं जानता, कि वह कहां से आती और किधर को जाती है? जो कोई आत्मा से जन्मा है वह ऐसा ही है।

यूहन्ना 3:9 नीकुदेमुस ने उसको उत्तर दिया; कि ये बातें क्योंकर हो सकती हैं?

यूहन्ना 3:10 यह सुनकर यीशु ने उस से कहा; तू इस्राएलियों का गुरु हो कर भी क्या इन बातों को नहीं समझता?” 

       उपरोक्त खंड से हम नीकुदेमुस के बारे में और प्रभु यीशु की बारे में उसके विचारों को देखते हैं:

  • पद 1 - वह एक फरीसी था, और यहूदियों का सरदार था। प्रभु यीशु की पृथ्वी की सेवकाई के समय में, फरीसी लोग परमेश्वर के मंदिर को और परमेश्वर की व्यवस्था के अध्ययन तथा शिक्षा को समर्पित जीवन जीने वाले लोगों का समुदाय थे। उनकी जीविका परमेश्वर के मंदिर से थी, और वे परमेश्वर के वचन के अध्ययन, व्याख्या, और लोगों को उसकी शिक्षा देने में समय बिताते थे; और नीकुदेमुस इन फरीसियों का एक प्रधान या सरदार था। उसका यह परिचय बताता है कि वह परमेश्वर के वचन और धर्म की बातों के पालन में कितना संलग्न और उच्च ओहदा रखने वाला होगा। 
  • सामान्यतः, फरीसी लोग प्रभु यीशु मसीह को पसंद नहीं करते थे, उससे बैर, द्वेष रखते थे, क्योंकि प्रभु उनके जीवन के पाखण्ड और दोगलेपन को स्पष्ट प्रकट कर देने और इसके लिए उन्हें उलाहना देने में हिचकिचाता नहीं था। प्रभु उनकी धार्मिकता को भी मानता था; किन्तु उसने यह भी बताया था कि परमेश्वर के सम्मुख उनके स्वीकार्य होने के लिए उनकी यह धार्मिकता अपर्याप्त हैक्योंकि मैं तुम से कहता हूं, कि यदि तुम्हारी धामिर्कता शास्त्रियों और फरीसियों की धामिर्कता से बढ़कर न हो, तो तुम स्वर्ग के राज्य में कभी प्रवेश करने न पाओगे” (मत्ती 5:20)। नीकुदेमुस फरीसियों में अपने ओहदे और साख को भी बनाए रखना चाहता था, और अपने मन की दुविधा का समाधान भी प्रभु से चाहता था। इसलिए वह सब की नज़रों से बचता हुआ, प्रभु से मिलने के लिए रात में आया (पद 2) 
  • पद 2 हमें यह भी दिखाता है कि फरीसियों का वह सरदार प्रभु यीशु का बहुत आदर करता था - उस धर्म गुरुओं के अगुवे ने प्रभु यीशु कोहे रब्बीअर्थातहे गुरुकहकर संबोधित किया। साथ ही उसने यह भी स्वीकार किया कि:
    • प्रभु यीशु परमेश्वर की ओर से गुरु होकर आया है
    • परमेश्वर प्रभु यीशु के साथ है
    • यह बात उन चिह्नों से प्रमाणित हो जाती है जो प्रभु यीशु करता था। 

कुल मिलाकर, प्रभु यीशु के प्रति नीकुदेमुस के मन और व्यवहार में बहुत आदर और भक्ति का भाव था। इसी कारण वह प्रभु के पास अपनी समस्या के समाधान के लिए आया था - अपने सारे ज्ञान, समझ, ओहदे, और दूसरों को परमेश्वर के वचन की शिक्षा देने वाला होने के बावजूद, उसका मन शान्त नहीं था; उसे यह निश्चय नहीं था कि वह परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करने भी पाएगा या नहीं। वह प्रभु से इसका समाधान जानना चाहता था। 

  • पद 3 में प्रभु यीशु उससे और कोई बात करने के स्थान पर, सीधे उसके मन की बेचैनी को संबोधित करता है। प्रभु उस धर्म-गुरु को, जो प्रभु यीशु का भी बहुत आदर करता था, स्पष्ट शब्दों में कह देता है, “मैं तुझ से सच सच कहता हूं, यदि कोई नये सिरे से न जन्मे तो परमेश्वर का राज्य देख नहीं सकता” - अर्थात, उसकी धार्मिकता, परमेश्वर के वचन का ज्ञान और समझ, धार्मिक समुदाय में उसका ओहदा, प्रभु यीशु मसीह के प्रति उसका आदर - न तो इनमें से कुछ भी, और न ही ये सब मिलाकर भी, उसके मन की समस्या का समाधान थे। बिना नया जन्म पाए वह परमेश्वर के राज्य को देख भी नहीं सकता था!
  • पद 4, 5 - नीकुदेमुस प्रभु के प्रत्युत्तर से हक्का-बक्का रह गया। उसके विचारों मेंजन्मका एक ही अर्थ था, और वह उसी के अनुसार प्रभु से प्रश्न करता है, उससे जानना चाहता है कि दोबारा जन्म लेना कैसे संभव हो सकता है? तब प्रभु यीशु उसेनया जन्मका अभिप्राय बताता है - नीकुदेमुस जिस जन्म की बात कर रहा था वह शारीरिक जन्म था; प्रभु जिस नए जन्म की बात कह रहा था, वह जल और परमेश्वर के आत्मा द्वारा आत्मिक जन्म था, जो व्यक्ति को स्वेच्छा से, अपने निर्णय के साथ लेना होता है। शारीरिक जन्म स्वाभाविक जन्म है जो मनुष्य शरीर की रीति के अनुसार लेता है; नया जन्म आत्मिक जन्म है जिसके लिए मनुष्य को समझ-बूझ के साथ व्यक्तिगत निर्णय लेना होता है। साथ ही प्रभु यीशु ने यह भी कहा, जब तक कोई नया जन्म न लेवह परमेश्वर के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकतालगभग एक ही साथ प्रभु ने दो बार, व्यक्ति के परमेश्वर के राज्य के लिए योग्य गिने जाने के लिए, नए जन्म की अनिवार्यता को कहा। और वह भी एक उच्च धार्मिक अगुवे से जो परमेश्वर के वचन को अच्छे से जानता था, प्रभु का आदर करता था।
  • पद 6, 7 - फिर प्रभु नीकुदेमुस को शारीरिक और नए जन्म के प्रभाव को समझाता है - नया जन्म व्यक्ति का शारीरिक से आत्मिक जन्म है; अविनाशी आत्मा का मरनहार शरीर को छोड़ कर अनन्तकालीन आत्मिक स्थान में परमेश्वर के साथ रहने के लिए तैयार होने का आरंभ। और अब तीसरी बार प्रभु उससे नया जन्म लेने की अनिवार्यता को कहता है। यही दिखाता है कि प्रभु की दृष्टि में यह नया जन्म कितना महत्वपूर्ण और आवश्यक है; हर एक के लिए अनिवार्य है। 
  • पद 8 - प्रभु फिर नया जन्म पा लेने की पहचान एक सांसारिक उदाहरण से देता है - हवा का प्रवाह। हवा दिखती नहीं है, किन्तु उसकी उपस्थिति उसके प्रवाह, उसके प्रवाह से उत्पन्न ध्वनि, और उसके प्रभावों से पता चल जाती है, प्रमाणित हो जाती है। इसी प्रकार जिसने नया जन्म पाया है, जो परमेश्वर के आत्मा और जल से जन्मा है, उसके जीवन में आए हुए परिवर्तन, उसके कार्य, उसके शब्द, बता देते हैं कि उसने नया जन्म पा लिया। 
  • पद 9, 10 - नीकुदेमुस अभी भी असमंजस में है, उसका मन और मस्तिष्क इस अद्भुत और महान तथ्य को ग्रहण नहीं कर पा रहा है, वह फिर इन बातों के प्रति अपने अविश्वास को व्यक्त करता है। तब प्रत्युत्तर में प्रभु उससे एक और उसे हिला देने वाली बात कहता हैतू इस्राएलियों का गुरु हो कर भी क्या इन बातों को नहीं समझता?” अर्थात, “मैं जो तुझ से कह रहा हूँ, वह कोई नई बात नहीं है; वचन में विद्यमान शिक्षा, जिसका तू ज्ञाता और शिक्षक है, उसी को व्यक्त कर रहा हूँ। इसलिए, इस्राएलियों का गुरु होने के नाते, तुझे तो यह बात तुरंत समझ आ जानी चाहिए।प्रभु यीशु नीकुदेमुस से उस समय उपलब्ध परमेश्वर के वचन, जो वर्तमान बाइबल का पुराना नियम है, उसमें लिखी हुई परमेश्वर के साथ संगति कर पाने के योग्य होने की बात (भजन 15; 51:6, 10; 73:1; आदि) कर रहा था। पुराने नियम की उन शिक्षाओं का सार था परमेश्वर के साथ धार्मिक क्रियाओं और अनुष्ठानों को करने वाले नहीं, वरन केवल शुद्ध मन वाले ही रह सकते हैं। परमेश्वर ने यशायाह 1:1-20 में धार्मिक विधियों को मनाते रहने वाले किन्तु मन और व्यवहार में सांसारिक तथा दुराचारी इस्राएलियों की इसभक्तिको अस्वीकार कर दिया; मलाकी 1:10 में ऐसेधर्मका निर्वाह करते हुए भी परमेश्वर के विमुख चलने वाले लोगों के लिए परमेश्वर ने कहा, “भला होता कि तुम में से कोई मन्दिर के किवाड़ों को बन्द करता कि तुम मेरी वेदी पर व्यर्थ आग जलाने न पाते! सेनाओं के यहोवा का यह वचन है, मैं तुम से कदापि प्रसन्न नहीं हूं, और न तुम्हारे हाथ से भेंट ग्रहण करूंगानीकुदेमुस से प्रभु यही बातनया जन्मलेने के नाम से दोहरा रहा था - जब तक व्यक्ति मन की शुद्धता और समर्पण के साथ परमेश्वर के पास नहीं आएगा, वह परमेश्वर के राज्य में कदापि प्रवेश न करेगा; चाहे वह कितना ही विद्वान, वचन का ज्ञाता और शिक्षक, और धार्मिक क्रिया-कलापों तथा अनुष्ठानों को पूरा करने वाला क्यों न हो, लोगों में कैसा भी ओहदा और सम्मानजनक स्थान क्यों न रखता हो। 

 

       नीकुदेमुस के साथ प्रभु के वार्तालाप से प्रत्येक व्यक्ति के लिए परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करने के लिए धर्म के निर्वाह और वचन का ज्ञाता होने के स्थान पर प्रभु के प्रति सच्चे मन से पूर्णतः समर्पित, तथा उसका आज्ञाकारी शिष्य होने की अनिवार्यता की शिक्षा हमें मिलती है। आज प्रभु यीशु की अपने शिष्यों तथा सभी लोगों के लिए यही शिक्षा हैअचम्भा न कर, कि मैं ने तुझ से कहा; कि तुम्हें नये सिरे से जन्म लेना अवश्य है” (यूहन्ना 3:7)। संभव है कि आप नीकुदेमुस के समान बहुत धर्मी, बाइबल के विद्वान और ज्ञाता, तथा शिक्षक हों, अपनी इसधार्मिकताके कारण समाज और अपने समुदाय में बहुत नाम और स्थान रखते हों, किन्तु नीकुदेमुस के समान ही प्रभु के कहे के अनुसार, आपको भीनया जन्मलेना अनिवार्य है; बिना ऐसा किए आप परमेश्वर के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकेंगे। और यदि यह नया जन्म पाना नीकुदेमुस जैसे धर्मी व्यक्ति के लिए अनिवार्य था, तो फिर किसी अन्य “सामान्य” धर्मी व्यक्ति के लिए और कितना आवश्यक तथा अनिवार्य है।

       अपने अनन्तकाल को दांव पर मत लगाइए, जोखिम मत उठाइए। स्वेच्छा, तथा सच्चे और समर्पित मन से पश्चाताप की एक छोटी प्रार्थना आपके लिए स्वर्ग के वे द्वार खोल देगी, जो आपकी अपनीधार्मिकताऔर धार्मिक रीति-रिवाज़ों का निर्वाह करना नहीं खोल सका है। अभी अवसर है, अभी प्रभु से कुछ इस प्रकार से प्रार्थना कीजिएहे प्रभु यीशु मैं स्वीकार करता हूँ कि मैं पापी हूँ और आपकी अनाज्ञाकारिता करता रहता हूँ। मैं स्वीकार करता हूँ कि आपने मेरे पापों को अपने ऊपर लेकर, मेरे बदले में उनके दण्ड को कलवरी के क्रूस पर सहा, और मेरे लिए अपने आप को बलिदान किया। आप मेरे लिए मारे गए, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए तीसरे दिन जी उठे। कृपया मुझ पर दया करके मेरे पापों को क्षमा कर दीजिए, मुझे अपनी शरण में ले लीजिए, अपना आज्ञाकारी शिष्य बनाकर, अपने साथ कर लीजिए।इसके विषय अंतिम निर्णय आपका है। 

 

बाइबल पाठ: 1 शमूएल 15:22-23; व्यवस्थाविवरण 8:20; लूका 16:10

1 शमूएल 15:22 शमूएल ने कहा, क्या यहोवा होमबलियों, और मेलबलियों से उतना प्रसन्न होता है, जितना कि अपनी बात के माने जाने से प्रसन्न होता है? सुन मानना तो बलि चढ़ाने और कान लगाना मेढ़ों की चर्बी से उत्तम है।

1 शमूएल 15:23 देख बलवा करना और भावी कहने वालों से पूछना एक ही समान पाप है, और हठ करना मूरतों और गृह-देवताओं की पूजा के तुल्य है। तू ने जो यहोवा की बात को तुच्छ जाना, इसलिये उसने तुझे राजा होने के लिये तुच्छ जाना है।

व्यवस्थाविवरण 8:20 जिन जातियों को यहोवा तुम्हारे सम्मुख से नष्ट करने पर है, उन्हीं के समान तुम भी अपने परमेश्वर यहोवा का वचन न मानने के कारण नष्ट हो जाओगे।

लूका 16:10 जो थोड़े से थोड़े में सच्चा है, वह बहुत में भी सच्चा है: और जो थोड़े से थोड़े में अधर्मी है, वह बहुत में भी अधर्मी है।

 

एक साल में बाइबल:

·      भजन 143-145

·      1 कुरिन्थियों 14:21-40