ई-मेल संपर्क / E-Mail Contact

इन संदेशों को ई-मेल से प्राप्त करने के लिए अपना ई-मेल पता इस ई-मेल पर भेजें : rozkiroti@gmail.com / To Receive these messages by e-mail, please send your e-mail id to: rozkiroti@gmail.com

रविवार, 5 सितंबर 2021

परमेश्वर का वचन, बाइबल – पाप और उद्धार - 11


पाप का समाधान - उद्धार - 7

       पिछले लेख में हमने परमेश्वर के वचन बाइबल में से एक उदाहरण देखा था कि धर्म का अगुवा, परमेश्वर के वचन का विद्वान और शिक्षक होने, तथा समाज में उच्च स्थान रखने के बावजूद, फरीसियों के सरदार नीकुदेमुस के मन में परमेश्वर के सम्मुख अपने धर्मी स्वीकार होने के विषय संदेह था, जिसके निवारण के लिए वह प्रभु यीशु मसीह से मिलने आया था। यहूदियों के इस धर्मी और संभ्रांत धार्मिक अगुवे से प्रभु यीशु मसीह ने तीन बार दो टूक कह दिया कि उसे नया जन्म लेना अनिवार्य है, क्योंकि इसके बिना न तो कोई परमेश्वर के राज्य में प्रवेश कर सकता है, और न ही उसे देख सकता है। साथ ही उसे यह भी जता दिया कि यह प्रभु यीशु द्वारा दी जाने वाली कोई नई शिक्षा नहीं है, वरन बाइबल के पुराने नियम खंड, जिसका नीकुदेमुस ज्ञाता और शिक्षक था, में परमेश्वर द्वारा दी गई शिक्षाओं के अनुसार है - केवल शुद्ध मन वाले, न कि धार्मिक क्रिया-कर्म करके भी सांसारिक बातों में लगे रहने वाले, परमेश्वर के साथ संगति करने पाएंगे (भजन 15; 51:6, 10; 73:1; आदि)।

आज इसी संदर्भ में बाइबल में से एक और उदाहरण देखेंगे, कि जैसे परमेश्वर के वचन का ज्ञाता और उस की व्यवस्था का पालन करने के बावजूद नीकुदेमुस के मन में अपने उद्धार के विषय शंका थी, वैसे ही एक अन्य धनी जवान सरदार द्वारा व्यवस्था की बातों का पालन करने के बावजूद, उसके मन में भी अनन्त जीवन का भागी होने के विषय संदेह था। इस धनी जवान सरदार का वृतांत हमको पहले तीनों सुसमाचारों में मिलता है (मत्ती 19:16-29; मरकुस 10:17-30; लूका 18:18-27)। यहाँ पर हम मरकुस रचित सुसमाचार के लेख को लेकर चलेंगे, किन्तु साथ ही अन्य दोनों वृतांतों में से भी कुछ बातों को देखते जाएंगे। मरकुस रचित सुसमाचार का वृतांत इस प्रकार है:

 

मरकुस 10:17 और जब वह निकलकर मार्ग में जाता था, तो एक मनुष्य उसके पास दौड़ता हुआ 

आया, और उसके आगे घुटने टेककर उस से पूछा हे उत्तम गुरु, अनन्त जीवन का अधिकारी होने के लिये मैं क्या करूं?

मरकुस 10:18 यीशु ने उस से कहा, तू मुझे उत्तम क्यों कहता है? कोई उत्तम नहीं, केवल एक अर्थात परमेश्वर

मरकुस 10:19 तू आज्ञाओं को तो जानता है; हत्या न करना, व्यभिचार न करना, चोरी न करना, झूठी गवाही न देना, छल न करना, अपने पिता और अपनी माता का आदर करना

मरकुस 10:20 उसने उस से कहा, हे गुरु, इन सब को मैं लड़कपन से मानता आया हूं

मरकुस 10:21 यीशु ने उस पर दृष्टि कर के उस से प्रेम किया, और उस से कहा, तुझ में एक बात की घटी है; जा, जो कुछ तेरा है, उसे बेच कर कंगालों को दे, और तुझे स्वर्ग में धन मिलेगा, और आकर मेरे पीछे हो ले

मरकुस 10:22 इस बात से उसके चेहरे पर उदासी छा गई, और वह शोक करता हुआ चला गया, क्योंकि वह बहुत धनी था



  • पद 17 - लूका 18:18 से हम देखते हैं कि यह एक सरदार अर्थात, अधिकारी, समाज में उच्च स्थान रखने वाला था; मत्ती 19:20 हमें बताता है कि वह जवान था; और मरकुस 10:22 बताता है कि वह बहुत धनी था। फिर भी यह व्यक्ति सार्वजनिक मार्ग पर जा रहे प्रभु यीशु के पास दौड़ता हुआ आया और उसे आदर मान देते हुए उसके सामने घुटने टेके, उसेउत्तम गुरुकह कर संबोधित किया। उसने प्रभु से अपने मन की व्यथा के विषय प्रश्न पूछाअनन्त जीवन का अधिकारी होने के लिये मैं क्या करूं?”; अर्थात उसे अपने विषय आभास था कि वह अनत जीवन का अधिकारी नहीं है; अभी उसके जीवन में कुछ है जो उसे अनन्त जीवन का वारिस होने से रोक रहा है, और उसका मन, उसका विवेक उसे इसके विषय सचेत कर रहा है। 
  • पद 18 - प्रभु ने उसके प्रश्न का उत्तर देने से पहले उसके मन के अंदर प्रभु के वास्तविक स्थान को उजागर कर दिया। प्रभु ने पलट कर उससे प्रश्न किया, “तू मुझे उत्तम क्यों कहता है? कोई उत्तम नहीं, केवल एक अर्थात परमेश्वरअर्थात, “मुझे उत्तम गुरु कहकर संबोधित करने के द्वारा क्या तू स्वीकार करता है कि मैं प्रभु परमेश्वर हूँ? प्रभु के प्रश्न के लिए उस जवान के उत्तर पर बहुत कुछ निर्भर था; हम इसे कुछ आगे, जहाँ उसका उत्तर है, वहाँ पर फिर देखेंगे।
  • पद 19 - प्रभु ने अपने बात को आगे जारी रखते हुए उससे आज्ञाओं का पालन करने के विषय कहा। मत्ती 19:18 बताता है कि उस जवान ने प्रभु से प्रश्न किया, “कौन सी आज्ञाएँ?, जो उसके अंदर विद्यमान उसकी धार्मिकता के प्रति दंभ का सूचक है। उसके उत्तर में प्रभु ने जिन आज्ञाओं का उल्लेख किया वे परमेश्वर द्वारा इस्राएलियों के लिए मूसा में होकर दी गईदस आज्ञाओंका भाग हैं। प्रभु ने उन दस आज्ञाओं में से पहली चार आज्ञाओं को, जो मनुष्य के परमेश्वर के प्रति व्यवहार से संबंधित हैं, उससे नहीं कहा; वरन बाद की छः आज्ञाएँ, जो मनुष्य के मनुष्य के साथ व्यवहार से संबंध रखती हैं, केवल उन्हें ही उसके सामने कहा।
  • पद 20 - यहाँ दिया गया उस जवान व्यक्ति का एक वाक्य का संक्षिप्त उत्तर, उसके विषय बहुत कुछ प्रकट कर देता है। मत्ती 19:20 में लिखा है कि उस जवान ने स्पष्ट यह भी कहा, “अब मुझ में किस बात की घटी है?” अर्थात उसका विवेक गवाही दे रहा था कि उसका लड़कपन से आज्ञाओं को जानने और मानने का दावा, उसकी अपनी धार्मिकता उसे अनन्त जीवन का अधिकारी बनाने के लिए पर्याप्त नहीं है। 
    • प्रभु ने उससे कहा था कि उत्तम केवल परमेश्वर है, तू क्यों मुझे उत्तम कहता है? उस जवान द्वारा इसके बाद भी प्रभु को उत्तम कह कर संबोधित करना यह प्रकट कर देता कि वह प्रभु यीशु को परमेश्वर स्वीकार करता है। किन्तु उसने यह नहीं किया; यहाँ पर अब वह उसेउत्तम गुरुनहीं, केवलहे गुरुसंबोधित करता है; अर्थात, उसके लिए प्रभु यीशु आदरणीय तो था, आराध्य नहीं था। वह एकगुरुसेज्ञानप्राप्त करने आया था, प्रभु से उद्धार का मार्ग सीखने नहीं। यदि वह यीशु को प्रभु स्वीकार करता होता, तो आगे प्रभु द्वारा उसे दिए गए समाधान के प्रति उसकी प्रतिक्रिया भिन्न होती। 
    • उसने यह तो तुरंत कह दिया कि मैं इन आज्ञाओं को लड़कपन से मानता आया हूँ, किन्तु यह नहीं कहा किप्रभु इन्हें ही नहीं, वरन पहली चार आज्ञाओं को भी लड़कपन से मानता आया हूँ।उसका मन, जो उसे उद्धार के विषय बेचैन करता था, यह जानता था कि वह मनुष्यों को दिखाने वाला व्यवहार तो ठीक से निभा रहा है, किन्तु परमेश्वर के प्रति उसका व्यवहार जैसा होना चाहिए, वैसा नहीं है। 
    • उसको लगा होगा किबच गया! यदि यीशु ने मुझसे पहली चार आज्ञाओं के लिए भी कहा होता, तो मैं फंस जाता।किन्तु प्रभु ने उसके सामने एक दर्पण रख दिया था, जिसमें उसे अपनी सच्ची छवि दिख रहे थी, कि वह परमेश्वर की दृष्टि में कैसा दिखता है।
  • पद 21 - उसके इस दिखावे के दोगले जीवन के बावजूद, प्रभु ने उससे फिर भी प्रेम किया; उसका तिरस्कार नहीं किया, वरन उसे उसकी समस्या का समाधान और सिद्धता का मार्ग बता दिया। मत्ती 19:21 से हम देखते है कि प्रभु ने उसे सिद्ध होने के आह्वान के साथ उत्तर दिया, “यीशु ने उस से कहा, यदि तू सिद्ध होना चाहता है; तो जा, अपना माल बेचकर कंगालों को दे; और तुझे स्वर्ग में धन मिलेगा; और आकर मेरे पीछे हो ले। अब आगे की प्रतिक्रिया उस जवान के निर्णय पर, उसकी मनसा पर निर्भर थी - वह किस धन को अधिक महत्व देता था, स्वर्गीय धन को अथवा सांसारिक धन को।
  • पद 22 - प्रभु द्वारा दिए गए समाधान, सांसारिक संपत्ति के मोह से निकलकर, यीशु को अपना प्रभु मानकर, उसके पीछे हो ले, को सुनकर वह उदास हो गया, उस समाधान को अस्वीकार करके, वह शोक करता हुआ वापस लौट गया। उसके वचन के ज्ञान, वचन के पालन, सारी धार्मिकता, दिखाने को प्रभु के प्रति आदर, आदि के बाद भी उसकी वास्तविकता कुछ और ही थी। धर्म के निर्वाह ने उसके मन को नहीं बदला था, उसका मन वास्तव में परमेश्वर से बहुत दूर था। वह अनन्त जीवन के स्रोत के पास आकर भी, उस स्रोत से प्रेम, अनन्त जीवन का निमंत्रण एवं मार्ग प्राप्त करने के बाद भी, अपने अपरिवर्तित मन के कारण वापस नाशमान संसार और विनाश में लौट गया।  
    • यदि प्रभु उसके लिए वास्तव मेंउत्तम गुरुहोता, तो उसके लिए प्रभु की बात को स्वीकार करना अधिक सहज होता। किन्तु यीशु उसके लिए प्रभु नहीं था; केवल एकगुरुथा। 
    • यदि उसकी धार्मिकता ने उसके मन को बदला होता तो वह परमेश्वर द्वारा दी गई सभी आज्ञाओं का ईमानदारी से पालन कर रहा होता, वह इस बात को प्रकट भी करता, और उसके मन की स्थिति दोष भावना वाली नहीं होती। 
    • वह एक बाहर से मनुष्यों को प्रसन्न करने वाला जीवन जी रहा था, किन्तु अंदर से परमेश्वर को प्रसन्न नहीं कर पा रहा था, और इसीलिए वह प्रभु यीशु के पास समाधान के लिए आया था। 
    • उसने प्रभु के प्रति भी बाहर से बहुत आदर दिखाया, किन्तु प्रभु ने उसके सामने उसके मन की स्थिति खोल कर रख दी। 
    • उस सारी धार्मिकता, आज्ञाओं को जानने, उन्हें मानने का दावा करने, स्वर्गीय अनन्त जीवन पाने की इच्छा रखने के बावजूद, मन में वह अभी भी संसार से बंधा हुआ था, और संसार को छोड़ना नहीं चाहता था। उसके धर्म के निर्वाह और वचन के ज्ञान ने उसे संसार के मोह से मुक्ति नहीं दी थी, उसके मन की बेचैनी को शान्त नहीं किया था। 

 

आज परमेश्वर की दृष्टि में, जिससे कोई बात छुपी नहीं है, आपकी वास्तविक स्थिति क्या है? कहीं आपकी दिखने वाली धार्मिकता और अच्छा सामाजिक व्यवहार एक बाहरी आवरण तो नहीं है, जिसे आप अपने अंदर की परमेश्वर से दूरी को ढाँपने के लिए प्रयोग कर रहे हैं? धर्म और धार्मिक बातों के पालन के बावजूद, परमेश्वर की आज्ञाओं को आदर देने और मानने का दावा करने के बावजूद, वह जवान जानता था कि वह अनन्त जीवन से दूर है; उसके अंदर कमी है, जिसका समाधान आवश्यक है। कहीं आप भी तो उस जवान के समान अपने धर्म, धार्मिकता और कर्मों के द्वारा अपने आप को सही और अनन्त जीवन का अधिकारी समझने का प्रयास तो नहीं कर रहे हैं? जैसे उस जवान के लिए, वैसे ही आपके लिए भी ये सभी प्रयास व्यर्थ होंगे।

जैसे प्रभु ने उस जवान से उसकी प्रभु को परमेश्वर अस्वीकार करने, उसके मन की दोगलेपन की स्थिति में भी प्रेम किया, वैसे ही वह आपकी वास्तविकता जानने के बावजूद आज आप से भी प्रेम करता है, आपको भी अनन्त जीवन का मार्ग, आपकी समस्या का समाधान देना चाहता है, आपको सिद्धता का मार्ग दिखाना चाहता है। क्या आपने प्रभु यीशु को वास्तव में अपना प्रभु, अपना स्वामी, अपना उद्धारकर्ता माना है? क्या आप उसके कहे के अनुसार करने के लिए तैयार हैं? आप से भी उसका आह्वान है, इस नश्वर संसार और संसार की नाशमान बातों, आकर्षण, संपदा आदि के मोह से निकलकर, सच्चे और समर्पित मन से, स्वेच्छा से यीशु को अपना प्रभु स्वीकार कर लें, उसके पीछे हो लें। उसके पक्ष में लिए गए निर्णय के पल से लेकर अनन्तकाल के लिए आपके दोनों लोक संवर जाएंगे, आप स्वर्गीय सुरक्षा और आशीषों के भागी हो जाएंगे। स्वेच्छा से, सच्चे पश्चाताप और समर्पण के साथ एक छोटी प्रार्थना, “हे प्रभु यीशु मैं स्वीकार करता हूँ कि मैं पापी हूँ और आपकी अनाज्ञाकारिता करता रहता हूँ। मैं स्वीकार करता हूँ कि आपने मेरे पापों को अपने ऊपर लेकर, मेरे बदले में उनके दण्ड को कलवरी के क्रूस पर सहा, और मेरे लिए अपने आप को बलिदान किया। आप मेरे लिए मारे गए, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए तीसरे दिन जी उठे। कृपया मुझ पर दया करके मेरे पापों को क्षमा कर दीजिए, मुझे अपनी शरण में ले लीजिए, अपना आज्ञाकारी शिष्य बनाकर, अपने साथ कर लीजिए।सच्चे मन से की गई पश्चाताप और समर्पण की एक प्रार्थना आपके जीवन को अभी से लेकर अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय जीवन बना देगी, स्वर्गीय आशीषों का वारिस कर देगी। 

 

बाइबल पाठ: भजन 15 

भजन संहिता 15:1 हे परमेश्वर तेरे तम्बू में कौन रहेगा? तेरे पवित्र पर्वत पर कौन बसने पाएगा?

भजन संहिता 15:2 वह जो खराई से चलता और धर्म के काम करता है, और हृदय से सच बोलता है;

भजन संहिता 15:3 जो अपनी जीभ से निन्दा नहीं करता, और न अपने मित्र की बुराई करता, और न अपने पड़ोसी की निन्दा सुनता है;

भजन संहिता 15:4 वह जिसकी दृष्टि में निकम्मा मनुष्य तुच्छ है, और जो यहोवा के डरवैयों का आदर करता है, जो शपथ खाकर बदलता नहीं चाहे हानि उठानी पड़े;

भजन संहिता 15:5 जो अपना रुपया ब्याज पर नहीं देता, और निर्दोष की हानि करने के लिये घूस नहीं लेता है। जो कोई ऐसी चाल चलता है वह कभी न डगमगाएगा।

 

एक साल में बाइबल:

·      भजन 146-147

·      1 कुरिन्थियों 15:1-28

शनिवार, 4 सितंबर 2021

परमेश्वर का वचन, बाइबल – पाप और उद्धार - 10

 

पाप का समाधान - उद्धार - 6

पिछले लेखों में हम बाइबल की प्रथम पुस्तक, उत्पत्ति के 3 अध्याय में दिए गए प्रथम पाप और उसके परिणामों और प्रभावों के विवरण पर आधारित, पाप के समाधान और उस समाधान से संबंधित तीन महत्वपूर्ण प्रश्नों में से पहले दो, “उद्धार किससे और क्यों”; तथाव्यक्ति इस उद्धार को कैसे प्राप्त कर सकता है?” को, और उनके निष्कर्षों को विस्तार से देख चुके हैं। हमने देखा कि पाप का मनुष्य जीवन और सृष्टि में प्रवेश परमेश्वर के प्रति अविश्वास, और इस कारण उसकी अनाज्ञाकारिता के द्वारा हुआ। पाप के मानव जीवन में आने और बस जाने के समय न तो कोई धर्म था, न किसी धर्म, और न किसी धार्मिक अनुष्ठान अथवा या रीति की कोई अवहेलना हुई। इसलिए पाप के समाधान के लिए भी किसी भी धर्म की कोई आवश्यकता नहीं है। परमेश्वर द्वारा दिए गए पाप के समाधान में न तो कोई धर्म, और न ही कोई धार्मिक प्रक्रिया सम्मिलित है। परमेश्वर का समाधान, मनुष्य का उसके प्रति विश्वास और उस विश्वास पर आधारित परमेश्वर की सम्पूर्ण आज्ञाकारिता एवं समर्पण पर निर्भर है। इस पूरी प्रक्रिया में मनुष्य को केवल परमेश्वर द्वारा उपलब्ध करवाए गए समाधान को अपने जीवन में कार्यान्वित करना है; उसमें अपनी कोई बात, योजना, विधि आदि नहीं सम्मिलित करनी है, और न ही किसी अन्य मनुष्य की मध्यस्थता अथवा योगदान को सम्मिलित करना है। बिना किसी धर्म अथवा किसी धार्मिक प्रक्रिया को किए, केवल और केवल प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास, समर्पण, और आज्ञाकारिता पर आधारित परमेश्वर द्वारा दिया गया यह सीधा, साधारण समाधान बहुत से लोगों को अटपटा और अस्वीकार्य लगता है, क्योंकि उन्हें लगता है कि यह अपर्याप्त होगा; अथवा उनके धर्म के काम और धर्म का निर्वाह उन्हें परमेश्वर को स्वीकार्य बनाने के लिए पर्याप्त और उचित है, इसलिए उन्हें और किसी बात की कोई आवश्यकता नहीं है। 

उद्धार से संबंधित तीसरे महत्वपूर्ण प्रश्न, “इसके लिए यह इतना आवश्यक क्यों हुआ कि स्वयं परमेश्वर प्रभु यीशु को स्वर्ग छोड़कर सँसार में बलिदान होने के लिए आना पड़ा?” को देखने से पहले आज से हम परमेश्वर के वचन बाइबल में से तीन बड़े धर्मी और परमेश्वर की व्यवस्था का गंभीरता से पालन करने वाले लोगों के जीवन से देखेंगे कि उनके द्वारा अपने धर्म का निर्वाह, उन्हें उद्धार प्रदान करने और परमेश्वर को स्वीकार्य होने के लिए अपर्याप्त था; स्वयं उनका विवेक उन्हें बता रहा था कि उनकी इस धर्म-परायणता के बावजूद, वे अभी परमेश्वर के सम्मुख खड़े नहीं हो सकते। 

पहला उदाहरण है यहूदियों के उच्च धार्मिक अगुवे, नीकुदेमुस का है:

यूहन्ना 3:1 फरीसियों में से नीकुदेमुस नाम एक मनुष्य था, जो यहूदियों का सरदार था।

यूहन्ना 3:2 उसने रात को यीशु के पास आकर उस से कहा, हे रब्बी, हम जानते हैं, कि तू परमेश्वर की ओर से गुरु हो कर आया है; क्योंकि कोई इन चिन्हों को जो तू दिखाता है, यदि परमेश्वर उसके साथ न हो, तो नहीं दिखा सकता।

यूहन्ना 3:3 यीशु ने उसको उत्तर दिया; कि मैं तुझ से सच सच कहता हूं, यदि कोई नये सिरे से न जन्मे तो परमेश्वर का राज्य देख नहीं सकता।

यूहन्ना 3:4 नीकुदेमुस ने उस से कहा, मनुष्य जब बूढ़ा हो गया, तो क्योंकर जन्म ले सकता है? क्या वह अपनी माता के गर्भ में दूसरी बार प्रवेश कर के जन्म ले सकता है?

यूहन्ना 3:5 यीशु ने उत्तर दिया, कि मैं तुझ से सच सच कहता हूं; जब तक कोई मनुष्य जल और आत्मा से न जन्मे तो वह परमेश्वर के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकता।

यूहन्ना 3:6 क्योंकि जो शरीर से जन्मा है, वह शरीर है; और जो आत्मा से जन्मा है, वह आत्मा है।

यूहन्ना 3:7 अचम्भा न कर, कि मैं ने तुझ से कहा; कि तुम्हें नये सिरे से जन्म लेना अवश्य है।

यूहन्ना 3:8 हवा जिधर चाहती है उधर चलती है, और तू उसका शब्द सुनता है, परन्तु नहीं जानता, कि वह कहां से आती और किधर को जाती है? जो कोई आत्मा से जन्मा है वह ऐसा ही है।

यूहन्ना 3:9 नीकुदेमुस ने उसको उत्तर दिया; कि ये बातें क्योंकर हो सकती हैं?

यूहन्ना 3:10 यह सुनकर यीशु ने उस से कहा; तू इस्राएलियों का गुरु हो कर भी क्या इन बातों को नहीं समझता?” 

       उपरोक्त खंड से हम नीकुदेमुस के बारे में और प्रभु यीशु की बारे में उसके विचारों को देखते हैं:

  • पद 1 - वह एक फरीसी था, और यहूदियों का सरदार था। प्रभु यीशु की पृथ्वी की सेवकाई के समय में, फरीसी लोग परमेश्वर के मंदिर को और परमेश्वर की व्यवस्था के अध्ययन तथा शिक्षा को समर्पित जीवन जीने वाले लोगों का समुदाय थे। उनकी जीविका परमेश्वर के मंदिर से थी, और वे परमेश्वर के वचन के अध्ययन, व्याख्या, और लोगों को उसकी शिक्षा देने में समय बिताते थे; और नीकुदेमुस इन फरीसियों का एक प्रधान या सरदार था। उसका यह परिचय बताता है कि वह परमेश्वर के वचन और धर्म की बातों के पालन में कितना संलग्न और उच्च ओहदा रखने वाला होगा। 
  • सामान्यतः, फरीसी लोग प्रभु यीशु मसीह को पसंद नहीं करते थे, उससे बैर, द्वेष रखते थे, क्योंकि प्रभु उनके जीवन के पाखण्ड और दोगलेपन को स्पष्ट प्रकट कर देने और इसके लिए उन्हें उलाहना देने में हिचकिचाता नहीं था। प्रभु उनकी धार्मिकता को भी मानता था; किन्तु उसने यह भी बताया था कि परमेश्वर के सम्मुख उनके स्वीकार्य होने के लिए उनकी यह धार्मिकता अपर्याप्त हैक्योंकि मैं तुम से कहता हूं, कि यदि तुम्हारी धामिर्कता शास्त्रियों और फरीसियों की धामिर्कता से बढ़कर न हो, तो तुम स्वर्ग के राज्य में कभी प्रवेश करने न पाओगे” (मत्ती 5:20)। नीकुदेमुस फरीसियों में अपने ओहदे और साख को भी बनाए रखना चाहता था, और अपने मन की दुविधा का समाधान भी प्रभु से चाहता था। इसलिए वह सब की नज़रों से बचता हुआ, प्रभु से मिलने के लिए रात में आया (पद 2) 
  • पद 2 हमें यह भी दिखाता है कि फरीसियों का वह सरदार प्रभु यीशु का बहुत आदर करता था - उस धर्म गुरुओं के अगुवे ने प्रभु यीशु कोहे रब्बीअर्थातहे गुरुकहकर संबोधित किया। साथ ही उसने यह भी स्वीकार किया कि:
    • प्रभु यीशु परमेश्वर की ओर से गुरु होकर आया है
    • परमेश्वर प्रभु यीशु के साथ है
    • यह बात उन चिह्नों से प्रमाणित हो जाती है जो प्रभु यीशु करता था। 

कुल मिलाकर, प्रभु यीशु के प्रति नीकुदेमुस के मन और व्यवहार में बहुत आदर और भक्ति का भाव था। इसी कारण वह प्रभु के पास अपनी समस्या के समाधान के लिए आया था - अपने सारे ज्ञान, समझ, ओहदे, और दूसरों को परमेश्वर के वचन की शिक्षा देने वाला होने के बावजूद, उसका मन शान्त नहीं था; उसे यह निश्चय नहीं था कि वह परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करने भी पाएगा या नहीं। वह प्रभु से इसका समाधान जानना चाहता था। 

  • पद 3 में प्रभु यीशु उससे और कोई बात करने के स्थान पर, सीधे उसके मन की बेचैनी को संबोधित करता है। प्रभु उस धर्म-गुरु को, जो प्रभु यीशु का भी बहुत आदर करता था, स्पष्ट शब्दों में कह देता है, “मैं तुझ से सच सच कहता हूं, यदि कोई नये सिरे से न जन्मे तो परमेश्वर का राज्य देख नहीं सकता” - अर्थात, उसकी धार्मिकता, परमेश्वर के वचन का ज्ञान और समझ, धार्मिक समुदाय में उसका ओहदा, प्रभु यीशु मसीह के प्रति उसका आदर - न तो इनमें से कुछ भी, और न ही ये सब मिलाकर भी, उसके मन की समस्या का समाधान थे। बिना नया जन्म पाए वह परमेश्वर के राज्य को देख भी नहीं सकता था!
  • पद 4, 5 - नीकुदेमुस प्रभु के प्रत्युत्तर से हक्का-बक्का रह गया। उसके विचारों मेंजन्मका एक ही अर्थ था, और वह उसी के अनुसार प्रभु से प्रश्न करता है, उससे जानना चाहता है कि दोबारा जन्म लेना कैसे संभव हो सकता है? तब प्रभु यीशु उसेनया जन्मका अभिप्राय बताता है - नीकुदेमुस जिस जन्म की बात कर रहा था वह शारीरिक जन्म था; प्रभु जिस नए जन्म की बात कह रहा था, वह जल और परमेश्वर के आत्मा द्वारा आत्मिक जन्म था, जो व्यक्ति को स्वेच्छा से, अपने निर्णय के साथ लेना होता है। शारीरिक जन्म स्वाभाविक जन्म है जो मनुष्य शरीर की रीति के अनुसार लेता है; नया जन्म आत्मिक जन्म है जिसके लिए मनुष्य को समझ-बूझ के साथ व्यक्तिगत निर्णय लेना होता है। साथ ही प्रभु यीशु ने यह भी कहा, जब तक कोई नया जन्म न लेवह परमेश्वर के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकतालगभग एक ही साथ प्रभु ने दो बार, व्यक्ति के परमेश्वर के राज्य के लिए योग्य गिने जाने के लिए, नए जन्म की अनिवार्यता को कहा। और वह भी एक उच्च धार्मिक अगुवे से जो परमेश्वर के वचन को अच्छे से जानता था, प्रभु का आदर करता था।
  • पद 6, 7 - फिर प्रभु नीकुदेमुस को शारीरिक और नए जन्म के प्रभाव को समझाता है - नया जन्म व्यक्ति का शारीरिक से आत्मिक जन्म है; अविनाशी आत्मा का मरनहार शरीर को छोड़ कर अनन्तकालीन आत्मिक स्थान में परमेश्वर के साथ रहने के लिए तैयार होने का आरंभ। और अब तीसरी बार प्रभु उससे नया जन्म लेने की अनिवार्यता को कहता है। यही दिखाता है कि प्रभु की दृष्टि में यह नया जन्म कितना महत्वपूर्ण और आवश्यक है; हर एक के लिए अनिवार्य है। 
  • पद 8 - प्रभु फिर नया जन्म पा लेने की पहचान एक सांसारिक उदाहरण से देता है - हवा का प्रवाह। हवा दिखती नहीं है, किन्तु उसकी उपस्थिति उसके प्रवाह, उसके प्रवाह से उत्पन्न ध्वनि, और उसके प्रभावों से पता चल जाती है, प्रमाणित हो जाती है। इसी प्रकार जिसने नया जन्म पाया है, जो परमेश्वर के आत्मा और जल से जन्मा है, उसके जीवन में आए हुए परिवर्तन, उसके कार्य, उसके शब्द, बता देते हैं कि उसने नया जन्म पा लिया। 
  • पद 9, 10 - नीकुदेमुस अभी भी असमंजस में है, उसका मन और मस्तिष्क इस अद्भुत और महान तथ्य को ग्रहण नहीं कर पा रहा है, वह फिर इन बातों के प्रति अपने अविश्वास को व्यक्त करता है। तब प्रत्युत्तर में प्रभु उससे एक और उसे हिला देने वाली बात कहता हैतू इस्राएलियों का गुरु हो कर भी क्या इन बातों को नहीं समझता?” अर्थात, “मैं जो तुझ से कह रहा हूँ, वह कोई नई बात नहीं है; वचन में विद्यमान शिक्षा, जिसका तू ज्ञाता और शिक्षक है, उसी को व्यक्त कर रहा हूँ। इसलिए, इस्राएलियों का गुरु होने के नाते, तुझे तो यह बात तुरंत समझ आ जानी चाहिए।प्रभु यीशु नीकुदेमुस से उस समय उपलब्ध परमेश्वर के वचन, जो वर्तमान बाइबल का पुराना नियम है, उसमें लिखी हुई परमेश्वर के साथ संगति कर पाने के योग्य होने की बात (भजन 15; 51:6, 10; 73:1; आदि) कर रहा था। पुराने नियम की उन शिक्षाओं का सार था परमेश्वर के साथ धार्मिक क्रियाओं और अनुष्ठानों को करने वाले नहीं, वरन केवल शुद्ध मन वाले ही रह सकते हैं। परमेश्वर ने यशायाह 1:1-20 में धार्मिक विधियों को मनाते रहने वाले किन्तु मन और व्यवहार में सांसारिक तथा दुराचारी इस्राएलियों की इसभक्तिको अस्वीकार कर दिया; मलाकी 1:10 में ऐसेधर्मका निर्वाह करते हुए भी परमेश्वर के विमुख चलने वाले लोगों के लिए परमेश्वर ने कहा, “भला होता कि तुम में से कोई मन्दिर के किवाड़ों को बन्द करता कि तुम मेरी वेदी पर व्यर्थ आग जलाने न पाते! सेनाओं के यहोवा का यह वचन है, मैं तुम से कदापि प्रसन्न नहीं हूं, और न तुम्हारे हाथ से भेंट ग्रहण करूंगानीकुदेमुस से प्रभु यही बातनया जन्मलेने के नाम से दोहरा रहा था - जब तक व्यक्ति मन की शुद्धता और समर्पण के साथ परमेश्वर के पास नहीं आएगा, वह परमेश्वर के राज्य में कदापि प्रवेश न करेगा; चाहे वह कितना ही विद्वान, वचन का ज्ञाता और शिक्षक, और धार्मिक क्रिया-कलापों तथा अनुष्ठानों को पूरा करने वाला क्यों न हो, लोगों में कैसा भी ओहदा और सम्मानजनक स्थान क्यों न रखता हो। 

 

       नीकुदेमुस के साथ प्रभु के वार्तालाप से प्रत्येक व्यक्ति के लिए परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करने के लिए धर्म के निर्वाह और वचन का ज्ञाता होने के स्थान पर प्रभु के प्रति सच्चे मन से पूर्णतः समर्पित, तथा उसका आज्ञाकारी शिष्य होने की अनिवार्यता की शिक्षा हमें मिलती है। आज प्रभु यीशु की अपने शिष्यों तथा सभी लोगों के लिए यही शिक्षा हैअचम्भा न कर, कि मैं ने तुझ से कहा; कि तुम्हें नये सिरे से जन्म लेना अवश्य है” (यूहन्ना 3:7)। संभव है कि आप नीकुदेमुस के समान बहुत धर्मी, बाइबल के विद्वान और ज्ञाता, तथा शिक्षक हों, अपनी इसधार्मिकताके कारण समाज और अपने समुदाय में बहुत नाम और स्थान रखते हों, किन्तु नीकुदेमुस के समान ही प्रभु के कहे के अनुसार, आपको भीनया जन्मलेना अनिवार्य है; बिना ऐसा किए आप परमेश्वर के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकेंगे। और यदि यह नया जन्म पाना नीकुदेमुस जैसे धर्मी व्यक्ति के लिए अनिवार्य था, तो फिर किसी अन्य “सामान्य” धर्मी व्यक्ति के लिए और कितना आवश्यक तथा अनिवार्य है।

       अपने अनन्तकाल को दांव पर मत लगाइए, जोखिम मत उठाइए। स्वेच्छा, तथा सच्चे और समर्पित मन से पश्चाताप की एक छोटी प्रार्थना आपके लिए स्वर्ग के वे द्वार खोल देगी, जो आपकी अपनीधार्मिकताऔर धार्मिक रीति-रिवाज़ों का निर्वाह करना नहीं खोल सका है। अभी अवसर है, अभी प्रभु से कुछ इस प्रकार से प्रार्थना कीजिएहे प्रभु यीशु मैं स्वीकार करता हूँ कि मैं पापी हूँ और आपकी अनाज्ञाकारिता करता रहता हूँ। मैं स्वीकार करता हूँ कि आपने मेरे पापों को अपने ऊपर लेकर, मेरे बदले में उनके दण्ड को कलवरी के क्रूस पर सहा, और मेरे लिए अपने आप को बलिदान किया। आप मेरे लिए मारे गए, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए तीसरे दिन जी उठे। कृपया मुझ पर दया करके मेरे पापों को क्षमा कर दीजिए, मुझे अपनी शरण में ले लीजिए, अपना आज्ञाकारी शिष्य बनाकर, अपने साथ कर लीजिए।इसके विषय अंतिम निर्णय आपका है। 

 

बाइबल पाठ: 1 शमूएल 15:22-23; व्यवस्थाविवरण 8:20; लूका 16:10

1 शमूएल 15:22 शमूएल ने कहा, क्या यहोवा होमबलियों, और मेलबलियों से उतना प्रसन्न होता है, जितना कि अपनी बात के माने जाने से प्रसन्न होता है? सुन मानना तो बलि चढ़ाने और कान लगाना मेढ़ों की चर्बी से उत्तम है।

1 शमूएल 15:23 देख बलवा करना और भावी कहने वालों से पूछना एक ही समान पाप है, और हठ करना मूरतों और गृह-देवताओं की पूजा के तुल्य है। तू ने जो यहोवा की बात को तुच्छ जाना, इसलिये उसने तुझे राजा होने के लिये तुच्छ जाना है।

व्यवस्थाविवरण 8:20 जिन जातियों को यहोवा तुम्हारे सम्मुख से नष्ट करने पर है, उन्हीं के समान तुम भी अपने परमेश्वर यहोवा का वचन न मानने के कारण नष्ट हो जाओगे।

लूका 16:10 जो थोड़े से थोड़े में सच्चा है, वह बहुत में भी सच्चा है: और जो थोड़े से थोड़े में अधर्मी है, वह बहुत में भी अधर्मी है।

 

एक साल में बाइबल:

·      भजन 143-145

·      1 कुरिन्थियों 14:21-40

शुक्रवार, 3 सितंबर 2021

परमेश्वर का वचन, बाइबल – पाप और उद्धार - 9

 

पाप का समाधान - उद्धार - 5

       पिछले चार लेखों से हम बाइबल की प्रथम पुस्तक, उत्पत्ति के 3 अध्याय में दिए गए प्रथम पाप और उसके परिणामों और प्रभावों के विवरण पर आधारित पाप के समाधान, तथा उद्धार से संबंधित तीन महत्वपूर्ण प्रश्नों को देख रहे हैं। हमने पहले प्रश्न –उद्धार किससे और क्योंपर विचार करने और उसके निष्कर्ष पर पहुँचने के पश्चात, पिछले लेख में दूसरे प्रश्नव्यक्ति इस उद्धार को कैसे प्राप्त कर सकता है?” पर विचार आरंभ किया था। इस दूसरे प्रश्न के अंतर्गत हमें देखा कि पाप व्यक्ति के द्वारा व्यक्तिगत रीति से की गई परमेश्वर की अनाज्ञाकारिता है; जब प्रथम पाप किया गया, उस समय न तो वहाँ कोई धर्म था, और न ही किसी धर्म का कोई उल्लंघन हुआ, और न ही परमेश्वर ने किसी धर्म के द्वारा उस पाप के समाधान और निवारण की बात की। पाप करने का आधार तथा कारण मनुष्य का परमेश्वर की मनुष्य के प्रति योजनाओं और इच्छाओं में अविश्वास करना था। इसीलिए, परमेश्वर ने मनुष्य के जीवन में आई पाप की इस समस्या का समाधान मनुष्य के स्वेच्छा और सच्चे मन से उसकी पूर्ण आज्ञाकारिता में आ जाने और पापों से पश्चाताप तथा प्रभु यीशु मसीह को उद्धारकर्ता स्वीकार कर लेने और उसके साथ उस खोए हुए विश्वास के संबंध को बहाल कर लेने के द्वारा दिया। 

पाप के इस समाधान में निहित कुछ अन्य आधारभूत और अति महत्वपूर्ण तात्पर्य हैं। इस संबंध की पुनः स्थापना के साथ ही प्रत्येक व्यक्ति द्वारा व्यक्तिगत रीति से इन तात्पर्यों को भी स्वीकार करना और उनके अनुसार अपने जीवन के विषय निर्णय लेना और जीवन को सुधारना भी अनिवार्य है। 

ये निहित तात्पर्य हैं:

  • क्योंकि पाप का प्रवेश व्यक्तिगत अनाज्ञाकारिता के कारण हुआ - अनाज्ञाकारी होकर उस वर्जित फल को हव्वा ने भी खाया और आदम ने भी खाया (उत्पत्ति 3:6), इसीलिए पाप का समाधान और निवारण भी किसी धर्म विशेष को मानने वाले परिवार में जन्म लेने, और उस धर्म से संबंधित रीति-रिवाज़ों के निर्वाह के द्वारा नहीं, वरन, प्रत्येक व्यक्ति के द्वारा अपने पापों के लिए परमेश्वर के समक्ष व्यक्तिगत पश्चाताप, परमेश्वर को सम्पूर्ण समर्पण, और फिर उसकी आज्ञाकारिता में बने रहने के निर्णय के द्वारा ही है। 
  • यह समाधान पैतृक विरासत अथवा वंशागत नहीं व्यक्तिगत है; अर्थात, माता-पिता या परिवार के किसी अन्य सदस्य अथवा परिवार के प्राचीनों के पश्चाताप और समर्पण के द्वारा उनकी संतान, संबंधी, और भावी पीढ़ी उद्धार नहीं पाती है। हर पीढ़ी, और हर व्यक्ति को, अपने पापों के लिए स्वयं ही पश्चाताप और समर्पण करना होता हैपरन्तु जितनों ने उसे ग्रहण किया, उसने उन्हें परमेश्वर के सन्तान होने का अधिकार दिया, अर्थात उन्हें जो उसके नाम पर विश्वास रखते हैं। वे न तो लहू से, न शरीर की इच्छा से, न मनुष्य की इच्छा से, परन्तु परमेश्वर से उत्पन्न हुए हैं” (यूहन्ना 1:12-13) 
  • कोई भी व्यक्ति मसीही विश्वासी के रूप में जन्म नहीं लेता है; प्रत्येक व्यक्ति को मसीही विश्वासी तथा परमेश्वर की संतान बनने के लिए शारीरिक जन्म के बाद स्वेच्छा और सच्चे समर्पण के द्वारा, परमेश्वर के परिवार में, एक आत्मिक जन्म लेना पड़ता है – अपने पापों के पश्चाताप और प्रभु यीशु मसीह को अपना व्यक्तिगत उद्धारकर्ता स्वीकार करने के द्वारा यह नया जन्मलेना पड़ता है। उसके सांसारिक परिवार के लोगों और पूर्वजों की धार्मिकता और उनका उद्धार, उसे उद्धार प्रदान नहीं करते हैं। 
  • मनुष्य किसी भी प्रकार से परमेश्वर द्वारा प्रदान किए गए इस सिद्ध कार्य को न तो संवार सकता है, न ही सुधार कर और बेहतर कर सकता है। अपनी बुद्धि, समझ, और योजनाओं को इसमें मिलाने के द्वारा इसे बिगाड़ कर व्यर्थ अवश्य कर सकता हैक्योंकि मसीह ने मुझे बपतिस्मा देने को नहीं, वरन सुसमाचार सुनाने को भेजा है, और यह भी शब्दों के ज्ञान के अनुसार नहीं, ऐसा न हो कि मसीह का क्रूस व्यर्थ ठहरे” (1 कुरिन्थियों 1:17) 
  • इस उद्धार के लिए जो भी करना था, जो भी कीमत चुकानी थी, वह सब कुछ परमेश्वर ने पूर्णतः कर के दे दिया है। मनुष्य को परमेश्वर द्वारा किए गए इस उद्धार के कार्य में अब और कुछ नहीं जोड़ना है, कुछ नहीं करना है, “क्योंकि तुम जानते हो, कि तुम्हारा निकम्मा चाल-चलन जो बाप दादों से चला आता है उस से तुम्हारा छुटकारा चान्दी सोने अर्थात नाशमान वस्तुओं के द्वारा नहीं हुआ। पर निर्दोष और निष्कलंक मेम्ने अर्थात मसीह के बहुमूल्य लहू के द्वारा हुआ” (1 पतरस 1:18-19)। न कोई कर्म-कांड, न कोई विधि-विधान, न किसी अन्य मनुष्य की मध्यस्थता अथवा सहयोग की आवश्यकता। बस स्वेच्छा से प्रभु यीशु को अपना व्यक्तिगत उद्धारकर्ता स्वीकार कर लेना है, उसके प्रति समर्पित होकर, अपने जीवन को उसके प्रति आज्ञाकारी कर लेना है – इसे ही नया जन्म पाना कहते हैं, जिसके बिना कोई स्वर्ग में प्रवेश तो दूर, उसे देख भी नहीं सकता हैयीशु ने उसको उत्तर दिया; कि मैं तुझ से सच सच कहता हूं, यदि कोई नये सिरे से न जन्मे तो परमेश्वर का राज्य देख नहीं सकता” “यीशु ने उत्तर दिया, कि मैं तुझ से सच सच कहता हूं; जब तक कोई मनुष्य जल और आत्मा से न जन्मे तो वह परमेश्वर के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकता” (यूहन्ना 3:3, 5) 
  • बाइबल यह स्पष्ट बताती है कि मनुष्य के लिए धर्म के निर्वाह की धार्मिकता अपर्याप्त हैक्योंकि मैं तुम से कहता हूं, कि यदि तुम्हारी धामिर्कता शास्त्रियों और फरीसियों की धामिर्कता से बढ़कर न हो, तो तुम स्वर्ग के राज्य में कभी प्रवेश करने न पाओगे” (मत्ती 5:20); परमेश्वर के दृष्टि में मैले चिथड़ों के समान व्यर्थ है “हम तो सब के सब अशुद्ध मनुष्य के से हैं, और हमारे धर्म के काम सब के सब मैले चिथड़ों के समान हैं। हम सब के सब पत्ते के समान मुर्झा जाते हैं, और हमारे अधर्म के कामों ने हमें वायु के समान उड़ा दिया है” (यशायाह 64:6)। 

 

       पाप और उद्धार से संबंधित चर्चा के इस महत्वपूर्ण दूसरे प्रश्न का निष्कर्ष है कि पाप का समाधान और उद्धार किसी धर्म के कार्य अथवा धर्म के निर्वाह के द्वारा नहीं है; न ही यह किसी धर्म विशेष की बात है; और न ही पैतृक अथवा वंशागत है। प्रत्येक व्यक्ति को अपने पापों के लिए स्वयं पश्चाताप करना होगा, उनके लिए स्वयं प्रभु यीशु से क्षमा माँगनी होगी, स्वयं ही अपना जीवन प्रभु यीशु को समर्पित करना होगा, उसका आज्ञाकारी शिष्य बनने का स्वयं ही निर्णय लेना होगा।

     क्या आपने वास्तव में उद्धार पाया है? यदि नहीं, तो स्वेच्छा से, सच्चे पश्चाताप और समर्पण के साथ एक छोटी प्रार्थना, “हे प्रभु यीशु मैं स्वीकार करता हूँ कि मैं पापी हूँ और आपकी अनाज्ञाकारिता करता रहता हूँ। मैं स्वीकार करता हूँ कि आपने मेरे पापों को अपने ऊपर लेकर, मेरे बदले में उनके दण्ड को कलवरी के क्रूस पर सहा, और मेरे लिए अपने आप को बलिदान किया। आप मेरे लिए मारे गए, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए तीसरे दिन जी उठे। कृपया मुझ पर दया करके मेरे पापों को क्षमा कर दीजिए, मुझे अपनी शरण में ले लीजिए, अपना आज्ञाकारी शिष्य बनाकर, अपने साथ कर लीजिए।सच्चे मन से की गई पश्चाताप और समर्पण की एक प्रार्थना आपके जीवन को अभी से लेकर अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय जीवन बना देगी, स्वर्गीय आशीषों का वारिस कर देगी। 

बाइबल पाठ: रोमियों 7:15-8:1

रोमियों 7:15 और जो मैं करता हूं, उसको नहीं जानता, क्योंकि जो मैं चाहता हूं, वह नहीं किया करता, परन्तु जिस से मुझे घृणा आती है, वही करता हूं।

रोमियों 7:16 और यदि, जो मैं नहीं चाहता वही करता हूं, तो मैं मान लेता हूं, कि व्यवस्था भली है।

रोमियों 7:17 तो ऐसी दशा में उसका करने वाला मैं नहीं, वरन पाप है, जो मुझ में बसा हुआ है।

रोमियों 7:18 क्योंकि मैं जानता हूं, कि मुझ में अर्थात मेरे शरीर में कोई अच्छी वस्तु वास नहीं करती, इच्छा तो मुझ में है, परन्तु भले काम मुझ से बन नहीं पड़ते।

रोमियों 7:19 क्योंकि जिस अच्छे काम की मैं इच्छा करता हूं, वह तो नहीं करता, परन्तु जिस बुराई की इच्छा नहीं करता वही किया करता हूं।

रोमियों 7:20 परन्तु यदि मैं वही करता हूं, जिस की इच्छा नहीं करता, तो उसका करने वाला मैं न रहा, परन्तु पाप जो मुझ में बसा हुआ है।

रोमियों 7:21 सो मैं यह व्यवस्था पाता हूं, कि जब भलाई करने की इच्छा करता हूं, तो बुराई मेरे पास आती है।

रोमियों 7:22 क्योंकि मैं भीतरी मनुष्यत्व से तो परमेश्वर की व्यवस्था से बहुत प्रसन्न रहता हूं।

रोमियों 7:23 परन्तु मुझे अपने अंगों में दूसरे प्रकार की व्यवस्था दिखाई पड़ती है, जो मेरी बुद्धि की व्यवस्था से लड़ती है, और मुझे पाप की व्यवस्था के बन्धन में डालती है जो मेरे अंगों में है।

रोमियों 7:24 मैं कैसा अभागा मनुष्य हूं! मुझे इस मृत्यु की देह से कौन छुड़ाएगा?

रोमियों 7:25 मैं अपने प्रभु यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर का धन्यवाद करता हूं: निदान मैं आप बुद्धि से तो परमेश्वर की व्यवस्था का, परन्तु शरीर से पाप की व्यवस्था का सेवन करता हूँ।

रोमियों 8:1 सो अब जो मसीह यीशु में हैं, उन पर दण्ड की आज्ञा नहीं: क्योंकि वे शरीर के अनुसार नहीं वरन आत्मा के अनुसार चलते हैं।

एक साल में बाइबल:

·      भजन 140-142

·      1 कुरिन्थियों 14:1-20

गुरुवार, 2 सितंबर 2021

परमेश्वर का वचन, बाइबल – पाप और उद्धार - 8

 

पाप का समाधान - उद्धार - 4 

 पिछले तीन लेखों में हमने उद्धार से संबंधित पहले प्रश्न –उद्धार किससे और क्योंको बाइबल की प्रथम पुस्तक, उत्पत्ति के 3 अध्याय में दिए गए विवरण के अनुसार विस्तार से देखा है; और पिछले लेख में हम इस प्रश्न के निष्कर्ष पर पहुंचे थे। निष्कर्ष में हमें दोनों बातों, “उद्धार किससेतथाउद्धार क्योंको देखा था, जो संक्षेप में इस प्रकार है:

  • किस से - उद्धार या बचाव पाप के दुष्प्रभावों से होना है, जिन के कारण मनुष्यों में आत्मिक एवं शारीरिक मृत्यु, डर, अहं, दोष, लज्जा, परमेश्वर से दूरी, अपनी गलतियों के लिए बहाने बनाना तथा दूसरों पर दोषारोपण करने, परमेश्वर की कृपा को नजरंदाज करने जैसी प्रवृत्ति और भावनाएं आ गई हैं।
  • क्यों - क्योंकि हमारा सृष्टिकर्ता परमेश्वर हमारे पापों में पड़े हुए होने की दशा में भी, हम सभी मनुष्यों से अभी भी प्रेम करता है, हमारे साथ संगति में रखना चाहता है; वह चाहता है कि हम उस से मेल-मिलाप कर लें, और उसके पुत्र-पुत्री होने के दर्जे को स्वीकार कर लें (यूहन्ना 1:2-13)। वह हमें विनाश में नहीं आशीष में देखना चाहता है और अपने साथ स्वर्ग में स्थान देना चाहता है। परमेश्वर की इस मनसा को स्वीकार करना अथवा नहीं करना, प्रत्येक मनुष्य का अपना निर्णय है।

 

       आज से हम दूसरे प्रश्न, “व्यक्ति इस उद्धार को कैसे प्राप्त कर सकता है?” पर विचार आरंभ करेंगे, और हमारे विचार का आधार बाइबल की प्रथम पुस्तक, उत्पत्ति के 3 अध्याय में दिया गया पहले पाप का विवरण ही रहेगा। 

हम देख चुके हैं कि उद्धार, उस प्रथम पाप द्वारा कार्यान्वित हुई विनाशक प्रक्रिया और उसके परिणामों को उलट कर वापस सृष्टि के समय की हमारी प्रथम स्थिति में बहाल किए जाने, तथा परिणामस्वरूप परमेश्वर के साथ टूटी हुई इस संगति में पुनः पहले के समान स्थापित हो जाना, तथा मृत्यु अर्थात परमेश्वर से उस अनन्त दूरी से बच जाना है।

 

मनुष्य उद्धार कैसे प्राप्त करे के संदर्भ में कुछ अति-महत्वपूर्ण, समझने के लिए अनिवार्य, एवं समाधान के लिए निर्णायक बातों पर ध्यान कीजिए: 

  • मनुष्य के उस प्रथम पाप के कारण किसी धर्म के निर्वाह का उल्लंघन नहीं हुआ था – क्योंकि जब वह प्रथम पाप हुआ, तब वहाँ कोई धर्म तो था ही नहीं! क्योंकि परमेश्वर का न तो कोई धर्म है, और न ही परमेश्वर ने कभी कोई भी धर्म बनाया अथवा बनवाया। संसार के सभी धर्म, ईसाई धर्म सहित, पाप में गिरे हुए मनुष्य के मन और विचारों की उपज हैं और पाप के कारण मनुष्यों में आई हुई परमेश्वर से विमुख कर देने वाली प्रवृत्ति एवं मानसिकता, मनुष्य को परमेश्वर की ओर फेर देना वाला उपाय नहीं प्रदान कर सकती हैअशुद्ध वस्तु से शुद्ध वस्तु को कौन निकाल सकता है? कोई नहीं” (अय्यूब 14:4) 
  • इसीलिए, अपने सभी दावों और आश्वासनों के बावजूद, आज तक कभी भी कोई भी धर्म किसी भी मनुष्य को निष्पाप, पवित्र, और परमेश्वर के समक्ष खड़ा होने योग्य नहीं बना सका हैहम तो सब के सब अशुद्ध मनुष्य के से हैं, और हमारे धर्म के काम सब के सब मैले चिथड़ों के समान हैं। हम सब के सब पत्ते के समान मुर्झा जाते हैं, और हमारे अधर्म के कामों ने हमें वायु के समान उड़ा दिया है” (यशायाह 64:6) 
  • मनुष्य को पाप से उभारने का एक मात्र उपाय पापों से पश्चाताप करना, उनके लिए प्रभु यीशु मसीह से क्षमा माँगना, और स्वेच्छा तथा सम्पूर्ण समर्पण के साथ प्रभु यीशु मसीह का शिष्य बनना, ईसाई या किसी धर्म में नहीं मसीही विश्वास में आना है, “इसलिये परमेश्वर अज्ञानता के समयों में आनाकानी कर के, अब हर जगह सब मनुष्यों को मन फिराने की आज्ञा देता है” (प्रेरितों 17:30)यदि तू अपने मुंह से यीशु को प्रभु जानकर अंगीकार करे और अपने मन से विश्वास करे, कि परमेश्वर ने उसे मरे हुओं में से जिलाया, तो तू निश्चय उद्धार पाएगा। क्योंकि धामिर्कता के लिये मन से विश्वास किया जाता है, और उद्धार के लिये मुंह से अंगीकार किया जाता है” (रोमियों 10:9-10)
  • क्योंकि पाप धर्म के उल्लंघन से नहीं है, इसलिए इसके निवारण में भी किसी भी धर्म का (वह चाहे कोई भी धर्म, चाहे ईसाई धर्म ही क्यों न हो), कोई भी स्थान या महत्व नहीं हैक्योंकि विश्वास के द्वारा अनुग्रह ही से तुम्हारा उद्धार हुआ है, और यह तुम्हारी ओर से नहीं, वरन परमेश्वर का दान है। और न कर्मों के कारण, ऐसा न हो कि कोई घमण्ड करे” (इफिसियों 2:8-9) 
  • समस्या व्यक्तिगत रीति से परमेश्वर और मनुष्य के मध्य विश्वास में विच्छेद से उत्पन्न हुई; आदम और हव्वा ने व्यक्तिगत रीति से, अपनी बुद्धि और समझ के अनुसार, अनाज्ञाकारिता, अर्थात, पाप करने का निर्णय लिया। मनुष्य ने शैतान की बातों में आकर परमेश्वर की कही बातों, उसके द्वारा मनुष्य के लिए दिए प्रावधानों, तथा मनुष्य के प्रति परमेश्वर की इच्छा तथा योजना के सर्वोत्तम और भले होने पर अविश्वास किया; और इसी अविश्वास के अन्तर्गत मनुष्य ने अपनी समझ-बूझ, अपने आँकलन को परमेश्वर की समझ-बूझ और उसके आँकलन से बेहतर समझा, जिसके कारण फिर उन्होंने परमेश्वर की अनाज्ञाकारिता भी की। 
  • इसीलिए प्रत्येक मनुष्य के पाप का समाधान भी परमेश्वर और प्रत्येक मनुष्य के मध्य व्यक्तिगत रीति से विश्वास को पुनः स्थापित करने के द्वारा ही है। 
  • इसके लिए अनिवार्य है कि प्रत्येक मनुष्य स्वेच्छा से परमेश्वर की हर बात को, हर बात के लिए परमेश्वर की समझ-बूझ और हर बात के लिए परमेश्वर के आँकलन एवं समाधान को, अपनी बात, अपनी समझ-बूझ और अपने आँकलन से उत्तम तथा सर्वोपरि स्वीकार करे, और अपने आप को, अपनी हर सोच-समझ, दृष्टिकोण, प्रवृत्ति, सूझ-बूझ और व्यवहार को पूर्णतः परमेश्वर के हाथों में समर्पित कर दे। 
  • अपनी नहीं वरन केवल और केवल परमेश्वर के कहे के अनुसार ही करे - उस आज्ञाकारिता की दशा में आ जाए, जिसमें उसकी रचना की गई थी, और जिसके निर्वाह के लिए उसे कहा गया था।

 

       हम इस प्रश्न पर विचार को ज़ारी रखेंगे; किन्तु अभी के लिए आपके सामने यह प्रश्न है - आप अपने आप को परमेश्वर के समक्ष ग्रहण योग्य किस प्रकार बना रहे हैं - अपने धर्म-कर्म के द्वारा, अथवा प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास के द्वारा? परमेश्वर के वचन बाइबल में दिया गया उद्धार का मार्ग केवल प्रभु यीशु मसीह ही हैयीशु ने उस से कहा, मार्ग और सच्चाई और जीवन मैं ही हूं; बिना मेरे द्वारा कोई पिता के पास नहीं पहुंच सकता” (यूहन्ना 14:6)। यदि आपने अभी तक उसे अपना व्यक्तिगत उद्धारकर्ता स्वीकार नहीं किया है, तो अभी यह करने का अवसर आपके पास है। आपकी स्वेच्छा, सच्चे मन और अपने पापों के लिए पश्चाताप के साथ की गई एक छोटी प्रार्थना, “हे प्रभु यीशु, मैं मान लेता हूँ कि मैंने मन-ध्यान-विचार-व्यवहार में आपकी अनाज्ञाकारिता करके पाप किया है। मैं धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों को अपने ऊपर लेकर, मेरे स्थान पर उनके मृत्यु-दण्ड को कलवरी के क्रूस पर दिए गए अपने बलिदान के द्वारा सह लिया। आप मेरे स्थान पर मारे गए, और मेरे उद्धार के लिए मृतकों में से जी भी उठे। कृपया मुझ पर दया करें और मेरे पाप क्षमा करें। मुझे अपना शिष्य बना लें, और अपनी आज्ञाकारिता में अपने साथ बना कर रखेंआपको पाप के विनाश से निकालकर परमेश्वर के साथ संगति और उसकी आशीषों में लाकर खड़ा कर देगी। क्या आप यह प्रार्थना अभी समय रहते करेंगे - निर्णय आपका है?

 

बाइबल पाठ: रोमियों 5:1-10 

रोमियों 5:1 ​सो जब हम विश्वास से धर्मी ठहरे, तो अपने प्रभु यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर के साथ मेल रखें।

रोमियों 5:2 जिस के द्वारा विश्वास के कारण उस अनुग्रह तक, जिस में हम बने हैं, हमारी पहुंच भी हुई, और परमेश्वर की महिमा की आशा पर घमण्ड करें।

रोमियों 5:3 केवल यही नहीं, वरन हम क्लेशों में भी घमण्ड करें, यही जानकर कि क्लेश से धीरज।

रोमियों 5:4 ओर धीरज से खरा निकलना, और खरे निकलने से आशा उत्पन्न होती है।

रोमियों 5:5 और आशा से लज्जा नहीं होती, क्योंकि पवित्र आत्मा जो हमें दिया गया है उसके द्वारा परमेश्वर का प्रेम हमारे मन में डाला गया है।

रोमियों 5:6 क्योंकि जब हम निर्बल ही थे, तो मसीह ठीक समय पर भक्तिहीनों के लिये मरा।

रोमियों 5:7 किसी धर्मी जन के लिये कोई मरे, यह तो र्दुलभ है, परन्तु क्या जाने किसी भले मनुष्य के लिये कोई मरने का भी हियाव करे।

रोमियों 5:8 परन्तु परमेश्वर हम पर अपने प्रेम की भलाई इस रीति से प्रगट करता है, कि जब हम पापी ही थे तभी मसीह हमारे लिये मरा।

रोमियों 5:9 सो जब कि हम, अब उसके लहू के कारण धर्मी ठहरे, तो उसके द्वारा क्रोध से क्यों न बचेंगे?

रोमियों 5:10 क्योंकि बैरी होने की दशा में तो उसके पुत्र की मृत्यु के द्वारा हमारा मेल परमेश्वर के साथ हुआ फिर मेल हो जाने पर उसके जीवन के कारण हम उद्धार क्यों न पाएंगे?

 

एक साल में बाइबल:

·      भजन 137-139

·      1 कुरिन्थियों 13