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रविवार, 6 अप्रैल 2025

The Church, or, Assembly of Christ Jesus - 58 - Teachers (1) / मसीह यीशु की कलीसिया या मण्डली – 58 - शिक्षक (1)

 

मसीह यीशु की कलीसिया या मण्डली – 58 

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शिक्षकों की सेवकाई (1)


हम पिछले लेखों में इफिसियों 4:11 में कलीसिया की उन्नति के लिए प्रभु द्वारा नियुक्त पाँच प्रकार के सेवकों तथा उनकी सेवकाइयों के बारे में देखते आ रहे हैं। हम देख चुके हैं कि ये पाँचों सेवकाइयां परमेश्वर के वचन की सेवकाई से संबंधित हैं; और हमने वचन से यह भी देखा है कि एक ही व्यक्ति एक से अधिक प्रकार की सेवकाई कर सकता है, और करता रहा है। पिछले लेख में हमने इनमें से पांचवें, उपदेशक, अर्थात शिक्षक होने के बारे में देखा था, और देखा था कि कैसे प्रभु यीशु भी एक शिक्षक, सुसमाचार प्रचारक, और अन्य सेवकाइयों को करने वाले जाने जाते थे। इसी प्रकार से पहली कलीसिया में प्रेरित भी एक से अधिक प्रकार की सेवकाइयों को करते थे। पिछले लेख में हमने परमेश्वर के वचन से पाँचवीं सेवकाई, शिक्षक और उपदेशक के बार में देखा था। आज हम वचन से ही उचित रीति से वचन की शिक्षा दिए जाने और वचन की सही शिक्षा के लोगों के जीवनों पर प्रभावों के कुछ उदाहरणों को देखते हैं।


हम बाइबल से कुछ उदाहरणों को देखते हैं:


* प्रभु यीशु मसीह ने जब लोगों को सिखाया, तब, फरीसियों और शास्त्रियों के समान नहीं, परंतु अधिकारी के समान, और अधिकार के साथ सिखाया (मत्ती 7:28-29; मरकुस 1:22; लूका 4:32)। अर्थात प्रभु यीशु ने वचन को ‘किताबी या मानवीय’ ज्ञान के अनुसार नहीं वरन वचन की गहराई से समझ और दृढ़ता के साथ सिखाया। किन्तु साथ ही वह लोगों को उनकी समझ के अनुसार भी सिखाता था, और परमेश्वर की शिक्षाओं को सरल दृष्टांतों के द्वारा लोगों को समझाता था (मरकुस 4:33-34)। मसीही शिक्षक को वचन की शिक्षा देने की विधि का यही उदाहरण लेकर चलना चाहिए। 


* पौलुस ने कुरिन्थुस की मण्डली को उन्हें उससे मिली सुसमाचार की शिक्षा के विषय स्मरण दिलाया, और हे भाइयों, जब मैं परमेश्वर का भेद सुनाता हुआ तुम्हारे पास आया, तो वचन या ज्ञान की उत्तमता के साथ नहीं आया। और मेरे वचन, और मेरे प्रचार में ज्ञान की लुभाने वाली बातें नहीं; परन्तु आत्मा और सामर्थ्य का प्रमाण था। इसलिये कि तुम्हारा विश्वास मनुष्यों के ज्ञान पर नहीं, परन्तु परमेश्वर की सामर्थ्य पर निर्भर हो (1 कुरिन्थियों 2:1, 4-5)। अर्थात, पौलुस जैसे ज्ञानवान और पवित्र शास्त्र की उत्तम शिक्षा पाए हुए व्यक्ति के द्वारा पवित्र आत्मा की अगुवाई में जो सुसमाचार की शिक्षा दी गई, वह आत्मा की सामर्थ्य से तो थी, किन्तु उसकी शिक्षाओं में ज्ञान बघारने की बातें, या संसार के ज्ञान की बातें नहीं थीं। वह परमेश्वर के वचन में अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ता था, वचन को रोचक या आकर्षक बनाने के प्रयास नहीं करता था, सांसारिक बातों और ज्ञान को वचन में नहीं मिलाता था; वह केवल वचन के सत्य को प्रकट करता था, और लोगों में शेष कार्य परमेश्वर पवित्र आत्मा करता था (2 कुरिन्थियों 4:2, 6)।  


* इसी प्रकार थिस्सलुनीकिया की मसीही मण्डली को पौलुस ने लिखा, क्योंकि हमारा सुसमाचार तुम्हारे पास न केवल वचन मात्र ही में वरन सामर्थ्य और पवित्र आत्मा, और बड़े निश्चय के साथ पहुंचा है; जैसा तुम जानते हो, कि हम तुम्हारे लिये तुम में कैसे बन गए थे। और तुम बड़े क्लेश में पवित्र आत्मा के आनन्द के साथ वचन को मान कर हमारी और प्रभु की सी चाल चलने लगे (1 थिस्स्लुनीकियों 1:5, 6)। यहाँ पर भी हम देखते हैं कि पौलुस द्वारा वचन की शिक्षा मनुष्य के ज्ञान के द्वारा नहीं, वरन, पवित्र आत्मा की सामर्थ्य और बड़ी दृढ़ता से दी गई। साथ ही हम यह भी देखते हैं कि परमेश्वर के वचन का पालन करने में थिस्सलुनीकिया के मसीही विश्वासियों को क्लेश तो उठाना पड़ा, किन्तु साथ ही उनमें पवित्र आत्मा का आनंद भी था, और उनके जीवन में परिवर्तन आया, और वे प्रभु की सी चाल चलने लगे - जो उन्हें मिली वचन की शिक्षा के सच्चे, खरे, और परमेश्वर की ओर से होने का प्रमाण है।


अगले लेख में हम परमेश्वर के वचन से वचन की शिक्षा देने और सम्बन्धित उदाहरणों को, तथा मनुष्यों के जीवन में उस खरी शिक्षा के परिणामों के बारे में कुछ और देखेंगे। 


यदि आपने अभी तक प्रभु की शिष्यता को स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी उसके पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। यदि आपने अभी तक नया जन्म, उद्धार नहीं पाया है, प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा नहीं माँगी है, तो अभी आपके पास समय और अवसर है कि यह कर लें। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” परमेश्वर आपके साथ संगति रखने की बहुत लालसा रखता है तथा आपको आशीषित देखना चाहता है, लेकिन इसे सम्भव करना आपका व्यक्तिगत निर्णय है। सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी। क्या आप अभी समय और अवसर होते हुए, इस प्रार्थना को नहीं करेंगे? निर्णय आपका है।

 

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 The Church, or, Assembly of Christ Jesus - 58

English Translation

The Ministry of Teachers (1)


Since the past few articles, we have been seeing from Ephesians 4:11 that for the works and functioning of His Church, the Lord Jesus has set some ministries and appointed some workers for those ministries. We have seen that these ministries are related to the ministry of God’s Word in the Churches. We have also seen that just as the Lord Jesus served as a Teacher, an Evangelist, and through other ministries as well, and so did the Apostles in the first Church, similarly one person can serve in more than one ministry. In the last article we had seen about the fifth ministry and its workers, the Teachers and Preachers. Today, from God’s Word, we will look about the Biblical way of teaching God’s Word, and the effects the correct teachings of God’s Word have on the lives of the people.


Let us consider some examples from the Bible:


* When the Lord Jesus taught the people, it was not as the Pharisees and the Scribes used to do; He taught with authority (Matthew 7:28-29; Mark 1:22; Luke 4:32). In other words, the Lord Jesus did not give them any “bookish” teachings or teachings through any human knowledge, but taught with a deep and proper understanding of God’s Word with a sense of being deeply rooted in it. But He also taught them according to the level of understanding of the people - how much and what all they could grasp (Mark 4:33-34). Every Christian Teacher of God’s Word should teach bearing these things in mind.


* Paul reminded the Church or Assembly in Corinth, how he taught them, And I, brethren, when I came to you, did not come with excellence of speech or of wisdom declaring to you the testimony of God. And my speech and my preaching were not with persuasive words of human wisdom, but in demonstration of the Spirit and of power, that your faith should not be in the wisdom of men but in the power of God (1 Corinthians 2:1, 4-5). In other words, under the guidance of the Holy Spirit, the gospel and teachings given by Paul, who was well-learned and very knowledgeable about the Scriptures, were with the power of the Spirit, did not contain any worldly knowledge, nor was it to show-off his own knowledge. Paul never added anything to God’s Word from his own side, nor did he attempt to make the teachings entertaining and attractive through adding frivolous and worldly things. Paul only brought forth the truth of God’s Word, and left it for the Holy Spirit to do the rest amongst the people (2 Corinthians 4:2, 6).


* Similarly, to the Church in Thessalonica, Paul wrote, For our gospel did not come to you in word only, but also in power, and in the Holy Spirit and in much assurance, as you know what kind of men we were among you for your sake. And you became followers of us and of the Lord, having received the word in much affliction, with joy of the Holy Spirit (1 Thessalonians 1:5-6). Here too we see that the teaching of God’s Word by Paul was not casual or according to the ways and knowledge of the world, but through the power of the Holy Spirit in much firmness or assurance. We also see that the Thessalonian Believers had to suffer problems and persecutions in obeying God’s Word, but they also received the joy of the Holy Spirit, their lives were changed, and they sincerely started to follow the Lord - which was the proof of their having received true and factual teachings, from God.


In the next article we will see some more examples and related references of giving the pure teachings of God's Word, and of the effects this has on man's life.


If you have not yet accepted the discipleship of the Lord Jesus, then take a decision in its favor now to secure your eternal life and heavenly blessings. The Lord's security and blessings are present where there is obedience of the Lord, where His Word is honored and followed. If you are still not Born Again, have not obtained salvation, or have not asked the Lord Jesus for forgiveness for your sins, then you have the time and opportunity to do so right now. Ask the Lord Jesus to forgive your sins, and voluntarily and sincerely surrender yourselves into His hands - this is the only way to salvation and heavenly life. All you have to do is say a short prayer, voluntarily and with a sincere heart, with heartfelt repentance for your sins, and a fully submissive attitude. You can do this in this manner, “Lord Jesus, I confess that I have disobeyed You, and have knowingly or unknowingly, in mind, in thought, in attitude, and in deeds, committed sins. I believe that you have fully borne the punishment of my sins by your sacrifice on the cross, and have paid the full price of those sins for all eternity. Please forgive my sins, change my heart and mind towards you, and make me your disciple, take me with you." God longs for your company and wants to see you blessed, but to make this possible, is your personal decision. One prayer said with a sincere and surrendered heart will turn your present and future, your life here on earth and in the next world, forever and make you heavenly and blessed. Will you not say this prayer now, while you have the time and opportunity to do so? The decision is yours.

 

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शनिवार, 5 अप्रैल 2025

The Church, or, Assembly of Christ Jesus - 57 - Teachers and Preachers / मसीह यीशु की कलीसिया या मण्डली – 57 - उपदेशक और शिक्षक

 

मसीह यीशु की कलीसिया या मण्डली – 57 

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उपदेशक और शिक्षक


पिछले कुछ लेखों में हम इफिसियों 4:11 से देखते आ रहे हैं कि प्रभु ने अपनी कलीसिया के कार्यों के लिए, कलीसिया में कुछ कार्यकर्ताओं, कुछ सेवकों को नियुक्त किया है। मूल यूनानी भाषा में इन सेवकों और उनकी सेवकाई के संबंध में प्रयोग किए गए शब्द दिखाते हैं कि ये सेवकाइयां कलीसिया में परमेश्वर के वचन की सेवकाई से संबंधित हैं। आज हम इफिसियों 4:11 में दी गई सूची में प्रभु यीशु द्वारा नियुक्त किए जाने वाले, प्रभु यीशु की कलीसिया के पाँचवें कार्यकर्ता, उपदेशक, के बारे में देखेंगे। मूल यूनानी भाषा के जिस शब्द का अनुवाद “उपदेशक” किया गया है, उसका शब्दार्थ है “शिक्षक” या “वचन की शिक्षा देने वाले”। परमेश्वर के वचन बाइबल की बातों और शिक्षाओं का प्रचार करने में, और उनके आधार पर कोई संदेश देने में, और वचन को सिखाने में अंतर है; प्रचार करना और शिक्षा देना भिन्न सेवकाइयां हैं, जैसा 1 कुरिन्थियों 12:28-29 से भी पता चलता है। प्रभु यीशु की पृथ्वी की सेवकाई के दिनों में यहूदी धर्म के अगुवे उन्हें परमेश्वर की ओर से भेजा गया एक गुरु या शिक्षक मानते थे (यूहन्ना 3:2); अनन्त जीवन पाने की लालसा रखने वाले धनी जवान ने भी प्रभु को “उत्तम गुरु/शिक्षक” कहकर संबोधित किया (मरकुस 10:17); और सुसमाचारों में अनेकों स्थानों पर लोग, विशेषकर यहूदी अगुवे प्रभु को “रब्बी”, जिसका अर्थ होता है शिक्षक, कहकर संबोधित किया करते थे। प्रभु यीशु के लिए यह संबोधन उचित और सही भी था, क्योंकि प्रभु लोगों को सिखाता था (मत्ती 13:54; मरकुस 1:21; 2:13), परमेश्वर के राज्य की बातें भी बता था, और साथ ही सुसमाचार भी सुनाता था (मरकुस 1:15; लूका 4:43; लूका 8:1; लूका 20:1), और लोगों को जगत के अंत तक की भविष्यवाणी की बातें भी बताईं और सिखाईं।


हमें इन सेवकाइयों के संदर्भ में एक और तथ्य का भी ध्यान रखना है; यद्यपि इफिसियों 4:11 में पाँच प्रकार के सेवक और सेवकाइयां दी गई हैं, किन्तु यह आवश्यक नहीं कि अलग-अलग व्यक्ति ही कलीसिया में इन अलग-अलग सेवकाइयों को करें। प्रभु यीशु के समान ही, एक ही व्यक्ति, भिन्न समयों पर, आवश्यकतानुसार, इन भिन्न सेवकाइयों का निर्वाह कर सकता था, और करता भी था, जैसा हमने ऊपर प्रभु यीशु के जीवन से देखा है। पौलुस ने लिखा, कि वह भिन्न सेवकाइयों को करता था: “मैं सच कहता हूं, झूठ नहीं बोलता, कि मैं इसी उद्देश्य से प्रचारक और प्रेरित और अन्यजातियों के लिये विश्वास और सत्य का उपदेशक ठहराया गया” (1 तीमुथियुस 2:7); “जिस के लिये मैं प्रचारक, और प्रेरित, और उपदेशक भी ठहरा” (2 तीमुथियुस 1:11)। याकूब ने, पतरस ने, यूहन्ना ने, नए नियम के सभी लेखकों ने, अपनी रचनाओं में सुसमाचार प्रचार भी किया, शिक्षाएं भी दीं, और भविष्य के समय से संबंधित भविष्यवाणियाँ भी लिखीं, तथा कलीसियाओं की अगुवाई भी की और उन के द्वारा हम कलीसिया के लोगों की देखभाल और रखवाली के बारे में भी देखते हैं। अर्थात, एक ही व्यक्ति एक या अधिक प्रकार की सेवकाइयां कर सकता है; सेवक की कार्य के लिए नियुक्ति नहीं, अपितु, कलीसिया में इन पाँचों प्रकार की सेवकाइयों का किया जाना, वचन की इन बातों का निर्वाह होना ही कलीसिया और मसीही जीवन की उन्नति के लिए आवश्यक है।


यह रोचक बात है कि इस पद में प्रभु यीशु द्वारा की गई सेवकाइयों में से उन सेवकाइयों के लिए जिन से अपने आप को प्रमुख, या महत्वपूर्ण, या विशिष्ट दिखाया जा सके, जैसे कि प्रेरित, भविष्यद्वक्ता और भविष्यवाणी करना, वर्तमान में उनके लिए तो सामान्यतः लोग बहुत लालसा रखते हैं, उन्हें उपाधियों के समान प्रयोग करते हैं। किन्तु आज अपने आप ही या मनुष्यों और संस्थाओं द्वारा कलीसियाओं में उच्च पद और आदरणीय स्थानों पर आसीन होने की लालसा रखने वाले और उससे सांसारिक लाभ अर्जित करने वाले इन लोगों में सुसमाचार प्रचारक और शिक्षक होने के लिए सामान्यतः कोई रुचि नहीं होती है। आज शायद ही कोई ऐसा जन मिलेगा जो अपने आप को सुसमाचार प्रचारक या वचन का शिक्षक कहता हो। ऐसा संभवतः इसलिए है क्योंकि इन सेवकाइयों के सच्चाई और खराई से निर्वाह के लिए परमेश्वर के साथ बैठना और बहुत समय बिताना पड़ता है, लोगों के मध्य बड़े धैर्य के साथ परिश्रम करना पड़ता है, किन्तु तब भी इन से समाज में वह प्रशंसा और आदर का स्थान नहीं मिलता है जो प्रेरित और भविष्यद्वक्ता कहलाने से मिलता है। वरन, बहुधा यह भी देखा जाता है कि सामान्य लोगों को उनकी पापी होने की दशा का बोध होना, उनकी अपनी धारणाओं के स्थान पर परमेश्वर के वचन की वास्तविकता और उसकी खरी बातें सुनना रास नहीं आता है, इसलिए इन सेवकाइयों को करने वालों को संसार तथा समाज में आदर, ओहदा, और उच्च स्थान तो कम ही मिलते हैं, किन्तु तिरस्कार और विरोध अधिक मिलता है। संभवतः इसीलिए आज के मसीही विश्वासियों में इन सेवकाइयों के लिए चाह बहुत कम है।


प्रेरित पौलुस ने तीमुथियुस को सचेत किया कि लोग खरे उपदेश और शिक्षा के स्थान पर अपनी पसंद के लुभावने उपदेश और शिक्षा देने वालों को एकत्रित कर लेंगे। ऐसे में उसे सुसमाचार प्रचार करने के लिए, लोगों को वचन की सही शिक्षा देने के लिए बहुत परिश्रम करना पड़ेगा, साथ ही दुख भी उठाना पड़ेगा (2 तिमुथियुस 4:1-5)। पतरस ने भी अपने पाठकों को चिताया कि मसीही विश्वासियों और कलीसियाओं में झूठे उपदेशक या शिक्षक भी उठ खड़े होंगे और नाश करने वाले पाखण्ड तथा विनाश की बातों को छिप-छिप कर कलीसियाओं में फैलाएंगे (2 पतरस 2:1)। प्रभु यीशु मसीह ने पहले से ही अपने शिष्यों को उनके मध्य ऐसे लोगों के आ जाने के विषय सचेत कर दिया था, और उन्हें यह भी बता दिया था कि इन गलत शिक्षा देने और प्रचार करने वाले लोगों को कैसे पहचानें - उनके “फलों” से; अर्थात, उन लोगों के जीवन की गवाही, उनकी शिक्षाओं के प्रभाव (वास्तव में दुष्प्रभाव) से पता चल जाएगा कि कौन सही उपदेशक है और कौन नहीं (मत्ती 7:16-20; लूका 6:43-45)। हम प्रभु के द्वारा नियुक्त शिक्षकों और उपदेशकों की सेवकाई के बारे में अगले लेख में कुछ और बातों को देखेंगे।


यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं, और यदि प्रभु परमेश्वर ने आपको अपनी कलीसिया के लोगों के मध्य वचन की शिक्षा देने ज़िम्मेदारी दी है, तो आपकी उन्नति और आशीष अपने मसीही जीवन तथा प्रभु परमेश्वर द्वारा सौंपी गई ज़िम्मेदारी को भली भांति निभाने और परमेश्वर को प्रसन्न करने वाली सही रीति से उसका निर्वाह करते रहने से ही है। परमेश्वर के वचन के सच्चाइयों को सीखने और सिखाने में समय लगाएं, शैतान द्वारा गलत शिक्षाओं को फैलाने वाले झूठे प्रेरितों और भविष्यद्वक्ताओं की गलत शिक्षाओं को समझने, जाँचने-परखने और उनसे बच कर चलने, तथा औरों को सचेत करने में संलग्न रहें। आप जितना अधिक समय परमेश्वर और उसके वचन के साथ बिताएंगे, उसकी आज्ञाकारिता में चलेंगे, वचन को उतनी गहराई से परमेश्वर पवित्र आत्मा आपको सिखाएगा, और उतना अधिक प्रभावी बनाकर प्रयोग करेगा।


यदि आपने अभी तक प्रभु की शिष्यता को स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी उसके पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। यदि आपने अभी तक नया जन्म, उद्धार नहीं पाया है, प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा नहीं माँगी है, तो अभी आपके पास समय और अवसर है कि यह कर लें। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” परमेश्वर आपके साथ संगति रखने की बहुत लालसा रखता है तथा आपको आशीषित देखना चाहता है, लेकिन इसे सम्भव करना आपका व्यक्तिगत निर्णय है। सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी। क्या आप अभी समय और अवसर होते हुए, इस प्रार्थना को नहीं करेंगे? निर्णय आपका है।  

 

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 The Church, or, Assembly of Christ Jesus - 57

English Translation

Teachers and Preachers


Since the past few articles, we have been seeing from Ephesians 4:11 that for the works and functioning of His Church, the Lord Jesus has set some ministries and appointed some workers for those ministries. In context of the Church and Christian Faith, the words used in the original Greek language that they were written in, for these ministries and workers show that they are related to the ministry of God’s Word in the Churches. Today, from the list of Ephesians 4:11 we will consider the fifth ministry and its worker, the “Teachers.” As we see from 1 Corinthians 12:28-29, there is a difference in preaching from the facts and instructions given in the Bible, and to teach from and about the Bible; these are two different ministries. During the days of the Lord Jesus’s ministry on earth, the religious leaders of the Jews considered Him to be a “teacher” from God (John 3:2), the Rich Young Ruler desirous of eternal life addressed Him as “Good Teacher” (Mark 10:17), and at many places in the Gospels we find the people, especially the Jewish religious leaders addressed Him as “Rabbi”, which means “Teacher.” Their addressing Him in this manner was appropriate and correct since He used to teach the people (Matthew 13:54; Mark 1:21; 2:13), teach them about the Kingdom of God, preach the Gospel to them (Mark 1:15; Luke 4:43; Luke 8:1; Luke 20:1), and also teach as well as prophesy to them about the end of the world (Matthew 24).


We have to keep one more thing in mind about these ministries given in Ephesians 4:11; although they are five different ministries, it is not necessary or required that five different people have to do them. Like the Lord Jesus, the same person, on different occasions, could carry out any of these ministries, as we see from the ministry of the Lord Jesus. Paul wrote that he used to carry out different ministries, “for which I was appointed a preacher and an apostle--I am speaking the truth in Christ and not lying--a teacher of the Gentiles in faith and truth” (1 Timothy 2:7); “to which I was appointed a preacher, an apostle, and a teacher of the Gentiles” (2 Timothy 1:11). James, Peter, John, all the writers of the books of the New Testament, in their writings preached the gospel, taught and gave instructions, prophesied about the end times, and served as elders and caretakers for the Churches. In other words, one person can carry out more than one kind of ministry; therefore, what is important is not the appointment of a worker for a particular ministry, but the carrying out of these five different ministries in every Church and in the lives of Christian Believers, for growth, stability and edification.


It is interesting to note that amongst these five kinds of ministries, today people usually have a desire for ministries through which they can show themselves off as prominent, or important, or special, and use the ministries as titles for themselves e.g., being Apostles, Prophets and prophesying. But among these people who using these ministries as a title place themselves up on a pedestal either by themselves, or through some group, sect, or denomination, and work to gain temporal benefits, name and fame, there is no desire to take the ministries of being an Evangelist or Teacher of God’s Word. You will be hard put to find anyone who likes to be called an Evangelist or Teacher. Quite likely this is because to fulfill these latter ministries worthily and diligently, one has to laboriously sit in the presence of the Lord, learn from Him, and then it requires a lot of patience and hard work to teach others. Yet, after all this effort, the Evangelists and Teachers do not have the honor and exaltation in the society that Apostles and Prophets have. Rather, because of telling the people about their being sinners, and because of exposing the truth of their false notions about their self-righteousness, through God’s Word, the Evangelists and Teachers are hardly ever appreciated. Therefore, their ministries too do not get much status, exaltation, and importance from the people; on the contrary they are often ridiculed, rejected, and opposed. Maybe that is why hardly anyone amongst the present-day Christian Believers has any desire to take up these ministries.


Paul had warned Timothy that in the latter days, people will gather for themselves those who, instead of sound doctrine and proper teachings, will teach things according to the people’s liking. In such an atmosphere those who want to preach the gospel, the correct doctrine, and true teachings of the Bible will have to labor much, as well as suffer for doing so (2 Timothy 4:1-5). Peter, too cautioned his readers that in the Churches and amongst the Christian Believers many false teachers will arise and will secretly spread destructive heresies (2 Peter 2:1). The Lord Jesus had forewarned His disciples that such false teachers will come amongst them; and He had also given the characteristics and criteria by which to recognize them - by their “fruits”; meaning, by the witness of their lives and living, and the effects of their preaching and teachings, it will become evident who is a preacher and Teacher from the Lord, and who is not (Matthew 7:16-20; Luke 6:43-45). We will learn some more about the Lord’s Teachers and Preachers in our next article.


If you are a Christian Believer, and if the Lord has given you the responsibility of teaching His Word amongst His people, then your growth, edification, and blessings are dependent on your worthily and diligently carrying out your God given responsibilities, in the manner that pleases God. Spend your time in learning and understanding the truths of God’s Word, and be steadfastly involved in recognizing and exposing the wrong teachings, preaching, and doctrines of the false apostles and prophets brought in by Satan. The more time you spend with God and His Word, the more obedient you are to Him, the more deeply God the Holy Spirit will teach you His Word, and make you more effective in your ministry for the Lord.


If you have not yet accepted the discipleship of the Lord Jesus, then take a decision in its favor now to secure your eternal life and heavenly blessings. The Lord's security and blessings are present where there is obedience of the Lord, where His Word is honored and followed. If you are still not Born Again, have not obtained salvation, or have not asked the Lord Jesus for forgiveness for your sins, then you have the time and opportunity to do so right now. Ask the Lord Jesus to forgive your sins, and voluntarily and sincerely surrender yourselves into His hands - this is the only way to salvation and heavenly life. All you have to do is say a short prayer, voluntarily and with a sincere heart, with heartfelt repentance for your sins, and a fully submissive attitude. You can do this in this manner, “Lord Jesus, I confess that I have disobeyed You, and have knowingly or unknowingly, in mind, in thought, in attitude, and in deeds, committed sins. I believe that you have fully borne the punishment of my sins by your sacrifice on the cross, and have paid the full price of those sins for all eternity. Please forgive my sins, change my heart and mind towards you, and make me your disciple, take me with you." God longs for your company and wants to see you blessed, but to make this possible, is your personal decision. One prayer said with a sincere and surrendered heart will turn your present and future, your life here on earth and in the next world, forever and make you heavenly and blessed. Will you not say this prayer now, while you have the time and opportunity to do so? The decision is yours.

 

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शुक्रवार, 4 अप्रैल 2025

The Church, or, Assembly of Christ Jesus - 56 - Pastors (2) / मसीह यीशु की कलीसिया या मण्डली – 56 - रखवाले (पास्टर) (2)

 

मसीह यीशु की कलीसिया या मण्डली – 56 

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रखवाले (पास्टर) की भूमिका (2)


पिछले लेख में हमें इफिसियों 4:11 में दी गई चौथी सेवकाई, परमेश्वर के झुण्ड का चरवाहा, या रखवाला अर्थात पास्टर होने के बारे में देखा था। हमने मूल यूनानी भाषा में प्रयोग किए गए शब्द के द्वारा देखा और समझा था कि रखवाले या पास्टर का कार्य भेड़ों की रखवाली और देखभाल करने वाले चरवाहे के समान ही होता है। वचन हमने यह भी सिखाता है कि प्रभु यीशु ही हमारा "प्रधान रखवाला" है, और प्रत्येक रखवाले को प्रभु के समान और उसकी अधीनता में होकर अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह करना है; क्योंकि प्रत्येक चरवाहे को एक न एक दिन अपने कार्य का हिसाब प्रभु को देना होगा। फिर हमने भजन 23 से रखवाले द्वारा सकारात्मक रीति से अपने दायित्व के निर्वाह के बारे में देखा था। आज हम एक बार फिर, पुराने नियम से ही रखवाला होने के दायित्व के नकारात्मक निर्वाह के बारे में देखेंगे।  


कलीसिया के रखवाले के लिए भजन 23 के इस सकारात्मक उदाहरण की तुलना में, यहेजकेल 34 अध्याय में इस्राएल के चरवाहों द्वारा अनेकों प्रकार से परमेश्वर की भेड़ों के प्रति उनकी लापरवाही और परमेश्वर की अनाज्ञाकारिता के नकारात्मक व्यवहार के उदाहरण दिए गए हैं, और उनके इस दुर्व्यवहार के लिए परमेश्वर द्वारा उनकी भर्त्सना करने, और उन्हें दण्ड देने, तथा अपनी भेड़ों को संभालने का वर्णन है। यहेजकेल 34:2-6 में चरवाहों के दुर्व्यवहार को बताया गया है, और शेष अध्याय परमेश्वर द्वारा स्थिति को नियंत्रण में लेने, अपनी भेड़ों को संभालने, एकत्रित करने, उनकी सही देखभाल करने, तथा चरवाहों से हिसाब लेने, उनको उनका दण्ड देने का वर्णन है। 


हम यहेजकेल 34:2-6 में चरवाहों द्वारा दायित्वों को नहीं निभाने के बारे में देखते हैं: 


* पद 2 - वे अपने पेट भरते थे, किन्तु भेड़-बकरियों के पेट भरे होने की चिन्ता नहीं करते थे।


* पद 3 - वे अपने लिए सर्वोत्तम भोजन और कपड़ों का इंतज़ाम रखते थे, किन्तु भेड़-बकरियों को उनके लिए उपयुक्त भोजन के स्थान पर नहीं ले जाते थे।


* पद 4 - वे बीमारों, रोगियों, घायलों की चिन्ता नहीं की, न उनके उपचार के लिए प्रावधान किए। न ही उन चरवाहों ने खोई हुई या निकाली हुई भेड़ों को फिर से झुण्ड में लौटा लाने के लिए कोई प्रयास किया। वरन् वे चरवाहे बल और ज़बरदस्ती से भेड़ों पर अधिकार जताते थे।


* पद 5 - समय और अवसर पर चरवाहों के भेड़ों के साथ उपस्थित न होने के कारण भेड़ें तितर-बितर हो गईं, वन पशुओं का आहार हो गईं। 


* पद 6 - भेड़ों के तितर-बितर हो जाने, इधर-उधर भटकने के बावजूद, चरवाहों ने उनकी सुधि नहीं ली, उन्हें ढूँढ़ने नहीं गए, उन्हें वापस सुरक्षा में लौटा लाने नहीं गए। 


यहेजकेल 34 अध्याय में इस्राएल के उन चरवाहों ने जो कुछ किया, उसके लिए शेष अध्याय परमेश्वर के क्रोध का, उनसे हिसाब लेने का, उन्हें दण्ड देने का, और कैसे परमेश्वर स्वयं अपनी भेड़ों को लौटा कर लाएगा, उनकी देखभाल करेगा, आदि बातों का वर्णन करता है। यदि आज कलीसिया के रखवाले भी वही करेंगे जो इस्राएल के उन चरवाहों ने किया, तो आज के ये पास्टर भी परमेश्वर के उसी क्रोध, न्याय, और दण्ड के भागी होंगे, जैसे वे चरवाहे हुए। वरन् कलीसिया के रखवालों को परमेश्वर के निर्देशों के अनुसार कलीसिया के लोगों की रखवाली करनी है।


यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं, और यदि प्रभु परमेश्वर ने आपको अपनी कलीसिया के लोगों के मध्य कोई ज़िम्मेदारी दी है, तो आपकी उन्नति और आशीष अपने मसीही जीवन तथा प्रभु परमेश्वर द्वारा सौंपी गई ज़िम्मेदारी को भली भांति निभाने और परमेश्वर को प्रसन्न करने वाली सही रीति से उसका निर्वाह करते रहने से ही है। परमेश्वर के वचन के सच्चाइयों को सीखने और सिखाने में समय लगाएं, शैतान द्वारा गलत शिक्षाओं को फैलाने वाले झूठे प्रेरितों और भविष्यद्वक्ताओं (2 कुरिन्थियों 11:13-15) की गलत शिक्षाओं को समझने, जाँचने-परखने और उनसे बच कर चलने, तथा औरों को सचेत करने में संलग्न रहें (यहूदा 1:20-23)।


यदि आपने अभी तक प्रभु की शिष्यता को स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी उसके पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। यदि आपने अभी तक नया जन्म, उद्धार नहीं पाया है, प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा नहीं माँगी है, तो अभी आपके पास समय और अवसर है कि यह कर लें। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” परमेश्वर आपके साथ संगति रखने की बहुत लालसा रखता है तथा आपको आशीषित देखना चाहता है, लेकिन इसे सम्भव करना आपका व्यक्तिगत निर्णय है। सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी। क्या आप अभी समय और अवसर होते हुए, इस प्रार्थना को नहीं करेंगे? निर्णय आपका है।

 

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 The Church, or, Assembly of Christ Jesus - 56

English Translation

Pastors, Their Role & Functions (2)


    In the last article we had begun to consider the fourth ministry given in Ephesians 4:11, that of being a pastor or caretaker, a shepherd of God's flock. We had seen and understood on the basis of the word used here in the original Greek language that the ministry of the Pastor is similar  to that of a shepherd or caretaker of the sheep. The Word also teaches us that the Lord Jesus is the "Chief Shepherd" and all the other Pastors or caretakers have to function like Him and fulfill their responsibilities under Him; since every shepherd will eventually have to give an account to the Lord. Then we had seen from Psalm 23, the ways the shepherds have to fulfill their responsibilities in a positive manner. Today too we will once again see from the Old Testament about the negative attitude and irresponsible behavior of the shepherds.


In contrast to the positive example of a Godly Pastor given in Psalm 23, God in His Word, in Ezekiel 34, has given the negative description of the callous, irresponsible, uncaring shepherds of Israel, who by their disobedience to God, allowed His sheep, the people of Israel to suffer. God severely denounces them and their ways, and tells them of His judgment and punishment for them and how He will gather together and take care of His sheep. In Ezekiel 34:2-6 is given the irresponsible and wrong behavior of the shepherds, and the rest of the chapter tells about God taking hold of the situation, bringing it under control, gathering together and taking proper care of His sheep; of taking an account from the shepherds and dispensing their due punishment upon them.


We see from Ezekiel 34:2-6 the irresponsible and wrong behavior of the shepherds:


* Verse 2 - They would feed themselves, but did not feed their flocks.


* Verse 3 - They made provisions of the best food and clothing for themselves, but made no arrangements of proper food for the flocks.


* Verse 4 - They did not take care or bother about helping the weak, the sick, the wounded in the flock. Nor did those shepherds go seeking after and bring back those who had been driven away or got lost. Rather, they ruled over the flock with force and cruelty.


* Verse 5 - Because at the required time and need, the shepherds were not present with the sheep, the sheep were scattered and became food for the wild beasts.


* Verse 6 - The shepherds never bothered about the sheep, even though they were scattered and wandered here and there; they never went searching for them nor did  they restore them back to security.


What those elders of Israel, those wayward shepherds of Israel did in Ezekiel 34, the rest of chapter 34 details the anger and wrath of God; speaks of how He will take an account and punish them. The chapter also speaks of how God will bring back His sheep and take proper care of them. If today, the Pastor, i.e., the shepherd of God’s flock will do what those shepherds of Israel did, then they too will be similarly called to account and suffer the anger, wrath, and punishment from God, as those shepherds did at that time. Therefore, the present-day Pastors are not to do any of that, but take care of the flock, the Church entrusted to him, just as God instructs him to do.


If you are a Christian Believer, and if God has given you a responsibility amongst His people, then your edification, growth, and blessings are in diligently fulfilling the responsibility in the manner that pleases God. Utilize your time in learning and teaching the truths of God’s Word; and be careful to learn about, identify, stay safe and warn others about the false apostles and prophets, and their wrong teachings (2 Corinthians 11:13-15), infiltrated amongst God’s people by Satan; save others from falling prey to Satan’s devices (Jude 1:20-23).


If you have not yet accepted the discipleship of the Lord Jesus, then take a decision in its favor now to secure your eternal life and heavenly blessings. The Lord's security and blessings are present where there is obedience of the Lord, where His Word is honored and followed. If you are still not Born Again, have not obtained salvation, or have not asked the Lord Jesus for forgiveness for your sins, then you have the time and opportunity to do so right now. Ask the Lord Jesus to forgive your sins, and voluntarily and sincerely surrender yourselves into His hands - this is the only way to salvation and heavenly life. All you have to do is say a short prayer, voluntarily and with a sincere heart, with heartfelt repentance for your sins, and a fully submissive attitude. You can do this in this manner, “Lord Jesus, I confess that I have disobeyed You, and have knowingly or unknowingly, in mind, in thought, in attitude, and in deeds, committed sins. I believe that you have fully borne the punishment of my sins by your sacrifice on the cross, and have paid the full price of those sins for all eternity. Please forgive my sins, change my heart and mind towards you, and make me your disciple, take me with you." God longs for your company and wants to see you blessed, but to make this possible, is your personal decision. One prayer said with a sincere and surrendered heart will turn your present and future, your life here on earth and in the next world, forever and make you heavenly and blessed. Will you not say this prayer now, while you have the time and opportunity to do so? The decision is yours.

 

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गुरुवार, 3 अप्रैल 2025

The Church, or, Assembly of Christ Jesus - 55 - Pastors (1) / मसीह यीशु की कलीसिया या मण्डली – 55 - रखवाले (पास्टर) (1)

 

मसीह यीशु की कलीसिया या मण्डली – 55 

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रखवाले (पास्टर) की भूमिका (1)


पिछले कुछ लेखों में हम इफिसियों 4:11 से देखते आ रहे हैं कि प्रभु ने अपनी कलीसिया के कार्यों के लिए, कलीसिया में कुछ कार्यकर्ताओं, कुछ सेवकों को नियुक्त किया है। मूल यूनानी भाषा में इन सेवकों और उनकी सेवकाई के संबंध में प्रयोग किए गए शब्द दिखाते हैं कि ये सेवकाइयां कलीसिया में परमेश्वर के वचन की सेवकाई से संबंधित हैं। इन सेवकों और उनकी सेवकाइयों के संबंध में हम यह भी देख चुके हैं कि वर्तमान में इन दायित्वों और सेवकाइयों को अपने नाम के साथ जोड़ कर एक उपाधि के समान प्रयोग करने की सामान्यतः देखी जाने वाली प्रवृत्ति का बाइबल में कोई समर्थन नहीं है। इन सभी दायित्वों और सेवकाइयों के लिए प्रभु ने ही नियुक्ति की है, किसी मनुष्य अथवा संस्था या डिनॉमिनेशन ने नहीं। यह तथ्य इन्हें सेवकाइयों के स्थान पर, “उपाधियों” के समान उपयोग करने, मानो किसी तथा-कथित ईश्वरीय अधिकार के अन्तर्गत, स्वयं ही या फिर किसी संस्था अथवा डिनॉमिनेशन के मनुष्यों के द्वारा इन उपाधियों को देने की वर्तमान परंपरा का भी समर्थन नहीं करता है। साथ ही वर्तमान में एक और बहुत गलत प्रवृत्ति भी देखी जाती है कि लोग इन सेवकाइयों का प्रयोग परमेश्वर के वचन का पालन करना सीखने और सिखाने के स्थान पर, अपनी ही बातों और शिक्षाओं को सिखाने और पालन करवाने के लिए प्रयोग करते हैं, चाहे उनकी वे बातें और शिक्षाएं बाइबल से मेल न भी खाती हों, बाइबल की शिक्षाओं के अतिरिक्त हों। ऐसा करके ये लोग परमेश्वर के वचन में जोड़ने या घटाने, उसे अपनी इच्छा और सुविधा के अनुसार बदलने का अस्वीकार्य और दण्डनीय कार्य करते हैं (प्रकाशितवाक्य 22:18-19)। यह वही पाप है जो प्रभु यीशु की पृथ्वी की सेवकाई के समय फरीसियों, सदूकियों, और शास्त्रियों ने किया, और जिसके लिए प्रभु ने उनकी तीव्र भर्त्सना की, उन्हें दण्डनीय ठहराया (मत्ती 15:3-9, 12-14)।


आज हम इफिसियों 4:11 में दी गई सूची में प्रभु यीशु द्वारा नियुक्त किए जाने वाले प्रभु यीशु की कलीसिया के चौथे कार्यकर्ता, रखवाले, के बारे में देखेंगे। मूल यूनानी भाषा के जिस शब्द का अनुवाद “रखवाले” किया गया है, उसका शब्दार्थ है “चरवाहे” या “भेड़ों की रखवाली और चरवाही करने वाले”। प्रभु यीशु मसीह के जन्म के समय, लूका 2:8 में जहाँ स्वर्गदूतों ने मैदान में अपने झुण्ड की पहरेदारी और देखभाल करने वाले लोगों को प्रभु के जन्म का समाचार सुनाया, उन गड़रियों के लिए भी मूल यूनानी भाषा में यही शब्द प्रयोग किया गया है, जिसका अनुवाद यहाँ “रखवाले” किया गया है। तात्पर्य यह कि कलीसिया के रखवाले वे हैं जो एक गड़रिये या चरवाहे के समान अपने “झुण्ड” या उसे सौंपे गए लोगों की देखभाल और सुरक्षा प्रदान करते हैं। बाइबल में प्रभु यीशु मसीह को “प्रधान रखवाला” भी कहा गया है (इब्रानियों 13:20; 1 पतरस 5:4); अर्थात वही अपनी विश्व-व्यापी कलीसिया का मुख्य देखभाल और सुरक्षा करने वाला है, शेष सभी उसी की अधीनता और उसके निर्देशों के अनुसार कार्य करते हैं। साथ ही बाइबल यह भी स्पष्ट बताती है कि प्रभु ने जिन्हें अपनी कलीसिया की देखभाल की ज़िम्मेदारी सौंपी है, जिन्हें अपने “झुण्ड” के अगुवे बनाया है, उन्हें अन्ततः प्रभु को इस ज़िम्मेदारी का हिसाब भी देना होगा, और उनके कार्य के अनुसार उन्हें प्रतिफल मिलेगा (इब्रानियों 13:17; 1 पतरस 5:1-4)। अर्थात, कलीसिया में “रखवाला” या चरवाहा होना बहुत ज़िम्मेदारी का कार्य है, यह लोगों पर अधिकार रखने के लिए नहीं (1 पतरस 5:3), वरन विनम्रता तथा सहनशीलता के साथ प्रभु के लिए उसके लोगों की देखभाल के लिए है (1 पतरस 5:2)। यह सेवकाई केवल नए नियम में ही दी जाने वाली सेवकाई नहीं है, वरन, जैसा हम अभी देखेंगे, पुराने नियम में भी इस्राएल के अगुवों को यही ज़िम्मेदारी, यही सेवकाई सौंपी गई थी।


प्रभु के लोगों में, एक रखवाले या चरवाहे के क्या कार्य होते हैं, उसे प्रभु के “झुण्ड” की चरवाही करने की इस ज़िम्मेदारी को कैसे निभाना है? परमेश्वर के वचन बाइबल में इसे सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ही प्रकार से, पुराने नियम में ही बता दिया गया था। जैसा हमने ऊपर देखा है, प्रभु यीशु को ही कलीसिया का प्रधान रखवाला बताया गया है। इसलिए स्वाभाविक है कि प्रभु परमेश्वर के जीवन और उदाहरण से ही हम इस ज़िम्मेदारी के सर्वश्रेष्ठ निर्वाह के बारे में सीख सकते हैं। इसका सकारात्मक और सर्वोत्तम उदाहरण दाऊद द्वारा लिखित भजन 23 है, जो संक्षेप में किन्तु प्रत्येक बिन्दु का ध्यान करते हुए चरवाहे के कार्य को बता देता है। भजन 23 का आरंभ यहोवा परमेश्वर को चरवाहा बताने के साथ होता है; फिर इससे आगे परमेश्वर द्वारा चरवाहे के रूप में किए गए कार्यों का उल्लेख है:


* पद 1 - वह अपनी भेड़ों को कुछ घटी नहीं होने देता है। पौलुस ने परमेश्वर पवित्र आत्मा की अगुवाई में अपने जीवन के उदाहरण से सीखने को बताते हुए लिखा कि जैसे हर दशा में प्रभु उसकी देखभाल करता है, उसे सब कुछ बहुतायत से उपलब्ध है और परमेश्वर उसकी हर आवश्यकता को पूरा करता है - फिलिप्पियों 4 अध्याय पढ़िए, और विशेषकर पद 13, 18, और 19 पर ध्यान कीजिए, वैसे ही प्रभु पौलुस के पाठकों के लिए भी करेगा। कलीसिया के रखवाले को भी उसके झुण्ड के लोगों की आवश्यकताओं का ध्यान रखते हुए, उन को उनकी आवश्यकता के अनुसार उपयुक्त सहायता और प्रावधान उपलब्ध करवाते रहना है जिससे उन्हें कुछ घटी न हो। 


* पद 2 - वह अपनी भेड़ों को उत्तम भोजन और जल उपलब्ध करवाता है - प्रभु यीशु स्वयं हमारे लिए “जीवन की रोटी” और “जीवन का जल” है (यूहन्ना 4:10, 14; 6:33, 35)। कलीसिया के रखवाले को प्रभु यीशु के वचन और शिक्षाओं के उत्तम आत्मिक भोजन को लोगों तक पहुँचाते रहना है जिससे उनका आत्मिक स्वास्थ्य अच्छा रहे, वे किसी गलत शिक्षा या सांसारिक बातों में भटक कर प्रभु से दूर न चले जाएं। 


* पद 3 - वह अशान्ति के समय में अपनी भेड़ों को शांति प्रदान करता है, और परमेश्वर के मार्गों में चलने की अगुवाई प्रदान करता है। कलीसिया के रखवाले को भी उसकी कलीसिया के लोगों को शांति, ढाढ़स, सांत्वना, दुख के समय में सहारा और निराशाओं में प्रोत्साहन देने वाला, और संसार की बातों की मिलावट से बचाकर परमेश्वर के खरे मार्गों में अपने झुण्ड को लिए चलने वाला होना चाहिए। 


* पद 4 - परमेश्वर के लोग उसकी उनके साथ निरंतर बनी उपस्थिति से आश्वस्त और सुरक्षित रहते हैं। अपने सोंटे और लाठी के द्वारा परमेश्वर अपनी भेड़ों को हाँकता भी है, जो इधर-उधर होने लगती हैं, उन्हें हांक कर वापस सही मार्ग में ले आता है; और भक्षक पशुओं से उनकी रक्षा करता है। कलीसिया के रखवाले को वचन रूपी लाठी और सोंटे से अपनी कलीसिया के लोगों को समझाना, सुधारना, सिखाना है, और जहाँ आवश्यक हो उलाहना देना और डांटना भी है (2 तीमुथियुस 3:16; 4:2-4)। 


* पद 5 - परमेश्वर अपने लोगों की कठिनाइयों में उनकी रक्षा और सहायता करता है; उनके लिए आवश्यक भली वस्तुएं उन्हें उपलब्ध करवाता है। कलीसिया के रखवाले को भी अपने लोगों के साथ हर परिस्थिति में खड़े रहकर उनकी सहायता करते रहना है, उन्हें सुरक्षा प्रदान करनी है, इधर-उधर भटकने और लज्जित होने से रोक कर रखना है, बचाना है। 


* पद 6 - परमेश्वर अपने साथ रहने और उस पर भरोसा रखने वाले लोगों को न केवल इस जीवन में उनकी भलाई के लिए आश्वस्त रखता है वरन साथ ही उनके परलोक के अनन्त जीवन के विषय भी आश्वस्त रखता है। कलीसिया के रखवाले को भी अपने लोगों को इस लोक और परलोक के विषय बताना और सिखाना है, तथा उन्हें इस जीवन में तथा परलोक के अनन्त जीवन में सही स्थान पर और सुरक्षित रहना सिखाना है।


अगले लेख में हम रखवालों या चरवाहों के द्वारा नकारात्मक रवैया रखने और अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाह नहीं करने के बारे में देखेंगे। 

 

यदि आपने अभी तक प्रभु की शिष्यता को स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी उसके पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। यदि आपने अभी तक नया जन्म, उद्धार नहीं पाया है, प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा नहीं माँगी है, तो अभी आपके पास समय और अवसर है कि यह कर लें। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” परमेश्वर आपके साथ संगति रखने की बहुत लालसा रखता है तथा आपको आशीषित देखना चाहता है, लेकिन इसे सम्भव करना आपका व्यक्तिगत निर्णय है। सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी। क्या आप अभी समय और अवसर होते हुए, इस प्रार्थना को नहीं करेंगे? निर्णय आपका है।


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 The Church, or, Assembly of Christ Jesus - 55

English Translation

Pastors, Their Role & Functions (1)


Since the past few articles, we have been seeing from Ephesians 4:11 that for the works and functioning of His Church, the Lord Jesus has set some ministries and appointed some workers for those ministries. In context of the Church and Christian Faith, the words used in the original Greek language that they were written in, for these ministries and workers show that they are related to the ministry of God’s Word in the Churches. We have also seen that today there is an unBiblical tendency to use these ministries and responsibilities as titles for conveying superiority over others; something for which there is neither any example nor support from God’s Word. All of these ministries and responsibilities have been given by Lord, and He alone appointed the persons to carry them out. This fact nullifies the present-day practice of people taking these as ‘titles’ upon themselves, or some group, sect, or denomination appointing some persons to them; as if by divine authority. Another very wrong thing seen these days, related to these ministries, is that people use them not to preach and teach the Word of God in truth and with sincerity, but their own contrived doctrines and ideas, whether or not what they preach and teach is according to the Bible. By doing this, these people become guilty of the sin of adding to, or taking away from, God’s Word according to their convenience, and will have to suffer the severe consequences (Revelation 22:18-19). This is the same sin that the Pharisees, Sadducees, and the Scribes committed at the time the Lord was on earth, and were severely castigated for it by the Lord (Matthew 15:3-9, 12-14).


Today we will see about the workers appointed by the Lord for the fourth ministry given in Ephesians 4:11, the Pastors. The word used in the original Greek language, and translated as ‘Pastor’, literally means a shepherd or one who looks after the sheep, and some English translations use the word “Shepherd” instead of “Pastors” here in this verse. In Luke 2:8, where at the time of the birth of the Lord Jesus, the angels announced the birth to the shepherds tending their flocks, this same word is used in Greek for those shepherds, as has been used in Ephesians 4:11 and translated as “Pastors.” In other words, the “Pastors” in a Church, amongst the Christian Believers, have the same role and function as a shepherd has for his flock of sheep. A Pastor has to look-after and keep the “flock” entrusted to him safe and secure, in the same manner as a shepherd does for his flock. In the Bible, the Lord Jesus has also been called “The Chief Shepherd” (Hebrews 13:20; 1 Peter 5:4); i.e., He is the one who is in-charge of taking care of His world-wide Church and flock of Believers, all the rest of the ‘shepherds’ have to function under Him and for Him, as He instructs and guides them in their roles and responsibilities. The Bible also makes it very clear that those to whom the Lord has entrusted this responsibility of being the “Pastors” or care-takers of His flock, they will eventually have to give an account to Him and receive their rewards for their performance (Hebrews 13:17; 1 Peter 5:1-4). Therefore, to be a Pastor or care-taker of a Church is a work of great responsibility, it is not for exercising authority over people (1 Peter 5:3), but to very humbly and with a lot of forbearance take care of the Church and people of the Lord (1 Peter 5:2). This responsibility was not given just in the New Testament, but as we will see just now, the same responsibility was given to the elders of Israel to take care of the Israelites as well.


Amongst the people of the Lord, what are the works and functions of a Shepherd or Pastor? How should he be fulfilling the responsibilities entrusted to him? In God’s Word, in the Old Testament itself, this has been clearly told by God, in its positive as well as negative aspects. As we have seen above, the Lord Jesus is the Chief Shepherd of His Church. Therefore, it is only natural that we can best learn from the life and example of the Lord Jesus, about how best to fulfill this responsibility. The best positive example of this is Psalm 23 written by David, which in brief tells about a shepherd’s responsibilities, in every verse. This Psalm starts with naming God as the Shepherd, and then from there goes on to tell how God carries out His role as the Shepherd:


* Verse 1 - He does not let His sheep face any lack. Paul, under the guidance of the Holy Spirit, using his own life and ministry as an example wrote, just as God takes care of him in all situations and provides for him in all circumstances, and he has everything to meet his needs - read Philippians chapter 4, and particularly pay attention to verses 13, 18, and 19, similarly God will also provide for and meet the needs of Paul’s audience as well. The shepherd of the church should also remain aware of the needs of his flock, and provide the required help and provisions to them, so that they lack nothing.


* Verse 2 - He arranges for good food and water for His sheep - the Lord Jesus is the “Bread of life” and the “Water of life” (John 4:10, 14; 6:33, 35). The caretakers of the Church should see that the flock receives good, nutritious spiritual food and water from God’s Word, so that their spiritual health does not suffer, but improves continually. He should ensure that they do not fall into any wrong teachings and worldliness, and get carried away from the Lord.


* Verse 3 - He provides comfort and peace to the sheep when they are restless and discomfited, and provides leadership for them to walk in the ways of the Lord God. A Pastor, the caretaker of the flock, should provide rest, comfort, peace, assurance and support in trying times, encouragement and guidance in discouragements and defeats; and he should ensure that they remain away from compromising with God’s Word, from the corruption of the world, and walk in the correct ways of the Lord.


* Verse 4 - God’s people feel comforted, assured, and secure because of His continual presence with them. He helps and guides them with His staff and His rod; the sheep that start wandering away from the right way, He prods back onto the right way, and keeps them safe from predators. The Pastor of the Church has to use the ‘rod and staff’ - the Word of God to teach, correct, instruct in righteousness, convince and teach with longsuffering, and wherever necessary, rebuke and exhort as well (2 Timothy 3:16; 4:2-4).


* Verse 5 - God keeps His people safe and secure in their difficult times, helps them, and provides the appropriate things for them according to their circumstances. The Pastor, the shepherd of the flock too, needs to stand with his people in all their situations and circumstances; keep them safe, prevent them from wandering away into wrongs, and safeguard them from being brought to shame.


* Verse 6 - God not only assures and provides good things in this life to His people, His Believers, but also assures them of eternal life and eternal rewards. The Pastor of the church too needs to teach his flock about the things of this world and of the next, and has to show them how to be safe and secure for this life as well as the next.


In the next article, we will see about the shepherds and caretakers having a negative attitude and not fulfilling their responsibilities,


If you have not yet accepted the discipleship of the Lord Jesus, then take a decision in its favor now to secure your eternal life and heavenly blessings. The Lord's security and blessings are present where there is obedience of the Lord, where His Word is honored and followed. If you are still not Born Again, have not obtained salvation, or have not asked the Lord Jesus for forgiveness for your sins, then you have the time and opportunity to do so right now. Ask the Lord Jesus to forgive your sins, and voluntarily and sincerely surrender yourselves into His hands - this is the only way to salvation and heavenly life. All you have to do is say a short prayer, voluntarily and with a sincere heart, with heartfelt repentance for your sins, and a fully submissive attitude. You can do this in this manner, “Lord Jesus, I confess that I have disobeyed You, and have knowingly or unknowingly, in mind, in thought, in attitude, and in deeds, committed sins. I believe that you have fully borne the punishment of my sins by your sacrifice on the cross, and have paid the full price of those sins for all eternity. Please forgive my sins, change my heart and mind towards you, and make me your disciple, take me with you." God longs for your company and wants to see you blessed, but to make this possible, is your personal decision. One prayer said with a sincere and surrendered heart will turn your present and future, your life here on earth and in the next world, forever and make you heavenly and blessed. Will you not say this prayer now, while you have the time and opportunity to do so? The decision is yours. 

 

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