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गुरुवार, 23 अप्रैल 2026

Blessed and Successful Life - 77 - Appropriately Handling God’s Word – 22 / आशीषित एवं सफल जीवन – 77 - परमेश्वर के वचन से उचित व्यवहार – 22

 

आशीषित एवं सफल जीवन – 77 - परमेश्वर के वचन के भण्डारी बनो – 62

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परमेश्वर के वचन से उचित व्यवहार – 22

 

हमने 2 कुरिन्थियों 4:2 से देखा था कि उस पद में पौलुस ने परमेश्वर के वचन की अपनी सेवकाई के तीन गुण, और साथ ही अपनी सेवकाई के उद्देश्य भी दिए हैं। ये तीन गुण हैं, उसने लज्जा के गुप्त कामों को त्याग दिया था, वह चतुराई से नहीं चलता था, और परमेश्वर के वचन में कोई मिलावट नहीं करता था। पहले के लेखों में पौलुस की सेवकाई के उद्देश्यों को देखने के बाद, पिछले लेख में हमने पौलुस की सेवकाई के पहले गुण, कि उसने लज्जा के गुप्त कामों को त्याग दिया था, के बारे में देखा था। आज हम इसे आगे ज़ारी रखते हुए इस पद में कहे गए दूसरे गुण के बारे में देखेंगे।


पहला गुण मुख्यतः पौलुस के अतीत, उसके प्रभु यीशु में विश्वास में आने से पूर्व के जीवन के बारे में था। हमने देखा था कि प्रभु यीशु में विश्वास में आने से पहले वह अपनी कुछ बातों और व्यवहार को अपनी धार्मिकता का व्यवहार समझता था’। वह उन बातों पर घमण्ड करता था जिन्हें उसने अपनी शिक्षा और प्रशिक्षण के समय मनुष्यों से, अपने गुरुओं से सीखा था; और बड़ी निष्ठा से उनका पालन किया करता था। उस समय उन्हें वह अपने लिये सद्गुण की, और परमेश्वर के प्रति भक्ति को दिखाने की बातें समझता था। परन्तु प्रभु में विश्वास में आने के बाद, और परमेश्वर से वचन की सही समझ और फिर दर्शनों को पा लेने के बाद, उसका दृष्टिकोण बिल्कुल बदल गया। मनुष्यों की शिक्षाओं पर आधारित दृष्टिकोण को बनाए रखने की बजाए, परमेश्वर और उसके वचन के सही दृष्टिकोण में आने के बाद, वह उन्हीं बातों को “कूड़ा” समझने लगा (फिलिप्पियों 3:7-8)। अब वही बातें उसके लिये लज्जा का कारण थीं; उनके कारण वह अपने आप को संसार का सबसे बड़ा पापी (1 तीमुथियुस 1:15), और प्रेरितों में सबसे छोटा, बल्कि प्रेरित कहलाने के भी अयोग्य समझने लगा (1 कुरिन्थियों 15:8-9)। और इसी कारण उसने अपनी लज्जा कि उन पुरानी बातों को पूर्णतः त्याग दिया, उनसे दूर हो गया। प्रभु और उसके वचन के साथ सही रहने के लिये उसने अपने पूर्व साथियों के बैर और घोर विरोध को भी स्वीकार कर लिया, परन्तु परमेश्वर और उसके वचन से जीवन भर कोई समझौता नहीं किया। उसने अपने जीवन का उद्देश्य मनुष्यों की बातों और विचारों की परवाह किये बगैर, परमेश्वर को प्रसन्न रखना बना लिया (2 कुरिन्थियों 5:9; गलातियों 1:10)।

 

इसके बाद, 2 कुरिन्थियों 4:2 में दिए गये उसके दूसरे और तीसरे गुण उसके जीवन, जैसा जीवन वह तब के लोगों के मध्य जीवन जीता था, और उसकी सेवकाई के बारे में हैं। दूसरे गुण में, पौलुस कहता है कि वह ‘चतुराई से नहीं चलता था।’ अर्थात, वह परमेश्वर के वचन की अपनी सेवकाई को अपनी स्वार्थ-सिद्धि के लिए कदापि उपयोग नहीं करता था; अर्थात् वह पाखण्डी जीवन नहीं जीता था। उसके इस दावे की पुष्टि इस तथ्य से है कि परमेश्वर की सेवा के नाम से पौलुस ने न तो साँसारिक ओहदे या वस्तुओं का कभी कोई लालच किया, और न ही उनके लिए कोई कार्य किया (प्रेरितों 20:33; 1 थिस्सलुनीकियों 1:5; 2:5, 7; 1 थिस्सलुनीकियों 3:7)। इसके विपरीत, अपनी सेवकाई को करते हुए, साथ ही पौलुस अपने जीवन यापन के लिए भी कार्य करता था, कभी किसी पर अपनी आवश्यकताओं के लिए निर्भर नहीं रहा; और अपनी कमाई में से औरों की भी सहायता करता था (प्रेरितों 20:34; 1 कुरिन्थियों 4:12; 1 थिस्सलुनीकियों 2:9)। उसने तो जिन कलीसियाओं में वह सेवा करता था, उनसे कभी वह भी नहीं माँगा जो उसका उपयुक्त बनता था (1 कुरिन्थियों 9:14-15)।


इसकी तुलना में, उस प्राथमिक कलीसिया के समय में ही, ऐसे लोग खड़े हो चुके थे जो परमेश्वर के वचन के प्रचार और शिक्षा को व्यक्तिगत लाभ के लिए उपयोग कर रहे थे (रोमियों 16:18; फिलिप्पियों 3:19), जिसकी पौलुस ने भर्त्सना की। पौलुस ने तिमुथियुस को भी सावधान किया कि, “जो समझते हैं कि भक्ति कमाई का द्वार है” (1 तिमुथियुस 3:19), उन से दूर रहे; तथा तीतुस को निर्देश दिए कि उनके मुँह बंद किए जाने चाहिएँ जो “लोग नीच कमाई के लिये अनुचित बातें सिखा कर घर के घर बिगाड़ देते हैं” (तीतुस 1:11)। पौलुस ने कुरिन्थुस के विश्वासियों को यह स्मरण दिलाया कि वह परमेश्वर के वचन को “बेचता” नहीं था (2 कुरिन्थियों 2:17; इस पद में हिन्दी में जिस शब्द का अनुवाद “मिलावट” या “हेरा-फेरी” किया गया है, मूल यूनानी भाषा के उस शब्द का शब्दार्थ है बेचना, अथवा लाभ के लिए उपयोग करना)। और इफिसुस के मसीही विश्वासियों से अपनी अंतिम विदाई लेते हुए पौलुस उनके सामने एक आदर्श जीवन जीने का दावा कर सका (प्रेरितों 20:18-19)। पौलुस का जीवन सभी के सामने एक ‘खुली-किताब’ था, चाहे वे उसके विरोधी हों अथवा समर्थक, कभी भी कोई भी उस पर साँसारिक वस्तुओं और बातों का लालच करने, उनकी प्राप्ति के लिए अनुचित उद्देश्य और मार्ग रखने, या उन्हें प्राप्त करने के लिए कुछ गलत करने का आरोप नहीं लगा सका। यहाँ तक कि, सँसार से कूच करने की प्रतीक्षा करते हुए, वह बड़े भरोसे के साथ यह कह सका कि जब वह स्वर्ग पहुंचेगा, तो प्रभु के द्वारा उसे ‘धर्म का मुकुट’ दिया जाएगा (2 तीमुथियुस 4:8)।


क्योंकि वह सँसार और सँसार के बातों तथा वस्तुओं से विरक्ति का जीवन जीता था, प्रभु के प्रति पूर्णतः समर्पित, आज्ञाकारी, और प्रतिबद्ध था, किसी भी भौतिक वस्तु या लाभ की लालसा अथवा लालच नहीं करता था, और क्योंकि उसने अपने आत्मिक स्तर एवं अधिकार का कभी भी अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए उपयोग नहीं किया था, इसीलिए परमेश्वर ने उसकी सेवकाई पर आशीष दी और उसे वचन के गूढ़ भेदो के बारे में ऐसी अन्तर्दृष्टि प्रदान की, जैसी किसी और को कभी नहीं मिली थी; और प्रेरित पतरस ने भी यह बात कही (2 पतरस 3:15-16)।


यह वर्तमान में देखे जाने वाले व्यवहार से एक वास्तविक किन्तु अप्रिय तुलना प्रस्तुत करता है। वर्तमान में लोग प्रभु की सेवकाई को न केवल साँसारिक वस्तुएँ, लाभ, और समाज में उच्च स्तर अर्जित करने के तरीके के समान उपयोग करते हैं, वरन उसे सही ठहराने के लिए कई गढ़े हुए तर्क भी देते हैं। उन्हें लोगों के साथ, तथा उन्हें ‘प्रभु की सेवकाई’ के लिए धन एवं संसाधन उपलब्ध करवाने वालों के साथ चतुराई से व्यवहार करने में कोई संकोच नहीं होता है, यद्यपि उपलब्ध करवाई गई वस्तुएँ और संसाधन उनके व्यक्तिगत उपयोग के लिए अधिक और प्रभु के कार्य के लिए कम उपयोग की जाती हैं। हो सकता है कि वे इसके बारे में कुछ तर्क दे सकें और अपने किए को सांसारिक आधार पर उचित भी ठहरा सकें; लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि परमेश्वर का आँकलन, निर्धारण, और न्याय उसके अपने ही मानकों के अनुसार होगा, न कि उन लोगों के अथवा सँसार के मानकों के आधार पर। और तब उन्हें बहुत शर्मिंदा होना पड़ेगा, भारी हानि उठानी पड़ेगी, ऐसी हानि जो न केवल उनके सँसार में कमाए गए उस अनुचित लाभ से कहीं अधिक होगी, बल्कि जो चिर-स्थाई और अनन्तकाल तक बनी रहेगी। अन्ततः, परमेश्वर के नाम में व्यक्तिगत लाभ के लिए चतुराई से चलना और व्यवहार करना उन्हें कल्पना से बाहर हानिकारक और भारी पड़ेगा।


हमारे लिए पाठ यह है कि परमेश्वर के वचन के साथ उचित व्यवहार करने और उसकी सेवकाई करने के लिए, परमेश्वर के प्रत्येक सेवक को, पौलुस के समान, बिना किसी प्रकार की कोई चतुराई के, एक खुली-किताब जैसा जीवन रखना होगा और परमेश्वर के वचन का व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं वरन्   परमेश्वर के राज्य के लाभ के लिए उपयोग करना होगा। अगले लेख में हम तीसरे गुण को देखेंगे।


यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। स्वेच्छा से अपने पापों के लिये पश्चाताप करके, प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु, मैं अपने पापों के लिए पश्चातापी हूँ, उनके लिए आप से क्षमा माँगता हूँ। मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मुझे और मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।


  

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Blessed and Successful Life - 77 - Be Stewards of God’s Word – 62 

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Appropriately Handling God’s Word – 22

 

We have seen that in 2 Corinthians 4:2 Paul has stated three characteristics of his ministry of God’s Word, as well as the purpose of his ministry. These three characteristics are, he had renounced the hidden things of shame, he did not walk in craftiness, and he did not handle the Word of God deceitfully. Having already considered the purposes of Paul’s ministry in earlier articles, in the last article we had considered the first characteristic of Paul’s ministry, that he had renounced the hidden things of shame. Today we will carry on and see the second characteristic mentioned in this verse.


The first characteristic mainly pertained to Paul’s former life, i.e., life before his coming to faith in the Lord Jesus. We had seen that before coming into faith in the Lord Jesus, he used to consider some of his attitudes and behavior as his own works of righteousness. He used to take pride in those things which he had learned from men and from his teachers during the time of his education and training; and he used to follow them with great sincerity. At that time, he considered them to be matters of virtue for himself and of showing devotion toward God. But after coming into faith in the Lord, and after receiving the correct understanding of the Word from God and then visions, his perspective changed completely. After coming into the correct perspective about God and His Word, instead of retaining his perspective based on the teachings of men, he began to consider those very things as “rubbish” (Philippians 3:7-8). Now those same things were a cause of shame for him; because of them, he began to consider himself the greatest sinner in the world (1 Timothy 1:15), and the least among the apostles, rather even unworthy to be called an apostle (1 Corinthians 15:8-9). And for this reason, he completely renounced those previous things of shame and totally turned away from them. To remain right with the Lord and His Word, he accepted even the enmity and fierce opposition of his former companions, but he never made any compromise with God and His Word throughout his life. He made it the purpose of his life to please God, without worrying about what men may think or say (2 Corinthians 5:9; Galatians 1:10).

 

After this, in 2 Corinthians 4:2 are given the second and third characteristics, and these pertain to his life, as he lived it; and his ministry as he carried it out while serving amongst the then people. In the second characteristic, Paul says that he ‘did not walk in craftiness.’ Meaning he did not use his ministry of God’s Word as a means to serve his own ends in the garb of serving God; i.e., he did not live a hypocritical life. An affirmation of this claim was that Paul neither ever coveted, nor ever worked for any worldly position or possessions (Acts 20:33; 1 Thessalonians 1:5; 2:5, 7; 2 Thessalonians 3:7). On the contrary, while carrying on with his ministry, Paul also worked for his living, never being dependent on others to provide for his needs; and, out of his earnings he would help others as well (Acts 20:34; 1 Corinthians 4:12; 1 Thessalonians 2:9). He did not even claim what was his due from the Churches where he ministered (1 Corinthians 9:14-15).


In contrast, as early as at that time of the first Church, already people had come up, using the ministry of preaching and teaching God’s Word, as a means of personal gain (Romans 16:18; Philippians 3:19), which Paul denounced. Paul also cautioned Timothy to stay away from those “who suppose that godliness is a means of gain” (1 Timothy 6:5), and instructed Titus that the mouths of those who were “teaching things which they ought not, for the sake of dishonest gain” should be stopped (Titus 1:11). Paul reminded the Corinthian Believers that he did not go about “peddling the Word of God”, as many were doing (2 Corinthians 2:17); and in his final farewell from the Ephesian Believers, he could claim to have an exemplary lifestyle (Acts 20:18-19). Paul’s life was an ‘open book’ before all, whether his detractors or those in his favor, and none could ever accuse him of any covetousness, inappropriate motives, or wrongdoings for acquiring any worldly status or wealth. So, much so, that awaiting his final departure from the world, he remained very confident that when he reaches heaven he will be rewarded with the crown of righteousness by the Lord (2 Timothy 4:8).


Because he lived this life of remaining detached from the things of this world, a life fully surrendered, obedient, and committed to the Lord, not desiring any temporal things or gains, not coveting anything, never ever using his spiritual status or authority for extracting any leverage of any kind for his personal gain, therefore God blessed his ministry and gave him such insights into His Word, that had not been given to anyone else; and even the Apostle Peter acknowledged this (2 Peter 3:15-16).


This is in such stark contrast to what is commonly seen these days, where people blatantly use the Lord’s ministry as a means of acquiring worldly possessions and status, and even justify doing this by various contrived arguments. They have no hesitation in dealing craftily with people and donors, to have them provide for ‘Lord’s ministry’, which actually is more for serving their own selves than for the service of the Lord. While they may be able to argue about it and justify their deeds on worldly grounds. But they forget that God’s assessment, evaluation, and judgment will be according to God’s criteria, not theirs or the worlds. And then they will cut a very sorry figure, and their loss will not only be far more than any gain they may have had from their walking craftily in the name of the Lord in this world, but will also be eternal and permanent. Eventually, walking craftily to gain worldly things will turn out to be unimaginably disastrous for them.


The lesson for us is that to be able to worthily handle and minister God’s Word, like Paul did, a servant of the Lord must live an open life, without any craftiness, and use God’s Word not for personal gains but for the benefit of God’s Kingdom. We will consider the third characteristic in the next article.


If you have not yet accepted the discipleship of the Lord, make your decision in favor of the Lord Jesus now to ensure your eternal life and heavenly blessings. Where there is obedience to the Lord, where there is respect and obedience to His Word, there is also the blessing and protection of the Lord. Repenting of your sins, and asking the Lord Jesus for forgiveness of your sins, voluntarily and sincerely, surrendering yourself to Him - is the only way to salvation and heavenly life. You only have to say a short but sincere prayer to the Lord Jesus Christ willingly and with a penitent heart, and at the same time completely commit and submit your life to Him. You can also make this prayer and submission in words something like, “Lord Jesus, I am sorry for my sins and repent of them. I thank you for taking my sins upon yourself, paying for them through your life.  Because of them you died on the cross in my place, were buried, and you rose again from the grave on the third day for my salvation, and today you are the living Lord God and have freely provided to me the forgiveness, and redemption from my sins, through faith in you. Please forgive my sins, take me under your care, and make me your disciple. I submit my life into your hands." Your one prayer from a sincere and committed heart will make your present and future life, in this world and in the hereafter, heavenly and blessed for eternity.



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गुरुवार, 2 नवंबर 2023

Blessed and Successful Life / आशीषित एवं सफल जीवन – 68 – Be Stewards of God’s Word / परमेश्वर के वचन के भण्डारी बनो – 54

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परमेश्वर के वचन से उचित व्यवहार – 22

 

    हमने 2 कुरिन्थियों 4:2 से देखा था कि पौलुस ने उस पद में परमेश्वर के वचन की अपनी सेवकाई के तीन गुण, और साथ ही अपनी सेवकाई के उद्देश्य भी दिए हैं। ये तीन गुण हैं, उसने लज्जा के गुप्त कामों को त्याग दिया था, वह चतुराई से नहीं चलता था, और परमेश्वर के वचन में कोई मिलावट नहीं करता था। पहले के लेखों में पौलुस की सेवकाई के उद्देश्यों को देखने के बाद, पिछले लेख में हमने पौलुस की सेवकाई के पहले गुण, कि उसने लज्जा के गुप्त कामों को त्याग दिया था, के बारे में देखा था। आज हम इसे आगे ज़ारी रखते हुए इस पद में कहे गए दूसरे गुण के बारे में देखेंगे।


    पहला गुण मुख्यतः पौलुस के अतीत, उसके प्रभु यीशु में विश्वास में आने से पूर्व के जीवन के बारे में था। उसके दूसरे और तीसरे गुण उसकी तत्कालीन जीवन और सेवकाई के बारे में हैं, जैसा कि वह तब के लोगों के मध्य जीवन जीता और सेवकाई करता था। दूसरे गुण में, पौलुस कहता है कि वह ‘चतुराई से नहीं चलता था।’ अर्थात, वह परमेश्वर के वचन की अपनी सेवकाई को अपनी स्वार्थ-सिद्धि के लिए कदापि उपयोग नहीं करता था; परमेश्वर की सेवा के नाम से न तो पौलुस ने साँसारिक वस्तुओं का न तो कभी कोई लालच किया, और न ही उनके लिए कोई कार्य किया (प्रेरितों 20:33; 1 थिस्सलुनीकियों 2:5)। इसके विपरीत, अपनी सेवकाई को करते हुए, साथ ही पौलुस अपने जीवन यापन के लिए भी कार्य करता था, कभी किसी पर अपनी आवश्यकताओं के लिए निर्भर नहीं रहा; और अपनी कमाई में से औरों की भी सहायता करता था (प्रेरितों 20:34; 1 कुरिन्थियों 4:12; 1 थिस्सलुनीकियों 2:9)। उसने तो जिन कलीसियाओं में वह सेवा करता था, उनसे कभी वह भी नहीं माँगा जो उसका उपयुक्त बनता था (1 कुरिन्थियों 9:14-15)।


    इसकी तुलना में, उस प्राथमिक कलीसिया के समय में ही, ऐसे लोग खड़े हो चुके थे जो परमेश्वर के वचन के प्रचार और शिक्षा को व्यक्तिगत लाभ के लिए उपयोग कर रहे थे (रोमियों 16:18; फिलिप्पियों 3:19), जिसकी पौलुस ने भर्त्सना की। पौलुस ने तिमुथियुस को भी सावधान किया कि, “जो समझते हैं कि भक्ति कमाई का द्वार है” (1 तिमुथियुस 3:19), उन से दूर रहे, तथा तीतुस को निर्देश दिए कि उनके मुँह बंद किए जाने चाहिएँ जो “लोग नीच कमाई के लिये अनुचित बातें सिखा कर घर के घर बिगाड़ देते हैं” (तीतुस 1:11)। पौलुस ने कुरिन्थुस के विश्वासियों को यह स्मरण दिलाया कि वह परमेश्वर के वचन को “बेचता” नहीं था (2 कुरिन्थियों 2:17; इस पद में हिन्दी में जिस शब्द का अनुवाद “मिलावट” या “हेरा-फेरी” किया गया है, मूल यूनानी भाषा के उस शब्द का शब्दार्थ है बेचना, अथवा लाभ के लिए उपयोग करना – इसके बारे में 25 अक्तूबर के लेख को देखिए)। और इफिसुस के मसीही विश्वासियों से अपनी अंतिम विदाई लेते हुए पौलुस उनके सामने एक अनुकरणीय जीवन जीने का दावा कर सका (प्रेरितों 20:18-19)। पौलुस का जीवन सभी के सामने एक ‘खुली-किताब’ था, चाहे वे उसके विरोधी हों अथवा समर्थक, कभी भी कोई भी उस पर साँसारिक वस्तुओं और बातों का लालच करने, उनकी प्राप्ति के लिए अनुचित उद्देश्य और मार्ग रखने, या उन्हें प्राप्त करने के लिए कुछ गलत करने का आरोप नहीं लगा सका। यहाँ तक कि, सँसार से कूच करने की प्रतीक्षा करते हुए, वह बड़े भरोसे के साथ यह कह सका कि जब वह स्वर्ग पहुंचेगा, तो प्रभु के द्वारा उसे ‘धर्म का मुकुट’ दिया जाएगा (2 तीमुथियुस 4:8)।


    क्योंकि वह सँसार और सँसार के बातों तथा वस्तुओं से विरक्ति का जीवन जीता था, प्रभु के प्रति पूर्णतः समर्पित, आज्ञाकारी, और प्रतिबद्ध था, किसी भी भौतिक वस्तु या लाभ की लालसा अथवा लालच नहीं करता था, और क्योंकि उसने अपने आत्मिक स्तर एवं अधिकार का कभी भी अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए उपयोग नहीं किया था, इसीलिए परमेश्वर ने उसकी सेवकाई पर आशीष दी और उसे वचन के गूढ़ भेदो के बारे में ऐसी अन्तर्दृष्टि प्रदान की, जैसी किसी और को कभी नहीं मिली थी; और प्रेरित पतरस ने भी यह बात कही (2 पतरस 3:15-16)।


    यह वर्तमान में देखे जाने वाले व्यवहार से एक वास्तविक किन्तु अप्रिय तुलना प्रस्तुत करता है। वर्तमान में लोग प्रभु की सेवकाई को न केवल साँसारिक वस्तुएँ, लाभ, और समाज में उच्च स्तर अर्जित करने के तरीके के समान उपयोग करते हैं, वरन उसे सही ठहराने के लिए कई गढ़े हुए तर्क भी देते हैं। उन्हें लोगों के साथ, तथा उन्हें ‘प्रभु की सेवकाई’ के लिए धन एवं संसाधन उपलब्ध करवाने वालों के साथ चतुराई से व्यवहार करने में कोई संकोच नहीं होता है, यद्यपि उपलब्ध करवाई गई वस्तुएँ और संसाधन उनके व्यक्तिगत उपयोग के लिए अधिक और प्रभु के कार्य के लिए कम उपयोग की जाती हैं। हो सकता है कि वे इसके बारे में कुछ तर्क दे सकें और अपने किए को सांसारिक आधार पर उचित भी ठहरा सकें; लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि परमेश्वर का आँकलन, निर्धारण, और न्याय उसके अपने ही मानकों के अनुसार होगा, न कि उन लोगों के अथवा सँसार के मानकों के आधार पर। और तब उन्हें बहुत शर्मिंदा होना पड़ेगा, भारी हानि उठानी पड़ेगी, ऐसी हानि जो उनके सँसार में कमाए गए उस अनुचित लाभ से कहीं अधिक होगी। अन्ततः, परमेश्वर के नाम में व्यक्तिगत लाभ के लिए चतुराई से चलना और व्यवहार करना उन्हें बहुत ही भारी पड़ेगा।


    हमारे लिए पाठ यह है कि परमेश्वर के वचन के साथ उचित व्यवहार करने और उसकी सेवकाई करने के लिए, परमेश्वर के प्रत्येक सेवक को, पौलुस के समान, बिना किसी प्रकार की कोई चतुराई के, एक खुली-किताब जैसा जीवन रखना होगा और परमेश्वर के वचन का व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं वरण परमेश्वर के राज्य के लाभ के लिए उपयोग करना होगा। अगले लेख में हम तीसरे गुण को देखेंगे।


    यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु, मैं अपने पापों के लिए पश्चातापी हूँ, उनके लिए आप से क्षमा माँगता हूँ। मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मुझे और मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।


 

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Appropriately Handling God’s Word – 22

 

    We have seen that in 2 Corinthians 4:2 Paul has stated three characteristics of his ministry of God’s Word, as well as the purpose of his ministry. These three characteristics are, he had renounced the hidden things of shame, he did not walk in craftiness, and he did not handle the Word of God deceitfully. Having already considered the purposes of Paul’s ministry in earlier articles, in the last article we had considered the first characteristic of Paul’s ministry, that he had renounced the hidden things of shame. Today we will carry on and see the second characteristic mentioned in this verse.


    The first characteristic mainly pertained to Paul’s former life, i.e., life before his coming to faith in the Lord Jesus. The second and third characteristics pertain to his current life and ministry, as he was lived and carried it out while serving amongst the then people. In the second characteristic, Paul says that he ‘did not walk in craftiness.’ Meaning he did not use his ministry of God’s Word as a means to serve his own ends; in the garb of serving God. Paul neither coveted, nor worked for any worldly possessions (Acts 20:33; 1 Thessalonians 2:5). On the contrary, while carrying on with his ministry, Paul also worked for his living, never being dependent on others to provide for his needs; and, out of his earnings he would help others as well (Acts 20:34; 1 Corinthians 4:12; 1 Thessalonians 2:9). He did not even claim what was his due from the Churches where he ministered (1 Corinthians 9:14-15).


    In contrast, as early as at that time of the first Church, already people had come up, using the ministry of preaching and teaching God’s Word, as a means of personal gain (Romans 16:18; Philippians 3:19), which Paul denounced. Paul also cautioned Timothy to stay away from those “who suppose that godliness is a means of gain” (1 Timothy 6:5), and instructed Titus that the mouths of those who were “teaching things which they ought not, for the sake of dishonest gain” should be stopped (Titus 1:11). Paul reminded the Corinthian Believers that he did not go about “peddling the Word of God”, as many were doing (2 Corinthians 2:17); and in his final farewell from the Ephesian Believers, he could claim to have an exemplary lifestyle (Acts 20:18-19). Paul’s life was an ‘open book’ before all, whether his detractors or those in his favor, and none could ever accuse him of any covetousness, inappropriate motives, or wrongdoings. So, much so, that awaiting his final departure from the world, he remained very confident that when he reaches heaven he will be rewarded with the crown of righteousness by the Lord (2 Timothy 4:8).


    Because he lived this detached from the things of this world, fully surrendered, obedient, and committed life for the Lord, not desiring any temporal things or gains, not coveting anything, never ever using his spiritual status or authority for extracting any leverage of any kind for his personal gain, therefore God blessed his ministry and gave him insights into His Word, that had not been given to anyone else; and even the Apostle Peter acknowledged this (2 Peter 3:15-16).


    This is in such stark contrast to what is commonly seen these days, where people blatantly use the Lord’s ministry as a means of acquiring worldly possessions and status, and even justify doing this by various contrived arguments. They have no hesitation in dealing craftily with people and donors, to have them provide for ‘Lord’s ministry’, which actually is more for serving their own selves than for the service of the Lord. While they may be able to argue about it and justify their deeds on worldly grounds; but they forget that God’s assessment, evaluation, and judgment will be according to His criteria, not theirs or the worlds; and then they will cut a very sorry figure, and their loss will be far more than any gain they may have had from their walking craftily in the name of the Lord in this world.


    The lesson for us is that to be able to worthily handle and minister God’s Word, like Paul did, a servant of the Lord has to have an open life, without any craftiness, and use God’s Word not for personal gains but for the benefit of God’s Kingdom. We will consider the third characteristic in the next article.


    If you have not yet accepted the discipleship of the Lord, make your decision in favor of the Lord Jesus now to ensure your eternal life and heavenly blessings. Where there is obedience to the Lord, where there is respect and obedience to His Word, there is also the blessing and protection of the Lord. Repenting of your sins, and asking the Lord Jesus for forgiveness of your sins, voluntarily and sincerely, surrendering yourself to Him - is the only way to salvation and heavenly life. You only have to say a short but sincere prayer to the Lord Jesus Christ willingly and with a penitent heart, and at the same time completely commit and submit your life to Him. You can also make this prayer and submission in words something like, “Lord Jesus, I am sorry for my sins and repent of them. I thank you for taking my sins upon yourself, paying for them through your life.  Because of them you died on the cross in my place, were buried, and you rose again from the grave on the third day for my salvation, and today you are the living Lord God and have freely provided to me the forgiveness, and redemption from my sins, through faith in you. Please forgive my sins, take me under your care, and make me your disciple. I submit my life into your hands." Your one prayer from a sincere and committed heart will make your present and future life, in this world and in the hereafter, heavenly and blessed for eternity.


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बुधवार, 22 जुलाई 2015

सन्तुष्ट


   कुछ लोगों को खरीददारी करने का शौक होता है; वे बस जो भी पसन्द आए उसे खरीदते और जमा करते रहते हैं। यह शौक सारे संसार के सभी स्थानों पर लोगों में मिलता है। चीन, साऊदी अरेबिया, कैनडा, फिलिप्पीन्स आदि देशों में बड़े बड़े शॉपिंग मॉल्स हैं जहाँ तरह तरह का देशी और विदेशी सामान मिलता है और लोग खरीददारी करने विदेशों से भी आते हैं। दुकानों और इंटरनैट के माध्यम से ऑन्लाइन शॉपिंग की लगातार बढ़ोतरी इस बात का प्रमाण है कि खरीददारी करना एक विश्व-व्यापि तथ्य है।

   खरीददारी करना मनोरंजक भी हो सकता है। किसी वस्तु के लिए अच्छी सौदेबाज़ी और परमेश्वर द्वारा हमें दी गई चीज़ों का आनन्द लेने में कोई बुराई नहीं है। लेकिन जब हम भौतिक वस्तुओं को प्राप्त करने में इतना तल्लीन हो जाते हैं कि बाकी सब कुछ को नज़रन्दाज़ करने लगें तो यह दिखाता है कि कुछ अनुचित होने लगा है।

   प्रभु यीशु ने अपने श्रोताओं को अपने एक कथन से एक चुनौती दी; प्रभु यीशु ने कहा, "...चौकस रहो, और हर प्रकार के लोभ से अपने आप को बचाए रखो: क्योंकि किसी का जीवन उस की संपत्ति की बहुतायत से नहीं होता" (लूका 12:15)। फिर प्रभु ने उन सब से एक ऐसे व्यक्ति के बारे में दृष्टांत कहा जो अपने लिए संसार की संपदा तो एकत्रित कर रहा था परन्तु परमेश्वर के साथ अपने संबंध को पूर्णत्या नज़रन्दाज़ करे हुए था।

   हम कैसे, जो हमारे पास है उस से सन्तुष्ट रहते हुए भौतिक वस्तुओं के लालच में पड़ने से अपने आप को बचाए रह सकते हैं, जिससे प्रभु यीशु के कहे दृष्टांत वाले व्यक्ति के समान गलती ना करें? परमेश्वर का वचन बाइबल हमें कुछ बातें मार्गदर्शन के लिए बताती है:
  • भौतिक वस्तुओं को परमेश्वर द्वारा दूसरों की भलाई के लिए प्रयोग करे जाने वाली आशीष और ज़िम्मेदारी के रूप में देखें। (मत्ती 25:14-30)
  • पैसा कमाने और संचित करने के लिए केवल उचित और मेहनत के रास्ते ही अपनाए। (नीतिवचन 6:6-11)
  • अपनी संपदा को परमेश्वर के कार्यों तथा ज़रूरतमन्दों के उपयोग के लिए लगाएं। (2 कुरिन्थियों 9:7; नीतिवचन 19:17)
  • जो कुछ आपके पास है उसके लिए तथा उसका आनन्द ले पाने के लिए परमेश्वर को सदा स्मरण रखें एवं उसके सदा धन्यवादी रहें। (1 तिमुथियुस 6:17)

   जमा करते रहने की बजाए जो है उसमें सन्तुष्ट रहने और परमेश्वर के वचनानुसार उसका सदुप्योग करने में ही शान्ति और भलाई है। - डेनिस फिशर


वस्तुओं में धनी बनने की बजाए परमेश्वर में धनी बनना अधिक आवश्यक और लाभकारी है।

पर सन्‍तोष सहित भक्ति बड़ी कमाई है। क्योंकि न हम जगत में कुछ लाए हैं और न कुछ ले जा सकते हैं। - 1 तिमुथियुस 6:6-7

बाइबल पाठ: लूका 12:13-21
Luke 12:13 फिर भीड़ में से एक ने उस से कहा, हे गुरू, मेरे भाई से कह, कि पिता की संपत्ति मुझे बांट दे। 
Luke 12:14 उसने उस से कहा; हे मनुष्य, किस ने मुझे तुम्हारा न्यायी या बांटने वाला नियुक्त किया है? 
Luke 12:15 और उसने उन से कहा, चौकस रहो, और हर प्रकार के लोभ से अपने आप को बचाए रखो: क्योंकि किसी का जीवन उस की संपत्ति की बहुतायत से नहीं होता। 
Luke 12:16 उसने उन से एक दृष्‍टान्‍त कहा, कि किसी धनवान की भूमि में बड़ी उपज हुई। 
Luke 12:17 तब वह अपने मन में विचार करने लगा, कि मैं क्या करूं, क्योंकि मेरे यहां जगह नहीं, जहां अपनी उपज इत्यादि रखूं। 
Luke 12:18 और उसने कहा; मैं यह करूंगा: मैं अपनी बखारियां तोड़ कर उन से बड़ी बनाऊंगा; 
Luke 12:19 और वहां अपना सब अन्न और संपत्ति रखूंगा: और अपने प्राण से कहूंगा, कि प्राण, तेरे पास बहुत वर्षों के लिये बहुत संपत्ति रखी है; चैन कर, खा, पी, सुख से रह। 
Luke 12:20 परन्तु परमेश्वर ने उस से कहा; हे मूर्ख, इसी रात तेरा प्राण तुझ से ले लिया जाएगा: तब जो कुछ तू ने इकट्ठा किया है, वह किस का होगा? 
Luke 12:21 ऐसा ही वह मनुष्य भी है जो अपने लिये धन बटोरता है, परन्तु परमेश्वर की दृष्टि में धनी नहीं।

एक साल में बाइबल: 
  • भजन 31-32
  • प्रेरितों 23:16-35


शुक्रवार, 30 जनवरी 2015

बाधाएं



   मैंने कुछ लोगों को इस रवैये के साथ कार्य करते देखा है कि यदि उन्हें कोई ऐसा विचार आता है जो उनकी दृष्टि में अच्छा है, या कोई ऐसा अवसर दिखाई देता है जो उन्हें लाभप्रद प्रतीत होता है तो वे उसे पूरा करने के लिए कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं, उस की पूर्ति के लिए अपने सारे साधन लगा देते हैं, और यदि उस पूर्ति में कोई बाधा आए तो उन्हें फिर चाहे बाधा के ऊपर होकर जाना पड़े या फिर उसके नीचे से, चाहे बाधा में होकर जाना पड़े या बाधा के इर्द-गिर्द घूम कर, लेकिन उस पूर्ति के लिए वह बाधा को हर रीति से पार करने के लिए तैयार रहते हैं। उनकी यह निष्ठा अच्छी तो प्रतीत होती है, लेकिन आवश्यक नहीं कि यह बात हमेशा सही ही हो; और इस बात को प्रमाणित करने के लिए मैं बिलाम नामक एक आदमी तथा उसके गदहे को आपके सामने रखना चाहता हूँ।

   परमेश्वर के वचन बाइबल में बिलाम नाम के एक व्यक्ति का उल्लेख आता है जो पहली नज़र में परमेश्वर का आज्ञाकारी भक्त दिखाई देता है, लेकिन वास्तव में परमेश्वर के नाम से अपनी ही लालसाओं और लालचों के आधीन कार्य करने वाला था। जब परमेश्वर इस्त्राएल को मिस्त्र के दासत्व से निकाल कर कनान देश में बसाने के लिए ले कर जा रहा था, तो मार्ग के एक स्थान के राजा ने उन इस्त्राएलियों का नाश करने के लिए बिलाम की सहायता माँगी, और बिलाम को इसके प्रतिफल में अच्छा ईनाम देने का वायदा किया। बिलाम ने परमेश्वर से इस बात के लिए आज्ञा माँगी लेकिन परमेश्वर ने उसे मना कर दिया। तब राजा ने बिलाम को और भी अधिक ईनाम का लालच दिया, और बिलाम फिर से परमेश्वर से इस्त्राएल के विरुद्ध हाथ बढ़ाने की अनुमति माँगने लगा। क्योंकि परमेश्वर बिलाम के हृदय की दशा जानता था, इसलिए उसने बिलाम को आज्ञा तो दे दी लेकिन कुछ सख्त शर्तें साथ जोड़ दीं, लेकिन फिर भी परमेश्वर बिलाम से प्रसन्न नहीं था। इसलिए जब बिलाम इस्त्राएल को श्राप देने के लिए अपने गदहे पर बैठा जा रहा था तो मार्ग में एक बहुत संकरे स्थान पर परमेश्वर ने अपने एक दूत को खड़ा कर दिया जिससे बिलाम का आगे बढ़ना रुक जाए; बिलाम उस दूत को नहीं देख पा रहा था लेकिन वह उसके गदहे को दिखाई दे रहा था और वह जानवर उस दूत को देख कर वहीं रुक गया। बिलाम के बहुत प्रयास करने पर भी जब वह गदहा आगे नहीं बढ़ा तो बिलाम गदहे पर बहुत क्रोधित हुआ और उसे पीटा भी। तब परमेश्वर का दूत उस पर प्रगट हुआ और बिलाम को अपनी गलती का एहसास हुआ।

   बिलाम के साथ हुई यह घटना हमें सिखाती है कि ज़रूरी नहीं कि प्रत्येक बाधा से पार निकलने का प्रयास किया जाए; कभी कभी परमेश्वर हमारे मार्ग अवरुद्ध करता है ताकि हम कुछ मूर्खतापूर्ण या अनुचित ना कर बैठें। इसलिए जब हमारी कुछ योजनाएं पूरी नहीं हो पा रही हों, कुछ प्रयास बारंबार विफल हो रहे हों तो हमें यही नहीं मान लेना चाहिए कि शैतान हमारे रास्ते में बाधा डाल रहा है। हो सकता है कि परमेश्वर ही वह बाधा डाल रहा हो जिससे हम किसी नुकसान में पड़ने से बच जाएं। इसलिए बाधा में भी परमेश्वर की इच्छा जानने और फिर उस इच्छा के अनुसार कार्य करने की प्रवृति रखना लाभप्रद है। - जूली ऐकरमैन लिंक


परमेश्वर हर समय अपने बच्चों की रखवाली तथा रक्षा करता रहता है; तब भी जब उन्हें आभास भी नहीं होता कि उन्हें उसकी आवश्यकता है।

और मैं तुझे तेरे लोगों से और अन्यजातियों से बचाता रहूंगा, जिन के पास मैं अब तुझे इसलिये भेजता हूं। कि तू उन की आंखे खोले, कि वे अंधकार से ज्योति की ओर, और शैतान के अधिकार से परमेश्वर की ओर फिरें; कि पापों की क्षमा, और उन लोगों के साथ जो मुझ पर विश्वास करने से पवित्र किए गए हैं, मीरास पाएं। - प्रेरितों 26:17-18

बाइबल पाठ: गिनती 22:10-34
Numbers 22:10 बिलाम ने परमेश्वर से कहा सिप्पोर के पुत्र मोआब के राजा बालाक ने मेरे पास यह कहला भेजा है, 
Numbers 22:11 कि सुन, जो दल मिस्र से निकल आया है उस से भूमि ढंप गई है; इसलिये आकर मेरे लिये उन्हें शाप दे; सम्भव है कि मैं उनसे लड़कर उन को बरबस निकाल सकूंगा। 
Numbers 22:12 परमेश्वर ने बिलाम से कहा, तू इनके संग मत जा; उन लोगों को शाप मत दे, क्योंकि  वे आशीष के भागी हो चुके हैं। 
Numbers 22:13 भोर को बिलाम ने उठ कर बालाक के हाकिमों से कहा, तुम अपने देश को चले जाओ; क्योंकि यहोवा मुझे तुम्हारे साथ जाने की आज्ञा नहीं देता। 
Numbers 22:14 तब मोआबी हाकिम चले गए और बालाक के पास जा कर कहा, कि बिलाम ने हमारे साथ आने से ना किया है। 
Numbers 22:15 इस पर बालाक ने फिर और हाकिम भेजे, जो पहिलों से प्रतिष्ठित और गिनती में भी अधिक थे। 
Numbers 22:16 उन्होंने बिलाम के पास आकर कहा, कि सिप्पोर का पुत्र बालाक यों कहता है, कि मेरे पास आने से किसी कारण ना न कर; 
Numbers 22:17 क्योंकि मैं निश्चय तेरी बड़ी प्रतिष्ठा करूंगा, और जो कुछ तू मुझ से कहे वही मैं करूंगा; इसलिये आ, और उन लोगों को मेरे निमित्त शाप दे। 
Numbers 22:18 बिलाम ने बालाक के कर्मचारियों को उत्तर दिया, कि चाहे बालाक अपने घर को सोने चांदी से भरकर मुझे दे दे, तौभी मैं अपने परमेश्वर यहोवा की आज्ञा को पलट नहीं सकता, कि उसे घटाकर वा बढ़ाकर मानूं। 
Numbers 22:19 इसलिये अब तुम लोग आज रात को यहीं टिके रहो, ताकि मैं जान लूं, कि यहोवा मुझ से और क्या कहता है। 
Numbers 22:20 और परमेश्वर ने रात को बिलाम के पास आकर कहा, यदि वे पुरूष तुझे बुलाने आए हैं, तो तू उठ कर उनके संग जा; परन्तु जो बात मैं तुझ से कहूं उसी के अनुसार करना। 
Numbers 22:21 तब बिलाम भोर को उठा, और अपनी गदही पर काठी बान्धकर मोआबी हाकिमों के संग चल पड़ा। 
Numbers 22:22 और उसके जाने के कारण परमेश्वर का कोप भड़क उठा, और यहोवा का दूत उसका विरोध करने के लिये मार्ग रोककर खड़ा हो गया। वह तो अपनी गदही पर सवार हो कर जा रहा था, और उसके संग उसके दो सेवक भी थे। 
Numbers 22:23 और उस गदही को यहोवा का दूत हाथ में नंगी तलवार लिये हुए मार्ग में खड़ा दिखाई पड़ा; तब गदही मार्ग छोड़कर खेत में चली गई; तब बिलाम ने गदही को मारा, कि वह मार्ग पर फिर आ जाए। 
Numbers 22:24 तब यहोवा का दूत दाख की बारियों के बीच की गली में, जिसके दोनों ओर बारी की दीवार थी, खड़ा हुआ। 
Numbers 22:25 यहोवा के दूत को देखकर गदही दीवार से ऐसी सट गई, कि बिलाम का पांव दीवार से दब गया; तब उसने उसको फिर मारा। 
Numbers 22:26 तब यहोवा का दूत आगे बढ़कर एक सकेत स्थान पर खड़ा हुआ, जहां न तो दाहिनी ओर हटने की जगह थी और न बाईं ओर। 
Numbers 22:27 वहां यहोवा के दूत को देखकर गदही बिलाम को लिये दिये बैठ गई; फिर तो बिलाम का कोप भड़क उठा, और उसने गदही को लाठी से मारा। 
Numbers 22:28 तब यहोवा ने गदही का मुंह खोल दिया, और वह बिलाम से कहने लगी, मैं ने तेरा क्या किया है, कि तू ने मुझे तीन बार मारा? 
Numbers 22:29 बिलाम ने गदही से कहा, यह कि तू ने मुझ से नटखटी की। यदि मेरे हाथ में तलवार होती तो मैं तुझे अभी मार डालता। 
Numbers 22:30 गदही ने बिलाम से कहा क्या मैं तेरी वही गदही नहीं जिस पर तू जन्म से आज तक चढ़ता आया है? क्या मैं तुझ से कभी ऐसा करती थी? वह बोला, नहीं। 
Numbers 22:31 तब यहोवा ने बिलाम की आंखे खोलीं, और उसको यहोवा का दूत हाथ में नंगी तलवार लिये हुए मार्ग में खड़ा दिखाई पड़ा; तब वह झुक गया, और मुंह के बल गिरके दण्डवत की। 
Numbers 22:32 यहोवा के दूत ने उस से कहा, तू ने अपनी गदही को तीन बार क्यों मारा? सुन, तेरा विरोध करने को मैं ही आया हूं, इसलिये कि तू मेरे साम्हने उलटी चाल चलता है; 
Numbers 22:33 और यह गदही मुझे देखकर मेरे साम्हने से तीन बार हट गई। जो वह मेरे साम्हने से हट न जाती, तो नि:सन्देह मैं अब तक तुझ को मार ही डालता, परन्तु उसको जीवित छोड़ देता। 
Numbers 22:34 तब बिलाम ने यहोवा के दूत से कहा, मैं ने पाप किया है; मैं नहीं जानता था कि तू मेरा साम्हना करने को मार्ग में खड़ा है। इसलिये अब यदि तुझे बुरा लगता है, तो मैं लौट जाता हूं।

एक साल में बाइबल: 
  • निर्गमन 23-24
  • मत्ती 20:1-16



शनिवार, 15 फ़रवरी 2014

सन्तुष्टि


   मेरी बेटी अब बोलने लगी है, तथा उसने एक शब्द सीख लिया है जो उसे बहुत प्रीय है - ’और’। वो हर बात जो उसे पसन्द है उसके लिए वह कहती है ’और’; जैसे, ’और’ कहते हुए वह टोस्ट और जैम की ओर इशारा करेगी, मेरे पति ने हाल ही में उसकी गुल्लक में डालने के लिए उसे कुछ सिक्के दिए तो उसने हाथ फैला कर उनसे कहा ’और’। एक प्रातः जब मेरे पति काम के लिए निकले तो वो पीछे से पुकारने लगी ’और पापा’।

   जैसे मेरी वह छोटी बेटी करती है वैसे ही हम व्यसक भी प्रायः अपने चारों ओर की वस्तुओं या किसी अन्य के पास की चीज़ों को देखकर कहते रहते हैं, ’और’; दुर्भाग्यवश हमारे लिए पर्याप्त कभी पर्याप्त नहीं होता, हमें भी हर चीज़ अधिक, और अधिक ही चाहिए होती है। सांसारिक बातों की इस लालसा और लालच की मनसा से बच पाने की सामर्थ केवल प्रभु यीशु में होकर ही हमें मिल सकती है। जैसा प्रेरित पौलुस ने अपने अनुभव के आधार पर कहा, "यह नहीं कि मैं अपनी घटी के कारण यह कहता हूं; क्योंकि मैं ने यह सीखा है कि जिस दशा में हूं, उसी में सन्‍तोष करूं" (फिलिप्पियों 4:11) वैसे ही हमारे लिए भी यही सामर्थ पौलुस के समान ही उप्लब्ध है।

   जब पौलुस कहता है कि "मैं ने यह सीखा है" तो इससे मैं समझती हूँ कि पौलुस के लिए परिस्थितियाँ सरल अथवा सहज नहीं थी। हम जानते हैं कि उसे अपने मसीही विश्वास के जीवन में अनेक कठिनाईयों का सामना करना पड़ा; यह सन्तोष करना सीखने के लिए उसे अभ्यास आवश्यक था। जब हम पौलुस के जीवन को परमेश्वर के वचन बाइबल में देखते हैं तो पाते हैं कि उसके जीवन में अनेक उतार-चढ़ाव आए; वह कठिनाईयों में रहा, सांप से भी डसा गया, झूठे आरोपों का शिकार हुआ, मारा-पीटा भी गया, तिरस्कृत भी हुआ इत्यादि लेकिन वह आत्माओं को बचाने और मसीही विश्वासियों की मण्डलियाँ स्थापित करने में लगा ही रहा और इन सब कठिनाईयों में कहता रहा कि उसकी आत्मा की तृप्ति का स्त्रोत प्रभु यीशु ही है। उसने प्रभु यीशु के सन्दर्भ में कहा, "जो मुझे सामर्थ देता है उस में मैं सब कुछ कर सकता हूं" (फिलिप्पियों 4:13)। प्रभु यीशु ने उसे वह आत्मिक बल दिया था जो उसे कठिनाईयों के समयों में संभालता था और बहुतायत तथा समृद्धि के समयों के फंदों से बच कर निकलना भी सिखाता था।

   यदि आप भी अपने जीवन में ’और’, ’और’, ’और’ की लालसा को कार्य करते हुए पाते हैं तो पौलुस के उदाहरण पर ध्यान कीजिए और स्मरण रखिए कि वास्तविक सन्तुष्टि प्रभु यीशु में अधिकाई से बने रहने में ही है ना कि सांसारिक वस्तुओं की बहुतायत के होने से। - जेनिफर बेनसन शुल्ट


सच्ची सन्तुष्टि इस नश्वर संसार की किसी वस्तु भी वस्तु पर निर्भर ना रहने में है।

और उस[प्रभु यीशु]ने उन से कहा, चौकस रहो, और हर प्रकार के लोभ से अपने आप को बचाए रखो: क्योंकि किसी का जीवन उस की संपत्ति की बहुतायत से नहीं होता। - लूका 12:15

बाइबल पाठ: फिलिप्पियों 4:10-20
Philippians 4:10 मैं प्रभु में बहुत आनन्‍दित हूं कि अब इतने दिनों के बाद तुम्हारा विचार मेरे विषय में फिर जागृत हुआ है; निश्‍चय तुम्हें आरम्भ में भी इस का विचार था, पर तुम्हें अवसर न मिला। 
Philippians 4:11 यह नहीं कि मैं अपनी घटी के कारण यह कहता हूं; क्योंकि मैं ने यह सीखा है कि जिस दशा में हूं, उसी में सन्‍तोष करूं। 
Philippians 4:12 मैं दीन होना भी जानता हूं और बढ़ना भी जानता हूं: हर एक बात और सब दशाओं में तृप्‍त होना, भूखा रहना, और बढ़ना-घटना सीखा है। 
Philippians 4:13 जो मुझे सामर्थ देता है उस में मैं सब कुछ कर सकता हूं। 
Philippians 4:14 तौभी तुम ने भला किया, कि मेरे क्‍लेश में मेरे सहभागी हुए। 
Philippians 4:15 और हे फिलप्‍पियो, तुम आप भी जानते हो, कि सुसमाचार प्रचार के आरम्भ में जब मैं ने मकिदुनिया से कूच किया तब तुम्हें छोड़ और किसी मण्‍डली ने लेने देने के विषय में मेरी सहयता नहीं की। 
Philippians 4:16 इसी प्रकार जब मैं थिस्सलुनीके में था; तब भी तुम ने मेरी घटी पूरी करने के लिये एक बार क्या वरन दो बार कुछ भेजा था। 
Philippians 4:17 यह नहीं कि मैं दान चाहता हूं परन्तु मैं ऐसा फल चाहता हूं, जो तुम्हारे लाभ के लिये बढ़ता जाए। 
Philippians 4:18 मेरे पास सब कुछ है, वरन बहुतायत से भी है: जो वस्तुएं तुम ने इपफ्रुदीतुस के हाथ से भेजी थीं उन्हें पाकर मैं तृप्‍त हो गया हूं, वह तो सुगन्‍ध और ग्रहण करने के योग्य बलिदान है, जो परमेश्वर को भाता है। 
Philippians 4:19 और मेरा परमेश्वर भी अपने उस धन के अनुसार जो महिमा सहित मसीह यीशु में है तुम्हारी हर एक घटी को पूरी करेगा। 
Philippians 4:20 हमारे परमेश्वर और पिता की महिमा युगानुयुग होती रहे। आमीन।

एक साल में बाइबल: 
  • गिनती 34-36


शनिवार, 27 अक्टूबर 2012

लालच


   चन्द्रमा पर कदम रखने वाले प्रथम मानव नील आर्मस्ट्रौंग को अपनी अंतरिक्ष यात्रा से लौटने के बाद समाचार पत्रों, रेडियो तथा टी.वी. के संवादाताओं और उनसे मिलने की इच्छा रखने वाले बहुत से लोगों की भीड़ के कारण परेशानी रहती थी। इन सबसे बचकर अपने तथा अपने पारिवारिक जीवन की शांति बनाए रहने के लिए वे अपने परिवार सहित एक छोटे से नगर में रहने चले गए। किंतु ख्याति की परेशानी ने उन्हें वहां भी नहीं छोड़ा। आर्मस्ट्रौंग के नाई को पता चला कि कुछ लोग हैं जो इस अंतरिक्ष नायक के बालों के लिए एक अच्छी रकम देने को तैयार हैं; इसलिए उसने आर्मस्ट्रौंगे के बालों को कई बार काटने के बाद उन्हें एकत्रित करके $३००० में एक खरीददार को बेच दिया। आर्मस्ट्रौंग को उस नाई के इस लालच और विश्वासघात से बहुत धक्का लगा।

   परमेश्वर के वचन बाइबल में भी विश्वासघात और बालों के काटे जाने की एक घटना दर्ज है। परमेश्वर ने जन्म से ही शिमशौन को इस्त्राएल का न्यायी होने के इए बुलाया था और उसे नाज़िर ठहराया था, और नाज़िर होने के चिन्ह के लिए शिमशौन को कभी अपने बाल नहीं काटने थे (न्यायियों १३:५)। जब आवश्यक्ता हुई तो परमेश्वर की आत्मा की सामर्थ से उसने अलौकिक शक्ति पाई और इस्त्राएल तथा अपने दुशमनों पलिश्तियों पर विजयी हुआ (न्यायियों १५:१४)। उसे हराने और बन्धुवा बनाने के लिए पलिश्तियों नें एक स्त्री दलीला को नियुक्त किया। दलीला ने उससे प्रेम का नाटक करके उससे शादि करी कि उसकी उस अलौकिक शक्ति का रहस्य जान सके। शिमशौन ने अन्ततः उसकी बातों में आकर अपनी शक्ति का रहस्य अर्थात बालों का ना काटा जाना उसे बता दिया। यह जानने के बाद दलीला ने उसे अपनी गोद में सुलाया और जब वह गहरी नींद में था तो उसके बाल कटवा दिए तथा उसे पलिश्तियों के हाथों दे दिया (न्यायियों १६:५, १९)।

   लालच मनुष्य को एक दुसरे के प्रति ही नहीं, परमेश्वर के प्रति भी विश्वासघाती बना देता है, जैसे प्रभु यीशु के चेले यहूदा इस्करियोती ने तीस चांदी के टुकड़ों के लिए यीशु को मारे जाने के लिए पकड़वा दिया। हम मसीही विश्वासियों को संसार के लाभ और संसार की वस्तुओं को प्राप्त करने के लालच से बचकर अपने उद्धारकर्ता प्रभु यीशु के प्रति पूरी तरह समर्पित मन, तथा दूसरों के प्रति प्रेम और सहायता का रवैया रखना है। परमेश्वर में विश्वास और संतुष्टि ही हमें लालच से बचाए रख सकती है, और हमें फलता-फूलता कर सकती है क्योंकि "यहोवा की दृष्टि सारी पृथ्वी पर इसलिये फिरती रहती है कि जिनका मन उसकी ओर निष्कपट रहता है, उनकी सहायता में वह अपना सामर्थ दिखाए" (२ इतिहास १६:९)।

   परमेश्वर से सहायता और संसार का लालच एक साथ नहीं हो सकते। - डेनिस फिशर


वफादारी ही सच्चे प्रेम का वास्तविक प्रमाण है।

यहोवा की दृष्टि सारी पृथ्वी पर इसलिये फिरती रहती है कि जिनका मन उसकी ओर निष्कपट रहता है, उनकी सहायता में वह अपना सामर्थ दिखाए। - २ इतिहास १६:९

बाइबल पाठ: न्यायियों १६:४-२१
Jdg 16:4  इसके बाद वह सोरेक नाम नाले में रहने वाली दलीला नाम एक स्त्री से प्रीति करने लगा। 
Jdg 16:5  तब पलिश्तियों के सरदारों ने उस स्त्री के पास जाके कहा, तू उसको फुसला कर बूझ ले कि उसके महाबल का भेद क्या है, और कौन उपाय करके हम उस पर ऐसे प्रबल हों, कि उसे बान्धकर दबा रखें? तब हम तुझे ग्यारह ग्यारह सौ टुकड़े चान्दी देंगे। 
Jdg 16:6  तब दलीला ने शिमशोन से कहा, मुझे बता दे कि तेरे बड़े बल का भेद क्या है, और किसी रीति से कोई तुझे बान्धकर दबा रख सके। 
Jdg 16:7  शिमशोन ने उस से कहा, यदि मैं सात ऐसी नई नई तातों से बान्धा जाऊं जो सुखाई न गई हों, तो मेरा बल घट जाएगा, और मैं साधारण मनुष्य सा हो जाऊंगा। 
Jdg 16:8  तब पलिश्तियों के सरदार दलीला के पास ऐसी नई नई सात तातें ले गए जो सुखाई न गई थीं, और उन से उस ने शिमशोन को बान्धा। 
Jdg 16:9  उसके पास तो कुछ मनुष्य कोठरी में घात लगाए बैठे थे। तब उस ने उस से कहा, हे शिमशोन, पलिश्ती तेरी घात में हैं! तब उस ने तांतों को ऐसा तोड़ा जैसा सन का सूत आग में छूते ही टूट जाता है। और उसके बल का भेद न खुला। 
Jdg 16:10  तब दलीला ने शिमशोन से कहा, सुन, तू ने तो मुझ से छल किया, और झूठ कहा है; अब मुझे बता दे कि तू किस वस्तु से बन्ध सकता है। 
Jdg 16:11  उस ने उस से कहा, यदि मैं ऐसी नई नई रस्सियों जो किसी काम में न आई हों कस कर बान्धा जाऊं, तो मेरा बल घट जाएगा, और मैं साधारण मनुष्य के समान हो जाऊंगा। 
Jdg 16:12  तब दलीला ने नई नई रस्सियां लेकर और उसको बान्ध कर कहा, हे शिमशोन, पलिश्ती तेरी घात में हैं! कितने मनुष्य तो उस कोठरी में घात लगाए हुए थे। तब उस ने उनको सूत की नाईं अपनी भुजाओं पर से तोड़ डाला। 
Jdg 16:13  तब दलीला ने शिमशोन से कहा, अब तक तू मुझ से छल करता, और झूठ बोलता आया है; अब मुझे बता दे कि तू काहे से बन्ध सकता है? उस ने कहा यदि तू मेरे सिर की सातों लटें ताने में बुने तो बन्ध सकूंगा। 
Jdg 16:14  सो उस ने उसे खूंटी से जकड़ा। तब उस से कहा, हे शिमशोन, पलिश्ती तेरी घात में हैं! तब वह नींद से चौंक उठा, और खूंटी को धरन में से उखाड़ कर उसे ताने समेत ले गया। 
Jdg 16:15  तब दलीला ने उस से कहा, तेरा मन तो मुझ से नहीं लगा, फिर तू क्यों कहता है, कि मैं तुझ से प्रीति रखता हूं? तू ने ये तीनों बार मुझ से छल किया, और मुझे नहीं बताया कि तेरे बड़े बल का भेद क्या है। 
Jdg 16:16  सो जब उस ने हर दिन बातें करते करते उसको तंग किया, और यहां तक हठ किया, कि उसके नाकों में दम आ गया, 
Jdg 16:17  तब उस ने अपने मन का सारा भेद खोल कर उस से कहा, मेरे सिर पर छुरा कभी नहीं फिरा, क्योंकि मैं मां के पेट ही से परमेश्वर का नाजीर हूं, यदि मैं मूढ़ा जाऊं, तो मेरा बल इतना घट जाएगा, कि मैं साधारण मनुष्य सा हो जाऊंगा। 
Jdg 16:18  यह देख कर, कि उस ने अपने मन का सारा भेद मुझ से कह दिया है, दलीला ने पलिश्तियों के सरदारों के पास कहला भेजा, कि अब की बार फिर आओ, क्योंकि उस ने अपने मन का सब भेद मुझे बता दिया है। तब पलिश्तियों के सरदार हाथ में रूपया लिए हुए उसके पास गए। 
Jdg 16:19  तब उस ने उसको अपने घुटनों पर सुला रखा; और एक मनुष्य बुलवाकर उसके सिर की सातों लटें मुण्डवा डालीं। और वह उसको दबाने लगी, और वह निर्बल हो गया। 
Jdg 16:20  तब उस ने कहा, हे शिमशोन, पलिश्ती तेरी घात में हैं! तब वह चौंक कर सोचने लगा, कि मैं पहिले की नाईं बाहर जाकर झटकूंगा। वह तो न जानता था, कि यहोवा उसके पास से चला गया है। 
Jdg 16:21  तब पलिश्तियों ने उसको पकड़ कर उसकी आंखें फोड़ डालीं, और उसे अज्जा को ले जाके पीतल की बेडिय़ों से जकड़ दिया; और वह बन्दीगृह में चक्की पीसने लगा।

एक साल में बाइबल: 
  • यर्मियाह १२-१४ 
  • २ तिमुथियुस १