ई-मेल संपर्क / E-Mail Contact

इन संदेशों को ई-मेल से प्राप्त करने के लिए अपना ई-मेल पता इस ई-मेल पर भेजें : rozkiroti@gmail.com / To Receive these messages by e-mail, please send your e-mail id to: rozkiroti@gmail.com

सोमवार, 13 दिसंबर 2021

मसीही सेवकाई और पवित्र आत्मा के वरदान - 11

  

आत्मिक वरदानों का प्रयोग 

       पिछले लेख में हम 1 कुरिन्थियों 12:7-11 से देख चुके हैं कि परमेश्वर पवित्र आत्मा के द्वारा दिए जाने वाले सभी वरदान किसी के निजी प्रयोग अथवा लाभ के लिए नहीं, वरन मसीही विश्वासियों की मण्डली की उन्नति और परमेश्वर के सुसमाचार के प्रचार तथा प्रसार के लिए हैं। इन वरदानों में आश्चर्यकर्म करने और अन्य भाषाएं बोलने तथा उन भाषाओं का अनुवाद करने के वरदान भी सम्मिलित हैं; और इनके संदर्भ में भी हमने देखा है कि ये भी, यदि उचित रीति से समझे तथा प्रयोग किए जाएं तो पद 7 के अनुसार और अन्य वरदानों के समान ही, सभी की भलाई के लिए दिए गए हैं। पद 11 में आत्मिक वरदानों के उपयोग के विषय दो बहुत महत्वपूर्ण बातें कही गई हैं, जिन्हें आत्मिक वरदानों का उपयोग करने के लिए समझना और ध्यान में रखना अनिवार्य है। ये दो बातें हैं (1) आत्मिक वरदानों का सदुपयोग परमेश्वर पवित्र आत्मा ही करवाता है; (2) हर मसीही विश्वासी को सभी आत्मिक वरदान परमेश्वर पवित्र आत्मा अपनी ओर से प्रदान करता है। 

यहाँ कही गई दूसरी बात के बारे में हम पहले भी देख चुके हैं कि परमेश्वर द्वारा हर एक मसीही विश्वासी के लिए निर्धारित सेवकाई (इफिसियों 2:10) के अनुसार, उसके सुचारु रीति से निर्वाह के लिए, पवित्र आत्मा व्यक्ति को उस सेवकाई के लिए आवश्यक एवं उपयुक्त वरदान देता है। क्योंकि ये सेवकाई परमेश्वर ने निर्धारित की है, औरपहले सेही निर्धारित कर रखी है, अर्थात यह परमेश्वर की सार्वभौमिक इच्छा एवं योजना के अनुसार है, इसलिए इसका ताल-मेल औरों की सेवकाइयों तथा व्यक्ति के लिए निर्धारित योजनाओं और कार्यों के साथ भी अवश्य होगा। इस कारण से किसी मनुष्य के द्वारा इसे बदलना संभव नहीं है। और हम पहले भी देख चुके हैं कि बाइबल में भी स्पष्ट उदाहरण हैं कि जिसके लिए परमेश्वर ने जो निर्धारित किया है, उसे ही वह कार्य, वह सेवकाई निभानी पड़ी; अपनी अनिच्छा या अयोग्यता आदि जताने के द्वारा कोई अपनी सेवकाई से हट नहीं सका, उसे बदलवा नहीं सका। साथ ही हम इस अध्याय के पद 31 (जिसका उपयोग पवित्र आत्मा से संबंधित गलत शिक्षाएं फैलाने वाले मन-चाहे वरदान मांगने और प्राप्त करने को सही ठहराने के लिए करते हैं), के बारे में भी देख चुके हैं कि यह पद केवलधुन में रहनेके लिए कह रहा है, किन्तु इसका कोई आश्वासन नहीं दे रहा है कि उस व्यक्ति की वहधुनपूरी भी की जाएगी। साथ ही, इस पद को उसके संदर्भ में देखने और समझने से यह प्रकट है कि यह मण्डली में अधिक से अधिक उपयोगी होने के अभिप्राय से कहा गया है, आत्मिक वरदान बदलवाने के लिए नहीं। 

इसी प्रकार से पद 11 में कही गई पहली बात, आत्मिक वरदानों का सदुपयोग परमेश्वर पवित्र आत्मा ही करवाता है, के भी कुछ बहुत महत्वपूर्ण निष्कर्ष हैं। हम परमेश्वर पवित्र आत्मा के बारे में यूहन्ना 16:12-13 से पहले देख चुके हैं कि वहसत्य का आत्माहै जो प्रभु के शिष्यों को केवल सत्य का मार्ग बताता है, और अपनी ओर से कुछ नहीं कहता है, केवल वही कहता है जो वह प्रभु परमेश्वर से सुनता है। इसलिए यह संभव ही नहीं है कि मनुष्यों की इच्छा के अनुसार परमेश्वर पवित्र आत्मा उनकी सेवकाई या वरदानों में कोई परिवर्तन करे। मसीही विश्वासियों को पवित्र आत्मा दिए जाने का उद्देश्य उनकी सेवकाई और मसीही जीवन में उनकी सहायता करना, और उन्हें सही मार्ग पर चलाना है, न कि उनकी इच्छाओं के अनुसार फेर-बदल करते रहना। त्रिएक परमेश्वर का कोई भी स्वरूप मनुष्यों के हाथों की कठपुतली नहीं है कि व्यक्ति उन्हें अपनी इच्छा के अनुसार नचाता रहे। जबकि पवित्र आत्मा के नाम से गलत शिक्षाएं देने वालों की बातों में अधिकांशतः परमेश्वर को अपनी इच्छा के अनुसार प्रयोग करने के प्रयास होते हैं। और अपनी इच्छा-पूर्ति को भक्ति के भेष में प्रस्तुत करने के लिए वे नाटकीय प्रार्थनाओं को भी इसके लिए सम्मिलित कर लेते हैं, किन्तु मूल बात परमेश्वर की निर्धारित इच्छा के स्थान पर अपनी पसंद-नापसंद को लागू करवाने के प्रयास रहते हैं। इसकी तुलना में, जब हम सुसमाचारों में प्रभु यीशु मसीह के, तथा पत्रियों में प्रेरितों और प्रभु के शिष्यों के प्रार्थना के जीवन को देखते हैं, तो न तो उन्होंने कभी कोई नाटकीय प्रार्थनाएं कीं, न कोई नाटकीय प्रचार किए। प्रभु यीशु ने तो सदा ही एकांत में प्रार्थना के द्वारा हर बात के लिए पहले परमेश्वर पिता की इच्छा को पता किया, और फिर उस इच्छा को ही पूरा किया; अपनी इच्छा को परमेश्वर की इच्छा पर हावी कभी नहीं किया। यहाँ तक कि पकड़वाए जाने से पहले, गतसमनी के बाग में की गई प्रार्थना में भी प्रभु ने अपनी इच्छा व्यक्त अवश्य की, किन्तु किया वही जो परमेश्वर ने उनके लिए निर्धारित किया हुआ था। 

यदि आप मसीही विश्वासी हैं, तो आपके लिए भी अपने मसीही जीवन और सेवकाई के सही निर्वाह के लिए इन बातों को समझना और पालन करना बहुत आवश्यक है कि परमेश्वर पवित्र आत्मा न तो अपनी ओर से कुछ कहेगा, और न करेगा; वह केवल वही कहेगा और करेगा जो प्रभु परमेश्वर द्वारा निर्धारित किया हुआ है। पवित्र आत्मासत्य का आत्माहै; इसलिए ऐसी प्रत्येक बात, ऐसा प्रत्येक व्यवहार, ऐसी प्रत्येक प्रार्थना या निवेदन जो परमेश्वर के वचन के अनुसार, उसके अनुरूप नहीं है, उससेसत्य के आत्माअर्थात परमेश्वर पवित्र आत्मा का कोई संबंध, कोई लेना-देना नहीं है। जो कुछ भी वचन के बाहर का है, वह असत्य है, परमेश्वर की ओर से नहीं है, और पवित्र आत्मा उसमें किसी के भी साथ कदापि नहीं होगा, लेश-मात्र भी नहीं। इसलिए अपने मसीही जीवन और अपनी मसीही सेवकाई को वचन के अनुसार और अनुरूप बनाइए; परमेश्वर द्वारा आपके लिए निर्धारित सेवकाई को पूरा करने के प्रयास में रहिए, तब ही परमेश्वर पवित्र आत्मा की सामर्थ्य और कार्य आपके जीवन को, तथा आप में होकर अन्य लोगों को, मण्डली को लाभान्वित करेंगे, उन्नत करेंगे। 

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी। 

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • होशे 12-14    
  • प्रकाशितवाक्य 4

रविवार, 12 दिसंबर 2021

मसीही सेवकाई और पवित्र आत्मा के वरदान - 10

 आत्मिक वरदान - उनके प्रकार तथा उनका विश्लेषण (2)


पिछले लेख में हमने 1 कुरिन्थियों 12:7-11 में दिए गए आत्मिक वरदानों को देखना आरंभ किया था। यहाँ दिए गए 9 विभिन्न वरदानों:बुद्धि का बातें”; “ज्ञान की बातें”; “विश्वास”; “चंगा करने का वरदान”; “सामर्थ्य के काम करने की शक्ति”; “भविष्यवाणी करने की शक्ति”; “आत्माओं की परख”; “अनेक प्रकार की भाषा”; “भाषाओं का अर्थ बतानामें से हमने पहले पाँच के बारे में देखा था। साथ ही हमने यह भी देखा था कि पवित्र आत्मा के सभी वरदान किसी के निज प्रयोग अथवा लाभ के लिए नहीं हैं, वरन, सभी के लिए और मसीही विश्वासियों की मण्डली की उन्नति और लाभ के लिए हैं। जिसे भी उसकी सेवकाई के लिए जो भी वरदान परमेश्वर पवित्र आत्मा ने प्रदान किया है, उसे वह वरदान पवित्र आत्मा की अगुवाई में, सभी मसीही विश्वासियों के लाभ के लिए प्रयोग करना है, अपने लिए नहीं। आज हम शेष चार वरदानों के बारे में कुछ विवरण देखेंगे:

  • भविष्यवाणी करने की शक्ति: मूल यूनानी भाषा के जिस शब्द का अनुवादभविष्यवाणी किया गया है, उसका शब्दार्थ न केवल भविष्य की बातें बताना होता है, वरन प्रेरित होकर औरों के सामने बोलना या बताना भी होता है। 1 कुरिन्थियों 14:3 में इसी शब्द को “”... मनुष्यों से उन्नति, और उपदेश, और शान्ति की बातेंकहने के लिए भी प्रयोग किया गया है, और लूका 22:64 में, जब पकड़वाए जाने के बाद सैनिकों द्वारा प्रभु का उपहास किया जा रहा था, तबबूझनेयापता लगाकर बतानेके लिए भी हुआ है। इसी प्रकार से इस शब्द को विभिन्न स्थानों में उसके भिन्न अर्थों के साथ उपयोग किया गया है। पवित्र आत्मा न केवल कुछ लोगों को भविष्य की बातें बताने की सामर्थ्य देता है (प्रेरितों 21:9-11), वरन कुछ लोगों को परमेश्वर की बातें औरों के सामने बोलने की भी सामर्थ्य देता है (1 कुरिन्थियों 11:4,5; 13:9; 14:3-5, 24, 31, 39; प्रकाशितवाक्य 11:3) 
  • आत्माओं की परख: पहली कलीसिया की स्थापना, और प्रभु के शिष्यों द्वारा सुसमाचार प्रचार के आरंभ होने के साथ ही शैतान की ओर से झूठे प्रचारक (1 यूहन्ना 2:18; 4:1), प्रभु यीशु के नाम से प्रचार को कमाई का साधन बना कर प्रयोग करने वाले (रोमियों 16:18; फिलिप्पियों 3:18, 19), और गलत शिक्षाओं के देने वाले (2 कुरिन्थियों 4:2; 2 पतरस 2:1; 2 यूहन्ना 1:7) भी मण्डलियों और लोगों में फैलने लगे थे, अपने कार्य के द्वारा लोगों को बहकाने लगे थे। उस समय में, जब आज के समान लिखित वचन लोगों के हाथ में नहीं था, अधिकांशतः मसीही जीवन की शिक्षाएं, सुसमाचार प्रचार, और प्रभु की बातों का प्रसार, मौखिक प्रचार और संबोधनों के द्वारा होता था। ऐसे में, इन शैतान के लोगों के झूठ और गलत शिक्षाओं को तुरंत ही परखने और प्रकट करने के लिए, वचन को जानने, जाँचने, और सच को उजागर करने की शक्ति पवित्र आत्मा लोगों को देता था, जिससे वे झूठ को प्रकट कर के लोगों को गलत शिक्षाओं से बचा सकें (1 कुरिन्थियों 14:29)। यह कार्य आज भी पवित्र आत्मा की सामर्थ्य से कुछ लोग विभिन्न माध्यमों के द्वारा करते रहते हैं, अन्यथा गलत शिक्षाओं की भरमार में मसीही विश्वासियों के लिए सत्य की पहचान करना बहुत कठिन हो जाएगा।   
  • अनेक प्रकार की भाषा: प्रेरितों 2:4-11 से यह प्रकट है कि जिनअन्य भाषाओंका उल्लेख किया गया है वे पृथ्वी की ही, और विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों के लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषाएं थीं, न कि अलौकिक या पृथ्वी के बाहर की भाषाएं, जैसा पवित्र आत्मा के नाम से गलत शिक्षाएं देने वाले दावा करते हैं। यह बात 1 कुरिन्थियों 14 अध्याय के अध्ययन से और अधिक स्पष्ट एवं दृढ़ हो जाती है। उस समय प्रभु के शिष्यों और प्रेरितों को तुरंत ही संसार भर में जाकर सुसमाचार बताने की आवश्यकता थी; किन्तु प्रभु के अनुयायी सभी इस्राएल से थे, यहूदी भाषा बोलने वाले थे, और अधिकांशतः तो बहुत कम शिक्षा पाए हुए या अनपढ़ भी थे। इस बात का सुसमाचार प्रचार में बाधा बनने के समाधान के लिए पवित्र आत्मा ने उन शिष्यों को अनेकों प्रकार की भाषाएं बोलने का वरदान भी दे दिया, जिससे वे उस भाषा के अनुसार अलग-अलग इलाकों में जाकर प्रचार कर सकें। यह उस समय की तात्कालिक आवश्यकता थी, जिसका समाधान परमेश्वर पवित्र आत्मा ने प्रदान किया, और यह 1 कुरिन्थियों 14 अध्याय में और स्पष्ट भी हो जाता है। साथ ही पवित्र आत्मा ने यह भी लिखवा दिया कि यह वरदान स्थाई नहीं है, वरन एक समय पर समाप्त हो जाएगा क्योंकि तब इसकी आवश्यकता नहीं रहेगी (1 कुरिन्थियों 13:8), हर स्थान पर हर भाषा में सुसमाचार देने वाले लोग खड़े हो जाएंगे। किन्तु इस वरदान की गलत समझ, व्याख्या, और शिक्षाओं के द्वारा पवित्र आत्मा के नाम से गलत शिक्षाएं देने वालों ने बहुतेरों को बहका रखा है, भ्रम में डाल रखा है। 

इसीलिए अन्य भाषा बोलने का वरदान भी सभी की भलाई, सभी की उपयोगिता, और मण्डली की उन्नति के लिए है; किसी के द्वारा व्यक्तिगत प्रयोग या अपने आप को विशेष सामर्थ्य पाया हुआ दिखाने के लिए नहीं। इस वरदान को व्यक्तिगत उपयोग के लिए बताना या प्रयोग करना, वचन के अनुसार नहीं है, इस वरदान तथा परमेश्वर के वचन का दुरुपयोग है।  

  • भाषाओं का अर्थ बताना: जिस प्रकार संसार के सभी स्थानों में जाकर वहाँ की भाषा में सुसमाचार प्रचार करने वालों की आवश्यकता थी, उसी प्रकार से मण्डलियों में ऐसे लोगों की भी आवश्यकता थी जो दु-भाषिये का कार्य कर सकें। अर्थात यदि कोई भिन्न भाषा बोलने वाला प्रचारक किसी मण्डली में आए, तो उसकी बात को स्थानीय भाषा में अनुवाद कर के स्थानीय लोगों को लाभान्वित कर सकें। इसीलिए पवित्र आत्मा ने लिखवाया है कि प्रचारक को किसी नए स्थान पर जाने के बाद पहले यह पता कर लेना चाहिए कि उसकी बात का स्थानीय भाषा में अनुवाद करने वाला कोई है कि नहीं; यदि नहीं है तो फिर उसे शांत रहना चाहिए, नाहक प्रचार नहीं करना चाहिए (1 कुरिन्थियों 14:27-28)

यदि आप मसीही विश्वासी हैं तो आपके लिए यह अनिवार्य है कि वचन की सही समझ और शिक्षा में दृढ़ और स्थापित हों, तथा गलत शिक्षाओं के बहकावे में न आएं; वरन गलत शिक्षाओं को औरों के सामने प्रकट करें और लोगों को उनसे सावधान रहने, बच कर रहने के बारे में समझाएं। इन अंत के दिनों में जिस तेज़ी से चिह्न-चमत्कारों आदि के द्वारा गलत शिक्षाएं फैलाई जा रही हैं, उसका सामना करने, लोगों को झूठी बातों में फँसने और बहकाए जाने से बचाने के लिए सभी मसीही विश्वासियों को वचन की सही समझ रखने और उसका सही उपयोग करना सिखाने की बहुत आवश्यकता है। प्रभु से प्रार्थना कीजि, उससे माँगिए कि वह आपको अपने लिए उपयोग करे कि आप झूठ और गलत शिक्षाओं को प्रकट कर सकें, उन्हें उजागर कर सकें, और लोगों को गलत बातों में फंस कर अनन्त विनाश में जाने से बचा सकें।

 यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी। 

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • होशे 9-11    
  • प्रकाशितवाक्य 3

शनिवार, 11 दिसंबर 2021

मसीही सेवकाई और पवित्र आत्मा के वरदान - 9


आत्मिक वरदान - उनके प्रकार तथा उनका विश्लेषण 

पिछले लेख में हमने देखा है कि न तो कोई आत्मिक वरदान और न ही कोई मसीही सेवकाई छोटी अथवा बड़ी, या कम अथवा अधिक महत्वपूर्ण है; परमेश्वर की दृष्टि में सभी समान हैं। सभी वरदानों का उपयोग किसी के निज प्रयोग अथवा भलाई के लिए नहीं वरन मण्डली के सभी लोगों की भलाई के लिए होना है। सभी वरदान परमेश्वर पवित्र आत्मा द्वारा प्रत्येक मसीही विश्वासी के लिए परमेश्वर द्वारा नियुक्त सेवकाई को सुचारु रीति से पूरा करने के लिए दिए जाते हैं; किसको क्या वरदान मिलना है, यह व्यक्ति की इच्छा के अनुसार नहीं, अपितु पवित्र आत्मा के द्वारा निर्धारित किया जाता है। हमने यह भी देखा था कि 1 कुरिन्थियों 12:31 में वाक्यांशबड़े से बड़े वरदान की धुन में रहोका अभिप्राय मण्डली में परमेश्वर के लिए अधिक से अधिक उपयोगी होने कीधुन में रहनेया हार्दिक इच्छा बनाए रखने के लिए है, वरदानों को बड़ा या छोटा बताने और वरदानों में बदलाव करवाने के लिए नहीं। इस वाक्यांश के विषय यह भी ध्यान कीजिए किधुन में रहोलिखा गया है; किन्तु यह नहीं कहा गया है कि ऐसा करने से पवित्र आत्मा हमारीधुन में रहनेके अनुसार हमारे वरदानों और सेवकाई में कोई परिवर्तन कर देगा - जैसा कि बहुधा पवित्र आत्मा से संबंधित गलत शिक्षाएं सिखाने वाले अभिप्राय देते हैं, और इसके लिए इस पद का दुरुपयोग करते हैं। 

आज से हम 1 कुरिन्थियों 12:7-11 के इन 5 पदों में दिए गए विभिन्न वरदानों को थोड़ा और गहराई से देखते हैं। यहाँ हर वरदान के साथ लिखा है, “किसी को...”; अर्थात हर किसी को सभी वरदान नहीं दिए गए हैं, और हर किसी को एक ही वरदान नहीं दिया गया है; वरन अलग-अलग सेवकों को, उनकी सेवकाई के अनुसार ही अलग-अलग वरदान दिए गए हैं। इसलिए किसी को भी किसी दूसरे के वरदान को लेकर ईर्ष्या या कोई अनुचित भावना नहीं रखनी चाहिए। यहाँ दिए गए वरदानों के अतिरिक्त भी पवित्र आत्मा के वरदान हैं, जो बाइबल की अन्य पुस्तकों में दिए गए हैं। अभी के लिए हम 1 कुरिन्थियों 12:7-11 में दिए गए वरदानों को ही देखना आरंभ करेंगे। इन 5 पदों में 9 विभिन्न वरदान दिए गए हैं; ये वरदान हैं:बुद्धि का बातें”; “ज्ञान की बातें”; “विश्वास”; “चंगा करने का वरदान”; “सामर्थ्य के काम करने की शक्ति”; “भविष्यवाणी करने की शक्ति”; “आत्माओं की परख”; “अनेक प्रकार की भाषा”; “भाषाओं का अर्थ बताना। इस खंड का आरंभ इन सभी वरदानों के सभी लोगों के लाभ के लिए होने, और पवित्र आत्मा के द्वारा होने (पद 7), और अंत इनके पवित्र आत्मा की इच्छा के अनुसार दिए जाने तथा इनका उपयोग पवित्र आत्मा द्वारा ही करवाए जाने (पद 11) से होता है। अर्थात आत्मिक वरदानों से संबंधित सब कुछ - उनका उद्देश्य, उन्हें प्रयोग करने की क्षमता, किस को क्या वरदान दिया जाना है का निर्णय, आदि, सभी परमेश्वर पवित्र आत्मा के अधिकार में है, यह पूर्णतः उनकी ओर से और उनके द्वारा है; किसी मनुष्य की इसमें कोई भूमिका अथवा अधिकार नहीं है, जैसा कि इस खंड से पहले पद 4-6 में भी लिखा गया है।

इन वरदानों के बारे में समझते हैं:

  • बुद्धि का बातें: बुद्धि या बुद्धिमत्ता का अर्थ होता है किसी परिस्थिति या आवश्यकता के अनुसार उपलब्ध ज्ञान एवं संसाधनों का उपयुक्त उपयोग करना; किसी कार्य को भली-भांति या लाभदायक रीति से करना। इसे भजन 119:97-105 के साथ देखने से यह और अधिक स्पष्ट हो जाता है। 
  • ज्ञान की बातें: ज्ञान किसी बात या विषय की जानकारी होने या उसे एकत्रित करने के लिए है। सामान्य व्यवहार में बुद्धिमत्ता और ज्ञान एक दूसरे के पूरक हैं, और साथ-साथ उपयोग होते हैं; एक के बिना दूसरा ठीक से उपयोग नहीं किया जा सकता है। किन्तु ज्ञान शारीरिक भी हो सकता है और ईश्वरीय भी; शारीरिक ज्ञान शैतानी होता है और स्वयं तथा औरों के लिए हानिकारक होता है, और ईश्वरीय ज्ञान आत्मा के फलों के अनुसार होता है (याकूब 3:14-17)। पवित्र आत्मा द्वारा दिया जाने वालाज्ञानईश्वरीय ज्ञान है, और इस ज्ञान का बुद्धि के साथ किया गया उपयोग व्यक्ति तथा औरों के लिए उन्नति लाता है। 
  • विश्वास: बहुत सी ईश्वरीय बातें मनुष्य को अपनी सांसारिक बुद्धि से अविश्वसनीय लगती हैं, समझ में नहीं आती हैं। उदाहरण के लिए यह स्वीकार कर लेना कि प्रभु यीशु मसीह ने समस्त मानवजाति के पापों की पूरी-पूरी कीमत चुका दी है, अब उन पर लाए विश्वास के द्वारा मनुष्य अनन्तकाल के नरक के दण्ड से बचकर, परमेश्वर की संतान बनकर अनन्तकाल के लिए परमेश्वर के साथ स्वर्ग में रहने लगता है, मानवीय बुद्धि और ज्ञान के आधार पर बहुतों के लिए कठिन होता है। किन्तु पवित्र आत्मा इसे और परमेश्वर की अन्य अद्भुत और अविश्वसनीय प्रतीत होने वाली बातों को मानने के लिए आवश्यक विश्वास प्रदान करता है। इसीलिए याकूब ने लिखा है कि जिसे बुद्धि की घटी है वह परमेश्वर से मांगे और उसे दी जाएगी (याकूब 1:5-6); और इब्रानियों 11 अध्याय में पुराने नियम के उन विश्वास के दिग्गजों के नाम दिए गए हैं, जिन्होंने परमेश्वर की अविश्वसनीय प्रतीत होने वाली बातों पर भी विश्वास किया और ऐसे-ऐसे कार्य करे जो उनके अपने लिए तथा औरों के लिए असंभव थे। 
  • चंगा करने का वरदान: प्रभु यीशु के शिष्यों के द्वारा शारीरिक रोगों से चंगाई भी पवित्र आत्मा की सामर्थ्य से दी जाती है, और चंगाई का यह वरदान भी परमेश्वर पवित्र आत्मा किसी-किसी मसीही सेवक को देता है, हर किसी को नहीं। किन्तु जिस प्रकार से आज इस वरदान का प्रयोग किया जा रहा है, वैसा बाइबल में नहीं किया गया है। बाइबल में कहीं पर भीचंगाई की सभाएंआयोजित करने, चंगाई प्राप्त करने को लोगों को लुभाने और एकत्रित करने, और शारीरिक चंगाई की शिक्षा को सुसमाचार प्रचार पर प्रमुखता एवं प्राथमिकता दिए जाने का कोई उल्लेख या उदाहरण नहीं है। शारीरिक चंगाई, चाहे प्रभु यीशु के द्वारा, या फिर उनके शिष्यों क द्वारा, जब भी दी गई है, व्यक्तिगत रीति से, व्यक्ति विशेष को, उससे बात करने के बाद दी गई है। किन्तु आज चंगाई देना मनुष्यों के नाम के प्रचार और प्रशंसा प्राप्त करने का माध्यम बन गया है। इस वरदान का बाइबल की शिक्षाओं के अनुरूप उचित उपयोग करने के स्थान पर इसका प्रभु यीशु के नाम में व्यक्तिगत प्रशंसा और लाभ के लिए किया जाने वाला दुरुपयोग और इसे अनुचित शिक्षाओं के साथ मिलाकर लोगों में प्रदर्शन करना, आज मसीही विश्वास और सुसमाचार प्रचार के लिए बहुत बड़ी मुसीबत और बाधा बना हुआ है। 
  • सामर्थ्य के काम करने की शक्ति: यद्यपि यहाँ पर यह नहीं बताया गया है कि ये सामर्थ्य के काम कौन से हैं, किन्तु मूल यूनानी भाषा के शब्द का अंग्रेजी अनुवाद “miracles” किया गया है। अर्थात ऐसे कार्य जो सामान्य मानवीय योग्यता, शक्ति, एवं क्षमताओं के द्वारा किया जाना संभव नहीं है। इन विभिन्न प्रकार के कार्यों को हम इब्रानियों 11 अध्याय में दिए गए विश्वास के दिग्गजों द्वारा परमेश्वर और उसके वचन में विश्वास के द्वारा की गई बातों से भी समझ सकते हैं। उनके विश्वास को व्यावहारिक रूप में कार्यान्वित परमेश्वर पवित्र आत्मा ही करवाता रहा।

 

शेष वरदानों,भविष्यवाणी करने की शक्ति”; “आत्माओं की परख”; “अनेक प्रकार की भाषा”; “भाषाओं का अर्थ बतानाको हम अगले लेख में देखेंगे। यदि आप मसीही विश्वासी हैं तो आपके लिए यह अति आवश्यक है कि आप अपनी सेवकाई को पहचानें और उस सेवकाई के लिए पवित्र आत्मा द्वारा पको प्रदान किए गए वरदानों को भी पहचानें, उनके महत्व को समझें, और उनका उपयुक्त उपयोग करें, जिससे सुसमाचार का प्रचार और प्रसार, तथा परमेश्वर के नाम की महिमा हो। जो भी सेवकाई और वरदान परमेश्वर ने आप को प्रदान किए हैं, वही आपके ले सही और आशीषपूर्ण हैं। उन्हें बदलने के व्यर्थ प्रयासों और गलत शिक्षाओं में मत फंसें; वरन उन्हें पवित्र आत्मा के निर्देशानुसार उपयोग कीजिए और परमेश्वर की आशीषों से परिपूर्ण होते चले जाइए। 

  यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • होशे 5-8    
  • प्रकाशितवाक्य 2  

शुक्रवार, 10 दिसंबर 2021

मसीही सेवकाई और पवित्र आत्मा के वरदान - 8


आत्मिक वरदान - समान महत्व के, सब के लाभ के लिए, पवित्र आत्मा के द्वारा   

पिछले लेख में हमने देखा था कि परमेश्वर पवित्र आत्मा चाहता है कि सभी मसीही विश्वासी आत्मिक वरदानों के बारे में सही समझ सीखें और रखें। साथ ही हमने यह भी देखा था कि परमेश्वर द्वारा उसके लिए निर्धारित सेवकाई के अनुसार प्रत्येक मसीही विश्वासी को उपयुक्त आत्मिक वरदान दिए जाते हैं। परमेश्वर की दृष्टि में न तो कोई सेवकाई छोटी अथवा बड़ी है, और न ही कोई आत्मिक वरदान बड़ा या प्रमुख, अथवा, छोटा या गौण है। इस प्रकार की भिन्नता या भेदभाव करना मनुष्य की प्रवृत्ति एवं भावना है, परमेश्वर की नहीं। यहाँ पर 1 कुरिन्थियों 12:31 के आधार पर वरदानों को बड़ा या छोटा कहने से पहले, इस पद को उसके संदर्भ में सही समझना आवश्यक है। इससे पहले के 12-27 पद में पौलुस ने शरीर को रूपक के समान प्रयोग करते हुए यह निष्कर्ष दिया कि जिस प्रकार देह के सभी अंग देह के लिए समान महत्व के और उसकी कार्य-क्षमता तथा कुशलता के लिए अपने-अपने स्थान पर आवश्यक हैं, कोई अंग कम अथवा अधिक महत्वपूर्ण, या बड़ा अथवा छोटा नहीं है, उसी प्रकार मण्डली में भी सभी मसीही विश्वासी, अपने भिन्न-भिन्न वरदानों और कार्यों के साथ, प्रभु की मण्डली रूपी देह के लिए समान महत्व रखते हैं, न तो कोई मसीही विश्वासी, न उसकी सेवकाई, न उसके वरदान, औरों की तुलना में बड़े अथवा छोटे, या कम अथवा अधिक महत्वपूर्ण है, सभी समान हैं। फिर इसके बाद पद 28 में पौलुस उस मण्डली रूपी एक देह में विभिन्न जिम्मेदारियों और कार्यों का उल्लेख करता है, और उन्हें क्रमवार बताते हुए उनकी क्रम-संख्या भी बताता है। फिर पद 29-30 में पौलुस पूछे गए प्रश्नों के द्वारा यह दिखाता है कि हर किसी को एक ही, या सारी ज़िम्मेदारियाँ नहीं दी गई हैं; सभी को अपनी-अपनी ज़िम्मेदारी निभानी है। और तब पद 31 में उसके द्वाराबड़े से बड़े वरदानवाक्यांश का प्रयोग किया गया है। इस पद को अन्य पदों के साथ, उसके संदर्भ में देखने से यह प्रकट हो जाता है किबड़े से बड़ेसे अभिप्राय अधिक से अधिक ज़िम्मेदारी वाले वरदान के लिए है। अर्थात पौलुस में होकर परमेश्वर पवित्र आत्मा मसीही विश्वासियों को यह बता रहा है कि मसीही मण्डली में अधिक से अधिक ज़िम्मेदारी उठाने वाले, यानि कि प्रभु के लिए अधिक से अधिक उपयोग में आने वाले व्यक्ति होने की धुन में रहो या लालसा रखो। यदि इसे वरदानों और सेवकाइयों में बड़े-छोटे के लिए समझा जाए तो फिर पद 12-27 में दी गई चर्चा व्यर्थ है; फिर तो प्रभु की मण्डली रूपी देह में सभी समान महत्व के नहीं हैं, और पवित्र आत्मा ने बड़े या छोटे आत्मिक वरदान देने के द्वारा भेद-भाव किया है। और यह बात परमेश्वर के स्वरूप और वचन की शिक्षाओं के साथ बिल्कुल मेल नहीं खाती है, इसलिए स्वीकार्य भी नहीं है

दूसरी बहुत महत्वपूर्ण बात जो इस अध्याय के 7 पद में, आत्मिक वरदानों के उल्लेख से भी पहले कही गई है, किन्तु जिस पर अधिकांशतः लोग ध्यान नहीं देते हैं, वह है, “किन्तु सब के लाभ पहुंचाने के लिये हर एक को आत्मा का प्रकाश दिया जाता है” (1 कुरिन्थियों 12:7)। हम इससे पहले परमेश्वर की कार्यविधि को समझते हुए, 8 दिसंबर के लेख में यह देख चुके हैं कि हमारा परमेश्वर पिता हमेशा सभी की भलाई के लिए ही कार्य करता है, और जो आशीषें वह देता है, वह किसी व्यक्ति के अपने निज लाभ और प्रयोग के लिए ही नहीं होती हैं, वरन, उस व्यक्ति में होकर सभी के लाभ और उन्नति के लिए होती हैं। यही बात यहाँ इस 7 पद में कही गई है। पवित्र आत्मा स्वयं इस बात को पहले ही लिखवा दे रहा है कि हर एक को जो भी आत्मिक वरदान पवित्र आत्मा की ओर से दिया गया है, वह सभी के लाभ के लिए है। इसकी पुष्टि एक बार फिर से 1 कुरिन्थियों 14:12 “इसलिये तुम भी जब आत्मिक वरदानों की धुन में हो, तो ऐसा प्रयत्न करो, कि तुम्हारे वरदानों की उन्नति से कलीसिया की उन्नति होमें हो जाती है। यद्यपि यह बात अन्य-भाषा बोलने के संदर्भ में कही गई है, किन्तु फिर भी यहाँ पर यह बलपूर्वक दोहराया गया है कि सभी के आत्मिक वरदानों के द्वारा कलीसिया ही की उन्नति होनी चाहिए; और 1 कुरिन्थियों 14:2-5 पद तथा इस अध्याय के अन्य पद भी यह स्पष्ट कर देते हैं कि अन्य भाषा बोलना भी कलीसिया की उन्नति के लिए ही है, किसी भी व्यक्ति के अपने निज प्रयोग अथवा लाभ के लिए नहीं। यद्यपि यह हमारे वर्तमान विषय से बाहर की चर्चा है, किन्तु इस संदर्भ में यह कहना बहुत आवश्यक है कि बाइबल में जिसेअन्य भाषाकहा गया है वह पृथ्वी की ही, और जानी पहचानी भाषाएं हैं, जिनके नाम हैं, जो विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में मनुष्यों द्वारा बोली जाती हैं, और जिनके अनुवाद किसी अन्य क्षेत्र की भाषा में किए जा सकते हैं। पवित्र आत्मा के नाम से गलत शिक्षाएं फैलाने वालों की इस गलत शिक्षा का कि अन्य भाषाएं अलौकिक, पृथ्वी के बाहर की भाषा है, बाइबल में कोई समर्थन नहीं है। 1 कुरिन्थियों 14 अध्याय ही ध्यान से और प्रार्थना पूर्वक पढ़ लीजिए, वास्तविकता स्वतः ही प्रकट हो जाएगी।

आत्मिक वरदानों से संबंधित तीसरी महत्वपूर्ण बात हम 1 कुरिन्थियों 12:, 11 पद में देखते हैं - हर एक आत्मिक वरदान, परमेश्वर पवित्र आत्मा प्रदान करता है, और अपनी इच्छा यानि उस व्यक्ति की निर्धारित सेवकाई के अनुसार प्रदान करता है। किसे कौन सा आत्मिक वरदान दिया जाना है, यह व्यक्ति की लालसा या उसके कहे अथवा मांगे जाने के अनुसार नहीं है। सभी को उसे उचित एवं उपयुक्त रीति से प्रयोग करना है, जो परमेश्वर ने उसे दिया है, उसके लिए रखा है। हम ऊपर देख चुके हैं किबड़े से बड़े वरदानों की धुन में रहो” (पद 31) का अर्थ मण्डली में अधिक से अधिक ज़िम्मेदारी निभाने के लिए है, अपने वरदान के स्थान पर कोई अन्य वरदान प्राप्त करने के लिए नहीं है। हम पहले भी, दिसंबर 5 और 6 के लेखों में देख चुके हैं कि परमेश्वर ने जिसके लिए जो ज़िम्मेदारी निर्धारित की है, उसे वो व्यक्ति ही निभा सकता है, कोई अन्य नहीं। परमेश्वर अपने निर्णय और बातें किसी के कहे के अनुसार बदलता नहीं है। उसके निर्णय अनन्तकाल के परिप्रेक्ष्य में लिए गए निर्णय हैं, अल्प-कालीन या मनुष्य की सोच और इच्छा के अनुसार लिए गए नहीं। मसीही विश्वासी की आशीष उसके द्वारा परमेश्वर की आज्ञाकारिता में है, न कि परमेश्वर को अपनी इच्छा के अनुसार कार्य करने के लिए बाध्य करने के प्रयासों में। 

यदि आप मसीही विश्वासी हैं तो आपको अपने मसीही जीवन और सेवकाई में पवित्र आत्मा से संबंधित गलत शिक्षाओं से बच कर रहने के लिए इन उपरोक्त बातों का ध्यान रखना बहुत आवश्यक है। न तो कोई सेवकाई और न कोई आत्मिक वरदान परमेश्वर की दृष्टि में बड़ा अथवा छोटा है। हर वरदान परमेश्वर की ओर से, सभी की भलाई के लिए दिया गया है, किसी के व्यक्तिगत उपयोग के लिए नहीं। इस संदर्भ में अन्य भाषा बोलना भी कलीसिया की भलाई और उपयोग के लिए ही है, जैसा 1 कुरिन्थियों 14 अध्याय के अध्ययन से स्पष्ट है, न कि किसी व्यक्ति के द्वारा मुँह से विचित्र ध्वनियाँ निकालकर और विचित्र हाव-भाव दिखाने के द्वारा लोगों पर यह प्रभाव जमाने के लिए कि उन्हें पवित्र आत्मा का कोई विशेष अनुग्रह या सामर्थ्य मिली हुई है। और किसे क्या देना है, हर आत्मिक वरदान परमेश्वर ही निर्धारित करता है, यह मनुष्य की इच्छा के अनुसार निर्धारित नहीं होता है। किसी को भी 1 कुरिन्थियों 12:31 की गलत व्याख्या के आधार पर वचन की इन सच्चाइयों को बदलने का प्रयास नहीं करना चाहिए। 

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • होशे 1-4    
  • प्रकाशितवाक्य 1

गुरुवार, 9 दिसंबर 2021

मसीही सेवकाई और पवित्र आत्मा के वरदान - 7

 

पवित्र आत्मा के वरदानों की समझ 

मसीही जीवन और सेवकाई में परमेश्वर पवित्र आत्मा की भूमिका और उनके द्वारा दिए जाने वाले आत्मिक वरदानों के अध्ययन में हम यह देख चुके हैं कि परमेश्वर प्रत्येक मसीही विश्वासी से कुछ न कुछ कार्य, जो हर एक के लिए परमेश्वर द्वारा पूर्व-निर्धारित हैं, चाहता है। परमेश्वर द्वारा निर्धारित इन कार्यों को करने के लिए प्रत्येक मसीही विश्वासी को उसमें निवास करने वाले परमेश्वर पवित्र आत्मा की सहायता उपलब्ध है, और साथ ही पवित्र आत्मा ने सभी को उनके कार्य और सेवकाई के लिए उचित और उपयुक्त वरदान, या क्षमताएं और योग्यताएं भी दी हैं, जिससे वह अपनी सेवकाई सुचारु रीति से और परमेश्वर की इच्छा के अनुसार कर सके, कि उसकी सेवकाई परमेश्वर को स्वीकार्य हो। इस संदर्भ में हम यह भी देख चुके हैं कि परमेश्वर को वही स्वीकार्य होता है जो उसकी इच्छा के अनुसार और उसकी आज्ञाकारिता में होकर किया जाता है। कोई मनुष्य अपनी मन-मर्ज़ी से परमेश्वर के नाम से कुछ भी करे, और अपेक्षा रखे कि परमेश्वर उसे स्वीकार करेगा, उसके लिए आशीष देगा, तो यह उस मनुष्य की अपनी सोच और समझ है। परमेश्वर उसकी इस सोच और समझ के साथ सहमत नहीं है, और उसे तथा उसके ऐसे सभी कार्यों को अस्वीकार कर देता है। इसलिए अति-आवश्यक है कि जब मसीही विश्वासी अपनी निर्धारित सेवकाई के कार्य करे, अपने वरदानों का उपयोग करे तो इस अनिवार्य बात का ध्यान रखते हुए करे। 

इसके लिए स्वाभाविक है कि प्रत्येक मसीही विश्वासी को आत्मिक वरदानों के प्रति सही समझ-बूझ और ज्ञान रखना चाहिए। परमेश्वर ने भी अपने लोगों को इस विषय में अनभिज्ञ एवं निःसहाय नहीं छोड़ा है। पवित्र आत्मा ने बाइबल की पुस्तकों में इन वरदानों, और उनके उपयोग के बारे में उपयुक्त विवरण लिखवाया है। अन्य स्थानों के अतिरिक्त, रोम के, और कुरिन्थुस के मसीही विश्वासियों को पौलुस प्रेरित के द्वारा लिखी पत्रियों में इसके विषय इसके बारे में प्रमुख शिक्षाएं मिलती हैं। कुरिन्थुस की मसीही मण्डली को लिखी अपने पहली पत्री में, पौलुस ने लिखाहे भाइयों, मैं नहीं चाहता कि तुम आत्मिक वरदानों के विषय में अज्ञात रहो” (1 कुरिन्थियों 12:1); और यहाँ से आरंभ कर के 14 अध्याय के अंत तक की चर्चा पवित्र आत्मा के वरदानों के बारे में है। इसी प्रकार से रोमियों को लिखी पत्री का 12 अध्याय भी पवित्र आत्मा के वरदानों के बारे में है। मसीही सेवकाई में लगे प्रत्येक मसीही विश्वासी को प्रार्थना के साथ, इन अध्यायों में दी गई शिक्षाओं के लिए पवित्र आत्मा का मार्गदर्शन मांगते हुए, इन अध्यायों को बहुत गंभीरता से और बारंबार पढ़ना चाहिए, और इनमें लिखी बातों को अपने जीवन और सेवकाई में लागू करना चाहिए। आज से हम 1 कुरिन्थियों 12 में आत्मिक वरदानों के बारे में लिखी बातों को देखना आरंभ करेंगे। 

जैसा उपरोक्त पहले पद के हवाले से स्पष्ट है, पौलुस प्रेरित में होकर परमेश्वर पवित्र आत्मा की यह हार्दिक इच्छा है कि मसीही विश्वासी इन आत्मिक वरदानों के विषय ज्ञान और समझ रखें। फिर 4 से 6 पद में पौलुस लिखता है कि वरदान, सेवा, और प्रभावशाली कार्य कई प्रकार के हैं, किन्तु इनके पीछे, इनमें होकर कार्य करने वाला आत्मा, प्रभु, और परमेश्वर एक ही है। अभिप्राय यह, कि न तो किसी का कार्य, न उसकी सेवा, और न उस सेवकाई का प्रकट प्रभाव, परमेश्वर की दृष्टि में छोटा अथवा बड़ा, या महत्वपूर्ण अथवा गौण है। जिसके लिए परमेश्वर ने जो और जैसा निर्धारित किया है, वही उसके लिए सही, सबसे उपयुक्त, और सबसे महत्वपूर्ण है; चाहे मनुष्यों की दृष्टि एवं आँकलन में वह कैसा भी हो - परमेश्वर उसे अपने मापदंड और आँकलन के अनुसार देखेगा और प्रतिफल देगा; मनुष्यों की बातों के अनुसार नहीं। इसे समझने के लिए बाइबल से कुछ उदाहरणों को देखते हैं: मत्ती 25:14-30 में प्रभु यीशु मसीह द्वारा कहा गया परदेश जाते समय एक मनुष्य द्वारा अपने दासों को दिए गए तोड़ों का दृष्टांत है। उस मनुष्य ने एक दास को पाँच, एक को दो और एक को एक ही तोड़ा दिया; और वापस लौटने पर तीनों से समान ही हिसाब लिया। इस पूरे दृष्टांत में कहीं यह संकेत अथवा बात नहीं दी गई है कि उस स्वामी की दृष्टि में उन दासों या उसके द्वारा उनका आँकलन करने या उन्हें परखने में कोई भिन्नता थी। यद्यपि उनकी व्यक्तिगत क्षमता के अनुसार स्वामी ने हर एक को दिया (पद 15), किन्तु वे तीनों और उनका आँकलन स्वामी की दृष्टि में समान था। एक तोड़ा पाने वाला अपने निकम्मेपन के कारण दण्ड का भागी हुआ, न कि स्वामी की उसके प्रति किसी पूर्व-धारणा के कारण। प्रभु ने मत्ती 20:1-16 में दाख की बारी के स्वामी का दृष्टांत बताया, जो दिन के अलग-अलग पहरों में जाकर अपनी बारी में काम करने के लिए मज़दूरों को लाता रहा, यहाँ तक कि अंतिम घंटे में भी और मज़दूर काम के लिए बुलाए। फिर उसने सभी को समान मेहनताना दिया। सारे दिन कार्य करने वालों और एक घंटा काम करने वालों में कोई भिन्नता नहीं की। जिन मज़दूरों ने भिन्नता करवानी भी चाही, उन्हें भी चुप कर दिया। निष्कर्ष स्पष्ट है, प्रभु द्वारा निर्धारित और सौंपा गया कोई भी सेवकाई या कार्य छोटा या बड़ा नहीं है; इसलिए उस सेवकाई या कार्य को करने से संबंधित कोई भी आत्मिक वरदान छोटा या बड़ा, अथवा कम या अधिक महत्व का नहीं है। जिसने भी प्रभु द्वारा निर्धारित कार्य को वफादारी से किया, प्रभु द्वारा उसे उपलब्ध करवाए गए संसाधनों का सही और उचित उपयोग किया, वह प्रभु द्वारा कभी भी किसी से भी छोटा या कम महत्व वाला नहीं समझा गया। उसे भी वही आदर और सम्मान तथा प्रतिफल और आशीषें मिलीं जो किसी अन्य को, चाहे मनुष्यों की दृष्टि में उसकी सेवकाई का महत्व एवं आँकलन कुछ भी हो।

यदि आप मसीही विश्वासी हैं, तो मनुष्यों की बातों और धारणाओं के बहकावे में आए बिना, प्रभु द्वारा आपको सौंपी गई सेवकाई का पूरे लगन से और वफादारी से निर्वाह कीजिए। प्रभु की दृष्टि में आप भी उतने ही महत्वपूर्ण और उपयोगी हैं, जितना कोई भी अन्य व्यक्ति। साथ ही यह भी ध्यान रखिए, ऐसे अनेकों हैं जो अपनी ही इच्छा के अनुसार प्रभु के नाम से बहुत कुछ करने में लगे हुए हैं, उनकी संसार में बहुत प्रशंसा और प्रतिष्ठा है, वे स्वयं अपने आप को तथा लोग भी उन्हें बहुत ऊंचे दर्जे का या महान समझते हैं। किन्तु अंतिम न्याय के समय उन्हें प्रभु से सुनने को मिलेगा, “मैं ने तुम को कभी नहीं जाना, हे कुकर्म करने वालों, मेरे पास से चले जाओ” (मत्ती 7:23); और तब उनकी क्या दशा होगी? इसलिए मनुष्यों के आँकलन और राय या विचार पर मत जाइए। जो प्रभु ने आप को सौंपा है, जो करने को कहा है, उसे वफादारी और ईमानदारी से पूरा कीजिए और प्रभु आपको कभी किसी से छोटा नहीं होने देगा। 

       यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • दानिय्येल 11-12    
  • यहूदा 1   

बुधवार, 8 दिसंबर 2021

मसीही सेवकाई और पवित्र आत्मा के वरदान - 6


पुनःअवलोकन, निष्कर्ष, परमेश्वर की कार्य-विधि, और शैतान की भ्रामक युक्तियाँ  

पुनःअवलोकन:

मसीही जीवन और सेवकाई में परमेश्वर पवित्र आत्मा द्वारा मसीही विश्वासियों को दिए गए वरदानों की इस अध्ययन शृंखला में हम अभी तक उन आधारभूत बातों को देखते आए हैं, जिनकी समझ और विचार रखना, पवित्र आत्मा के वरदानों के उपयोग के बारे में समझने के लिए अनिवार्य है। यदि परमेश्वर के वचन की इन मौलिक शिक्षाओं को ध्यान में रखे बिना हम पवित्र आत्मा के वरदानों और उपयोग को समझने के प्रयास करेंगे, तो बहुत सी गलतियों में पड़ सकते हैं, जो हमें सत्य से भटका देंगी। इस संदर्भ में हम अभी तक देख चुके हैं कि:

  • परमेश्वर स्वयं कार्यशील है और अपने लोगों को भी कार्यशील देखना चाहता है। 
  • परमेश्वर ने लोगों को मसीही विश्वास में निठल्ले होने तथा निष्क्रिय एवं निष्फल रहते हुए परमेश्वर की आशीषों को उपयोग करते रहने के लिए नहीं लिया है। 
  • परमेश्वर ने प्रत्येक मसीही विश्वासी द्वारा परमेश्वर के लिए करने के लिए कुछ न कुछ कार्य निर्धारित किए हैं। 
  • परमेश्वर द्वारा निर्धारित किए गए इन कार्यों को सुचारु रीति से करने के लिए परमेश्वर पवित्र आत्मा स्वतः ही प्रत्येक मसीही विश्वासी को उस कार्य के लिए उपयुक्त कोई न कोई वरदान अवश्य देता है। 

साथ ही हमने मसीही विश्वासी के जीवन और सेवकाई में परमेश्वर पवित्र आत्मा की भूमिका के संदर्भ में यह भी देखा है कि मसीही विश्वास में आते ही तुरंत ही उसी पल से हर विश्वासी के अन्दर पवित्र आत्मा आकर निवास करने लगता है; इसके किसी को लिए कोई अलग से प्रार्थना या प्रयास नहीं करना पड़ता है। यह मसीही विश्वास में आने के साथ ही, परमेश्वर द्वारा निर्धारित की गई और स्वतः ही होने वाली स्वाभाविक प्रक्रिया है। इससे संबंधित जो दूसरी महत्वपूर्ण बात हमने देखी थी वह थी कि व्यक्ति में पवित्र आत्मा की उपस्थिति उस व्यक्ति के बदले हुए जीवन और उसमें दिखने वाले आत्मा के फलों (गलातीयों 5:22-23) के द्वारा प्रमाणित होती है, न कि बाइबल के बाहर की विचित्र हरकतों, उछल-कूद, शोर-शराबे आदि के व्यवहार से, अथवा चिह्न-चमत्कार आदि करने के द्वारा।

निष्कर्ष:

शैतान का उद्देश्य सदा ही परमेश्वर के कार्य में बाधाएं डालना और उसकी योजनाओं को असफल करने के प्रयास करना रहता है। क्योंकि परमेश्वर मसीही विश्वासियों में होकर संसार में और संसार के लोगों के समक्ष अपने कार्य करता है, इसलिए परमेश्वर के कार्यों को बाधित करने के लिए शैतान मसीही विश्वासियों को व्यर्थ की बातों में उलझा कर रखता है जिससे वे अपने निर्धारित कार्य न कर सकें, और उसके द्वारा फैलाई जाने वाली भक्तिपूर्ण प्रतीत होने वाली किन्तु वास्तविकता में भरमाने वाली युक्तियों में उलझे रह कर समय बर्बाद करते रहें। अपने इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए वह मसीही विश्वासियों को जाने-अनजाने में परमेश्वर का अनाज्ञाकारी भी बना कर रखता है। यह समझते हुए कि वे परमेश्वर के लिए, या परमेश्वर की ओर से कार्य कर रहे हैं, वे अपनी ही धारणाओं, इच्छाओं, और मनुष्यों की मन-गढ़न्त बातों तथा गलत शिक्षाओं के अनुसार कार्य करते रहते हैं, और अन्ततः उनके सभी कार्य और प्रयास व्यर्थ एवं निष्फल होते हैं। शैतान की एक और कार्य-विधि है मसीही विश्वासी को उसके वरदानों और उनकी उपयोगिता के बारे में अनभिज्ञ रखना, या उन्हें ठीक से उपयोग नहीं करने देना, उनके बारे में उसे गलत शिक्षाओं में फंसा देना। 

परमेश्वर की कार्य-विधि:

परमेश्वर ने सदा ही समस्त मानवजाति की भलाई के लिए ही कार्य किया है। जब पृथ्वी पर पाप  बहुत बढ़ गया, और परमेश्वर ने जल-प्रलय के द्वारा पापी मनुष्यों के नाश की ठान ली, तब भी उसने उनके लिए जो पापों से पश्चाताप कर लें, उसकी चेतावनियों को मान लें, अपनी बुराई से पलट जाएं, उनके बचाए जाने के लिए नूह के द्वारा एक जहाज़ बनवाया; किन्तु नूह और उसके परिवार को छोड़ और किसी ने परमेश्वर की नहीं सुनी, संसार के लोगों ने परमेश्वर की चेतावनियों को गंभीरता से नहीं लिया, और जल-प्रलय में नाश हो गए। जब परमेश्वर अब्राहम को मूर्तिपूजकों में से निकालकर कनान में लेकर आया, तो अब्राहम को दी गई परमेश्वर की प्रतिज्ञा में भी समस्त पृथ्वी की भलाई की योजना थी। उस समय, “यहोवा ने अब्राम से कहा, अपने देश, और अपनी जन्मभूमि, और अपने पिता के घर को छोड़कर उस देश में चला जा जो मैं तुझे दिखाऊंगा। और मैं तुझ से एक बड़ी जाति बनाऊंगा, और तुझे आशीष दूंगा, और तेरा नाम बड़ा करूंगा, और तू आशीष का मूल होगा। और जो तुझे आशीर्वाद दें, उन्हें मैं आशीष दूंगा; और जो तुझे कोसे, उसे मैं शाप दूंगा; और भूमण्डल के सारे कुल तेरे द्वारा आशीष पाएंगे” (उत्पत्ति 12:1-3)। जब परमेश्वर ने अब्राहम के वंशजों, इस्राएलियों को अपने लोग होने के लिए चुना, तो उनमें होकर सच्चे परमेश्वर के विमुख एवं अनाज्ञाकारी हो चुके संसार के लोगों के सामने अपनी भलाई, अपने लोगों की देखभाल, और उनमें होकर अपनी सामर्थ्य तथा सार्वभौमिकता को दिखाया। किन्तु उसके सभी प्रमाणों के बावजूद संसार ने इस्राएल के परमेश्वर को नहीं अपनाया, वरन उलटे इस्राएल ने ही संसार की बातों को अपना लिया और परमेश्वर से दूर चला गया। उसका हर रीति से तिरस्कार किए जाने के बावजूद, फिर भी परमेश्वर सभी की देखभाल करता रहता है, सभी मनुष्यों को उसकी सृष्टि का उपयोग करने देता है, सभी की आवश्यकताओं को पूरा करता रहता हैजिस से तुम अपने स्वर्गीय पिता की सन्तान ठहरोगे क्योंकि वह भलों और बुरों दोनों पर अपना सूर्य उदय करता है, और धर्मियों और अधर्मियों दोनों पर मेंह बरसाता है” (मत्ती 5:45)। प्रभु यीशु मसीह में होकर भी परमेश्वर ने किसी जाति-विशेष, अथवा कुछ विशेष लोगों के लिए नहीं, परंतु समस्त मानवजाति के पापों की क्षमा, उद्धार, और परमेश्वर के साथ मेल-मिलाप कर लेने और अनन्तकाल के लिए परमेश्वर के साथ स्वर्ग के निवासी होने के लिए मार्ग बनाकर दिया। 

परमेश्वर के कार्यों और वरदानों के संबंध में यह एक बहुत महत्वपूर्ण सिद्धांत है, कि परमेश्वर का हर कार्य, हर आशीष, हर योजना, उसके द्वारा प्रदान की जाने वाली हर सामर्थ्य, कभी भी किसी व्यक्ति विशेष के लिए ही नहीं होती है, वरन उस व्यक्ति में होकर सभी की भलाई और उन्नति के लिए, संसार के लोगों को परमेश्वर के बारे में बताने, उसकी ओर आकर्षित करने, और उसकी निकटता में लाने के लिए होती है। परमेश्वर द्वारा दी जाने वाली बातों और सामर्थ्य से संबंधित इस मौलिक सिद्धांत की कभी अनदेखी नहीं करनी चाहिए, अन्यथा बहुत सी गलतियों में पड़ जाएंगे। और पवित्र आत्मा द्वारा दिए जाने वाले वरदानों को लेकर शैतान ने बहुत से लोगों को, विशेषकर उनको जो पवित्र आत्मा के नाम से गलत शिक्षाओं को सिखाते और फैलाते हैं, इसी गलती में फंसा रखा है।

शैतान की भ्रामक युक्तियाँ:

यदि आप थोड़ा सा भी विचार करें तो यह तुरंत ही प्रकट हो जाता है कि ये गलत शिक्षाएं फैलाने वाले लोग जिन पवित्र आत्मा के वरदानों और सामर्थ्य की बातें करते हैं, जिन्हें मांगने और पाने के लिए सिखाते हैं, वे सभी व्यक्ति द्वारा अपने उपयोग के लिए या व्यक्ति की प्रतिष्ठा और सामाजिक अथवा मण्डली में स्तर को बढ़ाने, लोगों से प्रशंसा पाने, व्यक्ति के अहम को बढ़ाने वाले होते हैं। दुख की बात यह है कि इन सभी वरदानों को भी परमेश्वर पवित्र आत्मा ने मण्डली तथा लोगों की भलाई के लिए दिया है, किन्तु जिस प्रकार से और जिस स्वरूप में ये लोग उन वरदानों को प्रस्तुत करते हैं, उससे उनकी वास्तविक उपयोगिता एवं दिए जाने का उद्देश्य भ्रष्ट हो जाता है। यह भक्ति और आत्मिकता के भेष में ढाँप कर, शैतान की कुटिलता और झूठ को लोगों में बैठा देने और फैला देने का तरीका है। शैतान के इस चंगुल में फँस कर वे लोग अपने इन वरदानों को व्यर्थ कर देते हैं, और जिनकी सेवकाई के लिए ये वरदान थे, वे लोग निष्क्रिय तथा निष्फल हो जाते हैं, अपनी आशीषों को गँवा देते हैं। उनके लिए वह दिन और समय कितना भयानक और हृदय-विदारक होगा, जब मत्ती 7:23 के अनुरूप, प्रभु यीशु मसीह उनसे कहेगा, “मैं ने तुम को कभी
नहीं जाना, हे कुकर्म करने वालों, मेरे पास से चले जाओ यदि उन्होंने परमेश्वर के वचन को गंभीरता से लिया होता, मनुष्यों की धारणाओं और मन-गढ़न्त बातों के अनुसार नहीं वरन बाइबल की बातों के अनुसार सीखा होता, स्वीकार करने से पहले सभी शिक्षाओं को बारीकी से जाँचा-परख होता, तो वे कभी शैतान की इन चालों में नहीं फँसते, परमेश्वर पवित्र आत्मा उन्हें वचन की सच्चाइयों को दिखाता, बताता, और समझाता। किन्तु उन्होंने परमेश्वर के वचन के स्थान पर मनुष्यों की बातों को अधिक महत्व दिया, और अपनी सेवकाई व्यर्थ कर ली, अपनी अनन्तकालीन आशीषें गँवा दीं। 

यदि आप मसीही विश्वासी हैं, तो पवित्र आत्मा के वरदानों से संबंधित अपने विचारों, मान्यताओं, और धारणाओं को परमेश्वर के वचन से जाँच-परख लें, और सुनिश्चित कर लें कि आप किसी गलत शिक्षा अथवा मनुष्य की गढ़ी हुई बातों में नहीं फंसे हुए हैं, वरन वचन की खराई और सही शिक्षा में ही स्थापित हैं। समय रहते सुधार न करने के परिणाम, वर्तमान में तथा अनन्तकाल के लिए, बहुत हानिकारक हो सकते हैं। प्रभु द्वारा मत्ती 7:23 में तथा उन पाँच मूर्ख कुँवारियों से कही गई बात को स्मरण कीजिए - बाद में सुधार का प्रयास करने से उन्हें कुछ लाभ नहीं हुआ, वे प्रभु से दूर ही रहे। 

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • दानिय्येल 8-10    
  • 3 यूहन्ना 1