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शनिवार, 30 अगस्त 2025

The Holy Communion – 80 - God’s Dealing With Sin (2) / प्रभु भोज – 80 - परमेश्वर द्वारा पाप से व्यवहार (2)

 

प्रभु भोज 80

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प्रभु की मेज़ - परमेश्वर द्वारा पाप से व्यवहार (2)


    इससे पिछले लेख में हमने देखा था कि पाप से व्यवहार के लिए, परमेश्वर के केवल दो विकल्प हैं - या तो उन्हें क्षमा कर दे, या उन्हें दण्डित करे। और, प्रत्येक मनुष्य के पास, उन के पापों लिए केवल यही दो विकल्प ही लागू हैं; या तो परमेश्वर से उनकी क्षमा प्राप्त कर ले, या उनके लिए परमेश्वर के न्याय का सामना करे। हमने देखा था कि क्योंकि पापों को केवल परमेश्वर ही क्षमा कर सकता है, इसलिए यह होना, उसी के तरीके और मानकों के अनुसार ही सम्भव है; न कि मनुष्य द्वारा बनाए गए किसी रीति या विधि के द्वारा। परमेश्वर का तरीका है कि पापों के लिए सच्चा पश्चाताप करके, परमेश्वर के सामने उनका अंगीकार करके, उनके लिए परमेश्वर से क्षमा माँगना, और प्राप्त करना। किसी भी मनुष्य के द्वारा बनाई गई कोई भी अन्य रीति या विधि, परमेश्वर के द्वारा दिये गए इस तरीके का स्थान नहीं ले सकता है, इसका विकल्प नहीं बन सकता है। आज हम इसे परमेश्वर के नबी, यशायाह के जीवन से देखेंगे।

    इस बात का एक उत्तम उदाहरण यशायाह नबी का जीवन है, यशायाह 6:1-8 देखिए। ध्यान रखिए कि इस स्वर्गीय दर्शन से पहले भी यशायाह परमेश्वर का नबी था, जैसा कि हम इस पुस्तक के आरंभ से ही देखते हैं। यद्यपि पहले भी यशायाह ने परमेश्वर से दर्शन और निर्देश पाए थे, किन्तु यशायाह 6 का परमेश्वर के अपनी महिमा में अपने सिंहासन पर बैठे होने का दर्शन यशायाह ने पहली बार देखा था। जब यशायाह ने परमेश्वर को उसकी पवित्रता और महिमा के साथ सिंहासन पर बैठे होने के दर्शन को देखा, यद्यपि वह परमेश्वर का नबी और संदेशवाहक था, फिर भी वह तुरन्त ही अपनी पापमय दशा के लिए कायल हो गया, और विशिष्ट रीति से अपने पाप का अंगीकार किया, “मैं अशुद्ध होंठ वाला मनुष्य हूं, और अशुद्ध होंठ वाले मनुष्यों के बीच में रहता हूं(6:5)। जब यशायाह अपने विशिष्ट पाप का अंगीकार करता है, एक सराप परमेश्वर की वेदी से अँगारा उठाकर उसके शरीर के पाप करने वाले स्थान - उसके होंठों को छू लेता है (6:6-7), और उसे उसके अधर्म दूर होने, पाप क्षमा होने का आश्वासन दिया जाता है, वह प्रभु परमेश्वर के लिए काम पर जाने के लिए तैयार हो जाता है। लगभग यही बात अय्यूब के साथ भी देखने को मिलती है (अय्यूब 40:3-5; 42:1-6), जो इस सारी पुस्तक में बड़े घमण्ड के साथ अपनी धार्मिकता का और अपने अनुचित रीति से दुख भोगने की दावे करता आ रहा था। किन्तु जैसे ही परमेश्वर अपनी महिमा और पवित्रता में उसका सामना करता है, तुरन्त ही अय्यूब को अपनी वास्तविक पापमय दशा का एहसास होता है, और वह मान लेता है कि उसे अब अपने पर ही घृणा आती है, और वह पश्चाताप करता है।

    यही 2 कुरिन्थियों 7:10 का “परमेश्वर-भक्ति का शोक” है, जो पश्चातापी मनुष्य को उद्धार पर ले जाता है, जिसके लिए फिर कोई पछतावा नहीं होता है। यह होने का प्रमाण, व्यक्ति का बदला हुआ और परमेश्वर को समर्पित एवं आज्ञाकारी जीवन है (रोमियों 12:1-2); और यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले ने बपतिस्मा देने से पहले और बाद में इसी परिवर्तित जीवन की माँग की थी (मत्ती 3:7-9; लूका 3:7-14)। किन्तु रीति के समान, औपचारिक रीति से किया गया पश्चाताप, जिसे इस पद में “संसारी शोक” कहा गया है, वह मृत्यु लेकर आता है, क्योंकि वह कभी भी सच्चे मन से किया गया शोक और खरा पश्चाताप था ही नहीं। उस व्यक्ति के वे पाप परमेश्वर के सामने कभी माने ही नहीं गए, कभी परमेश्वर से उनकी क्षमा प्राप्त ही नहीं हुई, और वे अभी भी उस व्यक्ति के जीवन का उतना ही भाग हैं जितना प्रभु भोज में भाग लेने से पहले थे, क्योंकि उसने कभी उन्हें छोड़ने का कोई निर्णय लिया ही नहीं था। वह व्यक्ति तो केवल एक रीति का निर्वाह करने के लिए, एक औपचारिकता को पूरा करने के लिए आया था, और उसके डिनॉमिनेशन की रीति के अनुसार यह करने के बाद वह इस संतुष्टि के साथ चला गया कि अब वह परमेश्वर के साथ ठीक दशा में आ गया है, क्योंकि उसके पास्टर ने उससे यह कह दिया है। किन्तु वास्तविकता में तो वह जिस हाल में आया था, उससे किसी भी बेहतर स्थिति में नहीं लौटा, वरन संभवतः और बिगड़ी हुई दशा में लौटा, क्योंकि अब उसपर एक और अयोग्य रीति से मेज़ में भाग लेने और परमेश्वर का मज़ाक उड़ाने का पाप भी जुड़ गया है।

    अगले लेख में हम इसके बारे में थोड़ा और देखेंगे, और पाप के साथ व्यवहार के परमेश्वर के दूसरे तरीके - न्याय और दण्ड के बारे में भी देखेंगे। यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं, और प्रभु की मेज़ में भाग लेते रहे हैं, तो कृपया अपने जीवन को जाँच कर देख लें कि आप वास्तव में पापों से छुड़ाए गए हैं तथा आप ने अपना जीवन प्रभु की आज्ञाकारिता में जीने के लिए उस को समर्पित किया है। आपके लिए यह अनिवार्य है कि आप परमेश्वर के वचन की सही शिक्षाओं को जानने के द्वारा एक परिपक्व विश्वासी बनें, तथा सभी शिक्षाओं को वचन की कसौटी पर परखने, और बेरिया के विश्वासियों के समान, लोगों की बातों को पहले वचन से जाँचने और उनकी सत्यता को निश्चित करने के बाद ही उनको स्वीकार करने और मानने वाले बनें (प्रेरितों 17:11; 1 थिस्सलुनीकियों 5:21)। अन्यथा शैतान द्वारा छोड़े हुए झूठे प्रेरित और भविष्यद्वक्ता मसीह के सेवक बन कर (2 कुरिन्थियों 11:13-15) अपनी ठग विद्या और चतुराई से आपको प्रभु के लिए अप्रभावी कर देंगे और आप के मसीही जीवन एवं आशीषों का नाश कर देंगे।

    यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।


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The Holy Communion – 80

English Translation

The Lord’s Table - God’s Dealing With Sin (2)


    In the previous article we have seen that God has only two options about dealing with sins – forgive them, or punish them. Only these two options are applicable to each and every person, for their sins, either seek God’s forgiveness, or face God’s judgement for them. We had seen that since it for God to forgive sins, therefore, this has to be done by His method and His standards; not through any man-made rituals or method. God’s method is that sins have to be sincerely repented of, confessed before God, and God’s forgiveness for them has to be asked and obtained. No man-made ritual or procedure can ever replace or be an alternative to this God given method. Today, we will see this illustrated in the life of God’s prophet, Isaiah.

    This is well illustrated from the life of Isaiah, in Isaiah 6:1-8. Remember, even before this heavenly vision seen by Isaiah, he already was a Prophet of God, as we see right from the beginning of this book. While, Isaiah had been receiving visions and instructions from God, but the vision of God in His majesty, seated on His throne, was first seen by Isaiah in chapter 6. When Isaiah sees the Lord God in His holiness and majesty, though a Prophet and spokesperson of God, he is immediately convicted of his own sins, and cries out confessing specifically that “I am a man of unclean lips, And I dwell in the midst of a people of unclean lips” (6:5). When Isaiah specifically confesses his sin, a seraph takes a coal from the altar of God and touches the specific sinning part of Isaiah’s body - his lips (6:6-7), and he is assured of his sin being forgiven and iniquity removed, and he is now ready to go to work for the Lord God. Much the same happened to Job (Job 40:3-5; 42:1-6), who throughout the book, till this point, had been proudly declaring his being righteous and suffering unjustly. But the moment God in His majesty and holiness confronts him, Job immediately realizes his actual sinful condition, and confesses that he is vile, abhors himself and repents.

    This is the “godly sorrow” of 2 Corinthians 7:10, that leads to salvation of the penitent person, and for which there will not be any regrets later. The proof of this having happened is the changed life of the person, now submitted and obedient to God (Romans 12:1-2); and it is this that John the Baptist had demanded before and after baptism (Matthew 3:7-9; Luke 3:7-14). But the ritualistic, perfunctory repentance, spoken in this verse as “sorrow of the world” produces death, since it never was a sorrow of the heart, never was a true repentance. Those sins still remained unconfessed, unforgiven, and still very much a part and parcel of the person’s life; they were never actually regretted for, and the person never meant to cast them away. All he had come to do was fulfill a religious ritual, an obligation, and having done it in the denominationally prescribed manner, he went back content that he had become right with God since his Pastor told him that; but actually no better than the condition he had come in, maybe somewhat worse, since now another sin of unworthily participating in the Communion and mocking God had also been added to his list of sins.

    In the next article, we will see more about this, and the second way of God handling sin - by judgment. If you are a Christian Believer and have been participating in the Lord’s Table, then please examine your life and make sure that you are actually a disciple of the Lord, i.e., are redeemed from your sins, have submitted and surrendered your life to the Lord Jesus to live in obedience to Him and His Word. You should also always, like the Berean Believers, first check and test all teachings that you receive from the Word of God, and only after ascertaining the truth and veracity of the teachings brought to you by men, should you accept and obey them (Acts 17:11; 1 Thessalonians 5:21). If you do not do this, the false apostles and prophets sent by Satan as ministers of Christ (2 Corinthians 11:13-15), will by their trickery, cunningness, and craftiness render you ineffective for the Lord and cause severe damage to your Christian life and your rewards.

    If you have not yet accepted the discipleship of the Lord Jesus, then to ensure your eternal life and heavenly rewards, take a decision in favor of the Lord Jesus now. Wherever there is surrender and obedience towards the Lord Jesus, the Lord’s blessings and safety are also there. If you are still not Born Again, have not obtained salvation, or have not asked the Lord Jesus for forgiveness for your sins, then you have the opportunity to do so right now. A short prayer said voluntarily with a sincere heart, with heartfelt repentance for your sins, and a fully submissive attitude, “Lord Jesus, I confess that I have disobeyed You, and have knowingly or unknowingly, in mind, in thought, in attitude, and in deeds, committed sins. I believe that you have fully borne the punishment of my sins by your sacrifice on the cross, and have paid the full price of those sins for all eternity. Please forgive my sins, change my heart and mind towards you, and make me your disciple, take me with you." God longs for your company and wants to see you blessed, but to make this possible, is your personal decision. Will you not say this prayer now, while you have the time and opportunity to do so - the decision is yours.


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शुक्रवार, 29 अगस्त 2025

The Holy Communion – 79 - God’s Dealing With Sin (1) / प्रभु भोज – 79 - परमेश्वर द्वारा पाप से व्यवहार (1)

 

प्रभु भोज 79

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प्रभु की मेज़ - परमेश्वर द्वारा पाप से व्यवहार (1)


    अभी तक, प्रभु भोज के बारे में 1 कुरिन्थियों 11:23-29 तक के अध्ययन में हमने देखा है कि प्रभु यीशु ने प्रभु भोज की स्थापना अपने प्रतिबद्ध शिष्यों के लिए की थी, प्रभु भोज में योग्य और अनुचित रीति से भाग लेने का क्या अर्थ है, प्रभु यीशु के प्रतिबद्ध शिष्यों के लिए प्रभु भोज में भाग लेना एक अनिवार्यता है, और प्रत्येक मसीही विश्वासी को भाग लेने से पहले अपने आप को जाँचना ही है। आज, आगे बढ़ते हुए, हम 1 कुरिन्थियों 11:30-31 से देखेंगे कि अयोग्य या अनुचित रीति से भाग लेने के क्या दुष्परिणाम होते हैं, जैसा कि पौलुस ने पवित्र आत्मा की अगुवाई में लिखे हैं।

    ये दो पद हमारे सामने रखते हैं कि क्या होता है जब कोई मसीही विश्वासी प्रभु के निर्देशों को हल्के में लेता है, उनकी अनदेखी करता है, अपनी इच्छा के अनुसार करता है, इस पूर्व-धारणा के साथ कि क्योंकि वह परमेश्वर की संतान है, उसे कभी कोई हानि नहीं होगी। किन्तु यह एक बहुत गलत धारणा है, शैतान द्वारा दिया गया धोखा है, मसीही विश्वासियों को बहकाने और गलत मार्ग पर डालने के लिए, जिससे परमेश्वर की संतान हानि उठाए। जैसा कि हम पिछले लेख में प्रेरितों 17:30-31; 2 कुरिन्थियों 5:10; 1 कुरिन्थियों 3:13-15; और 1 पतरस 4:16-17 से देख चुके हैं, सभी को, मसीही विश्वासियों को भी, प्रभु यीशु के सामने खड़े होकर अपने जीवनों और कार्यों का हिसाब उसे देना होगा, उनके द्वारा जिए गए जीवनों और किए गए कार्यों की बहुत बारीकी से और कड़ाई से, परमेश्वर के मानकों के आधार पर जाँच की जाएगी उन्हें उनके प्रतिफल देने के लिए, और परमेश्वर के न्याय का आरंभ मसीही विश्वासियों के न्याय के साथ होगा।

    परमेश्वर के वचन में, परमेश्वर द्वारा पाप से व्यवहार करने के केवल दो ही तरीके हैं, और प्रत्येक व्यक्ति को, मसीही विश्वासियों को भी, इन दो में से एक तरीके को चुनना होता है। परमेश्वर या तो पाप को क्षमा कर सकता है, या पाप के लिए न्याय करके उसका दण्ड दे सकता है। बाइबल में पाप के साथ व्यवहार के लिए और कोई तरीका नहीं दिया गया है। यदि परमेश्वर को किसी पाप को क्षमा करना है, तो व्यक्ति को अपने जीवन में उस पाप की उपस्थिति को स्वीकार करना होगा, उस विशिष्ट पाप को प्रभु के सामने मानना होगा, सच्चे और खरे मन से उसके लिए पश्चाताप करके, प्रभु से उसके लिए क्षमा माँगनी होगी। यह रीति के समान, औपचारिकता निभाते हुए, बारंबार धार्मिक अनुष्ठान की प्रथा का दोहराया जाना नहीं हो सकता है, जैसे कि बहुत सी डिनॉमिनेशनल कलीसियाओं में देखने को मिलता है, विशेषकर तब जब लोग अपने प्रभु भोज को मना रहे होते हैं। ऐसे में कलीसिया के एकत्रित लोग या तो किसी छपी हुई पुस्तक से, अथवा अपने पास्टर के पीछे-पीछे दोहराते रहते हैं, जिसमें संभव है कि एक सामान्य बुराइयों की कोई सामान्य सूची भी दी हुई हो। लेकिन शायद ही कोई इस रीति का निर्वाह, अपने पाप के विषय वास्तव में कायल होने, और उसके लिए सच्चे पश्चाताप के साथ करता है।

    ध्यान रखिए कि प्रभु को किसी रीति के नाम-मात्र के लिए पूरा किए जाने में कोई रुचि नहीं है। न ही प्रभु किसी मनुष्य की जाँच और परख मनुष्यों द्वारा बनाए गए तरीकों या मानकों के आधार पर करता है। क्योंकि पाप को क्षमा करना प्रभु का काम है, इसलिए जब तक कि प्रभु, जो बारीकी से मनुष्य के हृदय की गहराइयों को भी देख लेता है, उसके मन की वास्तविक दशा को जानता और पहचानता है, यदि मनुष्य के पश्चाताप और क्षमा याचना की खराई को स्वीकार नहीं करता है, तब तक उस व्यक्ति के द्वारा की गई हर बात व्यर्थ है, निष्फल है, और वास्तव में यह दोगलापन है, परमेश्वर का मज़ाक उड़ाना है (मत्ती 15:7-9, 13-14)। किसी व्यक्ति के द्वारा सच्चे मन से पापों के लिए पश्चाताप करने का अर्थ है, पहले उन विशिष्ट पापों के जीवन में होने को स्वीकार करना, फिर उन विशिष्ट पापों को प्रभु के सामने उन पापों का नाम लेते हुए मान लेना, और फिर प्रभु के समक्ष यह निर्णय लेना कि अब से वह उन पापों को अपने जीवन से निकाल देगा, और फिर इस निर्णय का अपने व्यावहारिक जीवन में निर्वाह करना।

    अगले लेख में हम इसके बारे में आगे देखेंगे।

    यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।


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The Holy Communion – 79

English Translation

The Lord’s Table - God’s Dealing With Sin (1)


    So far, in our study about the Holy Communion from 1 Corinthians 11:23-29, we have seen about the setting up of the Communion by the Lord for His committed disciples, what it means to participate worthily or unworthily in the Holy Communion, participating in the Lord’s Table being a mandatory for the committed disciples of the Lord Jesus, and the necessity of every disciple of the Lord examining himself before participating in the Lord’s Table. Today, moving ahead, we will see from 1 Corinthians 11:30-31, the consequences of participating unworthily, written by Paul under the guidance of the Holy Spirit.

    These two verses place before us what happens if the Christian Believer takes the Lord’s instructions lightly, ignores them, and does what he feels like, under the presumption that since he is a child of God, he will never come to any harm. But this is a very wrong notion, a satanic deception to misguide and mislead God’s children into harm. As we have seen from Acts 17:30-31; 2 Corinthians 5:10; 1 Corinthians 3:13-15; and 1 Peter 4:16-17 in the last article, everyone, including the Christian Believers will have to stand before the Lord Jesus, give an account of their lives, and undergo a meticulously carried out strict scrutiny according to God’s standards, of the life they have lived, to receive the rewards from the Lord; and God’s judgment will begin with the Christian Believers.

    In the Word of God, there are only two ways in which sin can be dealt with by God, and every person, including the Christian Believer, has to choose one or the other for God to deal with their sin. Either God can forgive sin, or He has to punish sin. There is no other way mentioned for handling sin in the Bible. If God has to forgive sin, then the person has to acknowledge the presence of sin in his life, specifically confess that sin to the Lord Jesus, sincerely and honestly repent of it, and ask for forgiveness from Him for it. This cannot be a ritualistic, perfunctory repetition as is routinely and liturgically practiced in the denominational Churches, especially while having their Holy Communion. The congregation simply reads or repeats after the Pastor from their printed book, where a general list of common wrong-doings may be mentioned. But quite unlikely that anyone ever goes through this ritual with a sincere sense or conviction of sin and repentance.

    Remember, the Lord is neither interested in the technical fulfillment of a ritual, nor does He evaluate and decide by man’s methods and criteria. It is the Lord who has to forgive the sin; so, unless the Lord, who looks deep into the hearts of men seeing the actual state of the heart, is convinced about the sincerity of a person’s repentance and asking for forgiveness, everything that the person does is vain, inconsequential, and in-fact a mockery of God and His instructions (Matthew 15:7-9, 13-14). For a person to sincerely repent of his sins, he has to first accept the specific sins he has committed, confess those specific sins, naming them or recounting them to the Lord, decide in the presence of the Lord to get rid of them from his life, and then follow up the decision by implementing it in his life.

    In the next article, we will consider further about this.

    If you have not yet accepted the discipleship of the Lord Jesus, then to ensure your eternal life and heavenly rewards, take a decision in favor of the Lord Jesus now. Wherever there is surrender and obedience towards the Lord Jesus, the Lord’s blessings and safety are also there. If you are still not Born Again, have not obtained salvation, or have not asked the Lord Jesus for forgiveness for your sins, then you have the opportunity to do so right now. A short prayer said voluntarily with a sincere heart, with heartfelt repentance for your sins, and a fully submissive attitude, “Lord Jesus, I confess that I have disobeyed You, and have knowingly or unknowingly, in mind, in thought, in attitude, and in deeds, committed sins. I believe that you have fully borne the punishment of my sins by your sacrifice on the cross, and have paid the full price of those sins for all eternity. Please forgive my sins, change my heart and mind towards you, and make me your disciple, take me with you." God longs for your company and wants to see you blessed, but to make this possible, is your personal decision. Will you not say this prayer now, while you have the time and opportunity to do so - the decision is yours.

 

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गुरुवार, 28 अगस्त 2025

The Holy Communion – 78 - Participate Duly Honoring The Lord’s Body (2) / प्रभु भोज – 78 - प्रभु की देह के योग्य आदर के साथ (2)

 

प्रभु भोज 78

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प्रभु की मेज़ - प्रभु की देह के योग्य आदर के साथ (2)

 

पिछले लेख में हमने देखा था कि परमेश्वर ने प्रभु भोज में अयोग्य रीति से, अर्थात, मात्र एक रीति के समान, बिना स्वयं को जाँचे, और अंगीकार तथा प्रभु से क्षमा प्रार्थना द्वारा स्थिति को सुधारे बिना, भाग लेने के बहुत गंभीर और हानिकारक परिणामों के बारे में चेतावनी दी है। केवल यही स्थान नहीं है जहाँ पर परमेश्वर ने अपने निर्देशों, और वचन को हल्के में लेने के बारे में चेतावनी दी है। विलापगीत 3:33 में लिखा है "क्योंकि वह मनुष्यों को अपने मन से न तो दबाता है और न दु:ख देता है।” पूरा पुराना नियम, तथा भविष्यदवक्ताओं की सेवकाई परमेश्वर की अनाज्ञाकारिता तथा उसके वचन को हल्के में लेने पर है। आदान की वाटिका से आरम्भ करके, नूह के समय के हालात तक, और परिणामस्वरूप सारे संसार में आई जल-प्रलय और दुष्टों के नाश, और फिर इस्राएलियों का इतिहास परमेश्वर के निर्देशों की बारम्बार की गई अनाज्ञाकारिता, और उसके वचन की अनदेखी करके, अपने ही मन और इच्छा के अनुसार करने, और फिर इसके लिए दुःख उठाने, क्योंकि परमेश्वर के पास कोई विकल्प शेष नहीं रह गया था (2 इतिहास 36:15-16) से भरा पड़ा है। इसी प्रकार से हम नए नियम में भी देखते हैं कि जब आवश्यक होता है, तब परमेश्वर अपने बच्चों की ताड़ना भी करता है, उन्हें सुधारने और सही मार्ग पर लाने के लिए (इब्रानियों 12:5-11)। पवित्र आत्मा ने पौलुस के द्वारा कुरिन्थियों को, और अब हमें चेतावनी दी है कि अयोग्य रीति से प्रभु की मेज़ में भाग लेने, परमेश्वर की अनाज्ञाकारिता करने, उसके वचन की बातों की अनदेखी करने के बहुत गंभीर परिणाम होंगे।

हम इब्रानियों 10:28-29 से देखते हैं कि परमेश्वर अपने पुत्र के निरादर को हल्के में नहीं लेता है; और यह ठीक भी है, क्योंकि यदि कोई परमेश्वर पुत्र का आदर नहीं करता है तो वह परमेश्वर पिता का आदर भी नहीं करेगा (यूहन्ना 5:23)। इसलिए, मानव जाति के उद्धार के लिए प्रभु द्वारा दिए गए बलिदान के चिह्नों को हल्के में अथवा अनुचित रीति से लेना, परमेश्वर का निरादर करना है, और फिर उसके परिणामों को भी भुगतना पड़ेगा। जो भाग लेते समय प्रभु की देह को नहीं पहचानता है; अर्थात परमेश्वर के निष्पाप, निष्कलंक, पवित्र पुत्र के द्वारा संपूर्ण मानवजाति के समस्त पापों को अपने ऊपर ले लेने और मनुष्यों को उनके पापों के परिणाम से छुड़ाने तथा उद्धार देने के लिए स्वयं पाप बन जाने की गंभीरता और अवर्णनीय महानता को नहीं पहचानते हैं; जो प्रभु भोज में योग्य रीति से भाग लेने की अनिवार्यता को नहीं पहचानते हैं; जो प्रभु यीशु द्वारा अपने शिष्यों के लिए प्रभु भोज की स्थापना करने के महत्व और उद्देश्य को नहीं पहचानते हैं, उन्हें भी फिर अपनी देह में ही इसके परिणामों को भी भुगतना पड़ेगा। और ये परिणाम 1 कुरिन्थियों 11:30 में दिए गए हैं - निर्बलता, रोग, और मृत्यु।

जैसा कि हम पद 30 से देख सकते हैं, पौलुस के यह पत्र लिखने के समय, ये परिणाम कुरिन्थियों में दिखने लगे थे। तात्पर्य यह है कि प्रभु की मेज़ का निरादर करना और उसमें अयोग्य रीति से भाग लेना वहाँ काफी समय से चल रहा होगा, और अन्ततः उन्हें इसके लिए दण्ड देने के अतिरिक्त, परमेश्वर के पास कोई विकल्प नहीं रहा। यह निर्गमन 34:5-7 में परमेश्वर द्वारा मूसा पर अपने नाम के प्रकट किये जाने का एक उदाहरण है - कि वह दयालु और विलम्ब से कोप करने वाला तो है, परन्तु साथ ही, एक न्यायी परमेश्वर भी है जो दुष्टों और अनाज्ञाकारी लोगों को उनका उचित परिणाम देता है। पौलुस ने तब अथेने के लोगों से बात करते हुए, और आज हमारे लिए, प्रेरितों 17:30-31 में कहा है कि जो प्रभु यीशु अपने प्रेम, अनुग्रह, और दया में, उसके पास पश्चाताप और समर्पण के साथ आने वाले सभी लोगों को पापों की क्षमा और उद्धार देना चाहता है, देने की प्रतीक्षा कर रहा है; वही अन्ततः न्यायी बन कर बैठेगा, और सभी को, जिसके वे योग्य हैं, वह देगा, यदि उन्होंने अभी पापों से उद्धार पाने और उसके परिणामों से बचाए जाने के इस समय और अवसर का सदुपयोग नहीं किया। और इसीलिए, हम नए नियम के, अनुग्रह के समय के लोगों को, पुराने नियम की घटना के आधार पर, इब्रानियों 3:7-19 की चेतावनी भी दी गई है।

यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं, और प्रभु की मेज़ में भाग लेते रहे हैं, तो कृपया अपने जीवन को जाँच कर देख लें कि आप वास्तव में पापों से छुड़ाए गए हैं तथा आप ने अपना जीवन प्रभु की आज्ञाकारिता में जीने के लिए उस को समर्पित किया है। आपके लिए यह अनिवार्य है कि आप परमेश्वर के वचन की सही शिक्षाओं को जानने के द्वारा एक परिपक्व विश्वासी बनें, तथा सभी शिक्षाओं को वचन की कसौटी पर परखने, और बेरिया के विश्वासियों के समान, लोगों की बातों को पहले वचन से जाँचने और उनकी सत्यता को निश्चित करने के बाद ही उनको स्वीकार करने और मानने वाले बनें (प्रेरितों 17:11; 1 थिस्सलुनीकियों 5:21)। अन्यथा शैतान द्वारा छोड़े हुए झूठे प्रेरित और भविष्यद्वक्ता मसीह के सेवक बन कर (2 कुरिन्थियों 11:13-15) अपनी ठग विद्या और चतुराई से आपको प्रभु के लिए अप्रभावी कर देंगे और आप के मसीही जीवन एवं आशीषों का नाश कर देंगे।

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

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The Holy Communion – 78

English Translation

The Lord’s Table - Participate Duly Honoring The Lord’s Body (2)

 

We had seen in the previous article that God has warned about the serious and very harmful consequences of taking part in the Holy Communion unworthily, i.e., merely as a ritual, without properly examining self, and correcting the situation through confession and seeking Lord's forgiveness. This is not the only place that God has warned about taking His instructions and Word for granted. It says in Lamentations 3:33 "For He does not afflict willingly, Nor grieve the children of men." The whole of the Old Testament, and the ministry of the Old Testament Prophets is about this disobedience and taking God's Word for granted. Starting from the Garden of Eden, to the situation in Noah's time and the consequent global flood and destruction of the wicked, and then the history of the Israelites, is full of repeated disobedience and ignoring God's Word, doing according to their fancy, and then suffering for it, having left no other choice for God (2 Chronicles 36:15-16). Similarly, in the New Testament we see that when necessary, God chastises His children, to correct and reform them (Hebrews 12:5-11). The Holy Spirit, through Paul, warned the Corinthians, and now us, that partaking in the Lord's Table unworthily, disobeying God, ignoring the instructions in His Word, will have severe consequences.

We see from Hebrews 10:28-29 that God does not take the dishonoring of His Son lightly; and rightly so, since anyone who does not honor God the Son, does not honor God the Father either (John 5:23). So, dishonoring God by trivially partaking of the symbols of the Lord’s sacrifice for salvation of mankind, will have its consequences. Those who do not discern the Lord’s body, i.e., do not recognize the seriousness and indescribable magnitude of the pure, sinless, spotless Son of God taking the entire sin of all of mankind upon Himself and becoming sin, to redeem and save all mankind; do not recognize the necessity of worthily participating in the Holy Communion; do not give due importance to the Lord’s purpose in instituting the Holy Communion for His disciples, will have to suffer the consequences in their own body. And these consequences are given in 1 Corinthians 11:30 - weakness, sickness, and even death.

As we can make out from verse 30, these consequences were already present amongst the Corinthians, at the time of Paul's writing this letter. The implication is that the dishonoring of the Lord's Table, and participating unworthily, must have been going on for some time, till eventually God was left with no alternative, but to punish them. This is another example of God's name, as he revealed it to Moses in Exodus 34:5-7 - that though He is a merciful and long-suffering God, but He is also a just God, who gives the disobedient, the wicked their due. Paul speaking to the Athenians and today to us, in Acts 17:30-31, that the same Lord Jesus, who in His love, grace, and mercy is willing and waiting to provide forgiveness of sins and salvation to all who come to Him in repentance and submission, will eventually sit as the judge, and give to everyone what they deserve, if they do not make proper use of this time and opportunity to be saved and delivered from the consequences of their sins. Hence, based on the incident of the Old Testament, the caution of Hebrews 3:7-19, for us the people of the New Testament, those of the age of grace.

If you are a Christian Believer and have been participating in the Lord’s Table, then please examine your life and make sure that you are actually a disciple of the Lord, i.e., are redeemed from your sins, have submitted and surrendered your life to the Lord Jesus to live in obedience to Him and His Word. You should also always, like the Berean Believers, first check and test all teachings that you receive from the Word of God, and only after ascertaining the truth and veracity of the teachings brought to you by men, should you accept and obey them (Acts 17:11; 1 Thessalonians 5:21). If you do not do this, the false apostles and prophets sent by Satan as ministers of Christ (2 Corinthians 11:13-15), will by their trickery, cunningness, and craftiness render you ineffective for the Lord and cause severe damage to your Christian life and your rewards.

If you have not yet accepted the discipleship of the Lord Jesus, then to ensure your eternal life and heavenly rewards, take a decision in favor of the Lord Jesus now. Wherever there is surrender and obedience towards the Lord Jesus, the Lord’s blessings and safety are also there. If you are still not Born Again, have not obtained salvation, or have not asked the Lord Jesus for forgiveness for your sins, then you have the opportunity to do so right now. A short prayer said voluntarily with a sincere heart, with heartfelt repentance for your sins, and a fully submissive attitude, “Lord Jesus, I confess that I have disobeyed You, and have knowingly or unknowingly, in mind, in thought, in attitude, and in deeds, committed sins. I believe that you have fully borne the punishment of my sins by your sacrifice on the cross, and have paid the full price of those sins for all eternity. Please forgive my sins, change my heart and mind towards you, and make me your disciple, take me with you." God longs for your company and wants to see you blessed, but to make this possible, is your personal decision. Will you not say this prayer now, while you have the time and opportunity to do so - the decision is yours.

 

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बुधवार, 27 अगस्त 2025

The Holy Communion – 77 - Participate Duly Honoring The Lord’s Body (1) / प्रभु भोज – 77 - प्रभु की देह के योग्य आदर के साथ (1)

 

प्रभु भोज 77

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प्रभु की मेज़ - प्रभु की देह के योग्य आदर के साथ (1)

 

पिछले लेखों में 1 कुरिन्थियों 11:28 से अध्ययन करने के बाद, अब हम आगे, 1 कुरिन्थियों 11:29-30 पर आते हैं। प्रेरित पौलुस में होकर पवित्र आत्मा इस पद से मसीही विश्वासियों के सामने प्रभु की मेज़ में अयोग्य रीति से भाग लेने के बहुत गंभीर तथा हानिकारक प्रभावों के बारे में बताता है। कुछ ही समय पहले हमने 1 कुरिन्थियों 11:27 से देखा था कि प्रभु की मेज़ में योग्य रीति से तथा अयोग्य रीति से भाग लेने का क्या अर्थ होता है। संक्षेप में, प्रभु की मेज़ में योग्य रीति से भाग लेना, उसमें किसी अनुष्ठान के समान या डिनॉमिनेशन की परंपरा पूरी करने के लिए नहीं, परन्तु उस अभिप्राय और रीति से भाग लेना है जो प्रभु यीशु ने प्रभु भोज को स्थापित करते समय निर्धारित किया था। अकसर, वे लोग जो प्रभु भोज में रीति या परंपरा के अनुसार भाग लेते हैं, यह गलत धारणा रखते हैं कि इससे वे धर्मी बन जाते हैं, परमेश्वर को स्वीकार्य हो जाते हैं, तथा स्वर्ग में प्रवेश पाने के योग्य हो जाते हैं। किन्तु यह बिल्कुल गलत और बाइबल के विपरीत धारणा है; परमेश्वर के वचन में कहीं भी, न तो प्रभु यीशु द्वारा, न पौलुस, अथवा अन्य किसी के द्वारा ऐसा कुछ भी कहा गया, न ही कोई ऐसा अभिप्राय दिया गया है। परमेश्वर द्वारा दिए गए उद्देश्यों - प्रभु यीशु के जीवन और बलिदान को स्मरण करना तथा उसकी मृत्यु का प्रचार करना, अर्थात उसकी गवाही देना, से भिन्न कोई भी उद्देश्य देना अयोग्य रीति से भाग लेना है।

योग्य रीति से भाग लेने से संबंधित एक और बहुत महत्वपूर्ण शिक्षा है कि भाग लेने वाले को पहले अपने आप को जाँच लेना चाहिए, अपने पापों, गलतियों, और कमज़ोरियाँ को प्रभु के सामने मान कर, प्रभु से उनके लिए क्षमा माँगनी चाहिए, और तब योग्य रीति से भाग लेना चाहिए। किन्तु इसे भी एक व्यर्थ की परंपरा बना दिया गया है, अब कलीसिया के एकत्रित लोग, अपने पादरी के पीछे-पीछे अनुष्ठान की विधि के अनुसार कही जाने वाली कुछ बातों को दोहराते हैं, अधिकांशतः औपचारिकता पूरी करने के लिए, न कि सार्थक रीति से अथवा किसी श्रद्धा या खराई के साथ, और फिर जा कर मेज़ में भाग ले लेते हैं।

हमें 1 कुरिन्थियों 11:29 में अयोग्य रीति से प्रभु भोज में भाग लेने के बारे में एक बहुत गंभीर चेतावनी दी गई है - ऐसा करने वाले इस खाने और पीने से अपने ऊपर दण्ड लाते हैं। और अगला ही पद, पद 30, हमें बताता है कि ये दण्ड यहीं, इसी पृथ्वी पर ही उनके जीवनों में आने लग जाते हैं, इससे पहले कि व्यक्ति प्रभु यीशु के सामने अपने जीवन का हिसाब देने के लिए, और भले या बुरे प्रतिफल पाने के लिए खड़ा हो (प्रेरितों 17:30-31; 2 कुरिन्थियों 5:10)। परमेश्वर ने जो कुछ भी कहा है, जो भी निर्देश दिए हैं, उन्हें कभी भी हल्के में नहीं लिया जा सकता है, और न ही यह मान कर चला जा सकता है कि कोई बात नहीं, अन्ततः इसकी अनदेखी हो जाएगी। नया जन्म पाए हुए मसीही विश्वासियों, परमेश्वर की संतानों को भी यह धारणा नहीं रखनी चाहिए कि वे परमेश्वर के निर्देशों के साथ समझौते कर सकते हैं, और वे हल्के में बच जाएंगे। बल्कि, 1 पतरस 4:17-18 कहता है कि परमेश्वर के न्याय का आरंभ विश्वासियों से होगा, और 1 कुरिन्थियों 3:13-15 बताता है कि यह काम कितनी बारीकी और गंभीरता से किया जाएगा। विश्वासियों का यह न्याय उनके उद्धार पाने या न पाने के लिए नहीं है, परन्तु अनन्तकाल के प्रतिफलों के लिए है, जैसा कि 1 कुरिन्थियों 3:15 स्पष्ट कर देता है कि कुछ ऐसे लोग भी होंगे जो उद्धार पाए हुए तो होंगे किन्तु स्वर्ग में अनन्तकाल के लिए छूछे हाथ रहेंगे क्योंकि उनके कोई भी कार्य किसी प्रतिफल के योग्य नहीं थे।

अगले लेख में हम परमेश्वर की बात को हल्के में लेने से आने वाले दण्ड के बारे में देखेंगे।

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

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The Holy Communion – 77

English Translation

The Lord’s Table - Participate Duly Honoring The Lord’s Body (1)

 

Having studied from 1 Corinthians 11:28 in the previous articles, we will now move to 1 Corinthians 11:29-30. The Holy Spirit, through Paul, from this verse onwards puts before the Christian Believers the serious and very harmful consequences of unworthy participation in the Lord’s Table. A short while back, from 1 Corinthians 11:27, we had seen what participating in the Lord’s Table worthily and unworthily means. Essentially, to participate worthily is to participate in the Lord’s Table, not as a ritual, or a denominational tradition to be fulfilled, but in the manner and with the purpose instituted by the Lord Jesus. Often those who participate in the Holy Communion ritualistically have this false notion that their participation makes them righteous, acceptable to God, and worthy of gaining entry into heaven. But this is an absolutely unBiblical idea; nowhere in God’s Word did the Lord Jesus, or Paul, or anyone else ever say or even imply this. Ascribing any other purpose than what God has given - a remembrance of the Lord Jesus’s life and sacrifice, and proclaiming the Lord’s death, i.e., witnessing for Him, makes it an unworthy participation.

Another very important teaching associated with participating worthily is that the participant should first examine himself, confess his sins, errors and short-comings before the Lord, seek His forgiveness for them, and having been forgiven, then to take part in a worthy manner, i.e., with the person’s sins dealt with and his being made worthy by the Lord. But this too has been made into a vain ritual, where the congregation simply repeats after the Pastor, a series of liturgical statements, more perfunctorily, than meaningfully or with any sincerity of heart, and then goes ahead to partake of the Lord’s Table.

In 1 Corinthians 11:29, we have a very serious word of caution for those who do not partake of the Holy Communion in a worthy manner - they eat and drink judgment to themselves. And the next verse, i.e., verse 30 shows us that the effects of this judgment come upon the person here on earth itself, even before the person eventually stands before the Lord Jesus to give an account of his life to the Lord, and receive the consequent rewards – good, or bad (Acts 17:30-31; 2 Corinthians 5:10). Nothing that God has said and instructed, can ever be taken lightly or presumed that it will be ignored. Even the Born-Again Christian Believers, the children of God cannot presume to compromise with God’s instructions and get away with it lightly. Rather, 1 Peter 4:17-18 say that God’s judgment will begin with the Believers, and 1 Corinthians 3:13-15 tells us how minutely and seriously it will be done. This judgment of the Believers is not to decide on their salvation, but for their eternal rewards, as is made clear in 1 Corinthians 3:15, that there will be some who will remain saved but also remain empty handed for eternity, since none of their works were worthy of any rewards.

In the next article we will consider about the retribution that comes because of taking God's instructions for granted.

If you have not yet accepted the discipleship of the Lord Jesus, then to ensure your eternal life and heavenly rewards, take a decision in favor of the Lord Jesus now. Wherever there is surrender and obedience towards the Lord Jesus, the Lord’s blessings and safety are also there. If you are still not Born Again, have not obtained salvation, or have not asked the Lord Jesus for forgiveness for your sins, then you have the opportunity to do so right now. A short prayer said voluntarily with a sincere heart, with heartfelt repentance for your sins, and a fully submissive attitude, “Lord Jesus, I confess that I have disobeyed You, and have knowingly or unknowingly, in mind, in thought, in attitude, and in deeds, committed sins. I believe that you have fully borne the punishment of my sins by your sacrifice on the cross, and have paid the full price of those sins for all eternity. Please forgive my sins, change my heart and mind towards you, and make me your disciple, take me with you." God longs for your company and wants to see you blessed, but to make this possible, is your personal decision. Will you not say this prayer now, while you have the time and opportunity to do so - the decision is yours.

 

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