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Saturday, August 31, 2013

सीखने वाली आत्मा

   एक दिन हमारे चर्च में आराधना आरंभ होने से थोड़ा सा ही पहले मैंने एक युवक को अपनी माँ के साथ वार्तालाप करते सुना। वे दोनों चर्च के सूचना पटल पर लगी सूचनाएं पढ़ रहे थे जिनमें से एक थी कि चर्च में आने वाले लोग जुलाई और अगस्त के महीनों में प्रतिदिन परमेश्वर के वचन बाइबल में नीतिवचन नामक पुस्तक का एक अध्याय पढ़ने की चुनौती लें; नीतिवचन में 31 अध्याय हैं। उस युवक ने अपनी माँ से पूछा, अगस्त के अन्त पर आकर लोग क्या करेंगे, अगस्त में तो 30 ही दिन होते हैं? उसकी माँ ने उत्तर दिया, नहीं अगस्त में भी 31 दिन होते हैं, वह फिर बोला नहीं, 30 ही दिन होते हैं!

   जब आराधना के समय हमारा एक दूसरे से मिलने और अभिनंदन करने का समया आया तो मैंने पीछे मुड़कर उस जवान से हाथ मिलाया, उसे "हैलो" कहा और मुस्कुराते हुए यह भी कहा कि अगस्त में वास्तव में 31 दिन होते हैं। वह फिर अपनी बात पर अड़ गया और बोला, नहीं, 31 दिन नहीं होते; एक के बाद एक कोई भी दो महीनों में 31 दिन कैसे हो सकते हैं? इतने में आराधना में स्तुति गीत आरंभ हो गया, और मैं मुस्कुराते हुए फिर सामने की ओर मुड़ गई।

   उस छोटे सी मुलाकात और वार्तालाप ने मुझे सोचने पर मजबूर किया कि एक सीखने वाली आत्मा को विकसित करना हमारे लिए कितना आवश्यक है, अन्यथा हम कभी अपने ही विचारों की सीमाओं के आगे नहीं बढ़ पाएंगे। नीतिवचन के लेखक राजा सुलेमान ने आरंभिक अध्यायों में यही बात समझाई है, एक नम्रता का मन और सीखने वाली आत्मा को अपने अन्दर बनाए रखना जिससे अपने बुज़र्गों के अनुभवों और शिक्षाओं से तथा परमेश्वर और उसके वचन से हम उत्तम बातें सीख सकें: "हे मेरे पुत्र, यदि तू मेरे वचन ग्रहण करे, और मेरी आज्ञाओं को अपने हृदय में रख छोड़े" (नीतिवचन 2:1); "क्योंकि बुद्धि यहोवा ही देता है; ज्ञान और समझ की बातें उसी के मुंह से निकलती हैं" (नीतिवचन 2:6); "अपनी दृष्टि में बुद्धिमान न होना; यहोवा का भय मानना, और बुराई से अलग रहना" (नीतिवचन 3:7)।

   अगस्त में 30 ही दिन होते हैं या 31 दिन, यह जानना चाहे कोई विशेष महत्व ना रखता हो, लेकिन नम्रता का मन और सीखने वाली आत्मा रखना बहुत महत्व रखता है, क्योंकि तभी हम दूसरों से तथा परमेश्वर से सीखने वाले हो सकेंगे। और परमेश्वर से सीखने के लिए प्रतिदिन नीतिवचन से एक अध्याय पढ़ना, उत्तम शिक्षा पाने के लिए एक अच्छा आरंभ है - क्या कल से आरंभ हो रहे नए माह से आप यह करने का संकल्प लेंगे, और उस संकल्प को पूरा भी करेंगे? - ऐनी सेटास


सच्ची बुद्धिमता परमेश्वर से ही आरंभ होती है और उसी पर अन्त भी होती है।

तू अपनी समझ का सहारा न लेना, वरन सम्पूर्ण मन से यहोवा पर भरोसा रखना। उसी को स्मरण कर के सब काम करना, तब वह तेरे लिये सीधा मार्ग निकालेगा। - नीतिवचन 3:5-6

बाइबल पाठ: नीतिवचन 2:1-9
Proverbs 2:1 हे मेरे पुत्र, यदि तू मेरे वचन ग्रहण करे, और मेरी आज्ञाओं को अपने हृदय में रख छोड़े,
Proverbs 2:2 और बुद्धि की बात ध्यान से सुने, और समझ की बात मन लगा कर सोचे;
Proverbs 2:3 और प्रवीणता और समझ के लिये अति यत्न से पुकारे,
Proverbs 2:4 ओर उसको चान्दी की नाईं ढूंढ़े, और गुप्त धन के समान उसी खोज में लगा रहे;
Proverbs 2:5 तो तू यहोवा के भय को समझेगा, और परमेश्वर का ज्ञान तुझे प्राप्त होगा।
Proverbs 2:6 क्योंकि बुद्धि यहोवा ही देता है; ज्ञान और समझ की बातें उसी के मुंह से निकलती हैं।
Proverbs 2:7 वह सीधे लोगों के लिये खरी बुद्धि रख छोड़ता है; जो खराई से चलते हैं, उनके लिये वह ढाल ठहरता है।
Proverbs 2:8 वह न्याय के पथों की देख भाल करता, और अपने भक्तों के मार्ग की रक्षा करता है।
Proverbs 2:9 तब तू धर्म और न्याय, और सीधाई को, निदान सब भली-भली चाल समझ सकेगा;

एक साल में बाइबल: 

  • भजन 132-134 
  • 1 कुरिन्थियों 11:17-34


Friday, August 30, 2013

निर्भर

   आयर्नमैन ट्राएथलन एक बहुत ही कठिन और असाधारण स्पर्धा है। इस स्पर्धा में भाग लेने वाले को 2.4 मील तक तैरना होता है, 112 मील तक साईकिल चलानी होती है और 26.2 मील की दूरी दौड़ कर तय करनी होती है। किसी भी व्यक्ति के लिए इसे पूरा कर पाना सरल नहीं है। लेकिन फिर भी डिक होयट ने इसमें अपने विकलांग पुत्र रिक के साथ भाग लिया और पूरा भी किया। जब डिक तैर रहा था तो अपने बेटे रिक को एक छोटी नाव में बैठा कर खींच भी रहा था, जब उसे साईकिल चलानी थी तो रिक को अपने साथ साईकिल पर सवार कर रखा था, और जब दौड़ना था तब रिक को पहिए वाली कुर्सी पर बैठा कर उसे धक्का देते हुए वह दौड़ता रहा। इस पूरी स्पर्धा को पूरा करने के लिए रिक पूर्णतया अपने पिता डिक पर निर्भर था; अपने पिता के बिना रिक कुछ भी नहीं कर सकता था, परन्तु पिता के साथ तथा उनकी सामर्थ से रिक ने असंभव को संभव कर लिया।

   डिक और रिक की इस कहानी से हम मसीही विश्वासी अपने मसीही जीवन के लिए एक महत्वपूर्ण शिक्षा ले सकते हैं। जैसे रिक अपने पिता पर स्पर्धा पूरी करने के लिए पूर्णतया निर्भर था, हम मसीही विश्वासी भी अपने उद्धारकर्ता प्रभु यीशु मसीह पर अपनी जीवन दौड़ सफलतापूर्वक पूरी करने के लिए पूर्णतया निर्भर हैं। परमेश्वर को भाता हुआ जीवन जीने के प्रयास में, चाहे हमारे उद्देश्य, संकल्प और प्रयास कितने ही दृढ़ और उत्तम क्यों ना हों, फिर भी हम अनेक बार ठोकर खाते हैं, चूक जाते हैं, गिर जाते हैं। हम केवल अपनी ही सामर्थ से कुछ भी नहीं कर सकते; हमें अपने प्रभु की सहायता की आवश्यकता है ही।

   आनन्द की बात यह है कि हमारे प्रेमी परमेश्वर पिता द्वारा यह सहायता हमारे माँगने से पहले ही हमारे लिए उपलब्ध करा दी गई है। परमेश्वर के वचन बाइबल में प्रेरित पौलुस ने लिखा: "मैं मसीह के साथ क्रूस पर चढ़ाया गया हूं, और अब मैं जीवित न रहा, पर मसीह मुझ में जीवित है: और मैं शरीर में अब जो जीवित हूं तो केवल उस विश्वास से जीवित हूं, जो परमेश्वर के पुत्र पर है, जिसने मुझ से प्रेम किया, और मेरे लिये अपने आप को दे दिया" (गलतियों 2:20)। प्रत्येक मसीही विश्वासी के लिए कितना प्रेर्णादायक और उत्साहवर्धक है यह आश्वासन - "अब मैं जीवित न रहा, पर मसीह मुझ में जीवित है"। जब मसीह मुझे में जीवित है तो मसीह की सामर्थ भी मुझ में कार्यकारी है, और यदि मसीह यीशु, अर्थात परमेश्वर की सामर्थ मुझे में कार्यकारी है तो फिर ऐसा क्या है जो उसकी सामर्थ की सहायता से मैं कर नहीं सकता?

   हम अपनी मसीही जीवन दौड़ अपनी सामर्थ से पूरी नहीं कर सकते; परन्तु यदि हम मसीह यीशु पर निर्भर रहेंगे, अर्थात, हर बात में उसके आज्ञाकारी रहेंगे, उसे अपने जीवन में प्रथम स्थान देंगे, अपने जीवन से उसे महिमा देंगे, उसके गवाह बन कर संसार के सामने उस में सेंत-मेंत सबके लिए उपलब्ध पापों की क्षमा और उद्धार का सुसमाचार सुनाने वाले होंगे, तो उसकी सामर्थ भी स्वतः ही हमारे अन्दर कार्यकारी रहेगी और हमें हर बात, हर परिस्थिति पर एक जयवन्त जीवन प्रदान करती रहेगी। - एलबर्ट ली


विश्वास हमारी दुर्बलता को परमेश्वर की सामर्थ से जोड़ कर हमें सबल बना देता है।

तुम मुझ में बने रहो, और मैं तुम में: जैसे डाली यदि दाखलता में बनी न रहे, तो अपने आप से नहीं फल सकती, वैसे ही तुम भी यदि मुझ में बने न रहो तो नहीं फल सकते। मैं दाखलता हूं: तुम डालियां हो; जो मुझ में बना रहता है, और मैं उस में, वह बहुत फल फलता है, क्योंकि मुझ से अलग हो कर तुम कुछ भी नहीं कर सकते। - यूहन्ना 15:4-5

बाइबल पाठ: फिलिप्पियों 4:4-13
Philippians 4:4 प्रभु में सदा आनन्‍दित रहो; मैं फिर कहता हूं, आनन्‍दित रहो।
Philippians 4:5 तुम्हारी कोमलता सब मनुष्यों पर प्रगट हो: प्रभु निकट है।
Philippians 4:6 किसी भी बात की चिन्‍ता मत करो: परन्तु हर एक बात में तुम्हारे निवेदन, प्रार्थना और बिनती के द्वारा धन्यवाद के साथ परमेश्वर के सम्मुख अपस्थित किए जाएं।
Philippians 4:7 तब परमेश्वर की शान्‍ति, जो समझ से बिलकुल परे है, तुम्हारे हृदय और तुम्हारे विचारों को मसीह यीशु में सुरिक्षत रखेगी।
Philippians 4:8 निदान, हे भाइयों, जो जो बातें सत्य हैं, और जो जो बातें आदरणीय हैं, और जो जो बातें उचित हैं, और जो जो बातें पवित्र हैं, और जो जो बातें सुहावनी हैं, और जो जो बातें मनभावनी हैं, निदान, जो जो सदगुण और प्रशंसा की बातें हैं, उन्‍हीं पर ध्यान लगाया करो।
Philippians 4:9 जो बातें तुम ने मुझ से सीखीं, और ग्रहण की, और सुनी, और मुझ में देखीं, उन्‍हीं का पालन किया करो, तब परमेश्वर जो शान्‍ति का सोता है तुम्हारे साथ रहेगा।
Philippians 4:10 मैं प्रभु में बहुत आनन्‍दित हूं कि अब इतने दिनों के बाद तुम्हारा विचार मेरे विषय में फिर जागृत हुआ है; निश्‍चय तुम्हें आरम्भ में भी इस का विचार था, पर तुम्हें अवसर न मिला।
Philippians 4:11 यह नहीं कि मैं अपनी घटी के कारण यह कहता हूं; क्योंकि मैं ने यह सीखा है कि जिस दशा में हूं, उसी में सन्‍तोष करूं।
Philippians 4:12 मैं दीन होना भी जानता हूं और बढ़ना भी जानता हूं: हर एक बात और सब दशाओं में तृप्‍त होना, भूखा रहना, और बढ़ना-घटना सीखा है।
Philippians 4:13 जो मुझे सामर्थ देता है उस में मैं सब कुछ कर सकता हूं।

एक साल में बाइबल: 
  • भजन 129-131 
  • 1 कुरिन्थियों 11:1-16