मसीह यीशु की कलीसिया या मण्डली – 58
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शिक्षकों की सेवकाई (1)
हम पिछले लेखों में इफिसियों 4:11 में कलीसिया की उन्नति के लिए प्रभु द्वारा नियुक्त पाँच प्रकार के सेवकों तथा उनकी सेवकाइयों के बारे में देखते आ रहे हैं। हम देख चुके हैं कि ये पाँचों सेवकाइयां परमेश्वर के वचन की सेवकाई से संबंधित हैं; और हमने वचन से यह भी देखा है कि एक ही व्यक्ति एक से अधिक प्रकार की सेवकाई कर सकता है, और करता रहा है। पिछले लेख में हमने इनमें से पांचवें, उपदेशक, अर्थात शिक्षक होने के बारे में देखा था, और देखा था कि कैसे प्रभु यीशु भी एक शिक्षक, सुसमाचार प्रचारक, और अन्य सेवकाइयों को करने वाले जाने जाते थे। इसी प्रकार से पहली कलीसिया में प्रेरित भी एक से अधिक प्रकार की सेवकाइयों को करते थे। पिछले लेख में हमने परमेश्वर के वचन से पाँचवीं सेवकाई, शिक्षक और उपदेशक के बार में देखा था। आज हम वचन से ही उचित रीति से वचन की शिक्षा दिए जाने और वचन की सही शिक्षा के लोगों के जीवनों पर प्रभावों के कुछ उदाहरणों को देखते हैं।
हम बाइबल से कुछ उदाहरणों को देखते हैं:
* प्रभु यीशु मसीह ने जब लोगों को सिखाया, तब, फरीसियों और शास्त्रियों के समान नहीं, परंतु अधिकारी के समान, और अधिकार के साथ सिखाया (मत्ती 7:28-29; मरकुस 1:22; लूका 4:32)। अर्थात प्रभु यीशु ने वचन को ‘किताबी या मानवीय’ ज्ञान के अनुसार नहीं वरन वचन की गहराई से समझ और दृढ़ता के साथ सिखाया। किन्तु साथ ही वह लोगों को उनकी समझ के अनुसार भी सिखाता था, और परमेश्वर की शिक्षाओं को सरल दृष्टांतों के द्वारा लोगों को समझाता था (मरकुस 4:33-34)। मसीही शिक्षक को वचन की शिक्षा देने की विधि का यही उदाहरण लेकर चलना चाहिए।
* पौलुस ने कुरिन्थुस की मण्डली को उन्हें उससे मिली सुसमाचार की शिक्षा के विषय स्मरण दिलाया, और हे भाइयों, जब मैं परमेश्वर का भेद सुनाता हुआ तुम्हारे पास आया, तो वचन या ज्ञान की उत्तमता के साथ नहीं आया। और मेरे वचन, और मेरे प्रचार में ज्ञान की लुभाने वाली बातें नहीं; परन्तु आत्मा और सामर्थ्य का प्रमाण था। इसलिये कि तुम्हारा विश्वास मनुष्यों के ज्ञान पर नहीं, परन्तु परमेश्वर की सामर्थ्य पर निर्भर हो (1 कुरिन्थियों 2:1, 4-5)। अर्थात, पौलुस जैसे ज्ञानवान और पवित्र शास्त्र की उत्तम शिक्षा पाए हुए व्यक्ति के द्वारा पवित्र आत्मा की अगुवाई में जो सुसमाचार की शिक्षा दी गई, वह आत्मा की सामर्थ्य से तो थी, किन्तु उसकी शिक्षाओं में ज्ञान बघारने की बातें, या संसार के ज्ञान की बातें नहीं थीं। वह परमेश्वर के वचन में अपनी ओर से कुछ नहीं जोड़ता था, वचन को रोचक या आकर्षक बनाने के प्रयास नहीं करता था, सांसारिक बातों और ज्ञान को वचन में नहीं मिलाता था; वह केवल वचन के सत्य को प्रकट करता था, और लोगों में शेष कार्य परमेश्वर पवित्र आत्मा करता था (2 कुरिन्थियों 4:2, 6)।
* इसी प्रकार थिस्सलुनीकिया की मसीही मण्डली को पौलुस ने लिखा, क्योंकि हमारा सुसमाचार तुम्हारे पास न केवल वचन मात्र ही में वरन सामर्थ्य और पवित्र आत्मा, और बड़े निश्चय के साथ पहुंचा है; जैसा तुम जानते हो, कि हम तुम्हारे लिये तुम में कैसे बन गए थे। और तुम बड़े क्लेश में पवित्र आत्मा के आनन्द के साथ वचन को मान कर हमारी और प्रभु की सी चाल चलने लगे (1 थिस्स्लुनीकियों 1:5, 6)। यहाँ पर भी हम देखते हैं कि पौलुस द्वारा वचन की शिक्षा मनुष्य के ज्ञान के द्वारा नहीं, वरन, पवित्र आत्मा की सामर्थ्य और बड़ी दृढ़ता से दी गई। साथ ही हम यह भी देखते हैं कि परमेश्वर के वचन का पालन करने में थिस्सलुनीकिया के मसीही विश्वासियों को क्लेश तो उठाना पड़ा, किन्तु साथ ही उनमें पवित्र आत्मा का आनंद भी था, और उनके जीवन में परिवर्तन आया, और वे प्रभु की सी चाल चलने लगे - जो उन्हें मिली वचन की शिक्षा के सच्चे, खरे, और परमेश्वर की ओर से होने का प्रमाण है।
अगले लेख में हम परमेश्वर के वचन से वचन की शिक्षा देने और सम्बन्धित उदाहरणों को, तथा मनुष्यों के जीवन में उस खरी शिक्षा के परिणामों के बारे में कुछ और देखेंगे।
यदि आपने अभी तक प्रभु की शिष्यता को स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी उसके पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। यदि आपने अभी तक नया जन्म, उद्धार नहीं पाया है, प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा नहीं माँगी है, तो अभी आपके पास समय और अवसर है कि यह कर लें। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” परमेश्वर आपके साथ संगति रखने की बहुत लालसा रखता है तथा आपको आशीषित देखना चाहता है, लेकिन इसे सम्भव करना आपका व्यक्तिगत निर्णय है। सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी। क्या आप अभी समय और अवसर होते हुए, इस प्रार्थना को नहीं करेंगे? निर्णय आपका है।
और
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The Church, or, Assembly of Christ Jesus - 58
The Ministry of Teachers (1)
Since the past few articles, we have been seeing from Ephesians 4:11 that for the works and functioning of His Church, the Lord Jesus has set some ministries and appointed some workers for those ministries. We have seen that these ministries are related to the ministry of God’s Word in the Churches. We have also seen that just as the Lord Jesus served as a Teacher, an Evangelist, and through other ministries as well, and so did the Apostles in the first Church, similarly one person can serve in more than one ministry. In the last article we had seen about the fifth ministry and its workers, the Teachers and Preachers. Today, from God’s Word, we will look about the Biblical way of teaching God’s Word, and the effects the correct teachings of God’s Word have on the lives of the people.
Let us consider some examples from the Bible:
* When the Lord Jesus taught the people, it was not as the Pharisees and the Scribes used to do; He taught with authority (Matthew 7:28-29; Mark 1:22; Luke 4:32). In other words, the Lord Jesus did not give them any “bookish” teachings or teachings through any human knowledge, but taught with a deep and proper understanding of God’s Word with a sense of being deeply rooted in it. But He also taught them according to the level of understanding of the people - how much and what all they could grasp (Mark 4:33-34). Every Christian Teacher of God’s Word should teach bearing these things in mind.
* Paul reminded the Church or Assembly in Corinth, how he taught them, And I, brethren, when I came to you, did not come with excellence of speech or of wisdom declaring to you the testimony of God. And my speech and my preaching were not with persuasive words of human wisdom, but in demonstration of the Spirit and of power, that your faith should not be in the wisdom of men but in the power of God (1 Corinthians 2:1, 4-5). In other words, under the guidance of the Holy Spirit, the gospel and teachings given by Paul, who was well-learned and very knowledgeable about the Scriptures, were with the power of the Spirit, did not contain any worldly knowledge, nor was it to show-off his own knowledge. Paul never added anything to God’s Word from his own side, nor did he attempt to make the teachings entertaining and attractive through adding frivolous and worldly things. Paul only brought forth the truth of God’s Word, and left it for the Holy Spirit to do the rest amongst the people (2 Corinthians 4:2, 6).
* Similarly, to the Church in Thessalonica, Paul wrote, For our gospel did not come to you in word only, but also in power, and in the Holy Spirit and in much assurance, as you know what kind of men we were among you for your sake. And you became followers of us and of the Lord, having received the word in much affliction, with joy of the Holy Spirit (1 Thessalonians 1:5-6). Here too we see that the teaching of God’s Word by Paul was not casual or according to the ways and knowledge of the world, but through the power of the Holy Spirit in much firmness or assurance. We also see that the Thessalonian Believers had to suffer problems and persecutions in obeying God’s Word, but they also received the joy of the Holy Spirit, their lives were changed, and they sincerely started to follow the Lord - which was the proof of their having received true and factual teachings, from God.
In the next article we will see some more examples and related references of giving the pure teachings of God's Word, and of the effects this has on man's life.
If you have not yet accepted the discipleship of the Lord Jesus, then take a decision in its favor now to secure your eternal life and heavenly blessings. The Lord's security and blessings are present where there is obedience of the Lord, where His Word is honored and followed. If you are still not Born Again, have not obtained salvation, or have not asked the Lord Jesus for forgiveness for your sins, then you have the time and opportunity to do so right now. Ask the Lord Jesus to forgive your sins, and voluntarily and sincerely surrender yourselves into His hands - this is the only way to salvation and heavenly life. All you have to do is say a short prayer, voluntarily and with a sincere heart, with heartfelt repentance for your sins, and a fully submissive attitude. You can do this in this manner, “Lord Jesus, I confess that I have disobeyed You, and have knowingly or unknowingly, in mind, in thought, in attitude, and in deeds, committed sins. I believe that you have fully borne the punishment of my sins by your sacrifice on the cross, and have paid the full price of those sins for all eternity. Please forgive my sins, change my heart and mind towards you, and make me your disciple, take me with you." God longs for your company and wants to see you blessed, but to make this possible, is your personal decision. One prayer said with a sincere and surrendered heart will turn your present and future, your life here on earth and in the next world, forever and make you heavenly and blessed. Will you not say this prayer now, while you have the time and opportunity to do so? The decision is yours.
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