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शनिवार, 8 जनवरी 2022

प्रभु यीशु की कलीसिया या मण्डली - स्वयं प्रभु ही के द्वारा

 

प्रभु यीशु अपनी कलीसिया स्वयं ही बना रहा है  

मसीही विश्वासियों की मण्डली, या प्रभु की कलीसिया के विषय इस अध्ययन में हम मत्ती 16:18 से, जहाँकलीसियाशब्द बाइबल में सबसे पहले प्रयोग हुआ है, कलीसिया के विषय वचन में दी गई बातों को देखते आ रहे हैं। हमने देखा है कि प्रभु यीशु की कलीसिया या मण्डलीइस पत्थर”, जो मत्ती 16:16 में पतरस को परमेश्वर से मिले दर्शनतू जीवते परमेश्वर का पुत्र मसीह हैपर आधारित है। हमने यह भी देखा कि पतरस को मिले इस ईश्वरीय दर्शन मेंयीशुकी बजाएमसीह”, अर्थात “परमेश्वर द्वारा नियुक्त और अभिषिक्त जगत का एकमात्र उद्धारकर्ता” शब्द के प्रयोग का क्या महत्व है; और फिर पिछले लेख में हमने समझा था कि प्रभु यीशु मसीह के जगत काएकमात्र उद्धारकर्ताहोने का क्या तात्पर्य है। संभव है कि कुछ लोगों को यह विश्लेषण नाहक हीबाल की खाल निकालने’, शब्दों से खेलने, के समान लगता हो। किन्तु अनन्तकाल के दृष्टिकोण और मसीही विश्वासी होने के उद्देश्य की ठीक समझ रखने के लिए इन बातों को जानना और समझना अत्यावश्यक है, अनिवार्य है। 

मत्ती 16:18 में लिखे प्रभु के कहे वाक्य पर ध्यान कीजिए - “...मैं इस पत्थर पर अपनी कलीसिया बनाऊंगा...”; प्रभु के इस वाक्य में तीन बातें बहुत महत्वपूर्ण हैं:

  • पहली, प्रभु स्वयं ही अपनी कलीसिया, अर्थात उसे जगत का एकमात्र उद्धारकर्ता मानने वालों के समूह को एकत्रित करेगा; वह यह कार्य किसी और से नहीं करवाएगा, यह ज़िम्मेदारी किसी और को नहीं सौंपेगा, वरन इस स्वयं ही पूरा करेगा। यही इस बात को दिखाता है कि यह कार्य कितना महत्वपूर्ण है, और इसे ठीक से करना कितना आवश्यक है; इसमें किसी भी प्रकार की कोई भी त्रुटि होने, कमी रहने का कोई स्थान, कोई गुंजाइश ही नहीं है। इसलिए वह सिद्ध, सर्वज्ञानी, सर्वशक्तिमान, सार्वभौमिक प्रभु परमेश्वर इसे स्वयं ही पूरा करेगा।  
  • दूसरी, वह कलीसिया प्रभु यीशु की अपनी होगी; उसे किसी व्यक्ति या स्थान, या किसी अन्य भौतिक, नश्वर, नाशमान के नाम या गुण के आधार पर नहीं जाना जाएगा; वह केवलप्रभु यीशु की कलीसियाप्रभु यीशु द्वारा बुलाए और एकत्रित किए गए लोगों का और उस ही के नाम से पहचाने जाने वाले लोगों का समूह होगा। 
  • तीसरी, प्रभु ने कहा कि वह ही अपनी इस कलीसिया कोबनाएगा’ - भविष्य काल; जब प्रभु ने यह बात कही कलीसिया उस समय वर्तमान नहीं थी, बनाई जानी थी। प्रभु द्वारा कही गई यह बात प्रेरितों 2 अध्याय में पतरस के प्रचार और उस प्रचार द्वारा हुई प्रतिक्रिया के साथ आरंभ हुई थी। किसी वस्तु कोबनानेमें समय और प्रयास लगता है, उसे उसके पूर्ण और अंतिम स्वरूप में लाने या ढालने के लिए एक प्रक्रिया से होकर निकलना पड़ता है। प्रभु की कलीसिया भी प्रभु के द्वाराबनाईजा रही है, उसमें अभी भी संसार भर से लोग जोड़े जा रहे हैं। अभी वह पूर्ण नहीं हुई है। प्रभु उसे बना भी रहा है और जितनी बन गई है, उसे प्रभु निष्कलंक, बेझुर्री भी बनाता जा रहा है, जिससे अन्ततः अपने पूर्ण स्वरूप में वह तेजस्वी, पवित्र और निर्दोष होकर उसके साथ खड़ी हो (इफिसियों 5:27)। अभी प्रभु उसे बनाने में कार्यरत है, कलीसिया निर्माणाधीन है, इसीलिए आज हमें उसमें कुछ कमियाँ, दोष, अपूर्णता, और सुधार के योग्य बातें दिखती हैं।

हम इन तीनों बातों को, परमेश्वर के वचन बाइबल के आधार पर, बारी-बारी से कुछ और विस्तार से देखेंगे। 

पहली बात, प्रभु स्वयं ही अपनी कलीसिया को बना रहा है। उसने यह कार्य किसी और पर, यहाँ तक कि उसके मानवीय शिष्य तो दूर, इस स्‍वर्गदूतों के हाथों में भी नहीं छोड़ा है। यही प्रभु परमेश्वर के लिए इस बात के महत्व और बड़े ध्यान तथा बारीकी से किए जाने की अनिवार्यता को दिखाता है। कलीसिया के आरंभ होने, और आरंभिक विस्तार के बारे में बाइबल में लिखी बातों को देखिए:

  • सो जिन्होंने उसका वचन ग्रहण किया उन्होंने बपतिस्मा लिया; और उसी दिन तीन हजार मनुष्यों के लगभग उन में मिल गए। और वे प्रेरितों से शिक्षा पाने, और संगति रखने में और रोटी तोड़ने में और प्रार्थना करने में लौलीन रहे” (प्रेरितों 2:41-42)। पतरस द्वारा किए गए प्रचार, और पापों से पश्चाताप के आह्वान (प्रेरितों 2:38) से कायल होकर उनभक्त यहूदियों” (प्रेरितों 2:5) में से तीन हज़ार ने प्रभु के वचन पर विश्वास किया, बपतिस्मा लिया, औरउनमेंअर्थात प्रभु के उन चुने हुए शिष्यों में मिल गए। साथ ही उनके जीवनों, प्रभु के प्रति उनके दृष्टिकोण, और उनकी प्राथमिकताओं में एक आधारभूत परिवर्तन आ गया; अब वे प्रेरितों से शिक्षा पाने, संगति रखने, प्रभु की मेज़ में सम्मिलित होने, और प्रार्थना करने में लौलीन रहने लगे। यह कलीसिया का, और सच्चे मसीही विश्वासियों की पहचान और उनके मन तथा जीवन में होने वाले परिवर्तन आरंभ था 
  • और परमेश्वर की स्तुति करते थे, और सब लोग उन से प्रसन्न थे: और जो उद्धार पाते थे, उन को प्रभु प्रति दिन उन में मिला देता था” (प्रेरितों 2:47)। इसके बाद जो लोग उद्धार पाते थे, उन्हें न तो प्रभु के शिष्य या प्रेरित, और न ही इन प्रथम 3000 विश्वासियों में से कोई व्यक्ति, वरन स्वयं प्रभु ही अपने शिष्यों को अपनी कलीसिया में मिला देता था।
  • और प्रेरितों के हाथों से बहुत चिन्ह और अद्भुत काम लोगों के बीच में दिखाए जाते थे, (और वे सब एक चित्त हो कर सुलैमान के ओसारे में इकट्ठे हुआ करते थे। परन्तु औरों में से किसी को यह हियाव न होता था, उन में जा मिलें; तौभी लोग उन की बड़ाई करते थे। और विश्वास करने वाले बहुतेरे पुरुष और स्त्रियां प्रभु की कलीसिया में और भी अधिक आकर मिलते रहे।) (प्रेरितों 5:12-14)। कलीसिया के आरंभिक समय से ही प्रेरितों के द्वारा बहुत चिह्न और अद्भुत काम लोगों के मध्य होने लगे; लोग उन सभी की बड़ाई करते थे; किन्तु फिर भी किसी में स्वतः ही उनमें मिल जाने का साहस नहीं होता था। न ही यह लिखा है कि प्रेरित या शिष्य लोगों को अपने में मिला लेते थे - यद्यपि वे पवित्र आत्मा से भरे हुए थे, सामर्थ्य से पापों से पश्चाताप और उद्धार का सुसमाचार सुना सकते थे, चिह्न और अद्भुत कार्य तो कर सकते थे, किन्तु किसी को भी मण्डली या कलीसिया में सम्मिलित नहीं कर सकते थे।प्रभु की कलीसियामें स्वयं प्रभु ही लोगों को जोड़ता था; अन्य कोई भी नहीं। प्रथम कलीसिया, “प्रभु की कलीसियाथी; किसी प्रेरित की, या किसी स्थान की बनाई अथवा स्थापित की हुई कलीसिया नहीं थी। 

और जब प्रभु का काम बढ़ने लगा, तो प्रभु द्वारा मत्ती 13:24-30 में दिए दृष्टांत, और 13:37-43 में दी गई उसकी व्याख्या के अनुसार, शैतान ने भी प्रभु के लोगों में अपने दुष्ट लोग मिलाना आरंभ कर दिया। किन्तु वर्तमान में प्रभु ने स्‍वर्गदूतों को भी उन दुष्ट लोगों को हटाने की अनुमति नहीं दी है, वरन, इस पृथक करने के कार्य को अंत के लिए रखा है, कहीं दुष्टों को हटाने में प्रभु के लोगों की हानि न हो जाए (13:28-30) - प्रभु स्‍वर्गदूतों को भी अपनी कलीसिया के साथ छेड़-छाड़ नहीं करने देता है। किन्तु समय-समय पर प्रभु अपने लोगों को सचेत करता रहता है, उन दुष्टों को प्रकट तथा अलग करता रहता है (प्रेरितों 20:29-31; 2 तिमुथियुस 4:10, 14; 1 यूहन्ना 2:18-19; 4:1-6; 3 यूहन्ना 1:9-10)। प्रभु की कलीसिया में केवल प्रभु के ही लोग रहने पाएंगे, प्रभु अन्य किसी को नहीं रहने देगा; और यह कलीसिया के लोगों को जाँचने, परखने, सही को गलत से पृथक करने का कार्य प्रभु स्वयं ही करता रहता है; किसी अन्य से कदापि नहीं करवाता है, कहीं गलती से उसका एक भी विश्वासी जन कोई हानि न उठाए। 

यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं, तो अपने आप को जाँच कर देखिए कि आप किस आधार पर अपने आप को मसीही विश्वासी कहते हैं, और किस प्रक्रिया के द्वारा कलीसिया से जुड़े हैं? जिस कलीसिया से आप जुड़े हैं, क्या वह वास्तव में प्रभु की कलीसिया है, या किसी मनुष्य, डिनॉमिनेशन, या संस्था की स्थापित की हुई, उनके नियमों और धारणाओं के अनुसार संचालित की जाने वाली कलीसिया है? इस जाँचने और पहचानने का एक चिह्न है प्रथम कलीसिया की स्थापना के साथ कलीसिया के सदस्यों के जीवनों में आया परिवर्तन और उनका प्रेरितों 2:42 की बातों में लौलीन रहना। क्या 2:42 की वे चार बातें, आपके जीवन का भी अनिवार्य और सर्वोपरि भाग हैं; क्या आप भी उनमें लौलीन रहते हैं?

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी। 

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • उत्पत्ति 20-22     
  • मत्ती 6:19-34  

शुक्रवार, 7 जनवरी 2022

प्रभु यीशु की कलीसिया या मण्डली - “एकमात्र उद्धारकर्ता” पर बनी हुई

 प्रभु यीशु केएकमात्र उद्धारकर्ताहोने का अर्थ

पिछले लेखों में हम मत्ती 16:18 के आधार पर प्रभु यीशु मसीह की कलीसिया या मण्डली, अर्थात उसके द्वारा चुने और बुलाए गए लोगों का समूह होने के बारे में देखते आ रहे हैं। हम देख चुके हैं कि प्रभु ने अपने इन चुने हुए लोगों पतरस पर आधारित करके नहीं बुलाया और स्थापित किया; वरन उन्हें अपने तथा अपने वचन की शिक्षाओं पर आधारित एवं स्थापित किया है। साथ ही हमने पिछले लेख में यह भी देखा था कि प्रभु की कलीसिया, अर्थात उसके बुलाए हुए लोग वे हैं जो उसेमसीहअर्थात परमेश्वर द्वारा नियुक्त और निर्धारित जगत का एकमात्र उद्धारकर्ता स्वीकार करते हैं। 

मसीहीकहलाना या समझे जाना, और वास्तविकता में वह सच्चामसीहीहोना जिसकी बात प्रभु यीशु ने मत्ती 16:18 में की है, व्यवहारिक रीति से दो बिलकुल भिन्न बातें हैं। यद्यपि सामान्यतः यही समझा और माना जाता है कि किसी परिवार विशेष में जन्म लेने के आधार पर, या किसी डिनॉमिनेशन, अथवा संस्था, याचर्चका सदस्य होने और उसकी प्रथाओं के निर्वाह, और कुछ अनुष्ठानों की पूर्ति, आदि के द्वारा व्यक्ति ईसाई या मसीही जन्म से ही होता है या फिर बन जाता है। किन्तु इस आम लेकिन गलत धारणा के विपरीत, परमेश्वर के वचन बाइबल की वास्तविकता यही है कि ऐसा करने से वह व्यक्ति समाज, कुछ लोगों, अथवा उसचर्चया डिनॉमिनेशन या संस्था के द्वारा तोमसीहीमाना और कहा जा सकता है; किन्तु अनिवार्य नहीं है कि वह वास्तव में प्रभु की दृष्टि में भीमसीहीहो, प्रभु की कलीसिया या बुलाए हुए लोगों में सम्मिलित हो। क्योंकि जो कोई भी अपने परिवार, अपनी धार्मिकता, अपने कर्मों, अपनीचर्चया डिनॉमिनेशन या संस्था की सदस्यता, अपने द्वारा प्रथाओं के निर्वाह और अनुष्ठानों की पूर्ति आदि पर आधारित होकर प्रभु की कलीसिया का सदस्य होना चाहता अथवा समझता है, वह इस प्राथमिक आधारभूत बात की वास्तविकता की उपेक्षा कर देता है कि वह फिर प्रभु यीशु के जगत का एकमात्र उद्धारकर्ता होने पर नहीं, वरन प्रभु परमेश्वर के अतिरिक्त उसचर्चया डिनॉमिनेशन या संस्था की अन्य बातों पर भरोसा रख कर और उनका पालन करके ऐसा करना चाहता है, और यह प्रभु की कलीसिया में होने की मूल शर्त की अवहेलना करना है। क्योंकि प्रभु को परमेश्वर कामसीहस्वीकार करना, पापों से पश्चाताप और मसीह यीशु को अपने जीवन के पूर्ण समर्पण के द्वारा होता है (रोमियों 10:9-10), वंश या कर्मों, या अनुष्ठानों के द्वारा नहीं। 

ध्यान कीजिए, जब यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले ने प्रभु के आगमन के लिए लोगों को तैयार करना आरंभ किया तो उसके प्रचार का प्रथम और मुख्य विषय पश्चाताप करना था (मत्ती 3:1-2); यही प्रभु यीशु की सेवकाई का भी प्रथम और मुख्य विषय था (मरकुस 3:1-2); तथा प्रभु द्वारा शिष्यों को दिए गए अंतिम निर्देश का भी विषय था (लूका 24:47); यही शिष्यों के द्वारा किए गए पहले प्रचार का मुख्य विषय था (मरकुस 6:12); और पश्चाताप करना ही पतरस के द्वारा किए गए पहले प्रचार का प्रथम और मुख्य विषय था (प्रेरितों 2:38), जिससे प्रथम कलीसिया की स्थापना हुई थी; यही पौलुस के द्वारा किए गए प्रचार का मुख्य विषय था (प्रेरितों 20:21); और पुराने नियम के भविष्यद्वक्ताओं की सेवकाई का विषय भी यही था (यिर्मयाह 25:4-5)। इसलिए जब प्रभु ने उसे जगत का एकमात्र उद्धारकर्ता स्वीकार करने के आधार पर लोगों को बुलाने और अपने साथ एकत्रित करने, कलीसिया को बनाने की बात की, तो कोई अनूठा या नया विषय सामने नहीं रखा। प्रभु ने वही दृढ़ता से दोहराया और उसी की पुष्टि की जो पुराने नियम में भविष्यद्वक्ताओं की सेवकाई का विषय था, यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले की सेवकाई का विषय था, प्रभु की अपनी सेवकाई का, और शिष्यों द्वारा की गई पहली सेवकाई का विषय था; और जो भविष्य में अन्य शिष्यों द्वारा की जाने वाली सेवकाई का भी विषय होना था। बिना अपने पापों से पश्चाताप किए और प्रभु यीशु को अपना जीवन पूर्णतः समर्पण करके जीवन में परिवर्तन किए (रोमियों 12:1-2) उद्धार पाने या परमेश्वर को स्वीकार्य प्रभु का जन हो जाने की कोई शिक्षा बाइबल में कहीं नहीं दी गई है। प्रभु का जन बनना प्रत्येक व्यक्ति के द्वारा व्यक्तिगत रीति से और स्वेच्छा से अपने पापों के लिए किए गए पश्चाताप, उन पापों की क्षमा और निवारण के लिए प्रभु यीशु द्वारा क्रूस पर किए गए कार्य को स्वीकार करने, और अपना जीवन पूर्णतः प्रभु को समर्पित करने के द्वारा होता है, चाहे उस व्यक्ति का जन्म किसी भी परिवार में हुआ हो, और चाहे उसने कितनी भी “ईसाई या मसीहीरीतियों और अनुष्ठानों को निभाया हो (प्रेरितों 17:30-31)। प्रभु कोमसीहया परमेश्वर द्वारा नियुक्त जगत का एकमात्र उद्धारकर्ता होना स्वीकार करने का यही अभिप्राय है। प्रभु की कलीसिया या मण्डली उन ही लोगों से मिलकर बनी है जो इस मूल सिद्धांत को स्वीकार करके इसका पालन करते हैं; इसमें कुछ और जोड़ते-घटाते नहीं हैं, मनुष्यों की और उनके समझ-बुद्धि-ज्ञान की बातों को या बाइबल के बाहर की किसी अन्य बात को इसके साथ या इसके अतिरिक्त मानने या मनवाने का प्रयास नहीं करते हैं। 

हम अगले लेख में देखेंगे कि क्यों ये बातें केवल शब्दों का खेल या भिन्न समझ रखने की बात नहीं है; क्यों ये इतनी महत्वपूर्ण हैं; अनन्त जीवन का वारिस होने के लिए समझे और माने जाने के लिए अनिवार्य हैं। 

यदि आप मसीही हैं, तो अपने आप को जाँचिए और परखिए कि कहीं आप अपने परिवार, अपने कार्यों, अपने द्वारा रीतियों और अनुष्ठानों को निभाने, आदि बातों के आधार पर तो अपने आप को मसीही और प्रभु की कलीसिया का सदस्य तो नहीं समझ रहे हैं, या समझते आ रहे हैं? यदि ऐसा है तो आप एक बहुत बड़ी गलतफहमी में जी रहे हैं, और अभी समय रहते अपने पापों के लिए सच्चा पश्चाताप और प्रभु यीशु को संपूर्ण समर्पण कर के इसे सुधार लीजिए। कहीं आप किसी भ्रम में जीते रह जाएं, और अंततः जब सच्चाई समझ में आए, आँख खुले, तब तक बहुत देर हो चुकी हो।

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी। 

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • उत्पत्ति 18-19     
  • मत्ती 6:1-18

गुरुवार, 6 जनवरी 2022

प्रभु यीशु की कलीसिया या मण्डली - उसके “मसीह” होने पर


वास्तविक कलीसिया प्रभु यीशु कोमसीहस्वीकार करने वालों से है। 

 पिछले लेखों में हमने परमेश्वर के वचन बाइबल में सबसे पहली बारकलीसियाशब्द के प्रयोग के पद -और मैं भी तुझ से कहता हूं, कि तू पतरस है; और मैं इस पत्थर पर अपनी कलीसिया बनाऊंगा: और अधोलोक के फाटक उस पर प्रबल न होंगे” (मत्ती 16:18) के विश्लेषण से कलीसिया से संबंधित कुछ अति महत्वपूर्ण बातों को देखा और समझा था। सबसे पहले हमने देखा था कि बाइबल के अनुसार, कलीसिया शब्द का अर्थ कोई विशिष्ट भौतिक भवन अथवा आराधना स्थल नहीं है, वरन बुलाए गए या एकत्रित किए गए लोगों का समूह है। फिर हमने देखा और समझा था कि यह पद एक बहुत आम किन्तु बिलकुल गलत धारणा, कि प्रभु ने यहाँ पर अपनी कलीसिया को पतरस पर बनाने के लिए कहा है का कदापि समर्थन नहीं करता है। इस गलत धारणा के विषय विस्तार से देखते हुए हमने यहाँ पर प्रभु के द्वारा कहे शब्दइस पत्थरऔर उसके वास्तविक अर्थ को समझा था, तथा यह भी देखा था कि वचन के अन्य किसी भी भाग में इस बात का कोई संकेत भी नहीं है कि प्रभु यीशु ने पतरस पर कलीसिया बनाने की बात कही, और न ही पतरस के मसीही व्यवहार में वह स्थिरता एवं दृढ़ता थी कि प्रभु की कलीसिया उस पर बना जा सके। कलीसिया के वास्तविक अर्थ और पतरस के कलीसिया का आधार नहीं होने के स्पष्ट हो जाने के बाद, अब हम इस पद में प्रभु द्वारा कही गई और बातों को देखेंगे तथा समझेंगे, जिससे प्रभु द्वारा लोगों को मसीही विश्वास में बुलाने और उनके जीवनों से प्रभु के प्रयोजन को, उसके उद्देश्यों को हम भली-भांति समझ सकें। 

मत्ती 16:18 में पतरस से संबंधित बात कहने के पश्चात, प्रभु यीशु का अगला वाक्य था, “...और मैं इस पत्थर पर अपनी कलीसिया बनाऊंगा...। हम पहले देख चुके हैं किइस पत्थरसे प्रभु का अभिप्राय पतरस द्वारा मत्ती 16:16 में कही गई बात है कि “... तू जीवते परमेश्वर का पुत्र मसीह है”, जिसका अनुमोदन प्रभु ने पद 17 में किया, जिसके लिए पतरस को धन्य भी कहा, और यह भी कहा कि पतरस को यह प्रभु यीशु के विषय परमेश्वर द्वारा दिया गया स्वर्गीय दर्शन है, उसकी अपनी समझ अथवा बुद्धि की बात नहीं है। मत्ती 16:18 में प्रभु इसी दर्शन के अनुसार अपने द्वारा बुलाए हुए लोगों को एक समूह में एकत्रित करने, अपनी कलीसिया बनाने की बात करता है। मत्ती 16:18 की और बातों को आगे देखने से पहले यह बात समझना और ध्यान में रखना अनिवार्य है कि पतरस द्वारा पद 16 में कही गई बात कि “... तू जीवते परमेश्वर का पुत्र मसीह हैक्यों परमेश्वर द्वारा पतरस को दिया गया एक स्वर्गीय दर्शन है, और क्यों यह बात इतनी महत्वपूर्ण है कि यही प्रभु द्वारा उसकी कलीसिया के बनाए जाने का आधार ठहरेगी।

ध्यान कीजिए कि पतरस द्वारा मत्ती 16:16 में कही गई बात, “... तू जीवते परमेश्वर का पुत्र मसीह हैमें प्रभु के लिए उसका नामयीशुप्रयोग नहीं किया गया है, जबकियीशुही उसका नाम था, जो स्वर्गदूत ने यूसुफ को बताया था (मत्ती 1:20-21)। इसलिए यहाँ पर पतरस द्वारा यह कहना कि  “... तू जीवते परमेश्वर का पुत्र यीशु हैअधिक उचित एवं सही होता। किन्तु न तो पतरस ने यह कहा, न ही प्रभु ने उसे सुधार के उससे यह कहलवाया, अपितु, उसकी इसी बात के लिए उसे सराहा और उसे धन्य कहा, तथा इसी बात को पिता परमेश्वर द्वारा उसे प्रदान किया गया स्वर्गीय दर्शन बताया। यह कलीसिया की सही समझ प्राप्त करने के लिए अनिवार्य और अत्यावश्यक तथ्य है जिसकी अवहेलना करने के द्वारा कलीसिया के विषय अनेकों गलफहमियाँ ईसाई या मसीही समाज में व्याप्त हो गई हैं, शैतान ने फैला दी हैं। पतरस द्वारायीशुके स्थान परमसीहप्रयोग करने का क्या अर्थ एवं महत्व है

आम धारणा के विपरीत, “मसीहप्रभु का नाम नहीं है; वरन यह प्रभु को उसके कार्य के लिए दी गई उपाधि या पहचान है।मसीह, या अंग्रेजी का “Christ” शब्द मूल यूनानी भाषा के “Christos” शब्द से हैं; और “Christos” शब्द का शब्दार्थ होता है किसी विशेष कार्य के लिए अभिषिक्त या मस्सा किया हुआ, या अंग्रेजी में “the Anointed one”; और हिन्दी केमस्सा किया हुआसे हीमसीहशब्द आया है। अर्थात जब पतरस ने प्रभु के प्रश्न के उत्तर में कहा कि “... तू जीवते परमेश्वर का पुत्र मसीह है”, तो वास्तव में पिता परमेश्वर ने पतरस से प्रभु यीशु के लिए कहलवाया था कितू ही वह परमेश्वर का पुत्र है जो अभिषिक्त या मस्सा किया हुआ है” - पतरस पर पिता परमेश्वर द्वारा प्रभु यीशु के परमेश्वर का पुत्र और जगत का एकमात्र उद्धारकर्ता होने का दर्शन प्रकट किया गया, और उसने इस दर्शन को अपने शब्दों में बोल दिया। और जब प्रभु यीशु ने पतरस द्वारा कहे गए इस वाक्य को वहपत्थर”, अर्थात वहपेत्रा’, या वहस्थिर, दृढ़, और अडिग चट्टानकहा जिस पर वह अपनी कलीसिया, या अपने बुलाए और एकत्रित किए हुए लोगों के समूह को स्थापित करने जा रहा था, तो प्रभु के कहने का अभिप्राय था किजो भी इस विश्वास के साथ उसके पास आएगा कि केवल वही परमेश्वर का पुत्र और पिता परमेश्वर की ओर से ठहराया हुआ, अभिषिक्त किया हुआ जगत का एकमात्र उद्धारकर्ता है, वही और केवल वही उसके एकत्रित किए हुओं में सम्मिलित होगा, उनके लोगों का एक भाग होगा। प्रभु की कलीसिया का सदस्य होने के लिए इस वाक्य के महत्व पर ध्यान कीजिए, उस को समझिए, और आजकलीसियायाचर्चसे संबंधित कई गलत धारणाओं की सच्चाई प्रकट हो जाएगी।

साथ ही अपने आप को उस समय की स्थिति में लाकर पतरस द्वारा कही गई इस बात के झकझोर देने वाले प्रभाव पर भी विचार कीजिए। व्यवस्थाविवरण 18:15, 18 में मूसा ने इस्राएलियों से अपने समान एक परमेश्वर के नबी के आने की बात कही थी, और फिर परमेश्वर की ओर से भविष्यद्वक्ता उसके आने की भविष्यवाणियाँ करते चले आ रहे थे। प्रभु यीशु की पृथ्वी की सेवकाई के दिनों में लोगों में एक उत्साह और आशा थी, कि परमेश्वर द्वारा प्रतिज्ञा किया हुआ मसीहा आने वाला है, हालात संकेत कर रहे थे कि वह अब कभी भी आ जाएगा, जैसा सामरी स्त्री ने कहा (यूहन्ना 4:25, 29), तथा यहूदियों में भी एक प्रत्याशा थी (यूहन्ना 6:14; 7:41)। पतरस से उसके भाई अंद्रियास ने आरंभ में ही यीशु के मसीहा होने की बात कह दी थी (यूहन्ना 1:41); और सामरी स्त्री की बात सुनकर तथा प्रभु यीशु को स्वयं अनुभव कर के सामरिया के उस गाँव के लोग भी मान गए थे कि यीशु ही मसीह है (यूहन्ना 4:39, 42)। किन्तु अभी तक प्रभु यीशु ने कभी उन लोगों के द्वारा उसका वह प्रतिज्ञा किए हुए मसीहा होने की बात को जानने और मानने को ऐसा महत्व नहीं दिया था, जितना अब पतरस के द्वारा यह कहने पर दिया।

पतरस तथा प्रभु के शिष्यों के लिए प्रभु द्वारा पतरस की बात को पिता परमेश्वर द्वारा दिया गया स्वर्गीय दर्शन बताना, और इसे आधार बनाकर अपने शिष्यों को एकत्रित करने की बात करना प्रभु यीशु द्वारा कही गई एक अभूतपूर्व बात थी। अब और यहाँ से, यह मानवीय समझ और धारणाओं से निकलकर ईश्वरीय पुष्टि के साथ उन शिष्यों के भविष्य को निर्धारित करने वाली बात हो गई थी। प्रभु ने अभी तक के अपने किसी भी शिष्य को इस बात के आधार पर नहीं बुलाया था। उसने पतरस को और कुछ अन्य शिष्यों कोमनुष्यों को पकड़ने वाला” (मत्ती 4:19; लूका 5:10) बनाने के आश्वासन के साथ तो बुलाया था, किन्तु किसी के लिए यह नहीं कहा था कि जब तक वह उसे परमेश्वर का पुत्र और जगत का परमेश्वर द्वारा निर्धारित एकमात्र उद्धारकर्ता स्वीकार नहीं कर लेते हैं, वे उसके जन नहीं हो सकते हैं; यदि कहा होता तो संभवतः यहूदा इस्करियोती आरंभ में ही बाहर हो गया होता! किन्तु अब प्रभु उनसे और आने वालों उसके लोगों के लिए कह रहा था कि केवल वही उसका बुलाया हुआ और उसके साथ रहने के लिए एकत्रित किया हुआ होगा जो उसे परमेश्वर का पुत्र और परमेश्वर द्वारा नियुक्त जगत का एकमात्र उद्धारकर्ता स्वीकार करेगा। प्रभु यीशु की इस बात के कारण संभवतः उन शिष्यों के मनों में एक खलबली मच गई होगी, वे अपने आप को देखने लगे होंगे कि क्या हम इस कसौटी पर खरे उतरते हैं कि नहीं? थोड़ा थम कर विचार कीजिए क्या पतरस की कही इस बात की समझ आपके मन में भी यही खलबली मचा रही हैआप अपने आप को मसीही किस आधार पर कहते हैं? मनुष्यों के ज्ञान की बातें नहीं, परमेश्वर की बातें ही मनों को टटोलती हैं, झकझोरती हैं, मनों की वास्तविकता को सामने लाती हैं।

यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं तो क्या आप का मसीही होना, अपने आप को मसीही विश्वासी कहना, पतरस द्वारा कही गई, और प्रभु द्वारा अनुमोदित की गई इसी बात, इसी स्वर्गीय दर्शन पर आधारित है? या आप किसी डिनॉमिनेशन अथवा मत या समुदाय की रीतियों और मान्यताओं के पालन के द्वारा अपने आप कोमसीहीसमझते आ रहे हैं? 2 कुरिन्थियों 13:5 के अनुसार, अपने आप को परख कर देखें कि आप सच्चे मसीही विश्वास में हैं कि नहीं? कहीं आप किसी भ्रम में जीते आ रहे हों, और अंततः जब सच्चाई समझ में आए, आँख खुले, तब तक बहुत देर हो चुकी हो।

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।



एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • उत्पत्ति 16-17     
  • मत्ती 5:27-48       

बुधवार, 5 जनवरी 2022

मसीह यीशु की कलीसिया या मण्डली - डांवांडोल नहीं, दृढ़ आधार पर बनाई गई


क्या पतरस मण्डली का डांवांडोल नहीं वरन दृढ़ आधार बन सकता था?

पिछले लेखों में प्रभु यीशु की मण्डली या कलीसिया के बारे में देखते आ रहे हैं। हमने देखा है कि मूल यूनानी भाषा में, प्रभु यीशु द्वारा मत्ती 16:18 में प्रयुक्त शब्द का अर्थ बुलाए गए या एकत्रित किए गए लोगों का समूह है, न कि कोई भवन अथवा संस्था। साथ ही हमने देखा है कि इस पद को लेकर यह गलत शिक्षा दी जाती है कि प्रभु ने अपनी मण्डली या कलीसिया को पतरस पर बनाने की बात कही है। हमने देखा है कि मत्ती 16:18 में प्रभु की कही गई बात की वास्तविकता को तीन बातों:

  • क्या मत्ती 16:18 में प्रभु की कलीसिया बनाने की बात पतरस के लिए थी?
  • क्या वचन में किसी अन्य स्थान पर पतरस पर कलीसिया बनाने की, उसे कलीसिया का आधार रखने की पुष्टि है?
  • क्या पतरस इस आदर और आधार के योग्य था?

के आधार पर जाँच और समझ सकते हैं। पिछले लेखों में हमने इनमें से पहली दो बातों के विश्लेषण को देखा था, और समझा था कि प्रभु यीशु ने आलंकारिक भाषा का प्रयोग तो किया, किन्तु मत्ती 16:18 में यह बात पतरस के विषय नहीं कही थी। आज हम तीसरी बात, “क्या पतरस इस आदर और आधार के योग्य था?” को देखेंगे।

प्रभु यीशु मसीह ने अपने पहाड़ी उपदेश (मत्ती 5-7 अध्याय) के अंत की ओर आकार एक दृष्टांत दिया था - दो घर बनाने वालों का (मत्ती 7:24-27)। घर बनाने वाला एक व्यक्ति मूर्ख ठहरा क्योंकि उसने स्थिर और दृढ़ नींव पर घर नहीं बनाया, और वह घर परिस्थितियों का सामना नहीं कर सका, शीघ्र ही गिर गया। दूसरा घर बनाने वाला बुद्धिमान ठहरा, क्योंकि उसने घर की नींव चट्टान पर डाली थी, इसलिए उसका घर स्थिर बना रहा, सभी परिस्थितियों को झेल सका। फिर निष्कर्ष में प्रभु ने कहा है कि वह दृढ़ चट्टान जिस पर स्थिर और अडिग घर या जीवन स्थापित होता है, उसकी शिक्षाएं हैं। जो प्रभु की बातें मानता है, वह चट्टान पर बने घर के समान स्थिर और दृढ़ बना रहेगा; किन्तु जो प्रभु की बातों को सुनता तो है, परंतु उनका पालन नहीं करता है वह उस मूर्ख मनुष्य के समान होगा जिसका घर या जीवन परिस्थितियों को झेल नहीं सकेगा, स्थिर बना नहीं रहेगा। अपनी सेवकाई के आरंभ में ही यह शिक्षा देने के बाद, क्या यह संभव है कि प्रभु अपनी ही दी हुई शिक्षा से पलट कर, अपनी विश्व-व्यापी कलीसिया को किसी अस्थिर, डांवांडोल रहने वाले मनुष्य पर स्थापित करेगा? साथ ही ध्यान करें, मत्ती 28:18-20 में - जो स्वर्गारोहण से पहले प्रभु यीशु द्वारा अपने शिष्यों को दी गई उनकी सेवकाई के विषय महान आज्ञा है, प्रभु ने शिष्यों से जाकर लोगों को उसका शिष्य बनाने, और जो शिष्य बन जाएं उन्हें उसकी सिखाई हुई बातों को सिखाने का निर्देश दिया है। वहाँ प्रभु ने यह नहीं कहा कि जैसा पतरस बताए या सिखाए, वही करना, वैसा ही सिखाना। एक बार फिर प्रभु ने स्वयं इस बात को दिखा दिया कि उसकी कलीसिया पतरस की बातों पर नहीं, प्रभु की शिक्षाओं पर स्थापित होगी; जैसा हम पिछले लेख में विस्तार से देख चुके हैं।

आज हम वचन में दी गई बातों के आधार पर देखेंगे कि क्या पतरस कलीसिया या मण्डली के लिए अत्यावश्यक यह स्थिर, दृढ़, और अडिग आधार हो सकता था? क्या विभिन्न परिस्थितियों और अवसरों पर, वचन में दिया गया पतरस का व्यवहार, इस बात की पुष्टि करता है कि वह डांवांडोल नहीं, वरन प्रभु की शिक्षाओं और निर्देशों पर सदा स्थिर और अडिग रहने वाला व्यक्ति था? इस विश्लेषण के लिए हम प्रभु के पुनरुत्थान से पहले की बातों को नहीं देखेंगे; क्योंकि यह प्रकट है कि प्रभु के मारे जाने, गाड़े जाने, और मृतकों में से जी उठने और शिष्यों को दर्शन देने के बाद, प्रभु के उनसे मिलते रहने और उन्हें सेवकाई के लिए तैयार करने के द्वारा शिष्यों तथा पतरस में बहुत परिवर्तन आया था। किन्तु इस परिवर्तन के बावजूद, क्या पतरस प्रभु में अपने विश्वास और मण्डली में अपने मसीही व्यवहार में ऐसा स्थिर, दृढ़, और स्थापित हो गया था कि उसे कलीसिया का आधार बनाया जा सके?

प्रभु के पुनरुत्थान और स्वर्गारोहण के बाद की बातों को देखने से हमें पतरस के व्यवहार में कुछ खामियाँ दिखाई देती हैं, जो उसे अस्थिर और डांवांडोल तथा उस पर कलीसिया के स्थापित किए जाने के लिए अनुपयुक्त प्रकट करती हैं। ये बातें हैं:

  • पतरस उतावली से कार्य कर देता था, अधीर था; जिससे उसके साथ रहने वाले भी उसकी बातों में आकर बहक जाते थे। इसके दो उदाहरण हैं, पहला, यूहन्ना 21:2-3 पद में, जब वह वापस अपने पुराने काम, मछली पकड़ने की ओर लौट गया, और उसके साथ छः और लोग भी चले गए, किन्तु सभी असफल रहे। दूसरा, प्रेरितों 1:15-26 में, बिना प्रभु की आज्ञा के, या प्रभु से पूछे, उसने यह निर्णय लिया कि यहूदा इस्करियोती के स्थान पर किसी और को नियुक्त किया जाए; और सभी लोग उसकी बातों में भी आ गए, यह कर दिया। किन्तु ऐसा कोई प्रमाण नहीं है कि उनके द्वारा नियुक्त व्यक्ति को वचन में कोई स्वीकृति मिली हो। बारहवें प्रेरित का यह पद बाद में प्रभु ने पौलुस को दिया। यह विश्लेषण एक पृथक विषय है, जिसे हम यहाँ पर नहीं देख पाएंगे। 
  • पतरस का ध्यान, कम से कम उस आरंभिक समय में, प्रभु द्वारा दिए जा रहे निर्देशों पर कम, औरों के साथ अपनी तुलना करने में अधिक रहता था; जो आरंभिक कलीसिया के लिए अत्यावश्यक स्थिरता और निष्पक्षता के व्यवहार के अनुरूप नहीं था। इसका उदाहरण भी हम यूहन्ना 21:18-22 में देखते हैं; प्रभु पतरस को उसकी आने वाली सेवकाई और जिम्मेदारियों के विषय सिखाना चाह रहा है, और पतरस का ध्यान प्रभु की बात पर नहीं वरन अपने साथी यूहन्ना के भविष्य पर लगा है। जिसके विषय फिर प्रभु को उसे एक डाँट लगानी पड़ती है (पद 22) 
  • पतरस अभी स्वर्गीय दर्शनों को समझने और उनके अनुसार कार्य करने के लिए अपरिपक्व था। प्रेरितों 10:10-16 में प्रभु उसे दर्शन के द्वारा संसार के सभी लोगों के पास जाकर सुसमाचार प्रचार करने की बात दिखा और बता रहा है, और वह उसे केवल अपनी शारीरिक स्थिति के अनुसार समझ कर प्रभु की बात को मानने से इनकार कर रहा है। और प्रेरितों 10:17 में लिखा है कि जब कुरनेलियुस के घर से लोग उसके पास पहुँचे, तब वह असमंजस में ही पड़ा हुआ था। यदि उसकी आत्मिक परिपक्वता उचित स्तर की होती तो समझ जाता कि जो दर्शन उसने देखा और जहाँ जाने के लिए प्रभु ने बुलावा भेजा है, वे एक ही बात हैं, जिसके लिए प्रभु उसे उस दर्शन के द्वारा आगाह कर रहा था (प्रेरितों 10:19-20)
  • पतरस में प्रभु की विश्वव्यापी कलीसिया की स्थापना की समझ नहीं थी; इसी अपरिपक्वता और दर्शनों की नासमझी के कारण, वह यह नहीं समझ सका था कि प्रभु अन्यजातियों से भी उतना ही प्रेम करता है जितना यहूदियों से, जैसा उसने प्रेरितों 1:8 में शिष्यों तथा पतरस से सामरिया और संसार के छोर तक जाकर प्रचार करने के दायित्व देने के द्वारा प्रकट किया था। वह कुरनेलियुस के घर जाकर अपनी इसी अपरिपक्वता और नासमझी को प्रकट करता है (प्रेरितों 10:28-29)। जो व्यक्ति प्रभु के सुसमाचार के विश्वव्यापी उद्देश्य को नहीं समझता था, वह प्रभु की विश्वव्यापी कलीसिया के दर्शन को क्या जानेगा, और उसका आधार कैसे होगा?
  • पतरस लोगों को दिखाने के लिए अपने मसीही व्यवहार को बदलने और कपट करने वाला व्यक्ति था, और उसके इस व्यवहार के कारण उसके साथ रहने वाले और भी लोग बहक जाते थे। गलातियों 2:11-21 में, घटना लिखी गई है जब पतरस ने पौलुस के मसीही हो जाने के चौदह वर्षों (गलातियों 2:1) से भी अधिक के बाद, अर्थात लगभग दो दशकों तक कलीसिया में कार्य करते रहने के बाद भी, लोगों को दिखाने के लिए अपने आप को यहूदियों को स्वीकार्य दिखाने का प्रयास किया था, और उसके साथ बरनबास जैसे लोग भी इस बात में गिर गए। यह इतनी गंभीर गलती थी, कि पतरस के इस व्यवहार और उसकी भर्त्सना के लिए पवित्र आत्मा ने पौलुस के द्वारा इस व्यवहार और उससे संबंधित बातों के लिएकपट” (पद 13 ), “सुसमाचार की सच्चाई पर सीधी चाल नहीं चलना” (पद 14), “विश्वास की नहीं वरन कर्मों की धार्मिकता को दिखाने वाला” (पद 16), “पापी” (पद 17), “अपराधी” (पद 18), “परमेश्वर के अनुग्रह को व्यर्थ ठहराने वाला” (पद 21) जैसे कठोर और कटु शब्दों का प्रयोग किया, और इस घटना को तथा उससे संबंधित भर्त्सना के उन शब्दों को अनन्तकाल के लिए अपने वचन में लिखवा भी दिया, जिससे आज हम पतरस के समान ही मनुष्यों को प्रसन्न करने के लिए परमेश्वर की शिक्षाओं से विमुख होने की इस गलती में न पड़ जाएं।

अब विचार कीजिए, क्या प्रभु जो आदि से लेकर अन्त तक की हर बात को जानता है, जिससे कोई बात छुपी नहीं है, जिसके लिए भविष्य भी वर्तमान के समान ही है, क्या वह ऐसे अस्थिर और डांवांडोल व्यवहार और प्रवृत्ति रखने वाले मनुष्य पर कलीसिया स्थापित करेगा? वह भी अपनी स्वयं की शिक्षा (मत्ती 7:24-27) के विरुद्ध?

यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं, तो परमेश्वर पवित्र आत्मा की आज्ञाकारिता एवं अधीनता में वचन की सच्चाइयों को उससे समझें। किसी के भी द्वारा कही गई कोई भी बात को तुरंत ही पूर्ण सत्य के रूप में स्वीकार न करें, विशेषकर तब, जब वह बात बाइबल की अन्य बातों के साथ ठीक मेल नहीं रखती हो। सदा इस बात का ध्यान रखें कि वचन के हर शब्द, हर बात को न केवल उसके तात्कालिक संदर्भ में देखें, समझें, तथा व्याख्या करें, वरन यह भी सुनिश्चित करें कि आपकी वह समझ और व्याख्या वचन में अन्य स्थानों पर दी गई संबंधित बातों एवं शिक्षाओं के अनुरूप भी है, उनके साथ किसी प्रकार का कोई विरोधाभास नहीं है। कभी भी किसी भी गलत शिक्षा को न तो स्वीकार करें और न ही उसका प्रचार और प्रसार करें; परमेश्वर अपने वचन की सच्चाइयों की अवहेलना करने वालों को फिर उन्हीं की मनसा के अनुसार भयानक भ्रम और विनाश में डाल देता है (यहेजकेल 14:7-8; 2 थिस्सलुनीकियों 2:10-12) 

 यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • उत्पत्ति 13-15     
  • मत्ती 5:1-26         

मंगलवार, 4 जनवरी 2022

मसीह यीशु की कलीसिया या मण्डली - प्रभु एवं उसकी शिक्षाओं पर आधारित


बाइबल में दिए गए कलीसिया के आधार को समझें।   

प्रभु परमेश्वर द्वारा लोगों को उद्धार देने, अपने साथी (मत्ती 28:20; यूहन्ना 14:3, 18), परमेश्वर की संतान (यूहन्ना 1:12-13), और अपने साथ स्वर्ग के वारिस (रोमियों 8:17) बनाने; उन्हें संसार भर में जाकर अपने सुसमाचार के प्रचार की सेवकाई सौंपने और सेवकाई के अनुसार आत्मिक वरदान प्रदान करने के उद्देश्य को समझने के लिए हमें प्रभु की कलीसिया या मण्डली और उससे संबंधित बातों को समझना होगा। इस संदर्भ में प्रचलित कुछ भ्रांतियों और गलत शिक्षाओं की वास्तविकता को हम परमेश्वर के वचन बाइबल से देख रहे हैं। पहले हमने देखा कि आम धारणा के विपरीत, बाइबल के अनुसार कलीसिया कोई भौतिक वस्तुओं से बना हुए भवन, अथवा कोई संस्था नहीं है, वरन प्रभु यीशु द्वारा बुलाए गए, और उसके प्रति समर्पित लोगों का समूह है। हमने पहले देखा था कि शब्द कलीसिया या मण्डली मूल यूनानी भाषा के जिस शब्द का अनुवाद है, वह है “ekklesia, एक्कलेसियाजिसका शब्दार्थ होता है, “व्यक्तियों का एकत्रित होना”, याव्यक्तियों का समूहयाव्यक्तियों की सभा। कलीसिया को एक विशिष्ट भवन एवं आराधना-स्थल के साथ जोड़ने से संबंधित बातों को हम आगे देखेंगे। दूसरी बहुत आम भ्रांति और गलत शिक्षा है कि प्रभु ने कलीसिया को अपने शिष्य पतरस पर स्थापित किया है, और इस भ्रांति के समर्थन में मत्ती 16:18 में प्रभु की कही बात का हवाला दिया जाता है, जोकलीसियाशब्द का बाइबल में सर्वप्रथम प्रयोग का पद भी है।

पिछले लेख में हमने देखा था कि मत्ती 16:18 में प्रभु की कही गई बात की वास्तविकता को तीन बातों:

  • क्या मत्ती 16:18 में प्रभु की कलीसिया बनाने की बात पतरस के लिए थी?
  • क्या वचन में किसी अन्य स्थान पर पतरस पर कलीसिया बनाने की, उसे कलीसिया का आधार रखने की पुष्टि है?
  • क्या पतरस इस आदर और आधार के योग्य था?

के आधार पर जाँच और समझ सकते हैं। पिछले लेख में हमने इनमें से पहली बात के विश्लेषण को देखा था, और समझा था कि प्रभु यीशु ने आलंकारिक भाषा का प्रयोग तो किया, किन्तु मत्ती 16:18 में यह बात पतरस के विषय नहीं कही थी। आज हम दूसरी बात, “वचन में दी गई अन्य बातों के द्वारा क्या कलीसिया के पतरस पर आधारित होने की पुष्टि होती है?” को देखेंगे।

कलीसिया, या मण्डली, अर्थात प्रभु के बुलाए हुए लोगों का समूह किसी भी व्यक्ति पर कदापि आधारित नहीं है, इसकी एक पुष्टि हम प्रेरित पौलुस द्वारा पवित्र आत्मा की अगुवाई में कुरिन्थुस की मण्डली को लिखी गई पहले पत्री के आरंभिक भाग में ही देखते हैं। पौलुस ने कुरिन्थुस की मण्डली ले लोगों के, प्रभु के सेवकों के प्रति उनकी निष्ठा के अनुसार विभाजित होने और फिर परस्पर मतभेद रखने की प्रवृत्ति की भर्त्सना करते हुए लिखा, “हे भाइयो, मैं तुम से यीशु मसीह जो हमारा प्रभु है उसके नाम के द्वारा बिनती करता हूं, कि तुम सब एक ही बात कहो; और तुम में फूट न हो, परन्तु एक ही मन और एक ही मत हो कर मिले रहो। क्योंकि हे मेरे भाइयों, खलोए के घराने के लोगों ने मुझे तुम्हारे विषय में बताया है, कि तुम में झगड़े हो रहे हैं। मेरा कहना यह है, कि तुम में से कोई तो अपने आप को पौलुस का, कोई अपुल्लोस का, कोई कैफा का, कोई मसीह का कहता है। क्या मसीह बँट गया? क्या पौलुस तुम्हारे लिये क्रूस पर चढ़ाया गया? या तुम्हें पौलुस के नाम पर बपतिस्मा मिला?” (1 कुरिन्थियों 1:10-13)। इस खंड से स्पष्ट है कि प्रभु के सेवकों के नाम पर, जिनमें से एक नाम पतरस का भी दिया गया है, निष्ठा रखने, और फिर उस आधार पर विभाजित होने, आपस में झगड़ने की यह प्रवृत्ति अनुचित थी। प्रभु के सभी लोगों को, उस एक ही नाम, प्रभु यीशु, पर निष्ठा रखनी थी, और प्रभु के प्रति समर्पण के अनुसार ही साथ मिलकर एक मनता के साथ रहना था। पतरस के नाम को कोई भी और कैसा भी विशेष महत्व प्रदान नहीं किया गया, अपितु यह विशेष महत्व देने के प्रयास की निन्दा की गई, इस से निकलने और हटने के लिए कहा गया। साथ ही यह एक और शिक्षा को हमारे सामने लाता है, जब भी उद्धारकर्ता प्रभु यीशु के नाम को छोड़ किसी भी अन्य व्यक्ति या प्रभु के सेवक के नाम अथवा किसी भी मनुष्य को महत्व देने के प्रयास होते हैं, तो परिणाम परस्पर मतभेद, झगड़े, और प्रभु के नाम की निन्दा होता है; क्योंकि यह परमेश्वर की ओर से नहीं वरन शैतान की ओर से है, और शैतान कभी भी प्रेम को नहीं वरन बैर, फूट, मतभेदों, और झगड़ों को ही लेकर आता है।

इसी बात को 1 कुरिन्थियों 3:1-7 में समझाया और दोहराया गया है, जहाँ पर साथ ही यह भी लिखा गया है कि मसीही विश्वासियों का इस प्रकार से मनुष्यों और मनुष्यों के नामों को महत्व देना: 

  • आत्मिक अपरिपक्वता का चिह्न है, (3:1)
  • उन्नत और गहन आत्मिक शिक्षाओं को प्राप्त करने, समझने, और जीवन में लागू एवं प्रयोग करने में बाधा डालता है, (3:2)
  • शारीरिक - अर्थात उद्धार से पहले की प्रवृत्तियों और व्यवहार के अभी भी मसीही चरित्र पर हावी होने और उसे दबाए रखने का प्रमाण है, (3:3-4)
  • तथा मसीही विश्वासी के जीवन में परमेश्वर की प्राथमिकता के न होने को दिखाता है। (3:5-7)

फिर इससे थोड़ा आगे चलकर, परमेश्वर पवित्र आत्मा एक बहुत महत्वपूर्ण बात लिखवाता है, जिसकी, तथा उससे संबंधित एक अन्य पद की, अनदेखी और अवहेलना वे सभी लोग, जाने या अनजाने में करते हैं, जो यह मानते हैं कि पतरस ही प्रथम मण्डली का आधार था, मण्डली उसी पर बनाई गई थी। पौलुस ने पवित्र आत्मा के अगुवाई में लिखा, “क्योंकि उस नेव को छोड़ जो पड़ी है, और वह यीशु मसीह है कोई दूसरी नेव नहीं डाल सकता” (1 कुरिन्थियों 3:11)। इस पद के पहले भाग से यह बिलकुल स्पष्ट है कि कलीसिया की नींव या आधार पहले से तैयार और स्थापित है; मध्य भाग बताता है कि वह पहले से तैयार और डाली गई नींव स्वयं प्रभु यीशु मसीह है, और अंतिम भाग बताता है कि कोई भी इस नींव को बदल नहीं सकता है, इसके स्थान पर कोई और नींव नहीं डाल सकता है। 

इस संदर्भ में इस पद से संबंधित जिस दूसरे पद की अनदेखी और अवहेलना की जाती है, वह हैऔर प्रेरितों और भविष्यद्वक्ताओं की नेव पर जिसके कोने का पत्थर मसीह यीशु आप ही है, बनाए गए हो। जिस में सारी रचना एक साथ मिलकर प्रभु में एक पवित्र मन्दिर बनती जाती है” (इफिसियों 2:20-21)। पद 20 भी यही बताता है कि कलीसिया की नींव, उसका आधार प्रेरितों और भविष्यद्वक्ताओं द्वारा जो बातें और शिक्षाएं प्रभु ने प्रदान की हैं, अर्थात परमेश्वर का वचन है - जो आदि से था, परमेश्वर का स्वरूप है, और जिसने प्रभु यीशु के रूप में देहधारी होकर हमारे साथ निवास किया (यूहन्ना 1:1, 2, 14)। साथ ही, इस 20 पद मेंप्रेरितों और भविष्यद्वक्ताओंके बहुवचन में प्रयोग पर ध्यान कीजिए। तात्पर्य यह है कि यह नींव, यह आधार, कोई एक व्यक्ति कदापि नहीं था; वरन प्रभु के वे अनेक प्रेरित और भविष्यद्वक्ता थे जिनमें होकर प्रभु का वचन लोगों तक पहुँचा; और पतरस निःसंदेह उनमें से एक था, किन्तु वही एकमात्र कदापि नहीं था। एक बार फिर यह पतरस के एकमात्र आधार होने की धारणा को गलत ठहराता है। साथ ही 20 पद यह भी दिखाता है कि इन सभी प्रेरितों और भविष्यद्वक्ताओं की शिक्षाओं को साथ और संगत रखने वाला वहकोने का पत्थर”, जिससे सारी नींव एवं भवन-निर्माण की सिधाई और दिशा जाँची जाती है, स्थापित की जाती है, स्वयं प्रभु यीशु मसीह है। फिर 21 पद में लिखा है कि कलीसिया की यह सारी रचना साथ मिलकरप्रभु में एक पवित्र मन्दिर बनती जाती है” - पतरस में नहीं, प्रभु में!

स्वयं पतरस भी उसके द्वारा लिखी गई पत्रियों में उसके कलीसिया का आधार होने की बात की पुष्टि करना तो दूर, ऐसा कोई संकेत भी नहीं देता है कि प्रभु ने उसे कलीसिया का आधार नियुक्त किया है, जिसके अनुसार वह इस दायित्व का निर्वाह कर रहा है। दोनों पत्रियों के आरंभ में उसने अपने आप को केवल प्रभु का प्रेरित कहा है, और दूसरी पत्री के आरंभ में प्रभु का दास भी कहा है, किन्तु कलीसिया का आधार होने को न तो कहीं कहा है और न ही इसका कोई संकेत दिया है।

प्रेरितों के काम के 15 अध्याय में भी जब यरूशलेम में मण्डलियों में फैलाई जा रही कुछ गलत शिक्षाओं के विषय चर्चा एवं निर्णय करने के लिए उस प्रारंभिक मण्डली के अगुवे एकत्रित हुए (प्रेरितों 15:6), और फिर प्रेरितों 15:7 में पतरस का नामबहुत वाद-विवाद के बादआया, और उसने किसी अधिकार के साथ नहीं वरन अन्य लोगों के समान एक सदस्य के रूप में अपना तर्क रखा। तथा फिर 12 पद से आगे लिखा है कि अन्य लोग भी अपने विचार रखने लगे, फिर अन्ततः 22 पद में जाकरप्रेरितों और प्राचीनोंके द्वारा सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया। कहीं पर भी पतरस के किसी विशेष स्तर अथवा स्थान, या सभा को संचालित करने, अंतिम निर्णय लेने, आदि जैसी बातों का कोई उल्लेख नहीं है; जबकि यह व्यवहार कलीसिया केआधारयामुख्य संचालकसे अपेक्षित है। 

अर्थात परमेश्वर के वचन में कहीं पर भी इस बात का समर्थन नहीं है कि प्रभु ने कलीसिया को पतरस पर आधारित कर के बनाने की बात कही, जिसे फिर निभाया गया। अगले लेख में हम देखेंगे और विश्लेषण करेंगे कि क्या प्रभुकलीसिया को पतरस पर बनानेके योग्य समझ कर उसे यह दायित्व दे सकता था।

यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं, तो परमेश्वर पवित्र आत्मा की आज्ञाकारिता एवं अधीनता में वचन की सच्चाइयों को उससे समझें; किसी के भी द्वारा कही गई कोई भी बात को तुरंत ही पूर्ण सत्य के रूप में स्वीकार न करें, विशेषकर तब, जब वह बात बाइबल की अन्य बातों के साथ ठीक मेल नहीं रखती हो।

 यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • उत्पत्ति 10-12      
  • मत्ती 4