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गुरुवार, 3 अप्रैल 2025

The Church, or, Assembly of Christ Jesus - 55 - Pastors (1) / मसीह यीशु की कलीसिया या मण्डली – 55 - रखवाले (पास्टर) (1)

 

मसीह यीशु की कलीसिया या मण्डली – 55 

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रखवाले (पास्टर) की भूमिका (1)


पिछले कुछ लेखों में हम इफिसियों 4:11 से देखते आ रहे हैं कि प्रभु ने अपनी कलीसिया के कार्यों के लिए, कलीसिया में कुछ कार्यकर्ताओं, कुछ सेवकों को नियुक्त किया है। मूल यूनानी भाषा में इन सेवकों और उनकी सेवकाई के संबंध में प्रयोग किए गए शब्द दिखाते हैं कि ये सेवकाइयां कलीसिया में परमेश्वर के वचन की सेवकाई से संबंधित हैं। इन सेवकों और उनकी सेवकाइयों के संबंध में हम यह भी देख चुके हैं कि वर्तमान में इन दायित्वों और सेवकाइयों को अपने नाम के साथ जोड़ कर एक उपाधि के समान प्रयोग करने की सामान्यतः देखी जाने वाली प्रवृत्ति का बाइबल में कोई समर्थन नहीं है। इन सभी दायित्वों और सेवकाइयों के लिए प्रभु ने ही नियुक्ति की है, किसी मनुष्य अथवा संस्था या डिनॉमिनेशन ने नहीं। यह तथ्य इन्हें सेवकाइयों के स्थान पर, “उपाधियों” के समान उपयोग करने, मानो किसी तथा-कथित ईश्वरीय अधिकार के अन्तर्गत, स्वयं ही या फिर किसी संस्था अथवा डिनॉमिनेशन के मनुष्यों के द्वारा इन उपाधियों को देने की वर्तमान परंपरा का भी समर्थन नहीं करता है। साथ ही वर्तमान में एक और बहुत गलत प्रवृत्ति भी देखी जाती है कि लोग इन सेवकाइयों का प्रयोग परमेश्वर के वचन का पालन करना सीखने और सिखाने के स्थान पर, अपनी ही बातों और शिक्षाओं को सिखाने और पालन करवाने के लिए प्रयोग करते हैं, चाहे उनकी वे बातें और शिक्षाएं बाइबल से मेल न भी खाती हों, बाइबल की शिक्षाओं के अतिरिक्त हों। ऐसा करके ये लोग परमेश्वर के वचन में जोड़ने या घटाने, उसे अपनी इच्छा और सुविधा के अनुसार बदलने का अस्वीकार्य और दण्डनीय कार्य करते हैं (प्रकाशितवाक्य 22:18-19)। यह वही पाप है जो प्रभु यीशु की पृथ्वी की सेवकाई के समय फरीसियों, सदूकियों, और शास्त्रियों ने किया, और जिसके लिए प्रभु ने उनकी तीव्र भर्त्सना की, उन्हें दण्डनीय ठहराया (मत्ती 15:3-9, 12-14)।


आज हम इफिसियों 4:11 में दी गई सूची में प्रभु यीशु द्वारा नियुक्त किए जाने वाले प्रभु यीशु की कलीसिया के चौथे कार्यकर्ता, रखवाले, के बारे में देखेंगे। मूल यूनानी भाषा के जिस शब्द का अनुवाद “रखवाले” किया गया है, उसका शब्दार्थ है “चरवाहे” या “भेड़ों की रखवाली और चरवाही करने वाले”। प्रभु यीशु मसीह के जन्म के समय, लूका 2:8 में जहाँ स्वर्गदूतों ने मैदान में अपने झुण्ड की पहरेदारी और देखभाल करने वाले लोगों को प्रभु के जन्म का समाचार सुनाया, उन गड़रियों के लिए भी मूल यूनानी भाषा में यही शब्द प्रयोग किया गया है, जिसका अनुवाद यहाँ “रखवाले” किया गया है। तात्पर्य यह कि कलीसिया के रखवाले वे हैं जो एक गड़रिये या चरवाहे के समान अपने “झुण्ड” या उसे सौंपे गए लोगों की देखभाल और सुरक्षा प्रदान करते हैं। बाइबल में प्रभु यीशु मसीह को “प्रधान रखवाला” भी कहा गया है (इब्रानियों 13:20; 1 पतरस 5:4); अर्थात वही अपनी विश्व-व्यापी कलीसिया का मुख्य देखभाल और सुरक्षा करने वाला है, शेष सभी उसी की अधीनता और उसके निर्देशों के अनुसार कार्य करते हैं। साथ ही बाइबल यह भी स्पष्ट बताती है कि प्रभु ने जिन्हें अपनी कलीसिया की देखभाल की ज़िम्मेदारी सौंपी है, जिन्हें अपने “झुण्ड” के अगुवे बनाया है, उन्हें अन्ततः प्रभु को इस ज़िम्मेदारी का हिसाब भी देना होगा, और उनके कार्य के अनुसार उन्हें प्रतिफल मिलेगा (इब्रानियों 13:17; 1 पतरस 5:1-4)। अर्थात, कलीसिया में “रखवाला” या चरवाहा होना बहुत ज़िम्मेदारी का कार्य है, यह लोगों पर अधिकार रखने के लिए नहीं (1 पतरस 5:3), वरन विनम्रता तथा सहनशीलता के साथ प्रभु के लिए उसके लोगों की देखभाल के लिए है (1 पतरस 5:2)। यह सेवकाई केवल नए नियम में ही दी जाने वाली सेवकाई नहीं है, वरन, जैसा हम अभी देखेंगे, पुराने नियम में भी इस्राएल के अगुवों को यही ज़िम्मेदारी, यही सेवकाई सौंपी गई थी।


प्रभु के लोगों में, एक रखवाले या चरवाहे के क्या कार्य होते हैं, उसे प्रभु के “झुण्ड” की चरवाही करने की इस ज़िम्मेदारी को कैसे निभाना है? परमेश्वर के वचन बाइबल में इसे सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ही प्रकार से, पुराने नियम में ही बता दिया गया था। जैसा हमने ऊपर देखा है, प्रभु यीशु को ही कलीसिया का प्रधान रखवाला बताया गया है। इसलिए स्वाभाविक है कि प्रभु परमेश्वर के जीवन और उदाहरण से ही हम इस ज़िम्मेदारी के सर्वश्रेष्ठ निर्वाह के बारे में सीख सकते हैं। इसका सकारात्मक और सर्वोत्तम उदाहरण दाऊद द्वारा लिखित भजन 23 है, जो संक्षेप में किन्तु प्रत्येक बिन्दु का ध्यान करते हुए चरवाहे के कार्य को बता देता है। भजन 23 का आरंभ यहोवा परमेश्वर को चरवाहा बताने के साथ होता है; फिर इससे आगे परमेश्वर द्वारा चरवाहे के रूप में किए गए कार्यों का उल्लेख है:


* पद 1 - वह अपनी भेड़ों को कुछ घटी नहीं होने देता है। पौलुस ने परमेश्वर पवित्र आत्मा की अगुवाई में अपने जीवन के उदाहरण से सीखने को बताते हुए लिखा कि जैसे हर दशा में प्रभु उसकी देखभाल करता है, उसे सब कुछ बहुतायत से उपलब्ध है और परमेश्वर उसकी हर आवश्यकता को पूरा करता है - फिलिप्पियों 4 अध्याय पढ़िए, और विशेषकर पद 13, 18, और 19 पर ध्यान कीजिए, वैसे ही प्रभु पौलुस के पाठकों के लिए भी करेगा। कलीसिया के रखवाले को भी उसके झुण्ड के लोगों की आवश्यकताओं का ध्यान रखते हुए, उन को उनकी आवश्यकता के अनुसार उपयुक्त सहायता और प्रावधान उपलब्ध करवाते रहना है जिससे उन्हें कुछ घटी न हो। 


* पद 2 - वह अपनी भेड़ों को उत्तम भोजन और जल उपलब्ध करवाता है - प्रभु यीशु स्वयं हमारे लिए “जीवन की रोटी” और “जीवन का जल” है (यूहन्ना 4:10, 14; 6:33, 35)। कलीसिया के रखवाले को प्रभु यीशु के वचन और शिक्षाओं के उत्तम आत्मिक भोजन को लोगों तक पहुँचाते रहना है जिससे उनका आत्मिक स्वास्थ्य अच्छा रहे, वे किसी गलत शिक्षा या सांसारिक बातों में भटक कर प्रभु से दूर न चले जाएं। 


* पद 3 - वह अशान्ति के समय में अपनी भेड़ों को शांति प्रदान करता है, और परमेश्वर के मार्गों में चलने की अगुवाई प्रदान करता है। कलीसिया के रखवाले को भी उसकी कलीसिया के लोगों को शांति, ढाढ़स, सांत्वना, दुख के समय में सहारा और निराशाओं में प्रोत्साहन देने वाला, और संसार की बातों की मिलावट से बचाकर परमेश्वर के खरे मार्गों में अपने झुण्ड को लिए चलने वाला होना चाहिए। 


* पद 4 - परमेश्वर के लोग उसकी उनके साथ निरंतर बनी उपस्थिति से आश्वस्त और सुरक्षित रहते हैं। अपने सोंटे और लाठी के द्वारा परमेश्वर अपनी भेड़ों को हाँकता भी है, जो इधर-उधर होने लगती हैं, उन्हें हांक कर वापस सही मार्ग में ले आता है; और भक्षक पशुओं से उनकी रक्षा करता है। कलीसिया के रखवाले को वचन रूपी लाठी और सोंटे से अपनी कलीसिया के लोगों को समझाना, सुधारना, सिखाना है, और जहाँ आवश्यक हो उलाहना देना और डांटना भी है (2 तीमुथियुस 3:16; 4:2-4)। 


* पद 5 - परमेश्वर अपने लोगों की कठिनाइयों में उनकी रक्षा और सहायता करता है; उनके लिए आवश्यक भली वस्तुएं उन्हें उपलब्ध करवाता है। कलीसिया के रखवाले को भी अपने लोगों के साथ हर परिस्थिति में खड़े रहकर उनकी सहायता करते रहना है, उन्हें सुरक्षा प्रदान करनी है, इधर-उधर भटकने और लज्जित होने से रोक कर रखना है, बचाना है। 


* पद 6 - परमेश्वर अपने साथ रहने और उस पर भरोसा रखने वाले लोगों को न केवल इस जीवन में उनकी भलाई के लिए आश्वस्त रखता है वरन साथ ही उनके परलोक के अनन्त जीवन के विषय भी आश्वस्त रखता है। कलीसिया के रखवाले को भी अपने लोगों को इस लोक और परलोक के विषय बताना और सिखाना है, तथा उन्हें इस जीवन में तथा परलोक के अनन्त जीवन में सही स्थान पर और सुरक्षित रहना सिखाना है।


अगले लेख में हम रखवालों या चरवाहों के द्वारा नकारात्मक रवैया रखने और अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाह नहीं करने के बारे में देखेंगे। 

 

यदि आपने अभी तक प्रभु की शिष्यता को स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी उसके पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। यदि आपने अभी तक नया जन्म, उद्धार नहीं पाया है, प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा नहीं माँगी है, तो अभी आपके पास समय और अवसर है कि यह कर लें। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” परमेश्वर आपके साथ संगति रखने की बहुत लालसा रखता है तथा आपको आशीषित देखना चाहता है, लेकिन इसे सम्भव करना आपका व्यक्तिगत निर्णय है। सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी। क्या आप अभी समय और अवसर होते हुए, इस प्रार्थना को नहीं करेंगे? निर्णय आपका है।


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 The Church, or, Assembly of Christ Jesus - 55

English Translation

Pastors, Their Role & Functions (1)


Since the past few articles, we have been seeing from Ephesians 4:11 that for the works and functioning of His Church, the Lord Jesus has set some ministries and appointed some workers for those ministries. In context of the Church and Christian Faith, the words used in the original Greek language that they were written in, for these ministries and workers show that they are related to the ministry of God’s Word in the Churches. We have also seen that today there is an unBiblical tendency to use these ministries and responsibilities as titles for conveying superiority over others; something for which there is neither any example nor support from God’s Word. All of these ministries and responsibilities have been given by Lord, and He alone appointed the persons to carry them out. This fact nullifies the present-day practice of people taking these as ‘titles’ upon themselves, or some group, sect, or denomination appointing some persons to them; as if by divine authority. Another very wrong thing seen these days, related to these ministries, is that people use them not to preach and teach the Word of God in truth and with sincerity, but their own contrived doctrines and ideas, whether or not what they preach and teach is according to the Bible. By doing this, these people become guilty of the sin of adding to, or taking away from, God’s Word according to their convenience, and will have to suffer the severe consequences (Revelation 22:18-19). This is the same sin that the Pharisees, Sadducees, and the Scribes committed at the time the Lord was on earth, and were severely castigated for it by the Lord (Matthew 15:3-9, 12-14).


Today we will see about the workers appointed by the Lord for the fourth ministry given in Ephesians 4:11, the Pastors. The word used in the original Greek language, and translated as ‘Pastor’, literally means a shepherd or one who looks after the sheep, and some English translations use the word “Shepherd” instead of “Pastors” here in this verse. In Luke 2:8, where at the time of the birth of the Lord Jesus, the angels announced the birth to the shepherds tending their flocks, this same word is used in Greek for those shepherds, as has been used in Ephesians 4:11 and translated as “Pastors.” In other words, the “Pastors” in a Church, amongst the Christian Believers, have the same role and function as a shepherd has for his flock of sheep. A Pastor has to look-after and keep the “flock” entrusted to him safe and secure, in the same manner as a shepherd does for his flock. In the Bible, the Lord Jesus has also been called “The Chief Shepherd” (Hebrews 13:20; 1 Peter 5:4); i.e., He is the one who is in-charge of taking care of His world-wide Church and flock of Believers, all the rest of the ‘shepherds’ have to function under Him and for Him, as He instructs and guides them in their roles and responsibilities. The Bible also makes it very clear that those to whom the Lord has entrusted this responsibility of being the “Pastors” or care-takers of His flock, they will eventually have to give an account to Him and receive their rewards for their performance (Hebrews 13:17; 1 Peter 5:1-4). Therefore, to be a Pastor or care-taker of a Church is a work of great responsibility, it is not for exercising authority over people (1 Peter 5:3), but to very humbly and with a lot of forbearance take care of the Church and people of the Lord (1 Peter 5:2). This responsibility was not given just in the New Testament, but as we will see just now, the same responsibility was given to the elders of Israel to take care of the Israelites as well.


Amongst the people of the Lord, what are the works and functions of a Shepherd or Pastor? How should he be fulfilling the responsibilities entrusted to him? In God’s Word, in the Old Testament itself, this has been clearly told by God, in its positive as well as negative aspects. As we have seen above, the Lord Jesus is the Chief Shepherd of His Church. Therefore, it is only natural that we can best learn from the life and example of the Lord Jesus, about how best to fulfill this responsibility. The best positive example of this is Psalm 23 written by David, which in brief tells about a shepherd’s responsibilities, in every verse. This Psalm starts with naming God as the Shepherd, and then from there goes on to tell how God carries out His role as the Shepherd:


* Verse 1 - He does not let His sheep face any lack. Paul, under the guidance of the Holy Spirit, using his own life and ministry as an example wrote, just as God takes care of him in all situations and provides for him in all circumstances, and he has everything to meet his needs - read Philippians chapter 4, and particularly pay attention to verses 13, 18, and 19, similarly God will also provide for and meet the needs of Paul’s audience as well. The shepherd of the church should also remain aware of the needs of his flock, and provide the required help and provisions to them, so that they lack nothing.


* Verse 2 - He arranges for good food and water for His sheep - the Lord Jesus is the “Bread of life” and the “Water of life” (John 4:10, 14; 6:33, 35). The caretakers of the Church should see that the flock receives good, nutritious spiritual food and water from God’s Word, so that their spiritual health does not suffer, but improves continually. He should ensure that they do not fall into any wrong teachings and worldliness, and get carried away from the Lord.


* Verse 3 - He provides comfort and peace to the sheep when they are restless and discomfited, and provides leadership for them to walk in the ways of the Lord God. A Pastor, the caretaker of the flock, should provide rest, comfort, peace, assurance and support in trying times, encouragement and guidance in discouragements and defeats; and he should ensure that they remain away from compromising with God’s Word, from the corruption of the world, and walk in the correct ways of the Lord.


* Verse 4 - God’s people feel comforted, assured, and secure because of His continual presence with them. He helps and guides them with His staff and His rod; the sheep that start wandering away from the right way, He prods back onto the right way, and keeps them safe from predators. The Pastor of the Church has to use the ‘rod and staff’ - the Word of God to teach, correct, instruct in righteousness, convince and teach with longsuffering, and wherever necessary, rebuke and exhort as well (2 Timothy 3:16; 4:2-4).


* Verse 5 - God keeps His people safe and secure in their difficult times, helps them, and provides the appropriate things for them according to their circumstances. The Pastor, the shepherd of the flock too, needs to stand with his people in all their situations and circumstances; keep them safe, prevent them from wandering away into wrongs, and safeguard them from being brought to shame.


* Verse 6 - God not only assures and provides good things in this life to His people, His Believers, but also assures them of eternal life and eternal rewards. The Pastor of the church too needs to teach his flock about the things of this world and of the next, and has to show them how to be safe and secure for this life as well as the next.


In the next article, we will see about the shepherds and caretakers having a negative attitude and not fulfilling their responsibilities,


If you have not yet accepted the discipleship of the Lord Jesus, then take a decision in its favor now to secure your eternal life and heavenly blessings. The Lord's security and blessings are present where there is obedience of the Lord, where His Word is honored and followed. If you are still not Born Again, have not obtained salvation, or have not asked the Lord Jesus for forgiveness for your sins, then you have the time and opportunity to do so right now. Ask the Lord Jesus to forgive your sins, and voluntarily and sincerely surrender yourselves into His hands - this is the only way to salvation and heavenly life. All you have to do is say a short prayer, voluntarily and with a sincere heart, with heartfelt repentance for your sins, and a fully submissive attitude. You can do this in this manner, “Lord Jesus, I confess that I have disobeyed You, and have knowingly or unknowingly, in mind, in thought, in attitude, and in deeds, committed sins. I believe that you have fully borne the punishment of my sins by your sacrifice on the cross, and have paid the full price of those sins for all eternity. Please forgive my sins, change my heart and mind towards you, and make me your disciple, take me with you." God longs for your company and wants to see you blessed, but to make this possible, is your personal decision. One prayer said with a sincere and surrendered heart will turn your present and future, your life here on earth and in the next world, forever and make you heavenly and blessed. Will you not say this prayer now, while you have the time and opportunity to do so? The decision is yours. 

 

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बुधवार, 2 अप्रैल 2025

The Church, or, Assembly of Christ Jesus - 54 - Gospel Preaching (2) / मसीह यीशु की कलीसिया या मण्डली – 54 - सुसमाचार प्रचार (2)

 

मसीह यीशु की कलीसिया या मण्डली – 54 

Click Here for the English Translation

सुसमाचार प्रचार का महत्व एवं अनिवार्यता (2)


पिछले लेख में हमने इफिसियों 4:11 में दी गई तीसरी सेवकाई और उससे सम्बन्धित लोगों, सुसमाचार प्रचार और सुसमाचार प्रचारकों के बारे में देखना आरम्भ किया था। हमने देखा था कि सुसमाचार प्रचार प्रत्येक मसीही विश्वासी तथा कलीसिया क लिए परमेश्वर द्वारा निर्धारित सेवकाई है, जिसमें उन्हें संलग्न रहना है। सुसमाचार प्रचार के साथ ही परमेश्वर की सामर्थ्य, सुरक्षा, और आशीष भी जुड़े हुए हैं; व्यक्तियों के लिए भी और कलीसिया के लिए भी। साथ ही हमने यह भी देखा था कि कैसे शैतान अपनी विभिन्न युक्तियों के द्वारा कलीसिया तथा सुसमाचार प्रचारकों को इस सेवकाई के प्रति उदासीन रखता है और उन्हें यह करने से हताश करता रहता है। आज हम इसी विषय पर कुछ और बातों को देखेंगे। 


सुसमाचार प्रचार मसीही जीवन और कलीसिया के लिए परमेश्वर की सामर्थ्य को उपलब्ध करवाता है, तथा सुसमाचार ही विश्वास में होकर परमेश्वर की धार्मिकता को प्रकट करता है (रोमियों 1:16-17)। शैतान यह भली-भाँति जानता है कि जो भी व्यक्ति या कलीसिया सुसमाचार प्रचार में लगे होंगे, वे उसके लिए एक बड़ी समस्या बन जाएंगे, क्योंकि उनमें होकर परमेश्वर की सामर्थ्य उसके विरुद्ध कार्य करेगी। इसलिए वह सुसमाचार प्रचार में हर संभव बाधा डालता है। शैतान, लोगों को सुसमाचार प्रचार के प्रति उदासीन करता है, सुसमाचार प्रचारकों को साँसारिक लोगों तथा संसार के द्वारा भयभीत करता है, उनके अपने जीवन, परिवारों, तथा उनकी गवाही को बिगाड़ता है, परमेश्वर के जो संतान लगन और उत्साह के साथ सुसमाचार प्रचार में लगे हैं उन्हें निरुत्साहित करता है, जिससे प्रभु के उन लोगों का जीवन उनके प्रचार के अनुरूप न दिखे और अप्रभावी रहे। इसी रीति से वह कलीसिया को औपचारिकताओं तथा परंपराओं, रीति-रिवाज़ों, त्यौहारों और पर्व आदि के निर्वाह में फंसाए रखता है; उनमें कलह, फूट, दलों और गुटों में विभाजन आदि करवाता है, जिससे किसी भी रीति से कलीसिया भी दुर्बल रहे, सुसमाचार प्रचार में न लगे, और प्रभु के लिए निरुपयोगी और अप्रभावी बनी रहे। अर्थात, किसी न किसी प्रकार से मसीही विश्वासी और प्रभु की कलीसिया को सुसमाचार प्रचार करने से अक्षम या दुर्बल बनाए रखता है। और परमेश्वर पवित्र आत्मा चाहता है कि हम शैतान की इन युक्तियों के प्रति सचेत रहें, उन्हें पहचानें, और उनसे बचाकर चलें (2 कुरिन्थियों 2:11)।


शैतान का सुसमाचार प्रचार को प्रभाव रहित करने का एक अन्य बहुत कारगर हथियार है सुसमाचार की सच्चाई और मूल स्वरूप को बिगाड़ कर, एक मिलावटी या मन-गढ़ंत और अप्रभावी सुसमाचार को लोगों द्वारा प्रचार करवाना (1 कुरिन्थियों 1:17), और लोगों के मनों में यह बात डालना कि वे प्रभु के लिए अच्छी सेवा कर रहे हैं, जबकि वास्तव में वे प्रभु की बहुत बड़ी हानि कर रहे होते हैं। शैतान द्वारा इस प्रकार के भ्रष्ट किए गए सुसमाचार में लोगों से पापों से पश्चाताप करने और उनके लिए प्रभु से क्षमा माँगने के स्थान पर भले कामों को करने, भले बनने, और धार्मिक गतिविधियों को करने तथा मानने-मनाने के द्वारा परमेश्वर को स्वीकार्य होने की शिक्षाएं दी जाती हैं; जो कि प्रभु यीशु के एकमात्र सच्चे और उद्धार देने वाले सुसमाचार (रोमियों 10:9-10; 1 कुरिन्थियों 15:1-4) से बिलकुल भिन्न हैं। जो लोग शैतान द्वारा भ्रष्ट किए गए इस सुसमाचार के पालन और प्रचार में लगे होते हैं, उन्हें लगता है कि वे प्रभु के लिए अच्छा कार्य कर रहे हैं, किन्तु वास्तव में वे प्रभु के विरुद्ध और शैतान के लिए अच्छा कार्य कर रहे होते हैं। इस भ्रष्ट सुसमाचार के प्रभावहीन होने की गंभीरता को हम पवित्र आत्मा द्वारा पौलुस प्रेरित से गलातियों की मसीही मण्डली को लिखी बात से समझ सकते हैं: मुझे आश्चर्य होता है, कि जिसने तुम्हें मसीह के अनुग्रह से बुलाया उस से तुम इतनी जल्दी फिर कर और ही प्रकार के सुसमाचार की ओर झुकने लगे। परन्तु वह दूसरा सुसमाचार है ही नहीं: पर बात यह है, कि कितने ऐसे हैं, जो तुम्हें घबरा देते, और मसीह के सुसमाचार को बिगाड़ना चाहते हैं। परन्तु यदि हम या स्वर्ग से कोई दूत भी उस सुसमाचार को छोड़ जो हम ने तुम को सुनाया है, कोई और सुसमाचार तुम्हें सुनाए, तो श्रापित हो। जैसा हम पहिले कह चुके हैं, वैसा ही मैं अब फिर कहता हूं, कि उस सुसमाचार को छोड़ जिसे तुम ने ग्रहण किया है, यदि कोई और सुसमाचार सुनाता है, तो श्रापित हो। अब मैं क्या मनुष्यों को मनाता हूं या परमेश्वर को? क्या मैं मनुष्यों को प्रसन्न करना चाहता हूं? (गलातियों 1:6-9)।


क्योंकि अपनी कलीसिया और उसके लोगों की उन्नति के लिए प्रभु ने सुसमाचार प्रचार को इतना महत्व दिया है, और आवश्यक ठहराया है, इसलिए हम मसीही विश्वासियों की यह ज़िम्मेदारी है कि हम प्रभु के इस कार्य में प्रभु के निर्देशानुसार एवं आज्ञाकारिता में संलग्न रहें, इसे नज़रन्दाज़ न करें, इसे हल्का या कम महत्व का न समझें। यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं तो विचार कीजिए कि प्रभु यीशु के सुसमाचार प्रचार के प्रति आपका क्या रवैया है? क्या आप उस सच्चे सुसमाचार को, उसके मूल स्वरूप में समझते और जानते हैं? क्या आप उस सुसमाचार को ग्रहण करने और उसके निर्वाह के द्वारा मसीही विश्वासी बने हैं, या अन्य किसी विधि से? यदि आप उस सच्चे सुसमाचार के द्वारा प्रभु में नहीं आए हैं, उसके आधार पर प्रभु की कलीसिया के अंग नहीं बने हैं, तो आप शैतान द्वारा फैलाए गए भ्रम-जाल में फंसे हुए हैं, और आपको अभी समय तथा अवसर रहते अपनी स्थिति को ठीक करना अनिवार्य है, नहीं तो शैतान द्वारा आपकी अनन्तकाल की हानि आपके लिए तैयार है।


यदि आपने अभी तक प्रभु की शिष्यता को स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी उसके पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। यदि आपने अभी तक नया जन्म, उद्धार नहीं पाया है, प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा नहीं माँगी है, तो अभी आपके पास समय और अवसर है कि यह कर लें। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” परमेश्वर आपके साथ संगति रखने की बहुत लालसा रखता है तथा आपको आशीषित देखना चाहता है, लेकिन इसे सम्भव करना आपका व्यक्तिगत निर्णय है। सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी। क्या आप अभी समय और अवसर होते हुए, इस प्रार्थना को नहीं करेंगे? निर्णय आपका है।  

 

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 The Church, or, Assembly of Christ Jesus - 54

English Translation

The Importance & Necessity of Preaching the Gospel (2)


In the previous article, we had begun to consider about the third ministry and its workers, given in Ephesians 4:11 - gospel preaching and preachers. We had seen that it is a God ordained purpose for every Christian Believer and every Church to be engaged in preaching the gospel. God's power, security, and blessings are associated with preaching of the gospel, for individuals as well as the Church.  We also how Satan keeps the Church and gospel preachers distracted from this ministry, and discourages them from being involved in it. Today we will continue with the topic and consider some more things related to it.


The preaching and propagating of the gospel, makes available the power of to the Believers, and it is the gospel that reveals God’s righteousness through faith (Romans 1:16-17). Satan knows this very well; he knows that those who are engaged in preaching and propagating the gospel, will turn out to be a big problem for him, since God’s power will work against him, through them. Therefore, he obstructs and tries to prevent preaching the gospel in every possible way that he can. To accomplish this, Satan turns the gospel preachers into being indifferent and callous towards their ministry and responsibility, puts fear of worldly people and the world in their hearts, strives to spoil their life, families, and testimony, discourage and suppress the zeal and enthusiasm of God’s children who are engaged in or want to be involved in preaching the gospel; all so that the lives of the preachers of the gospel does not resemble or live up to what they preach, and they become ineffective for the Lord. Similarly, he keeps the churches involved in an outward show of vain activity through fulfilling formalities, rituals, traditions, celebrations, feasts and festivals; and even through creating dissensions, groupism, and infightings, so that somehow the church too remains weak and incapable of having any outreach, and is ineffective for the Lord. God the Holy Spirit desires that we learn and be aware of these devices of Satan, and stay safe from being beguiled by him (2 Corinthians 2:11).


A very effective and often used weapon of Satan against the gospel is to have the people corrupt the gospel by inserting their own ideas, thinking, and wisdom in it, thereby render the gospel ineffective (1 Corinthians 1:17), and then engage the people in spreading this false, corrupted, ineffective gospel, under the assumption that they are doing a service for the Lord, whereas actually they are doing a great disservice for the Lord! A hallmark of this corrupted, ineffective, false gospel is that instead of repentance for sins and asking for the Lord’s forgiveness for them, it encourages the people to be good, to do good works, be ‘religious’, be involved in ‘religious works’ to please God and become acceptable to Him - none of which are a feature of the one and only true, saving, gospel (Romans 10:9-10; 1 Corinthians 15:1-4) of the Lord Jesus. The seriousness of this corruption, and ineffectiveness of this corrupted gospel was emphasized by the Holy Spirit in the opening section of Apostle Paul’s letter to the Church in Galatia. Through the Holy Spirit, Paul wrote, I marvel that you are turning away so soon from Him who called you in the grace of Christ, to a different gospel, which is not another; but there are some who trouble you and want to pervert the gospel of Christ. But even if we, or an angel from heaven, preach any other gospel to you than what we have preached to you, let him be accursed. As we have said before, so now I say again, if anyone preaches any other gospel to you than what you have received, let him be accursed (Galatians 1:6-9).


Since the Lord has given so much emphasis to the preaching of the gospel and made it so necessary for the growth, stability, and edification of His Church and its members - the Christian Believers, it is the responsibility of the Christian Believers to be continually engaged in this ministry under the Lord’s instructions and guidance, not take it lightly, not ignore or overlook it. If you are a Christian Believer, then what is your attitude towards the gospel and its preaching? Do you know and understand the gospel in its correct form? Have you become a Christian, a Believer by obeying and following that gospel, or through some other way? If you have not come to faith in the Lord Jesus through that gospel, if you have not become a member of the Lord Jesus’s Church through obeying and following the gospel, then you are caught and entangled in the deceptive and destructive web of Satan. Assess and correct your situation now, while you have God given time and opportunity to do so, else eternal damnation and irretrievable harm is ready and waiting for you from Satan.


If you have not yet accepted the discipleship of the Lord Jesus, then take a decision in its favor now to secure your eternal life and heavenly blessings. The Lord's security and blessings are present where there is obedience of the Lord, where His Word is honored and followed. If you are still not Born Again, have not obtained salvation, or have not asked the Lord Jesus for forgiveness for your sins, then you have the time and opportunity to do so right now. Ask the Lord Jesus to forgive your sins, and voluntarily and sincerely surrender yourselves into His hands - this is the only way to salvation and heavenly life. All you have to do is say a short prayer, voluntarily and with a sincere heart, with heartfelt repentance for your sins, and a fully submissive attitude. You can do this in this manner, “Lord Jesus, I confess that I have disobeyed You, and have knowingly or unknowingly, in mind, in thought, in attitude, and in deeds, committed sins. I believe that you have fully borne the punishment of my sins by your sacrifice on the cross, and have paid the full price of those sins for all eternity. Please forgive my sins, change my heart and mind towards you, and make me your disciple, take me with you." God longs for your company and wants to see you blessed, but to make this possible, is your personal decision. One prayer said with a sincere and surrendered heart will turn your present and future, your life here on earth and in the next world, forever and make you heavenly and blessed. Will you not say this prayer now, while you have the time and opportunity to do so? The decision is yours.


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मंगलवार, 1 अप्रैल 2025

The Church, or, Assembly of Christ Jesus - 53 - Gospel Preaching (1) / मसीह यीशु की कलीसिया या मण्डली – 53 - सुसमाचार प्रचार (1)

 

मसीह यीशु की कलीसिया या मण्डली – 53 

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सुसमाचार प्रचार का महत्व एवं अनिवार्यता (1)


हमने देखा है कि इफिसियों 4:11 में कलीसिया की उन्नति के लिए प्रभु द्वारा नियुक्त किए गए पाँच प्रकार के सेवकों या कार्यकर्ताओं और उनकी सेवकाई या कार्यों की सूची दी गई है, कलीसिया में उनकी सेवकाई के विषय बताया गया है। मूल यूनानी भाषा में इन सेवकों के लिए प्रयोग किए गए शब्दों के आधार पर, ये पाँचों कार्यकर्ता और उनके कार्य, वचन की सेवकाई से संबंधित हैं। इनमें से पहले दो, प्रेरित और भविष्यद्वक्ता और इनकी सेवकाइयों के विषय हम पिछले लेखों में देख चुके हैं। परमेश्वर के वचन बाइबल में दी गई इनकी सेवकाई के हवालों से यह प्रकट है कि आज जो स्वयं के प्रेरित और भविष्यद्वक्ता होने का दावा करते हैं, उनमें, उनके कार्यों में और बाइबल में इन सेवकाइयों के बारे में दी गई बातों में कोई सामंजस्य नहीं है। अधिकांशतः ये लोग उन मत, समुदाय, डिनॉमिनेशंस में देखे जाते हैं जो परमेश्वर पवित्र आत्मा से संबंधित गलत शिक्षाओं को मानते, मनवाते, और उन गलत शिक्षाओं का प्रचार एवं प्रसार करते हैं। ये लोग अपने आप ही, या कुछ अन्य मनुष्यों या किसी संस्था अथवा मत के अगुवों द्वारा प्रेरित या भविष्यद्वक्ता बन जाते हैं, और इसे एक पदवी के समान औरों पर अधिकार रखने तथा सांसारिक लाभ की बातों को अर्जित करने के लिए प्रयोग करते हैं। जबकि वचन इफिसियों 4:11 में, और अन्य स्थानों पर यह स्पष्ट कहता है कि कलीसिया में यह नियुक्ति केवल प्रभु के द्वारा की जाती है, किसी मनुष्य के द्वारा नहीं।


इन लोगों की बातों और विशेषकर “भविष्यवाणियों” के लिए एक और बात ध्यान में रखनी बहुत आवश्यक है - प्रभु परमेश्वर द्वारा नियुक्त प्रेरितों और प्रथम कलीसिया के अगुवों का समय समाप्त होते-होते, नए नियम की सभी पत्रियां और पुस्तकें लिखी जा चुकी थीं, और स्थान-स्थान पर पहुँचा दी गई थीं। अर्थात, परमेश्वर का वचन लिखित रूप में पूर्ण हो चुका था; अब केवल उसे संकलित करके एक पुस्तक के रूप में लाना शेष था, जैसा कि आज बाइबल के रूप में वह हमारे हाथों में विद्यमान है। उन प्रेरितों और आरंभिक कलीसिया के अगुवों में होकर परमेश्वर पवित्र आत्मा ने जो वचन लिखवा दिया, वही संकलित होकर अनन्तकाल के लिए बाइबल के रूप में परमेश्वर का वचन स्थापित हो गया है। इस सन्दर्भ में पतरस अपनी दूसरी पत्री, 2 पतरस 1:3-4 में, परमेश्वर पवित्र आत्मा की अगुवाई में लिखता है कि प्रभु यीशु की पहचान और समझा के द्वारा, जीवन और भक्ति से संबंधित सभी बातें, तथा परमेश्वर की बड़ी और महान प्रतिज्ञाएं, और संसार की सड़ाहट से बचने का मार्ग हमे दे दिया गया है - एक पूर्ण किया जा चुका सिद्ध कार्य, जिसमें किसी भी अन्य बात के जोड़े जाने या संशोधन किए जाने की न तो कोई आवश्यकता है और न ही कोई संभावना शेष है। अर्थात, अब जब वचन के एक बार लिख कर दे दिया गया है, तो उसके बाद उसमें न कुछ जोड़ा जा सकता है, और न घटाया जा सकता है, न बदला जा सकता है; जिसने भी ऐसा कुछ भी करने का प्रयास किया, उसे बहुत भारी दण्ड भोगना पड़ेगा (प्रकाशितवाक्य 22:18-19)। इसलिए आज, जो यह अपनी ओर से “भविष्यवाणी” करके परमेश्वर के वचन में अपनी ओर से बातें जोड़ने या वचन की बातों को बदलने या सुधारने के प्रयास करते हैं, वह उनके लिए, और उनकी बातों को मानने वालों के लिए बहुत हानिकारक होगा (मत्ती 12:36-37; 15:8-9, 13-14)।


इफिसियों 4:11 में दिए गए तीसरे प्रकार की कार्यकर्ता हैं “सुसमाचार सुनाने वाले”। ध्यान कीजिए कि यद्यपि कलीसिया में कुछ लोगों को सुसमाचार प्रचार का दायित्व और वरदान दिया गया है, किन्तु सुसमाचार सुनाना प्रभु ने अपने सभी शिष्यों के लिए रखा है (मत्ती 28:18-20; मरकुस 16:15; प्रेरितों 1:8); सुसमाचार प्रचार प्रत्येक मसीही विश्वासी की ज़िम्मेदारी है। पौलुस ने अपनी मसीही सेवकाई में सुसमाचार प्रचार करने की अनिवार्यता को 1 कुरिन्थियों 9:16-17, 23 में व्यक्त किया, तथा अपने सहकर्मी तीमुथियुस को भी दुख उठाकर भी बड़ी सहनशीलता के साथ, बिना हार माने, सुसमाचार प्रचार में लगे रहने के लिए कहा (2 तीमुथियुस 4:5)। प्रभु यीशु की कलीसिया के लिए प्रयुक्त विभिन्न रूपकों (metaphors) के अध्ययन में भी, और प्रेरितों 2:42 की चार बातों में से “रोटी तोड़ने” के बारे में वचन की बातों को देखते समय हमने देखा था कि कलीसिया का एक उद्देश्य, उसका एक कर्तव्य है प्रभु यीशु की गवाही देते रहना। जहाँ प्रभु यीशु की गवाही होगी, वहीं साथ ही सुसमाचार प्रचार भी होगा। जिस भी स्थानीय कलीसिया की गतिविधियों में सुसमाचार प्रचार नहीं है, वह कलीसिया या तो प्रभु की कलीसिया नहीं है, अन्यथा प्रभु के मार्गों, कार्यों, और उद्देश्यों से भटक गई है, प्रभु के लिए कार्य नहीं कर रही है। जैसा हम प्रकाशितवाक्य अध्याय 2 और 3 की कलीसियाओं से देखते हैं, ऐसी सभी अप्रभावी और निकम्मी कलीसियाएँ, बची नहीं रहेंगी, वे प्रभु द्वारा मिटा दी जाएँगी। जैसा हम पहले के लेखों में देख चुके हैं, प्रभु यीशु की कलीसिया और उसके सदस्यों के मसीही जीवनों की उन्नति वचन की सही आज्ञाकारिता के साथ जुड़ी हुई है। जहाँ प्रभु तथा उसके वचन की आज्ञाकारिता है, वहाँ प्रभु परमेश्वर की सुरक्षा और आशीष भी है; जहाँ वचन का पालन नहीं है, वहाँ परमेश्वर की आशीष और सुरक्षा भी नहीं है।


यदि आपने अभी तक प्रभु की शिष्यता को स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी उसके पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। यदि आपने अभी तक नया जन्म, उद्धार नहीं पाया है, प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा नहीं माँगी है, तो अभी आपके पास समय और अवसर है कि यह कर लें। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” परमेश्वर आपके साथ संगति रखने की बहुत लालसा रखता है तथा आपको आशीषित देखना चाहता है, लेकिन इसे सम्भव करना आपका व्यक्तिगत निर्णय है। सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी। क्या आप अभी समय और अवसर होते हुए, इस प्रार्थना को नहीं करेंगे? निर्णय आपका है।

 

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 The Church, or, Assembly of Christ Jesus - 53

English Translation

The Importance & Necessity of Preaching the Gospel (1)


    We have seen that in Ephesians 4:11 a list of five kinds of ministries and their workers appointed by the Lord Jesus for the growth and edification of His Church is given. The words used for the ministries in the original Greek language, in context of the Church and the Christian Faith, all imply various works and functions related to the ministry of the Word of God. Of these five, we have considered the first two, i.e., Apostles, Prophets and Prophesying. From the Biblical texts related to these ministries and workers, it is evident that today those who claim to be Apostles and Prophets, neither live up to the criteria, nor exhibit the characteristics and qualities mentioned in God’s Word the Bible about these ministries and workers. Today, these people are usually seen in those groups, sects, and denominations that preach, teach, and make people follow wrong doctrines and false teachings related to God the Holy Spirit. In such groups, sects, and denominations, some persons or elders, declare some of their members as Apostles or Prophets. They then use these ministries as a title or status symbol to assert authority over other members, to gain material things and temporal benefits. Whereas Ephesians 4:11 says it very clearly that the appointments to these ministries were done by the Lord, not any person.


Another very important thing to always be keep in mind, related to the activities of these people, especially regarding “Prophesying” is that by the time the era and life-time of the Lord appointed Apostles and the Elders of the first Church came to an end, all the books and letters that eventually were going to be a part of the New Testament, had already been written, circulated, and had reached their destinations. In other words, the Word of God in its written form had been completed; now all that remained was to compile it into one book, in the form we have it with us, as the Bible. What those Apostles and Prophets of the initial Church wrote under the guidance of the Holy Spirit and left for us, later, that was compiled in one book to be with us for all eternity, as the Word of God, the Bible. In this context, Peter under the guidance of the Holy Spirit wrote in 2 Peter 1:3-4, that everything that pertains to life and godliness, along with God’s great promises and the way to escape the corruption of the world, has already been given to us in the knowledge and understanding of the Lord Jesus - as a completed and accomplished perfect work, in which there is neither any need nor any scope or possibility of any addition, or modification, or correction. In other words, now that God’s Word has been written down and given to us, there is no possibility of adding or taking away or modifying anything from it; whoever does anything like this will have to pay a very heavy price for doing so (Revelation 22:18-19). Therefore, the present-day self or man proclaimed “Apostles” and “Prophets”, who claim to receive visions and instructions from god, on the basis of which they then add or modify or reject things from God’s Word with gross impunity, will have to give a serious account and heavily suffer for manhandling God’s Word to suit their convenience (Matthew 12:36-37; 15:8-9, 13-14).


In Ephesians 4:11, the third ministry and its workers are “Evangelists.” Take note that although some in the Church have especially been given the gift of preaching the gospel, but the Lord has kept preaching and propagating the gospel for each and every one of His disciples (Matthew 28:18-20; Mark 16:15; Acts 1:8); evangelism or preaching the gospel is every Christian’s responsibility. The Apostle Paul expressed the compulsion and necessity of preaching the gospel in 1 Corinthians 9:16-17, 23; and he also instructed his co-worker, Timothy, to continue patiently in preaching the gospel, putting up with all the problems and difficulties that may come while doing this, without giving up on it (2 Timothy 4:5). While we were considering the various metaphors used in the Bible for the Church of the Lord Jesus Christ, and also in the discussion from Acts 2:42 on “Breaking of Bread”, i.e., the Holy Communion, we had seen that one of the purposes, a responsibility of the Church is to be engaged in witnessing for the Lord Jesus. Wherever there is witnessing for the Lord Jesus, the preaching of the gospel will also be there, automatically. Therefore, in whichever local church, there is no outreach and gospel preaching in its activities, that church either does not belong to the Lord Jesus, or has been misled and fallen away from the Lord’s ways, works, and purposes and is no longer working for the Lord, is ineffective and not of any use for Him. As we see from the churches of Revelation chapters 2 and 3, all ineffective and useless churches will face the Lord’s judgment and be brought to an end. As we have seen in the earlier articles, the growth, stability, and edification of the Lord’s Church and of His Believers is closely related to their proper obedience to God’s Word. Where there is obedience to the Lord and His Word, there the security and blessings of the Lord God are also present; else that church or person are on their own, without any help, security, and blessings of God.


If you have not yet accepted the discipleship of the Lord Jesus, then take a decision in its favor now to secure your eternal life and heavenly blessings. The Lord's security and blessings are present where there is obedience of the Lord, where His Word is honored and followed. If you are still not Born Again, have not obtained salvation, or have not asked the Lord Jesus for forgiveness for your sins, then you have the time and opportunity to do so right now. Ask the Lord Jesus to forgive your sins, and voluntarily and sincerely surrender yourselves into His hands - this is the only way to salvation and heavenly life. All you have to do is say a short prayer, voluntarily and with a sincere heart, with heartfelt repentance for your sins, and a fully submissive attitude. You can do this in this manner, “Lord Jesus, I confess that I have disobeyed You, and have knowingly or unknowingly, in mind, in thought, in attitude, and in deeds, committed sins. I believe that you have fully borne the punishment of my sins by your sacrifice on the cross, and have paid the full price of those sins for all eternity. Please forgive my sins, change my heart and mind towards you, and make me your disciple, take me with you." God longs for your company and wants to see you blessed, but to make this possible, is your personal decision. One prayer said with a sincere and surrendered heart will turn your present and future, your life here on earth and in the next world, forever and make you heavenly and blessed. Will you not say this prayer now, while you have the time and opportunity to do so? The decision is yours.

 

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सोमवार, 31 मार्च 2025

The Church, or, Assembly of Christ Jesus - 52 - Prophesying Meanings (2) / मसीह यीशु की कलीसिया या मण्डली – 52 - भविष्यवाणी के अर्थ (2)

 

मसीह यीशु की कलीसिया या मण्डली – 52 

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बाइबल के अनुसार भविष्यवाणी के अर्थ (2)


    पिछले लेख में हमने शब्दों "भविष्यद्वक्ता" और भविष्यद्वाणी" के विभिन्न अर्थों और तात्पर्यों के बार में देखा था। इन बातों की पुष्टि के लिए, तथा यह भी समझने के लिए कि वर्तमान में जो स्वयं को "भविष्यद्वक्ता" कहते हैं, तथा उनकी "भविष्यद्वाणियाँ" परमेश्वर के वचन के समक्ष क्या स्थान रखती हैं, आज हम परमेश्वर के वचन बाइबल के कुछ पदों से "भविष्यद्वक्ता" और "भविष्यद्वाणी" शब्दों के प्रयोग के कुछ उदाहरण देखते हैं। 


बाइबल के इन पदों पर कुछ विचार कीजिए:


* किसी देवी-देवता को पुकारना: 1राजा 18:29 वे दोपहर भर ही क्या, वरन भेंट चढ़ाने के समय तक नबूवत करते रहे, परन्तु कोई शब्द सुन न पड़ा; और न तो किसी ने उत्तर दिया और न कान लगाया। - एल्लियाह से मिली चुनौती के अंतर्गत बाल देवता के नबी अपने देवता को भरसक पुकारते रहे।


* अपने शब्दों के द्वारा लोगों को आश्वस्त अथवा प्रोत्साहित करना, शान्ति या सांत्वना देना: 1 कुरिन्थियों 14:3 परन्तु जो भविष्यद्वाणी करता है, वह मनुष्यों से उन्नति, और उपदेश, और शान्‍ति की बातें कहता है।


* परमेश्वर द्वारा दी गई आज्ञा को बोलना और मानना: 


- यहेजकेल 37:4 तब उसने मुझ से कहा, इन हड्डियों से भविष्यद्वाणी कर के कह, हे सूखी हड्डियों, यहोवा का वचन सुनो।


- यहेजकेल 37:9-10 तब उसने मुझ से कहा, हे मनुष्य के सन्तान सांस से भविष्यद्वाणी कर, और सांस से भविष्यद्वाणी कर के कह, हे सांस, परमेश्वर यहोवा यों कहता है कि चारों दिशाओं से आकर इन घात किए हुओं में समा जा कि ये जी उठें। उसकी इस आज्ञा के अनुसार मैं ने भविष्यद्वाणी की, तब सांस उन में आ गई, ओर वे जीकर अपने अपने पांवों के बल खड़े हो गए; और एक बहुत बड़ी सेना हो गई।


* परमेश्वर की ओर से आने वाली घटनाओं और बातों के बारे में बताना:


 - यहेजकेल 36:1, 3 फिर हे मनुष्य के सन्तान, तू इस्राएल के पहाड़ों से भविष्यद्वाणी कर के कह, हे इस्राएल के पहाड़ों, यहोवा का वचन सुनो। इस कारण भविष्यद्वाणी कर के कह, परमेश्वर यहोवा यों कहता हे, लोगों ने जो तुम्हें उजाड़ा और चारों ओर से तुम्हें ऐसा निगल लिया कि तुम बची हुई जातियों का अधिकार हो जाओ, और लुतरे तुम्हारी चर्चा करते और साधारण लोग तुम्हारी निन्दा करते हैं;


- यहेजकेल 37:12-14 इस कारण भविष्यद्वाणी कर के उन से कह, परमेश्वर यहोवा यों कहता है, हे मेरी प्रजा के लोगों, देखो, मैं तुम्हारी कब्रें खोल कर तुम को उन से निकालूंगा, और इस्राएल के देश में पहुंचा दूंगा। सो जब मैं तुम्हारी कब्रें खोलूं, और तुम को उन से निकालूं, तब हे मेरी प्रजा के लोगों, तुम जान लोगे कि मैं यहोवा हूँ। और मैं तुम में अपना आत्मा समाऊंगा, और तुम जीओगे, और तुम को तुम्हारे निज देश में बसाऊंगा; तब तुम जान लोगे कि मुझ यहोवा ही ने यह कहा, और किया भी है, यहोवा की यही वाणी है।


* परमेश्वर के प्रभाव में आकर उसके निर्देश के अनुसार बोलना: 


- अमोस 3:8 सिंह गरजा; कौन न डरेगा? परमेश्वर यहोवा बोला; कौन भविष्यद्वाणी न करेगा?


  - यहेजकेल 36:6 इस कारण इस्राएल के देश के विषय में भविष्यद्वाणी कर के पहाड़ों, पहाडिय़ों, नालों, और तराइयों से कह, परमेश्वर यहोवा यों कहता है, देखो, तुम ने जातियों की निन्दा सही है, इस कारण मैं अपनी बड़ी जलजलाहट से बोला हूँ।


* आराधना, स्तुति करना, और आराधना के लिए संगीत वाद्य बजाना: 1इतिहास 25:1-6 फिर दाऊद और सेनापतियों ने आसाप, हेमान और यदूतून के कितने पुत्रों को सेवकाई के लिये अलग किया कि वे वीणा, सारंगी और झांझ बजा बजाकर नबूवत करें। और इस सेवकाई के काम करने वाले मनुष्यों की गिनती यह थी: अर्थात आसाप के पुत्रों में से तो जक्कूर, योसेप, नतन्याह और अशरेला, आसाप के ये पुत्र आसाप ही की आज्ञा में थे, जो राजा की आज्ञा के अनुसार नबूवत करता था। फिर यदूतून के पुत्रों में से गदल्याह, सरीयशायाह, हसब्याह, मत्तित्याह, ये ही छ: अपने पिता यदूतून की आज्ञा में हो कर जो यहोवा का धन्यवाद और स्तुति कर कर के नबूवत करता था, वीणा बजाते थे। और हेमान के पुत्रों में से, मुक्किय्याह, मत्तन्याह, लज्जीएल, शबूएल, यरीमोत, हनन्याह, हनानी, एलीआता, गिद्दलती, रोममतीएजेर, योशबकाशा, मल्लोती, होतीर और महजीओत। परमेश्वर की प्रतिज्ञानुकूल जो उसका नाम बढ़ाने की थी, ये सब हेमान के पुत्र थे जो राजा का दर्शी था; क्योंकि परमेश्वर ने हेमान को चौदह बेटे और तीन बेटियां दीं थीं। ये सब यहोवा के भवन में गाने के लिये अपने अपने पिता के आधीन रह कर, परमेश्वर के भवन, की सेवकाई में झांझ, सारंगी और वीणा बजाते थे। और आसाप, यदूतून और हेमान राजा के आधीन रहते थे।


* किसी गुप्त या अनजानी बात को बताना: लूका 22:64 और उस की आंखे ढांपकर उस से पूछा, कि भविष्यद्वाणी कर के बता कि तुझे किसने मारा - प्रभु यीशु मसीह को पकड़ने के बाद उसका का ठट्ठा करते समय उससे उपहास करते हुए पूछना।  


ये “भविष्यद्वक्ता” और “भविष्यद्वाणी” शब्दों के बाइबल में विभिन्न अभिप्रायों के प्रयोग को दिखाने के लिए केवल उदाहरणस्वरूप लिए गए बाइबल के कुछ पद हैं; संपूर्ण सूची नहीं।


आज ईसाई या मसीही समाज में, विशेषकर उन समुदायों और डिनॉमिनेशंस में जो परमेश्वर पवित्र आत्मा के बारे में गलत शिक्षाएं बताते और सिखाते रहते हैं, ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो अपने आप को “नबी” या “भविष्यद्वक्ता” कहते हैं, और परमेश्वर के नाम से कुछ भी कहते रहते हैं। उनका मुख्य ध्येय अपने आप को उच्च और प्रशंसनीय बनाना तथा परमेश्वर के नाम, काम, और उसके वचन के द्वारा अपने लिए सांसारिक लाभ, संपत्ति, यश, ओहदा, आदि एकत्रित करना होता है। यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं, तो आपके लिए यह अनिवार्य है कि आप परमेश्वर के वचन की गलत समझ और गलत उपयोग से बचें। वचन की सही समझ और सही उपयोग आपके लिए आत्मिक उन्नति और आशीष का कारण होगा, किन्तु गलत समझ और गलत उपयोग बहुत हानिकारक होगा। इसलिए यदि आप किसी गलत शिक्षा अथवा धारणा में पड़े हुए हैं, तो स्थिति को जाँच-परखकर अभी समय और अवसर के रहते उससे बाहर निकल आएं, आवश्यक सुधार कर लें।


यदि आपने अभी तक प्रभु की शिष्यता को स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी उसके पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। यदि आपने अभी तक नया जन्म, उद्धार नहीं पाया है, प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा नहीं माँगी है, तो अभी आपके पास समय और अवसर है कि यह कर लें। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” परमेश्वर आपके साथ संगति रखने की बहुत लालसा रखता है तथा आपको आशीषित देखना चाहता है, लेकिन इसे सम्भव करना आपका व्यक्तिगत निर्णय है। सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी। क्या आप अभी समय और अवसर होते हुए, इस प्रार्थना को नहीं करेंगे? निर्णय आपका है। 

 

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 The Church, or, Assembly of Christ Jesus - 52

English Translation

Biblical Meanings of Prophesying (2)


In the previous article, we have seen the various implications and meanings of the words “Prophet” and “Prophecy.” Today, let us look at some examples of the usage, meaning, and implications of these two words through some verses from the Bible; using them as examples of what we have said, and to see how the present day self-proclaimed "Prophets" and their "prophecies" measure up to God's Word.


Consider the following verses:


* To call unto some deity: 1 Kings 18:29 And when midday was past, they prophesied until the time of the offering of the evening sacrifice. But there was no voice; no one answered, no one paid attention. The prophets of Baal called out to their deity; but in vain.


* To comfort and assure people through speaking to them: 1 Corinthians 14:3 But he who prophesies speaks edification and exhortation and comfort to men.


* To speak out and obey God’s commandments:


- Ezekiel 37:4 Again He said to me, Prophesy to these bones, and say to them, 'O dry bones, hear the word of the Lord!’


- Ezekiel 37:9-10 Also He said to me, Prophesy to the breath, prophesy, son of man, and say to the breath, Thus says the Lord God: Come from the four winds, O breath, and breathe on these slain, that they may live. So I prophesied as He commanded me, and breath came into them, and they lived, and stood upon their feet, an exceedingly great army.


* To foretell about the future events, from God:


- Ezekiel 36:1, 3 And you, son of man, prophesy to the mountains of Israel, and say, O mountains of Israel, hear the word of the Lord! therefore prophesy, and say, Thus says the Lord God: Because they made you desolate and swallowed you up on every side, so that you became the possession of the rest of the nations, and you are taken up by the lips of talkers and slandered by the people


- Ezekiel 37:12-14 Therefore prophesy and say to them, Thus says the Lord God: Behold, O My people, I will open your graves and cause you to come up from your graves, and bring you into the land of Israel. Then you shall know that I am the Lord, when I have opened your graves, O My people, and brought you up from your graves. I will put My Spirit in you, and you shall live, and I will place you in your own land. Then you shall know that I, the Lord, have spoken it and performed it, says the Lord.


* To speak under the power and influence of God, according to His instructions:



- Amos 3:8 A lion has roared! Who will not fear? The Lord God has spoken! Who can but prophesy?


 - Ezekiel 36:6 Therefore prophecy concerning the land of Israel, and say to the mountains, the hills, the rivers, and the valleys, Thus says the Lord God: Behold, I have spoken in My jealousy and My fury, because you have borne the shame of the nations.


* To praise and worship God, and to play musical instruments for worshipping: 1Chronicles 25:1-6 Moreover David and the captains of the army separated for the service some of the sons of Asaph, of Heman, and of Jeduthun, who should prophesy with harps, stringed instruments, and cymbals. And the number of the skilled men performing their service was: Of the sons of Asaph: Zaccur, Joseph, Nethaniah, and Asharelah; the sons of Asaph were under the direction of Asaph, who prophesied according to the order of the king. Of Jeduthun, the sons of Jeduthun: Gedaliah, Zeri, Jeshaiah, Shimei, Hashabiah, and Mattithiah, six, under the direction of their father Jeduthun, who prophesied with a harp to give thanks and to praise the Lord. Of Heman, the sons of Heman: Bukkiah, Mattaniah, Uzziel, Shebuel, Jerimoth, Hananiah, Hanani, Eliathah, Giddalti, Romamti-Ezer, Joshbekashah, Mallothi, Hothir, and Mahazioth. All these were the sons of Heman the king's seer in the words of God, to exalt his horn. For God gave Heman fourteen sons and three daughters. All these were under the direction of their father for the music in the house of the Lord, with cymbals, stringed instruments, and harps, for the service of the house of God. Asaph, Jeduthun, and Heman were under the authority of the king.


* To tell about some secret or unknown thing: Luke 22:64 They blindfolded him and demanded, "Prophesy! Who hit you?"


These are just a few representative, sample verses, and not an exhaustive list from the Bible to illustrate the varying meanings of the words “Prophet” and “Prophecy.” 


Today, in Christendom, especially amongst those groups, sects, and denominations who keep preaching and teaching wrong doctrines and false teachings about God the Holy Spirit, there is no dearth of people who call themselves as “prophets”, are self-appointed or man-appointed to this position, and keep saying anything that comes to their mind as a “prophecy from God.” But their main purpose is to gain prominence, to become famous and acquire a name and following; they use the name of God, His Word, and things done in his name to acquire worldly benefits and possessions, name, fame, and status in the society, and rise to a position of having authority over people. If you are a Christian Believer, then it is essential for you to recognize and beware of the misunderstandings and misuse of God’s Word and name. Having a correct understanding and using God’s Word worthily will be a blessing for you and help you in your spiritual growth; but misuse and propagating misunderstandings will be deleterious and catastrophic. Therefore, check and evaluate what you accept and believe in, and if you are caught up and involved in some wrong doctrines and false teachings, in misconceptions and wrong notions, then now, while God is giving you the time and opportunity to rectify your beliefs and situation and come out of the wrong things, do so; lest by the time you realize and decide to do so, it is very late and beyond the point of correction.


If you have not yet accepted the discipleship of the Lord Jesus, then take a decision in its favor now to secure your eternal life and heavenly blessings. The Lord's security and blessings are present where there is obedience of the Lord, where His Word is honored and followed. If you are still not Born Again, have not obtained salvation, or have not asked the Lord Jesus for forgiveness for your sins, then you have the time and opportunity to do so right now. Ask the Lord Jesus to forgive your sins, and voluntarily and sincerely surrender yourselves into His hands - this is the only way to salvation and heavenly life. All you have to do is say a short prayer, voluntarily and with a sincere heart, with heartfelt repentance for your sins, and a fully submissive attitude. You can do this in this manner, “Lord Jesus, I confess that I have disobeyed You, and have knowingly or unknowingly, in mind, in thought, in attitude, and in deeds, committed sins. I believe that you have fully borne the punishment of my sins by your sacrifice on the cross, and have paid the full price of those sins for all eternity. Please forgive my sins, change my heart and mind towards you, and make me your disciple, take me with you." God longs for your company and wants to see you blessed, but to make this possible, is your personal decision. One prayer said with a sincere and surrendered heart will turn your present and future, your life here on earth and in the next world, forever and make you heavenly and blessed. Will you not say this prayer now, while you have the time and opportunity to do so? The decision is yours.

 

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