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शुक्रवार, 17 दिसंबर 2021

मसीही सेवकाई और पवित्र आत्मा के वरदान - 15

     

आत्मिक वरदानों के प्रयोगकर्ता - प्रेरित: मनुष्य द्वारा नियुक्ति के परिणाम 

  पिछले लेख में हमने मसीही विश्वासियों की मण्डली में 1 कुरिन्थियों 12:28 में उपयोगिता के अनुसार दिए गए वरदानों के क्रम में सर्वप्रथम - प्रेरित होने के वरदान के बारे में परमेश्वर के वचन बाइबल में से देखा था। हमने देखा था कि उस आरंभिक मण्डली के लोगों की दृष्टि में प्रेरित कौन थे, और कैसे नियुक्त किए गए थे, और प्रेरित होने का अर्थ क्या था। हमने उनकी नियुक्ति के विषय देखा था कि सभी प्रथम प्रेरित, प्रभु यीशु द्वारा अपने शिष्यों में से नियुक्त किए गए थे। उस नियुक्ति के पश्चात, प्रेरित कहे गए उन बारह शिष्यों के अतिरिक्त, प्रभु के तत्कालीन शिष्यों में किसी शिष्य को फिर कभी प्रेरित नहीं कहा गया। और न ही बाद में मण्डली में प्रेरितों को नियुक्त करने के लिए कोई निर्देश दिए गए तथा न ही उनकी नियुक्ति के लिए उनमें विद्यमान होने वाले गुणों की कोई शिक्षा दी गई, जैसे के 1 तिमुथियुस 3:1-7, और तीतुस 1:5-9 में मण्डली के संचालन के लिए मण्डलियों के अगुवों के विषय कहा गया है। परमेश्वर के वचन बाइबल में प्रेरितों की नियुक्ति के लिए उनके परमेश्वर द्वारा नियुक्त किए जाने ही की बात लिखी गई है। केवल एक उदाहरण है जब मनुष्यों ने एक व्यक्ति को प्रेरित नियुक्त करने का प्रयास किया, यहूदा इस्करियोती के स्थान पर किसी अन्य जन को, किन्तु उसका परिणाम संदेहास्पद ही रहा, और उस नियुक्ति में आरंभ से अंत तक जो प्रक्रिया अपनाई गई वह वचन से असंगत ही रही। आज हम मनुष्यों द्वारा की गई इसी नियुक्ति और प्रक्रिया को कुछ विस्तार से देखेंगे, कि जो ऊपरी तौर से तो सही और वचन के अनुसार लगती है, किन्तु वास्तविकता में है नहीं। 

हम प्रेरितों1:15-26 खंड से देखते हैं कि प्रभु यीशु के स्वर्गारोहण के बाद, शिष्य पवित्र आत्मा की सामर्थ्य प्राप्त करने की प्रतीक्षा कर रहे थे, जिसके बाद वे सुसमाचार प्रचार की सेवकाई पर निकाल सकें। वे अपना समय प्रार्थना करने (प्रेरितों 1:14) और मंदिर में उपस्थित होकर स्तुति करने (लूका 24:53) में बिताते थे। ऐसे में पतरस उनके मध्य में खड़ा होकर कुछ कहने लगा; और उसने अपनी बात को वचन में दी गई भविष्यवाणी को आधार बनाकर व्यक्त किया। पतरस का विषय था यहूदा इस्करियोती के स्थान पर किसी अन्य को प्रेरित होने के लिए नियुक्त करना। पतरस का यह कार्य एक उत्तम उदाहरण है हम मनुष्यों द्वारा, विशेषकर मसीही विश्वासियों, या ईसाई धर्म के मानने वालों के द्वारा, परमेश्वर के वचन और नाम को, अपनी इच्छा पूरी करने के लिए प्रयोग करने का। 

प्रेरितों 1:15-26 में कहीं यह नहीं लिखा गया है कि पतरस ने यह बात प्रभु परमेश्वर के कहने पर की। न ही पतरस अपने लिए कहता है कि उसने इस विषय को परमेश्वर के सामने प्रार्थना में रखा था, और उसे जो परमेश्वर की ओर से मार्गदर्शन मिला, उसके अनुसार वह अब उन लोगों से बात कर रहा है, उन्हें परमेश्वर की इच्छा बता रहा है। पतरस की तुलना में, जब प्रभु ने अपने बारह शिष्यों के प्रेरित होने का चुनाव किया (मत्ती 10:2), तो उससे पहले उसने परमेश्वर पिता के साथ प्रार्थना में सारी रात बिताई, और तब जो लोग उसके साथ रहते थे उनमें से बारह को प्रेरितों कहलाए जाने के लिए चुना (लूका 6:12-13) 

इसकी तुलना में पतरस द्वारा की जाने वाली प्रक्रिया को देखिए:  

प्रेरितों 1:14-15 - प्रभु के अनुयायी प्रार्थना में लगे हुए हैं। उनकी प्रार्थना के विषय तो नहीं दिए गए हैं; किन्तु स्वाभाविक है कि स्वर्गारोहण से पहले जो शिक्षाएं प्रभु ने उन्हें दी थीं, और जिन जिम्मेदारियों के निर्वाह के लिए तैयार होने के लिए कहा था, वे ही बातें उनकी प्रार्थनाओं का विषय रही होंगी। साथ ही ध्यान कीजिए कि प्रभु ने उन्हें सुसमाचार प्रचार पर जाने के लिए तैयार होने के लिए तो कहा था, किन्तु कभी भी, किसी को भी यहूदा इस्करियोती के स्थान पर कोई नियुक्ति करने के लिए नहीं कहा - न पतरस से जब उससे तीन बार भेड़ों और मेमनों की रखवाली करने और उन्हें चराने के लिए कहा (यूहन्ना 21:15-17), न मत्ती 28:18-20 तथा मरकुस 16:15-19 में दी गई स्वर्गारोहण के समय प्रभु की महान आज्ञा के समय, न लूका 24 अध्याय के अंत में दी गई इम्माऊस के मार्ग पर दो शिष्यों के साथ हुई चर्चा में, और न ही लूका 24:45 में उनकी वचन की समझ खोलने के समय पर। प्रभु ने कभी भी किसी से भी यह करने के लिए नहीं कहा था; किन्तु फिर भी पतरस अपने आप ही इस बात को लेकर प्रभु के लोगों के बीच में खड़ा हो गया। उसने सुनने वालों के सामने, आने वाली सेवकाई के कार्य की बात उठाकर, पहले अपनी बात मानने का आधार बनाया कि अब शीघ्र ही शिष्यों को सेवकाई पर निकलना था, और बारह प्रेरितों में से अब एक कम हो गया था (प्रेरितों 1:17), जिसकी नियुक्ति अभी नहीं हुई थी। फिर परमेश्वर के वचन में से भजन संहिता में लिखी भविष्यवाणी का सहारा लेकर अपनी बात को वैध ठहराया (प्रेरितों 1:16, 20) 

साथ ही पतरस अपनी बात को सही ठहराने के लिए मानवीय बुद्धि और तर्क का सहारा लेता है (प्रेरितों 1:21-22)। उसकी कही ये बातें सामान्य समझ और दृष्टिकोण से बहुत उचित और सही लगती हैं, किन्तु इन में कहीं प्रभु की इच्छा का कोई उल्लेख नहीं है। वह तर्क देता है कि पहले प्रेरित भी उन लोगों में से चुने गए थे जो आरंभ से प्रभु यीशु के साथ रहते थे, इसलिए अब भी उन्हीं लोगों में से किसी एक को ही यह आदर मिलना चाहिए। लेकिन उसने इस बात का ध्यान नहीं किया कि बारह प्रेरित चुनने से पहले प्रभु ने पिता परमेश्वर से सारी रात प्रार्थना और परामर्श किया था, उससे अनुमति ली थी, तब कहीं यह निर्णय लिया था। जबकि पतरस उसके साथ एकत्रित शिष्यों से भी परामर्श और अनुमति नहीं ले रहा है, वरन सीधे उन्हें अपनी बात मानने के लिए तैयार कर रहा है। और यह प्रभु द्वारा इस नियुक्ति के लिए स्थापित उदाहरण के कदापि अनुरूप नहीं है। 

परिणामस्वरूप, प्रेरितों 1:23-25 में हम देखते हैं कि वे लोग पतरस की बात से सहमत हो जाते हैं, और अपनी सलाह-मशवरा करने के बाद, किसी ऐसी रीति से जिसका कोई विवरण नहीं दिया गया है, अपने आप में से दो लोगों के नामों पर एकमत हो जाते हैं, और फिर उन्हें परमेश्वर के सम्मुख अंतिम निर्णय के लिए ले कर आते हैं। तुलना में, प्रभु यीशु ने परमेश्वर के सामने किसी का भी नाम नहीं रखा था; जबकि ये लोग पहले अपनी बुद्धि और समझ लगा रहे हैं, और अपनी समझ के अनुसार अपना ही निर्णय कर लेने के बाद, दो नाम तय कर लेने के बाद, फिर उन केवल उन दोनों ही में से एक के लिए निर्णय देने के लिए परमेश्वर से कह रहे हैं। वे परमेश्वर को निर्देश दे रहे हैं कि तू बस इन दोनों में से एक के लिए बता दे - तेरा उत्तर केवल इन दोनों में से एक के लिए ही होना चाहिए; क्योंकि हमने तय कर लिया है। हम यह जानते हैं और निर्णय कर चुके हैं कि हम में से केवल यही दोनों ही इस सेवकाई और प्रेरित नियुक्त होने के योग्य हैं, और परमेश्वर तुझे इसके अनुसार ही करना होगा। 

प्रेरितों 1:26 से हम देखते हैं कि उन्होंने न केवल लोगों के नाम निर्धारित कर लिए, वरन परमेश्वर ने उनमें से एक को कैसे चुनना है यह भी निर्धारित कर लिया, और परमेश्वर पर अपनी कार्य-विधि लागू भी कर दी। उन्होंने परमेश्वर से यह भी जानने का प्रयास नहीं किया कि उनकी बात परमेश्वर की इच्छा के अनुसार है भी कि नहीं, वह अपना उत्तर कैसे देगा, या, वे परमेश्वर के उत्तर को कैसे जानेंगे। फिर अपनी समझ और तरीके से काम करके, और परमेश्वर के नाम में, अपनी बनाई विधि के अनुसार उन्होंने एक को चुन भी लिया, तथा स्वयं ही उसे प्रेरित होने की उपाधि भी दे दी। जो काम पहले प्रभु ने परमेश्वर की इच्छा और परामर्श द्वारा किए थे, वे सभी अब इन लोगों ने अपनी समझ और ज्ञान के अनुसार कर दिए, और वचन के हवालों तथा प्रार्थना करने के द्वारा उसे परमेश्वर की इच्छा में किया गया कार्य जता दिया। 

इस पद का अंतिम वाक्य इस संदर्भ में रोचक है, क्योंकि संकेत देता है कि परमेश्वर ने मत्तियाह को बारहवाँ प्रेरित स्वीकार नहीं किया था। परमेश्वर पवित्र आत्मा ने लिखवाया, “...सो वह उन ग्यारह प्रेरितों के साथ गिना गयाजबकि अधिक उचित वाक्य, जो उसके बारहवाँ प्रेरित होने की भी पुष्टि करता, यह लिखवाना होताऔर वह बारहवाँ प्रेरित हो गया”, या फिर, “और वह बारहवाँ प्रेरित बन गया  

यूहन्ना 21:2-3 में जब पतरस वापस मछली पकड़ने के लिए निकला, तो उसके साथ छः और शिष्य भी उसका अनुसरण करते हुए इसी काम में चले गए थे। न केवल पतरस प्रभु के प्रति विश्वास में कमज़ोर पड़ा वरन उसके कारण छः और शिष्य भी कमज़ोर पड़कर प्रभु के मार्ग से हट गए; और फिर आगे प्रभु को उन सभी को उसकी सेवकाई के लिए लौटा के लाना पड़ा। यहाँ पर फिर से पतरस वही करता है - एक बार फिर न केवल वह स्वयं प्रभु की बात से हटा, वरन उसके साथ वहाँ एकत्रित अन्य लोग भी बहक गए, उसकी गलती में उसके साथ सम्मिलित हो गए। वे भी पतरस को सुधारने की बजाए, उसके साथ गलती में सम्मिलित हो गए। उन्होंने मिलकर परमेश्वर पर अपनी समझ के अनुसार और अपने द्वारा निर्धारित बातों को लाद दिया - 

  • परमेश्वर तुझे अभी ही, इसी समय बारहवाँ प्रेरित चुनना होगा
  • तुझे उस बारहवें को उन में से ही चुनना होगा जो आरंभ से हमारे साथ रहे हैं;
  • हम जानते हैं कि हम सही हैं क्योंकि हमें इस से संबंधित वचन के हवाले पता हैं;
  • यह बारह की गिनती पूरी करना हमारी आती सेवकाई के लिए बहुत आवश्यक है, और तुझे अभी यह कमी पूरी करनी है;
  • हम ने अपने में से दो सबसे योग्य जन चुन लिए हैं, हमें पता है कि यही सबसे उपयुक्त हैं
  • अब तुझे बस इतना बताना है कि इन दोनों में से कौन सबसे उपयुक्त है;
  • हमारे चिट्ठियाँ डालने के द्वारा तुझे यह निर्णय प्रकट करना होगा। 

पतरस और उसके साथी परमेश्वर को वहाँ अपनी बातों में बांध कर, अपने हाथों की कठपुतली बनाकर, उनकी मर्जी के अनुसार करने के लिए प्रयोग कर रहे थे। इच्छा और निर्णय उनके थे, नाम परमेश्वर का था।  

उनकी प्रक्रिया के अनुसार बारहवाँ प्रेरित चुन लिया गया, उन लोगों के द्वारा उसे वह पद भी दे दिया गया, किन्तु सारे नए नियम में कहीं उसकी सेवकाई का कोई उल्लेख नहीं है। वह पतरस और उसके साथियों के द्वारा ठहराया गया प्रेरित तो था; किन्तु परमेश्वर ने यह पद किसी और, अर्थात पौलुस के लिए रखा हुआ था, जिसे वह बाद में प्रकट करता है - 1 कुरिन्थियों 9:1-2; 15:9। मनुष्यों के चुनाव और नियुक्ति के जन, मत्तियाह, का वचन में कहीं कोई महत्व अथवा उल्लेख नहीं है; जबकि, परमेश्वर की नियुक्ति के जन, पौलुस का कार्य, उसके प्रभु में आते के साथ ही, प्रेरितों 9 अध्याय से ही आरंभ हो जाता है। और यहाँ से आरंभ करके 28 अध्यायों की यह शेष सारी प्रेरितों के काम नामक पुस्तक पौलुस के कार्यों के बारे में ही है; साथ ही नए नियम का लगभग दो तिहाई भाग पवित्र आत्मा ने पौलुस द्वारा लिखवाया है। 

परमेश्वर के वचन के अधिकांश विद्वानों और वचन की अधीनता में होकर मसीही सेवकाई में लगे लोगों का यही मानना है कि प्रेरितों का समय प्रभु के द्वारा नियुक्त किए गए उन प्रेरितों के साथ समाप्त हो चुका है, और फिर उनके बाद परमेश्वर ने न तो कोई नए प्रेरित नियुक्त किए, न ही उनकी नियुक्ति के लिए कभी शिष्यों को कोई निर्देश दिए हैं।प्रेरितशब्द के शब्दार्थ, “विशेष अधिकार के साथ नियुक्त किया हुआको तथा परमेश्वर के वचन के ज्ञान को अपने तर्क का आधार बनाकर परमेश्वर की मण्डली में अपना व्यक्तिगत स्तर बनाने और उनमें कोई विशिष्ट अधिकार का स्थान दिखाने वाले, तथा लोगों में अपने नाम और प्रचार द्वारा महत्व और प्रशंसा के पात्र होने की लालसा रखने वाले, सेवकाई के इस पवित्र आत्मा के वरदान का उपाधि और पदवी के समान प्रयोग तो कर सकते हैं। हो सकता है कि उनका प्रचार और व्यवहार बहुत आकर्षक, सही, और प्रभावी, तथा वचन के अनुसार लगे - पतरस का प्रचार और वचन का प्रयोग भी सभी को ऐसा ही प्रभावी और सही लगा था; किन्तु उनकी वास्तविकता प्रभु के वचन के अनुसार उनका आँकलन और जाँच करने से, उनके प्रचार के विषयों और उनकी शिक्षाओं द्वारा लोगों के जीवन में आने वाले पवित्र आत्मा के फलों के विद्यमान होने से, लोगों के अन्दर परमेश्वर और उसके वचन के प्रति आज्ञाकारी होने की भावना जागृत होने से प्रकट हो जाती है; लोगों के सांसारिक या नश्वर बातों के लाभ प्राप्त करने से नहीं। 

यदि आप मसीही विश्वासी हैं तो यह अति आवश्यक है कि आप वो करें जो प्रभु ने करने के लिए कहा है; और उसे वैसे करें जैसे प्रभु ने बताया है। हम प्रभु को सिखाने वाले, अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए उसके नाम और वचन का दुरुपयोग करने वाले न बनें। वचन के हवाले, और आकर्षक शब्दों की प्रार्थनाओं का सहारा लेकर हम लोगों को भरमा सकते हैं, परमेश्वर को नहीं, और न ही परमेश्वर को किसी रीति से किसी बात के लिए बाध्य कर सकते हैं। अंततः होगा वही जो परमेश्वर चाहता है, और जैसा परमेश्वर चाहता है।  

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।  

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • आमोस 7-9    
  • प्रकाशितवाक्य 8 

गुरुवार, 16 दिसंबर 2021

मसीही सेवकाई और पवित्र आत्मा के वरदान - 14

  

आत्मिक वरदानों के प्रयोगकर्ता - प्रेरित: परमेश्वर द्वारा नियुक्ति  

मसीही विश्वासियों की मण्डलियों में आत्मिक वरदानों की उपयोगिता के अनुसार 1 कुरिन्थियों 12:28 में दिए गए क्रम में पहले तीन स्थान उन लोगों के हैं जिन्हें परमेश्वर पवित्र आत्मा ने वचन की सेवकाई से संबंधित वरदान प्रदान किए हैं अर्थात, प्रेरित, भविष्यद्वक्ता, और शिक्षक। जैसे उपयोगिता के इस वरीयता क्रम में दिए गए अंतिम वरदानों, अन्य भाषाएं बोलना और उनका अनुवाद करने के वरदान के साथ हो गया है, वैसे ही आरंभिक दोनों वरदानों - प्रेरित, और भविष्यद्वक्ता होने के वरदान के साथ भी हो गया है। इन्हें वर्तमान में बहुत गलत समझा जाता है, और मण्डली में अपने आप को उच्च एवं प्रभावी दिखाने, अपने आप को औरों से भिन्न तथा बढ़कर महत्व वाला दर्शाने के लिए इन्हें प्रयोग किया जाने लगा है, जबकि यह वचन के अनुसार सही नहीं है। परमेश्वर की दृष्टि में सभी सेवकाई और सभी वरदान समान स्तर के हैं, क्योंकि सभी सेवाकाइयाँ भी परमेश्वर द्वारा निर्धारित की गई हैं, तथा उन सेवकाइयों के लिए उपयुक्त वरदान भी परमेश्वर पवित्र आत्मा ही अपनी इच्छा के अनुसार प्रदान करता है, किसी मनुष्य की इच्छा अथवा लालसा और प्रार्थना के अनुसार नहीं। 

इन सेवकाइयों और वरदानों तथा उनके प्रयोगकर्ताओं के बारे में गलत धारणाओं और शिक्षाओं से बचने का एक उपाय है, उन्हें उस दृष्टिकोण से समझना, जिस प्रकार से उस आरंभिक मण्डली या कलीसिया के लोगों ने उन्हें समझा था, जब उन वरदानों और सेवकाइयों के बारे में उन्हें सिखाया गया और पत्रियों में लिखा गया था। वही उनका प्राथमिक और वास्तविक अर्थ एवं अभिप्राय है, जो समय, स्थान, सभ्यता, और लोगों के अनुसार कभी नहीं बदल सकता, क्योंकि परमेश्वर का वचन स्थिर, स्थाई, और अटल है और कभी नहीं बदलता है। इस आधार पर उस आरंभिक मण्डली के लिए प्रेरित, भविष्यद्वक्ता, और शिक्षक होने का जो अभिप्राय था, वही आज भी है। आज बहुत से लोग अपने आप लिए इन सेवकाइयों को उपाधियों के समान प्रयोग करते हैं; अपने नाम और प्रचार में अपने महत्व और ओदे या स्तर को दिखाने के लिए इन सेवकाइयों को उपाधि के समान लगाकर प्रचार करते हैं, यह दिखाना चाहते हैं कि वे कितने विशिष्ट और प्रमुख हैं। किन्तु वास्तविकता तो यह है कि हम सभी, चाहे हमने कोई भी उपाधि क्यों न धारण कर रखी हो, पापी ही हैं, जिन्हें प्रभु यीशु ने हमारे किसी कर्म अथवा योग्यता के कारण नहीं वरन अपने अनुग्रह में होकर क्षमा किया और बचाया है, तथा अपनी इच्छा के अनुसार अपनी मण्डली में सेवकाई सौंपी है; अपने आप को बड़ा या प्रमुख, या विशिष्ट दिखाने के लिए नहीं, और न ही उस सेवकाई को सांसारिक लाभ और संपत्ति जमा करने का साधन बनाने के लिए, वरन सुसमाचार के प्रचार और प्रभु के नाम को महिमा एवं आदर देने के लिए। हम सभी को प्रभु परमेश्वर की महिमा को प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रीति से चुराने के प्रयास करने की बजाए, पौलुस प्रेरित के रवैयेपरन्तु मैं जो कुछ भी हूं, परमेश्वर के अनुग्रह से हूं: और उसका अनुग्रह जो मुझ पर हुआ, वह व्यर्थ नहीं हुआ परन्तु मैं ने उन सब से बढ़कर परिश्रम भी किया: तौभी यह मेरी ओर से नहीं हुआ परन्तु परमेश्वर के अनुग्रह से जो मुझ पर था” (1 कुरिन्थियों 15:10) का अनुसरण करना चाहिए। 

इस संदर्भ में आज हम आरंभिक कलीसिया के लिएप्रेरितहोने के अभिप्राय को परमेश्वर के वचन से देखते और समझते हैं, क्योंकि यह लोगों द्वारा धारण की जाने वाली एक बहुत प्रचलित उपाधि है, जिसे लेकर बहुत गलत शिक्षाएं और समझ फैला दी गई है:

मूल यूनानी भाषा के जिस शब्द का अनुवादप्रेरितकिया गया है, उसका अर्थ हैविशेष अधिकार के साथ नियुक्त किया हुआ।यह संज्ञा स्वयं प्रभु ने ही अपने 12 शिष्यों दी थी। प्रभु ने अपने सभी शिष्यों को प्रेरित नहीं कहा, वरन अपने सभी शिष्यों में से जिन बारह को उसने विशेषकर चुना था, उन्हें ही यह संज्ञा दी (लूका 6:12-16)। और यह संज्ञा सुसमाचारों में अन्त तक (पकड़वाए जाने से पहले फसह का पर्व – लूका 22:14; पुनरुत्थान के बाद एकत्रित लोगों को बताना – लूका 24:9-10) उन्हीं बारह के लिए ही प्रयोग की गई। अर्थात, प्रभु का प्रत्येक शिष्य, प्रभु यीशु की ओर से, “प्रेरितनहीं था; प्रभु के साथ रहने वाले लोगों और शिष्यों में से भी प्रेरित केवल वही कहलाते थे जिन्हें प्रभु यीशु ने प्रेरित कहा था। और इन बारह को चुनने के पीछे, जिन्हें प्रभु ने प्रेरित नियुक्त किया था, उनके लिए प्रभु का विशेष अभिप्राय था, जो मण्डली में पवित्र आत्मा द्वारा दिए गए प्रेरित होने के वरदान के समान है तथा वचन की सेवकाई से संबंधित है। उन बारह प्रेरितोंको प्रभु यीशु के अन्य शिष्यों से कुछ भिन्न होना था, जैसा कि मरकुस 3:13-15 में उनके लिए दिया गया है:

–       वे उसके साथ रहें;

–       वे उसके द्वारा भेजे जाने के लिए तैयार रहें – जब और जहाँ प्रभु भेजे;

–       वे प्रभु के कहे के अनुसार प्रचार करें; और दुष्टात्माओं को निकालने का अधिकार रखें।

प्रेरित कहलाने वाले शिष्यों के लिए कही गई इन तीनों बातों के क्रम का भी महत्व है; अकसर लोग अंतिम बात, प्रचार करने और आश्चर्यकर्म करने की सेवकाई के पीछे भागते हैं; किन्तु प्रभु के साथ समय बिताने, और उसके कहे के अनुसार जाकर उसके द्वारा बताए गए कार्य को करने की इच्छा नहीं रखते हैं। शिष्य को सबसे पहले प्रभु के साथ रहना है, फिर उसके कहे के अनुसार करना है, और तब ही प्रचार या आश्चर्यकर्मों की लालसा रखनी है।

 बाद में नए नियम में शब्दप्रेरितका प्रयोग दूसरे रूप में भी किया गया है – एक तो प्रेरित वे थे जिन्हें प्रभु ने नियुक्त किया था; और इस शब्द का दूसरा प्रयोग उनके लिए आया है जो विशेष सन्देश-वाहक थे, जैसे कि बरनबास (प्रेरितों 14:14) , प्रभु का भाई याकूब (गलातियों 1:19), संभवतः सिलास (1 थिस्सलुनीकियों 2:6 को 1:1 से मिलाकर देखें), आदि। किन्तु ऐसा कदापि नहीं है कि प्रभु के प्रत्येक सेवक को भी प्रेरित कहा गया; उदाहरण के लिए, तिमुथियुस, तीतुस, फिलेमोन, उनेसिमुस, इपफ्रूदितुस, आदि महत्वपूर्ण सेवकों के लिए प्रेरित शब्द नहीं प्रयोग किया गया है।

कलीसिया के कार्यों और देखभाल के लिए नियुक्त किए गए लोगों में भी परमेश्वर के द्वारा  प्रेरितों को नियुक्त करने का उल्लेख है (1 कुरिन्थियों 12:28-29; इफिसियों 4:11)। कलीसिया के कार्यों से संबंधितप्रेरितोंके लिए इन दोनों पत्रियों – कुरिन्थियों और इफिसियों, में स्पष्ट आया है कि उन्हें परमेश्वर ने नियुक्त किया था; वे किसी मनुष्य की नियुक्ति नहीं थे – यह भी हो सकता है कि ये प्रेरित, वे प्रभु द्वारा आरंभ में नियुक्त किए गए शिष्य हों, जिन्हें अब प्रभु द्वारा कलीसियाओं की रखवाली की ज़िम्मेदारी भी दी गई। अर्थात, प्रेरित जब भी नियुक्त किए गए, परमेश्वर के द्वारा ही नियुक्त किए गए। 

यहाँ पर यह ध्यान देने योग्य बात है कि बाद में तीतुस और तिमुथियुस को लिखी गई पत्रियों में जब कलीसिया के कार्यों को संभालने के लिए, कलीसियाओं के सदस्यों द्वारा, अगुवों की नियुक्ति करने के लिए, कलीसिया के उन सेवकों या अगुवों या प्राचीनों के गुणों के बारे में निर्देश दिया गया (1 तिमुथियुस 3:1-7; तीतुस 1:6-9), तब वहाँ कलीसिया के कार्यों के लिए अथवा प्रभु के सुसमाचार और संदेश के प्रचार के लिए मनुष्यों द्वारा प्रेरितों के चुनाव करने के लिए न तो कहा गया (तीतुस 1:5), और न ही तब स्वयं को प्रेरित नियुक्त करने या मण्डली के द्वारा किसी को प्रेरित नियुक्त करने के लिए कोई विशेष गुण लिखवाए गए। साथ ही इस पर भी ध्यान कीजिए कि रोमियों 16 अध्याय में, जो उस पत्री का अंतिम अध्याय है, पवित्र आत्मा की अगुवाई में पौलुस कई लोगों को उनके कार्य और सहायता के लिए धन्यवाद के लिए स्मरण करता है, और पहले ही पद में फीबे को डीकनेस भी कहता है, अर्थात एक सेवकाई और ज़िम्मेदारी के पद का उल्लेख भी करता है। किन्तु 16:7 में अपने साथ के पुराने प्रेरितों को छोड़, पौलुस और किसी को प्रेरित नहीं कहता है। इसी प्रकार 1 कुरिन्थियों 16 में भी किसी के प्रेरित होने का उल्लेख नहीं है, जबकि पवित्र आत्मा की अगुवाई में यहाँ पर भी कई लोगों की उनके मसीही जीवन और कार्यों के लिए सराहना की गई है।

परमेश्वर का वचन ही अपना सबसे उत्तम स्पष्टीकरण और अपनी समझ प्रदान करता है, और परमेश्वर ने अपने वचन में ही हमें प्रेरितों की पहचान भी बताई है। प्रेरितों 1:2-3 में हमें प्रभु द्वारा नियुक्त प्रेरितों की पहचान के लिए दिए गए तीन गुण देखते हैं:

1.     प्रभु द्वारा चुने हुए (पद 2)

2.     प्रभु द्वारा आज्ञा पाए हुए (पद 2)

3.     जिन्होंने पुनरुत्थान हुए प्रभु को देखा (पद 3)

पौलुस के जीवन में भी दमिश्क के मार्ग पर उसे मिले प्रभु यीशु के दर्शन के द्वारा ये तीनों बातें पूरी हुई, और इस बात का दावा वह 1 कुरिन्थियों 9:1-2; 15:9 में करता है; इसीलिए पौलुस भी प्रेरित कहलाया है। इन तीन बातों के आधार पर मनुष्यों द्वारा, यहूदा इस्करियोती के स्थान पर एक प्रेरित की नियुक्ति का एकमात्र उदाहरण हम प्रेरितों 1:20-26 में पाते हैं। किन्तु मनुष्यों द्वारा की गई इस एक नियुक्ति के लिए उन लोगों ने वचन से असंगत क्या कुछ किया, यह अपने आप में एक रोचक अध्ययन है, जिसे हम अगले लेख में देखेंगे।  

जैसे सच्चे प्रेरित थे, वैसे ही शैतान ने अपने लोगों को झूठे प्रेरित बना कर मण्डलियों में मिला दिया (2 कुरिन्थियों 11:13) जिससे प्रभु के कार्य को बिगाड़ सकें, लोगों को सच्चाई के मार्ग से भटका सकें। ये झूठे प्रेरित व्यावसायिक प्रचारक थे, जो लोग-लुभावनी बातों का प्रचार करके (2 तिमुथियुस 4:3-4), श्रोताओं से पैसे लेते थे। ये लोगों से सिफारिश की पत्रियाँ या अपनी प्रशंसा के पत्र लिखवाकर ले आए थे, और पौलुस द्वारा दी गई शिक्षाओं का विरोध करते थे (2 कुरिन्थियों 3:1-3)। और आज भी स्वयं-नियुक्त अथवा मनुष्यों द्वारा नियुक्तप्रेरितोंमें यही बात देखी जाती है - वे लोगों में अपनी प्रशंसा, आदर, स्तर, और लोगों द्वारा उन्हें प्रदान किए जाने वाले उच्च स्थान का ढिंढोरा पीटते हैं, और फिर उसके आधार पर अपने आप को प्रमुख और विशिष्ट जताते हैं, तथा दीनता, नम्रता, और खराई से वचन की सही और सच्ची शिक्षाएं देने वालों के महत्व को कम या व्यर्थ दिखाते हैं। प्रभु यीशु ने कहा था कि सच्चे और झूठे भविष्यद्वक्ताओं में भिन्नता उनके फलों से पता चल जाएगी (मत्ती 7:16-20)। प्रभु की इसी बात को आधार बनाकर, पौलुस कुरिन्थियों की मण्डली के लोगों से कहता है कि तुम ही हमारे प्रशंसा-पत्र, हमारे सिफारिशी पत्र हो। अर्थात हमें किसी मनुष्य से प्रशंसा पाने या अपना ढिंढोरा पीटने की आवश्यकता नहीं है, प्रभु हमारी सेवकाई और वास्तविकता को भली-भांति जानता है; हमारी सेवकाई के फलों, यानि कि, तुम्हें देखकर ही लोग पहचानते हैं कि उन झूठे प्रेरितों की तुलना में तुम्हारे शिक्षक कौन और कैसे थे, और तुम्हें क्या सिखाते थे।

यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं, तो यह ध्यान और विश्वास रखिए कि परमेश्वर ने हमें भेड़ की खाल में छिपे भेड़ियों की पहचान न कर पाने की असहाय स्थिति में नहीं छोड़ा है; उसने अपने वचन में ही इसकी पहचान दी है, और वचन को समझाने के लिए अपना पवित्र आत्मा हमें दिया है। मसीही विश्वासियों के लिए समझने के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण बात है कि वचन में मनुष्यों द्वारा न तो प्रेरित नियुक्त किए जाने के कोई निर्देश हैं,  इस नियुक्ति के लिए कोई गुण और प्रक्रिया दी गई है, और न मनुष्यों द्वारा की गई नियुक्ति के आधार पर कोई प्रेरित होने के दायित्व को निभा सका है। प्रभु चाहता है कि हम पहले जाँचें, सच्चाई को परखें, और तब ही किसी शिक्षा या धारणा को स्वीकार करें (1 यूहन्ना 4:1; 1 थिस्सलुनीकियों 5:21)। सच्चे और झूठे प्रेरितों की पहचान करने के लिए हम आज उन्हें मरकुस 3:13-15 में दिए गए प्रेरित कहलाने वाले शिष्यों के गुणों, तथा प्रेरितों 1:1-2 में दिए गए प्रेरितों के गुणों और बातों के आधार पर, तथा प्रभु द्वारा मत्ती 7:16-20 की पहचान – उनके फलों के द्वारा जाँच सकते हैं। जिस में ये बाते नहीं हैं, वह मसीही सेवकाई के लिए प्रभु द्वारा नियुक्त सच्चा प्रेरित भी नहीं है। आज भी जो अपने आप को प्रेरित कहते हैं, उनके जीवनों में इन आरंभिक कलीसिया के लोगों के लिए दी गई पहचान की बातों को भी होना चाहिए, अन्यथा उनका दावा गलत है। 

 यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।  

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • आमोस 4-6    
  • प्रकाशितवाक्य 7 

बुधवार, 15 दिसंबर 2021

मसीही सेवकाई और पवित्र आत्मा के वरदान - 13


आत्मिक वरदानों के प्रयोगकर्ता (2)

पिछले लेख में हमने परमेश्वर पवित्र आत्मा द्वारा मसीही सेवकाई के लिए मसीही विश्वासियों को दिए जाने वाले वरदानों के प्रयोगकर्ताओं के बारे में देखा था। हम यह भी देख चुके हैं कि न तो कोई मसीही सेवकाई, और न ही कोई आत्मिक वरदान, औरों की तुलना में छोटा या बड़ा, अथवा अधिक या कम महत्वपूर्ण है। परमेश्वर की दृष्टि में सभी का समान स्तर है, सभी समान रीति से महत्वपूर्ण हैं, और जिसे जो सेवकाई और वरदान परमेश्वर ने दिया है, वही उसके लिए आवश्यक एवं महत्वपूर्ण है; उसके प्रतिफल और आशीषें उसी सेवकाई को उचित रीति से पूरा करने से हैं। किसी अन्य की सेवकाई अथवा वरदानों की लालसा करना, उन्हें माँगने की प्रार्थनाएं करना, और अपनी सेवकाई और वरदानों को गौण समझना वचन के अनुसार सही नहीं है। 

मण्डली में विभिन्न वरदानों की उपयोगिता के आधार पर 1 कुरिन्थियों 12:28 में संख्या के साथ एक क्रम दिया गया है; यह क्रम मण्डली में उपयोगिता की वरीयता को दर्शाने के लिए है, वरदानों अथवा सेवकाइयों को बड़ा या छोटा दिखाने के लिए नहीं। इस क्रम के अनुसार, सबसे अधिक उपयोगी हैं वचन की सेवकाई से संबंधित, प्रेरित, भविष्यद्वक्ता, और शिक्षक होने के वरदान। इसके बाद सामर्थ्य के काम करने, चंगा करने वाले, और उपकार करने वाले वरदान हैं, और मण्डली में उपयोगिता के आधार पर अंत में विभिन्न प्रकार की भाषाएं बोलने और उनके अनुवाद करने के वरदान हैं - क्योंकि इन भाषाओं से संबंधित वरदानों की उपयोगिता तब ही पड़ेगी जब कोई परदेशी या विदेशी प्रचारक अथवा सेवक, जो स्थानीय भाषा नहीं जानता है, वचन की सेवकाई के लिए उस मण्डली में आए; अन्यथा मण्डली के प्रतिदिन के कार्यों में उन भाषाओं संबंधी वरदानों की कोई आवश्यकता नहीं है। किन्तु आज लोगों में पहले तीन, सबसे उपयोगी वरदानों की अपेक्षा अंतिम वरदानों की लालसा बहुत अधिक है, औरअन्य भाषा बोलनेके वरदान को लेकर तो बहुत सी गलत शिक्षाएं और धारणाएं बताई और सिखाई जाती हैं, वचन के दुरुपयोग द्वारा लोगों को बहकाया जाता है। 

इसी प्रकार यदि हम इफिसियों 4:11-13 को देखें, “और उसने कितनों को भविष्यद्वक्ता नियुक्त कर के, और कितनों को सुसमाचार सुनाने वाले नियुक्त कर के, और कितनों को रखवाले और उपदेशक नियुक्त कर के दे दिया। जिस से पवित्र लोग सिद्ध हों जाएं, और सेवा का काम किया जाए, और मसीह की देह उन्नति पाए। जब तक कि हम सब के सब विश्वास, और परमेश्वर के पुत्र की पहचान में एक न हो जाएं, और एक सिद्ध मनुष्य न बन जाएं और मसीह के पूरे डील डौल तक न बढ़ जाएंतो भी इसी बात की पुष्टि हो जाती है कि मण्डली की, प्रभु की देह - उसकी कलीसिया की, प्राथमिक आवश्यकता वचन की सेवकाई और वचन की शिक्षा देने वाले हैं। यदि वचन की सेवकाई ठीक से होगी, तो जैसा इफिसियों में लिखा है, पवित्र लोग, अर्थात मण्डली के लोग, सिद्ध होंगे, सेवा का काम किया जाएगा, मसीह की देह उन्नति पाएगी। यही कारण है कि मण्डली में उपयोगिता के आधार पर 1 कुरिन्थियों 12:28 में वरदानों की उपयोगिता के पहले तीन स्थान वचन की सेवकाई से संबंधित वरदानों को दिए गए हैं। 

किन्तु इन पहले तीन वरदानों को लेकर भी आज असमंजस और तरह-तरह की शिक्षाओं का बोल-बाला हो गया है। बहुत से लोग अपने आप कोप्रेरित (Apostle)”, याभविष्यद्वक्ता (Prophet)” कहने लग गए हैं; किन्तु अपने आप को शिक्षक शायद ही कोई कहता है। इन लोगों के नाम के साथप्रेरित (Apostle)”, याभविष्यद्वक्ता (Prophet)” उपाधि लगाकर इंटरनेट पर वीडियो एवं प्रचार संदेशों की भरमार है। इसी प्रकार सेसामर्थ्य के काम करने वाले (Miracle Workers)” याचंगा करने वालों (healers)” का भी बहुत नाम और प्रचार होता है। किन्तु वचन की खरी सेवकाई और सही शिक्षाएं देने वालों की संख्या बहुत कम है; जो वचन की सही सेवकाई करते भी हैं, लोग उन्हें अधिक पसंद नहीं करते हैं; जो पवित्र आत्मा द्वारा 2 तिमुथियुस 4:3-4 की भविष्यवाणी, “क्योंकि ऐसा समय आएगा, कि लोग खरा उपदेश न सह सकेंगे पर कानों की खुजली के कारण अपनी अभिलाषाओं के अनुसार अपने लिये बहुतेरे उपदेशक बटोर लेंगे। और अपने कान सत्य से फेरकर कथा-कहानियों पर लगाएंगेकी पूर्ति है। परमेश्वर पवित्र आत्मा ने जब पौलुस प्रेरित के द्वारा ये पत्रियाँ लिखवाई थीं, उस समय के पत्रियों के उन प्राथमिक पाठकों के लिए जोप्रेरित”, “भविष्यद्वक्ता”, आदि उपाधियों का र्थ था, वही आज भी इन शब्दों का प्राथमिक अर्थ है, जिसे, क्योंकि परमेश्वर का वचन और बात कभी बदलती नहीं है, इसलिए बदला या नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता है; उस मूल अर्थ के स्थान पर आज अन्य अर्थ लागू नहीं किए जा सकते हैं, अन्यथा यह वचन को बदलने और उसे अटल के स्थान पर परिवर्तनीय बनाना होगा। हम अगले लेख में परमेश्वर के वचन बाइबल में दिए गएप्रेरित”, “भविष्यद्वक्ता”, आदि शब्दों के अर्थ और अभिप्रायों को देखेंगे। 

यदि आप मसीही विश्वासी हैं तो आपको यह ध्यान रखना अनिवार्य है कि आप परमेश्वर के वचन की सच्चाई का प्रचार और प्रसार खराई के साथ करें। लोगों द्वारा अपने आप को दी जाने वाली उपाधियों से प्रभावित होकर उनके बारे कोई अनुचित धारणाएं न बना लें, उनकी बातों को वचन की बातों से बढ़कर न समझें, और बेरिया के विश्वासियों के समान (प्रेरितों 17:11) हर बात को वचन से जाँच-परख कर ही स्वीकार करें।

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।  

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • आमोस 1-3    
  • प्रकाशितवाक्य 6

मंगलवार, 14 दिसंबर 2021

मसीही सेवकाई और पवित्र आत्मा के वरदान - 12


आत्मिक वरदानों के प्रयोगकर्ता (1)

हमने पिछले लेख में 1 कुरिन्थियों 12:7 और 11 से देखा है कि  (1) मसीही विश्वासी से उसके आत्मिक वरदानों का सदुपयोग परमेश्वर पवित्र आत्मा ही करवाता है; पवित्र आत्मा की सामर्थ्य एवं मार्गदर्शन के बिना मसीही विश्वासी उन आत्मिक वरदानों को सही रीति से प्रयोग नहीं कर सकता है। (2) हर मसीही विश्वासी को उसके सभी आत्मिक वरदान परमेश्वर द्वारा उसके लिए निर्धारित की गई सेवकाई के अनुसार, पवित्र आत्मा अपनी ओर से प्रदान करता है। इन वरदानों का दिया जाना किसी की इच्छा के अनुसार नहीं है; मसीही विश्वासी को अपने आप को परमेश्वर की इच्छा के अनुसार ढालना और कार्य करना है, न कि उसे परमेश्वर को अपनी इच्छा के अनुसार चलाने और प्रयोग करने के प्रयास करने हैं। मसीही विश्वासी की आशीष उसकी परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता और समर्पण में है, न कि उसके द्वारा परमेश्वर को अपनी इच्छा-पूर्ति के लिए उपयोग करने के प्रयासों में। 

आत्मिक वरदानों के प्रयोग से संबंधित इस अध्याय का एक और महत्वपूर्ण पद हैऔर परमेश्वर ने कलीसिया में अलग अलग व्यक्ति नियुक्त किए हैं; प्रथम प्रेरित, दूसरे भविष्यद्वक्ता, तीसरे शिक्षक, फिर सामर्थ्य के काम करने वाले, फिर चंगा करने वाले, और उपकार करने वाले, और प्रधान, और नाना प्रकार की भाषा बोलने वाले” (1 कुरिन्थियों 12:28), और यहाँ पर आत्मिक वरदानों का प्रयोग करने वालों को पवित्र आत्मा ने एक क्रम-संख्या के साथ लिखवाया है। रोचक बात है कि पवित्र आत्मा के नाम से गलत शिक्षाएं देने वालों में सर्वाधिक प्रचलित और माँग किया जाने वाला वरदान - अन्य भाषा बोलना, यहाँ दिए गए क्रम में सबसे अंत में रखा गया है; अर्थात कलीसिया में इस वरदान का तुलनात्मक रीति से स्थान बहुत बाद में, अंत में आता है। यह नहीं कि यह वरदान कम महत्वपूर्ण है या छोटा अथवा गौण है, वरन इसलिए क्योंकि किसी भी स्थानीय मण्डली के कार्यों में इसकी उपयोगिता अन्यों की तुलना में उतनी अधिक नहीं है - क्योंकि इसका उपयोग तब ही होगा जब कोई ऐसा परदेशी प्रचारक, जो स्थानीय भाषा नहीं जानता है, आए और वचन की सेवकाई करे। अन्यथा मण्डली के प्रतिदिन के सामान्य कार्यों के लिए इस वरदान की कोई आवश्यकता नहीं है। 

इस वरदान से ठीक पहले, अर्थात वरदानों के क्रम में अंत की ओर, एक और ऐसा वरदान है, सामान्यतः मनुष्य जिसकी बहुत लालसा रखते हैं, जिसे प्राप्त करना चाहते हैं -प्रधान” (अँग्रेज़ी में administrations) होना, अर्थात मण्डली में, मण्डली के कार्यों को नियोजित करने और प्रबंधन करने का स्थान। आज इसे औरों पर अधिकार रखने और अधिकार दिखाने, अपने आप को ऊंचा और दूसरों को नियंत्रित कर सकने वाला दिखाने के लिए प्रयोग किया जाता है। किन्तु उपयोगिता के दृष्टिकोण से इस वरदान की वरीयता भी अन्य की तुलना में अंत की ओर ही है। ऐसा इसलिए क्योंकि उस आरंभिक मसीही मण्डली के समय में लोग प्रभु यीशु मसीह की शिक्षाओं को गंभीरता से लेते और पालन करते थे। प्रभु यीशु ने अपने शिष्यों से कहा था, “तब उसने बैठकर बारहों को बुलाया, और उन से कहा, यदि कोई बड़ा होना चाहे, तो सब से छोटा और सब का सेवक बने” (मरकुस 9:35)। इसलिए उस पहली कलीसिया के समय मेंप्रधान” (या administrator) होने का तात्पर्य था वास्तव में सब से छोटा होना और सब का सेवक होना, जो इस वरदान और कार्य से संबंधित आज के व्यवहार के बिलकुल विपरीत है; इसलिए उस समय इसके लिए कोई होड़ भी नहीं रहती थी।

उपयोगिता के अनुसार दिए गए वरीयता के क्रम के मध्य मेंसामर्थ्य के काम करने वाले, फिर चंगा करने वाले, और उपकार करने वालेदिए गए हैं। किन्तु प्राथमिक स्थान वचन की सेवकाई से संबंधित काम करने वालों का हैप्रथम प्रेरित, दूसरे भविष्यद्वक्ता, तीसरे शिक्षक”; अर्थात, परमेश्वर के दृष्टिकोण से, मण्डली के कार्यों और सेवकाई के लिए, मण्डली की उन्नति के लिए सबसे अधिक उपयोगिता परमेश्वर के वचन की सेवकाई करने वालों, वचन को ठीक से सिखाने और समझाने वालों की है। इन प्राथमिक सेवकाई के वरदानों के उचित निर्वाह के लिए व्यक्ति को परमेश्वर के वचन के साथ और प्रार्थना में समय बिताना होता है। प्रेरितों 6:1-7 में आरंभिक मण्डली की एक घटना दी गई है, जो मण्डली में विवाद और मतभेद का कारण बन रही थी। किन्तु प्रेरितों ने उसके कारण प्रार्थना और वचन की सेवा करने के महत्व के साथ कोई समझौता नहीं किया। उन्होंने समस्या को सुलझाने के लिए समाधान बताया, किन्तु अपनी सेवकाई की थोड़े समय के लिए भी अनदेखी नहीं की, जिसके परिणामस्वरूपपरमेश्वर का वचन फैलता गया और यरूशलेम में चेलों की गिनती बहुत बढ़ती गई; और याजकों का एक बड़ा समाज इस मत के आधीन हो गया” (प्रेरितों 6:7) 

यदि आप मसीही विश्वासी हैं तो, आपकी प्राथमिकताएं क्या हैं? क्या परमेश्वर के वचन में दृढ़ और स्थापित होना, उसे दूसरों तक उसके सही स्वरूप में पहुँचाना आपकी इच्छा और प्राथमिकता है, या आप भी दिखने में बहुत प्रभावी किन्तु मण्डली के लिए उपयोगिता में कम वरीयता रखने वाली बातों के पीछे पड़े हैं? अपनी सेवकाई और अपने वरदान को पहचानिए; प्रभु के लिए उपयोगी बनिए। 

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी। 

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • होशे 1-3    
  • प्रकाशितवाक्य

सोमवार, 13 दिसंबर 2021

मसीही सेवकाई और पवित्र आत्मा के वरदान - 11

  

आत्मिक वरदानों का प्रयोग 

       पिछले लेख में हम 1 कुरिन्थियों 12:7-11 से देख चुके हैं कि परमेश्वर पवित्र आत्मा के द्वारा दिए जाने वाले सभी वरदान किसी के निजी प्रयोग अथवा लाभ के लिए नहीं, वरन मसीही विश्वासियों की मण्डली की उन्नति और परमेश्वर के सुसमाचार के प्रचार तथा प्रसार के लिए हैं। इन वरदानों में आश्चर्यकर्म करने और अन्य भाषाएं बोलने तथा उन भाषाओं का अनुवाद करने के वरदान भी सम्मिलित हैं; और इनके संदर्भ में भी हमने देखा है कि ये भी, यदि उचित रीति से समझे तथा प्रयोग किए जाएं तो पद 7 के अनुसार और अन्य वरदानों के समान ही, सभी की भलाई के लिए दिए गए हैं। पद 11 में आत्मिक वरदानों के उपयोग के विषय दो बहुत महत्वपूर्ण बातें कही गई हैं, जिन्हें आत्मिक वरदानों का उपयोग करने के लिए समझना और ध्यान में रखना अनिवार्य है। ये दो बातें हैं (1) आत्मिक वरदानों का सदुपयोग परमेश्वर पवित्र आत्मा ही करवाता है; (2) हर मसीही विश्वासी को सभी आत्मिक वरदान परमेश्वर पवित्र आत्मा अपनी ओर से प्रदान करता है। 

यहाँ कही गई दूसरी बात के बारे में हम पहले भी देख चुके हैं कि परमेश्वर द्वारा हर एक मसीही विश्वासी के लिए निर्धारित सेवकाई (इफिसियों 2:10) के अनुसार, उसके सुचारु रीति से निर्वाह के लिए, पवित्र आत्मा व्यक्ति को उस सेवकाई के लिए आवश्यक एवं उपयुक्त वरदान देता है। क्योंकि ये सेवकाई परमेश्वर ने निर्धारित की है, औरपहले सेही निर्धारित कर रखी है, अर्थात यह परमेश्वर की सार्वभौमिक इच्छा एवं योजना के अनुसार है, इसलिए इसका ताल-मेल औरों की सेवकाइयों तथा व्यक्ति के लिए निर्धारित योजनाओं और कार्यों के साथ भी अवश्य होगा। इस कारण से किसी मनुष्य के द्वारा इसे बदलना संभव नहीं है। और हम पहले भी देख चुके हैं कि बाइबल में भी स्पष्ट उदाहरण हैं कि जिसके लिए परमेश्वर ने जो निर्धारित किया है, उसे ही वह कार्य, वह सेवकाई निभानी पड़ी; अपनी अनिच्छा या अयोग्यता आदि जताने के द्वारा कोई अपनी सेवकाई से हट नहीं सका, उसे बदलवा नहीं सका। साथ ही हम इस अध्याय के पद 31 (जिसका उपयोग पवित्र आत्मा से संबंधित गलत शिक्षाएं फैलाने वाले मन-चाहे वरदान मांगने और प्राप्त करने को सही ठहराने के लिए करते हैं), के बारे में भी देख चुके हैं कि यह पद केवलधुन में रहनेके लिए कह रहा है, किन्तु इसका कोई आश्वासन नहीं दे रहा है कि उस व्यक्ति की वहधुनपूरी भी की जाएगी। साथ ही, इस पद को उसके संदर्भ में देखने और समझने से यह प्रकट है कि यह मण्डली में अधिक से अधिक उपयोगी होने के अभिप्राय से कहा गया है, आत्मिक वरदान बदलवाने के लिए नहीं। 

इसी प्रकार से पद 11 में कही गई पहली बात, आत्मिक वरदानों का सदुपयोग परमेश्वर पवित्र आत्मा ही करवाता है, के भी कुछ बहुत महत्वपूर्ण निष्कर्ष हैं। हम परमेश्वर पवित्र आत्मा के बारे में यूहन्ना 16:12-13 से पहले देख चुके हैं कि वहसत्य का आत्माहै जो प्रभु के शिष्यों को केवल सत्य का मार्ग बताता है, और अपनी ओर से कुछ नहीं कहता है, केवल वही कहता है जो वह प्रभु परमेश्वर से सुनता है। इसलिए यह संभव ही नहीं है कि मनुष्यों की इच्छा के अनुसार परमेश्वर पवित्र आत्मा उनकी सेवकाई या वरदानों में कोई परिवर्तन करे। मसीही विश्वासियों को पवित्र आत्मा दिए जाने का उद्देश्य उनकी सेवकाई और मसीही जीवन में उनकी सहायता करना, और उन्हें सही मार्ग पर चलाना है, न कि उनकी इच्छाओं के अनुसार फेर-बदल करते रहना। त्रिएक परमेश्वर का कोई भी स्वरूप मनुष्यों के हाथों की कठपुतली नहीं है कि व्यक्ति उन्हें अपनी इच्छा के अनुसार नचाता रहे। जबकि पवित्र आत्मा के नाम से गलत शिक्षाएं देने वालों की बातों में अधिकांशतः परमेश्वर को अपनी इच्छा के अनुसार प्रयोग करने के प्रयास होते हैं। और अपनी इच्छा-पूर्ति को भक्ति के भेष में प्रस्तुत करने के लिए वे नाटकीय प्रार्थनाओं को भी इसके लिए सम्मिलित कर लेते हैं, किन्तु मूल बात परमेश्वर की निर्धारित इच्छा के स्थान पर अपनी पसंद-नापसंद को लागू करवाने के प्रयास रहते हैं। इसकी तुलना में, जब हम सुसमाचारों में प्रभु यीशु मसीह के, तथा पत्रियों में प्रेरितों और प्रभु के शिष्यों के प्रार्थना के जीवन को देखते हैं, तो न तो उन्होंने कभी कोई नाटकीय प्रार्थनाएं कीं, न कोई नाटकीय प्रचार किए। प्रभु यीशु ने तो सदा ही एकांत में प्रार्थना के द्वारा हर बात के लिए पहले परमेश्वर पिता की इच्छा को पता किया, और फिर उस इच्छा को ही पूरा किया; अपनी इच्छा को परमेश्वर की इच्छा पर हावी कभी नहीं किया। यहाँ तक कि पकड़वाए जाने से पहले, गतसमनी के बाग में की गई प्रार्थना में भी प्रभु ने अपनी इच्छा व्यक्त अवश्य की, किन्तु किया वही जो परमेश्वर ने उनके लिए निर्धारित किया हुआ था। 

यदि आप मसीही विश्वासी हैं, तो आपके लिए भी अपने मसीही जीवन और सेवकाई के सही निर्वाह के लिए इन बातों को समझना और पालन करना बहुत आवश्यक है कि परमेश्वर पवित्र आत्मा न तो अपनी ओर से कुछ कहेगा, और न करेगा; वह केवल वही कहेगा और करेगा जो प्रभु परमेश्वर द्वारा निर्धारित किया हुआ है। पवित्र आत्मासत्य का आत्माहै; इसलिए ऐसी प्रत्येक बात, ऐसा प्रत्येक व्यवहार, ऐसी प्रत्येक प्रार्थना या निवेदन जो परमेश्वर के वचन के अनुसार, उसके अनुरूप नहीं है, उससेसत्य के आत्माअर्थात परमेश्वर पवित्र आत्मा का कोई संबंध, कोई लेना-देना नहीं है। जो कुछ भी वचन के बाहर का है, वह असत्य है, परमेश्वर की ओर से नहीं है, और पवित्र आत्मा उसमें किसी के भी साथ कदापि नहीं होगा, लेश-मात्र भी नहीं। इसलिए अपने मसीही जीवन और अपनी मसीही सेवकाई को वचन के अनुसार और अनुरूप बनाइए; परमेश्वर द्वारा आपके लिए निर्धारित सेवकाई को पूरा करने के प्रयास में रहिए, तब ही परमेश्वर पवित्र आत्मा की सामर्थ्य और कार्य आपके जीवन को, तथा आप में होकर अन्य लोगों को, मण्डली को लाभान्वित करेंगे, उन्नत करेंगे। 

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी। 

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • होशे 12-14    
  • प्रकाशितवाक्य 4

रविवार, 12 दिसंबर 2021

मसीही सेवकाई और पवित्र आत्मा के वरदान - 10

 आत्मिक वरदान - उनके प्रकार तथा उनका विश्लेषण (2)


पिछले लेख में हमने 1 कुरिन्थियों 12:7-11 में दिए गए आत्मिक वरदानों को देखना आरंभ किया था। यहाँ दिए गए 9 विभिन्न वरदानों:बुद्धि का बातें”; “ज्ञान की बातें”; “विश्वास”; “चंगा करने का वरदान”; “सामर्थ्य के काम करने की शक्ति”; “भविष्यवाणी करने की शक्ति”; “आत्माओं की परख”; “अनेक प्रकार की भाषा”; “भाषाओं का अर्थ बतानामें से हमने पहले पाँच के बारे में देखा था। साथ ही हमने यह भी देखा था कि पवित्र आत्मा के सभी वरदान किसी के निज प्रयोग अथवा लाभ के लिए नहीं हैं, वरन, सभी के लिए और मसीही विश्वासियों की मण्डली की उन्नति और लाभ के लिए हैं। जिसे भी उसकी सेवकाई के लिए जो भी वरदान परमेश्वर पवित्र आत्मा ने प्रदान किया है, उसे वह वरदान पवित्र आत्मा की अगुवाई में, सभी मसीही विश्वासियों के लाभ के लिए प्रयोग करना है, अपने लिए नहीं। आज हम शेष चार वरदानों के बारे में कुछ विवरण देखेंगे:

  • भविष्यवाणी करने की शक्ति: मूल यूनानी भाषा के जिस शब्द का अनुवादभविष्यवाणी किया गया है, उसका शब्दार्थ न केवल भविष्य की बातें बताना होता है, वरन प्रेरित होकर औरों के सामने बोलना या बताना भी होता है। 1 कुरिन्थियों 14:3 में इसी शब्द को “”... मनुष्यों से उन्नति, और उपदेश, और शान्ति की बातेंकहने के लिए भी प्रयोग किया गया है, और लूका 22:64 में, जब पकड़वाए जाने के बाद सैनिकों द्वारा प्रभु का उपहास किया जा रहा था, तबबूझनेयापता लगाकर बतानेके लिए भी हुआ है। इसी प्रकार से इस शब्द को विभिन्न स्थानों में उसके भिन्न अर्थों के साथ उपयोग किया गया है। पवित्र आत्मा न केवल कुछ लोगों को भविष्य की बातें बताने की सामर्थ्य देता है (प्रेरितों 21:9-11), वरन कुछ लोगों को परमेश्वर की बातें औरों के सामने बोलने की भी सामर्थ्य देता है (1 कुरिन्थियों 11:4,5; 13:9; 14:3-5, 24, 31, 39; प्रकाशितवाक्य 11:3) 
  • आत्माओं की परख: पहली कलीसिया की स्थापना, और प्रभु के शिष्यों द्वारा सुसमाचार प्रचार के आरंभ होने के साथ ही शैतान की ओर से झूठे प्रचारक (1 यूहन्ना 2:18; 4:1), प्रभु यीशु के नाम से प्रचार को कमाई का साधन बना कर प्रयोग करने वाले (रोमियों 16:18; फिलिप्पियों 3:18, 19), और गलत शिक्षाओं के देने वाले (2 कुरिन्थियों 4:2; 2 पतरस 2:1; 2 यूहन्ना 1:7) भी मण्डलियों और लोगों में फैलने लगे थे, अपने कार्य के द्वारा लोगों को बहकाने लगे थे। उस समय में, जब आज के समान लिखित वचन लोगों के हाथ में नहीं था, अधिकांशतः मसीही जीवन की शिक्षाएं, सुसमाचार प्रचार, और प्रभु की बातों का प्रसार, मौखिक प्रचार और संबोधनों के द्वारा होता था। ऐसे में, इन शैतान के लोगों के झूठ और गलत शिक्षाओं को तुरंत ही परखने और प्रकट करने के लिए, वचन को जानने, जाँचने, और सच को उजागर करने की शक्ति पवित्र आत्मा लोगों को देता था, जिससे वे झूठ को प्रकट कर के लोगों को गलत शिक्षाओं से बचा सकें (1 कुरिन्थियों 14:29)। यह कार्य आज भी पवित्र आत्मा की सामर्थ्य से कुछ लोग विभिन्न माध्यमों के द्वारा करते रहते हैं, अन्यथा गलत शिक्षाओं की भरमार में मसीही विश्वासियों के लिए सत्य की पहचान करना बहुत कठिन हो जाएगा।   
  • अनेक प्रकार की भाषा: प्रेरितों 2:4-11 से यह प्रकट है कि जिनअन्य भाषाओंका उल्लेख किया गया है वे पृथ्वी की ही, और विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों के लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषाएं थीं, न कि अलौकिक या पृथ्वी के बाहर की भाषाएं, जैसा पवित्र आत्मा के नाम से गलत शिक्षाएं देने वाले दावा करते हैं। यह बात 1 कुरिन्थियों 14 अध्याय के अध्ययन से और अधिक स्पष्ट एवं दृढ़ हो जाती है। उस समय प्रभु के शिष्यों और प्रेरितों को तुरंत ही संसार भर में जाकर सुसमाचार बताने की आवश्यकता थी; किन्तु प्रभु के अनुयायी सभी इस्राएल से थे, यहूदी भाषा बोलने वाले थे, और अधिकांशतः तो बहुत कम शिक्षा पाए हुए या अनपढ़ भी थे। इस बात का सुसमाचार प्रचार में बाधा बनने के समाधान के लिए पवित्र आत्मा ने उन शिष्यों को अनेकों प्रकार की भाषाएं बोलने का वरदान भी दे दिया, जिससे वे उस भाषा के अनुसार अलग-अलग इलाकों में जाकर प्रचार कर सकें। यह उस समय की तात्कालिक आवश्यकता थी, जिसका समाधान परमेश्वर पवित्र आत्मा ने प्रदान किया, और यह 1 कुरिन्थियों 14 अध्याय में और स्पष्ट भी हो जाता है। साथ ही पवित्र आत्मा ने यह भी लिखवा दिया कि यह वरदान स्थाई नहीं है, वरन एक समय पर समाप्त हो जाएगा क्योंकि तब इसकी आवश्यकता नहीं रहेगी (1 कुरिन्थियों 13:8), हर स्थान पर हर भाषा में सुसमाचार देने वाले लोग खड़े हो जाएंगे। किन्तु इस वरदान की गलत समझ, व्याख्या, और शिक्षाओं के द्वारा पवित्र आत्मा के नाम से गलत शिक्षाएं देने वालों ने बहुतेरों को बहका रखा है, भ्रम में डाल रखा है। 

इसीलिए अन्य भाषा बोलने का वरदान भी सभी की भलाई, सभी की उपयोगिता, और मण्डली की उन्नति के लिए है; किसी के द्वारा व्यक्तिगत प्रयोग या अपने आप को विशेष सामर्थ्य पाया हुआ दिखाने के लिए नहीं। इस वरदान को व्यक्तिगत उपयोग के लिए बताना या प्रयोग करना, वचन के अनुसार नहीं है, इस वरदान तथा परमेश्वर के वचन का दुरुपयोग है।  

  • भाषाओं का अर्थ बताना: जिस प्रकार संसार के सभी स्थानों में जाकर वहाँ की भाषा में सुसमाचार प्रचार करने वालों की आवश्यकता थी, उसी प्रकार से मण्डलियों में ऐसे लोगों की भी आवश्यकता थी जो दु-भाषिये का कार्य कर सकें। अर्थात यदि कोई भिन्न भाषा बोलने वाला प्रचारक किसी मण्डली में आए, तो उसकी बात को स्थानीय भाषा में अनुवाद कर के स्थानीय लोगों को लाभान्वित कर सकें। इसीलिए पवित्र आत्मा ने लिखवाया है कि प्रचारक को किसी नए स्थान पर जाने के बाद पहले यह पता कर लेना चाहिए कि उसकी बात का स्थानीय भाषा में अनुवाद करने वाला कोई है कि नहीं; यदि नहीं है तो फिर उसे शांत रहना चाहिए, नाहक प्रचार नहीं करना चाहिए (1 कुरिन्थियों 14:27-28)

यदि आप मसीही विश्वासी हैं तो आपके लिए यह अनिवार्य है कि वचन की सही समझ और शिक्षा में दृढ़ और स्थापित हों, तथा गलत शिक्षाओं के बहकावे में न आएं; वरन गलत शिक्षाओं को औरों के सामने प्रकट करें और लोगों को उनसे सावधान रहने, बच कर रहने के बारे में समझाएं। इन अंत के दिनों में जिस तेज़ी से चिह्न-चमत्कारों आदि के द्वारा गलत शिक्षाएं फैलाई जा रही हैं, उसका सामना करने, लोगों को झूठी बातों में फँसने और बहकाए जाने से बचाने के लिए सभी मसीही विश्वासियों को वचन की सही समझ रखने और उसका सही उपयोग करना सिखाने की बहुत आवश्यकता है। प्रभु से प्रार्थना कीजि, उससे माँगिए कि वह आपको अपने लिए उपयोग करे कि आप झूठ और गलत शिक्षाओं को प्रकट कर सकें, उन्हें उजागर कर सकें, और लोगों को गलत बातों में फंस कर अनन्त विनाश में जाने से बचा सकें।

 यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी। 

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • होशे 9-11    
  • प्रकाशितवाक्य 3