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सोमवार, 2 मार्च 2026

Blessed and Successful Life - 25 - Improper Behavior Towards God’s Word - 5 / आशीषित एवं सफल जीवन – 25 - परमेश्वर के वचन के प्रति अनुचित व्यवहार – 5

 

आशीषित एवं सफल जीवन – 25 - परमेश्वर के वचन के भण्डारी बनो – 10

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परमेश्वर के वचन के प्रति अनुचित व्यवहार – 5

 

पिछले लेख में हमने देखा था कि परमेश्वर न केवल यह चाहता है कि उसके लोग उसके निर्देशों के अनुसार ही कार्य करें, वरन साथ ही इस बात के लिए भी दृढ़ है कि वे उन कार्यों को ठीक वैसे ही करें जैसा उसने उन से करने के लिए कहा है; न कि अपनी इच्छा और तरीके से। इस सिद्धान्त के एक व्यवहारिक चित्रण के रूप में, आज हम मूसा के द्वारा मिस्र से इस्राएल के छुड़ाए जाने से सम्बन्धित कुछ घटनाओं को देखना आरम्भ करेंगे। आज हम मूसा के इस्राएल का अगुवा बनने का प्रयास करने के बारे में देखेंगे, और फिर उसके बाद कुछ अन्य उदाहरण भी देखेंगे।


प्रेरितों 7:22-36 में स्तिफनुस द्वारा दोहराए गए इस्राएल के छुड़ाए जाने के संक्षिप्त घटनाक्रम को देखिए। जैसा स्तिफनुस ने कहा था, मूसा, इस्राएलियों के साथ अपना भाईचारा और समर्थन व्यक्त करने के लिए स्वतः ही उनके पास गया था। वहाँ पर एक मिस्री द्वारा एक इस्राएली पर किए जा रहे अत्याचार को देख, पहले तो मूसा ने इस्राएली के पक्ष में कुछ करने के लिए, अपनी ही समझ के अनुसार, उस मिस्री को मार डाला; और फिर बाद में इस्राएलियों के मध्य के विवादों को भी सुलझाने का प्रयास किया। संभवतः उसका विचार रहा होगा कि उसकी राजसी हैसियत और क्षमताओं के कारण, इस्राएली उसे मिस्र के दासत्व से उनका छुड़ाने वाला समझ लेंगे, उसे स्वीकार कर लेंगे। लेकिन इस्राएलियों ने ऐसा नहीं किया, अपने छुड़ाने वाले के रूप में उन्होंने उसका तिरस्कार किया, और मूसा को अपनी जान बचा कर मिस्र से भागना पड़ा। इसके बाद और चालीस वर्ष की तैयारी का समय लगा, और तब परमेश्वर मूसा को वापस मिस्र में लेकर आया और उसके द्वारा इस्राएल को दासत्व से छुड़वाया।


यद्यपि मूसा इस्राएलियों को छुड़ाने के लिए परमेश्वर द्वारा चुना और निर्धारित किया हुआ था, लेकिन मूसा अपनी इच्छा और तरीके से इस कार्य को नहीं कर सका, बल्कि ऐसा करने के प्रयास में जान के जोखिम में आ गया। वह यह बात नहीं जानता था कि जब उसने यह कार्य अपने आप ही करने का प्रयास किया था, उस समय वह इस ज़िम्मेदारी के निर्वाह के लिए प्रशिक्षित और तैयार किया हुआ नहीं था। परमेश्वर को उसे चालीस वर्ष तक जंगल में प्रशिक्षित करना पड़ा, उसे बिना किसी पहचान के तथा दूसरों पर आश्रित एक परदेशी बनकर एक साधारण से व्यक्ति के रूप में जीवन जीने के द्वारा, उसके घमण्ड और राजसी सोच को तोड़ना पड़ा। उसे मूक, असहाय, और मूर्ख भेड़ों के साथ काम करना पड़ा, जो अपनी इच्छा से, तथा परिणाम की कोई चिंता किए बिना ही कुछ भी कर बैठने की प्रवृत्ति रखती थीं। जब मूसा ने उनके साथ रहते हुए धैर्य सीख लिया और उसमें बुद्धिहीन पशुओं की भी देखभाल करने का हृदय विकसित हो गया, तब परमेश्वर ने उसे इस्राएलियों को छुड़ाने के लिए भेजा।

 

साथ ही एक बात और भी थी, जिस समय मूसा ने स्वतः ही इस्राएलियों का छुड़ाने वाला बनने का प्रयास किया था, तब तक परमेश्वर द्वारा उनके छुटकारे के लिए निर्धारित समय पूरा नहीं हुआ था; और जिस दिन यह समय पूरा हो गया, परमेश्वर उन्हें मिस्र से निकाल लाया (उत्पत्ति 15:13; निर्गमन 12:40-41)। जब मूसा के जाने का समय आया, उस समय, जलती हुई झाड़ी की घटना और संबंधित बातों के द्वारा (निर्गमन 4) परमेश्वर ने मूसा को यह भी दिखाया कि यद्यपि अपनी दृष्टि में, और अपने आँकलन के अनुसार, उसमें इस्राएलियों को मिस्र से छुड़ाने के लिए कोई योग्यता, कोई सामर्थ्य नहीं थी; किन्तु परमेश्वर की आज्ञाकारिता के द्वारा वह अद्भुत आश्चर्यकर्म कर सकता था।


अब, मूसा यह जान चुका था कि इस असंभव लगने वाले कार्य को सफलतापूर्वक करने के लिए उसके पास अपना कुछ भी नहीं था जिसके आधार पर वह इसे कर पाने का कोई दावा कर पाता, या ऐसा करने का सोच भी सकता था; वह इसके लिए पूर्णतः परमेश्वर पर ही निर्भर था। और हम यह अच्छे से जानते हैं कि यह केवल मूसा की परमेश्वर के प्रति निःसंकोच आज्ञाकारिता, तथा असंभव दिखने वाली बातों के लिए भी परमेश्वर पर उसका पूर्ण भरोसा रखना ही था जिसने न केवल उसे इस्राएलियों को स्वीकार्य और उनका अगुवा तथा छुड़ाने वाला बनाया, बल्कि उसे फिरौन द्वारा किसी भी हानि के करने से भी सुरक्षित रखा, यद्यपि मूसा में होकर उनपर आई दस विपत्तियों के कारण मिस्र को बहुत भारी हानि उठानी पड़ी थी (इब्रानियों 11:24-27)।


उनको मिस्र से निकाल लाने के पश्चात, इस्राएल को और आगे वाचा किए हुए कनान देश में ले जाने से पहले, परमेश्वर ने इस्राएलियों से उसके साथ एक वाचा बाँधने के लिए कहा, उसके आज्ञाकारी बने रहने की वाचा (निर्गमन 19:3-8)। इस्राएलियों के यह वाचा बाँधने के बाद, परमेश्वर ने पहले उन्हें अपनी आज्ञाएँ, फिर अपनी व्यवस्था दी, और फिर इसके बाद उन से कनान की यात्रा के दौरान उसकी आराधना करने के लिए एक आराधना का तम्बू भी बनाने के लिए कहा। यहाँ पर ध्यान दीजिए कि इस्राएलियों और परमेश्वर के बीच की यह वाचा केवल एक ही बात पर आधारित थी, परमेश्वर के प्रति बिना किसी शर्त के, उनकी पूर्ण आज्ञाकारिता पर।


हम अगले लेख में भी इस्राएल की इस यात्रा के बारे में और देखेंगे, तथा इस उदाहरण से और भी सीखेंगे कि परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता का अर्थ है परमेश्वर द्वारा कही गई बात को उसके द्वारा बताए गए तरीके से ही पूरा करना; न कि परमेश्वर द्वारा निर्धारित बात और दिये गये निर्देशों को अपने या अन्य मनुष्यों द्वारा गढ़े गये तरीकों और रीतियों द्वारा करना।


यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। स्वेच्छा से अपने पापों के लिये पश्चाताप करके, प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु, मैं अपने पापों के लिए पश्चातापी हूँ, उनके लिए आप से क्षमा माँगता हूँ। मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मुझे और मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।




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Blessed and Successful Life - 25 - Be Stewards of God’s Word – 10 

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Improper Behavior Towards God’s Word - 5

 

In the previous article we have seen that God not only wants His people to do what He instructs them to do, but is also equally particular that they do it just the way that He wants them to do it; and not according to their own concepts and fancies. As a practical illustration of this principle, today we begin to look at incidents related to Israel's deliverance from Egypt through Moses. Today we will see about Moses attempting to become the leader of Israel, and later see some other examples as well.


Consider the summary of Israel’s deliverance as stated by Stephen before the Council in Acts 7:22-36. As Stephen recounts this incident, Moses, wanting to express his solidarity and brotherhood with them, had initially gone to the Israelites on his own. There, acting in favor of an Israelite being oppressed by an Egyptian, according to his own understanding Moses even killed the oppressor, and then tried to settle disputes between the Israelites. Probably, his thinking was that because of his royal status and capabilities, the Israelites will accept him as their deliverer from Egyptian slavery. But the Israelites rejected him as their potential deliverer, and he had to run away from Egypt for saving his life. It took another forty years of preparation before God brought him back to Egypt, to deliver Israel from slavery through him.


Though Moses was to be the one through whom God would deliver Israel, yet at that time Moses could not do this according to his desire and by his own methods; rather, in attempting to do so, he jeopardized his life. What Moses was unaware of  was that when he tried to do it on his own, he was still not trained and prepared to carry out this responsibility. God had to train him for another forty years in the wilderness, as a nobody living and working in a very simple manner, as a foreigner dependent upon others. Thereby, God had to break his pride and his royal manner of thinking. Moses had to work with dumb, defenseless sheep, prone to do things their own way without bothering about the consequences. It was only when Moses had learnt patience and developed the heart to care for even dumb animals, that he was sent to deliver Israel.

 

Also, another thing was that at the time Moses attempted to become their deliverer, God’s determined time for their deliverance had not been completed; and the day this time was completed, God brought them out of Egypt (Genesis 15:13; Exodus 12:40-41). In the incidence of the Burning Bush and associated events (Exodus 4), God had also shown to Moses, that though in his own eyes, and by his own reckoning, he had no qualities and capabilities to deliver Israel from Egypt; but through being obedient to God, he was capable of doing extra-ordinary miracles.


Now, Moses had learnt that for being successful in carrying out this seemingly impossible task, he had nothing of his own by which he could make any claims or even think of accomplishing it; he was totally dependent on God for it. And we know this very well that it was only his unflinching obedience to God, and his complete trust in God for even seemingly impossible things, that was the only thing that made him acceptable to Israel as their leader and deliverer. It was this faith that kept Pharaoh from harming him in any way, although through Moses Egypt had suffered great loss, in the ten plagues he brought upon them (Hebrews 11:24-27).


Having brought them out of Egypt, before leading Israel towards the Promised Land, Canaan, God asked the Israelites to make a covenant with Him, of being obedient to Him (Exodus 19:3-8). After the Israelites agreed to this covenant, God proceeded further, first giving them His Commandments, and then the Law, and then asking them to build the Tabernacle for worshipping Him while they journeyed to Canaan. Take note that the covenant between the Israelites and God was totally dependent on one and only one thing, absolute, unconditional obedience to God.

 

We will continue considering this Exodus journey of Israel in the next article as well, to continue learning from this illustration that obedience to God means doing the things He has said, and doing them the way He wants them done; and not doing God ordained and instructed things, by methods and rituals contrived by other people, or self.


If you have not yet accepted the discipleship of the Lord, make your decision in favor of the Lord Jesus now to ensure your eternal life and heavenly blessings. Where there is obedience to the Lord, where there is respect and obedience to His Word, there is also the blessing and protection of the Lord. Repenting of your sins, and asking the Lord Jesus for forgiveness of your sins, voluntarily and sincerely, surrendering yourself to Him - is the only way to salvation and heavenly life. You only have to say a short but sincere prayer to the Lord Jesus Christ willingly and with a penitent heart, and at the same time completely commit and submit your life to Him. You can also make this prayer and submission in words something like, “Lord Jesus, I am sorry for my sins and repent of them. I thank you for taking my sins upon yourself, paying for them through your life.  Because of them you died on the cross in my place, were buried, and you rose again from the grave on the third day for my salvation, and today you are the living Lord God and have freely provided to me the forgiveness, and redemption from my sins, through faith in you. Please forgive my sins, take me under your care, and make me your disciple. I submit my life into your hands." Your one prayer from a sincere and committed heart will make your present and future life, in this world and in the hereafter, heavenly and blessed for eternity.


 

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सोमवार, 11 नवंबर 2024

Growth through God’s Word / परमेश्वर के वचन से बढ़ोतरी – 248

 

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मसीही जीवन से सम्बन्धित बातें – 93


मसीही जीवन के चार स्तम्भ - 4 - प्रार्थना (35) 


व्यावहारिक मसीही जीवन से सम्बन्धित बातों के मूल स्वरूप और आरम्भिक मसीही विश्वासियों तथा कलीसियाओं द्वारा उन बातों के पालन किए जाने के बारे में सीखने के लिए, हम इन बातों को परमेश्वर के वचन बाइबल में दिए गए उदाहरणों तथा संबंधित हवालों से देखते और समझते आ रहे हैं। जैसा हम पहले के लेखों में देख चुके हैं, प्रेरितों 2 अध्याय में व्यावहारिक मसीही जीवन से सम्बन्धित सात बातें दी गई हैं। पहली तीन बातें, जो मसीही विश्वास में आने, मसीही जीवन आरम्भ करने से सम्बन्धित हैं, वे पतरस द्वारा भक्त यहूदियों को किए गए प्रचार के अन्त की ओर, प्रेरितों 2:38-41 में दी गई हैं। और शेष चार, जिनका आरम्भिक मसीही विश्वासी लौलीन होकर पालन करते थे, वे प्रेरितों 2:42 में दी गई हैं, और मसीही जीवन पर उनके सकारात्मक प्रभाव के कारण उन्हें “मसीही जीवन के स्तम्भ” भी कहा जाता है। इन चार में से पहली तीन बातों पर विचार कर लेने के बाद, अब हम चौथी बात, प्रार्थना करने पर विचार कर रहे हैं। प्रार्थना से सम्बन्धित बुनियादी बातों को देखने और समझने के बाद, अब हम मसीहियों में बहुत आम प्रयोग की जाने वाली “प्रभु की प्रार्थना” पर मत्ती 6:5-15 के आधार पर देखना आरम्भ किया है। हमने देखा है कि यह हर अवसर और हर बात के लिए, बिना सोचे-समझे, यूँ ही दोहराई जाने वाली कोई प्रार्थना नहीं है। वरन प्रभु यीशु ने अपने सच्चे समर्पित, आज्ञाकारी शिष्यों को, परमेश्वर को स्वीकार्य प्रार्थनाएं बनाने के लिए एक रूपरेखा, एक ढाँचा दिया है। मत्ती के इस खण्ड में, प्रभु ने पद 11-13a में तीन बातें कही हैं, जिन्हें प्रभु के शिष्यों को परमेश्वर से माँगना है। ये तीन बातें हैं, परमेश्वर पिता पर निर्भर रहना, क्षमाशील होना, और पिता परमेश्वर द्वारा परीक्षा में न लाए जाने और बुराई से बचाए रखने का निवेदन करना। पिछले दो लेखों में तीसरी बात को देखने और समझने के बाद, आज हम देखेंगे कि परमेश्वर अपने लोगों को, विशेषकर उन्हें जो इन बातों में उन्नत होना चाहते हैं, इनकी आशीषों को प्राप्त करना चाहते हैं, उन्हें किस प्रकार प्रशिक्षित करता है।


हमने पिछले लेखों में देखा है कि परमेश्वर हमारे बारे में सब कुछ जानता है (यूहन्ना 2:24-25); किन्तु उसके प्रति हमारे विश्वास, आज्ञाकारिता, और मनसा की वास्तविक दशा को हम पर प्रकट करने के लिए, परमेश्वर हमें परीक्षाओं से होकर निकालता है, ताकि हम समय रहते अपने भटकने, अपनी गलतियों, और अपनी कमजोरियों को पहचान जाएं, और उन्हें सुधार लें। जैसा हम अपने प्रतिदिन के जीवन और व्यवहार से जानते और समझते हैं, किसी भी वस्तु की वास्तविकता, उसे उन परिस्थितियों में उपयोग करने के द्वारा ही पता चलती है, जिनके लिए उसे तैयार किया गया है। मसीही विश्वासियों को प्रशिक्षित, परिपक्व, एवं दृढ़ बनाने के लिए परमेश्वर इन दोनों व्यावहारिक और सैद्धांतिक बातों का उनके जीवन में प्रयोग करता है। 


मत्ती 6:11 में दी गई पहली बात है, अपनी रोज की रोटी के लिए परमेश्वर पर निर्भर रहना। अर्थात दिन-प्रतिदिन के हिसाब से जीवन जीना; मत्ती 6:33-34 को मानते हुए उसका पालन करना, और अपने मन में निश्चित रहना कि जब कल आएगा, तब कल की आवश्यकताओं के अनुसार परमेश्वर उन आवश्यकताओं के लिए प्रावधान भी करके देगा; जैसे अब्राहम ने इसहाक को सिखाया (उत्पत्ति 22:7-8)। इस प्रशिक्षण के लिए, परमेश्वर हमें आवश्यकताओं में, कमी-घटी में, परेशानियों में जा लेने देगा (व्यवस्थाविवरण 8:3-6); और हमें हमारी मनसा, युक्तियों पर छोड़ देगा। उन आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए हमारे सामने सांसारिकता के अनुसार चलने का, संसार से समझौता करने का अवसर होगा। अब यह हम पर, परमेश्वर पर हमारे विश्वास की दृढ़ता पर, निर्भर होगा कि हम कुछ समय के दुःख और कुछ हानि सहते हुए भी अपने मसीही विश्वास, और परमेश्वर की योजनाओं पर अपने भरोसे को बनाए रखते हैं, और परीक्षा से पार हो जाते हैं, जैसा अय्यूब  ने किया; या दुःख, तकलीफ, असुविधाओं से बचने के लिए संसार के साथ समझौता कर लेते हैं, किन्तु परीक्षा में असफल रहते हैं; जो हमें हमारे विश्वास की वास्तविकता और दृढ़ता को प्रकट कर देता है। प्रतिदिन के प्रावधान के लिए परमेश्वर पर निर्भर रहने का अर्थ है, बिना परमेश्वर पर, उसकी योजनाओं पर, उसके प्रावधानों पर सन्देह किए, बिना संसार के मार्गों को अपनाए, परमेश्वर के कहे के अनुसार चलते रहना, चाहे उसके लिए कुछ दुःख, हानि, असुविधा क्यों न उठानी पड़े। 


अगले लेख में हम प्रार्थना के दूसरे और तीसरे बिन्दु के लिए प्रशिक्षित किए जाने के बारे में देखेंगे।


यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु, मैं अपने पापों के लिए पश्चातापी हूँ, उनके लिए आप से क्षमा माँगता हूँ। मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मुझे और मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।


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English Translation


Things Related to Christian Living – 93


The Four Pillars of Christian Living - 4 - Prayer (35)


 

To learn about the original form of the things related to practical Christian living, and how the initial Christian Believers and churches practiced them, we are considering and understanding these things through the examples and references about them in God’s Word the Bible. As we have seen in the earlier articles, there are seven things related to practical Christian living given in Acts 2. The first three things, that are related to coming into the Christian faith, are given towards the end of Peter’s sermon to the devout Jews, in Acts 2:38-41. The remaining four, those that the initial Christian Believers followed steadfastly, are given in Acts 2:42. Because of their positive effect on Christian living, they are also known as “Pillars of Christin Living.” Having considered the first three of these four, we are now considering the fourth one, praying. Having seen and understood the fundamental things related to prayer, now we are considering something that is very commonly used amongst the Christiana, the “Lord’s Prayer” on the basis of Matthew 6:5-15. We have seen that it is not something that has been given for being said as a formality by rote on every occasion and for all situations, without even knowing about it or understanding it. Rather, the Lord Jesus has given to His true, surrendered, and obedient disciples an outline, a framework, for saying prayers that would be acceptable to God. In this passage from Matthew, the Lord in verses 11-13a has said three things, which the disciples of the Lord should ask from God. These three things are, to be dependent upon Father God, to be forgiving, and to request God the Father that He would not lead them into temptation and also keep them safe from evil. Having seen about the third of these three in the previous two articles, today we will see how God trains His people, especially those who want to be edified in these things, and receive the blessings associated with them.


We have seen in the previous articles that that God knows everything about us (John 2:24-25); but to make us aware of the actual state of our faith, obedience, and mentality towards Him, God allows us to go through trials and temptations, so that we may know about our getting misled, realize our mistakes, and learn of our weaknesses and rectify them well in time. As we know and understand from our day-to-day lives and behavior, the actual state of anything is only known when it is put to use for the purpose it has been made. To make us Christian Believers trained, mature, and steadfast, God uses both of these practical and fundamental principles in our lives.


In Matthew 6:11 we have the first thing – depend upon God for our daily bread. In other words, to live life one day at a time, believing in and trusting Matthew 6:33-34, being confident in our hearts that when ‘tomorrow’ comes, then according to the needs of ‘tomorrow’ God will make the necessary provisions; as Abraham taught Isaac (Genesis 22:7-8). For this training, God allows us to go through needs, deficiencies, problems (Deuteronomy 8:3-6); and leaves us to our own thinking and devices. To fulfill those needs, we will have before us the opportunities to do things like the world does, to compromise with the world. Now, it is left to us to depend upon our faith in God, and be willing to go through times of pain and some loss, while continuing to trust our Christian faith and the plans that God has made for us, and successfully go through the trials, as Job did; or to escape pain, problems, and discomfort compromise with the world, but fail in our being evaluated; and that makes the actual state of our faith and its steadfastness evident to us. To remain dependent upon God for our daily needs means to trust God without doubting His plans, His provisions for us and without taking recourse to the ways of the world, continue to move on the path laid out for us by God, even if it means suffering pain, problems, and discomfort.


In the next article we will consider about being trained for the second and third prayer points.


If you have not yet accepted the discipleship of the Lord, make your decision in favor of the Lord Jesus now to ensure your eternal life and heavenly blessings. Where there is obedience to the Lord, where there is respect and obedience to His Word, there is also the blessing and protection of the Lord. Repenting of your sins, and asking the Lord Jesus for forgiveness of your sins, voluntarily and sincerely, surrendering yourself to Him - is the only way to salvation and heavenly life. You only have to say a short but sincere prayer to the Lord Jesus Christ willingly and with a penitent heart, and at the same time completely commit and submit your life to Him. You can also make this prayer and submission in words something like, “Lord Jesus, I am sorry for my sins and repent of them. I thank you for taking my sins upon yourself, paying for them through your life.  Because of them you died on the cross in my place, were buried, and you rose again from the grave on the third day for my salvation, and today you are the living Lord God and have freely provided to me the forgiveness, and redemption from my sins, through faith in you. Please forgive my sins, take me under your care, and make me your disciple. I submit my life into your hands." Your one prayer from a sincere and committed heart will make your present and future life, in this world and in the hereafter, heavenly and blessed for eternity.


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मंगलवार, 7 जुलाई 2020

निर्भर


     लौरा की माँ कैंसर से जूझ रही थीं। एक प्रातः लौरा ने उनके लिए अपनी एक सहेली के साथ प्रार्थना की। उसकी वह सहेली कई वर्षों से मस्तिष्क के रोग सेरेब्रल पाल्सी के कारण अपनी हर आवश्यकता के लिए दूसरों की सहायता पर निर्भर रहती थी। लौरा की सहेली ने अपनी प्रार्थना में कहा, “प्रभु आप मेरे लिए सब कुछ करते हैं; लौरा की माँ के लिए भी सब कुछ कर दीजिए।” लौरा अपनी सहेली द्वारा परमेश्वर पर पूर्णतः निर्भर रहने को स्वीकार करने और कहने से बहुत प्रभावित हुई। उसने उस पल पर विचार करते हुए कहा, “मैं कितनी बार यह स्वीकार करती हूँ कि हर बात में मुझे परमेश्वर पर निर्भर होने की आवश्यकता है? यह मुझे प्रतिदिन, हर बात के लिए करना चाहिए!”

     परमेश्वर के वचन बाइबल में हम प्रभु यीशु के विषय देखते हैं, कि अपने पृथ्वी के सेवकाई के समय में उन्होंने स्वर्गीय पिता परमेश्वर पर पूर्ण निर्भरता दिखाई। हम यह सोच रख सकते हैं कि क्योंकि प्रभु यीशु, मानव रूप में परमेश्वर थे, इसलिए उनके पास अपने आप पर निर्भर रहने के सर्वोत्तम और सर्वोचित कारण थे। परन्तु जब धर्म के अगुवों ने उनसे पूछा कि उन्होंने वैधानिक तौर पर घोषित विश्राम के दिन में क्यों कार्य किया, क्योंकि उन्होंने किसी को सबत के दिन चंगा किया था, तो प्रभु ने उन्हें उत्तर दिया, “... मैं तुम से सच सच कहता हूं, पुत्र आप से कुछ नहीं कर सकता, केवल वह जो पिता को करते देखता है, क्योंकि जिन जिन कामों को वह करता है उन्हें पुत्र भी उसी रीति से करता है” (यूहन्ना 5:19)। प्रभु ने भी पिता परमेश्वर पर अपनी पूर्ण निर्भरता व्यक्त की!

     प्रभु यीशु का पिता परमेश्वर पर निर्भर रहना इस बात का सर्वोच्च उदाहरण प्रस्तुत करता है कि परमेश्वर के साथ संबंध में रहने का क्या अर्थ होता है। हमारी हर साँस, हमारे जीवन का हर पल, हमें परमेश्वर के अनुग्रह से मिला उपहार है; और परमेश्वर चाहता है कि हमारे जीवन उसकी सामर्थ्य से भरे हुए हों। जब हम अपने हर पल को प्रार्थना के साथ और उसके वचन की आज्ञाकारिता में होकर, उसके प्रेम को व्यक्त करने तथा उसकी सेवकाई के लिए प्रयोग होने के लिए व्यतीत करते हैं, हम उस पर अपनी निर्भरता को दिखाते हैं। - जेम्स बैंक्स

 

प्रार्थना-विहीन जीवन, परमेश्वर से पृथक होने की घोषणा है। - डैनियल हेन्डरसन


मैं दाखलता हूं: तुम डालियां हो; जो मुझ में बना रहता है, और मैं उस में, वह बहुत फल फलता है, क्योंकि मुझ से अलग हो कर तुम कुछ भी नहीं कर सकते। - यूहन्ना 15:5

बाइबल पाठ: यूहन्ना 5:16-23

यूहन्ना 5:16 इस कारण यहूदी यीशु को सताने लगे, क्योंकि वह ऐसे ऐसे काम सब्त के दिन करता था।

यूहन्ना 5:17 इस पर यीशु ने उन से कहा, कि मेरा पिता अब तक काम करता है, और मैं भी काम करता हूं।

यूहन्ना 5:18 इस कारण यहूदी और भी अधिक उसके मार डालने का प्रयत्न करने लगे, कि वह न केवल सब्त के दिन की विधि को तोड़ता, परन्तु परमेश्वर को अपना पिता कह कर, अपने आप को परमेश्वर के तुल्य ठहराता था।

यूहन्ना 5:19 इस पर यीशु ने उन से कहा, मैं तुम से सच सच कहता हूं, पुत्र आप से कुछ नहीं कर सकता, केवल वह जो पिता को करते देखता है, क्योंकि जिन जिन कामों को वह करता है उन्हें पुत्र भी उसी रीति से करता है।

यूहन्ना 5:20 क्योंकि पिता पुत्र से प्रीति रखता है और जो जो काम वह आप करता है, वह सब उसे दिखाता है; और वह इन से भी बड़े काम उसे दिखाएगा, ताकि तुम अचम्भा करो।

यूहन्ना 5:21 क्योंकि जैसा पिता मरे हुओं को उठाता और जिलाता है, वैसा ही पुत्र भी जिन्हें चाहता है उन्हें जिलाता है।

यूहन्ना 5:22 और पिता किसी का न्याय भी नहीं करता, परन्तु न्याय करने का सब काम पुत्र को सौंप दिया है।

यूहन्ना 5:23 इसलिये कि सब लोग जैसे पिता का आदर करते हैं वैसे ही पुत्र का भी आदर करें: जो पुत्र का आदर नहीं करता, वह पिता का जिसने उसे भेजा है, आदर नहीं करता।     

 

एक साल में बाइबल: 

  • अय्यूब 34-35
  • प्रेरितों 15:1-21


शनिवार, 21 सितंबर 2019

प्रार्थना



      गायक तथा गीत लेखक रॉबर्ट हैमलेट ने “The Lady Who Prays for Me” गाना अपनी माँ के सम्मान में लिखा, जिनका यह नियम था कि प्रति-प्रातः वे अपने बच्चों के लिए, उनके बस स्टॉप पर जाने से पहले, प्रार्थना अवश्य करती थीं। जब एक जवान माँ ने हैमलेट को यह गाना गाते हुए सुना, उन्होंने भी अपने बेटे के साथ प्रार्थना करने का निर्णय किया। इसका परिणाम हृदयस्पर्शी था! उसके बेटे के द्वार से बाहर निकलने से पहले उसकी माँ ने उसके साथ प्रार्थना की। पाँच मिनिट के बाद ही उनका बेटा बस स्टॉप से लौट कर आ गया, और उसके साथ बस स्टॉप से कुछ और बच्चे भी आए! उसकी माँ चकित हो गई, और पूछा कि “क्या हुआ”; तो बेटे ने उत्तर दिया, “इनकी माताओं ने इनके साथ प्रार्थना नहीं की।”

      परमेश्वर के वचन बाइबल में इफिसुस के मसीही विश्वासियों को लिखी अपनी पत्री में पौलुस ने सभी से प्रार्थना करने का आग्रह किया, “हर समय, और हर प्रकार से” (6:18)। प्रतिदिन परमेश्वर पर निर्भरता को दिखाना परिवार के लिए अनिवार्य है क्योंकि अनेकों बच्चे परमेश्वर पर भरोसा करना तब ही सीखते हैं जब वे उनके निकट के लोगों में सच्चा विश्वास देखते हैं (2 तिमुथियुस 1:5)। प्रार्थना के अत्यंतावश्यक महत्व को सिखाने का इससे बेहतर और कोई मार्ग नहीं है, कि बच्चों के साथ और उनके लिए प्रार्थना की जाए। यह उन्हें व्यक्तिगत रीति से प्रत्येक आवश्यकता के लिए परमेश्वर की ओर बढ़ने की अनिवार्यता को समझाने का एक तरीका है।

      जब हम बच्चों को परमेश्वर के मार्ग पर डालते हैं, उनके समक्ष एक वास्तविक विश्वास का नमूना रखने के द्वारा (नीतिवचन 22:6; 2 तिमुथियुस 1:5), तो हम उन्हें एक विशेष उपहार देते हैं; यह आश्वासन कि परमेश्वर हमारे जीवनों का अभिन्न अंग है, और सदैव हमारे साथ बना रहता है, हमसे सदा प्रेम करता है, हमारा मार्गदर्शन करता है, और हमें सुरक्षा प्रदान करता है। - सिंडी हैस कैस्पर

दैनिक प्रार्थना प्रतिदिन की चिंताओं को कम कर देती है।

लड़के को शिक्षा उसी मार्ग की दे जिस में उसको चलना चाहिये, और वह बुढ़ापे में भी उस से न हटेगा। - नीतिवचन 22:6

बाइबल पाठ: इफिसियों 6:18-19
Ephesians 6:18 और हर समय और हर प्रकार से आत्मा में प्रार्थना, और बिनती करते रहो, और इसी लिये जागते रहो, कि सब पवित्र लोगों के लिये लगातार बिनती किया करो।
Ephesians 6:19 और मेरे लिये भी, कि मुझे बोलने के समय ऐसा प्रबल वचन दिया जाए, कि मैं हियाव से सुसमाचार का भेद बता सकूं जिस के लिये मैं जंजीर से जकड़ा हुआ राजदूत हूं।

एक साल में बाइबल: 
  • सभोपदेशक 7-9
  • 2 कुरिन्थियों 13



बुधवार, 4 सितंबर 2019

निर्भर



      हम हमारे घर के निकट एक नदी के किनारे पैदल घूमने के लिए अपने पड़ौसियों के साथ निकले थे। एक युवक एलन ने पूछा, “क्या मार्ग में हमें साँप भी मिलेंगे?” मैंने उत्तर दिया, “अभी तक तो हमें कभी भी नहीं मिले हैं; परन्तु संभावना तो है! इसलिए चलो हम परमेश्वर से प्रार्थना करके ही आगे चलते हैं कि वह हमें सुरक्षित रखे।” हम रुके, हमने प्रार्थना की, और फिर आगे चलने लगे। कुछ ही मिनिट चलने के बाद अचानक ही मेरी पत्नि कैरी ने अपने कदम रोके और वह पीछे हट गई। वहाँ मार्ग पर एक ज़हरीला साँप कुंडली मारे पड़ा था उर कैरी का पाँव उस पर पड़ने ही वाला था। हम वहीं रुक गए, और वह साँप मार्ग से हटकर चला गया। हमने फिर से रुक कर परमेश्वर का धन्यवाद किया कि किसी को कोई हानि नहीं हुई। मेरा विश्वास है कि एलन के प्रश्न द्वारा परमेश्वर ने हमें सचेत किया था कि हम इस घटना के लिए तैयार हो जाएँ, परमेश्वर से सामर्थ्य प्राप्त कर लें, और हमारा प्रार्थना करना उस पर हमारे निर्भर होने के द्वारा सुरक्षित हो जाने का एक भाग था।

      उस संध्या को हमारा खतरे का सामना करना, मेरे मन में परमेश्वर के वचन बाइबल में लिखे दाऊद के वचनों : “यहोवा और उसकी सामर्थ की खोज करो; उसके दर्शन के लिये लगातार खोज करो” (1 इतिहास 16:11) के महत्व को प्रत्यक्ष करता है। दाऊद द्वारा कही गई यह बात उस भजन का एक भाग है जो उसने वाचा के सन्दूक के यरूशलेम लाए जाने के समय कहा था। उसके इस भजन में परमेश्वर की, उसके लोगों के प्रति विश्वासयोग्यता का वर्णन किया गया है – उनका इतिहास गवाह है कि जब-जब भी परमेश्वर के लोग संघर्षों में आए हैं, परमेश्वर उनके प्रति विश्वासयोग्य रहा है। इसलिए दाऊद कहता है कि वे लोग सदा परमेश्वर की स्तुति करें, और उसे पुकारते रहें (पद 35)।

      परमेश्वर के दर्शन के लिए उसके खोजी होने का क्या अर्थ है? इसका अर्थ होता है कि जीवन के सर्वाधिक साधारण प्रतीत होने वाले पलों में भी हम अपने मन उसकी ओर लगाएँ। हो सकता है कि हमारी प्रार्थनाओं का उत्तर उससे भिन्न हो जैसी हमने अपेक्षा की थी, परन्तु जो भी हो परमेश्वर सदा ही विश्वासयोग्य रहता है। हमारा अच्छा चरवाहा हमारा मार्गदर्शन करेगा और हमें अपनी करुणा, सामर्थ्य, और प्रेम में बनाए रखेगा। हम सदा उस पर निर्भर बने रह सकते हैं। - जेम्स बैंक्स


प्रार्थना सामर्थ्य प्रदान करती है कि मूर्छित हुए बिना चलते रहें। - ओसवौल्ड चेंबर्स

प्रार्थना में लगे रहो, और धन्यवाद के साथ उस में जागृत रहो। - कुलुस्सियों 4:2

बाइबल पाठ: 1 इतिहास 16:11-18, 28-36
1 Chronicles 16:11 यहोवा और उसकी सामर्थ की खोज करो; उसके दर्शन के लिये लगातार खोज करो।
1 Chronicles 16:12 उसके किए हुए आश्चर्यकर्म, उसके चमत्कार और न्यायवचन स्मरण करो।
1 Chronicles 16:13 हे उसके दास इस्राएल के वंश, हे याकूब की सन्तान तुम जो उसके चुने हुए हो!
1 Chronicles 16:14 वही हमारा परमेश्वर यहोवा है, उसके न्याय के काम पृथ्वी भर में होते हैं।
1 Chronicles 16:15 उसकी वाचा को सदा स्मरण रखो, यह वही वचन है जो उसने हजार पीढिय़ों के  लिये ठहरा दिया।
1 Chronicles 16:16 वह वाचा उसने इब्राहीम के साथ बान्धी, उौर उसी के विषय उसने इसहाक से शपथ खाई,
1 Chronicles 16:17 और उसी को उसने याकूब के लिये विधि कर के और इस्राएल के लिये सदा की वाचा बान्ध कर यह कह कर दृढ़ किया, कि
1 Chronicles 16:18 मैं कनान देश तुझी को दूंगा, वह बांट में तुम्हारा निज भाग होगा।
1 Chronicles 16:28 हे देश देश के कुलों, यहोवा का गुणानुवाद करो,
1 Chronicles 16:29 यहोवा की महिमा और सामर्थ को मानो। यहोवा के नाम की महिमा ऐसी मानो जो उसके नाम के योग्य है। भेंट ले कर उसके सम्मुख आाओ, पवित्रता से शोभायमान हो कर यहोवा को दण्डवत करो।
1 Chronicles 16:30 हे सारी पृथ्वी के लोगो उसके साम्हने थरथराओ! जगत ऐसा स्थिर है, कि वह टलने का नहीं।
1 Chronicles 16:31 आकाश आनन्द करे और पृथ्वी मगन हो, और जाति जाति में लोग कहें, कि यहोवा राजा हुआ है।
1 Chronicles 16:32 समुद्र और उस में की सब वस्तुएं गरज उठें, मैदान और जो कुछ उस में है सो प्रफुल्लित हों।
1 Chronicles 16:33 उसी समय वन के वृक्ष यहोवा के साम्हने जयजयकार करें, क्योंकि वह पृथ्वी का न्याय करने को आने वाला है।
1 Chronicles 16:34 यहोवा का धन्यवाद करो, क्योंकि वह भला है; उसकी करुणा सदा की है।
1 Chronicles 16:35 और यह कहो, कि हे हमारे उद्धार करने वाले परमेश्वर हमारा उद्धार कर, और हम को इकट्ठा कर के अन्यजातियों से छुड़ा, कि हम तेरे पवित्र नाम का धन्यवाद करें, और तेरी स्तुति करते हुए तेरे विषय बड़ाई करें।
1 Chronicles 16:36 अनादिकाल से अनन्तकाल तक इस्राएल का परमेश्वर यहोवा धन्य है। तब सब प्रजा ने आमीन कहा: और यहोवा की स्तुति की।

एक साल में बाइबल: 
  • भजन 143-145
  • 1 कुरिन्थियों 14:21-40



शुक्रवार, 22 जून 2018

प्रावधान



      ट्रिस्टान डा कुन्हा द्वीप अपनी भौगोलिक स्थिति और एकान्तता के लिए प्रसिद्ध है। उसपर निवास करने वाले 288 लोगों के कारण, वह विश्व का सबसे दूरस्त बसा हुआ द्वीप है। यह द्वीप दक्षिणी अटलांटिक महासागर में, दक्षिणी अफ्रीका से 1,750 मील दूर स्थित है, जो इससे निकटतम भूभाग है, और यदि किसी को वहाँ जाना हो तो उसे नाव से सात दिन की यात्रा करनी पड़ेगी, क्योंकि उस द्वीप पर कोई हवाई-पट्टी नहीं है।

      प्रभु यीशु मसीह और उसके अनुयायी एक एकांत स्थल पर थे जब प्रभु ने हज़ारों भूखे लोगों के लिए आश्चर्यकर्म द्वारा भोजन का प्रावधान किया। यह आश्चर्यकर्म करने से पहले प्रभु ने अपने अनुयायियों से कहा, “मुझे इस भीड़ पर तरस आता है, क्योंकि यह तीन दिन से बराबर मेरे साथ हैं, और उन के पास कुछ भी खाने को नहीं। यदि मैं उन्हें भूखा घर भेज दूं, तो मार्ग में थक कर रह जाएंगे; क्योंकि इन में से कोई कोई दूर से आए हैं” (मरकुस 8:2-3)। क्योंकि वे निर्जन स्थान में थे जहाँ भोजन सरलता से उपलब्ध नहीं था, इसलिए उन्हें पूर्णतः प्रभु यीशु पर निर्भर होना था। उनके पास और कोई विकल्प नहीं था।

      कभी-कभी परमेश्वर हमें ऐसे सुनसान स्थानों में आ लेने देता है जहाँ केवल वह ही हमारी सहायता हो सकता है। उसके द्वारा हमारी आवश्यकताओं की पूर्ति होना हमारी परिस्थितयों पर निर्भर नहीं है। यदि परमेश्वर इस सृष्टि को ‘कुछ नहीं’ से बना सकता है तो निश्चय ही वह हमारी प्रत्येक आवश्यकता को भी पूरा कर सकता है, हमारी परिस्थिति चाहे कैसी भी हो। परमेश्वर अपनी महिमा के धन के अनुसार प्रभु यीशु में होकर, सदा हमारे लिए प्रावधान कर सकता है। - जेनिफर बेन्सन शुल्ट


हम भरोसा रख सकते हैं कि परमेश्वर वह कर सकता है जो हम नहीं कर सकते हैं।

और मेरा परमेश्वर भी अपने उस धन के अनुसार जो महिमा सहित मसीह यीशु में है तुम्हारी हर एक घटी को पूरी करेगा। - फिलिप्पियों 4:19

बाइबल पाठ: मरकुस 8:1-13
Mark 8:1 उन दिनों में, जब फिर बड़ी भीड़ इकट्ठी हुई, और उन के पास कुछ खाने को न था, तो उसने अपने चेलों को पास बुलाकर उन से कहा।
Mark 8:2 मुझे इस भीड़ पर तरस आता है, क्योंकि यह तीन दिन से बराबर मेरे साथ हैं, और उन के पास कुछ भी खाने को नहीं।
Mark 8:3 यदि मैं उन्हें भूखा घर भेज दूं, तो मार्ग में थक कर रह जाएंगे; क्योंकि इन में से कोई कोई दूर से आए हैं।
Mark 8:4 उसके चेलों ने उसको उत्तर दिया, कि यहां जंगल में इतनी रोटी कोई कहां से लाए कि ये तृप्‍त हों?
Mark 8:5 उसने उन से पूछा; तुम्हारे पास कितनी रोटियां हैं? उन्होंने कहा, सात।
Mark 8:6 तब उसने लोगों को भूमि पर बैठने की आज्ञा दी, और वे सात रोटियां लीं, और धन्यवाद कर के तोड़ीं, और अपने चेलों को देता गया कि उन के आगे रखें, और उन्होंने लोगों के आगे परोस दिया
Mark 8:7 उन के पास थोड़ी सी छोटी मछिलयां भी थीं; और उसने धन्यवाद कर के उन्हें भी लोगों के आगे रखने की आज्ञा दी।
Mark 8:8 सो वे खाकर तृप्‍त हो गए और शेष टृकड़ों के सात टोकरे भरकर उठाए।
Mark 8:9 और लोग चार हजार के लगभग थे; और उसने उन को विदा किया।
Mark 8:10 और वह तुरन्त अपने चेलों के साथ नाव पर चढ़कर दलमनूता देश को चला गया।
Mark 8:11 फिर फरीसी निकलकर उस से वाद-विवाद करने लगे, और उसे जांचने के लिये उस से कोई स्‍वर्गीय चिन्ह मांगा।
Mark 8:12 उसने अपनी आत्मा में आह मार कर कहा, इस समय के लोग क्यों चिन्‍ह ढूंढ़ते हैं? मैं तुम से सच कहता हूं, कि इस समय के लोगों को कोई चिन्ह नहीं दिया जाएगा।
Mark 8:13 और वह उन्हें छोड़कर फिर नाव पर चढ़ गया और पार चला गया।
                                                 

एक साल में बाइबल: 
  • एस्तेर 6-8
  • प्रेरितों 6



शुक्रवार, 17 नवंबर 2017

निर्भर


   मेरी बेटी का ऑपरेशन हुआ था, और ऑपरेशन के पश्चात मैं उसके पास बैठी हुई थी। जब उसे होश आया और उसने आँखें खोलीं, तो साथ ही उसे यह आभास भी हुआ कि वह कष्ट में है और वह रोने लगी। मैंने उसकी बाहें सहलाने के द्वारा उसे निश्चिंत करना चाहा, परन्तु वह और व्याकुल हो गई। फिर नर्स की सहायाता से मैंने उसे अपनी गोदी में लिया, उसके गालों से आँसू पोंछे, और उससे प्रेम के साथ बात करनी लगी, उसे समझाया कि शीघ्र ही वह बेहतर अनुभव करने लगेगी।

   परमेश्वर ने अपने वचन बाइबल में यशायाह भविष्यद्वकता में होकर अपने लोगों, इस्त्राएलियों, को स्मरण कराया कि "जिस प्रकार माता अपने पुत्र को शान्ति देती है, वैस ही मैं भी तुम्हें शान्ति दूंगा" (यशायाह 66:13)। परमेश्वर ने वायदा किया कि वह उन्हें शान्ति देगा और अपनी गोद में ऐसे लिए चलेगा, जैसे एक माँ अपने बच्चे को गोदी में लिए चलती है। परमेश्वर की ओर से यह प्रेम भरा सन्देश उसके उन लोगों के लिए था जो उसके प्रति श्रद्धा रखते थे।

   अपने लोगों को सांत्वना देने की परमेश्वर की इच्छा और सामर्थ्य पौलुस द्वारा कुरिन्थियों को लिखी दूसरी पत्री में फिर प्रकट होती है। पौलुस ने लिखा कि "वह हमारे सब क्‍लेशों में शान्‍ति देता है; ताकि हम उस शान्‍ति के कारण जो परमेश्वर हमें देता है, उन्हें भी शान्‍ति दे सकें, जो किसी प्रकार के क्‍लेश में हों" (2 कुरिन्थियों 1:4)। हमारी परेशानियों में परमेश्वर हमारे साथ कोमल और सहानुभूतिपूर्ण होता है। एक दिन हमारी सारी परेशानियों का अन्त हो जाएगा, हमारे सभी आँसू सदा के लिए पोंछ डाले जाएंगे और हम अनन्तकाल तक परमेश्वर के साथ रहेंगे (प्रकशितवाक्य 21:3-4)। उस दिन के आने तक हम परमेश्वर पर निर्भर रह सकते हैं कि वह हमसे प्रेम और सहायता का व्यवहार बनाए रखेगा, हमें अपनी शान्ति में रखेगा। - जेनिफर बेन्सन शुल्ट


परमेश्वर अपने लोगों को सांत्वना और शान्ति देता है।

फिर मैं ने सिंहासन में से किसी को ऊंचे शब्द से यह कहते सुना, कि देख, परमेश्वर का डेरा मनुष्यों के बीच में है; वह उन के साथ डेरा करेगा, और वे उसके लोग होंगे, और परमेश्वर आप उन के साथ रहेगा; और उन का परमेश्वर होगा। और वह उन की आंखों से सब आंसू पोंछ डालेगा; और इस के बाद मृत्यु न रहेगी, और न शोक, न विलाप, न पीड़ा रहेगी; पहिली बातें जाती रहीं। - प्रकशितवाक्य 21:3-4

बाइबल पाठ: यशायाह 66:5-13
Isaiah 66:5 तुम्हारे भाई जो तुम से बैर रखते और मेरे नाम के निमित्त तुम को अलग कर देते हैं उन्होंने कहा है, यहोवा की महिमा तो बढ़े, जिस से हम तुम्हारा आनन्द देखते पाएं; परन्तु उन्हीं को लज्जित होना पड़ेगा।
Isaiah 66:6 सुनो, नगर से कोलाहल की धूम, मन्दिर से एक शब्द, सुनाई देता है! वह यहोवा का शब्द है, वह अपने शत्रुओं को उनकी करनी का फल दे रहा है! 
Isaiah 66:7 उसकी पीड़ाएं उठाने से पहले ही उसने जन्मा दिया; उसको पीड़ाएं होने से पहिले ही उस से बेटा जन्मा। 
Isaiah 66:8 ऐसी बात किस ने कभी सुनी? किस ने कभी ऐसी बातें देखी? क्या देश एक ही दिन में उत्पन्न हो सकता है? क्या एक जाति क्षण मात्र में ही उत्पन्न हो सकती है? क्योंकि सिय्योन की पीड़ाएं उठी ही थीं कि उस से सन्तान उत्पन्न हो गए। 
Isaiah 66:9 यहोवा कहता है, क्या मैं उसे जन्माने के समय तक पहुंचाकर न जन्माऊं? तेरा परमेश्वर कहता है, मैं जो गर्भ देता हूं क्या मैं कोख बन्द करूं? 
Isaiah 66:10 हे यरूशलेम से सब प्रेम रखने वालो, उसके साथ आनन्द करो और उसके कारण मगन हो; हे उसके विषय सब विलाप करने वालो उसके साथ हषिर्त हो! 
Isaiah 66:11 जिस से तुम उसके शान्तिरूपी स्तन से दूध पी पीकर तृप्त हो; और दूध पीकर उसकी महिमा की बहुतायत से अत्यन्त सुखी हो।
Isaiah 66:12 क्योंकि यहोवा यों कहता है, देखो, मैं उसकी ओर शान्ति को नदी के समान, और अन्यजातियों के धन को नदी की बाढ़ के समान बहा दूंगा; और तुम उस से पीओगे, तुम उसकी गोद में उठाए जाओगे और उसके घुटनों पर कुदाए जाओगे। 
Isaiah 66:13 जिस प्रकार माता अपने पुत्र को शान्ति देती है, वैस ही मैं भी तुम्हें शान्ति दुंगा; तुम को यरूशलेम ही में शान्ति मिलेगी।

एक साल में बाइबल: 
  • यहेजकेल 5-7
  • इब्रानियों 12


शुक्रवार, 9 जून 2017

आभारी तथा निर्भर


   अपनी पुस्तक The Hidden Brain में विज्ञान लेखक शंकर वेदान्तम ने अपना एक अनुभव बताया है; वह एक दिन आराम से तैरने के लिए गए। पानी शान्त और साफ था, और थोड़े समय में ही लंबी दूरी तक तैर पाने के कारण उसे अपने आप पर बहुत गर्व हुआ, उसे प्रतीत हुआ कि वह बहुत बलवान है। इसलिए उसने निर्णय किया कि वह खाड़ी से निकलकर खुले पानी में तैरेगा। आगे खुले पानी में तैरते जाने में उसे कोई कठिनाई नहीं हुई, परन्तु जब उसने वापस लौटना चाहा तो उसने पाया कि वह भरसक प्रयास के बावजूद किनारे के निकट आने नहीं पा रहा था। वास्तव में पानी के बहाव से उसे धोखा हुआ था; उसके कम समय में लंबी दूरी तय कर लेने का कारण उसकी अपनी सामर्थ नहीं वरन पानी का बहाव था जो उसे उस दिशा में लिए चला जा रहा था, और अब विपरीत दिशा में वह उस बहाव से बाहर नहीं निकल पा रहा था।

   परमेश्वर के साथ हमारे संबंधों में भी ऐसा ही कुछ हो सकता है। जीवन के बहाव के साथ हम आगे बढ़ते हुए कहीं भी पहुँच सकते हैं। जब जीवन सरल होता है तो हम सोचने लगते हैं कि हमारी उपलब्धियाँ और सफलताएं हमारी अपनी योग्यता और सामर्थ के कारण हैं। इससे हमारे अन्दर घमंड और अपने ऊपर अनुचित आत्मविश्वास उत्पन्न होने लगता है। लेकिन अपनी वास्तविकता और निःसहाय होने का आभास हमें तब होता है जब कोई विपरीत परिस्थिति या परेशानी हमें घेर लेती है, और उन से निकल पाने के हमारे प्रयास असफल होने लगते हैं।

   हम देखते हैं कि परमेश्वर के वचन बाइबल में दर्ज इस्त्राएल के इतिहास में यही बात इस्त्राएलियों के साथ बारंबार हुई। परमेश्वर उन्हें अपनी आशीषों, शान्ति, समृध्दि और सैनिक सफलता देता, परन्तु कुछ ही समय बाद वे यह समझने लगते कि यह सब वे अपनी सामर्थ्य और योग्यता के कारण प्राप्त कर रहे हैं, और वे घमंडी तथा आत्मविश्वासी हो जाते (व्यवस्थाविवरण 8:11-12)। ऐसे में उन्हें लगता कि अब उन्हें परमेश्वर की आवश्यकता नहीं है, और वे परमेश्वर का मार्ग छोड़कर अपने ही मार्ग ले लेते। परन्तु जब भी कोई शत्रु उन पर हमला करता था, तब उन्हें पता चलता था कि उनकी वास्तविक स्थिति क्या है, और परमेश्वर की सहायता के बिना वे कितने असहाय हैं।

   जब जीवन आराम से चल रहा होता है, तब ही वह समय होता है जिसमें हमें अनुचित आत्मविश्वास के धोखे में पड़ने से बचना चाहिए और ध्यान रखना चाहिए कि कहीं घमंड के कारण हम सही मार्ग से भटकने तो नहीं लगे हैं। केवल नम्रता और दीनता तथा परमेश्वर के वचन की आज्ञकारिता ही हमें ऐसे में सुरक्षित तथा सही मार्ग पर बनाए रखेगी। अपनी सभी आशीषों, सफलताओं तथा समृध्दि के लिए हमें सदा परमेश्वर का आभारी और केवल उसकी सामर्थ्य तथा मार्गदर्शन पर निर्भर रहना चाहिए। - जूली ऐकैरमैन लिंक


सच्ची दीनता हर उपलब्धि का श्रेय परमेश्वर को देती है।

क्योंकि वे न तो अपनी तलवार के बल से इस देश के अधिकारी हुए, और न अपने बाहुबल से; परन्तु तेरे दाहिने हाथ और तेरी भुजा और तेरे प्रसन्न मुख के कारण जयवन्त हुए; क्योंकि तू उन को चाहता था। - भजन 44:3

बाइबल पाठ: व्यवस्थाविवरण 8:6-20
Deuteronomy 8:6 इसलिये अपने परमेश्वर यहोवा की आज्ञाओं का पालन करते हुए उसके मार्गों पर चलना, और उसका भय मानते रहना। 
Deuteronomy 8:7 क्योंकि तेरा परमेश्वर यहोवा तुझे एक उत्तम देश में लिये जा रहा है, जो जल की नदियों का, और तराइयों और पहाड़ों से निकले हुए गहिरे गहिरे सोतों का देश है। 
Deuteronomy 8:8 फिर वह गेहूं, जौ, दाखलताओं, अंजीरों, और अनारों का देश है; और तेलवाली जलपाई और मधु का भी देश है। 
Deuteronomy 8:9 उस देश में अन्न की महंगी न होगी, और न उस में तुझे किसी पदार्थ की घटी होगी; वहां के पत्थर लोहे के हैं, और वहां के पहाड़ों में से तू तांबा खोदकर निकाल सकेगा। 
Deuteronomy 8:10 और तू पेट भर खाएगा, और उस उत्तम देश के कारण जो तेरा परमेश्वर यहोवा तुझे देगा उसका धन्य मानेगा। 
Deuteronomy 8:11 इसलिये सावधान रहना, कहीं ऐसा न हो कि अपने परमेश्वर यहोवा को भूलकर उसकी जो जो आज्ञा, नियम, और विधि, मैं आज तुझे सुनाता हूं उनका मानना छोड़ दे; 
Deuteronomy 8:12 ऐसा न हो कि जब तू खाकर तृप्त हो, और अच्छे अच्छे घर बनाकर उन में रहने लगे, 
Deuteronomy 8:13 और तेरी गाय-बैलों और भेड़-बकरियों की बढ़ती हो, और तेरा सोना, चांदी, और तेरा सब प्रकार का धन बढ़ जाए, 
Deuteronomy 8:14 तब तेरे मन में अहंकार समा जाए, और तू अपने परमेश्वर यहोवा को भूल जाए, जो तुझ को दासत्व के घर अर्थात मिस्र देश से निकाल लाया है, 
Deuteronomy 8:15 और उस बड़े और भयानक जंगल में से ले आया है, जहां तेज विष वाले सर्प और बिच्छू हैं, और जलरहित सूखे देश में उसने तेरे लिये चकमक की चट्ठान से जल निकाला, 
Deuteronomy 8:16 और तुझे जंगल में मन्ना खिलाया, जिसे तुम्हारे पुरखा जानते भी न थे, इसलिये कि वह तुझे नम्र बनाए, और तेरी परीक्षा कर के अन्त में तेरा भला ही करे। 
Deuteronomy 8:17 और कहीं ऐसा न हो कि तू सोचने लगे, कि यह सम्पत्ति मेरे ही सामर्थ्य और मेरे ही भुजबल से मुझे प्राप्त हुई। 
Deuteronomy 8:18 परन्तु तू अपने परमेश्वर यहोवा को स्मरण रखना, क्योंकि वही है जो तुझे सम्पति प्राप्त करने का सामर्थ्य इसलिये देता है, कि जो वाचा उसने तेरे पूर्वजों से शपथ खाकर बान्धी थी उसको पूरा करे, जैसा आज प्रगट है। 
Deuteronomy 8:19 यदि तू अपने परमेश्वर यहोवा को भूलकर दूसरे देवताओं के पीछे हो लेगा, और उसकी उपासना और उन को दण्डवत करेगा, तो मैं आज तुम को चिता देता हूं कि तुम नि:सन्देह नष्ट हो जाओगे। 
Deuteronomy 8:20 जिन जातियों को यहोवा तुम्हारे सम्मुख से नष्ट करने पर है, उन्ही की नाईं तुम भी अपने परमेश्वर यहोवा का वचन न मानने के कारण नष्ट हो जाओगे। 

एक साल में बाइबल: 
  • 2 इतिहास 32-33
  • यूहन्ना 18:19-40