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बुधवार, 9 मार्च 2011

व्यवस्था से परे जीवन

एक हीरे की अंगूठी चोरी हो गई। पुलिस ने तलाश आरंभ करी और चोर की शिनाखत भी हो गई, लेकिन पुलिस किसी को पकड़ कर बन्द नहीं कर पाई। चोर के विवरण में पुलिस ने लिखा कि "वह कद में छोटा, तेज़ दौड़ने वाला और बड़ी चतुराई और खामोशी से चल सकने वाला है।" वास्तव में चोर एक सात महीने का बिल्ली का बच्चा था, और उसकी पहिचान धातु पहिचानने वाले यंत्र को उसके शरीर पर घुमाने से हुई और जब उसका एक्स-रे किया गया तो बात प्रमाणित हो गई। क्योंकि बिल्लियां और जानवर कानून से परे होते हैं, उसे चोरी के जुर्म में गिरफतार नहीं किया जा सका।

ऐसा ही कुछ मसीही विश्वासी और परमेश्वर की व्यवस्था के संबंध के साथ भी है। रोमियों के आठवें अध्याय में पौलुस बताता है कि मसीही विश्वासी पर कभी स्वर्गीय न्यायालय में नरक के लिये दोषी ठहराये जाने के लिये मुकद्दमा नहीं होगा। रोमियों ४:८ पौलुस कहता है " धन्य है वह मनुष्य जिसे परमेश्वर पापी न ठहराए" और ऐसे धन्य मनुष्य के लिये वह प्रश्न पूछता है "परमेश्वर के चुने हुओं पर दोष कौन लगाएगा? परमेश्वर वह है जो उनको धर्मी ठहराने वाला है।" (रोमियों ८:३३)

इसका यह तात्पर्य नहीं है कि क्योंकि मसीही विश्वासी पर व्यवस्था लागू नहीं होती इसलिये वह मनमर्ज़ी करने को स्वतंत्र है और उसका कोई हिसाब नहीं लेगा। मसीही विश्वासी व्यवस्था से परे है क्योंकि मसीह का क्रूस उनकी नरक के अनन्त दण्ड से रक्षा करता है, लेकिन साथ ही यही क्रूस उन्हे मसीह के समान जीने के लिये भी कहता है तथा यह भी कि उनके मसीही जीवन के कार्यों का हिसाब परमेश्वर अवश्य लेगा। " क्‍योंकि अवश्य है, कि हम सब का हाल मसीह के न्याय आसन के साम्हने खुल जाए, कि हर एक व्यक्ति अपने अपने भले बुरे कामों का बदला जो उस ने देह के द्वारा किए हों पाए।" (२ कुरिन्थियों ५:१०) "क्‍योंकि वह समय आ पहुंचा है, कि पहिले परमेश्वर के लोगों का न्याय किया जाए, और जब कि न्याय का आरम्भ हम ही से होगा तो उन का क्‍या अन्‍त होगा जो परमेश्वर के सुसमाचार को नहीं मानते?" (१ पतरस ४:१७)

यदि हम पाप के विष्य में लापरवाह होंगे तो अवश्य ही अपनी अनुशासनहीनता के लिये दुख उठाएंगे, और स्वर्ग में मिलने वाले अपने प्रतिफलों का नुकसान उठाएंगे। परन्तु परमेश्वर का धन्यवाद हो कि हम कभी नरक के दण्ड के भागी नहीं होंगे - प्रभु यीशु ने हमें व्यवस्था के श्राप और नरक के दण्ड से बचा लिया है। - मार्ट डी हॉन


जब हम मसीह के गुणों के कारण धर्मी ठहराए जाते हैं, तो मसीह में होकर परमेश्वर हमें निर्दोष देखता है।

परमेश्वर के चुने हुओं पर दोष कौन लगाएगा? परमेश्वर वह है जो उनको धर्मी ठहराने वाला है। - रोमियों ८:३३


बाइबल पाठ: रोमियों ८:२९-३९

क्‍योंकि जिन्‍हें उस ने पहिले से जान लिया है उन्‍हें पहिले से ठहराया भी है कि उसके पुत्र के स्‍वरूप में हों ताकि वह बहुत भाइयों में पहिलौठा ठहरे।
फिर जिन्‍हें उस ने पहिले से ठहराया, उन्‍हें बुलाया भी, और जिन्‍हें बुलाया, उन्‍हें धर्मी भी ठहराया है, और जिन्‍हें धर्मी ठहराया, उन्‍हें महिमा भी दी है।
सो हम इन बातों के विषय में क्‍या कहें यदि परमेश्वर हमारी ओर है, तो हमारा विरोधी कौन हो सकता है?
जिस ने अपने निज पुत्र को भी न रख छोड़ा, परन्‍तु उसे हम सब के लिये दे दिया: वह उसके साथ हमें और सब कुछ क्‍योंकर न देगा?
परमेश्वर के चुने हुओं पर दोष कौन लगाएगा परमेश्वर वह है जो उनको धर्मी ठहराने वाला है।
फिर कौन है जो दण्‍ड की आज्ञा देगा मसीह वह है जो मर गया वरन मुर्दों में से जी भी उठा, और परमेश्वर की दाहिनी ओर है, और हमारे लिये निवेदन भी करता है।
कौन हम को मसीह के प्रेम से अलग करेगा? क्‍या क्‍लेश, या संकट, या उपद्रव, या अकाल, या नंगाई, या जोखिम, या तलवार?
जैसा लिखा है, कि तेरे लिये हम दिन भर घात किए जाते हैं; हम वध होने वाली भेंडों की नाई गिने गए हैं।
परन्‍तु इन सब बातों में हम उसके द्वारा जिस ने हम से प्रेम किया है, जयवन्‍त से भी बढ़कर हैं।
क्‍योंकि मैं निश्‍चय जानता हूं, कि न मृत्यु, न जीवन, न स्‍वर्गदूत, न प्रधानताएं, न वर्तमान, न भविष्य, न सामर्थ, न ऊंचाई,
न गहिराई और न कोई और सृष्‍टि, हमें परमेश्वर के प्रेम से, जो हमारे प्रभु मसीह यीशु में है, अलग कर सकेगी।

एक साल में बाइबल:
  • व्यवस्थाविवरण ८-१०
  • मरकुस ११:१९-३३

मंगलवार, 8 मार्च 2011

प्रेम की व्यवस्था

एक दम्पति साथ तो रहते थे परन्तु उनमें आपसी प्रेम नहीं था। उनका साथ रहना प्रेम का नहीं वरन एक दम्पति का बन्धन था। पति बहुत कठोर और हावी होकर रहने वाला था। उसने अपनी पत्नि के पालन करने के लिये एक सूचि बना कर उसे दे दी। उसने पत्नि को मजबूर किया कि वह उस सूचि को प्रतिदिन पढ़े और पूरी तरह से उसका पालन करे। पत्नि को प्रातः कब उठना है, कब पति के लिये कैसा भोजन तैयार करना और परोसना है, घर का काम और देखभाल कब और कैसे करनी है आदि सब उस सूचि में दर्ज था और पत्नि को कोई काम उस सूची से बाहर या निर्धारित रीति के अलावा करने की अनुमति नहीं थी। पत्नि इसी तरह पिसती हुई समय बिताती रही।

कुछ समय पश्चात पति की मृत्यु हो गई और तब पत्नि पति की उस नियमों की व्यवस्था से स्वतंत्र हो सकी। एक मनुष्य ने उस स्त्री को चाहा और उससे शादी कर ली। यह नया पती अपनी पत्नि की खुशी के लिये यथासंभव करता और अपने प्रेम तथा उसके प्रति अपनी प्रशंसा से लगातार उसे अवगत कराता रहता। पत्नि भी पति का प्रेम पाकर अपने पति को प्रसन्न रखने के लिये अपनी ओर से जो कुछ बन पड़ता करती रहती। एक दिन घर की सफाई करते हुए, एक दराज के कोने में पड़ी उसे अपने पहले पति द्वारा दी गई सूचि मिली। उसने उस सूचि को फिर से पढ़ा, और उसे एहसास हुआ कि अब भी वह अपने पति के लिये वही सब कुछ कर रही है जो उसके पहले पति ने उस सूची में लिख कर उसे दिया था; फर्क केवल यह था कि अब वह किसी मजबूरी या दबाव में नहीं वरन अपने पति के प्रेम के प्रत्युत्तर में दिल से और खुशी से करती थी कि उसका पति प्रसन्न रहे।

प्रभु यीशु ने भी हमसे पहले प्रेम किया, इतना प्रेम कि हमारी पाप की दशा में भी हमारे लिये अपनी जान दे दी जिससे कि हम पाप से स्वतंत्र हो सकें। हम अब प्रभु पर विश्वास करके, नियमों की व्यवस्था से स्वतंत्र होकर उसके प्रेम के प्रत्युत्तर में किसी मजबूरी से या रीति निभाने के लिये नहीं, परन्तु प्रेम में होकर उसकी सेवा और आराधना करते हैं। यही प्रेम की व्यवस्था है। - रिचर्ड डी हॉन


व्यवस्था की आधीनता में मसीह की सेवा कर्तव्य निभाना है, प्रेम की आधीनता में आनन्द है।

क्‍योंकि मसीह का प्रेम हमें विवश कर देता है... - २ कुरिन्थियों ५:१४


बाइबल पाठ: २ कुरिन्थियों ५:१०-१५

क्‍योंकि अवश्य है, कि हम सब का हाल मसीह के न्याय आसन के साम्हने खुल जाए, कि हर एक व्यक्ति अपने अपने भले बुरे कामों का बदला जो उस ने देह के द्वारा किए हों पाए।
सो प्रभु का भय मानकर हम लोगों को समझाते हैं और परमेश्वर पर हमारा हाल प्रगट है और मेरी आशा यह है, कि तुम्हारे विवेक पर भी प्रगट हुआ होगा।
हम फिर भी अपनी बड़ाई तुम्हारे साम्हने नहीं करते वरन हम अपने विषय में तुम्हें घमण्‍ड करने का अवसर देते हैं, कि तुम उन्‍हें उत्तर दे सको, जो मन पर नहीं, वरन दिखवटी बातों पर घमण्‍ड करते हैं।
यदि हम बेसुध हैं, तो परमेश्वर के लिये और यदि चैतन्य हैं, तो तुम्हारे लिये हैं।
क्‍योंकि मसीह का प्रेम हमें विवश कर देता है इसलिये कि हम यह समझते हैं, कि जब एक सब के लिये मरा तो सब मर गए।
और वह इस निमित्त सब के लिये मरा, कि जो जीवित हैं, वे आगे को अपके लिये न जीएं परन्‍तु उसके लिये जो उन के लिये मरा और फिर जी उठा।

एक साल में बाइबल:
  • व्यवस्थाविवरण ५-७
  • मरकुस ११:१-१८

"व्यवस्था का उद्देश्य" पर अनवर जमाल जी की टिपणी के सन्दर्भ में

अन्वर जमाल साहब,
आपकी टिप्पणी के लिये धन्यवाद। आपकी टिप्पणी में कही गई बातों में कुछ सच है, कुछ अन्समझा है और कुछ गलत। इन तीनों को बाइबल की कुछ सच्चाईयों के सन्दर्भ में समझाने की कोशिश करता हूं, आशा है कि कामयाब हो पाऊंगा।

१. सच यह है कि प्रभु यीशु मसीह और उनके चेले व्यवस्था का पालन करते थे।

प्रभु यीशु का दावा था कि वे व्यवस्था को हटाने नहीं वरन उसे पूरा करने आए हैं। व्यवस्था को सही और सच्चे दिली तौर से पूरा कर पाना किसी भी इन्सान के लिये असंभव है; और जब तक व्यवस्था पूरी नहीं होती वह लागू भी रहती, क्योंकि परमेश्वर की कही कोई बात पूरी हुए बिना रह नहीं सकती। प्रभु यीशु मसीह ने, जो व्यवस्था का देने वाला है, व्यवस्था को सही और सच्चे दिली तौर से पूरा किया और उसकी जगह परमेश्वर की आज्ञाकारिता और उसे प्रसन्न करने की एक आसान और कारगर विधी दी जो किसी नियम - कानून के पालन के बन्धनों द्वारा नहीं वरन मसीह में विश्वास और प्रेम द्वारा है।


. अन्समझा यह है कि वे, यानि मसीह और उनके चेले, ऐसा क्यों करते थे और व्यवस्था क्यों दी गई?

मसीह ने व्यवस्था का पालन किया परमेश्वर के वचन को पूरा करने और उद्धार का मार्ग देने के लिये। आरंभ में उनके चेलों के पास भी परमेश्वर के वचन के पालन के लिये केवल व्यवस्था ही थी। मसीह के क्रूस पर चढ़ाकर मारे जाने और फिर तीसरे दिन जी उठने से पहले, यहूदी लोगों के पास परमेश्वर की आज्ञाकारिता का कोई और माध्यम नहीं था। व्यवस्था मसीह के आने तक मसीह की पहिचान कराने और परमेश्वर के लोगों को मसीह के लिये संभाल कर रखने के लिये एक शिक्षक के समान थी। मसीह के जी उठने के बाद व्यवस्था पूरी हो गई और परमेश्वर तक पहुंचने की राह मसीह में होकर बन गई - न केवल यहूदियों के लिये वरन किसी भी धर्म - जाति - समाज - स्थान के दायरों से परे समस्त मानव जाति के लिये भी। उसके बाद चेले भी व्यवस्था का नहीं वरन मसीह में मिले अनुग्रह का पालन करने लगे, जो अपने आप में व्यवस्था का दिल से पालन करने के समान था।

व्यवस्था का उद्देश्य कभी उद्धार देना नहीं था, व्यवस्था परमेश्वर की पवित्रता और मनुष्यों की पापमय दशा को पहिचानने के लिये परमेश्वर द्वारा मनुष्यों को दिया गया एक पैमाना या नापने का ज़रिया है। "व्यवस्था का उद्देश्य" ब्लॉग के लेख में तीन उदाहरणों से इसी बात को साफ किया गया है कि व्यवस्था केवल समस्या की पहिचान करवाती है, व्यवस्था में समस्या का समाधान नहीं है। इसे एक और उदाहरण से समझिये - जैसे एक्स-रे, रक्त जांच आदि के द्वारा रोग की पहिचान होती है इलाज नहीं; जांच के नतीजों द्वारा इलाज निर्धारित होता है लेकिन करी गई जांच अपने आप में दवा या इलाज नहीं है, वैसे ही व्यवस्था के द्वारा हमारे पाप के रोग की पहिचन होती है, उसका इलाज नहीं। पाप का इलाज तो मसीह यीशु ही में है।

व्यवस्था हमें हमारी पापों में गिरी हुई दशा दिखाती है, लेकिन वह न तो हमें पाप करने से रोक पाती है और न किसी पापी को माफी देकर निष्पाप बना सकती है। व्यवस्था पाप के लिये पापी को सिर्फ सज़ा का हकदार बता सकती है। मनुष्य के हर पाप के लिये व्यवस्था के पास सिर्फ सज़ा है और सज़ा की दहशत है। इसलिये व्यवस्था पर बने रहने वाला मनुष्य परमेश्वर की आज्ञाकारिता परमेश्वर के लिये अपने प्रेम के अन्तर्गत नहीं वरन सज़ा से बचने के डर से करता रहता है।

व्यवस्था के साथ एक और मुश्किल यह है कि जो कोई व्यवस्था के साथ जीना चाहता है, वो अगर एक भी बात में गलती से भी चूक गया तो फिर वह पूरी व्यवस्था का दोषी और सज़ा का हकदार ठहरता है; जैसे साफ श्वेत चादर पर यदि एक छोटे भाग में ही कीचड़ का दाग़ क्यों न लग जाए, गन्दी पूरी चादर ही मानी जाती है। इसलिये सारी उम्र व्यवस्था का पालन करते रहो और आखिर में आकर किसी एक बात में चूक जाओ तो पिछला सारा हिसाब खत्म हो जाता है, सिर्फ सज़ा सामने रह जाती है।

एक और अहम बात समझने की आवश्यक्ता है - व्यवस्था में दी गई शिक्षाएं, विधियां और रीतियां आदि, सभी आने वाले उद्धारकर्ता अर्थात प्रभु यीशु मसीह के जीवन और कार्यों का पूर्वावलोकन था, एक इशारों में कही गई बात थी जिसे मसीह ने आकर स्पष्ट तथा सजीव किया। इसीलिये मसीह व्यवस्था की परिपूर्णता और सजीव स्वरूप है, और अब उस पुराने छाया समान स्वरूप, अर्थात विधियों की व्यवस्था के स्थान पर वह अपने सजीव और सदा विद्यमान स्वरूप को हमें पालन करने के लिये देता है। इसीलिये जो मसीह और मसीह की शिक्षाओं का पालन करते हैं वे व्यवस्था का भी पालन करते हैं। जो बात व्यवस्था अपने लिखित स्वरूप में करने में असमर्थ थी - अर्थात प्रेम, अनुग्रह और क्षमा; वह मसीह के सजीव स्वरूप में समर्थ हो गई। अब विधियों का लेख तो हमारे सामने से हट गया लेकिन परमेश्वर की व्यवस्था अपने सच्चे और खरे स्वरूप में अभी भी पालन के लिये विद्यमान है। अब उसमें अर्थात मसीह रूपी व्यवस्था में दण्ड की आज्ञा नहीं वरन प्रेम, अनुग्रह और क्षमा है, पाप की माफी है, पाप करने की प्रवृति पर विजयी हो पाने की सामर्थ देने की क्षमता है।


३. गलत है आपका कहना कि "इसीलिए पॉल की उनसे नहीं बनी और उसने अपने मत को अन्य जातियों के लिए आसान बनाने की खातिर व्यवस्था को निरस्त घोषित कर दिया। जिसका कि उन्हें कोई अधिकार न था।"

पूरी बाइबल परमेश्वर का वचन है, मसीह का वचन है - पौल (या पौलूस) द्वारा लिखी हुई किताबें भी। पूरी बाइबल में सबसे ज़्यादा किताबें पौल ही की लिखी हुई हैं और बाकी सभी किताबों की तरह पौल के लिखी किताबें भी परमेश्वर की आत्मा की प्रेरणा ही से लिखी गईं हैं। पौल ने कभी अपनी किसी किताब में व्यवस्था को अनुचित, बुरा या गलत नहीं बताया। पौल मसीह के आरंभिक चेलों में से नहीं था। पौल मसीही विश्वास में बाद में आया, पहले वो मसीहीयों के विरुद्ध आवाज़ बुलन्द करके उन्हें सताने वाला यहूदी हुआ करता था, जो बड़ी कड़ाई से व्यवस्था का पालन करता था। एक बार जब वह स्वयं व्यवस्था के असली और सही उद्देश्य को मसीही विश्वास में आने के द्वारा पहिचान गया तो फिर उसके बाद उसने हमेशा व्यवस्था के इसी सही और सच्चे उद्देश्य को पहिचानने और मसीह में होकर संसार के हरेक पापी को मिलने वाले अनुग्रह, क्षमा और उद्धार की सच्चाई का बयान किया। मसीही विश्वास में आने के बाद भी उसने हमेशा व्यवस्था को पूरा आदर और सम्मान दिया। पौल ने व्यवस्था के उल्लंघन करने की नहीं वरन मसीह में होकर व्यवस्था के पालन ही की शिक्षा दी।

न तो पौल ने कभी कोई "अपना मत" चलाने की कोशिश करी और न ही उसने परमेश्वर से मिली शिक्षाओं को "अन्य जातियों के लिए आसान बनाने की खातिर व्यवस्था को निरस्त घोषित कर दिया"। उसने हमेशा मसीह ही को आगे रखा और उसके समय के मसीह के बाकी चेलों ने भी उसका साथ दिया, उसकी शिक्षाओं को माना, उनका समर्थन किया और उन्हें सही बताया। बाइबल में कहीं यह नहीं दर्शाया गया कि पौल ने कोई अलग मत स्थापित करने का प्रयास किया अथवा वह मसीह के अन्य चेलों से अलग चला हो या मसीह के अन्य चेलों ने उसे कभी गलत बताया हो।

किसी मनुष्य को यह अधिकार नहीं कि वो परमेश्वर की शिक्षाओं और उसकी किसी बात में कोई फेरबदल कर सके और उसकी बातों को "आसान" बनाने के लिये उनमें मिलावट कर सके। पौल की लिखी किताबों का परमेश्वर के वचन बाइबल में सम्मिलित होना ही इस बात का प्रमाण है कि उसकी द्वारा लिखित बातें और शिक्षाएं सही, जायज़ और परमेश्वर के मन के अनुसार हैं।

आशा है कि मैं व्यवस्था पालन को लेकर आपकी चिंताओं का निवारण करने में सफल रहा हूँ।

धन्यवाद,
रोज़ की रोटी

सोमवार, 7 मार्च 2011

व्यवस्था का उद्देश्य

व्यवस्था ने न कभी किसी का उद्धार किया है न कभी कर सकती है। परमेश्वर ने व्यवस्था हमें पाप से छुड़ाने के लिये नहीं वरन पाप का बोध कराने और पाप से उद्धार की हमारी आवश्यक्ता को हमपर प्रगट करने के लिये दिया। इसीलिये प्रेरित पौलुस व्यवस्था को "शिक्षक" की संज्ञा देता है।

सुसमाचार प्रचारक फ्रेड ब्राउन ने अपने एक अविस्मरणीय प्रचार में व्यवस्था के उद्देश्य की व्याख्या तीन उदाहरणों से करी। व्यवस्था के उद्देश्य के लिये उसने सबसे पहला उदाहरण दिया एक छोटे दर्पण का जिसका उपयोग दन्तचिकित्सक मुंह के अन्दर का हाल जानने के लिये करते हैं। उस दर्पण के माध्यम से वे दांतों की सड़ाहट और दांतों में हुए छेदों को देख सकते हैं, लेकिन वह दर्पण न तो सड़े दांत निकाल सकता है और न ही उनका कोई उपचार कर सकता है। दर्पण केवल व्याधि को दिखा सकता है, उसका उपचार नहीं कर सकता।

ब्राउन ने व्यवस्था के उद्देश्य के लिये दूसरा उदाहरण टॉर्च से दिया। यदि रात में घर का फ्यूज़ उड़ जाए और घर की बिजली चली जाने से अनधकार हो जाए तो अन्धकार में टॉर्च के सहारे आप फ्यूज़ बॉक्स तक पहुंच सकते हैं और उड़े हुए फ्यूज़ के तार को देख सकते हैं, लेकिन उस तार को निकाल कर आप उसकी जगह टॉर्च को नहीं लगा सकते; वहां तो आपको फ्यूज़ का नया तार ही लगाना पड़ेगा, तब ही घर फिर से रौशन हो सकेगा। टॉर्च समस्या दिखा सकती है, उसका समाधान नहीं कर सकती।

व्यवस्था के उद्देश्य के लिये तीसरा उदाहरण ब्राउन ने दिया उस सीध नापने वाली डोर से जिसका उपयोग राजमिस्त्री भवन बनाते समय दीवार की सीध देखने के लिये करते हैं। यह डोर दिखा तो सकती है कि दीवार सीधी बन रही है या नहीं, परन्तु यदि दीवार में कोई टेढ़ापन है तो डोर उसे दूर नहीं कर सकती; यह सुधारने का काम तो राजमिस्त्री को ही करना होता है।

दर्पण, टॉर्च और सीध नापने वाली डोर की तरह व्यवस्था भी समस्या, अर्थात पाप की पहचान करवाती है, किंतु वह समस्या का निवारण नहीं कर सकती। पाप की समस्या का निवारण तो केवल प्रभु यीशु मसीह में है, और वही एकमात्र उद्धारकर्ता है जिसने व्यव्स्था की हर बात को पूरा करके क्रूस अपने बलिदान द्वारा समस्त मानव जाति के लिये उद्धार का मार्ग खोल दिया और अब कोई भी उसपर सहज विश्वास द्वारा, बिना किसी रीति रिवाज़ों, कार्यों अथवा व्यवस्था के पालन की समस्या में उलझे, अपने पापों से मुक्ति और उद्धार पा सकता है। - डेव एगनर


व्यवस्था हमें हमारी वह आवश्यक्ता दिखाती है जिसे केवल परमेश्वर का अनुग्रह पूरी कर सकता है।

इसलिये व्यवस्था मसीह तक पहुंचाने को हमारा शिक्षक हुई है, कि हम विश्वास से धर्मी ठहरें। - गलतियों ३:२४


बाइबल पाठ: गलतियों ३:१९-२९

तब फिर व्यवस्था क्‍या रही? वह तो अपराधों के कारण बाद में दी गई, कि उस वंश के आने तक रहे, जिस को प्रतिज्ञा दी गई थी, और वह स्‍वर्गदूतों के द्वारा एक मध्यस्थ के हाथ ठहराई गई।
मध्यस्थ तो एक का नहीं होता, परन्‍तु परमेश्वर एक ही है।
तो क्‍या व्यवस्था परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं के विरोध में है? कदापि न हो क्‍योंकि यदि ऐसी व्यवस्था दी जाती जो जीवन दे सकती, तो सचमुच धामिर्कता व्यवस्था से होती।
परन्‍तु पवित्र शास्‍त्र ने सब को पाप के आधीन कर दिया, ताकि वह प्रतिज्ञा जिस का आधार यीशु मसीह पर विश्वास करना है, विश्वास करने वालों के लिये पूरी हो जाए।
पर विश्वास के आने से पहिले व्यवस्था की आधीनता में हमारी रखवाली होती थी, और उस विश्वास के आने तक जो प्रगट होने वाला था, हम उसी के बन्‍धन में रहे।
इसलिये व्यवस्था मसीह तक पहुंचाने को हमारा शिक्षक हुई है, कि हम विश्वास से धर्मी ठहरें।
परन्‍तु जब विश्वास आ चुका, तो हम अब शिक्षक के आधीन न रहे।
क्‍योंकि तुम सब उस विश्वास करने के द्वारा जो मसीह यीशु पर है, परमेश्वर की सन्‍तान हो।
और तुम में से जितनों ने मसीह में बपतिस्मा लिया है उन्‍होंने मसीह को पहिन लिया है।
अब न कोई यहूदी रहा और न यूनानी; न कोई दास, न स्‍वतंत्र; न कोई नर, न नारी; क्‍योंकि तुम सब मसीह यीशु में एक हो।
और यदि तुम मसीह के हो, तो इब्राहीम के वंश और प्रतिज्ञा के अनुसार वारिस भी हो।

एक साल में बाइबल:
  • व्यवस्थाविवरण ३-४
  • मरकुस १०:३२-५२

रविवार, 6 मार्च 2011

व्यवस्था का पालन

नियम ही नियमों का उल्लंघन करने को उभारते हैं! किसी बच्चे से कहिये कि वह "उस रखी हुई मिठाई को न खाए" - क्या होगा? वह ललचाई नज़रों से उस मिठाई की ओर देखता रहेगा और फिर लालच में पड़कर मिठाई को खा ही लेगा। यदि उसे जता कर मना नहीं किया गया होता तो शायद वह कभी मिठाई की ओर देखता भी नहीं।

परमेश्वर के पवित्र नियमों के प्रति हमारा भी ऐसा ही बर्ताव होता है। जिन बातों से हमें बचाने के लिये ये नियम दिये गये, उन्हीं बातों को करने के लिये वे हमें उकसा देते हैं। यह इसलिये होता है क्योंकि "पाप और मृत्यु की व्यवस्था" (रोमियों ८:२) हमारे शरीरों में कार्य करती है। पौलुस कहता है कि "...बिना व्यवस्था के मैं पाप को नहीं पहिचानता: व्यवस्था यदि न कहती, कि लालच मत कर तो मैं लालच को न जानता। परन्‍तु पाप ने अवसर पाकर आज्ञा के द्वारा मुझ में सब प्रकार का लालच उत्‍पन्न किया, क्‍योंकि बिना व्यवस्था के पाप मुर्दा है।" (रोमियों ७:७, ८) उस मनाही ने ही मन में सब प्रकार की बुराई को अवसर दिया। परमेश्वर की व्यवस्था तो भली है, पवित्र है, आत्मिक है परन्तु व्यवस्था आज्ञाकारी बनाने में असमर्थ है। व्यव्स्था सही मार्ग को बता तो सकती है, और बताती भी है; पर उस मार्ग पर चलने की सामर्थ नहीं दे सकती। और इसीलिए, मार्ग जानने के बाद भी मार्ग पर न चल पाने के कारण हम व्यवस्था के दोषी ठहरते हैं।

तो कैसे फिर हम परमेश्वर की व्यवस्था का पालन कर सकते हैं, यदि व्यवस्था ही हमें दोषी ठहरा देती है? - प्रभु यीशु मसीह में होकर जो हमें सामर्थ और स्वतंत्रता देता है "सो अब जो मसीह यीशु में हैं, उन पर दण्‍ड की आज्ञा नहीं: क्‍योंकि वे शरीर के अनुसार नहीं वरन आत्मा के अनुसार चलते हैं। क्‍योंकि जीवन की आत्मा की व्यवस्था ने मसीह यीशु में मुझे पाप की, और मृत्यु की व्यवस्था से स्‍वतंत्र कर दिया।" (रोमियों ८:१, २)

इसे इस प्रकार समझिये - वायुयान गुरुत्वाकर्षण की व्यवस्था से बंधा ज़मीन पर रहता है। किंतु जब वह उड़नपट्टी पर वेग से चलना आरंभ करता है तो उसके एक गति को पार करने से वायु प्रवाह और उड़ान के नियमों कि व्यवस्था गुरुत्वाकर्षण के नियमों की व्यवस्था के ऊपर लागू हो जाते हैं और विमान उड़ने लगता है। जब तक वह वायु प्रवाह और उड़ान के नियमों के आधीन होकर उनका पालन करेगा, वह गुरुत्वाकर्षण के नियमों के ऊपर विजयी रहेगा, जैसे ही उड़ान के नियमों का उल्लंघन होगा, गुरुत्वाकर्षण के नियम उसे फिर पृथ्वी पर ले आएंगे। इसी प्रकार जब हम मसीह की आधीनता में हो जाते हैं वह हमें अपने आत्मा द्वारा सामर्थ देता है कि हम पाप और मृत्यु की व्यवस्था के ऊपर जयवंत हो सकें "पर मैं कहता हूं, आत्मा के अनुसार चलो, तो तुम शरीर की लालसा किसी रीति से पूरी न करोगे। क्‍योंकि शरीर आत्मा के विरोध में लालसा करती है, और ये एक दूसरे के विरोधी हैं; इसलिये कि जो तुम करना चाहते हो वह न करने पाओ। और यदि तुम आत्मा के चलाए चलते हो तो व्यवस्था के आधीन न रहे।" (गलतियों ५:१६-१८)

क्‍योंकि परमेश्वर ने हमें भय की नहीं पर सामर्थ, और प्रेम, और संयम की आत्मा दी है। - डेनिस डी हॉन


पाप और मृत्यु की व्यवस्था के अंधेरे में भटकने वालों को प्रभु का अनुग्रह जीवन की ज्योति में ले चलता है।

क्‍योंकि जीवन की आत्मा की व्यवस्था ने मसीह यीशु में मुझे पाप की, और मृत्यु की व्यवस्था से स्‍वतंत्र कर दिया। - रोमियों ८:२


बाइबल पाठ: रोमियों ८:१-११

सो अब जो मसीह यीशु में हैं, उन पर दण्‍ड की आज्ञा नहीं: क्‍योंकि वे शरीर के अनुसार नहीं वरन आत्मा के अनुसार चलते हैं।
क्‍योंकि जीवन की आत्मा की व्यवस्था ने मसीह यीशु में मुझे पाप की, और मृत्यु की व्यवस्था से स्‍वतंत्र कर दिया।
क्‍योंकि जो काम व्यवस्था शरीर के कारण र्दुबल होकर न कर सकी, उस को परमेश्वर ने किया, अर्थात अपने ही पुत्र को पापमय शरीर की समानता में, और पाप के बलिदान होने के लिये भेजकर, शरीर में पाप पर दण्‍ड की आज्ञा दी।
इसलिये कि व्यवस्था की विधि हम में जो शरीर के अनुसार नहीं वरन आत्मा के अनुसार चलते हैं, पूरी की जाए।
क्‍योंकि शरीरिक व्यक्ति शरीर की बातों पर मन लगाते हैं परन्‍तु आध्यात्मिक आत्मा की बातों पर मन लगाते हैं।
शरीर पर मन लगाना तो मृत्यु है, परन्‍तु आत्मा पर मन लगाना जीवन और शान्‍ति है।
क्‍योंकि शरीर पर मन लगाना तो परमेश्वर से बैर रखना है, क्‍योंकि न तो परमेश्वर की व्यवस्था के अधीन है, और न हो सकता है।
और जो शारीरिक दशा में है, वे परमेश्वर को प्रसन्न नहीं कर सकते।
परन्‍तु जब कि परमेश्वर का आत्मा तुम में बसता है, तो तुम शारीरिक दशा में नहीं, परन्‍तु आत्मिक दशा में हो। यदि किसी में मसीह का आत्मा नहीं तो वह उसका जन नहीं।
और यदि मसीह तुम में है, तो देह पाप के कारण मरी हुई है; परन्‍तु आत्मा धर्म के कारण जीवित है।
और यदि उसी का आत्मा जिस ने यीशु को मरे हुओं में से जिलाया तुम में बसा हुआ है तो जिस ने मसीह को मरे हुओं में से जिलाया, वह तुम्हारी मरणहार देहों को भी अपने आत्मा के द्वारा जो तुम में बसा हुआ है जिलाएगा।

एक साल में बाइबल:
  • व्यवस्थाविवरण १-२
  • मरकुस १०:१-३१

शनिवार, 5 मार्च 2011

व्यवस्था की समस्या

अमेरिका के आयकर विभाग में २५ वर्ष से कार्यरत एक अधिकारी को अपने आयकर की चोरी करने के लिये पकड़ा गया। जब यह खबर फैली, लगभग उसी समय समाचार पत्रों में एक और खबर भी प्रमुख रूप से प्रकाशित हुई - अपराधी मामलों का न्याय करने वाले कुछ न्यायाधिशों के अनैतिक चालचलन और बेईमानियों के बारे में। समाचार पत्रों ने समाज के समक्ष सवाल उठाया "न्यायियों का न्याय कौन करेगा?"

व्यवस्था और नियमों से भली भांति अवगत लोगों द्वारा व्यवस्था और नियमों का उल्लंघन केवल आयकर विभाग के अधिकारियों और न्यायाधीशों तक ही सीमित नहीं है। एक ऐसी भी व्यवस्था है जिसका उल्लंघन प्रत्येक व्यक्ति ने किया है - परमेश्वर की व्यवस्था। लेकिन इससे भी गंभीर बात यह है कि कुछ स्वधर्मी लोग परमेश्वर की व्यवस्था का उल्लंघन करने वाले होकर के भी उसका पालन करने के अपने अनुचित दावे में घमंड करते हैं। बिना शक, जिस व्यवस्था का पालन करने का वे दावा करते हैं, वही व्यवस्था उन्हें दोषी ठहराती है, उनके असली चेहरे को दिखाती है। परमेश्वर की व्यवस्था प्रत्येक स्वधर्मी घमंडी को उसकी वास्तविक्ता - व्यवस्था का उल्लंघन करने वाला के रूप में दिखा देती है। व्यवस्था की समस्या यही है कि व्यवस्था के नियमों के पालन में एक भी नियम की चूक या उल्लंघन से मनुष्य सारी व्यवस्था का दोषी ठहरता है "सो जितने लोग व्यवस्था के कामों पर भरोसा रखते हैं, वे सब श्राप के आधीन हैं, क्‍योंकि लिखा है, कि जो कोई व्यवस्था की पुस्‍तक में लिखी हुई सब बातों के करने में स्थिर नहीं रहता, वह श्रापित है।" (गलतियों ३:१०) "क्‍योंकि जो कोई सारी व्यवस्था का पालन करता है परन्‍तु एक ही बात में चूक जाए तो वह सब बातों मे दोषी ठहरा।" (याकूब २:१०)

रोमियों को लिखी अपनी पत्री में पौलुस स्पष्ट करता है कि व्यवस्था का उद्देश्य धर्मी ठहराना नहीं वरन परमेश्वर की पवित्रता का ज्ञान कराना और उस पवित्रता का मापदंड हमारे सामने रखना है जिससे हम पाप की पहचान कर सकें "क्‍योंकि व्यवस्था के कामों से कोई प्राणी उसके साम्हने धर्मी नहीं ठहरेगा, इसलिये कि व्यवस्था के द्वारा पाप की पहिचान होती है।" (रोमियों ३:२०) व्यवस्था इसलिये दी गई कि हमारी शिक्षक बन कर हमें मसीह के विश्वास तक लाए "पर विश्वास के आने से पहिले व्यवस्था की अधीनता में हमारी रखवाली होती थी, और उस विश्वास के आने तक जो प्रगट होने वाला था, हम उसी के बन्‍धन में रहे। इसलिये व्यवस्था मसीह तक पहुंचाने को हमारा शिक्षक हुई है, कि हम विश्वास से धर्मी ठहरें।" (गलतियों ३:२३, २४)

परमेश्वर की व्यवस्था का उपयोग कभी स्वधार्मिकता का घमंड संसार के समक्ष बघारने के लिये नहीं किया जाना चाहिये, वरन व्यवस्था का सही उपयोग है कि उसके सम्मुख अपने आप को रखकर हम अपनी पापमय दशा को पहचान सकें और जान सकें कि परमेश्वर की दया और अनुग्रह की हमें कितनी अधिक आवश्यक्ता है। जब हम अपनी स्वधार्मिकता पर नहीं वरन परमेश्वर की दया और अनुग्रह पर आधारित जीवन जीना आरंभ करेंगे, तब ही व्यवस्था की समस्या से मुक्ति पा सकेंगे "परन्‍तु जिस के बन्‍धन में हम थे उसके लिये मर कर, अब व्यवस्था से ऐसे छूट गए, कि लेख की पुरानी रीति पर नहीं, वरन आत्मा की नई रीति पर सेवा करते हैं।" (रोमियों ७:६) - मार्ट डी हॉन


मसीह यीशु में प्रत्येक जन व्यवस्था की समस्या का समाधान पा सकता है।

तू जो व्यवस्था के विषय में घमण्‍ड करता है, क्‍या व्यवस्था न मानकर, परमेश्वर का अनादर करता है? - रोमियों २:२३


बाइबल पाठ: रोमियों ७:१-६

हे भाइयो, क्‍या तुम नहीं जानते, मैं व्यवस्था के जानने वालों से कहता हूं, कि जब तक मनुष्य जीवित रहता है, तक तक उस पर व्यवस्था की प्रभुता रहती है?
क्‍योंकि विवाहिता स्त्री व्यवस्था के अनुसार अपने पति के जीते जी उस से बन्‍धी है, परन्‍तु यदि पति मर जाए, तो वह पति की व्यवस्था से छूट गई।
सो यदि पति के जीते जी वह किसी दूसरे पुरूष की हो जाए, तो व्यभिचारिणी कहलाएगी, परन्‍तु यदि पति मर जाए, तो वह उस व्यवस्था से छूट गई, यहां तक कि यदि किसी दूसरे पुरूष की हो जाए, तौभी व्यभिचारिणी न ठहरेगी।
सो हे मेरे भाइयो, तुम भी मसीह की देह के द्वारा व्यवस्था के लिये मरे हुए बन गए, कि उस दूसरे के हो जाओ, जो मरे हुओं में से जी उठा: ताकि हम परमेश्वर के लिये फल लाएं।
क्‍योंकि जब हम शारीरिक थे, तो पापों की अभिलाषायें जो व्यवस्था के द्वारा थीं, मृत्यु का फल उत्‍पन्न करने के लिये हमारे अंगों में काम करती थीं।
परन्‍तु जिस के बन्‍धन में हम थे उसके लिये मर कर, अब व्यवस्था से ऐसे छूट गए, कि लेख की पुरानी रीति पर नहीं, वरन आत्मा की नई रीति पर सेवा करते हैं।

एक साल में बाइबल:
  • गिनती ३४-३६
  • मरकुस ९:३०-५०

शुक्रवार, 4 मार्च 2011

स्वतंत्र कैसे हों?

हर कोई स्वतंत्रता चाहता है, लेकिन स्वतंत्रता के प्रयत्न कभी कभी बन्धनों में बांध देते हैं। बाइबल शिक्षिका हेन्रियेटा मीयरस सच्ची स्वतंत्रता का भेद जानती थीं। उन्होंने कहा, "पक्षी आकाश में स्वतंत्र है, लेकिन उसी पक्षी को आप पानी में डाल दीजिए और वह अपनी स्वतंत्रता खो देगा। इसी प्रकार एक मसीही विश्वासी भी जब तक परमेश्वर की आज्ञाकरिता में जीता है और परमेश्वर की इच्छा पूरी करता रहता है, स्वतंत्र है। यह परमेश्वर समर्पण का जीवन परमेश्वर की सन्तानों के लिये वैसे ही स्वभाविक है जैसे मछली के लिये जल और पक्षी के लिये आकाश में रहने का जीवन।"

बुद्धिमान राजा सुलेमान ने अपने पुत्र को समझाने के लिये उसे उपदेश दिया कि सच्ची स्वतंत्रता केवल परमेश्वर पर केंद्रित जीवन रीति द्वारा ही संभव है, क्योंकि परमेश्वर ने इसी के लिये ही हमारी सृष्टि करी है। इसकी तुलना में, जो कोई परमेश्वर के इस सत्य के विमुख चलता है, वह अवश्य ही बन्धुवाई में पड़ता है। नीतिवचन का १६वां अध्याय वर्णन करता है उस स्वतंत्रता और सन्तुष्टि का जो नम्रता, विश्वास, आत्म संयम और अच्छे बोल-चाल का पालन करने से मिलती है। साथ ही यह अध्याय चेतावनी भी देता है उस अवश्यंभावी बन्धुवाई के विष्य में जो उन लोगों के जीवन में आ जाती है जो विद्रोह, घमंड, बैर, द्वेष और दूसरों के लिये जानबूझ कर परेशानी खड़ी करने वालों को मिलती है।

बाइबल का नया नियम हमें प्रभु यीशु से परिचय करवाता है - हमारी स्वतंत्रता का एकमात्र आधार। हमारे उस सृष्टिकर्ता और उद्धारकर्ता ने कहा, "...यदि तुम मेरे वचन में बने रहोगे, तो सचमुच मेरे चेले ठहरोगे। और सत्य को जानोगे, और सत्य तुम्हें स्‍वतंत्र करेगा।" (यूहन्ना ८:३१, ३२)

सत्य को जानिये, सत्य ही आपको स्वतंत्र करेगा। - मार्ट डी हॉन


सच्ची स्वतंत्रता अपनी मनमर्ज़ी करने में नहीं वरन परमेश्वर की मर्ज़ी करने में है।

दुष्ट अपने ही अधर्म के कर्मों से फंसेगा, और अपने ही पाप के बन्धनों में बन्धा रहेगा। - नीतिवचन ५:२२

बाइबल पाठ: नीतिवचन १६:१६-३३
बुद्धि की प्राप्ति चोखे सोने से क्या ही उत्तम है! और समझ की प्राप्ति चान्दी से अति योग्य है।
बुराई से हटना सीधे लोगों के लिये राजमार्ग है, जो अपने चालचलन की चौकसी करता, वह अपने प्राण की भी रक्षा करता है।
विनाश से पहिले गर्व, और ठोकर खाने से पहिले घमण्ड होता है।
घमण्डियों के संग लूट बांट लने से, दीन लोगों के संग नम्र भाव से रहना उत्तम है।
जो वचन पर मन लगाता, वह कल्याण पाता है, और जो यहोवा पर भरोसा रखता, वह धन्य होता है।
जिसके ह्रृदय में बुद्धि है, वह समझ वाला कहलाता है, और मधुर वाणी के द्वारा ज्ञान बढ़ता है।
जिसके बुद्धि है, उसके लिये वह जीवन का सोता है, परन्तु मूढ़ों को शिक्षा देना मूढ़ता ही होती है।
बुद्धिमान का मन उसके मुंह पर भी बुद्धिमानी प्रगट करता है, और उसके वचन में विद्या रहती है।
मनभावने वचन मधु भरे छते की नाईं प्राणों को मीठे लगते, और हड्डियों को हरी-भरी करते हैं।
ऐसा भी मार्ग है, जो मनुष्य को सीधा देख पड़ता है, परन्तु उसके अन्त में मृत्यु ही मिलती है।
परिश्रमी की लालसा उसके लिये परिश्रम करती है, उसकी भूख तो उसको उभारती रहती है।
अधर्मी मनुष्य बुराई की युक्ति निकालता है, और उसके वचनों से आग लगा जाती है।
टेढ़ा मनुष्य बहुत झगड़े को उठाता है, और कानाफूसी करने वाला परम मित्रों में भी फूट करा देता है।
उपद्रवी मनुष्य अपने पड़ोसी को फुसला कर कुमार्ग पर चलाता है।
आंख मूंदने वाला छल की कल्पनाएं करता है, और ओंठ दबाने वाला बुराई करता है।
पक्के बाल शोभायमान मुकुट ठहरते हैं; वे धर्म के मार्ग पर चलने से प्राप्त होते हैं।
विलम्ब से क्रोध करना वीरता से, और अपने मन को वश में रखना, नगर के जीत लेने से उत्तम है।
चिट्ठी डाली जाती तो है, परन्तु उसका निकलना यहोवा ही की ओर से होता है।

एक साल में बाइबल:
  • गिनती ३१-३३
  • मरकुस ९:१-२९