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मंगलवार, 28 दिसंबर 2021

मसीही सेवकाई और पवित्र आत्मा के वरदान - 26


वरदानों का प्रयोग - रोमियों 12:3 - स्व-आँकलन के साथ 

परमेश्वर पवित्र आत्मा ने पौलुस में होकर रोमियों 12 अध्याय के पहले दो पदों में मसीही सेवकाई के लिए अनिवार्य मसीही विश्वासी की सही मानसिकता के बारे में लिखवाया।  इन दोनों पदों से हमने देखा था कि मसीही सेवकाई के लिए मसीही विश्वासी को परमेश्वर के प्रति पूर्णतः समर्पित, और आज्ञाकारी होना चाहिए, साथ ही पापों की क्षमा और उद्धार के द्वारा उसके जीवन में आए भीतरी परिवर्तन को व्यावहारिक जीवन में भी प्रकट होना चाहिए। यह व्यावहारिक परिवर्तन ही उसके जीवन में उद्धार और पवित्र आत्मा के कार्य को प्रमाणित करता है; परमेश्वर के वचन बाइबल में इसका और कोई प्रमाण नहीं दिया गया है। सही मानसिकता और वास्तविक समर्पण तथा पूर्ण आज्ञाकारिता के बाद, पवित्र आत्मा की अगुवाई में पौलुस मसीही विश्वासी के लिए अनिवार्य एक और बात के लिए कहता है - स्वयं का आँकलन करना। 

पौलुस यह स्पष्ट कर देता है कि यह बात कहने का अधिकार उसे उसकी सेवकाई की नियुक्ति के द्वारा, परमेश्वर से मिला है। वह कहता है, “क्योंकि मैं उस अनुग्रह के कारण जो मुझ को मिला है, तुम में से हर एक से कहता हूं...”; और 1 कुरिन्थियों 15:9-10 में वह इसअनुग्रहके विषय बताता है कि यह उसका परमेश्वर द्वारा प्रेरित नियुक्त करके सुसमाचार की सेवकाई के लिए ठहराया जाना है, जिसकी पुष्टि फिर वह रोमियों 1:1 और अपनी सभी पत्रियों के आरंभ में करता है। अर्थात, परमेश्वर के द्वारा उसे सौंपे गए दायित्व के निर्वाह के लिए वह मसीही विश्वासियों को मसीही विश्वास और जीवन से संबंधित उन शिक्षाओं से अवगत करवाता था, जो परमेश्वर उसे औरों के लिए बताता था। यह मसीही सेवकाई के लिए एक बहुत महत्वपूर्ण शिक्षा है, जिसका निर्वाह करना बहुत से लोगों को कठिन लगता है। आज प्रचारकों और उपदेशकों को लोगों की प्रशंसा करने, उन से लुभावनी बातें कहने में कोई संकोच नहीं होता है; किन्तु खरी और सही शिक्षा देने में उन्हें संकोच होता है कि कहीं लोगों को बुरा न लग जाए (जो अन्त के दिनों का एक चिह्न है - 2 तिमुथियुस 4:1-5) - चाहे उनके सच्चाई न बताने के कारण परमेश्वर को बुरा लगता रहे। हर मसीही सेवक को गलातियों 1:10 “यदि मैं अब तक मनुष्यों को ही प्रसन्न करता रहता, तो मसीह का दास न होताहमेशा स्मरण रखना चाहिए, और उसके अनुसार अपनी सेवकाई का निर्वाह करना चाहिए।

रोमियों 12:3 में कही गई अगली बात है कि यह शिक्षाहर एकके लिए है। यह केवल उनके लिए नहीं है जो प्रचार करने या शिक्षा देने, अथवा मण्डली की देख-भाल और संचालन के कार्य में लगे हैं। मसीही सेवकाई से संबंधित ये शिक्षाएं मण्डली के हर एक सदस्य, प्रत्येक मसीही विश्वासी के लिए हैं, क्योंकि परमेश्वर ने सभी के लिए कुछ भले कार्य निर्धारित किए हैं (इफिसियों 2:10), और परमेश्वर पवित्र आत्मा ने सभी की भलाई के लिए मण्डली के सभी सदस्यों को उनकी सेवकाई के अनुसार वरदान दे दिए हैं (1 कुरिन्थियों 12:7, 11)। इसलिए इस सेवकाई को सुचारु रीति से करना और वरदानों का सदुपयोग करना भी सभी मसीही विश्वासियों को आना चाहिए। इस कार्य के लिए, पद 1 और 2 के समर्पण, आज्ञाकारिता, और व्यावहारिक जीवन में प्रकट होने वाले भीतरी परिवर्तन के बाद, अगला कदम है अपने विषय सही आँकलन करना और सही दृष्टिकोण रखना। 

एक स्वाभाविक मानवीय प्रवृत्ति है कि जब किसी को कोई विशेष ज़िम्मेदारी दी जाती है, तो उसमें इस बात को लेकर विशिष्ट होने का विचार भी आ जाता है, जिसे फिर शैतान उकसा कर अपने आप को औरों से उच्च समझने की मानसिकता और घमण्ड में परिवर्तित करके उस व्यक्ति को पाप में फंसा देता है, परमेश्वर की सेवकाई के लिए उसे अप्रभावी बना देता है। शैतान की इस युक्ति में फँसने से बचने के लिए प्रत्येक मसीही विश्वासी को पौलुस के समानपरन्तु मैं जो कुछ भी हूं, परमेश्वर के अनुग्रह से हूं: और उसका अनुग्रह जो मुझ पर हुआ, वह व्यर्थ नहीं हुआ परन्तु मैं ने उन सब से बढ़कर परिश्रम भी किया: तौभी यह मेरी ओर से नहीं हुआ परन्तु परमेश्वर के अनुग्रह से जो मुझ पर था” (1 कुरिन्थियों 15:10) की मानसिकता के साथ कार्य करना चाहिए। अर्थात, अपने मसीही विश्वासी होने को, या अपने प्रभु के लिए किसी रीति से और किसी कार्य के उपयोगी होने को, अपनी किसी योग्यता अथवा गुण के कारण न समझे, वरन, केवल और केवल परमेश्वर के अनुग्रह में उसे दी गई ऐसी ज़िम्मेदारी, जिसे उसे परमेश्वर की इच्छा के अनुसार, उसी के दिए वरदान के द्वारा निभाना है, समझे।

पौलुस इस बात को और स्पष्ट करते हुए कहता है कि जैसा और जितना परमेश्वर ने बनाया और दिया है, उस से बढ़कर कोई अपने आप को न समझे। इसके लिए प्रत्येक मसीही विश्वासी कोसुबुद्धिके साथ अपने आप को जाँचने, अपना आँकलन करने वाला होना चाहिए। औरों को जाँचना, उनकी आलोचना करना, उनके स्तर को समझना और पहचानना तथा लोगों के सामने औरों के बारे में अपने आँकलन का बयान करना तो बहुत सहज होता है। किन्तु इसी माप-दण्ड को अपने ऊपर लागू करके, इसी के अनुसार अपना सही आँकलन करना बहुत कठिन होता है। और इससे भी कठिन होता है खराई से यह स्व-आँकलन करने के पश्चात, परमेश्वर के समक्ष उसका अंगीकार करके, अपने आप को उसके अनुसार सुधारना, या सुधारे जाने के लिए अपने आप को परमेश्वर के हाथों में सौंप देना। परमेश्वर का वचन हमें दोनों ही बातों की शिक्षा और उदाहरण प्रदान करता है। पवित्र आत्मा की अगुवाई में पौलुस 1 कुरिन्थियों 11:27-32 में बलपूर्वक यह निर्देश देता है कि प्रत्येक मसीही विश्वासी को, प्रभु की मेज़ में भाग लेने से पहले, अपने आप को जाँच लेना चाहिए। जो ऐसा करता है, वह फिर परमेश्वर से दण्ड पाने से बच जाता है, वरन उसकी आशीषों का संभागी हो जाता है। इसी प्रकार से स्व-आँकलन का एक लिखित प्रमाण दाऊद द्वारा लिखा गया भजन 51 है, जो उसने बतशेबा तथा उसके पति ऊरिय्याह के साथ किए गए पाप के लिए नातान द्वारा उसे बताए जाने के बाद लिखा था। इस भजन में दाऊद न केवल अपने पाप का अंगीकार कर रहा है, वरन अपने आप को शुद्धि के लिए परमेश्वर के हाथों में भी छोड़ दे रहा है।  खराई से अपने स्व-आँकलन करने, पाप मान लेने, और अपने आप को परमेश्वर के हाथों में छोड़ देने की इसी प्रवृत्ति के कारण दाऊद को बाइबल मेंपरमेश्वर के मन के अनुसार” (प्रेरितों 13:22) व्यक्ति कहा गया है।

यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं, तो यह स्व-आँकलन करने की व्यावहारिक मानसिकता आप के लिए भी अनिवार्य है। परमेश्वर किसी में विद्यमान किसी भी घमण्ड के साथ कार्य नहीं कर सकता है। आप परमेश्वर के लिए तब ही उपयोगी होंगे, आप परमेश्वर से तब ही आशीषें प्राप्त करेंगे, जब आप अपने अंदर झांक कर, अपने मन की वास्तविक स्थिति को परमेश्वर के सामने मान लेने वाले और उसके सुधार के लिए उसके हाथों में अपने आप को छोड़ देने वाले बनेंगे। वह आपकी वास्तविकता आप से पहले, आप से अधिक गहराई से, और आप से बेहतर जानता है (1 इतिहास 28:9)। किन्तु वह चाहता है कि आप भी अपनी वास्तविकता को जानें और मानें, जिससे वह आपको अपनी सामर्थ्य से परिपूर्ण करके अपने लिए उपयोगी, अपनी मण्डली के लिए उन्नति का कारण, स्वयं आपके लिए आशीषें अर्जित करने वाला बना सके।

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी। 

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • ज़कर्याह 5-8     
  • प्रकाशितवाक्य 19 

सोमवार, 27 दिसंबर 2021

मसीही सेवकाई और पवित्र आत्मा के वरदान - 25


वरदानों का प्रयोग - रोमियों 12   

पिछले लेखों में हमने 1 कुरिन्थियों 12 अध्याय से देखा है कि मसीही विश्वासियों को, परमेश्वर द्वारा उनकी निर्धारित सेवकाई को सुचारु रीति से करने के लिए परमेश्वर पवित्र आत्मा विभिन्न आत्मिक वरदान देता है। सभी को एक ही वरदान नहीं दिया जाता है, और न ही किसी एक को सभी वरदान दिए जाते हैं। प्रत्येक को उनकी सेवकाई के अनुसार, तथा सभी की भलाई एवं मण्डली की उन्नति के लिए वरदान दिया जाता है। किस को क्या वरदान दिया जाना है यह निर्णय परमेश्वर पवित्र आत्मा का है; इसमें किसी मनुष्य का किसी भी प्रकार का कोई भी हस्तक्षेप नहीं है। सभी सेवकाई और वरदान परमेश्वर की दृष्टि में समान महत्व के हैं, किसी के भी औरों की तुलना में बड़े-छोटे होने की, या कम अथवा अधिक महत्व का होने की कोई बात नहीं है। किन्तु मसीही मण्डलियों या कलीसिया के कार्यों में, कौन सी सेवकाई एवं वरदान अधिकांशतः प्रयोग किए जाते हैं, और किन के प्रयोग की आवश्यकता, तुलनात्मक रीति से, अन्य से कम होती है, उसके अनुसार 1 कुरिन्थियों 12:28 में एक क्रम दिया गया है, जिसमें सबसे पहले वचन की सेवकाइयों से संबंधित सेवकाइयों और वरदानों को लिखा गया है, और सबसे अंत में अन्य भाषाओं से संबंधित सेवकाई एवं वरदानों को लिखा गया है। साथ ही फिर 31 पद में प्रोत्साहित किया गया है कि मण्डली के लोगों को मण्डली में अधिक से अधिक उपयोगी होने की ‘धुन’ में रहना चाहिए; यद्यपि इस पद का दुरुपयोग यह दिखाने के लिए किया जाता है कि विश्वासी अपनी इच्छा के अनुसार अपने लिए वरदान माँग सकते हैं - जो इस पद की अनुचित व्याख्या और गलत प्रयोग है।

बाइबल में 1 कुरिन्थियों 12 अध्याय के अतिरिक्त भी आत्मिक वरदानों के बारे में लिखा गया है। ऐसा ही एक वचन-भाग है रोमियों 12 अध्याय; इस अध्याय में भी परमेश्वर पवित्र आत्मा ने पौलुस के द्वारा आत्मिक वरदानों के बारे में कुछ भिन्न दृष्टिकोण से लिखवाया है। रोमियों के इस अध्याय में 1 कुरिन्थियों 12 के समान ही, न केवल वरदानों का उल्लेख और मसीही मण्डली को एक देह के समान दिखाकर सभी सदस्यों को साथ मिलकर कार्य करने और अपने वरदानों का प्रयोग करने का आह्वान है, वरन उनके प्रयोग के विषय कुछ अनिवार्य आत्मिक बातें और दृष्टिकोण भी बताए गए हैं। मानव देह को रूपक के समान प्रयोग करने और आत्मिक वरदानों के प्रयोग पर आने से पहले, पवित्र आत्मा ने इस अध्याय के आरंभिक पदों में इन दोनों बातों के सही निर्वाह के लिए एक आत्मिक दृष्टिकोण अपनाने और बनाए रखने की बात की है। स्वाभाविक है कि शारीरिक एवं सांसारिक विचारों तथा दृष्टिकोण को रखते हुए आत्मिक सेवकाई कर पाना संभव नहीं है। यदि परमेश्वर को प्रसन्न करना है, उससे आशीषें प्राप्त करनी हैं, तो शारीरिक एवं सांसारिक प्रवृत्ति से उठकर आत्मिक और परमेश्वर के अनुसार स्थिति में आना और रहना पड़ेगा। तब ही हम परमेश्वर की बात को समझने और निभाने पाएंगे, जिससे हमारे कार्य उसे स्वीकार्य हों, और वह उन कार्यों से प्रसन्न हो। इसीलिए पौलुस में होकर पवित्र आत्मा द्वारा इस अध्याय का आरंभ, इस आह्वान के साथ होता है:इसलिये हे भाइयों, मैं तुम से परमेश्वर की दया स्मरण दिला कर बिनती करता हूं, कि अपने शरीरों को जीवित, और पवित्र, और परमेश्वर को भावता हुआ बलिदान कर के चढ़ाओ: यही तुम्हारी आत्मिक सेवा है। और इस संसार के सदृश न बनो; परन्तु तुम्हारी बुद्धि के नये हो जाने से तुम्हारा चाल-चलन भी बदलता जाए, जिस से तुम परमेश्वर की भली, और भावती, और सिद्ध इच्छा अनुभव से मालूम करते रहो” (रोमियों 12:1-2) 

इन दो पदों में ध्यान देने वाली कुछ बातें हैं:

  • पद 1 का आरंभ मसीही विश्वासी को उसके प्रति परमेश्वर की दया का स्मरण दिलाने के साथ होता है। इसे बेहतर समझने के लिए इसे इसके संदर्भ में, इससे पहले के पदों के साथ देखिए। अध्याय 11, विशेषकर उसके अंत में, प्रभु परमेश्वर की महानता तथा सार्वभौमिकता का वर्णन, और उसकी महिमा का उल्लेख किया गया है। परमेश्वर की इस हस्ती, उसके सर्वोच्च, सर्वसामर्थी, एवं सर्वज्ञानी होने, के सामने जब मनुष्य अपनी हस्ती, अपनी पापमय और परमेश्वर के लिए अस्वीकार्य स्थिति का ध्यान करता है, तो उसे बोध होता है कि उसमें ऐसा कुछ भी नहीं है कि परमेश्वर उसका ध्यान करे, उससे संपर्क या व्यवहार रखे। किन्तु फिर भी परमेश्वर संसार के सभी मनुष्यों से प्रेम करता है, उन्हें अपने साथ जोड़ना चाहता है, उन्हें अपनी संतान होने का आदर देना चाहता है (यूहन्ना 1:12-13)। इसीलिए इस अध्याय और पद का आरंभिक वाक्यांश है, “इसलिये हे भाइयों, मैं तुम से परमेश्वर की दया स्मरण दिला कर बिनती करता हूं...। तात्पर्य यह कि आत्मिक सेवकाई और आत्मिक वरदानों के सही प्रयोग के लिए मनुष्य को अपनी किसी योग्यता अथवा शारीरिक सामर्थ्य अथवा गुण के आधार पर नहीं वरन अपनी अयोग्यता, अपनी वास्तविकता के बोध के साथ, परमेश्वर के प्रति दीन, नम्र, नतमस्तक, आज्ञाकारी, और पूर्णतः समर्पित होकर; हर बात में परमेश्वर से मिलने वाली उसकी दया, उसके अनुग्रह का ध्यान रखते और मानते हुए, कार्य करना चाहिए। 
  • फिर पद के दूसरे भाग में पवित्र आत्मा मसीही सेवक को अपने आप को परमेश्वर को स्वीकार्य बलिदान के समान अर्पित करने को कहता है, और इस ही उसकीआत्मिक सेवाकहता है। यहाँ पुराने नियम से परमेश्वर की आराधना और उपासना करने, उससे क्षमा प्राप्त करने और उसे स्वीकार्य होने के विधि - परमेश्वर को निर्धारित बलिदान चढ़ाने की बात को समक्ष लाया गया है। परमेश्वर द्वारा दी गई व्यवस्था में हर एक बलिदान का एक स्वरूप, एक विधि होती थी; और बलिदान कोई भी हो, किसी भी उद्देश्य से क्यों न चढ़ाया जाए,, उसे उस विधि के अनुसार चढ़ाना होता था। सभी बलिदानों के साथ एक बात सामान्य थी - जो वेदी पर परमेश्वर के सामने चढ़ा दिया गया, वह फिर लौट कर उस बलिदान चढ़ाने वाले मनुष्य के हाथ में वापस नहीं आता था! या तो वह चढ़ाया गया बलिदान जल कर राख हो जाता था, या फिर याजकों के उपयोग के लिए दे दिया जाता था। इसी प्रकार से जो जीवन परमेश्वर को अर्पित कर दिया गया है, उसे वापस लेकर फिर से संसार के साथ नहीं जोड़ा जा सकता है, सांसारिकता की बातों के लिए प्रयोग नहीं किया जा सकता है। यदि उसे वापस लिया जा रहा है, शारीरिक लालसाओं और सांसारिक बातों के लिए प्रयोग किया जा रहा है, तो इसका अर्थ है कि वह जीवन वास्तव में सही रीति से बलिदाननहीं किया गया है - पूर्णतः परमेश्वर को समर्पित नहीं किया गया है। इसलिए वह परमेश्वर के लिए उपयोगी और उसकी महिमा का कारण भी नहीं होगा। साथ ही यह संसार और शरीर के भी, तथा आत्मा के साथ भी निभाने की प्रवृत्ति उस व्यक्ति कीआत्मिक सेवाभी नहीं मानी जाएगी। 
  • फिर 2 पद मसीही सेवक के लिए कहता है कि उसके अंदर आया परिवर्तन, मसीही विश्वास में आने से उसकी बुद्धि के नए हो जाने का प्रमाण, उसके बदले हुए जीवन में, उसके परिवर्तित चाल-चलन के द्वारा दिखाई देना चाहिए। उसके अंदर हुए परिवर्तन का यही बाहरी प्रमाण है; इसके अतिरिक्त व्यक्ति के आत्मिक या परमेश्वर का जन हो जाने, उसके अंदर परमेश्वर पवित्र आत्मा के बस जाने का और कोई प्रमाण बाइबल में नहीं दिया गया है - मन का परिवर्तन, व्यवहार और जीवन के परिवर्तन से दिखाई देता है।
  • जिनके अन्दर यह परिवर्तन दिखाई देने लगता है, वे फिर परमेश्वर की इच्छा को जानने वाले भी बन जाते हैं; यह एक निरंतर होती रहने वाली, और भी उन्नत होती रहने वाली प्रक्रिया है। जैसे-जैसेबुद्धि के नये हो जाने से तुम्हारा चाल-चलन भी बदलता जाएवैसे-वैसे व्यक्ति परमेश्वर की इच्छा को और अधिक जानता चला जाता है; और यह उसके परमेश्वर के साथ होते चले जाने वाले अनुभवों में होकर होता है। 

       यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं, परमेश्वर के लिए उपयोगी होना चाहते हैं, तो उसको समर्पित और उसकी आज्ञाकारिता का जीवन भी जीना सीखिए। धार्मिक रीति-रिवाजों, कार्यों, और परंपराओं के निर्वाह से कोई परमेश्वर को प्रसन्न नहीं कर सका है (प्रेरितों 15:10; 1 पतरस 1:18-19)। परमेश्वर ने आपको उद्धार देने के साथ ही आपके लिए कुछ भले कार्य निर्धारित कर रखे हैं (इफिसियों 2:10); आपकी सहायता तथा मार्गदर्शन के लिए अपना पवित्र आत्मा आप में बसा दिया है, जो सर्वदा आपके साथ रहता है; अपना जीवता वचन आपके हाथों में दे दिया है; और आपको अपने परिवार का, अपनी कलीसिया का एक अंग बना लिया है। अब आपको परमेश्वर द्वारा दिए गए इन संसाधनों एवं प्रयोजनों के उचित प्रयोग के द्वारा, रोमियों 12:1-2 का पालन करना है, जिससे आप तथा आपके कार्य उसे स्वीकार्य हो सकें, और आप उसकी आशीषों के संभागी हो सकें। परमेश्वर की आज्ञाकारिता के अतिरिक्त, उसे प्रसन्न करने, उसे आशीषें पाने का कोई अन्य मार्ग नहीं है (1 शमूएल 15:22) 

       यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी। 

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • ज़कर्याह 1-4     
  • प्रकाशितवाक्य 18

रविवार, 26 दिसंबर 2021

मसीही सेवकाई और पवित्र आत्मा के वरदान - 24


निष्कर्ष - 1 कुरिन्थियों 12:28-31  

 हम पिछले लेखों में 1 कुरिन्थियों 12:28 में सूचीबद्ध किए गए कुछ आत्मिक वरदानों के बारे में देखते आ रहे हैं। यह पद हमें बताता है किपरमेश्वर ने कलीसिया में अलग अलग व्यक्ति नियुक्त किए हैं...", और फिर उन व्यक्तियों को दिए गए वरदानों की सूची दी गई है। इस आरंभिक वाक्यांश में कुछ बातें ध्यान से देखने और विचार करने योग्य हैं:

  • आत्मिक वरदान जैसा कि पहले 1 कुरिन्थियों 12:11 में बताया गया है, परमेश्वर द्वारा दिए जाते हैं। इफिसियों 2:10 में लिखा है कि परमेश्वर ने अपने प्रत्येक विश्वासी के लिए पहले से ही कुछ-न-कुछ भले कार्य निर्धारित कर रखे हैं। परमेश्वर के लोगों के द्वारा उन भले कार्यों को सुचारु रीति से करने के लिए, उन कार्यों में उनकी सहायता के लिए, परमेश्वर पवित्र आत्मा उन्हें परमेश्वर द्वारा निर्धारित उनकी सेवकाई के अनुसार कुछ आत्मिक वरदान बाँट देता है। ये वरदान व्यक्ति की इच्छा के अनुसार नहीं, वरन, परमेश्वर द्वारा किए गए निर्धारण के अनुसार हैं; केवल वही इनके विषय निर्णय करता है। 
  • इन आत्मिक वरदानों का प्रयोगकलीसियाके लिए है, जैसा कि पहले 1 कुरिन्थियों 12:7 में भी बताया गया है। परमेश्वर पवित्र आत्मा की ओर से दिया गया कोई भी वरदान किसी व्यक्ति के अपने व्यक्तिगत प्रयोग के लिए, अथवा लोगों में अपने आप को विशिष्ट, अथवा उच्च या महत्वपूर्ण दिखाने के लिए, प्रदर्शन करने के लिए नहीं है। सभी वरदान कलीसिया यानि कि मसीही विश्वासियों की मण्डली की भलाई के लिए उपयोग करने के लिए दिए गए हैं। कोई भी व्यक्ति यह दावा नहीं कर सकता है कि उसने कुछ विशेष, अथवा औरों से उत्तम पाया है। सभी वरदान परमेश्वर की ओर से हैं, समान महत्व के हैं, बड़े या छोटे नहीं हैं; और न ही कोई मसीही विश्वासी परमेश्वर की दृष्टि में कम अथवा अधिक महत्वपूर्ण है - जिसके अनुसार वह उन्हें कोई वरदान दे। सभी विश्वासी परमेश्वर के लिए समान हैं, वह सभी से समान प्रेम करता है। सभी पापों के लिए पश्चाताप करने और प्रभु यीशु से पापों की क्षमा माँगकर उसे समर्पण करने के द्वारा मसीही बने हैं, अपनी किसी भी योग्यता अथवा गुण या विशेषता के कारण नहीं। 
  • अलग-अलग आत्मिक वरदानों के प्रयोग के लिए परमेश्वर ने अलग-अलग व्यक्ति नियुक्त किए हैं। अर्थात, न तो एक ही व्यक्ति को सभी वरदान दिए गए हैं; और न ही सभी व्यक्तियों को एक ही वरदान दिया गया है। जिसकी जैसी सेवकाई परमेश्वर ने निर्धारित की, उसी के अनुसार उसे वरदान भी दे दिए गए। पद 28 के इस आरंभिक वाक्यांश में स्पष्ट लिखा हैनियुक्त किए हैं”; अभिप्राय यह कि किसी भी व्यक्ति ने कोई भी सेवकाई अथवा कोई भी वरदान किसी रीति से अपने लिए चुने अथवा कमाए नहीं है। जिसे जो भी दिया गया, वह परमेश्वर की ओर से, परमेश्वर की योजना के अनुसार दिया गया है। उस व्यक्ति की आशीष उसे दी गए सेवकाई को, उसे दिए गए वरदान की सहायता से भली-भांति करने से, उनके द्वारा परमेश्वर की आज्ञाकारिता एवं महिमा करने से है; न कि औरों की सेवकाई और वरदानों के लिए लालसा और माँग करने से।

इस आरंभिक वाक्यांश के बाद दी गई सूची, कलीसिया में वरदानों के उपयोग किए जाने के अनुसार है, अर्थात जो वरदान अधिक उपयोग किए जाते हैं, उन्हें पहले बताया गया है और जो कम उपयोग होते हैं, उन्हें बाद में बताया गया है। किन्तु अपने-अपने स्थान और प्रयोग के समय के अनुसार प्रत्येक वरदान अन्य के बराबर ही महत्वपूर्ण है। सबसे कम प्रयोग किए जाने वाले अन्य भाषा बोलने वाले वरदान को सबसे बाद में रखा गया है, और वचन से संबंधित सेवकाई के वरदानों को पहले तीन स्थानों पर रखा गया है। किन्तु जब कोई विदेशी प्रचारक आए, जिसके अनुवाद के लिए उसकी भाषा बोलने वाले सेवक की आवश्यकता हो, तो जिसके पास यह अन्य भाषा से संबंधित वरदान है, उसकी उपयोगिता और महत्व पहले तीनों वरदानों के समान है प्रकट हो जाता है। इसीलिए, सेवकाई और संबंधित वरदान कम अथवा अधिक महत्व के नहीं हैं, किन्तु उन्हें कलीसिया के कार्यों में सामान्यतः कितना अधिक अथवा कम प्रयोग करने की आवश्यकता पड़ती है, उसी के अनुसार वरदानों को यहाँ सूचीबद्ध किया गया है।

अलग-अलग व्यक्तियों को अलग-अलग वरदान दिए जाने को फिर पद 29 से पद 31 के आरंभ  में कुछ आलंकारिक प्रश्नों (rhetorical questions) के द्वारा दोहराया और समझाया गया है कि न तो सभी को एक ही वरदान दिया गया है, और न ही किसी एक को सभी वरदान दिए गए हैं। [आलंकारिक प्रश्न (rhetorical question) वे प्रश्न होते हैं, जिनकेहाँ’, अथवामें उत्तर, प्रश्न और उसके संदर्भ में पहले से ही निहित होते हैं, और पाठक या श्रोता को उस प्रश्न का कोई उत्तर स्वयं नहीं देना होता है, वरन वे उस प्रश्न के संदर्भ से उस पूर्व-निहित एवं निर्धारित उत्तर को समझ जाते हैं।]। मूल यूनानी भाषा में इन प्रश्नों को नकारात्मक भाव के साथ लिखा गया है, अर्थात, इन सभी प्रश्नों का उत्तरनहींही है। इस आलंकारिक भाषा के प्रयोग के द्वारा पवित्र आत्मा ने पौलुस में होकर यह स्थापित किया है कि सभी को एक ही वरदान नहीं दिया गया है, अलग-अलग विश्वासियों को अलग-अलग वरदान दिए गए हैं। इसलिए परमेश्वर पवित्र आत्मा के संबंध में गलत शिक्षाओं के सिखाने और फैलाने वालों के लिए यह ध्यान देने, और समझने तथा वचन से सीखकर पालन करने की बात है कि वे सभी को एक ही वरदान - अन्य भाषा बोलना, मांगने या प्राप्त करने की शिक्षा देकर, और वह भी बहुत बलपूर्वक और दृढ़ता के साथ, वचन की अनदेखी कर रहे हैं, वचन के विपरीत बात सिखा रहे हैं, लोगों को झूठी बातों से बहका और भरमा रहे हैं। और परमेश्वर पवित्र आत्मा, जो सत्य का आत्मा (यूहन्ना 14:17) है, वह वचन के विरुद्ध न तो कभी सिखाएगा, और न ही कभी करेगा। साथ ही, वचन में जिनअन्य-भाषाओंकी बात की गई है वे पृथ्वी के ही किसी अन्य क्षेत्र अथवा स्थान की भाषाएं हैं, कोई अलौकिक या पृथ्वी के बाहर की भाषाएं नहीं हैं (प्रेरितों 2:1-11)। साथ ही प्रभु यीशु मसीह ने कहा है कि शैतान ही प्रत्येक झूठ का पिता है, प्रत्येक असत्य उसी की ओर से होता है (यूहन्ना 8:44)। इसलिए उनकी ये, तथा अन्य संबंधित गलत शिक्षाएं, पवित्र आत्मा की ओर से नहीं हैं, वरन शैतान की ओर से किया गया छलावा हैं, जिस में से उन्हें बाहर आ जाना चाहिए।

 और तब पद 31 से, जिसका उपयोग पवित्र आत्मा से संबंधित गलत शिक्षाएं फैलाने वाले मन-चाहे वरदान मांगने और प्राप्त करने की अपनी एक और गलत शिक्षा को सही ठहराने के लिए करते हैं, हम देख चुके हैं कि उनकी यह धारणा सत्य नहीं है। इस पद को उसके संदर्भ में देखने और समझने से यह प्रकट है कि यह प्रत्येक मसीही विश्वासी के मण्डली में अधिक से अधिक उपयोगी होने के अभिप्राय से कहा गया है, आत्मिक वरदान बदलवाने के लिए नहीं। इस पद को अन्य पदों के साथ और उसके संदर्भ में देखने से यह प्रकट हो जाता है कि यहाँ जोबड़े से बड़े वरदानवाक्यांश का प्रयोग किया गया है, उसका अभिप्राय कलीसिया या मण्डली में अधिक से अधिक ज़िम्मेदारी वाले वरदान के लिए है। अर्थात पौलुस में होकर परमेश्वर पवित्र आत्मा मसीही विश्वासियों को यह बता रहा है कि मसीही मण्डली में अधिक से अधिक ज़िम्मेदारी उठाने वाले, यानि कि प्रभु के लिए अधिक से अधिक उपयोग में आने वाले व्यक्ति होने की ‘धुन’ में रहो या लालसा रखो। यदि इसे वरदानों और सेवकाइयों के बड़े-छोटे होने के लिए समझा जाए तो फिर पद 12-27 में दी गई चर्चा व्यर्थ है; फिर तो प्रभु की मण्डली रूपी देह में सभी समान महत्व के नहीं हैं, और पवित्र आत्मा ने बड़े या छोटे आत्मिक वरदान देने के द्वारा भेद-भाव किया है। और यह बात परमेश्वर के स्वरूप और वचन की शिक्षाओं के साथ बिल्कुल मेल नहीं खाती है, इसलिए स्वीकार्य भी नहीं है। साथ ही, यदि यह कहा जाए कि यह पद व्यक्ति द्वारा अपनी इच्छा के अनुसार वरदान माँगने और पाने को सिखा रहा है, तो ध्यान कीजिए कि यह पद केवलधुन में रहनेके लिए कह रहा है। इस पद में कोई आश्वासन नहीं है कि उस व्यक्ति की वहधुनपूरी भी की जाएगी। न ही वचन में कहीं पर ऐसा कोई उदाहरण है कि किसी मसीही विश्वासी के मांगने पर उसकी सेवकाई या वरदान बदल दिए गए। और न ही किसी अन्य स्थान पर ऐसी कोई शिक्षा प्रभु ने अथवा पत्रियों के लेखकों में से किसी ने दी है। इसलिए परमेश्वर पवित्र आत्मा के नाम से ऐसी किसीधुनके पूरा किए जाने की शिक्षा भी असत्य है, परमेश्वर की ओर से नहीं है, और यह सिखाना वचन का दुरुपयोग करना है।

यदि आप मसीही विश्वासी हैं, तो ध्यान कीजिए कि आपके लिए कितना महत्वपूर्ण और अनिवार्य है कि आप परमेश्वर के वचन की हर बात को उसके संदर्भ के साथ, मूल भाषा के शब्दों के अर्थ को समझते हुए, उसकी वास्तविकता में समझें; न कि मन-गढ़न्त धारणाओं और गलत शिक्षाओं, असत्य को बताने और फैलाने वालों की बातों में आकर उनके छलावे में फंस जाएं (2 कुरिन्थियों 2:11)। क्योंकि वचन का दुरुपयोग करके लोगों को बहका कर पाप में फंसाना शैतान की बहुत पुरानी और परखी हुई युक्ति है (2 कुरिन्थियों 11:3, 13-15), जिसे वह अदन की वाटिका से प्रयोग करता आ रहा है (उत्पत्ति 3:1-6); यहाँ तक कि उसने इसे प्रभु यीशु के विरुद्ध भी प्रयोग करने का प्रयास किया था (मत्ती 4:1-11)। यदि आपके साथ भी वह अपनी इस युक्ति में सफल हुआ तो आपको लगेगा कि आप सही मार्ग पर हैं, किन्तु शैतान आपको गलत मार्ग पर लिए चल रहा होगा। और अन्ततः जब आँख खुलेगी, और सही समझ आएगी, तब तक बहुत देर हो चुकी होगी।

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी। 

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • हाग्गै 1-2     
  • प्रकाशितवाक्य 17  

शनिवार, 25 दिसंबर 2021

मसीही सेवकाई और पवित्र आत्मा के वरदान - 23


आत्मिक वरदानों के प्रयोगकर्ता - प्रधान    

       मसीही विश्वासियों की मण्डलियों में विभिन्न कार्यों को करने और दायित्वों के निर्वाह के लिए परमेश्वर पवित्र आत्मा ने मसीही विश्वासियों को विभिन्न वरदान दिए हैं, जिनकी एक सूची 1 कुरिन्थियों 12:28 में दी गई है। इस सूची में दिए गए क्रम और वरीयता के अनुसार हम पिछले लेखों में इन विभिन्न वरदानों को देखते आ रहे हैं। इस सूची के अंतिम वरदान, अन्य भाषाएं बोलने, के बारे में हम आरंभ में देख चुके हैं, क्योंकि इस वरदान को लेकर बहुत सी गलतफहमियाँ और गलत शिक्षाएं ईसाई समाज और मसीही विश्वासियों में व्याप्त हैं, और निरंतर फैलाई जाती हैं। आज, इस सूची के शेष अंतिम वरदान -प्रधानहोने के विषय में हम परमेश्वर के वचन बाइबल से देखेंगे। 

       जिस शब्द का हिन्दी अनुवादप्रधानकिया गया है, उसका मूल यूनानी भाषा में शब्दार्थ किसी जहाज के कप्तान के समाननियंत्रण रखने, संचालन करने, और दिशा देने वालाहोता है। बाइबल के विभिन्न अँग्रेज़ी अनुवादों में इसे विभिन्न शब्दों के द्वारा व्यक्त किया गया है, जिन में सबसे अधिक प्रयोग किया जाने वाला शब्द है Administrations; इसके अतिरिक्त प्रयोग किए गए अँग्रेज़ी शब्द हैं, Managing, Directions, Governings, Guidings, Leadership, Ministrations, आदि। यह एक रोचक किन्तु महत्वपूर्ण बात है कि इस शब्द के लगभग सभी अँग्रेज़ी अनुवादों को बहुवचन में अनुवाद किया गया है। अर्थात, यह कार्य कई दायित्वों के एक साथ निर्वाह करने का कार्य है; इस शब्द का अभिप्राय मण्डली की देखभाल, संचालन, मार्गदर्शन, रख-रखाव करना, और ज़िम्मेदारी लेना एवं निभाना है। मसीही मण्डलियों में इन दायित्वों के निर्वाह करने वालों के लिए अन्य शब्द भी प्रयोग किए गए हैं, जैसे कि “प्राचीन” (1 तिमुथियुस 5:17), “रखवाले” (इफिसियों 4:11), “सेवक” (1 कुरिन्थियों 3:5), “अध्यक्ष” (1 तिमुथियुस 3:1, 2), आदि। यह ध्यान देने और समझने के लिए बहुत महत्वपूर्ण है कि ये सभी शब्द, तथा 1 कुरिन्थियों 12:28 में प्रयुक्त शब्दप्रधान”, का प्रयोग मण्डली के शेष लोगों पर किसी अधिकार या वर्चस्व दिखाने अथवा रखने की पदवी अथवा उपाधि को नहीं, वरन सेवक या सहायक के समान औरों की सेवा, सहायता, और वचन शिक्षा देने आदि की ज़िम्मेदारियों को दिखाते हैं। साथ ही यहाँ पर यह ध्यान देने और समझने की बात है कि 1 कुरिन्थियों 12:28 मेंप्रधानशब्द के द्वारा उन लोगों की सामूहिक सेवकाई या दायित्व को बताया गया है, और पत्रियों में उन लोगों को बताया गया है जो इस दायित्व के अलग-अलग भागों का साथ मिलकर के निर्वाह करते हैं। 

साथ ही इस दायित्व के निर्वाह करने वाले इन लोगों के लिए प्रयोग किए गए शब्दों के बारे में  एक और रोचक एवं बहुत महत्वपूर्ण तथ्य भी वचन में विदित है, हमेशा इस दायित्व को निभाने वाले लोगों के लिए बहुवचन का ही प्रयोग किया गया है, चाहे बात किसी एक ही मण्डली की ही क्यों न हो रही हो। कहने का अभिप्राय यह कि नए नियम में, परमेश्वर पवित्र आत्मा के द्वारा प्रभु यीशु की कलीसिया के संचालन और देखभाल आदि के लिए दिए गए निर्देशों के अनुसार, कलीसिया या मण्डली की ज़िम्मेदारी कभी किसी एक व्यक्ति के लिए नहीं थी; किसी भी मण्डली का कोई एक सर्वेसर्वा अधिकारी कभी नहीं थासदा ही अलग-अलग लोगों को मिलकर इस एक दायित्व का निर्वाह करना था। कोई भी एक व्यक्ति कभी भी किसी एक मण्डली का सर्वाधिकार रखने वाला, मण्डली के लोगों को अपनी इच्छा और समझ के अनुसार नियंत्रित करने वाला, औरों पर अधिकार रखने वाला नहीं ठहराया गया। जिन्हें यह वरदान और दायित्व दिया गया, उन्हें इसका निर्वाह प्रभु के भय में, और सदा ही प्रभु को इसके विषय उत्तर देने के बोध के साथ करना था, “तुम में जो प्राचीन हैं, मैं उन के समान प्राचीन और मसीह के दुखों का गवाह और प्रगट होने वाली महिमा में सहभागी हो कर उन्हें यह समझाता हूं। कि परमेश्वर के उस झुंड की, जो तुम्हारे बीच में हैं रखवाली करो; और यह दबाव से नहीं, परन्तु परमेश्वर की इच्छा के अनुसार आनन्द से, और नीच-कमाई के लिये नहीं, पर मन लगा कर। और जो लोग तुम्हें सौंपे गए हैं, उन पर अधिकार न जताओ, वरन झुंड के लिये आदर्श बनो। और जब प्रधान रखवाला प्रगट होगा, तो तुम्हें महिमा का मुकुट दिया जाएगा, जो मुरझाने का नहीं” (1 पतरस 5:1-4)। ध्यान कीजिए कि पवित्र आत्मा द्वारा पतरस से लिखवाए गए इस निर्देश को नम्रता तथा सहनशीलता से, और आदर्श बनकर निभाना था; उसे अधिकार रखने और भौतिक लाभ उठाने के लिए प्रयोग नहीं करना था, और इसे किसीनौकरीके समान नहीं वरन मन से करना था। साथ ही उन्हेंप्रधान रखवालेअर्थात प्रभु यीशु मसीह को प्रसन्न करने और उससे अपने प्रतिफल प्राप्त करने के विचार के साथ इसका निर्वाह करना था; न कि अपने से किसी अन्य उच्च पद-अधिकारी अथवा किसी मनुष्य को प्रसन्न करने और उनसे कोईइनामया आदर और प्रशंसा पाने के लिए।

साथ ही हम उस आरंभिक मसीही विश्वासियों की मण्डलियों के उदाहरण से यह भी देखते हैं कि जो प्रधान”, अर्थात मण्डली की देखभाल और संचालन करने वाले हों, उनमें परमेश्वर के द्वारा दिए गए विशिष्ट गुणों एवं विशेषताओं का होना आवश्यक था। ये सभी गुण उनके व्यक्तिगत, पारिवारिक, और आत्मिक जीवन में विद्यमान होने चाहिए थे; तब ही उन्हें मण्डली केप्रधानहोने के पद पर नियुक्त किया जाना था (1 तिमुथियुस 3:1-10; तीतुस 1:5-11)। वचन में वोट डालकर किसी चुनाव की प्रक्रिया के द्वारा इन सेवकों को नियुक्ति करने का कोई निर्देश, उदाहरण, अथवा संकेत नहीं है। और न ही नियुक्त होने वालों की कोई निर्धारित संख्या दी गई है, बहुवचन के द्वारा यही बताया गया है कि उन्हें एक से अधिक होना था। साथ ही किसी एक का दूसरों से उच्च या बढ़कर अधिकार रखने के लिए भी कोई संकेत नहीं दिया गया है। एक बहु-प्रचलित आम धारणा के विपरीत, वचन में ऐसा कोई संकेत या उल्लेख नहीं है कि पतरस उस पहली मण्डली का अध्यक्ष था, जो आगे चलकरपोपका पद कहलाया, और आज भी बना हुआ है, और न ही इसी प्रकार के किन्हीं अन्य पदों का कोई उल्लेख किया गया है। इनप्रधानोंकी कार्यविधि के उदाहरण हम प्रेरितों के काम पुस्तक में, मण्डलियों में उठे कुछ महत्वपूर्ण प्रश्नों के विषय, प्रेरितों 6:1-6 में, तथा 15 अध्याय देखते हैं। प्रथम मण्डली के उनप्रधानोंके कार्य करने के इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि वे स्वयं व्यक्तिगत रीति से परमेश्वर के वचन का अध्ययन करने, प्रार्थना करने, आत्मिक जीवन की बातों की सही प्राथमिकता को बनाए रखने, और परमेश्वर के निर्देशों के अनुसार कार्य करने वाले लोग थे। उनके निर्णय परस्पर खुली चर्चा के बाद, सर्वसम्मति से, एक मन होकर लिए जाते थे; उनमें बड़े-छोटे समझे जाने की, या उनके अहम को पहुंची किसी ठेस के कारण किसी अन्य से द्वेष रखने की भावना नहीं थी। यह तब ही संभव हो सकता है जब उनमें से प्रत्येक अपने दायित्व का निर्वाह मनुष्यों को प्रसन्न करने के लिए नहीं, किसी मनुष्य की इच्छा के अनुसार नहीं, वरन परमेश्वर के भय में होकर, उसे उत्तरदायी होने की भावना के साथ करे, और परमेश्वर के वचन तथा उसकी आज्ञाकारिता को अपने जीवन में प्राथमिकता दे (गलातियों 1:10) 

यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं, और परमेश्वर ने आपको अपनी मण्डली में कोई ज़िम्मेदारी दी है, आपके द्वारा वह कुछ कार्य करना चाहता है तो, आपके लिए अनिवार्य है कि सबसे पहले आपका अपना जीवन मनुष्यों के नहीं वरन परमेश्वर के भय में चलने, उसे उत्तरदायी होने, और उसकी आज्ञाकारिता में बने रहने, उसके वचन को ध्यान में रखने वाला जीवन हो। तब ही आप अपने दायित्व का सही निर्वाह करने पाएंगे, उस कार्य के द्वारा परमेश्वर को महिमा देने और उसे प्रसन्न करने पाएंगे। अन्यथा, यदि आप मनुष्यों को प्रसन्न करने को वरीयता देंगे, तो शीघ्र ही शैतान आप से ऐसे गलत निर्णय, जो आपके तथा औरों के जीवन के लिए, तथा मण्डली या कलीसिया के लिए हानिकारक होंगे, उन्हें भी करवाने लगेगा। जैसे अदन की वाटिका में हव्वा से पाप करवाने के लिए उसने किया था, शैतान हमेशा लोगों को परमेश्वर के निर्देशों का पालन करने, अथवा अपनी बुद्धि और समझ के अनुसार सही, लुभावनी, तथा भली लगने वाली बातों के मध्य चुनाव करने की स्थिति में ला कर खड़ा कर देता है, और परमेश्वर तथा उसकी बातों पर संदेह लाने के द्वारा परमेश्वर की अनाज्ञाकारिता के लिए उकसाता है। यहीं पर हमारे और हमारे कार्यों का परमेश्वर को स्वीकार्य होने, परमेश्वर के प्रति हमारे समर्पण, विश्वास, और आज्ञाकारिता की वास्तविकता और खराई का निर्णय हो जाता है; जिससे फिर हमारे परमेश्वर के लिए उपयोगी होने और उससे आदर एवं महिमा, तथा अनन्तकालीन उत्तम प्रतिफल पाने का भी निर्णय हो जाता है (यूहन्ना 5:41-44) 

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी। 

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • सपन्याह 1-3     
  • प्रकाशितवाक्य 16 

शुक्रवार, 24 दिसंबर 2021

मसीही सेवकाई और पवित्र आत्मा के वरदान - 22


आत्मिक वरदानों के प्रयोगकर्ता - उपकार करने वाले - क्यूँ और कैसे   

हमने पिछले लेख में मसीही विश्वासियों की मण्डली में उपकार या सहायता करने के आत्मिक वरदान की आवश्यकता के बारे में देखा था। बाइबल हमें बताती है कि मसीही विश्वासी और परमेश्वर के जन, और परमेश्वर के नबी भी सुख-दुख की परिस्थितियों से निकलते हैं, और सभी को सहायता की आवश्यकता होती है। ऐसे में परमेश्वर के जन ही एक-दूसरे के सबसे अच्छे सहायक हो सकते हैं। कभी-कभी जो मित्र सहायता तथा सांत्वना देने के लिए आते हैं, वे ही दुख और अधिक बढ़ाने लग जाते हैं, जैसे कि अय्यूब के साथ हुआ था। अय्यूब पर एक ही दिन में आई भयानक और हृदय विदारक त्रासदियों, उसके सभी बच्चों के मारे जाने, उसका सब कुछ लुट जाने, और उसका शरीर घावों से भर जाने का समाचार सुनकर, अय्यूब के मित्र उसके पास उसे सांत्वना और ढाढ़स देने के लिए आए थे, किन्तु उसकी दशा देखकर वे आप ही रो पड़े, विलाप करने लगे, और उनमें से कोई भी सात दिन तक अय्यूब से कुछ बोल नहीं सका (अय्यूब 2:11-13)। उसके बाद जब उन्होंने अय्यूब से बात करनी आरंभ की, तो उसे ही किसी पाप का दोषी ठहराने लगे जिसके कारण उस पर यह सभी त्रासदियाँ आईं। अय्यूब उनके सामने अपने निर्दोष होने की बात कहता रहा, परन्तु वे उस पर दोषारोपण करते ही रहे। अन्ततः, उनकी बातों से तंग आकर, अय्यूब, उसे सांत्वना देने आए हुए अपने उन मित्रों से कहता है, “ऐसी बहुत सी बातें मैं सुन चुका हूँ, तुम सब के सब निकम्मे शान्तिदाता हो। क्या व्यर्थ बातों का अन्त कभी होगा?” (अय्यूब 16:2)। और इस पुस्तक के अंत में हम देखते हैं कि परमेश्वर भी उनके इस दोषारोपण से प्रसन्न नहीं था, जबकि वे मित्र परमेश्वर को सही और अय्यूब को गलत प्रमाणित करना चाह रहे थे (अय्यूब 42:7); अय्यूब ने जब अपने मित्रों के लिए होमबलि चढ़ाकर उनके पक्ष में परमेश्वर से प्रार्थना की, तब ही उन्हें परमेश्वर से क्षमा प्राप्त हुई (अय्यूब 42:8-9) 

परमेश्वर का वचन हमें सिखाता है कि हम परमेश्वर से ही बुद्धिमत्ता और सही शब्द माँगकर, तब ही उपकार और सहायता की सेवकाई को करें, जैसे कि यशायाह कहता है, “प्रभु यहोवा ने मुझे सीखने वालों की जीभ दी है कि मैं थके हुए को अपने वचन के द्वारा संभालना जानूं। भोर को वह नित मुझे जगाता और मेरा कान खोलता है कि मैं शिष्य के समान सुनूं” (यशायाह 50:4)। प्रभु यीशु मसीह के लिए भी वचन में आया है कि लोग उसकी बातों को सराहते थे, क्योंकि वे अनुग्रह से भरी होती थीं, “और सब ने उसे सराहा, और जो अनुग्रह की बातें उसके मुंह से निकलती थीं, उन से अचम्भा किया; और कहने लगे; क्या यह यूसुफ का पुत्र नहीं?” (लूका 4:22)। नीतिवचन भी हमें इसी प्रकार से सच्चाई को भी ग्रहण योग्य और मनभावना बनाकर कहने के लिए सिखाता है (नीतिवचन 10:13, 32; 16:21; 22:11; 25:11) 

आत्मिक वरदानों के बारे में, 1 कुरिन्थियों 12:7 में लिखा है कि प्रत्येक वरदान सभी के लाभ के लिए हैं। यह बात इस वरदान के विषय भी सही है। जिन्हें यह सहायता या उपकार की सेवकाई प्रभु ने सौंपी है, कई बार उन्हें स्वयं भी दुखों, क्लेशों, और विपरीत परिस्थितियों से होकर जाना पड़ता है। इन बातों के द्वारा परमेश्वर उन्हें उनकी इस सेवकाई को भली-भांति करने के लिए, या किसी आने वाली परिस्थिति में औरों की सहायता करने के लिए प्रशिक्षित करता है, “हमारे प्रभु यीशु मसीह के परमेश्वर, और पिता का धन्यवाद हो, जो दया का पिता, और सब प्रकार की शान्ति का परमेश्वर है। वह हमारे सब क्लेशों में शान्ति देता है; ताकि हम उस शान्ति के कारण जो परमेश्वर हमें देता है, उन्हें भी शान्ति दे सकें, जो किसी प्रकार के क्लेश में हों। क्योंकि जैसे मसीह के दुख हम को अधिक होते हैं, वैसे ही हमारी शान्ति भी मसीह के द्वारा अधिक होती है” (2 कुरिन्थियों 1:3-5) 

परमेश्वर के वचन, बाइबल में हमें विभिन्न उदाहरणों और शिक्षाओं के द्वारा बताया गया है कि यह सेवकाई किन विभिन्न रीतियों से की जा सकती है:

  • दुखी लोगों के हर प्रकार के बोझों को उठाने में सहायक बनाकर: प्रभु यीशु मसीह ने कहाहे सब परिश्रम करने वालों और बोझ से दबे लोगों, मेरे पास आओ; मैं तुम्हें विश्राम दूंगा। मेरा जूआ अपने ऊपर उठा लो; और मुझ से सीखो; क्योंकि मैं नम्र और मन में दीन हूं: और तुम अपने मन में विश्राम पाओगे। क्योंकि मेरा जूआ सहज और मेरा बोझ हल्का है” (मत्ती 11:28-30)। प्रभु यीशु स्वयं लोगों के भारी बोझों को अपने ऊपर लेकर, उनके साथ अपने हल्के बोझ को बाँटना चाहता है। प्रभु की इस बात का एक उत्तम उदाहरण है नेक सामरी का दृष्टांत (लूका 10:30-37), जहाँ प्रभु ने बताया कि परिस्थिति और आवश्यकता के अनुसार उस सामरी व्यक्ति ने मुसीबत में पड़े व्यक्ति की सहायता करने में किसी प्रकार का कोई संकोच नहीं किया, वरन आगे बढ़कर उसकी सहायता भी की, और आगे के लिए भी प्रयोजन किया। 
  • लोगों की आवश्यकताओं की पूर्ति में योगदान के द्वारा: पौलुस ने भी अपनी पत्रियों में दिखाया कि कैसे विभिन्न मंडलियों के लोग उसकी यात्राओं में उसकी सहायता करते थे, उसकी आवश्यकताओं को पूरा करते थे (रोमियों 15:24; 2 कुरिन्थियों 1:16)। साथ ही उसने सेवकाई में लगे लोगों की सहायता करने वालों की आवश्यकताओं में उनकी सहायता करने की भी शिक्षा दी (फिलिप्पियों 4:3)। पौलुस ने औरों की सहायता खुले दिल से करने का अति उत्तम उदाहरण मकिदुनिया की कलीसियाओं को दिखाया; और उनके उदाहरण के आधार पर इस सेवकाई में भी बढ़ते जाने के लिए कहा (2 कुरिन्थियों 8:1-7)
  • प्रार्थनाओं के द्वारा परमेश्वर की सहायता और अनुग्रह मांगने के द्वारा: पौलुस ने न केवल भौतिक वस्तुओं के द्वारा सहायता करने के लिए सिखाया, वरन, एक दूसरे के लिए; एक दूसरे के दुखों और परिस्थितियों के लिए प्रार्थना करने के द्वारा भी सहायता प्रदान करने को कहा (कुलुस्सियों 4:12; 1 थिस्सलुनीकियों 3:10; फिलेमोन 1:22)। उसने स्वयं अपने लिए मण्डलियों से प्रार्थनाएं करने के लिए कहा (रोमियों 15:30-33; 2 कुरिन्थियों 1:11; इफिसियों 6 :19; कुलुस्सियों 4:3; 1 थिस्सलुनीकियों 3:1; 5:25)
  • वचन की शिक्षा देने के द्वारा: मसीही विश्वासियों, मण्डलियों, और परमेश्वर के कार्यों के विरुद्ध शैतान का एक प्रमुख हथियार है परमेश्वर की अनाज्ञाकारिता करवाना। यह करने के लिए सबसे सहज तरीका है कि या तो परमेश्वर के वचन को लोगों तक पहुँचने न दे, या फिर उन्हें गलत शिक्षाओं में फंसा कर बहका और भरमा दे - ऐसे में लोगों यही लगता रहेगा कि वे परमेश्वर के वचन का पालन कर रहे हैं, जबकि वास्तविकता में वे परमेश्वर के वचन और निर्देशों के विरुद्ध, शैतान की बातों के पालन में लगे हुए होंगे। पुराने नियम में इस्राएल का इतिहास गवाह है कि परमेश्वर ने उन्हें सदा अपने वचन का पालन करने, उसे थामे रहने के लिए कहा (व्यवस्थाविवरण 6:1-3; 17:18-19; यहोशू 1:7-8)। जब भी लोगों ने परमेश्वर के वचन का पालन नहीं किया, वे हानि में आ गए (न्यायियों 2:10-20; यशायाह 5:13; होशे 4:6)। प्रभु यीशु मसीह ने भी सुसमाचार प्रचार के साथ संसार के लोगों को उसकी शिक्षाएं सिखाने को कहा (मत्ती 28:19-20), और वचन सीखने में हमारी सहायता के लिए परमेश्वर पवित्र आत्मा मसीही विश्वासियों में रहने के लिए दिया है (1 कुरिन्थियों 2:10-16)। साथ ही मसीही सेवकों को वचन की शिक्षाएं देने के दायित्व भी दिए हैं, जिससे मसीही विश्वासी और मण्डलियां सिद्ध, स्थिर और दृढ़ हो सकें, शैतान की गलत शिक्षाओं के बहकावे में आने से बच सकें (इफिसियों 4:11-15; कुलुस्सियों 2:4-8; 2 तिमुथियुस 3:16-18; 4:2-5) 
  • वचन के सही उपयोग के द्वारा: मसीही विश्वासियों को उनके मसीही जीवन में सही और स्थिर बनाए रखने के लिए वचन की शिक्षाएं देने की यह सेवकाई बहुत आवश्यक है, और उपकार या सहायता करने वालों को भी यह ध्यान रखना है कि लोग वचन की सही शिक्षाओं में स्थिर और दृढ़ हैं या किसी गलत शिक्षा में पड़ गए हैं, या वचन का अध्ययन ही छोड़ दिया है! उपकार या सहायता की सेवकाई करने वाले को भी वचन में स्थिर और दृढ़ होना चाहिए जिससे आवश्यकता के अनुसार, पवित्र आत्मा की अगुवाई में वह वचन के सही भाग, सही शिक्षाओं के प्रयोग के द्वारा औरों की सहायता कर सकें, उन्हें उभार सकें, सांत्वना दे सकें।

यदि आप मसीही विश्वासी हैं तो आपके लिए यह आवश्यक है कि आप परमेश्वर के वचन का नियमित अध्ययन करें (यूहन्ना 14:21, 23), पवित्र आत्मा के साथ बैठकर उससे वचन को सीखें (1 कुरिन्थियों 2:12), उसे गहराई से अपने हृदय में बैठाएं (कुलुस्सियों 3:16), जिससे पवित्र आत्मा समय और आवश्यकता के अनुसार आपको वचन स्मरण करवाए (यूहन्ना 14:26), और फिर अपने तथा औरों के जीवन में उस वचन के सही उपयोग के द्वारा आप औरों के सहायक या उपकार करने वाले एक श्रेष्ठ मसीही सेवक बन सकें (2 तिमुथियुस 2:15) 

 यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी। 

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • हबक्कूक 1-3     
  • प्रकाशितवाक्य 15