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गुरुवार, 26 मई 2011

संतुलित सत्य

१९वीं सदी में प्रचलित एक बच्चों की कहानी मुझे बहुत विचलित करती है क्योंकि यह कहानी परमेश्वर के बारे में बहुत गलत दृष्टीकोण देती है।

यह कहानी एक छोटे बच्चे के बारे में है, जिसने अपनी माँ की आज्ञा के विरुद्ध, उसकी पीठ पीछे केक का एक छोटा टुकड़ा लेकर खा लिया। इस कारण उस कहानी में इस बच्चे को नीच, निन्दनीय, कपटी और किसी भी आदरणीय या उदार भावना से सर्वथा विहीन आदि कहा गया। उसके बाद इस "धोखेबाज़ लड़के" का परमेश्वर के सिंहासन के सामने न्याय के लिए प्रस्तुत किया जाना और वहाँ उसे कठोर दंड की आज्ञा के साथ कहा जाना कि, " हे श्रापित लोगों, मेरे साम्हने से उस अनन्‍त आग में चले जाओ, जो शैतान और उसके दूतों के लिये तैयार की गई है" (मत्ती २५:४१) दिखाया गया है।

यह कहानी अनज्ञाकारिता और झूठ के विरुद्ध चेतावनी देने की बात में तो ठीक है, लेकिन यह परमेश्वर के विलंब से कोप करने, धैर्य रखने, क्षमा देने जैसे गुणों को बिलकुल अन्देखा कर देती है और परमेश्वर के गुणों का असंतुलित चित्रण प्रस्तुत करती है। इसकी तुलना में, १ कुरिन्थियों ६:९-११ में हम अधर्म और अनुचित चाल-चलन के विरुद्ध कड़ी चेतावनी तो पाते हैं, किंतु साथ ही अधर्म के निन्दनीय कार्यों की सूची के बाद ये कोमल शब्द भी पाते हैं, " और तुम में से कितने ऐसे ही थे, परन्‍तु तुम प्रभु यीशु मसीह के नाम से और हमारे परमेश्वर के आत्मा से धोए गए, और पवित्र हुए और धर्मी ठहरे" (१ कुरिन्थियों ६:११); क्योंकि हमारा परमेश्वर किसी भी पापी के नाश से नहीं वरन प्रत्येक के बचाए जाने से प्रेम रखता है, "प्रभु यहोवा की यह वाणी है, क्या मैं दुष्ट के मरने से कुछ भी प्रसन्न होता हूँ? क्या मैं इस से प्रसन्न नहीं होता कि वह अपने मार्ग से फिरकर जीवित रहे?" (यहेजकेल १८:२३)। प्रभु यीशु ने कहा " परमेश्वर ने अपने पुत्र को जगत में इसलिये नहीं भेजा, कि जगत पर दंड की आज्ञा दे परन्‍तु इसलिये कि जगत उसके द्वारा उद्धार पाए" (युहन्ना ३:१७); "यीशु ने यह सुनकर, उन से कहा, भले चंगों को वैद्य की आवश्यकता नहीं, परन्‍तु बीमारों को है: मैं धमिर्यों को नहीं, परन्‍तु पापियों को बुलाने आया हूं।" (मरकुस २:१७)

कुछ मसीही बिना परमेश्वर की करूणा का ध्यान करे परमेश्वर के कोप पर इतना ज़ोर देते हैं कि वे उसकी दया और क्षमाशीलता को भूल जाते हैं। दूसरी ओर कुछ ऐसे मसीही भी हैं जो परमेश्वर की दया, करुणा और क्षमाशीलता पर इतना ज़ोर देते हैं कि वे उसकी पवित्रता, न्याय और पाप से घृणा (पापी से नहीं) को नज़रांदाज़ कर देते हैं और पाप के प्रति परमेश्वर के दृष्टीकोण को बहुत हल्का प्रदर्शित करते हैं। जहाँ हमें परमेश्वर की पवित्रता, न्याय के प्रति कटिबद्धता और पाप से घृणा को बहुत गंभीरता से लेना चाहिए वहीं उसके प्रेम, दया और अनुग्रह को भी अन्देखा नहीं करना चाहिए।

जब हम परमेश्वर के गुणों को सही जानने और समझने लगेंगे तब ही हम अपना जीवन भी सही जी सकेंगे। सत्य के संतुलित ज्ञान द्वारा ही हम लोगों को भी सही मार्गदर्शन दे सकते हैं। - हर्ब वैन्डर लुग्ट


परमेश्वर के अनुग्रह के वर्णन के बिना परमेश्वर के क्रोध की शिक्षा अधूरी तथा असंतुलित है।

जो प्रेम परमेश्वर हम से रखता है, उस को हम जान गए, और हमें उस की प्रतीति है; परमेश्वर प्रेम है: जो प्रेम में बना रहता है, वह परमेश्वर में बना रहता है और परमेश्वर उस में बना रहता है। - १ युहन्ना ४:१६


पर जैसा तुम्हारा बुलाने वाला पवित्र है, वैसे ही तुम भी अपने सारे चाल चलन में पवित्र बनो। क्‍योंकि लिखा है, कि पवित्र बनो, क्‍योंकि मैं पवित्र हूं। - १ पतरस १:१६


बाइबल पाठ: १ कुरिन्थियों ६:९-२०

1Co 6:9 क्‍या तुम नहीं जानते, कि अन्यायी लोग परमेश्वर के राज्य के वारिस न होंगे धोखा न खाओ, न वेश्यागामी, न मूर्त्तिपूजक, न परस्त्रीगामी, न लुच्‍चे, न पुरूषगामी।
1Co 6:10 न चोर, न लोभी, न पियक्कड़, न गाली देने वाले, न अन्‍धेर करने वाले परमेश्वर के राज्य के वारिस होंगे।
1Co 6:11 और तुम में से कितने ऐसे ही थे, परन्‍तु तुम प्रभु यीशु मसीह के नाम से और हमारे परमेश्वर के आत्मा से धोए गए, और पवित्र हुए और धर्मी ठहरे।
1Co 6:12 सब वस्‍तुएं मेरे लिये उचित तो हैं, परन्‍तु सब वस्‍तुएं लाभ की नहीं, सब वस्‍तुएं मेरे लिये उचित हैं, परन्‍तु मैं किसी बात के आधीन न हूंगा।
1Co 6:13 भोजन पेट के लिये, और पेट भोजन के लिये है, परन्‍तु परमेश्वर इस को और उस को दोनों को नाश करेगा, परन्‍तु देह व्यभिचार के लिये नहीं, वरन प्रभु के लिये और प्रभु देह के लिये है।
1Co 6:14 और परमेश्वर ने अपनी सामर्थ से प्रभु को जिलाया, और हमें भी जिलाएगा।
1Co 6:15 क्‍या तुम नहीं जानते, कि तुम्हारी देह मसीह के अंग हैं सो क्‍या मैं मसीह के अंग लेकर उन्‍हें वेश्या के अंग बनाऊं? कदापि नहीं।
1Co 6:16 क्‍या तुम नहीं जानते, कि जो कोई वेश्या से संगति करता है, वह उसके साथ एक तन हो जाता है क्‍योंकि वह कहता है, कि वे दोनों एक तन होंगे।
1Co 6:17 और जो प्रभु की संगति में रहता है, वह उसके साथ एक आत्मा हो जाता है।
1Co 6:18 व्यभिचार से बचे रहो: जितने और पाप मनुष्य करता है, वे देह के बाहर हैं, परन्‍तु व्यभिचार करने वाला अपनी ही देह के विरूद्ध पाप करता है।
1Co 6:19 क्‍या तुम नहीं जानते, कि तुम्हारी देह पवित्रात्मा का मन्‍दिर है जो तुम में बसा हुआ है और तुम्हें परमेश्वर की ओर से मिला है, और तुम अपने नहीं हो?
1Co 6:20 कयोंकि दाम देकर मोल लिये गए हो, इसलिये अपनी देह के द्वारा परमेश्वर की महिमा करो।

एक साल में बाइबल:
  • १ इतिहास २८-२९
  • यूहन्ना ९:२४-४१

बुधवार, 25 मई 2011

के बारे में जानना; को जानना

एक शाम को आई आंधी-बारिश के बाद मैंने आकाश में अति सुन्दर इन्द्रधनुष देखा, ऐसा जैसा मैंने पहले कभी नहीं देखा था। लेकिन जब मैंने उसका वर्णन अपनी पत्नि के सामने करना चाहा तो मैं बहुत कुण्ठित हो गया क्योंकि उसकी सुन्दरता बयान करने के लिए मुझे शब्द नहीं मिल रहे थे।

जो मैंने देखा उसे समझने के लिए मैंने ज्ञान के विश्वकोष में खोजा; वहाँ मुझे इन्द्रधनुष को समझाने वाले तथ्य मिले कि इन्द्र्धनुष तब बनता है जब प्रकाश के पानी की बून्दों में होकर निकलने से वह अपनी विभिन्न तरंगों में बिखर जाता है, प्रत्येक तरंग का रंग अलग होता है और इस कारण इन्द्रधनुष आकाश में एक रंगीन पट्टी दिखता है। विश्वकोष ने मेरे ज्ञान को तो बढ़ाया, लेकिन जो मैंने जाना वे केवल वैज्ञानिक तथ्य मात्र थे, इन तथ्यों में इन्द्रधनुष की सुन्दरता नहीं थी।

पतरस की दूसरी पत्री के पहले अध्याय में दो तरह के ज्ञान के बारे में बताया गया है। मूल युनानी भाषा में आत्मिक उन्नति के संबंध में, ५ और ६ पद में, लेखक जो शब्द प्रयोग करता है उसका तात्पर्य तत्व ज्ञान से है; किंतु पद २, ३ और ८ में आत्मिक उन्नति के संबंध में जो शब्द प्रयोग हुआ है उसका तात्पर्य मसीह के व्यावाहरिक और व्यक्तिगत ज्ञान से है। इन दोनो अलग अलग शब्दों का प्रयोग बताता है कि प्रभु के बारे जानना और प्रभु को जानना वैसे ही भिन्न हैं जैसे इन्द्रधनुष के बारे में जानना और उसकी सुन्दरता को जानना।

अय्युब ने भी इस भिन्नता को पहचाना, और उसने परमेश्वर से कहा, "मैंने कानों से तेरा समाचार सुना था, परन्तु अब मेरी आंखें तुझे देखती हैं" (अय्युब ४२:५)।

जैसे जैसे आप परमेश्वर के बारे में अपना ज्ञान बढ़ाते हैं, यह प्रयास भी कीजिए कि आप परमेश्वर को जानने वाले भी हो सकें। - मार्ट डी हॉन


सच्चा ज्ञान विश्वास से भरे हृदय से आरंभ होता है, तथ्यों से भरे दिमाग से नहीं।

परमेश्वर को किसी ने कभी नहीं देखा, एकलौता पुत्र जो पिता की गोद में हैं, उसी ने उसे प्रगट किया। यूहन्ना १:१८


यीशु ने उस से कहा; हे फिलप्‍पुस, मैं इतने दिन से तुम्हारे साथ हूं, और क्‍या तू मुझे नहीं जानता? जिस ने मुझे देखा है उस ने पिता को देखा है। युहन्ना १४:९

बाइबल पाठ: २ पतरस १:१-११

2Pe 1:1 शमौन पतरस की और से जो यीशु मसीह का दास और प्रेरित है, उन लोगों के नाम जिन्‍होंने हमारे परमेश्वर और उद्धारकर्ता यीशु मसीह की धामिर्कता से हमारा सा बहुमूल्य विश्वास प्राप्‍त किया है।
2Pe 1:2 परमेश्वर के और हमारे प्रभु यीशु की पहचान के द्वारा अनुग्रह और शान्‍ति तुम में बहुतायत से बढ़ती जाए।
2Pe 1:3 क्‍योंकि उसके ईश्वरीय सामर्थ ने सब कुछ जो जीवन और भक्ति से सम्बन्‍ध रखता है, हमें उसी की पहचान के द्वारा दिया है, जिस ने हमें अपनी ही महिमा और सदगुण के अनुसार बुलाया है।
2Pe 1:4 जिन के द्वारा उस ने हमें बहुमूल्य और बहुत ही बड़ी प्रतिज्ञाएं दी हैं: ताकि इन के द्वारा तुम उस सड़ाहट से छूटकर जो संसार में बुरी अभिलाषाओं से होती है, ईश्वरीय स्‍वभाव के समभागी हो जाओ।
2Pe 1:5 और इसी कारण तुम सब प्रकार का यत्‍न करके, अपने विश्वास पर सदगुण, और सदगुण पर समझ।
2Pe 1:6 और समझ पर संयम, और संयम पर धीरज, और धीरज पर भक्ति।
2Pe 1:7 और भक्ति पर भाईचारे की प्रीति, और भाईचारे की प्रीति पर प्रेम बढ़ाते जाओ।
2Pe 1:8 क्‍योंकि यदि ये बातें तुम में वर्तमान रहें, और बढ़ती जाएं, तो तुम्हें हमारे प्रभु यीशु मसीह के पहचानने में निकम्मे और निष्‍फल न होने देंगी।
2Pe 1:9 और जिस में ये बातें नहीं, वह अन्‍धा है, और धुन्‍धला देखता है, और अपने पूर्वकाली पापों से धुलकर शुद्ध होने को भूल बैठा है।
2Pe 1:10 इस कारण हे भाइयों, अपने बुलाए जाने, और चुन लिये जाने को सिद्ध करने का भली भांति यत्‍न करते जाओ, क्‍योंकि यदि ऐसा करोगे, तो कभी भी ठोकर न खाओगे।
2Pe 1:11 वरन इस रीति से तुम हमारे प्रभु और उद्धारकर्ता यीशु मसीह के अनन्‍त राज्य में बड़े आदर के साथ प्रवेश करने पाओगे।

एक साल में बाइबल:
  • १ इतिहास २५-२७
  • यूहन्ना ९:१-२३

मंगलवार, 24 मई 2011

कम बोलिए, अधिक कहिए

सन १९७२ में सैन फ्रैनसिस्को के विशाल गोल्डन गेट पुल के नीचे दो तेल के टैंकर आपस में टकरा गए जिससे ८४०,००० गैलन तेल खाड़ी में बह गया। तेल रिसाव के कारण मरे हुए समुद्री पक्षी, मछलियाँ और समुद्री जीव बह कर किनारों पर आने लगे। इस त्रासदी से प्रभावित होकर उस पुल के समीप रहने वाले एक मनुष्य ने ठान लिया कि अब से वह ऐसा सादगी का जीवन व्यतीत करेगा जिससे कम से कम प्राकृतिक संसाधनों का व्यय हो। पहले उसने हर जगह चल कर ही जाना आरंभ किया। लगभग एक साल के पश्चात उसने निर्णय लिया कि प्राकृतिक संसाधनों के व्यर्थ व्यय की ओर लोगों का ध्यान खींचने के लिए वह मौन धारण कर लेगा। अगले १३ वर्ष में वह केवल एक बार बोला, जब उसने अपने माता-पिता को फोन करके बताया कि अपने इस उद्देश्य को सर्वविदित करने के लिए वह एक पैदल यात्रा करने जा रहा है। अपनी यात्रा में वह बिना बोले अपनी बात लोगों को पहुँचाता रहा; लेकिन कुछ ही समय में उसने यह भी जाना कि मौन रहकर वह लोगों की बातों को अधिक सुन सकता है, और फिर वह यह बात भी लोगों को पहुँचाने लगा।

जो इस व्यक्ति ने किया, वह हम सब पर भी लागू होता है। कम बोलने से न केवल हम अधिक सुन सकेंगे, वरन अपनी बात अधिक प्रभावी रीति से कह भी सकेंगे। अकसर किसी विष्य पर हमारा शाँत रहना हमारे शब्दों से अधिक प्रभावकारी और वाग्मी होता है।

बुद्धिमान व्यक्ति की बात सुनी भी जाती है और वह स्वयं भी औरों की बात सुनता है, क्योंकि वह जानता है कि उसे कब बोलना चाहिए और कब मौन रहना चाहिए; उसका मौन भी अपनी बात कहने की एक विधी है।

राजा सुलेमान ने अपने नीतिवचनों में इस सत्य की ओर कई बार ध्यान खींचा है कि कम बोलकर भी अधिक कह जाना बुद्धिमान की निशानी है। - मार्ट डी हॉन


शांति मनोहर है। जब तक कहने को उससे सुन्दर कुछ न हो, तब तक शांत ही रहिए।

मूढ़ भी जब चुप रहता है, तब बुद्धिमान गिना जाता है; और जो अपना मुंह बन्द रखता वह समझ वाला गिना जाता है। - नीतिवाचन १७:२८


बाइबल पाठ: नीतिवाचन १७:२७-१८:४

Pro 17:27 जो संभलकर बोलता है, वही ज्ञानी ठहरता है; और जिकी आत्मा शान्त रहती है, वो ही समझ वाला पुरूष ठहरता है।
Pro 17:28 मूढ़ भी जब चुप रहता है, तब बुद्धिमान गिना जाता है; और जो अपना मुंह बन्द रखता वह समझ वाला गिना जाता है।
Pro 18:1 जो औरों से अलग हो जाता है, वह अपनी ही इच्छा पूरी करने के लिये ऐसा करता है,
Pro 18:2 और सब प्रकार की खरी बुद्धि से बैर करता है। मूर्ख का मन समझ की बातों में नहीं लगता, वह केवल अपने मन की बात प्रगट करना चाहता है।
Pro 18:3 जहां दुष्ट आता है, वहां अपमान भी आता है; और निन्दित काम के साथ नामधराई होती है।
Pro 18:4 मनुष्य के मुंह के वचन गहिरा जल, वा उमण्डने वाली नदी वा बुद्धि के सोते हैं।

एक साल में बाइबल:
  • १ इतिहास २२-२४
  • यूहन्ना ८:२८-५९

सोमवार, 23 मई 2011

बुद्धि और ज्ञान

एक कार्टून रेखाचित्र में दिखाया गया कि एक युवती सर पर टोपी और काला चोगा पहने हुए और अपने हाथ में अपनी स्नातक डिगरी लिए खड़ी है। उसका सर गर्व से ऊँचा है और वह संसार को नीची निगाहों से देख रही है। संसार ने उससे पूछा कि वह कौन है तो वह घमंड से उत्तर देती है, "क्या तुम मुझे नहीं पहचानते? मैं ने प्रतिष्ठा विद्यापीठ से स्नातक की डिगरी ली है।" संसार उसे उत्तर देता है, "बस इतनी सी बात; मेरे साथ आओ, शेष मैं अब तुम्हें सिखाऊंगा।"

उस युवती के स्नातक के डिगरी प्राप्त करने और शिक्षा अर्जित करने को हम तुच्छ नहीं जान सकते, उसने कुछ गलत नहीं किया। किंतु केवल कुछ वर्ष की पढाई और कक्षा में बैठकर सीखने से तो कोई बुद्धिमान नहीं बन जाता। कठिन परिस्थितियों के अनुभव स्कूल कालेज की पढाई से कहीं अधिक मूल्यवान शिक्षाएं देते हैं। क्या शिक्षा का कोई महत्व है? बिलकुल है, शिक्षा आवश्यक है, परन्तु शिक्षित होने के साथ बुद्धिमान होना भी बहुत आवश्यक है। ज्ञान तथ्यों को जानना है, बुद्धिमानी तथ्यों का सही उपयोग करना जानना है। लेकिन इन सब से ऊपर है वह ज्ञन जो परमेश्वर से मिलता है, क्योंकि परमेश्वरीय ज्ञान ही इन सब बातों का सही उपयोग सिखा सकता है।

सबसे उत्तम शिक्षा और बहुत प्रकार का अनुभव होने पर भी मनुष्य परमेश्वर से अलग रहकर कुछ नहीं कर सकता; इसलिए परमेश्वर का वचन हमें हिदायत देता है कि अपनी शिक्षा और अनुभवों के साथ हम स्वर्गीय बुद्धि को भी जोड़ लें, और इसे पाना बहुत सहज है। याकूब १:५-७ में लिखा है कि "पर यदि तुम में से किसी को बुद्धि की घटी हो, तो परमेश्वर से मांगे, जो बिना उलाहना दिए सब को उदारता से देता है और उस को दी जाएगी। पर विश्वास से मांगे, और कुछ सन्‍देह न करे, क्‍योंकि सन्‍देह करने वाला समुद्र की लहर के समान है जो हवा से बहती और उछलती है। ऐसा मनुष्य यह न समझे, कि मुझे प्रभु से कुछ मिलेगा" और नीतिवचन ९:१० बताता है कि "यहोवा का भय मानना बुद्धि का आरम्भ है, और परमपवित्र ईश्वर को जानना ही समझ है।"

जहाँ ऐसा स्वर्गीय ज्ञान होगा वहाँ कभी घमण्ड नहीं होगा। - रिचर्ड डी हॉन


शिक्षा का मर्म मन को शिक्षित करना है।

अपनी दृष्टि में बुद्धिमान न होना; यहोवा का भय मानना, और बुराई से अलग रहना। - नीतिवचन ३:७


बाइबल पाठ: नीतिवचन ३:१३-२०

Pro 3:13 क्या ही धन्य है वह मनुष्य जो बुद्धि पाए, और वह मनुष्य जो समझ प्राप्त करे,
Pro 3:14 क्योंकि बुद्धि की प्राप्ति चान्दी की प्राप्ति से बड़ी, और उसका लाभ चोखे सोने के लाभ से भी उत्तम है।
Pro 3:15 वह मूंगे से अधिक अनमोल है, और जितनी वस्तुओं की तू लालसा करता है, उन में से कोई भी उसके तुल्य न ठहरेगी।
Pro 3:16 उसके दाहिने हाथ में दीर्घायु, और उसके बाएं हाथ में धन और महिमा है।
Pro 3:17 उसके मार्ग मनभाऊ हैं, और उसके सब मार्ग कुशल के हैं।
Pro 3:18 जो बुद्धि को ग्रहण कर लेते हैं, उनके लिये वह जीवन का वृक्ष बनती है; और जो उसको पकड़े रहते हैं, वे धन्य हैं।
Pro 3:19 यहोवा ने पृथ्वी की नेव बुद्धि ही से डाली और स्वर्ग को समझ ही के द्वारा स्थिर किया।
Pro 3:20 उसी के ज्ञान के द्वारा गहिरे सागर फूट निकले, और आकाशमण्डल से ओस टपकती है।

एक साल में बाइबल:
  • १ इतिहास १९-२१
  • यूहन्ना ८:१-२७

रविवार, 22 मई 2011

शब्दों की आड़

अकसर लोग अपने मन की बात सच्चाई से कहने में झिझकते हैं और उसे शब्दों की आड़ के पीछे छुपाने का प्रयास करते हैं लेकिन उनके शब्द उनकी मनोभावनाओं के अनुकूल नहीं होते। न्यूयॉर्क के एक वकील जैराल्ड निरेनबर्ग ने इस विष्य पर एक पुस्तक लिखी जिसका शीर्षक है Meta Talk: Guide to Hidden Meanings in Conversation. इस पुस्तक में उन्होंने छुपी या गोल-मोल बात बनाने के ३५० उदाहरण दिये हैं।

एक संवाद विशेषज्ञ का मानना है कि लोग इस बात से डरते हैं कि ईमानदारी से कहे गई उनकी बातों के कारण उन्हें मित्रता, प्रेम, आदर का नुकसान उठाना पड़ेगा। इसलिए या तो वे अपने होंठ बन्द रखते हैं या वे जो कहना चाहते हैं उसे घुमा फिराकर अस्पष्ट रूप से कहते हैं। अपने प्रति हीन भावना या दूसरों की भावनाओं को ठेस पहुँचाने का भय भी लोगों के स्पष्ट और सही बात कहने में बाधा बनते हैं।

मसीही विश्वासी भी इस समस्या से अछूते नहीं हैं। ईमानदार रहना और किसी को ठेस पहुँचाए बिना सत्य बोलना, दोनो को एक साथ निभा पाना बहुत कठिन हो सकता। बाइबल इस समस्या का संतुलित हल देती है। प्रभु यीशु का जीवन इस का सजीव उदाहरण है। उन्हों ने सदा ही सत्य बोला, कभी मक्कारी नहीं करी, न ही किसी से घुमा-फिरा कर बातों करीं और न किसी को दोगली बातों में उलझाया; तौ भी कभी किसी ने उन पर अपमान जनक व्यवहार का दोष नहीं लगाया। इस का कारण था उनका सदा नम्रता और करुणा का व्यवहार रखना, कभी घमण्ड न करना और न किसी को नीचा दिखाने का व्यवहार करना और सदा दूसरों की भलाई तथा सहायता में कार्यरत रहना।

परमेश्वर का वचन बाइबल हमें सिखाती है कि हम कैसे सच्चे और ईमानदार रहते हुए भी किसी को ठेस पहुँचाने से बच सकते हैं। याकूब की पत्री के तीसरे अध्याय में स्वर्गीय ज्ञान के बारे में बताया गया है जो हमें ईमानदार और मृदु रख सकता है, क्योंकि "जो ज्ञान ऊपर से आता है वह पहिले तो पवित्र होता है फिर मिलनसार, कोमल और मृदुभाव और दया, और अच्‍छे फलों से लदा हुआ और पक्षपात और कपट रहित होता है" (याकूब ३:१७)। इसलिए इस स्वर्गीय ज्ञान और समझ बूझ के साथ हम प्रभु यीशु के समान हम अपनी बात चीत और व्यवहार में ईमानदार किंतु मृदु रह सकते हैं।

जो मसीही विश्वासी इस स्वर्गीय ज्ञान को अपना बोलचाल और व्यवहार निर्धारित करने देंगे उन्हें फिर कभी शब्दों की आड़ से अपनी बात नहीं कहनी पड़ेगी। - मार्ट डी हॉन


नम्रता से कहे गए वचन सुनने में हलके लगते हैं किंतु उनका प्रभाव भारी होता है।

बुद्धिमान का मन उसके मुंह पर भी बुद्धिमानी प्रगट करता है, और उसके वचन में विद्या रहती है। - नीतिवचन १६:२३


बाइबल पाठ:
याकूब
Jas 3:1 हे मेरे भाइयों, तुम में से बहुत उपदेशक न बनें, क्‍योंकि जानते हो, कि हम उपदेशक और भी दोषी ठहरेंगे।
Jas 3:2 इसलिये कि हम सब बहुत बार चूक जाते हैं: जो कोई वचन में नहीं चूकता, वही तो सिद्ध मनुष्य है और सारी देह पर भी लगाम लगा सकता है।
Jas 3:3 जब हम अपने वश में करने के लिये घोड़ों के मुंह में लगाम लगाते हैं, तो हम उन की सारी देह को भी फेर सकते हैं।
Jas 3:4 देखो, जहाज भी, यद्यपि ऐसे बड़े होते हैं, और प्रचण्‍ड वायु से चलाए जाते हैं, तौभी एक छोटी सी पतवार के द्वारा मांझी की इच्‍छा के अनुसार घुमाए जाते हैं।
Jas 3:5 वैसे ही जीभ भी एक छोटा सा अंग है और बड़ी बड़ी डींगे मारती है: देखो, थोड़ी सी आग से कितने बड़े बन में आग लग जाती है।
Jas 3:6 जीभ भी एक आग है: जीभ हमारे अंगों में अधर्म का एक लोक है और सारी देह पर कलंक लगाती है, और भवचक्र में आग लगा देती है और नरक कुण्‍ड की आग से जलती रहती है।
Jas 3:7 क्‍योंकि हर प्रकार के वन-पशु, पक्षी, और रेंगने वाले जन्‍तु और जलचर तो मनुष्य जाति के वश में हो सकते हैं और हो भी गए हैं।
Jas 3:8 पर जीभ को मनुष्यों में से कोई वश में नहीं कर सकता; वह एक ऐसी बला है जो कभी रूकती ही नहीं, वह प्राण नाशक विष से भरी हुई है।
Jas 3:9 इसी से हम प्रभु और पिता की स्‍तुति करते हैं और इसी से मनुष्यों को जो परमेश्वर के स्‍वरूप में उत्‍पन्न हुए हैं श्राप देते हैं।
Jas 3:10 एक ही मुंह से धन्यवाद और श्राप दोनों निकलते हैं।
Jas 3:11 हे मेरे भाइयों, ऐसा नही होना चाहिए।
Jas 3:12 क्‍या सोते के एक ही मुंह से मीठा और खारा जल दोनों निकलता है? हे मेरे भाइयों, क्‍या अंजीर के पेड़ में जैतून, या दाख की लता में अंजीर लग सकते हैं? वैसे ही खारे सोते से मीठा पानी नहीं निकल सकता।
Jas 3:13 तुम में ज्ञानवान और समझदार कौन है? जो ऐसा हो वह अपने कामों को अच्‍छे चालचलन से उस नम्रता सहित प्रगट करे जो ज्ञान से उत्‍पन्न होती है।
Jas 3:14 पर यदि तुम अपने अपने मन में कड़वी डाह और विरोध रखते हो, तो सत्य के विरोध में घमण्‍ड न करना, और न तो झूठ बोलना।
Jas 3:15 यह ज्ञान वह नहीं, जो ऊपर से उतरता है वरन सांसारिक, और शारीरिक, और शैतानी है।
Jas 3:16 इसलिये कि जहां डाह और विरोध होता है, वहां बखेड़ा और हर प्रकार का दुष्‍कर्म भी होता है।
Jas 3:17 पर जो ज्ञान ऊपर से आता है वह पहिले तो पवित्र होता है फिर मिलनसार, कोमल और मृदुभाव और दया, और अच्‍छे फलों से लदा हुआ और पक्षपात और कपट रहित होता है।
Jas 3:18 और मिलाप कराने वालों के लिये धामिर्कता का फल मेल-मिलाप के साथ बोया जाता है।

एक साल में बाइबल:
  • १ इतिहास १६-१८
  • यूहन्ना ७:२८-५३

शनिवार, 21 मई 2011

सर्वोत्तम निवेदन

एक फारसी दार्शनिक से पूछा गया कि उसने इतना ज्ञान कैसे अर्जित किया? उसने उत्तर दिया, "मैंने घमंड को कभी अपने आड़े आने नहीं दिया; यदि मैं किसी चीज़ के बारे में नहीं जानता था तो बिना झिझके पूछ लिया करता था।"

जीवन निर्वाह करने के लिए हम सब को समझ-बूझ चाहिए। नवयुवक वयस्क होते समय सोचते हैं कि मैं अपने जीवन में क्या करूँ? वयस्क नौकरी, परिवार की ज़िम्मेदारियों तथा कई अन्य निर्णयों के बारे में सोचते हैं जिनके बहुत दूरगामी परिणाम हो सकते हैं। अकसर हम परमेश्वर से समझ-बूझ इसलिए माँगते हैं कि उसके द्वारा हम धन और रुतबा अर्जित कर सकें। लेकिन हम परमेश्वर को झाँसा नहीं दे सकते; वह हमारी मनसा तथा उद्देश्य जानता है। जो उसका आदर करते हैं, उन्हें वह यह सब स्वतः ही दे देता है।

यद्यपि सुलेमान इस्त्राएल का राजा था, तौ भी उसे अपनी समझ-बूझ की सीमाएं स्वीकार करने में कोई हिचकिचाहट नहीं थी। लेकिन वह केवल सांसारिक ज्ञान पाने ही से संतुष्ट नहीं था, उसे ज्ञान से भी अधिक परमेश्वर की लालसा थी। जब परमेश्वर ने उससे पूछा कि तू क्या चाहता है कि मैं तुझे दूँ, तो सुलेमान ने परमेश्वर से केवल एक ही निवेदन किया; उसने माँगा कि परमेश्वर उसे अपनी प्रजा का खरा न्याय करने की सामर्थ और सदबुद्धि दे। परमेश्वर ने उसे न केवल यह सामर्थ दी वरन असीम दौलत, वैभव और आदर भी साथ में दे दिया।

हमें अपने हृदयों को टटोलने और परमेश्वर से ज्ञान तथा समझ-बूझ पाने के अपने वास्तस्विक उद्देश्य का उसके सामने अंगीकार करने की आवश्यक्ता है। जब हम अपनी प्राथमिकताएं सही निर्धारित कर लेंगे, तब हम परमेश्वर से याकूब १:५ में उसकी दी हुई प्रतिज्ञा "पर यदि तुम में से किसी को बुद्धि की घटी हो, तो परमेश्वर से मांगे, जो बिना उलाहना दिए सब को उदारता से देता है; और उस को दी जाएगी" को भी बेझिझक माँग सकते हैं।

यदि हमारी दिली इच्छा अपने जीवन से परमेश्वर का आदर करने की है, तो परमेश्वर से समझ-बूझ पाने के सर्वोत्तम निवेदन को करने में हमें कोई रुकावट नहीं। - डेनिस डी हॉन


वे ही बुद्धिमान हैं जो परमेश्वर को अपना गुरू बना लेते हैं।

अब मुझे ऐसी बुद्धि और ज्ञान दे, कि मैं इस प्रजा के साम्हने अन्दर-बाहर आना-जाना कर सकूं, क्योंकि कौन ऐसा है कि तेरी इतनी बड़ी प्रजा का न्याय कर सके? - २ इतिहास १:१०


बाइबल पाठ: २ इतिहास १:१- १२

2Ch 1:1 दाऊद का पुत्र सुलैमान राज्य में स्थिर हो गया, और उसका परमेश्वर यहोवा उसके संग रहा और उसको बहुत ही बढ़ाया।
2Ch 1:2 और सुलैमान ने सारे इस्राएल से, अर्थात सहस्रपतियों, शतपतियों, न्यायियों और इस्राएल के सब रईसों से जो पितरों के घरानों के मुख्य मुख्य पुरुष थे, बातें कीं।
2Ch 1:3 और सुलैमान पूरी मण्डली समेत गिबोन के ऊंचे स्थान पर गया, क्योंकि परमेश्वर का मिलाप वाला तम्बू, जिसे यहोवा के दास मूसा ने जंगल में बनाया था, वह वहीं पर था।
2Ch 1:4 परन्तु परमेश्वर के सन्दूक को दाऊद किर्यत्यारीम से उस स्थान पर ले आया था जिसे उस ने उसके लिये तैयार किया था, उस ने तो उसके लिये यरूशलेम में एक तम्बू खड़ा कराया था।
2Ch 1:5 और पीतल की जो वेदी ऊरी के पुत्र बसलेल ने, जो हूर का पोता था, बनाई थी, वह गिबोन में यहोवा के निवास के साम्हने थी। इसलिये सुलैमान मण्डली समेत उसके पास गया।
2Ch 1:6 और सुलैमान ने वहीं उस पीतल की वेदी के पास जाकर, जो यहोवा के साम्हने मिलाप वाले तम्बू के पास थी, उस पर एक हजार होमबलि चढ़ाए।
2Ch 1:7 उसी दिन रात को परमेश्वर ने सुलैमान को दर्शन देकर उस से कहा, जो कुछ तू चाहे कि मैं तुझे दूं, वह मांग।
2Ch 1:8 सुलैमान ने परमेश्वर से कहा, तू मेरे पिता दाऊद पर बड़ी करुणा करता रहा और मुझ को उसके स्थान पर राजा बनाया है।
2Ch 1:9 अब हे यहोवा परमेश्वर ! जो वचन तू ने मेरे पिता दाऊद को दिया था, वह पूरा हो; तू ने तो मुझे ऐसी प्रजा का राजा बनाया है जो भूमि की धूलि के किनकों के समान बहुत है।
2Ch 1:10 अब मुझे ऐसी बुद्धि और ज्ञान दे, कि मैं इस प्रजा के साम्हने अन्दर- बाहर आना-जाना कर सकूं, क्योंकि कौन ऐसा है कि तेरी इतनी बड़ी प्रजा का न्याय कर सके?
2Ch 1:11 परमेश्वर ने सुलैमान से कहा, तेरी जो ऐसी ही मनसा हुई, अर्थात तू ने न तो धन सम्पत्ति मांगी है, न ऐश्वर्य और न अपने बैरियों का प्राण और न अपनी दीर्घायु मांगी, केवल बुद्धि और ज्ञान का वर मांगा है, जिस से तू मेरी प्रजा का जिसके ऊपर मैं ने तुझे राजा नियुक्त किया है, न्याय कर सके,
2Ch 1:12 इस कारण बुद्धि और ज्ञान तुझे दिया जाता है। और मैं तुझे इतना धन सम्पत्ति और ऐश्वर्य दूंगा, जितना न तो तुझ से पहिले किसी राजा को, मिला और न तेरे बाद किसी राजा को मिलेगा।

एक साल में बाइबल:
  • १ इतिहास १३-१५
  • यूहन्ना ७:१-२७

शुक्रवार, 20 मई 2011

आईये गाएं

संगीत का भक्ति में सदा महत्वपूर्ण स्थान रहा है। परमेश्वर के मन्दिर में आराधना करने वाले भजन गाया करते थे। प्रभु यीशु और उनके चेलों ने प्रभु भोज के बाद भजन गाया (मत्ती २६:३०)। पौलुस ने विश्वासियों को प्रोत्साहित किया कि "आपस में भजन और स्‍तुतिगान और आत्मिक गीत गाया करो, और अपने अपने मन में प्रभु के साम्हने गाते और कीर्तन करते रहो" (इफिसीयों ५:१९)।

भजन गाने का उद्देश्य केवल लोगों को आते सन्देश के लिए तैयार करना ही नहीं है, यदि ऐसा होता तो भक्ति संगीत केवल एक व्यर्थ औपचारिकता बन के रह जाता। पौलुस इस प्रकार भजन गाने से कभी सहमत नहीं होता, क्योंकि उसका दृढ़ विश्वास था कि खराई से प्रचार किया गया सुसमाचार ही "उद्धार के निमित परमेश्वर की सामर्थ है" (रोमियों १:१६)। हम भक्ति संगीत द्वारा प्रभावी रूप से परमेश्वर के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त कर सकते हैं, अपनी विनतियाँ उसके सामने प्रस्तुत कर सकते हैं और अपने विश्वास की गवाही संसार के सामने रख सकते हैं।

भजन ३३ में इस्त्राएलियों को परमेश्वर के सामर्थी वचन के लिए, उसके कभी असफल न होने वाले मार्गदर्शन के लिए और सदा अपने लोगों के प्रति बनी रहने वाली उसकी देखभाल के लिए स्तुति गाने को कहा गया है। जब पौलुस और सिलास बन्दीगृह में डाल दिये गए थे, उनके पाँव काठ में ठोक दिये गए और कोड़े मार मार कर उनकी पीठ उधेड़ दी गई, तब उस हालत में भी वे भजन गा रहे थे क्योंकि उनके मन उद्धार के आनन्द से भरे हुए थे (प्रेरितों १६:२५)।

यदि हम वास्तव में प्रभु से प्रेम करते हैं, तो हम उत्साहपूर्वक उसके आराधकों के साथ मिलकर उसकी स्तुति अवश्य गाएंगे। जब हम अकेले हों और हमारे हृदय आराधना से भरे हों, तब भी हम ऊँचे स्वर में गा सकते हैं, बिना इस बात की चिंता करे कि हम कैसा गा रहे हैं।

दिल से निकली कैसी भी आराधना परमेश्वर को प्रसन्न करती है। - हर्ब वैन्डर लुग्ट


संगीत दिल के उन भावों को अभिव्यक्त कर सकता है जिन्हें हम शब्दों में ला पाते, लेकिन जिनके बारे में हम खामोश भी नहीं रह पाते।

हे धर्मियों यहोवा के कारण जयजयकार करो क्योंकि धर्मी लोगों को स्तुति करनी सोहती है। - भजन ३३:१


बाइबल पाठ: भजन ३३:१-११

Psa 33:1 हे धर्मियों यहोवा के कारण जयजयकार करो क्योंकि धर्मी लोगों को स्तुति करनी सोहती है।
Psa 33:2 वीणा बजा बजाकर यहोवा का धन्यवाद करो, दस तार वाली सारंगी बजा बजाकर उसका भजन गाओ।
Psa 33:3 उसके लिये नया गीत गाओ, जयजयकार के साथ भली भांति बजाओ।
Psa 33:4 क्योंकि यहोवा का वचन सीधा है, और उसका सब काम सच्चाई से होता है।
Psa 33:5 वह धर्म और न्याय से प्रीति रखता है, यहोवा की करूणा से पृथ्वी भरपूर है।
Psa 33:6 आकाशमण्डल यहोवा के वचन से, और उसके सारे गण उसके मुंह की श्वास से बने।
Psa 33:7 वह समुद्र का जल ढेर की नाई इकट्ठा करता; वह गहिरे सागर को अपने भण्डार में रखता है।
Psa 33:8 सारी पृथ्वी के लोग यहोवा से डरें, जगत के सब निवासी उसका भय मानें!
Psa 33:9 क्योंकि जब उस ने कहा, तब हो गया; जब उस ने आज्ञा दी, तब वास्तव में वैसा ही हो गया।
Psa 33:10 यहोवा अन्य अन्य जातियों की युक्ति को व्यर्थ कर देता है; वह देश देश के लोगों की कल्पनाओं को निष्फल करता है।
Psa 33:11 यहोवा की युक्ति सर्वदा स्थिर रहेगी, उसके मन की कल्पनाएं पीढ़ी से पीढ़ी तक बनी रहेंगी।

एक साल में बाइबल:
  • १ इतिहास १०-१२
  • यूहन्ना ६:४५-७१