मसीह यीशु की कलीसिया या मण्डली – 55
Click Here for the English Translation
रखवाले (पास्टर) की भूमिका (1)
पिछले कुछ लेखों में हम इफिसियों 4:11 से देखते आ रहे हैं कि प्रभु ने अपनी कलीसिया के कार्यों के लिए, कलीसिया में कुछ कार्यकर्ताओं, कुछ सेवकों को नियुक्त किया है। मूल यूनानी भाषा में इन सेवकों और उनकी सेवकाई के संबंध में प्रयोग किए गए शब्द दिखाते हैं कि ये सेवकाइयां कलीसिया में परमेश्वर के वचन की सेवकाई से संबंधित हैं। इन सेवकों और उनकी सेवकाइयों के संबंध में हम यह भी देख चुके हैं कि वर्तमान में इन दायित्वों और सेवकाइयों को अपने नाम के साथ जोड़ कर एक उपाधि के समान प्रयोग करने की सामान्यतः देखी जाने वाली प्रवृत्ति का बाइबल में कोई समर्थन नहीं है। इन सभी दायित्वों और सेवकाइयों के लिए प्रभु ने ही नियुक्ति की है, किसी मनुष्य अथवा संस्था या डिनॉमिनेशन ने नहीं। यह तथ्य इन्हें सेवकाइयों के स्थान पर, “उपाधियों” के समान उपयोग करने, मानो किसी तथा-कथित ईश्वरीय अधिकार के अन्तर्गत, स्वयं ही या फिर किसी संस्था अथवा डिनॉमिनेशन के मनुष्यों के द्वारा इन उपाधियों को देने की वर्तमान परंपरा का भी समर्थन नहीं करता है। साथ ही वर्तमान में एक और बहुत गलत प्रवृत्ति भी देखी जाती है कि लोग इन सेवकाइयों का प्रयोग परमेश्वर के वचन का पालन करना सीखने और सिखाने के स्थान पर, अपनी ही बातों और शिक्षाओं को सिखाने और पालन करवाने के लिए प्रयोग करते हैं, चाहे उनकी वे बातें और शिक्षाएं बाइबल से मेल न भी खाती हों, बाइबल की शिक्षाओं के अतिरिक्त हों। ऐसा करके ये लोग परमेश्वर के वचन में जोड़ने या घटाने, उसे अपनी इच्छा और सुविधा के अनुसार बदलने का अस्वीकार्य और दण्डनीय कार्य करते हैं (प्रकाशितवाक्य 22:18-19)। यह वही पाप है जो प्रभु यीशु की पृथ्वी की सेवकाई के समय फरीसियों, सदूकियों, और शास्त्रियों ने किया, और जिसके लिए प्रभु ने उनकी तीव्र भर्त्सना की, उन्हें दण्डनीय ठहराया (मत्ती 15:3-9, 12-14)।
आज हम इफिसियों 4:11 में दी गई सूची में प्रभु यीशु द्वारा नियुक्त किए जाने वाले प्रभु यीशु की कलीसिया के चौथे कार्यकर्ता, रखवाले, के बारे में देखेंगे। मूल यूनानी भाषा के जिस शब्द का अनुवाद “रखवाले” किया गया है, उसका शब्दार्थ है “चरवाहे” या “भेड़ों की रखवाली और चरवाही करने वाले”। प्रभु यीशु मसीह के जन्म के समय, लूका 2:8 में जहाँ स्वर्गदूतों ने मैदान में अपने झुण्ड की पहरेदारी और देखभाल करने वाले लोगों को प्रभु के जन्म का समाचार सुनाया, उन गड़रियों के लिए भी मूल यूनानी भाषा में यही शब्द प्रयोग किया गया है, जिसका अनुवाद यहाँ “रखवाले” किया गया है। तात्पर्य यह कि कलीसिया के रखवाले वे हैं जो एक गड़रिये या चरवाहे के समान अपने “झुण्ड” या उसे सौंपे गए लोगों की देखभाल और सुरक्षा प्रदान करते हैं। बाइबल में प्रभु यीशु मसीह को “प्रधान रखवाला” भी कहा गया है (इब्रानियों 13:20; 1 पतरस 5:4); अर्थात वही अपनी विश्व-व्यापी कलीसिया का मुख्य देखभाल और सुरक्षा करने वाला है, शेष सभी उसी की अधीनता और उसके निर्देशों के अनुसार कार्य करते हैं। साथ ही बाइबल यह भी स्पष्ट बताती है कि प्रभु ने जिन्हें अपनी कलीसिया की देखभाल की ज़िम्मेदारी सौंपी है, जिन्हें अपने “झुण्ड” के अगुवे बनाया है, उन्हें अन्ततः प्रभु को इस ज़िम्मेदारी का हिसाब भी देना होगा, और उनके कार्य के अनुसार उन्हें प्रतिफल मिलेगा (इब्रानियों 13:17; 1 पतरस 5:1-4)। अर्थात, कलीसिया में “रखवाला” या चरवाहा होना बहुत ज़िम्मेदारी का कार्य है, यह लोगों पर अधिकार रखने के लिए नहीं (1 पतरस 5:3), वरन विनम्रता तथा सहनशीलता के साथ प्रभु के लिए उसके लोगों की देखभाल के लिए है (1 पतरस 5:2)। यह सेवकाई केवल नए नियम में ही दी जाने वाली सेवकाई नहीं है, वरन, जैसा हम अभी देखेंगे, पुराने नियम में भी इस्राएल के अगुवों को यही ज़िम्मेदारी, यही सेवकाई सौंपी गई थी।
प्रभु के लोगों में, एक रखवाले या चरवाहे के क्या कार्य होते हैं, उसे प्रभु के “झुण्ड” की चरवाही करने की इस ज़िम्मेदारी को कैसे निभाना है? परमेश्वर के वचन बाइबल में इसे सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ही प्रकार से, पुराने नियम में ही बता दिया गया था। जैसा हमने ऊपर देखा है, प्रभु यीशु को ही कलीसिया का प्रधान रखवाला बताया गया है। इसलिए स्वाभाविक है कि प्रभु परमेश्वर के जीवन और उदाहरण से ही हम इस ज़िम्मेदारी के सर्वश्रेष्ठ निर्वाह के बारे में सीख सकते हैं। इसका सकारात्मक और सर्वोत्तम उदाहरण दाऊद द्वारा लिखित भजन 23 है, जो संक्षेप में किन्तु प्रत्येक बिन्दु का ध्यान करते हुए चरवाहे के कार्य को बता देता है। भजन 23 का आरंभ यहोवा परमेश्वर को चरवाहा बताने के साथ होता है; फिर इससे आगे परमेश्वर द्वारा चरवाहे के रूप में किए गए कार्यों का उल्लेख है:
* पद 1 - वह अपनी भेड़ों को कुछ घटी नहीं होने देता है। पौलुस ने परमेश्वर पवित्र आत्मा की अगुवाई में अपने जीवन के उदाहरण से सीखने को बताते हुए लिखा कि जैसे हर दशा में प्रभु उसकी देखभाल करता है, उसे सब कुछ बहुतायत से उपलब्ध है और परमेश्वर उसकी हर आवश्यकता को पूरा करता है - फिलिप्पियों 4 अध्याय पढ़िए, और विशेषकर पद 13, 18, और 19 पर ध्यान कीजिए, वैसे ही प्रभु पौलुस के पाठकों के लिए भी करेगा। कलीसिया के रखवाले को भी उसके झुण्ड के लोगों की आवश्यकताओं का ध्यान रखते हुए, उन को उनकी आवश्यकता के अनुसार उपयुक्त सहायता और प्रावधान उपलब्ध करवाते रहना है जिससे उन्हें कुछ घटी न हो।
* पद 2 - वह अपनी भेड़ों को उत्तम भोजन और जल उपलब्ध करवाता है - प्रभु यीशु स्वयं हमारे लिए “जीवन की रोटी” और “जीवन का जल” है (यूहन्ना 4:10, 14; 6:33, 35)। कलीसिया के रखवाले को प्रभु यीशु के वचन और शिक्षाओं के उत्तम आत्मिक भोजन को लोगों तक पहुँचाते रहना है जिससे उनका आत्मिक स्वास्थ्य अच्छा रहे, वे किसी गलत शिक्षा या सांसारिक बातों में भटक कर प्रभु से दूर न चले जाएं।
* पद 3 - वह अशान्ति के समय में अपनी भेड़ों को शांति प्रदान करता है, और परमेश्वर के मार्गों में चलने की अगुवाई प्रदान करता है। कलीसिया के रखवाले को भी उसकी कलीसिया के लोगों को शांति, ढाढ़स, सांत्वना, दुख के समय में सहारा और निराशाओं में प्रोत्साहन देने वाला, और संसार की बातों की मिलावट से बचाकर परमेश्वर के खरे मार्गों में अपने झुण्ड को लिए चलने वाला होना चाहिए।
* पद 4 - परमेश्वर के लोग उसकी उनके साथ निरंतर बनी उपस्थिति से आश्वस्त और सुरक्षित रहते हैं। अपने सोंटे और लाठी के द्वारा परमेश्वर अपनी भेड़ों को हाँकता भी है, जो इधर-उधर होने लगती हैं, उन्हें हांक कर वापस सही मार्ग में ले आता है; और भक्षक पशुओं से उनकी रक्षा करता है। कलीसिया के रखवाले को वचन रूपी लाठी और सोंटे से अपनी कलीसिया के लोगों को समझाना, सुधारना, सिखाना है, और जहाँ आवश्यक हो उलाहना देना और डांटना भी है (2 तीमुथियुस 3:16; 4:2-4)।
* पद 5 - परमेश्वर अपने लोगों की कठिनाइयों में उनकी रक्षा और सहायता करता है; उनके लिए आवश्यक भली वस्तुएं उन्हें उपलब्ध करवाता है। कलीसिया के रखवाले को भी अपने लोगों के साथ हर परिस्थिति में खड़े रहकर उनकी सहायता करते रहना है, उन्हें सुरक्षा प्रदान करनी है, इधर-उधर भटकने और लज्जित होने से रोक कर रखना है, बचाना है।
* पद 6 - परमेश्वर अपने साथ रहने और उस पर भरोसा रखने वाले लोगों को न केवल इस जीवन में उनकी भलाई के लिए आश्वस्त रखता है वरन साथ ही उनके परलोक के अनन्त जीवन के विषय भी आश्वस्त रखता है। कलीसिया के रखवाले को भी अपने लोगों को इस लोक और परलोक के विषय बताना और सिखाना है, तथा उन्हें इस जीवन में तथा परलोक के अनन्त जीवन में सही स्थान पर और सुरक्षित रहना सिखाना है।
अगले लेख में हम रखवालों या चरवाहों के द्वारा नकारात्मक रवैया रखने और अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाह नहीं करने के बारे में देखेंगे।
यदि आपने अभी तक प्रभु की शिष्यता को स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी उसके पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। यदि आपने अभी तक नया जन्म, उद्धार नहीं पाया है, प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा नहीं माँगी है, तो अभी आपके पास समय और अवसर है कि यह कर लें। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” परमेश्वर आपके साथ संगति रखने की बहुत लालसा रखता है तथा आपको आशीषित देखना चाहता है, लेकिन इसे सम्भव करना आपका व्यक्तिगत निर्णय है। सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी। क्या आप अभी समय और अवसर होते हुए, इस प्रार्थना को नहीं करेंगे? निर्णय आपका है।
और
कृपया अपनी स्थानीय भाषा में अनुवाद और प्रसार करें
*************************************************************************
The Church, or, Assembly of Christ Jesus - 55
Pastors, Their Role & Functions (1)
Since the past few articles, we have been seeing from Ephesians 4:11 that for the works and functioning of His Church, the Lord Jesus has set some ministries and appointed some workers for those ministries. In context of the Church and Christian Faith, the words used in the original Greek language that they were written in, for these ministries and workers show that they are related to the ministry of God’s Word in the Churches. We have also seen that today there is an unBiblical tendency to use these ministries and responsibilities as titles for conveying superiority over others; something for which there is neither any example nor support from God’s Word. All of these ministries and responsibilities have been given by Lord, and He alone appointed the persons to carry them out. This fact nullifies the present-day practice of people taking these as ‘titles’ upon themselves, or some group, sect, or denomination appointing some persons to them; as if by divine authority. Another very wrong thing seen these days, related to these ministries, is that people use them not to preach and teach the Word of God in truth and with sincerity, but their own contrived doctrines and ideas, whether or not what they preach and teach is according to the Bible. By doing this, these people become guilty of the sin of adding to, or taking away from, God’s Word according to their convenience, and will have to suffer the severe consequences (Revelation 22:18-19). This is the same sin that the Pharisees, Sadducees, and the Scribes committed at the time the Lord was on earth, and were severely castigated for it by the Lord (Matthew 15:3-9, 12-14).
Today we will see about the workers appointed by the Lord for the fourth ministry given in Ephesians 4:11, the Pastors. The word used in the original Greek language, and translated as ‘Pastor’, literally means a shepherd or one who looks after the sheep, and some English translations use the word “Shepherd” instead of “Pastors” here in this verse. In Luke 2:8, where at the time of the birth of the Lord Jesus, the angels announced the birth to the shepherds tending their flocks, this same word is used in Greek for those shepherds, as has been used in Ephesians 4:11 and translated as “Pastors.” In other words, the “Pastors” in a Church, amongst the Christian Believers, have the same role and function as a shepherd has for his flock of sheep. A Pastor has to look-after and keep the “flock” entrusted to him safe and secure, in the same manner as a shepherd does for his flock. In the Bible, the Lord Jesus has also been called “The Chief Shepherd” (Hebrews 13:20; 1 Peter 5:4); i.e., He is the one who is in-charge of taking care of His world-wide Church and flock of Believers, all the rest of the ‘shepherds’ have to function under Him and for Him, as He instructs and guides them in their roles and responsibilities. The Bible also makes it very clear that those to whom the Lord has entrusted this responsibility of being the “Pastors” or care-takers of His flock, they will eventually have to give an account to Him and receive their rewards for their performance (Hebrews 13:17; 1 Peter 5:1-4). Therefore, to be a Pastor or care-taker of a Church is a work of great responsibility, it is not for exercising authority over people (1 Peter 5:3), but to very humbly and with a lot of forbearance take care of the Church and people of the Lord (1 Peter 5:2). This responsibility was not given just in the New Testament, but as we will see just now, the same responsibility was given to the elders of Israel to take care of the Israelites as well.
Amongst the people of the Lord, what are the works and functions of a Shepherd or Pastor? How should he be fulfilling the responsibilities entrusted to him? In God’s Word, in the Old Testament itself, this has been clearly told by God, in its positive as well as negative aspects. As we have seen above, the Lord Jesus is the Chief Shepherd of His Church. Therefore, it is only natural that we can best learn from the life and example of the Lord Jesus, about how best to fulfill this responsibility. The best positive example of this is Psalm 23 written by David, which in brief tells about a shepherd’s responsibilities, in every verse. This Psalm starts with naming God as the Shepherd, and then from there goes on to tell how God carries out His role as the Shepherd:
* Verse 1 - He does not let His sheep face any lack. Paul, under the guidance of the Holy Spirit, using his own life and ministry as an example wrote, just as God takes care of him in all situations and provides for him in all circumstances, and he has everything to meet his needs - read Philippians chapter 4, and particularly pay attention to verses 13, 18, and 19, similarly God will also provide for and meet the needs of Paul’s audience as well. The shepherd of the church should also remain aware of the needs of his flock, and provide the required help and provisions to them, so that they lack nothing.
* Verse 2 - He arranges for good food and water for His sheep - the Lord Jesus is the “Bread of life” and the “Water of life” (John 4:10, 14; 6:33, 35). The caretakers of the Church should see that the flock receives good, nutritious spiritual food and water from God’s Word, so that their spiritual health does not suffer, but improves continually. He should ensure that they do not fall into any wrong teachings and worldliness, and get carried away from the Lord.
* Verse 3 - He provides comfort and peace to the sheep when they are restless and discomfited, and provides leadership for them to walk in the ways of the Lord God. A Pastor, the caretaker of the flock, should provide rest, comfort, peace, assurance and support in trying times, encouragement and guidance in discouragements and defeats; and he should ensure that they remain away from compromising with God’s Word, from the corruption of the world, and walk in the correct ways of the Lord.
* Verse 4 - God’s people feel comforted, assured, and secure because of His continual presence with them. He helps and guides them with His staff and His rod; the sheep that start wandering away from the right way, He prods back onto the right way, and keeps them safe from predators. The Pastor of the Church has to use the ‘rod and staff’ - the Word of God to teach, correct, instruct in righteousness, convince and teach with longsuffering, and wherever necessary, rebuke and exhort as well (2 Timothy 3:16; 4:2-4).
* Verse 5 - God keeps His people safe and secure in their difficult times, helps them, and provides the appropriate things for them according to their circumstances. The Pastor, the shepherd of the flock too, needs to stand with his people in all their situations and circumstances; keep them safe, prevent them from wandering away into wrongs, and safeguard them from being brought to shame.
* Verse 6 - God not only assures and provides good things in this life to His people, His Believers, but also assures them of eternal life and eternal rewards. The Pastor of the church too needs to teach his flock about the things of this world and of the next, and has to show them how to be safe and secure for this life as well as the next.
In the next article, we will see about the shepherds and caretakers having a negative attitude and not fulfilling their responsibilities,
If you have not yet accepted the discipleship of the Lord Jesus, then take a decision in its favor now to secure your eternal life and heavenly blessings. The Lord's security and blessings are present where there is obedience of the Lord, where His Word is honored and followed. If you are still not Born Again, have not obtained salvation, or have not asked the Lord Jesus for forgiveness for your sins, then you have the time and opportunity to do so right now. Ask the Lord Jesus to forgive your sins, and voluntarily and sincerely surrender yourselves into His hands - this is the only way to salvation and heavenly life. All you have to do is say a short prayer, voluntarily and with a sincere heart, with heartfelt repentance for your sins, and a fully submissive attitude. You can do this in this manner, “Lord Jesus, I confess that I have disobeyed You, and have knowingly or unknowingly, in mind, in thought, in attitude, and in deeds, committed sins. I believe that you have fully borne the punishment of my sins by your sacrifice on the cross, and have paid the full price of those sins for all eternity. Please forgive my sins, change my heart and mind towards you, and make me your disciple, take me with you." God longs for your company and wants to see you blessed, but to make this possible, is your personal decision. One prayer said with a sincere and surrendered heart will turn your present and future, your life here on earth and in the next world, forever and make you heavenly and blessed. Will you not say this prayer now, while you have the time and opportunity to do so? The decision is yours.
&
Please Translate and Propagate in your Regional Language