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शुक्रवार, 25 नवंबर 2022

सुसमाचार से संबंधित शिक्षाएं / Teachings Regarding the Gospel


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सही सुसमाचार के 7 गुण


हम पिछले लेखों से देखते आ रहे हैं कि बालकों के समान अपरिपक्व मसीही विश्वासियों की एक पहचान यह भी है कि वे बहुत सरलता से भ्रामक शिक्षाओं द्वारा बहकाए तथा गलत बातों में भटकाए जाते हैं (इफिसियों 4:14)। इन भ्रामक शिक्षाओं को शैतान और उस के दूत झूठे प्रेरित, धर्म के सेवक, और ज्योतिर्मय स्‍वर्गदूतों का रूप धारण कर के बताते और सिखाते हैं (2 कुरिन्थियों 11:13-15)। ये लोग, और उनकी शिक्षाएं, दोनों ही बहुत आकर्षक, रोचक, और ज्ञानवान, यहाँ तक कि भक्तिपूर्ण और श्रद्धापूर्ण भी प्रतीत हो सकती हैं, किन्तु साथ ही उनमें अवश्य ही बाइबल की बातों के अतिरिक्त भी बातें डली हुई होती हैं। जैसा परमेश्वर पवित्र आत्मा ने प्रेरित पौलुस के द्वारा 2 कुरिन्थियों 11:4 में लिखवाया है, “यदि कोई तुम्हारे पास आकर, किसी दूसरे यीशु को प्रचार करे, जिस का प्रचार हम ने नहीं किया: या कोई और आत्मा तुम्हें मिले; जो पहिले न मिला था; या और कोई सुसमाचार जिसे तुम ने पहिले न माना था, तो तुम्हारा सहना ठीक होता”, इन भ्रामक शिक्षाओं और गलत उपदेशों के, मुख्यतः तीन विषय, होते हैं - प्रभु यीशु मसीह, पवित्र आत्मा, और सुसमाचार। साथ ही इस पद में सच्चाई को पहचानने और शैतान के झूठ से बचने के लिए एक बहुत महत्वपूर्ण बात भी दी गई है, कि इन तीनों विषयों के बारे में जो यथार्थ और सत्य हैं, वे सब वचन में पहले से ही बता और लिखवा दिए गए हैं। इसलिए बाइबल से देखने, जाँचने, तथा वचन के आधार पर शिक्षाओं को परखने के द्वारा सही और गलत की पहचान करना कठिन नहीं है।

 

पिछले लेखों में हमने इन गलत शिक्षा देने वाले लोगों के द्वारा, पहले तो प्रभु यीशु से संबंधित सिखाई जाने वाली गलत शिक्षाओं को देखा; फिर उसके बाद, परमेश्वर पवित्र आत्मा से संबंधित सामान्यतः बताई और सिखाई जाने वाली गलत शिक्षाओं की वास्तविकता को वचन की बातों से देखा; और अब पिछले कुछ लेखों से हमने सुसमाचार से संबंधित गलत शिक्षाओं के बारे में देखना आरंभ किया है, जिससे कि हम सही सुसमाचार क्या है देख और समझ सकें और गलत या भ्रष्ट को पहचान सकें, ताकि स्वयं भी गलत से बच कर रह सकें तथा औरों को भी बचा सकें। इस संदर्भ में पिछले लेखों में हमने सुसमाचार के विषय भ्रम और गलत शिक्षाएं को पहचानने के आधार को देखा था, फिर हमने सच्चे और उद्धार देने वाले सुसमाचार के शैतान द्वारा बिगाड़े जाने, भ्रष्ट किए जाने, और विभिन्न रीतियों से अप्रभावी किए जाने वाली आम युक्तियों के बारे में देखा। आज हम वास्तविक सुसमाचार के गुणों को देखेंगे, जिससे असली और नकली के मध्य पहचान कर सकें।


कलीसिया के आरंभ से ही शैतान ने गलत शिक्षाओं और झूठे प्रचारकों के द्वारा सुसमाचार को बिगाड़ना, उसे अप्रभावी बनाने वाली बातों के साथ मिलाकर लोगों में फैलाना आरंभ कर दिया था। उसका उद्देश्य यही था कि लोगों को भ्रामक बातों में फँसा और बहका कर, उन्हें मानवीय विधियों एवं रीतियों के द्वारा कर्मों द्वारा धार्मिकता, वचन की समझ का जिज्ञासू, और प्रभु के बारे में खोज करने वाला होने, आदि के द्वारा धर्मी बन जाने के भ्रम में फँसाए रखे, और साधारण विश्वास से सच्चे सुसमाचार को स्वीकार करने तथा व्यवाहरिक मसीही जीवन को जीने से दूर रखे (कुलुस्सियों 2:6-8)। ऐसा होने से वे उद्धार से वंचित रह जाएंगे, यद्यपि उन्हें यही लगता रहेगा कि वे भी उद्धार पाए हुए हैं, स्वर्ग में जाने के योग्य हैं। किन्तु साथ ही परमेश्वर पवित्र आत्मा ने अपनी प्रेरणा से प्रभु के शिष्यों द्वारा उन बातों को भी लिखवा दिया तथा उपलब्ध करवा दिया, जो शैतान के इस झूठ को प्रकट करती हैं, और असली सुसमाचार की पहचान करवाती हैं, जिससे जो भी वचन को सच्चे समर्पित मन से, पवित्र आत्मा से सीखने का इच्छुक होगा, वह इस असली-नकली की पहचान को जान लेगा। पवित्र आत्मा की प्रेरणा से पौलुस प्रेरित ने गलातीयों की मण्डली को लिखी पत्री का आरंभ करते हुए कहा: “मुझे आश्चर्य होता है, कि जिसने तुम्हें मसीह के अनुग्रह से बुलाया उस से तुम इतनी जल्दी फिर कर और ही प्रकार के सुसमाचार की ओर झुकने लगे। परन्तु वह दूसरा सुसमाचार है ही नहीं: पर बात यह है, कि कितने ऐसे हैं, जो तुम्हें घबरा देते, और मसीह के सुसमाचार को बिगाड़ना चाहते हैं” (गलातियों 1:6-7)। गलातीयों की पत्री, इसी विषय, अर्थात सही सुसमाचार, गलत सुसमाचार, सुसमाचार से भटकना आदि बातों पर ही लिखी गई है, और इस पत्री के 1 और 2 अध्याय, वास्तविक सुसमाचार की पहचान करवाते हैं, प्रभु यीशु के असली सुसमाचार के गुण या स्वभाव, और प्रभावों का यहाँ पर वर्णन किया गया है।


यह एक जानी-पहचानी बात है कि हर नकली उत्पाद को बनाने वाले उस नकली को उसके असली मूल उत्पाद के समान ही दिखने वाला बनाते हैं, साथ ही उस नकली के असली के समान ही कार्य करने और प्रभावी होने के बात करते हैं। अर्थात उस के गुण या “स्वभाव”, और उसके “प्रभाव” हमें असली और नकली की पहचान करवाते हैं। यही असली और नकली सुसमाचार के लिए भी सही है। आज हम असली सुसमाचार के गुणों, अर्थात उसके स्वभाव के बारे में देखेंगे। 

असली सुसमाचार के 7 गुण या स्वभाव:

  1. पौलुस इस पत्री का आरंभ अपनी सेवकाई और बुलाहट से आरंभ करता है। वह गलातीयों 1:1 में अपने पाठकों को यह स्पष्ट कर देता है कि उसकी नियुक्ति परमेश्वर के द्वारा है, न कि मनुष्यों की ओर से। क्योंकि यह उसके मसीही जीवन का दृढ़ सत्य था, जिस के विषय उसने कभी किसी प्रकार का कोई भी समझौता नहीं किया, इसीलिए उसकी वफादारी भी केवल और केवल प्रभु परमेश्वर के ही प्रति थी, अन्य किसी के प्रति नहीं। सच्चे सुसमाचार के प्रचारक का पहला गुण है कि वह न केवल परमेश्वर की ओर से अपनी सेवकाई के लिए नियुक्त होने का दावा भी करेगा, वरन उस दावे को जी कर के भी दिखाएगा। सही सुसमाचार का प्रचार करने वाले प्रचारक के व्यवहारिक जीवन में परमेश्वर के प्रति वफादारी और जवाबदेही, तथा सुसमाचार के द्वारा सांसारिकता की बातों, संसार से प्रशंसा, बड़ाई, यश आदि अर्जित करने से अलगाव भी दिखाई देगा।

  2. गलातियों 1:2 से प्रकट है कि सही सुसमाचार के प्रचारकों में बड़े-छोटे की भावना नहीं होगी; वह अपने सभी सहकर्मियों को, प्रभु की सेवकाई में लगे लोगों को समान आदर के साथ रखता है, सभी के साथ मेल-मिलाप रखते हुए, उन्हें भी अपनी सेवकाई का महत्वपूर्ण भाग बताता है, केवल अपने आप को ही बड़ा या मुख्य दिखाने के प्रयास नहीं करता है। 

  3. गलातियों 1:3 में पौलुस सही सुसमाचार का तीसरा गुण या स्वभाव लिखता है - वास्तविक सुसमाचार प्रभु यीशु मसीह की शांति और अनुग्रह के साथ आता है। अर्थात उस संदेश और उसके पालन से अनबन, विभाजन, फूट, बैर, टकराव, आदि नहीं होते; वरन वह हमेशा प्रेम, मेल-मिलाप, क्षमा, एकता, दीनता, नम्रता आदि मसीही गुणों के साथ आता है, जबकि नकली इसके विपरीत बातों के साथ आता है।

  4. गलातीयों 1:4 में वास्तविक सुसमाचार का चौथा स्वभाव दिया गया है, वह हमारे पापों से छुटकारे के लिए प्रभु यीशु के द्वारा दिए गए बलिदान का प्रचार करता है न कि मनुष्यों के अपने किसी कार्य या कर्मों के अनुसार भला बनने और उद्धार पाने का। साथ ही वह सांसारिक बातों, धन-संपत्ति, भौतिक समृद्धि, शारीरिक चंगाइयों, आदि का नहीं, और मसीह यीशु में विश्वास के द्वारा पापों की क्षमा पर बल देता है, उसे ही मुख्य विषय बनाए रखता है। साथ ही वह प्रभु यीशु मसीह के जीवन से परमेश्वर के प्रति मृत्यु सहने तक आज्ञाकारी होने के लिए भी सिखाता है (इब्रानियों 12:1-4; प्रकाशितवाक्य 2:10)। 

  5. गलातियों 1:5 में सही सुसमाचार के प्रचार और प्रचारक का पाँचवां गुण दिया गया है, उसके द्वारा सदा ही प्रभु यीशु मसीह की स्तुति और बड़ाई, उसी की प्रशंसा, महिमा और गुणगान का प्रचार होगा, किसी मनुष्य का नहीं।

  6. गलातियों 1:6 सचेत करता है कि कोई भी सच्चा मसीही विश्वासी अपने आप को आवश्यकता से अधिक सिद्ध या स्थिर न समझ ले, जैसा कि 1 कुरिन्थियों 10:12 में भी लिखा गया है। कोई यहाँ ध्यान कीजिए, कोई अविश्वासी नहीं अपितु, गलातिया की मसीही मण्डली के लोग, प्रभु के विश्वासी जन ही “और ही सुसमाचार” में अर्थात गलत सुसमाचार में बहकाए और भरमाए गए थे। सही सुसमाचार का छठवाँ स्वभाव है कि वह सदा ही मनुष्य को उसकी दुर्बलता के बारे में, और प्रभु के सच्चे विश्वासी जन को सदा हर बात के लिए परमेश्वर पर निर्भर रहने, परमेश्वर के वचन से जाँचते रहने, और उसी के अनुसार चलने के लिए कहेगा। वह कभी किसी को भी अपने आप पर, अपनी बुद्धि और युक्ति पर भरोसा रखने और अपनी समझ या संसार की सलाह, संसार को सही लगने वाली बात के अनुसार करने को नहीं कहेगा।

  7. गलातीयों 1:7 में सही सुसमाचार का सातवाँ गुण है कि उससे लोगों में डर या घबराहट नहीं आती; ऐसा करना सुसमाचार को बिगाड़ने वालों का काम है। गलत सुसमाचार वाले लोग विभिन्न प्रकार के डर-भय दिखा कर लोगों को अपनी बातों का पालन करने के लिए बाध्य करते हैं। जब कि असली सुसमाचार लोगों को परमेश्वर की संतान होने के लिए प्रेरित करता है (यूहन्ना 1:12-13), प्रभु से मिली पापों की क्षमा में भरोसा रखते हुए पापों के दंड उठाने के भय से मुक्त जीवन जीने (रोमियों 8:1-2), और आशीषित अनन्त जीवन की बात करता है (मत्ती 19:28-30; 1 कुरिन्थियों 2:9), तो फिर उससे घबराहट या भय क्यों आएगा? नाहक ही भय और घबराहट उत्पन्न करना, लोगों को बाध्य करना, शिक्षाओं की जाँच-पड़ताल करने से रोकना शैतान और उसकी बातों का गुण है, प्रभु और उसके सुसमाचार का नहीं। 


सच्चे सुसमाचार के 7 गुणों या स्वभाव को देखने के बात, हम उसके प्रभाव को अगले लेख में देखेंगे।यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं, तो आपके लिए यह जानना और समझना अति-आवश्यक है कि आप प्रभु परमेश्वर के सुसमाचार से संबंधित किसी गलत शिक्षाओं धारणाओं में न पड़े हों। सच्चे सुसमाचार के स्वभाव के अनुसार अपने आप को जाँचने के द्वारा यह सुनिश्चित कर लीजिए कि आपने सच्चे सुसमाचार पर सच्चा विश्वास किया है, और आप सच्चे पश्चाताप और समर्पण तथा सच्चे मन से प्रभु यीशु से पापों की क्षमा के द्वारा परमेश्वर के जन बने हैं। न खुद भरमाए जाएं, और न ही आपके द्वारा कोई और भरमाया जाए। लोगों द्वारा कही जाने वाली ही नहीं, वरन वचन में लिखी हुई बातों पर ध्यान दें, और लोगों की बातों को वचन की बातों से मिला कर जाँचें और परखें, यदि सही हों, तब ही उन्हें मानें, अन्यथा अस्वीकार कर दें।

 

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।


एक साल में बाइबल पढ़ें: 

  • यहेजकेल 24-26 

  • 1 पतरस 2


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English Translation

The 7 Characteristics of the True Gospel


We have been seeing in the previous articles that one of the ways the childlike, immature Christian Believers can be identified is that they can very easily be deceived, beguiled and misled by wrong doctrines and false teachings. Satan and his followers bring in their wrong doctrines and misinterpretations of God’s Word through people who masquerade as apostles, ministers of righteousness, and angels of light (2 Corinthians 11:13-15). These deceptive people and their false messages, their teachings appear to be very attractive, interesting, knowledgeable, even very reverential and righteous; but there is always something or the other that is extra-Biblical or unBiblical mixed into them. These wrong teachings and false doctrines are mainly about three topics - the Lord Jesus Christ, the Holy Spirit, and the Gospel, as God the Holy Spirit got it written down through the Apostle Paul in 2 Corinthians 11:4 “For if he who comes preaches another Jesus whom we have not preached, or if you receive a different spirit which you have not received, or a different gospel which you have not accepted--you may well put up with it!” In this verse a very important way to identify the false and the correct, discern between them, and escape from being beguiled by Satan is also given - that which is the truth about these three topics has already been given and written in God’s Word. Therefore, by cross-checking every teaching and doctrine from the Bible, the true and the false can be discerned; that which is not already present in God’s Word is false, and their preacher is a preacher of satanic deceptions.


In the previous articles, after seeing some commonly preached and taught false things about the Lord Jesus, next we had seen the Biblical facts and teachings about the wrong things often taught and preached regarding the Holy Spirit. Now, we have started to take up the wrong teachings about the Gospel. For this we first need to know, learn, and understand the correct or Biblical things about the Gospel. In the Introduction to this topic, we had seen that the Gospel of the Lord Jesus is not about any earthly kingdom, wealth or prosperity, but about man being able to enter the kingdom of God. We had seen that the first step to man’s entering God’s kingdom is his repenting of sins, which is equally important and applicable for everybody, no matter what their religion, beliefs, notions, or community may be; even if your family has been “christian” for many generations and you may be considering yourself as “people of God.” In the last article we moved ahead from here, and saw what the Gospel is, what it means; that it is an information from God for entire mankind, irrespective of religion, caste, creed, age, belief etc. for being saved from sins freely through the Lord Jesus. It is not a tradition, ritual, or method, the fulfillment of which enables a person to reach a higher level of being “religious” or “righteous” so that God becomes compelled to give him an entrance into His kingdom. The Gospel becomes effective and working in a person’s life by his repenting of his sins, asking the Lord Jesus to forgive him, and surrendering his life to the Lord Jesus. In the previous article we had seen the various ploys and devices that Satan uses to corrupt and spoil the true and life-giving Gospel, and renders it ineffective. Today we will see characteristics of the true Gospel, so that we can discern between the correct and the wrong teachings about the Gospel.


Since the beginning if the Church, Satan had also begun to corrupt the Gospel through preachers and teachers of false doctrines and wrong teachings, and has spread his disinformation to render the gospel ineffective in people’s lives. Satan’s intention was to beguile people through deceptive teachings, to keep them involved in the deception of being righteous through good works, learners of the Scriptures, and seekers of the Lord, etc., through human efforts and means, thereby keep them away from accepting and following the true Gospel and living the practical Christian life (Colossians 2:6-8). Thereby, they will stay away from being saved, while assuming that they too are saved and worthy of being in heaven. But God the Holy Spirit had got it written and made available through the disciples of the Lord Jesus, how to identify the false teachings of Satan, and recognize the true life-saving Gospel of the Lord Jesus. Therefore, whoever sincerely wants to learn God’s Word with a truly committed and surrendered heart from the Holy Spirit, will be able to discern between the true and the false. Writing to the Church in Galatia through the inspiration of the Holy Spirit, the Apostle Paul wrote: “I marvel that you are turning away so soon from Him who called you in the grace of Christ, to a different gospel, which is not another; but there are some who trouble you and want to pervert the gospel of Christ” (Galatians 1:6-7). The letter to the Galatians has been written on this theme, the true Gospel, identifying the false gospel, being misled from the Gospel etc., and the first two chapters of this letter give us the identification marks of the true Gospel, the characteristics, nature, and effects of the correct Gospel of the Lord Jesus have been given here.


This is a well-known fact that every maker and seller of a spurious product tries to make his product appear as similar as he possibly can to the real or original product; and he also claims that his spurious product will be just as effective as the real one. In other words, two things, the “nature” and the “effects” of a product provide to us the features to discern between the real and the spurious. This is also equally true for discerning between the true and the false gospel. Today, we will see about the “nature” or characteristics of the true Gospel from the letter to Galatians.


The 7 Characteristics or Nature of the True Gospel:

  1. Paul begins this letter by writing about his ministry and calling. In Galatians 1:1 he makes it clear to his readers that he has been appointed by God to this ministry, and not by any man. Because this was the firm, unchangeable truth of his Christian life, on which he never compromised in any manner, therefore his allegiance and commitment too was primarily only to the Lord God, not to any person or anyone else. The first characteristic of the preacher of the true Gospel is that he not only knows and asserts his being appointed by God to the ministry, but also practically lives out this claim in his Christian life. The life of the preacher of the true Gospel is one of faithfulness and accountability towards God not man, and of separation from the world, of staying away from from using the Gospel to acquire any kind of temporal gains, praise, name and fame etc. from people of the world.

  2. Galatians 1:2 makes it evident that amongst the preachers of the true Gospel, there is no feeling of anyone being more or less important; they give the same honour and importance to all their colleagues, who are engaged with them in preaching the Gospel. Thy consider all their colleagues an equally important part of their ministry and live in harmony with all of them. They do not try to project themselves as the leaders of the group or someone superior than others.

  3. Galatians 1:3 - Paul writes the third characteristic - the true Gospel comes with the peace and grace of God and the Lord Jesus Christ. Implying that living by that Gospel does not give rise to mutual differences, divisions, discords, animosity, conflicts etc.; rather it always comes with Christian virtues like love, forgiveness, unity, reconciliation, humility, meekness etc. In contrast, the false gospel is associated with things contrary to these virtues.

  4. Galatians 1:4 tells about the fourth characteristic of the true Gospel, it is centred upon and preaches the sacrifice of the Lord Jesus to deliver us from our sins. It is not about any works of any person, or of doing good and becoming good through any kind of works to be saved. Also, the true Gospel does not preach about any worldly things, gaining wealth and property of this world, acquiring temporal prosperity, getting physical healings etc. The true Gospel only emphasizes upon forgiveness of sins through faith in the Lord Jesus, and always maintains it as the preaching point. It also teaches from the life of the Lord Jesus to be obedient to and faithful towards God, even till death (Hebrews 12:1-4; Revelation 2:10).

  5. Galatians 1:5 gives the fifth characteristic of the true Gospel, about its preacher; the preacher always praises and worships, exalts, glorifies, and exemplifies the only Lord Jesus Christ, not any person.

  6. Galatians 1:6, as the sixth characteristic illustrates that no Christian Believer should ever think of himself being perfect and established in faith, as 1 Corinthians 10:12 admonishes us. Here, in this verse, take note that not any unbelievers, but the members of the Church in Galatia, the Christian Believers had been carried away into believing in a “different gospel”, i.e., a false gospel! By implication, the sixth characteristic is that the true Gospel will always keep its followers aware of their fallibility and keep exhorting them to trust and depend only upon the Lord God for everything and in all situations, to keep examining and evaluating himself by the Word of God, and to live in obedience only to the Word of God. It will never make anyone trust themselves or their wisdom and understanding, or act according to the cunning ways of the world and behave in a manner that seems to be right in the eyes of the world.

  7. Galatians 1:7 shows us the seventh characteristic of the true Gospel, that it does not trouble the people, it does produce any unnecessary fear or apprehension amongst people. Doing this is a feature of the followers of the false gospel, who create a sense of fear and apprehension in the hearts of people to coerce them to do their bidding, else face harmful consequences. The true Gospel encourages its followers to live like the children of God (John 1:12-13); to trust the forgiveness they have received from the Lord and live free of the fear of suffering the consequences of their sins (Romans 8:1-2); and leads them to live life in anticipation of a blessed eternal life (Matthew 19:28-30; 1 Corinthians 2:9), so then why would anyone be troubled by such a Gospel? To create fear and apprehension, to compel people into doing certain things, to prevent them from examining and evaluating the doctrines and teachings preached to them, etc. is Satan’s attribute, not of the Lord Jesus and His Gospel.

After these seven characteristics, in the next article, we will look at the effects of the true Gospel. If you are a Christian Believer, then it is very essential for you to know and learn that you do not get beguiled and misled into wrong teachings and doctrines about the Holy Spirit; neither should you get deceived, nor should anyone else be deceived through you. Take note of the things written in God’s Word, not on things spoken by the people; always cross-check and verify all messages and teachings from the Word of God. If you have already been entangled in wrong teachings, then by cross-checking and verifying them from the Word of God, hold to only that which is the truth, follow it, and reject the rest.


If you have not yet accepted the discipleship of the Lord Jesus, then to ensure your eternal life and heavenly rewards, take a decision in favor of the Lord Jesus now. Wherever there is surrender and obedience towards the Lord Jesus, the Lord’s blessings and safety are also there. If you are still not Born Again, have not obtained salvation, or have not asked the Lord Jesus for forgiveness for your sins, then you have the opportunity to do so right now. A short prayer said voluntarily with a sincere heart, with heartfelt repentance for your sins, and a fully submissive attitude, “Lord Jesus, I confess that I have disobeyed You, and have knowingly or unknowingly, in mind, in thought, in attitude, and in deeds, committed sins. I believe that you have fully borne the punishment of my sins by your sacrifice on the cross, and have paid the full price of those sins for all eternity. Please forgive my sins, change my heart and mind towards you, and make me your disciple, take me with you." God longs for your company and wants to see you blessed, but to make this possible, is your personal decision. Will you not say this prayer now, while you have the time and opportunity to do so - the decision is yours.


Through the Bible in a Year: 

  • Ezekiel 24-26 

  • 1 Peter 2



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