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मंगलवार, 2 नवंबर 2021

मसीही सेवकाई में पवित्र आत्मा की भूमिका - 2

 

आवश्यकता 

 पिछले लेख में हमने देखा था कि सफल और प्रभावी मसीही सेवकाई केवल परमेश्वर पवित्र आत्मा की आज्ञाकारिता और मार्गदर्शन के द्वारा ही संव है। कोई भी शैक्षिक योग्यता अथवा प्रशिक्षण, कोई डिग्री प्राप्त कर लेना या कोर्स कर लेना तब तक प्रभु के लिए फलवंत और प्रभु को स्वीकार्य नहीं हो सकता है, जब तक व्यक्ति पवित्र आत्मा की अगुवाई में उस प्रशिक्षण का उपयोग, परमेश्वर की इच्छा के अनुसार ना करे। मसीही सेवकाई, मत्ती 28:19-20 के अनुसार, लोगों को प्रभु यीशु का शिष्य बनाना है और उन्हें, जो शिष्य बन जाते हैं, बपतिस्मा देना और प्रभु की बातें सिखाना है। शिष्य बनाने और फिर उन्हें प्रभु की बातें सिखाने में उन विभिन्न वरदानों का उपयोग होता है, जो परमेश्वर पवित्र आत्मा प्रत्येक मसीही विश्वासी को देता है (रोमियों 12:6-8; 1 कुरिन्थियों 12:4-11)। यही अपने आप में स्पष्ट कर देता है कि क्यों जब तक परमेश्वर पवित्र आत्मा की सामर्थ्य और मार्गदर्शन साथ नहीं है, कोई भी सफल और प्रभावी मसीही सेवकाई नहीं कर सकता है। 

हमारे ध्यान देने के लिए आवश्यक एक और बात है; अन्य सभी शिष्यों के समान, प्रभु यीशु से वचन की शिक्षाएं, प्रशिक्षण, तथा अधिकार तो यहूदा इस्करियोती ने भी पाया था; अन्य शिष्यों के साथ सेवकाई के लिए वह भी गया था; उस समय प्रभु यीशु का प्रचार तो उसने भी किया था, और हो सकता है कि शिष्यों के समान उसने आश्चर्यकर्म भी किए होंगे; किन्तु अंततः परिणाम क्या हुआ? प्रभु यीशु ने उसेविनाश का पुत्रबताया, जो नाश हो गया। उसके साथ न तो प्रभु का अनुग्रह था - जिसे वह ठुकरा चुका था; और न पवित्र आत्मा की सामर्थ्य अथवा मार्गदर्शन था। उसका प्रभु के साथ रहने का अनुभव, प्रभु से मिली शिक्षाएं और अधिकार, उसका प्रभु के चुने हुए बारह शिष्यों में गिना औरप्रेरितकहलाया जाना (मत्ती 10:1-4), सब निरर्थक और व्यर्थ हो गया।

प्रभु ने जब अपने शिष्यों को सुसमाचार प्रचार और मसीही सेवकाई के लिए जाने को कहा, तो वह उन्हें एक बहुत बड़े जोखिम में भेज रहा था; सृष्टि के सबसे सामर्थी, चतुर, और धूर्त एवं कुटिल हस्ती, शैतान, के विरुद्ध युद्ध करने के लिए भेज रहा था। परमेश्वर के बाद, शैतान ही है जिसकी सामर्थ्य है। परमेश्वर का वचन बाइबल हमें बताती है कि: 

  • सारा संसार उस दुष्ट के वक्ष में पड़ा है (1 यूहन्ना 5:19); 
  • वह अपनी चतुराई से परमेश्वर के लोगों को उनकी पवित्रता और मन की सिधाई से बहका सकता है, उन्हें भ्रष्ट कर सकता है (2 कुरिन्थियों 11:3) - ध्यान कीजिए कि जब आदम और हव्वा बहकाए गए और पाप में गिरे, तब वो निष्पाप और पवित्र दशा में थे, सृष्टि में पाप का अस्तित्व ही नहीं था, वे दोनों परमेश्वर के साथ ऐसी संगति में रहते थे जिसकी आज हम केवल कल्पना ही कर सकते हैं। लेकिन फिर भी शैतान ने उन्हें बहका कर पाप में गिरा दिया।
  • वह और उसके दूत ज्योतिर्मय स्वर्गदूत का रूप धारण करके, अपने आप को मसीह का प्रेरित दिखा कर गलत शिक्षाओं से लोगों को भरमा सकते हैं (2 कुरिन्थियों 11:13-15)
  • उसके भरमाने की युक्तियों की सामर्थ्य का अंदाज़ा इससे लगाया जा सकता है कि हज़ार वर्ष तक अथाह कुंड में कैद रहने के बाद जब उसे कुछ समय के लिए छोड़ा जाएगा, तब भी वह उन लोगों में से जिन्होंने परमेश्वर के राज्य को हज़ार वर्ष तक देखा है, लोगों को भरमा कर परमेश्वर के विरुद्ध युद्ध करने के लिए तैयार कर लेगा (प्रकाशितवाक्य 20:7-9) 
  • वह इतना धूर्त है कि देहधारी हुए परमेश्वर के वचन, प्रभु यीशु मसीह (यूहन्ना 1:1, 14), के समक्ष उसी के वचन का दुरुपयोग करने और प्रभु को बहकाने के प्रयास करने से पीछे नहीं हटा (मत्ती 4:1-11), तो फिर उसके सामने किसी मनुष्य के बाइबल ज्ञान या समझ की क्या हस्ती हो सकती है
  • वह स्‍वर्गदूतों को भी उनका कार्य करने से रोक के रखने, बाधित करने की सामर्थ्य रखता है (दानिय्येल 10:11-14)
  • पतरस ने मसीही विश्वासियों से कहासचेत हो, और जागते रहो, क्योंकि तुम्हारा विरोधी शैतान गरजने वाले सिंह के समान इस खोज में रहता है, कि किस को फाड़ खाए” (1 पतरस 5:8) 

इस प्रबल, चतुर, और कुटिल शत्रु का सामना करके, उसके चंगुल से लोगों को निकालकर उन्हें अनन्त विनाश से अनन्त जीवन में ला पाना किसी भी मनुष्य की सामर्थ्य के बस की बात नहीं है। इसीलिए प्रभु ने शिष्यों से कहा कि जब तक वे परमेश्वर पवित्र आत्मा की सामर्थ्य - उसका साथ, उसका मार्गदर्शन प्राप्त न कर लें, तब तक अपनी ही मानवीय बल-बुद्धि-सामर्थ्य के सहारे शैतान से लोहा लेने न निकलें। प्रभु जानता था कि यदि वे अपनी ही सामर्थ्य से शैतान का सामना करने के प्रयास करेंगे तो मुँह की खाएंगे, और परास्त तथा निराश होकर पीछे हट जाएंगे, असफल रहेंगे; इसके लिए उन्हें शैतान से अधिक सामर्थी की सहायता चाहिए होगी, और वह परमेश्वर स्वयं था, जो परमेश्वर पवित्र आत्मा उनके अंदर रहेगा, और उन्हें सक्षम तथा उपयोगी करेगा, यदि वे उसके आज्ञाकारी और समर्पित रहें।  

प्रभु परमेश्वर ने सभी मसीही विश्वासियों के लिए सेवकाई रखी हुई है (इफिसियों 2:10), और परमेश्वर पवित्र आत्मा उन्हें उस सेवकाई के लिए उपयुक्त वरदान भी देता है (1 कुरिन्थियों 12:4-11), और उनकी सहायता तथा मार्गदर्शन भी करता है। यदि आप मसीही विश्वासी हैं, तो क्या आपने अपनी सेवकाई को पहचाना है, प्रभु परमेश्वर से उसके विषय प्रार्थना की और जानकारी ली है, परमेश्वर पवित्र आत्मा द्वारा आपको उसके लिए दिए गए वरदानों को जाना और उनका उपयोग करना सीखा है? यदि नहीं, तो यह करना अपनी प्राथमिकता बनाएं, और अन्य सभी सेवकाई के कार्योंको छोड़कर प्रभु द्वारा निर्धारित अपनी सेवकाई को पूरा करने में प्रयासरत हो जाएं। क्योंकि आपकी आशीष और अनन्तकाल के प्रतिफल उसी से हैं; आपकी वही सेवकाई परमेश्वर को स्वीकार्य होगी, और सफल रहेगी

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी उसके पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी। 

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • यिर्मयाह 27-29
  • तीतुस

सोमवार, 1 नवंबर 2021

मसीही सेवकाई में पवित्र आत्मा की भूमिका - 1

 

परिचय 

            परमेश्वर के वचन बाइबल के नए नियम खण्ड की प्रभु यीशु की जीवनी और कार्यों के वर्णन वाली पहली चार सुसमाचारों की पुस्तकों के बाद, पाँचवीं पुस्तक का नाम हैप्रेरितों के काम। प्रेरितों के काम मसीही विश्वासियों की प्रथम मण्डली, और उस प्रारंभिक मसीही मण्डली के लोगों के साथ घटित घटनाओं एवं संसार में सुसमाचार प्रचार और प्रसार के उनके कार्यों का लेख है। इस पुस्तक का आरंभ प्रभु यीशु मसीह के मृतकों में से पुनरुत्थान के बाद, उनके द्वारा अपने शिष्यों के साथ बिताए गए समय के उल्लेख से होता है। अपने पुनरुत्थान के बाद, प्रभु यीशु चालीस दिन तक अपने शिष्यों के साथ रहा, उन्हें सिखाता रहा, वचन और विश्वास में दृढ़ करता रहा, उनकी आने वाली सेवकाई के लिए उन्हें तैयार करता रहाऔर उसने दु:ख उठाने के बाद बहुत से पड़े प्रमाणों से अपने आप को उन्हें जीवित दिखाया, और चालीस दिन तक वह उन्हें दिखाई देता रहा: और परमेश्वर के राज्य की बातें करता रहा” (प्रेरितों के काम 1:3)। अपने बलिदान से पहले साढ़े तीन वर्ष तक प्रभु यीशु अपने शिष्यों को साथ लिए चलता रहा, उसने उन्हें विभिन्न परिस्थितियों से होकर निकालने दिया, बहुत सी शिक्षाएं दीं। उन्हें प्रचार और आश्चर्यकर्म करने के अधिकार भी दिए और जब प्रभु ने शिष्यों को इस कार्य के लिए भेजा (मत्ती 10 अध्याय), तो उन्होंने यह सब किया भी (मरकुस 6:12-13; लूका 10:20) 

हम इन बातों से यह अभिप्राय ले सकते हैं कि प्रभु के स्वर्गारोहण के समय आने तक, अब शिष्य शिक्षा और अनुभव के साथ मसीही सेवकाई के लिए जाने के लिए प्रशिक्षित और तैयार थे। किन्तु फिर भी प्रभु यीशु ने स्वर्ग पर जाने से पहले उन्हें एक निर्देश और दियाऔर उन से मिलकर उन्हें आज्ञा दी, कि यरूशलेम को न छोड़ो, परन्तु पिता की उस प्रतिज्ञा के पूरे होने की बाट जोहते रहो, जिस की चर्चा तुम मुझ से सुन चुके हो” (प्रेरितों 1:4); “परन्तु जब पवित्र आत्मा तुम पर आएगा तब तुम सामर्थ्य पाओगे; और यरूशलेम और सारे यहूदिया और सामरिया में, और पृथ्वी की छोर तक मेरे गवाह होगे” (प्रेरितों 1:8)। यह प्रभु की ओर से दिया गया कोई नया निर्देश नहीं था; अपने पकड़वाए जाने से पहले प्रभु यीशु ने शिष्यों से यह प्रतिज्ञा की थी, कि उन के बाद शिष्यों के साथ परमेश्वर पवित्र आत्मा सहायक बनकर रहेगा (यूहन्ना 14 और 16 अध्याय); और यहाँ पर प्रभु इसी प्रतिज्ञा को दोहरा रहा था। हम मसीही विश्वासियों के लिए यह बहुत ध्यान देने और विचार करने योग्य बात है कि स्वयं प्रभु यीशु के साथ रहकर, उससे सीखकर, यह सारा प्रशिक्षण और अनुभव प्राप्त करने के बाद भी, प्रभु यीशु ने शिष्यों को सेवकाई पर निकलने से तब तक रुके रहने के लिए कहा, जब तक कि उन्हें परमेश्वर पवित्र आत्मा की सामर्थ्य, तथा उनका साथ नहीं मिल जाता है। मसीही सेवकाई में परमेश्वर पवित्र आत्मा की भूमिका का यह एक महान और अति महत्वपूर्ण अनुमोदन है; मसीही सेवकाई उनकी सहायता उनके मार्गदर्शन के बिना नहीं हो पाने के आधारभूत सत्य की पुष्टि है। 

आज बहुत से लोग केवल प्रशिक्षण और किसी बाइबल कॉलेज अथवा सेमनरी से डिग्री प्राप्त कर लेने, या कोई कोर्स कर लेने के द्वारा समझते हैं कि वे अब मसीही सेवकाई के लिए तैयार हैं। और उन्हें लगता है कि वे अपने प्रशिक्षण, शिक्षा, अनुभव, के द्वारा और उनके चर्च या डिनॉमिनेशन में बनाई गई योजनाओं और निर्धारित लक्ष्यों के अनुसार कार्य करने से तथा उन लोगों से उपलब्ध सहायता एवं साथ के द्वारा मसीही सेवकाई को कर सकते हैं। अवश्य ही वे कुछ प्रचार का कार्य कर सकते हैं, लोगों को अपना ज्ञान दिखा सकते हैं, औरमसीही सेवकाईके नाम पर कुछसमाज-सेवाया कुछ शिक्षा, चिकित्सा, भलाई के कार्य आदि कर सकते हैं। किन्तु यह सब प्रभु के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए, और सुसमाचार के प्रभावी प्रचार और प्रसार के लिए अंततः निरर्थक तथा अप्रभावी ही ठहरता है। हो सकता है कि समाज और लोगों से इसके लिए बहुत सराहना मिले, कुछ पुरस्कार भी मिलें, किन्तु जो प्रभु की ओर से नहीं है, वह प्रभु को स्वीकार्य भी नहीं है, और उसके लिए फलवंत भी नहीं है (मत्ती 7:21-23; मत्ती 15:8, 9, 14) 

प्रेरितों के काम पुस्तक का यह आरंभिक अध्याय और यहाँ दिए गए प्रभु यीशु के निर्देश दिखाते हैं कि वास्तविक और प्रभावी मसीही सेवकाई, बिना परमेश्वर पवित्र आत्मा की सामर्थ्य, सहायता, और मार्गदर्शन के संभव नहीं है। आते दिनों में हम मसीही सेवकाई में परमेश्वर पवित्र आत्मा की इसी भूमिका के विषय परमेश्वर के वचन में दी गई शिक्षाओं को देखेंगे, और उनसे सीखेंगे के हम प्रभु के लिए कैसे उपयोगी तथा कार्यकारी हो सकते हैं। यदि आप मसीही विश्वासी हैं, तो आप को अपने उद्धारकर्ता प्रभु के लिए कार्यकारी एवं उपयोगी भी अवश्य ही होना है। और आप यह प्रभु के प्रति पूर्ण समर्पण और आज्ञाकारिता के द्वारा ही कर सकते हैं, जिसमें परमेश्वर पवित्र आत्मा आपका मार्गदर्शक, सहायक, और सामर्थ्य प्रदान करने वाला रहेगा। 

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी उसके पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • यिर्मयाह 24-26
  • तीतुस 2

रविवार, 31 अक्टूबर 2021

मसीही विश्वास एवं शिष्यता - 31


मसीही विश्वासी के गुण (7) - प्रभु के समान प्रेम रखता है

सुसमाचारों में दिए गए प्रभु यीशु मसीह के शिष्य के गुणों में से यह सातवाँ गुण है कि मसीही विश्वासी, जैसा प्रभु यीशु ने औरों से रखा वैसे ही वह भी प्रेम रखता है। प्रभु यीशु ने क्रूस पर मारे जाने के लिए अपने पकड़वाए जाने से ठीक पहले, शिष्यों के साथ फसह का भोज खाते हुए, उन शिष्यों से कहा, “मैं तुम्हें एक नई आज्ञा देता हूं, कि एक दूसरे से प्रेम रखो: जैसा मैं ने तुम से प्रेम रखा है, वैसा ही तुम भी एक दूसरे से प्रेम रखो। यदि आपस में प्रेम रखोगे तो इसी से सब जानेंगे, कि तुम मेरे चेले हो” (यूहन्ना 13:34-35)। आगे चलकर प्रेरित यूहन्ना ने पवित्र आत्मा की अगुवाई में अपनी पहली पत्री में लिखा, “जो प्रेम नहीं रखता, वह परमेश्वर को नहीं जानता है, क्योंकि परमेश्वर प्रेम है” (1 यूहन्ना 4:8); “और जो प्रेम परमेश्वर हम से रखता है, उसको हम जान गए, और हमें उस की प्रतीति है; परमेश्वर प्रेम है: जो प्रेम में बना रहता है, वह परमेश्वर में बना रहता है; और परमेश्वर उस में बना रहता है” (1 यूहन्ना 4:16)

प्रभु यीशु मसीह ने न केवल अपने शिष्यों से वरन समस्त संसार के सभी लोगों से निःस्वार्थ, और अपने आप को बलिदान कर देने वाला प्रेम किया। प्रभु ने अपने इस प्रेम का उदाहरण यहूदा इस्करियोती को भी अपने साथ साढ़े तीन वर्ष रखने और उसे वही सब सामर्थ्य एवं अधिकार जो प्रभु ने अन्य शिष्यों को दिए थे देने के द्वारा, तथा क्रूस पर से उन्हें यातना देने वालों को भी क्षमा कर देने (लूका 23:34) के द्वारा दिखाया। अपनी पृथ्वी की संपूर्ण सेवकाई के दौरानकि परमेश्वर ने किस रीति से यीशु नासरी को पवित्र आत्मा और सामर्थ्य से अभिषेक किया: वह भलाई करता, और सब को जो शैतान के सताए हुए थे, अच्छा करता फिरा; क्योंकि परमेश्वर उसके साथ था” (प्रेरितों 10:38)

आज हमारे लिए भी परमेश्वर पिता ने यही निःस्वार्थ प्रेम दिखाया है, “प्रेम इस में नहीं कि हम ने परमेश्वर ने प्रेम किया; पर इस में है, कि उसने हम से प्रेम किया; और हमारे पापों के प्रायश्चित्त के लिये अपने पुत्र को भेजा” (1 यूहन्ना 4:10)। और प्रभु यीशु ने भी यही निःस्वार्थ, बलिदान वाला प्रेम दिखाया हैपरन्तु परमेश्वर हम पर अपने प्रेम की भलाई इस रीति से प्रगट करता है, कि जब हम पापी ही थे तभी मसीह हमारे लिये मरा” (रोमियों 5:8)

प्रभु चाहता है कि उसके शिष्य भी आपस में तथा संसार के लोगों से ऐसा ही प्रेम रखें; यही संसार के सामने उसके शिष्य होने की पहचान होगी:

  • यदि आपस में प्रेम रखोगे तो इसी से सब जानेंगे, कि तुम मेरे चेले हो” (यूहन्ना 13:35)
  • सो मैं जो प्रभु में बन्‍धुआ हूं तुम से बिनती करता हूं, कि जिस बुलाहट से तुम बुलाए गए थे, उसके योग्य चाल चलो। अर्थात सारी दीनता और नम्रता सहित, और धीरज धरकर प्रेम से एक दूसरे की सह लो” (इफिसियों 4:1-2)
  • और यदि किसी को किसी पर दोष देने को कोई कारण हो, तो एक दूसरे की सह लो, और एक दूसरे के अपराध क्षमा करो: जैसे प्रभु ने तुम्हारे अपराध क्षमा किए, वैसे ही तुम भी करो” (कुलुस्सियों 3:13) 

       यह कर पाना तब तक संभव नहीं है जब तक शिष्य छठे गुण की बात, अपने आप का इनकार करना, और पहले गुण की बात, पूर्ण समर्पण और आज्ञाकारिता के साथ प्रभु यीशु के लिए कार्यकारी एवं उपयोगी होने के लिए प्रतिबद्ध न हो। जब तक किसी में भी किसी भी बात के लिए जरा भीअहंहै, तब तक व निःस्वार्थ और बलिदान वाला प्रेम नहीं कर सकता है। 

       किसी भी मनुष्य के लिए, अपनी ही सामर्थ्य और योग्यता से, अथवा इच्छा के द्वारा, प्रभु द्वारा कहे गए सातों गुणों में से एक का भी निर्वाह कर पाना संभव नहीं है। किन्तु हम मसीही विश्वासियों के अंदर निवास करने वाला परमेश्वर पवित्र आत्मा हमें सामर्थ्य देता है, हमारा मार्गदर्शन करता है, कि हम अंश-अंश करके अपने प्रभु यीशु की समानता में ढलते चले जाएं (2 कुरिन्थियों 3:18), उसके समान सोचने, रहने, और व्यवहार करने वाले बनते चले जाएं। संसार के दृष्टिकोण से ये सभी गुण दुर्बलता और असफलता के चिह्न हो सकते हैं, किन्तु प्रभु ने इन्हीं गुणों को पहले जी कर दिखाया, तब ही शिष्यों से करने के लिए कहा; और हम जानते हैं किइस कारण परमेश्वर ने उसको अति महान भी किया, और उसको वह नाम दिया जो सब नामों में श्रेष्ठ है” (फिलिप्पियों 2:9)। आज इन्हीं गुणों के कारण प्रभु यीशु का नाम वह सर्वश्रेष्ठ तथा सर्वोच्च नाम हैकि जो स्वर्ग में और पृथ्वी पर और जो पृथ्वी के नीचे है; वे सब यीशु के नाम पर घुटना टेकें। और परमेश्वर पिता की महिमा के लिये हर एक जीभ अंगीकार कर ले कि यीशु मसीह ही प्रभु है” (फिलिप्पियों 2:10-11) 

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी उसके पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।      

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • यिर्मयाह 22-23
  • तीतुस 1

शनिवार, 30 अक्टूबर 2021

मसीही विश्वास एवं शिष्यता - 30


मसीही विश्वासी के गुण (6) - क्रूस उठाकर चलने के लिए तैयार रहता है 

सुसमाचारों में दिए गए प्रभु यीशु मसीह के शिष्य के गुणों में से यह छठा गुण है कि मसीही विश्वासी, प्रभु यीशु के कहे के अनुसार, अपना इनकार करते हुए प्रतिदिन अपना क्रूस उठाकर चलने को तैयार रहता है। प्रभु यीशु ने अपने शिष्यों से कहा है:

लूका 9:23 उसने सब से कहा, यदि कोई मेरे पीछे आना चाहे, तो अपने आप से इनकार करे और प्रति दिन अपना क्रूस उठाए हुए मेरे पीछे हो ले

       लूका 14:27 और जो कोई अपना क्रूस न उठाए; और मेरे पीछे न आए; वह भी मेरा चेला नहीं हो सकता

       आजक्रूस उठाकर चलनाएक मुहावरा बन कर रह गया है, और इससे उसका महत्व बहुत कम हो गया है। लोग किसी भी व्यक्तिगत कठिनाई, संकट, परेशानी, को अपना क्रूस बताने लगे हैं, और कठिनाइयों को झेलने को क्रूस उठाना कहने लगे हैं। किन्तु इसका वास्तविक और सही तात्पर्य बिल्कुल भिन्न है। वाक्यांशक्रूस उठाकर चलनाके वास्तविक अर्थ को समझने के लिए इसके ऐतिहासिक अभिप्राय एवं प्रयोग को देखना होगा। प्रभु यीशु मसीह की पृथ्वी की सेवकाई के दिनों में क्रूस समाज के सबसे निकृष्ट और जघन्य अपराधियों को एक बहुत क्रूर और पीड़ादायक मृत्यु देने का तरीका था, जिसमें अपराधी बहुत धीरे-धीरे किन्तु अत्यधिक पीड़ा के साथ क्रूस पर टंगे-टंगे मरता था, कई बार उसे मरने में एक दिन से भी अधिक का समय लग जाता। क्रूस पर चढ़ाए जाने से पहले उस अपराधी को कोड़े मारने, पीटने, आदि के द्वारा सैनिक यातनाएं देते थे, फिर उस घायल अवस्था में उसी से उसका काठ का बना भारी क्रूस उठवाकर उसे मारे जाने के सार्वजनिक स्थान पर ले जाते थे, जहाँ पर फिर उसे नंगा कर के उसके हाथों और पैरों को काठ पर ठोक कर, उसे धीरे-धीरे मरने के लिए छोड़ दिया जाता था, और मरने के समय तक उसका उपहास, और उसे यातना देना चलता रहता था। 

इसलिए उस समय के समाज में जब लोग किसी को क्रूस उठाए जाते हुए देखते थे, तो उनके लिए उसमें कुछ बातें निहित और स्पष्ट होती थीं। देखने वाले जानते और समझते थे कि:

  • वह व्यक्ति कोई बहुत जघन्य अपराधी है 
  • उसने कुछ बहुत घृणित और निंदनीय कार्य किए हैं 
  • इस कारण वह निन्दा, उपहास, और मृत्यु दण्ड के योग्य है 
  • जहाँ वह व्यक्ति जा रहा है, वहाँ से अब वह जीवित वापस नहीं आएगा, केवल उसकी लाश ही लाई जाएगी। 

प्रभु यीशु मसीह पर इनमें में से कोई भी बात लागू नहीं होती थी, फिर भी प्रभु ने अपनी ईश्वरीय महिमा, अपने स्वर्गीय वैभव, अपने परमेश्वरत्व के स्तर एवं सम्मान को छोड़ कर, यह सब, मेरे, आपके, और समस्त संसार के सभी लोगों के उद्धार का मार्ग बनाने के लिए, स्वेच्छा से, परमेश्वर पिता की आज्ञाकारिता में (इब्रानियों 10:5-7; यूहन्ना 4:34; 6:38), सहना स्वीकार कर लिया, और सह लिया।

उपरोक्त तथ्यों के आधार पर हम निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि जब प्रभु ने अपने शिष्यों से कहा कि उनके पीछे आने के लिए वे प्रतिदिन अपना क्रूस उठाकर उनके पीछे चलने के लिए तैयार रहें, तो उनका क्या अर्थ रहा होगा। प्रकट है कि प्रभु का अर्थ किसी व्यक्ति के द्वारा अपनी किसी व्यक्तिगत समस्या के लिए कठिनाई अथवा परेशानी का सामना करना नहीं था। स्वाभाविक अर्थ है कि जो भी प्रभु यीशु का शिष्य बनना चाहे, उनका अनुसरण करना चाहे, जैसे परमेश्वर की आज्ञाकारिता में प्रभु ने संसार और समाज से अनुचित और अकारण उपहास, निन्दा और अत्यधिक यातनाएं सहीं, उसी प्रकार वह शिष्य भी, मत्ती 10:16-20 तथा रोमियों 8:17-18 के अनुसार, प्रभु के अनुसरण, परमेश्वर के वचन की आज्ञाकारिता, और सुसमाचार प्रचार  के लिए, प्रतिदिन:

  • अकारण अपमानित होने और निन्दा सहने के लिए तैयार रहे
  • लोगों के हाथों मारे-पीटे, यातनाएं दिए जाने, और दुख उठाने के लिए तैयार रहे 
  • अपने प्राणों तक को बलिदान करने के लिए तैयार रहे (यूहन्ना 16:1-2)

अर्थात, जब प्रभु यीशु का शिष्य प्रभु की सेवकाई के लिए, प्रभु की आज्ञाकारिता में, घर से बाहर निकले तो किसी भी दुर्दशा, अथवा मृतक अवस्था में वापस लौटने के विचार के साथ निकले; और यह उसके लिए एक-दो दिन, अथवा यदा-कदा की नहीं, वरन प्रतिदिन की बात हो। साथ ही उसके अन्दर अपने लिए कोई महत्वाकांक्षा, किसी आदर-सम्मान को पाने, लोगों में कुछ स्तर रखने, अपने आप को किसी योग्य अथवा कुछ समझने की भावना न हो।  

 यदि आप प्रभु यीशु मसीह के शिष्य हैं, तो प्रभु यीशु की शिष्यता की इस कसौटी पर आज अपने आप को कहाँ खड़ा हुआ पाते हैं? क्या आप वास्तव में प्रभु यीशु के पीछे चलने में उसके लिए, उसके वास्तविक अर्थ में, अपना क्रूस उठाने के लिए तैयार हैं; या यह आपके लिए केवल एक वाक्यांश है, जिसका निर्वाह आपको संभव नहीं लगता है? क्या अपने आप को प्रभु यीशु का शिष्य कहना आप के लिए एक औपचारिकता निभाना है, या आप सच्चे मन से उसके समर्पित और आज्ञाकारी शिष्य हैं

और यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी उसके पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • यिर्मयाह 20-21
  • 2 तिमुथियुस

शुक्रवार, 29 अक्टूबर 2021

मसीही विश्वास एवं शिष्यता - 29


मसीही विश्वासी के गुण (5) - प्रभु के लिए सब कुछ छोड़ने के लिए तैयार होता है 

सुसमाचारों में दिए गए प्रभु यीशु मसीह के शिष्य के गुणों में से यह पाँचवाँ गुण, पहले कहे गए दूसरे गुण के समान, शिष्य, अर्थात मसीही विश्वासी में एक अलगाव की माँग करता है। प्रभु यीशु ने कहा, “इसी रीति से तुम में से जो कोई अपना सब कुछ त्याग न दे, तो वह मेरा चेला नहीं हो सकता” (लूका 14:33)। मसीही विश्वासी का दूसरा गुण पारिवारिक संबंधों में अलगाव की माँग करता है, और यह पाँचवाँ गुण, प्रभु यीशु के पक्ष में शिष्य द्वारा भौतिक, या सांसारिक और नश्वर वस्तुओं से अलगाव से की माँग करता है। इसी गुण के एक दूसरा स्वरूप पर नए नियम में काफी ज़ोर दिया गया है, पत्रियों में उसे बहुधा दोहराया गया है - अपने आप को संसार में परदेशी और यात्री जानकर संसार की बातों के मोह में पड़ने से बचे रहना (इब्रानियों 11:13; 1 पतरस 2:11)। यूहन्ना और याकूब ने तो पवित्र आत्मा की अगुवाई में यहाँ तक लिखा है कि भौतिक या सांसारिक बातों से प्रेम रखना , स्वतः और अनिवार्यतः व्यक्ति में परमेश्वर के प्रति प्रेम न होने का सूचक है, उसको परमेश्वर का बैरी बना देता है; उनके द्वारा लिखे पदों को देखें:

 “तुम न तो संसार से और न संसार में की वस्तुओं से प्रेम रखो: यदि कोई संसार से प्रेम रखता है, तो उस में पिता का प्रेम नहीं है। क्योंकि जो कुछ संसार में है, अर्थात शरीर की अभिलाषा, और आंखों की अभिलाषा और जीविका का घमण्ड, वह पिता की ओर से नहीं, परन्तु संसार ही की ओर से है। और संसार और उस की अभिलाषाएं दोनों मिटते जाते हैं, पर जो परमेश्वर की इच्छा पर चलता है, वह सर्वदा बना रहेगा” (1 यूहन्ना 2:15-17)

हे व्यभिचारिणयों, क्या तुम नहीं जानतीं, कि संसार से मित्रता करनी परमेश्वर से बैर करना है सो जो कोई संसार का मित्र होना चाहता है, वह अपने आप को परमेश्वर का बैरी बनाता है” (याकूब 4:4)

जब प्रभु ने अपने आरंभिक शिष्यों को बुलाया, तो वे अपने व्यवसाय, अपने परिवार आदि को छोड़ कर प्रभु के पीछे हो लिए:वे तुरन्त नाव और अपने पिता को छोड़कर उसके पीछे हो लिए” (मत्ती 4:22); “और व नावों को किनारे पर ले आए और सब कुछ छोड़कर उसके पीछे हो लिए” (लूका 5:11); “वहां से आगे बढ़कर यीशु ने मत्ती नाम एक मनुष्य को महसूल की चौकी पर बैठे देखा, और उस से कहा, मेरे पीछे हो ले। वह उठ कर उसके पीछे हो लिया” (मत्ती 9:9)। जब एक व्यक्ति ने प्रभु से उसका शिष्य बनने की इच्छा व्यक्त की, “जब वे मार्ग में चले जाते थे, तो किसी न उस से कहा, जहां जहां तू जाएगा, मैं तेरे पीछे हो लूंगा। यीशु ने उस से कहा, लोमडिय़ों के भट और आकाश के पक्षियों के बसेरे होते हैं, पर मनुष्य के पुत्र को सिर धरने की भी जगह नहीं” (लूका 9:57-58) - अर्थात प्रभु के पीछे चलने के लिए इस अनिश्चितता को स्वीकार करके चलना होगा कि यह आवश्यक नहीं है कि इस सेवकाई में रहने के लिए स्थान और खाने के लिए भोजन मिलेगा। जब, जो, जैसा मिल जाए, उसे ही स्वीकार करके प्रभु द्वारा दिए गए कार्य में लगे ही रहना है। पौलुस ने तिमुथियुस को लिखा, “पर तू सब बातों में सावधान रह, दुख उठा, सुसमाचार प्रचार का काम कर और अपनी सेवा को पूरा कर” (2 तीमुथियुस 4:5)। लेकिन जो यह सब जानते हुए, इन बातों को स्वीकार करते हुए, प्रभु के पीछे चल निकले थे, अपने उन शिष्यों को प्रभु यीशु ने प्रतिज्ञा दी, “यीशु ने कहा, मैं तुम से सच कहता हूं, कि ऐसा कोई नहीं, जिसने मेरे और सुसमाचार के लिये घर या भाइयों या बहिनों या माता या पिता या लड़के-बालों या खेतों को छोड़ दिया हो। और अब इस समय सौ गुणा न पाए, घरों और भाइयों और बहिनों और माताओं और लड़के-बालों और खेतों को पर उपद्रव के साथ और परलोक में अनन्त जीवन” (मरकुस 10:29-30)

प्रभु यीशु द्वारा दिए गए बीज बोने वाले के दृष्टांत को स्मरण करें (मत्ती 13:3-9)। यहाँ पर तीसरी प्रकार की भूमि, झाड़ियों के स्थान, पर गिरने और उगने वाला बीज वह है जो उगा और बढ़ा, किन्तु संसार की बातों और धन के धोखे ने उसे दबा कर निष्फल कर दियाजो झाड़ियों में बोया गया, यह वह है, जो वचन को सुनता है, पर इस संसार की चिन्ता और धन का धोखा वचन को दबाता है, और वह फल नहीं लाता” (मत्ती 13:22)। जो धनी जवान व्यक्ति (मत्ती 19:16-24) प्रभु के पास अनन्त जीवन का मार्ग प्राप्त करने के लिए आया था, वह निराश और असफल इसलिए लौट गया, क्योंकि वह अपने धन और सांसारिक वस्तुओं से अपने आप को अलग नहीं करने पाया था; वह प्रभु की शिष्यता की यह कीमत नहीं चुकाना चाहता था, और जीवन के जल के सोते के पास आकर भी प्यासा और बिना अनन्त जीवन पाए चला गया। 

यदि आप प्रभु यीशु मसीह के शिष्य हैं, तो क्या आपने अपने आप को भौतिक, नश्वर सांसारिक बातों के मोह से पृथक किया है? इसका यह अभिप्राय नहीं है कि प्रभु के शिष्य को सन्यासी बनकर विरक्ति का जीवन जीना चाहिए। अभिप्राय यह है कि प्रभु का शिष्य अपने जीवन में प्राथमिक स्थान प्रभु और उसके वचन की आज्ञाकारिता को देता है, न कि सांसारिक उपलब्धियों और महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति में लगे रहने को। प्रभु यीशु की शिष्यता की इस कसौटी पर आज अपने आप को कहाँ खड़ा हुआ पाते हैं? क्या अपने आप को प्रभु यीशु का शिष्य कहना आप के लिए एक औपचारिकता निभाना है, या आप सच्चे मन से उसके समर्पित और आज्ञाकारी शिष्य हैं

और यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी उसके पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी। 

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • यिर्मयाह 18-19
  • 2 तिमुथियुस 3 

गुरुवार, 28 अक्टूबर 2021

मसीही विश्वास एवं शिष्यता - 28

 

मसीही विश्वासी के गुण (4) - प्रभु के लिए फलवंत बहुतायत से होता है 

       सुसमाचारों में, प्रभु द्वारा बताए गए अपने शिष्यों के गुणों में से चौथा है कि वह अपने प्रभु और उद्धारकर्ता, प्रभु यीशु मसीह के लिए फल लाता है, “मेरे पिता की महिमा इसी से होती है, कि तुम बहुत सा फल लाओ, तब ही तुम मेरे चेले ठहरोगे” (यूहन्ना 15:8)। यह पद हमें बताता है कि प्रभु के लिए फल लाना न केवल शिष्य का एक गुण है, वरन फल लाने से परमेश्वर पिता की भी महिमा होती है। किसी भी पौधे या वृक्ष के द्वारा फल लाने का एक ही प्रमुख कारण होता है - उस फल से उसके समान और पौधे या वृक्ष उत्पन्न हों; अर्थात उस प्रजाति का विस्तार हो। वह फल भोजन, या औषधि, या अन्य किसी रूप में भी प्रयोग किया जा सकता है; किन्तु यह सब उसके प्राथमिक उपयोग नहीं हैं। प्राकृतिक रीति से पेड़-पौधे फल अपनी जाति के विस्तार के लिए ही उत्पन्न करते हैं; चाहे उनके फल और किसी काम में आएं या न आएं, और किसी के लिए उपयोगी हों अथवा न हों, चाहे वे फल औरों के लिए लाभदायक हों अथवा कष्टदायक या हानिकारक हों। 

यही अभिप्राय प्रभु द्वारा उसके लिए फलवंत होने के साथ भी संलग्न है - प्रभु के शिष्य प्रभु के लिए और शिष्य बनाएं, जो मत्ती 28:18-20 में शिष्यों को दी गई प्रभु की महान आज्ञा के अनुरूप है। हम जितना अधिक सुसमाचार का प्रचार और प्रसार करेंगे, उतना अधिक प्रभु के लिए फलवंत और परमेश्वर की महिमा का कारण होंगे, जो फिर हमारे लिए आशीष का कारण बनेगा। यहाँ एक बात और ध्यान देने के लिए आवश्यक है, प्रभु ने कहातुम बहुत सा फल लाओ” - प्रभु ने यह नहीं कहा कितुम आत्मा के फल बहुतायत से लाओ” - जो कि सामान्यतः इस पद के साथ समझ लिया जाता है, जबकि प्रभु ने यह नहीं कहा है। शिष्य को अपने जीवन से अपने समान और शिष्य बनाने हैं; अवश्य ही उसके अच्छे, प्रभावी, और आकर्षक मसीही जीवन के लिए उसमें आत्मा के फल और गुण होना अनिवार्य है। किन्तु प्रभु ने औरों के जीवनों में आत्मा के फल उत्पन्न करने के लिए नहीं कहा; जब कोई व्यक्ति प्रभु का शिष्य बन जाएगा, तो उसमें आकर निवास करने वाला पवित्र आत्मा स्वयं उसमें आत्मा के फल उत्पन्न करेगा। कोई मनुष्य अपने अंदर अथवा किसी और में आत्मा के फल उत्पन्न नहीं कर सकता है; आत्मा के फल तो पवित्र आत्मा ही उत्पन्न और विकसित करता है। प्रभु हम से हमारे फल, हमारे द्वारा उसकी शिष्यता में और शिष्यों को लेकर आने के लिए कह रहा है।

साथ ही यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि प्रभु के कहे के अनुसार, जैसे पेड़ की पहचान उसके फलों से होती है, वैसे ही व्यक्ति की पहचान, या शिष्य की पहचान, उसके जीवन के फलों से होती है (मत्ती 7:16, 20)। प्रभु के लिए शिष्य का फलवंत होना प्रभु के प्रति उसके समर्पण, आज्ञाकारिता, प्रेम, और उपयोगिता की पहचान है। प्रभु परमेश्वर फल लाने को बहुत महत्व देता है; प्रभु यीशु ने लूका 13:6-9 में बताए दृष्टांत के द्वारा शिष्यों को समझाया कि जो वृक्ष परमेश्वर के लिए फलवंत नहीं है, उसे फिर उसके दुष्परिणाम भी भुगतने पड़ेंगे। यही बात पुराने नियम में यशायाह 5:1-7 में यहोवा द्वारा लगाई गई दाख की बारी, अर्थात इस्राएल के संदर्भ में भी कही गई है - जब इस्राएल परमेश्वर के लिए फलवंत नहीं हुआ, अच्छे फल नहीं लाया, तो उसे इसके दुष्परिणाम भुगतने पड़े। 

प्रभु यीशु के सच्चे, वास्तविक शिष्य में अपने उद्धारकर्ता प्रभु के लिए उपयोगी होने, उसके आज्ञाकारी होकर, उसके नाम को महिमा देने की लालसा और प्रवृत्ति होती है। प्रभु ने जो वरदान, गुण, और योग्यताएं उसे दी हैं, वह उनका प्रयोग प्रभु के राज्य के विस्तार और विकास के लिए करता है, और अपने लिए आशीष तथा परमेश्वर के लिए महिमा का कारण बनता है। यदि आप मसीही विश्वासी हैं, तो यह जाँचने की बात है कि आप प्रभु के लिए फलवंत हैं कि नहीं; और यदि फलवंत हैं तो आपके फल की मात्रा और गुणवत्ता क्या है? प्रभु परमेश्वर मुझ से और आप से बहुत सा फल लाने की आशा रखता है। क्या हम उसकी शिष्यता की इस कसौटी पर खरे हैं? क्या हम इस पहचान के द्वारा अपने आप को प्रभु के शिष्य कह और बता सकते हैं?

और यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी उसके पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • यिर्मयाह 15-17
  • 2 तिमुथियुस 2

बुधवार, 27 अक्टूबर 2021

मसीही विश्वास एवं शिष्यता - 27


मसीही विश्वासी के गुण (3) - प्रभु के समान होने का प्रयास करता है 

सुसमाचारों में दिए गए वर्णन में से, प्रभु यीशु मसीह के शिष्य का तीसरा गुण है कि उसे अपने उद्धारकर्ता और गुरु, प्रभु यीशु मसीह की समानता में होना है। प्रभु यीशु ने कहा, “चेला अपने गुरु से बड़ा नहीं; और न दास अपने स्वामी से। चेले का गुरु के, और दास का स्वामी के बराबर होना ही बहुत है; जब उन्होंने घर के स्वामी को शैतान कहा तो उसके घर वालों को क्यों न कहेंगे?” (मत्ती 10:24-25)। यह हमारे लिए बहुत विचार और मनन करने की बात है कि परमेश्वर ने व्यवस्था को मूसा के द्वारा लिखवा कर इस्राएलियों के लिए दे दिया, और उन्हें उसका पालन करने के लिए कहा। किन्तु इस अनुग्रह के युग में प्रभु यीशु मसीह ने स्वयं देहधारी वचन बनकर मनुष्यों के मध्य निवास किया (यूहन्ना 1:14) और सजीव उदाहरण के द्वारा जी कर दिखाया, बताया, और सिखाया कि प्रभु यीशु के अनुयायी को कैसा होना है, क्या करना है। मसीही विश्वासी का आदर्श, अनुसरण करने के लिए उसका नमूना स्वयं प्रभु यीशु मसीह है। मसीही विश्वास का जीवन व्यावहारिक जीवन है; संसार के सामने जी कर दिखाया जाता है; धर्म-कर्म-रस्म के निर्वाह और किताबी ज्ञान अर्जित करने का जीवन नहीं है। 

पौलुस ने पवित्र आत्मा की अगुवाई में अपने जीवन के उदाहरण से इस बात को लिखा, कि जैसे वह मसीह का अनुसरण करता था, वैसे ही, उसके समान अन्य लोग भी ऐसा ही करें:

1 कुरिन्थियों 11:1 तुम मेरी सी चाल चलो जैसा मैं मसीह की सी चाल चलता हूं

1 थिस्स्लुनीकियों 4:1-2 निदान, हे भाइयों, हम तुम से बिनती करते हैं, और तुम्हें प्रभु यीशु में समझाते हैं, कि जैसे तुम ने हम से योग्य चाल चलना, और परमेश्वर को प्रसन्न करना सीखा है, और जैसा तुम चलते भी हो, वैसे ही और भी बढ़ते जाओ। क्योंकि तुम जानते हो, कि हम ने प्रभु यीशु की ओर से तुम्हें कौन कौन सी आज्ञा पहुंचाई

पौलुस ने आगे चलकर अपने जीवन के विषय में लिखा:

फिलिप्पियों 1:21 क्योंकि मेरे लिये जीवित रहना मसीह है, और मर जाना लाभ है

गलतियों 2:20 मैं मसीह के साथ क्रूस पर चढ़ाया गया हूं, और अब मैं जीवित न रहा, पर मसीह मुझ में जीवित है: और मैं शरीर में अब जो जीवित हूं तो केवल उस विश्वास से जीवित हूं, जो परमेश्वर के पुत्र पर है, जिसने मुझ से प्रेम किया, और मेरे लिये अपने आप को दे दिया

उसने अपने आप को पूर्णतः मसीह यीशु को समर्पित कर दिया था, और प्रभु यीशु के कहे के अनुसार करता था, उसी के चलाए चलता था, अपने जीवन से उसी को दिखाना, और उसे ही महिमा देना चाहता था। 

मसीही जीवन की परिपक्वता में बढ़ना भी प्रभु यीशु मसीह की समानता में बढ़ते जाना हैपरन्तु जब हम सब के उघाड़े चेहरे से प्रभु का प्रताप इस प्रकार प्रगट होता है, जिस प्रकार दर्पण में, तो प्रभु के द्वारा जो आत्मा है, हम उसी तेजस्वी रूप में अंश अंश कर के बदलते जाते हैं” (2 कुरिन्थियों 3:18)। यह परिवर्तन तब ही संभव है जब हर बात में हर निर्णय से पहले, यह विचार करे किइस बात के लिए, या इस परिस्थिति में, प्रभु यीशु क्या कहता, अथवा क्या करता?” इसीलिए पवित्र आत्मा ने लिखवाया है किइस संसार के सदृश न बनो; परन्तु तुम्हारी बुद्धि के नये हो जाने से तुम्हारा चाल-चलन भी बदलता जाए, जिस से तुम परमेश्वर की भली, और भावती, और सिद्ध इच्छा अनुभव से मालूम करते रहो” (रोमियों 12:2)। हम मसीही विश्वासियों को अपना हर कार्य, हर निर्णय, सांसारिक बुद्धि अथवा समझ के अनुसार नहीं वरन उस बदली हुई बुद्धि और चाल-चलन के अनुसार करना है।   

यदि आप मसीही विश्वासी हैं, तो यह जाँचने की बात है कि आप का आदर्श, आपके अनुसरण के लिए आपका नमूना कौन है? क्या आप अपने जीवन की हर बात, हर निर्णय में प्रभु यीशु को प्राथमिकता देकर, वैसा ही करने और जीने का प्रयास करते हैं जैसा उस बात, उस निर्णय के लिए प्रभु यीशु करता? प्रभु ने कहा है, शिष्य के लिए अपने गुरु के समान होना ही पर्याप्त है। 

और यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी उसके पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • यिर्मयाह 12-14
  • 2 तिमुथियुस 1