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बुधवार, 22 दिसंबर 2021

मसीही सेवकाई और पवित्र आत्मा के वरदान - 20


आत्मिक वरदानों के प्रयोगकर्ता - चंगा करने वाले 

मसीही विश्वासियों की मण्डली में उपयोगिता के क्रम के अनुसार, 1 कुरिन्थियों 12:28 में सामर्थ्य की काम के बाद दिया गया अगला वरदान है चंगा करने का वरदान। पिछले लेख में हमने सामर्थ्य के काम करने के विषय में बाइबल की शिक्षाओं को देखा था, और इस वरदान के उपयोग में भी परमेश्वर की आज्ञाकारिता और इस वरदान को परमेश्वर के वचन के अनुसार प्रयोग करने के महत्व को हमने देखा था। चंगा करने का वरदान भी सामर्थ्य के काम करने के वरदान के समान ही है, और इसके साथ भी सामर्थ्य के काम करने के वरदान से संबंधित वचन की शिक्षाएं लागू होती हैं। हम प्रभु यीशु मसीह के जीवन और सेवकाई से देखते हैं कि प्रभु ने बहुत से लोगों को, उनकी विभिन्न प्रकार की बीमारियों से और दुष्टात्माओं द्वारा ग्रसित होने, सताए जाने से चंगाइयाँ दीं। प्रभु की सेवकाई को संक्षिप्त करके प्रेरितों के काम पुस्तक में लिखा गया है, “कि परमेश्वर ने किस रीति से यीशु नासरी को पवित्र आत्मा और सामर्थ्य से अभिषेक किया: वह भलाई करता, और सब को जो शैतान के सताए हुए थे, अच्छा करता फिरा; क्योंकि परमेश्वर उसके साथ था” (प्रेरितों 10:38)। जब प्रभु ने शिष्यों को सेवकाई पर भेजा, तब भी उन्हें सुसमाचार प्रचार के साथ चंगा करने की सामर्थ्य भी दी (मत्ती 10:1; लूका 10:1, 9); और अपने स्वर्गारोहण से पहले शिष्यों को दी सुसमाचार प्रचार की सेवकाई की महान आज्ञा के साथ भी लोगों को चंगा करने और दुष्टात्माओं से छुटकारा देने की सामर्थ्य भी प्रदान की (मरकुस 16:17-18) 

अर्थात, स्वयं प्रभु की सेवकाई में, और उनकी आज्ञा तथा उनके द्वारा दी गई सामर्थ्य में उनके शिष्यों द्वारा की जाने वाली सेवकाई में भी लोगों को चंगा करने और दुष्टात्माओं से छुटकारा देने का एक महत्वपूर्ण स्थान था; और आज भी है। प्रभु की वही सामर्थ्य जो तब उन आरंभिक शिष्यों और मसीही विश्वासियों में होकर कार्य करती थी, वही आज भी, वैसे ही प्रभु के निर्धारित शिष्यों के जीवनों में कार्य करती है, उन्हें इस सेवकाई को करने के लिए सक्षम करती है। रोगों और दुष्टात्माओं से चंगा करना परमेश्वर पिता द्वारा कुछ मसीही विश्वासियों के लिए निर्धारित सेवकाई है, और उनको परमेश्वर पवित्र आत्मा द्वारा प्रदान किया जाने वाला आत्मिक वरदान भी है। किन्तु साथ ही दो महत्वपूर्ण बातें भी हमें ध्यान रखनी चाहिएं; पहली बात, प्रभु ने सुसमाचारों में अपने आने के विभिन्न उद्देश्य बताए, जैसे कि, प्रचार करने के लिए (मरकुस 1:38), पापियों को पश्चाताप के लिए बुलाने के लिए (मरकुस 2:17; लूका 5:32), परमेश्वर पिता की इच्छा पूरी करने के लिए (यूहन्ना 6:38), न्याय के लिए (यूहन्ना 9:39), बहुतायत का जीवन देने के लिए (यूहन्ना 10:10), ज्योति देने के लिए (यूहन्ना 12:46), सत्य की गवाही देने के लिए (यूहन्ना 18:37), इत्यादि। किन्तु अपने आने के उद्देश्यों में उन्होंने कभी यह नहीं कहा कि मैं चंगाई और दुष्टात्माओं से छुटकारा देने के लिए आया हूँ, जबकि उन्होंने यह बहुतायत से किया। और दूसरी बात, अपनी महान आज्ञा में प्रभु ने शिष्यों को चंगाइयों की सामर्थ्य अवश्य दी, किन्तु भेजा संसार भर में सुसमाचार सुनाने के लिए (मत्ती 28:18-20; प्रेरितों 1:8); यह नहीं कहा कि जाकर चंगा करो और लोगों को दुष्टात्माओं से छुड़ाओ। और यह उस समय में जब चिकित्सा-विज्ञान उन्नत नहीं था, रोगों के निदान और उपचार के साधन या समझ-बूझ नहीं थी, और लोग अंदाज़े से ही औरों कोचंगाकरते थे, रोगियों को चंगा करने वालों की बहुत आवश्यकता थी। 

इन दोनों बातों से हम क्या शिक्षा ले सकते हैं? शारीरिक चंगाइयाँ प्रभु ने भी दीं, उनके शिष्यों ने भी दीं, और मृतकों को भी जिलाया; और आज भी प्रभु की निर्धारित सेवकाइयों में तथा पवित्र आत्मा के वरदानों में लोगों को शारीरिक चंगाइयां देने तथा दुष्टात्माओं से छुड़ाने की भूमिका है, और परमेश्वर की सामर्थ्य से यह होता भी है। किन्तु प्राथमिक महत्व और उद्देश्य लोगों में सुसमाचार प्रचार तथा परमेश्वर के वचन की सही शिक्षा दिए जाने का है। चंगाई देना मुख्य उद्देश्य नहीं है, वरन सुसमाचार प्रचार के साथ किया जाने वाला कार्य है। ध्यान कीजिए, यूहन्ना 14 और 16 अध्याय में प्रभु यीशु द्वारा शिष्यों को पवित्र आत्मा के बारे में शिक्षाएं दी गई थीं, उनमें कहीं यह नहीं कहा गया था कि वह लोगों को चंगाइयाँ देगा। किन्तु आज हम पवित्र आत्मा के नाम से गलत शिक्षाएं देने वालों की शिक्षाओं में पवित्र आत्मा द्वारा शारीरिक चंगाइयों का एक बहुत प्रमुख और सुसमाचार प्रचार से भी अधिक महत्वपूर्ण स्थान पाते हैं। वे लोगों को चंगाइयों के नाम से आकर्षित करने, सभाओं में आने के लिए चंगाइयों के लालच में डालकर लाने के प्रयास करते हैं। क्या आपने कभी बाइबल में कहीं पर भीचंगाई सभाएंआयोजित किए जाने का कोई उदाहरण देखा है, जैसा आज बहुतायत से किया जाता है? क्या आपने बाइबल में प्रभु के शिष्यों कोचंगा करने वालाकी उपाधि के साथ प्रसिद्ध होने का कोई उदाहरण पढ़ा है, जैसा आज बहुधा इन गलत शिक्षाएं देने वालों में देखा जाता है? बाइबल से उदाहरण ढूँढने को तो छोड़िए, क्या आरंभिक कलीसिया के इतिहास में, प्रभु के आरंभिक शिष्यों द्वारा किए गए संसार भर में सुसमाचार प्रचार में क्या इस प्रकार चंगाई सभाओं और चंगाई को लेकर प्रसिद्धि की बात पाई जाती है? और जितनी प्रभावी एवं व्यापक रीति से, अनेकों प्रकार के कष्ट, कठिनाइयों, और सताव को सहते हुए उन आरंभिक शिष्यों ने संसार भर में सुसमाचार प्रचार किया था, उतना ये चंगाई की दुकानें चलाने वाले कभी नहीं करने पाए हैं। उलटे, आज उनकी ये चंगाई सभाएं और प्रसिद्धि वास्तविक सुसमाचार प्रचार के लिए एक बहुत बड़ी बाधा और विरोध का कारण बनी हुई है।

साथ ही यह भी ध्यान रखिए कि जैसे पिछले लेख में हमने आश्चर्यकर्मों, चिह्नों, और चमत्कारों के विषय देखा था, उसी प्रकार से चंगाई केवल परमेश्वर पवित्र आत्मा के वरदान द्वारा ही नहीं है। आज भी हर इलाके में आपको हर गैर-मसीही आराधना स्थल के साथ जुड़े हुए लोगों द्वारा चंगाई पाने, या उनकी समस्याओं का निवारण हो जाने, आदि के दावे और उदाहरण मिलेंगे। उन गैर-मसीही आराधना स्थलों से भी लोगों ने शारीरिक चंगाई और सुख-समृद्धि प्राप्त की है; किन्तु वहाँ से कभी किसी ने पापों की क्षमा, उद्धार, तथा परमेश्वर की संतान होने का अधिकार कभी प्राप्त नहीं किया है। चंगाई चाहे किसी मसीही के द्वारा मिले अथवा किसी गैर-मसीही के द्वारा, अंततः, एक दिन हर व्यक्ति को अपनी यह देह छोड़कर प्रभु यीशु के सामने खड़े होना ही है (प्रेरितों 17:30-31)। उस दिन उसकी यह चंगाई उसके किस काम की होगी, यदि उसने चंगाई तो पाई किन्तु सुसमाचार नहीं? और जिसे शारीरिक लालच के द्वारा प्रभु यीशु के पास लाने का प्रयत्न किया गया, वह प्रभु यीशु के अनन्तकालीन आत्मिक महत्व को कैसे समझेगा, क्योंकि उसके सामने तो शारीरिक बातों को ही प्रमुख किया गया, उन्हीं का महत्व दिखाया गया। 

यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं, तो ध्यान से जाँचिए और समझिए कि प्रभु आप से क्या चाहता है। प्रभु आज भी अपने शिष्यों में होकर अपनी सामर्थ्य प्रकट करता है, चंगाई देता है; किन्तु उन्हीं के द्वारा जिनके लिए उसने यह सेवकाई ठहराई है, और जो इसका निर्वाह प्रभु के निर्देशों के अनुसार, प्रभु की आज्ञाकारिता में प्रभु की महिमा के लिए करते हैं। न कि इस सेवकाई और वरदान को स्वार्थ-सिद्धि और सांसारिक संपत्ति जमा करने का साधन बनाते हैं, और न ही तमाशा बनाकर लोगों में प्रभु के नाम पर उँगलियाँ उठाने और लांछन लगाने के अवसर देते हैं, सुसमाचार प्रचार में बाधाएं उत्पन्न करते हैं। परमेश्वर के वचन के प्रचार, शिक्षा, और उसकी आज्ञाकारिता का स्थान सदा ही आश्चर्यकर्मों, चिह्नों, चमत्कारों, और चंगाइयों के कार्यों से पहले रहा है, और रहेगा। प्रभु और उसके शिष्यों ने पहले वचन और सुसमाचार को अपने जीवन से जी कर दिखाया, फिर उसका प्रचार किया, और उसके बाद ही आश्चर्यकर्मों, चिह्नों, चमत्कारों, और चंगाइयों के कार्यों को किया  (मरकुस 3:13-15)। यही बाइबल का स्थापित क्रम है, और इसी क्रम के अनुसार करने से ही परमेश्वर की महिमा होगी।  

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी। 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • मीका 6-7     
  • प्रकाशितवाक्य 13

मंगलवार, 21 दिसंबर 2021

मसीही सेवकाई और पवित्र आत्मा के वरदान - 19


आत्मिक वरदानों के प्रयोगकर्ता - आश्चर्यकर्म, चिह्न, और चमत्कार  करने वाले 

परमेश्वर पवित्र आत्मा ने कलीसिया, या मसीही विश्वासियों की मण्डली में, मण्डली के तथा मण्डली के लोगों के मसीही विश्वास एवं जीवन में उन्नति के लिए कुछ आत्मिक वरदान दिए हैं, जिन्हें हम 1 कुरिन्थियों 12:28 के अनुसार देख रहे हैं। हम देख चुके हैं कि कलीसिया के लिए उपयोगिता के अनुसार इस पद में दिए गए इन वरदानों के क्रम में सबसे ऊपर वचन की सेवकाई से संबंधित वरदान हैं - प्रेरित, भविष्यद्वक्ता, और शिक्षक, जिनके बारे में बाइबल की शिक्षाओं को हम पिछले कुछ लेखों में देख चुके हैं। साथ ही हमने यह भी देखा है कि आज पहली दो सेवकाइयों के चाहने वाले और इन सेवकाइयों को उपाधि या पदवी के समान प्रयोग करके समाज में अपना वर्चस्व जताने वाले तो बहुत हैं, किन्तु उनका जीवन, व्यवहार, और इन वरदानों का प्रयोग वचन के अनुसार नहीं है, वरन स्वार्थ-सिद्धि और शारीरिक तथा सांसारिक लाभों को प्राप्त करने के लिए है। और साथ ही हमने यह भी देखा था कि पहले दोनों वरदानों के इच्छुक लोगों की तुलना में वचन के शिक्षक होने के आत्मिक वरदान के चाहने वाले बहुत कम हैं, और जो हैं भी उनमें से बहुत कम ऐसे हैं जो परमेश्वर के साथ बैठकर उससे पहले वचन की बातों को सीखते हैं, और फिर उन्हें लोगों में बांटते हैं। आज अधिकांश शिक्षक और उनकी शिक्षाएं मानवीय बुद्धि और समझ के अनुसार वचन के अनुचित प्रयोग को लेकर की जाती हैं; परमेश्वर के वचन को आत्मा की प्रबल दोधारी तलवार के समान नहीं, वरन कानों की खुजली मिटाने वाली लुभावनी और लोकप्रिय बातों का संकलन बनाकर बताई जाती हैं, जो बाइबल के प्रयोग के सिद्धांतों के विरुद्ध है। 

वचन की सेवकाई से संबंधित वरदानों के बाद, इस पद में जो अगले दो वरदान दिए गए हैं वे हैं सामर्थ्य के काम करना और चंगा करना। ये दोनों वरदान परस्पर संबंधित हैं; किन्तु हम आज सामर्थ्य के काम करने के बारे में ही देखेंगे। हम मसीही विश्वासियों में बहुधा यह गलत धारणा पाई जाती है कि आश्चर्यकर्म या सामर्थ्य के काम केवल परमेश्वर पवित्र आत्मा की सहायता और सामर्थ्य से ही किए जा सकते हैं, अन्यथा नहीं। और पवित्र आत्मा के नाम से गलत शिक्षाएं, मिथ्या प्रचार, और अनुचित व्यवहार करने और सिखाने वाले भी इस गलत धारणा पर बहुतायत से बल देने के द्वारा लोगों में इस वरदान को प्राप्त करने की लालसा जागृत करते हैं। किन्तु परमेश्वर के वचन बाइबल से हम यही देखते और सीखते हैं कि शैतान और उसके दूत भी आश्चर्यकर्म करने की शक्ति रखते हैं, और आश्चर्यकर्म करते भी हैं। इस संदर्भ में बाइबल से ही कुछ उदाहरणों को देखते हैं:

  • इस्राएलियों को मिस्र के दासत्व से छुड़ाने के लिए, अपने आप को परमेश्वर द्वारा नियुक्त जन प्रमाणित करने के लिए, परमेश्वर की आज्ञाकारिता और सामर्थ्य से जो चिह्न मूसा तथा हारून ने फिरौन के सामने दिखाए, फिरौन केपंडितों और टोन्हाकरने वालों ने भी वही करके दिखा दि (निर्गमन 7:8-12, 19-22; 8:5-7)। निश्चित है कि फिरौन के इन लोगों में काम करने वाली सामर्थ्य परमेश्वर की नहीं थी; और परमेश्वर के अतिरिक्त दूसरी ऐसी सामर्थ्य शैतान ही की है। साथ ही ये लोग फिरौन के साथ और उसके दरबार में, मूसा और हारून के आने से पहले से विद्यमान थे। क्योंकि वे लोग कुछ अद्भुत कर पाने की सामर्थ्य रखते थे, फिरौन के सामने पहले से अपने आप को प्रमाणित कर चुके थे, इसीलिए फिरौन के साथ थे। तब ही फिरौन ने बड़े भरोसे के साथ उन्हें मूसा और हारून का सामना करने के लिए आगे किया था, और आरंभिक स्पर्धा में वे मूसा और हारून के समान सामर्थी भी प्रमाणित हुए थे।  
  • परमेश्वर ने अपनी व्यवस्था में भावी कहने वालों, शुभ-अशुभ मुहूर्तों को मानने वालों, टोन्हा करने वालों, और तांत्रिकों, आदि से दूर रहने को कहा (व्यवस्थाविवरण 8:9-14) उन मूर्तिपूजकों और यहोवा परमेश्वर को न जानने वाले लोगों में भी कुछ आश्चर्यकर्म, चिह्न और चमत्कार करने वाले लोग उस कनान देश में पहले से रहते थे जिसे परमेश्वर इस्राएलियों को देने जा रहा था। उनकी वहाँ उपस्थिति और समाज पर उनका प्रभाव और पकड़ इस बात का प्रमाण है कि उनमें कुछ शक्तियां थीं। किन्तु वे शक्तियां परमेश्वर की ओर से नहीं थीं, इसीलिए परमेश्वर अपने लोगों को उन शक्तियों के प्रभाव में आने नहीं देना चाहता था, और उनसे दूर रहने, ऐसी शक्तियां रखने वाले लोगों का नाश करने के लिए कहा। 
  • इसी प्रकार से राजा नबूकदनेस्सर ने अपने दरबार में ज्योतिषी, तन्त्री, टोन्हे, आदि रखे हुए थे; न तो राजा नबूकदनेस्सर और न उसके दरबार के ये ज्योतिषी, तन्त्री, टोन्हे, आदि, जीवते, सच्चे परमेश्वर यहोवा को जानते या मानते थे। किन्तु उन ज्योतिषी, तन्त्री, टोन्हे, आदि ने अवश्य ही अपनी कोई योग्यता और क्षमता राजा के सामने प्रमाणित की होगी, और करते रहे होंगे; किन्तु अब वे परमेश्वर द्वारा दिखाए गए स्वप्न को नहीं बूझ सके (दानिय्येल 2:2-7; 4:4-7), जो इस बात का प्रमाण था किन उनकी जो भी शक्ति थी वह परमेश्वर से भिन्न और परमेश्वर द्वारा दी जाने वाली सामर्थ्य से कम थी। 
  • शमौन टोन्हा करने वाला लोगों को अपनी विद्या और कार्यों से चकित करता था, और लोग इतने प्रभावित थे कि उसमें ईश्वरीय शक्ति होने की बात करते थे (प्रेरितों 8:9-11)। अर्थात उसमें भी कोई अलौकिक शक्ति थी, जिसकी सहायता से वह लोगों पर प्रभाव और पकड़ बनाए हुए था, और जिसे उसने छोड़ा नहीं था, यद्यपि उसने भी मसीही विश्वासी हो जाने का दावा किया था। उसकी इस शक्ति के विषय जिसके प्रभाव में वह अभी तक था, पतरस उसे कहता है, “इस बात में न तेरा हिस्सा है, न बांटा; क्योंकि तेरा मन परमेश्वर के आगे सीधा नहीं। इसलिये अपनी इस बुराई से मन फिराकर प्रभु से प्रार्थना कर, सम्भव है तेरे मन का विचार क्षमा किया जाए। क्योंकि मैं देखता हूं, कि तू पित्त की सी कड़वाहट और अधर्म के बन्धन में पड़ा है” (प्रेरितों के काम 8:21-23)। अर्थात शमौन टोन्हा करने वाले में होकर कार्य करने वाली शक्तियां परमेश्वर की शक्तियां नहीं थीं।  
  • पौलुस ने एक दासी में से भावी कहने वाली आत्मा को निकाला, जो भावी कहा करती थी (प्रेरितों 16:16-18)। यदि उस लड़की में वह आत्मा परमेश्वर की ओर से होती, तो पौलुस उसे क्यों निकालता? उलटे, वह तो उसके अपने विषय बताने का अनुमोदन करता, उसे परमेश्वर की महिमा के लिए प्रयोग करता। 
  • मसीही विश्वास में आने से पहले जादू करने वालों ने, मसीही विश्वास में आने के बाद, अपनी पुस्तकें लाकर जलाईं (प्रेरितों 19:18-19); अर्थात उनकी विद्या मानी, सीखी, और सिखाई जाती थी। अन्यथा उस समय में जब सभी पुस्तकें हाथ से लिखी जाती थीं, तो ऐसी बातों के लिए जो मिथ्या और प्रमाण-रहित थीं, पुस्तकें क्यों लिखी जातीं, और रखी जाती, या इतनी बहुमूल्य आँकी जातीं? उन पुस्तकों की बातों में चाहे सब कुछ न सही, किन्तु कुछ तो यथार्थ होगा, जिसके द्वारा जन-साधारण को प्रभावित एवं वशीभूत किया जाता था। परंतु जो कुछ भी था वह परमेश्वर और मसीही विश्वास के अनुरूप नहीं था, इसीलिए उन्होंने उन सब को जला दिया, नष्ट कर दिया। 
  • परमेश्वर पवित्र आत्मा ने पौलुस द्वारा थिस्सलुनीकियों को लिखवाई पत्री में मसीही विश्वासियों को सचेत किया कि वे चिह्न-चमत्कारों के पीछे न जाएं, क्योंकि अंत के दिनों में शैतान ऐसे कार्यों के द्वारा लोगों को भटका देगा और विनाश में ले जाएगा, क्योंकि उन्होंने परमेश्वर के वचन पर विश्वास करने के स्थान पर अलौकिक बातों पर विश्वास किया और झूठ में फंस गए (2 थिस्सलुनीकियों 2:9-12);
  • प्रभु यीशु ने, और पुराने नियम के नबियों तथा नए नियम के प्रेरितों ने तो मुर्दों में प्राण डाले थे; किन्तु अंत के समय में तो यहाँ तक होगा कि शैतान मूरत में भी प्राण डालेगा और उससे बुलवाएगा (प्रकाशितवाक्य 13:14-15)

 उपरोक्त उदाहरणों से यह स्पष्ट है कि सभी आश्चर्यकर्म, चिह्न, और चमत्कार परमेश्वर की ओर से, या परमेश्वर की सामर्थ्य से नहीं होते हैं, शैतान भी लोगों को भरमाने, और अपने वक्ष में रखने के लिए यह करवा सकता है, और करवाता भी है। तो फिर हम कैसे पहचानें कि कौन सा आश्चर्यकर्म परमेश्वर की सामर्थ्य से है, और कौन सा शैतान की सामर्थ्य से? परमेश्वर का वचन इस बात के लिए बहुत स्पष्ट है कि परमेश्वर की दृष्टि में महत्व और प्राथमिकता परमेश्वर के वचन और उसकी आज्ञाकारिता की है। अर्थात, जो कुछ भी परमेश्वर की सामर्थ्य से होगा, वह उसके वचन के अनुसार होगा, और उसकी आज्ञाकारिता में होगा। जिस भी आश्चर्यकर्म, चिह्न, चमत्कार, आदि में यह प्राथमिक और सबसे महत्वपूर्ण गुण नहीं है, वह प्रभु की ओर से नहीं है। दूसरा महत्वपूर्ण गुण, जिसे हम 1 कुरिन्थियों 12:7 में पाते हैं, है कि जो परमेश्वर की आज्ञाकारिता और सामर्थ्य से होगा, वह किसी व्यक्ति की प्रशंसा या बड़ाई के लिए नहीं, वरन सभी की भलाई के लिए और परमेश्वर के नाम की महिमा के लिए होगा। चाहे कहने को परमेश्वर का नाम उन आश्चर्यकर्मों, चिह्नों, चमत्कारों के साथ और उनके करने वाले के साथ जुड़ा हुआ हो, किन्तु यदि उनका उद्देश्य कलीसिया की भलाई और उन्नति, सुसमाचार का प्रचार, और प्रभु यीशु में पापों की क्षमा एवं उद्धार को बताना, प्रभु यीशु के नाम पर ऊँचा उठाना नहीं है (यूहन्ना 3:14-15), तो उन लोगों और उनके कामों के साथ प्रभु का नाम जुड़ा होना व्यर्थ है, भ्रम है, छलावा है। 

प्रभु यीशु ने अपने पहाड़ी उपदेश में, एक बहुत महत्वपूर्ण शिक्षा दी है, “जो मुझ से, हे प्रभु, हे प्रभु कहता है, उन में से हर एक स्वर्ग के राज्य में प्रवेश न करेगा, परन्तु वही जो मेरे स्वर्गीय पिता की इच्छा पर चलता है। उस दिन बहुतेरे मुझ से कहेंगे; हे प्रभु, हे प्रभु, क्या हम ने तेरे नाम से भविष्यवाणी नहीं की, और तेरे नाम से दुष्टात्माओं को नहीं निकाला, और तेरे नाम से बहुत अचम्भे के काम नहीं किए? तब मैं उन से खुलकर कह दूंगा कि मैं ने तुम को कभी नहीं जाना, हे कुकर्म करने वालों, मेरे पास से चले जाओ” (मत्ती 7:21-23)। यहाँ प्रभु द्वारा कही गई बातों पर ध्यान दीजिए:

  • जिनके लिए प्रभु ने यह बात कही है, वे प्रभु को संबोधित कर रहे थे, किसी अन्य देवी-देवता या अलौकिक शक्ति को नहीं;
  • वे संख्या मेंबहुतेरेहोंगे, थोड़े से नहीं
  • उन्होंने जो कुछ भी किया, वह प्रभु यीशु के नाम से किया, अपने नाम से या किसी अन्य देवी-देवता के नाम से नहीं;
  • उन्होंने जो कुछ किया, वह वही सब था जो आज पवित्र आत्मा के नाम से गलत शिक्षाएं सिखाने और फैलाने वाले करने पर ज़ोर देते हैं - भविष्यवाणियाँ करना, दुष्टात्माओं को निकालना, अचंभे के कार्य करना;
  • उन्होंने यह सब थोड़ा सा या कभी-कभार नहीं वरन बहुतायत से किया;
  • उन्होंने यह नहीं कहा किहमने करने के प्रयास किए”, याहमने यह सब करने की लालसा रखी”; वरन यह कि हमने किया! अर्थात ये सभी कार्य उनके द्वारा हुए, उनके ये कार्य लोगों के सामने प्रत्यक्ष थे; और
  • प्रभु यीशु ने उन से यह नहीं कहा कितुमने यह सब करने का प्रयास तो किया किन्तु तुम से हो नहीं सका”; वरन उनके इन दावों को झूठ या गलत न बताने के द्वारा प्रभु ने अप्रत्यक्ष रीति से उनके द्वारा यह सब किए जाने की पुष्टि भी की;
  • किन्तु फिर भी प्रभु ने उन्हें कहामैंने तुम्हें कभी नहीं जानाऔर उन्हें पूर्णतः अस्वीकार कर दिया;
  • प्रभु ने उनके कार्यों को झुठलाया नहीं, वरन उन कार्यों कोकुकर्मकहा।

प्रभु द्वारा उनके लिए कही गई इस अनपेक्षित और कठोर बात का आधार पद 21 के अंत में प्रभु यीशु द्वारा कहा गया वाक्य हैवही जो मेरे स्वर्गीय पिता की इच्छा पर चलता है”; अर्थात इन लोगों में परमेश्वर तथा उसके वचन की आज्ञाकारिता का स्थान नहीं था। चाहे वे संख्या में बहुत थे, और वे प्रभु के नाम से और बहुतायत से ये सभी भविष्यवाणियाँ, चिह्न और चमत्कार करते थे किन्तु वे परमेश्वर की इच्छा पर नहीं चलते थे, उनकी अपनी ही धारणाएं, अपने ही विश्वास, अपनी ही बातें और शिक्षाएं थीं, जिन्हें वे मानते, मनाते, और मनवाते थे - और अपनी यह मन-गढ़न्त बातें, अपनी मन-मर्ज़ी वे प्रभु परमेश्वर के नाम से बताते, चलाते, सिखाते और दिखाते थे। किन्तु उनके द्वारा अपनी बातों को प्रभु के नाम से बताने, सिखाने, और दिखाने के द्वारा, उनकी बातें प्रभु परमेश्वर की बातें नहीं बन गईं। वे मनुष्यों की बातें और शिक्षाएं थीं, और मनुष्यों ही की रहीं; प्रभु परमेश्वर ने उन्हें कोई महत्व अथवा स्वीकृति नहीं दी, बल्कि न केवल उन्हें पूर्णतः तिरस्कार कर दिया, वरन ऐसा करने वालों को अपने पास से निकाल बाहर भी कर दिया। 

यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं, और प्रभु के लिए सेवकाई में लगे हैं, या लगना चाहते हैं, तो आपके लिए आवश्यक है कि परमेश्वर द्वारा आपके लिए निर्धारित सेवकाई को पहचानें, आपको उस सेवकाई के निर्वाह के लिए परमेश्वर पवित्र आत्मा द्वारा दिए गए वरदान, यह पहचान करने में आपके सहायक होंगे; और फिर परमेश्वर की आज्ञाकारिता और उसके प्रति सच्चे समर्पण के साथ उस सेवकाई को पूरा करें। लुभावनी और प्रभावित करने वाली बातों, और लोगों में आदर, सम्मान, स्थान पाने, या शारीरिक और सांसारिक लाभ की बातों को पाने या करने के छलावे में न पड़ें। वही करें जो परमेश्वर ने आपके लिए रखा है, वैसे ही करें, जैसे परमेश्वर ने अपने वचन में बताया है, और आपके लिए ठहराया है। 

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी। 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • मीका 4-5     
  • प्रकाशितवाक्य 12 

सोमवार, 20 दिसंबर 2021

मसीही सेवकाई और पवित्र आत्मा के वरदान - 18


आत्मिक वरदानों के प्रयोगकर्ता - शिक्षक और शिक्षा देना

मसीही विश्वासियों की परमेश्वर द्वारा उनके लिए निर्धारित सेवकाइयों में, वचन की सेवकाई से संबंधित 1 कुरिन्थियों 12:28 में दी गई सेवकाइयों में से पहली दो - प्रेरित, और भविष्यद्वक्ता होने के बारे में हम पिछले लेखों में देख चुके हैं। आज इस पद में दी गई वचन से संबंधित तीसरी सेवकाई, शिक्षक के बारे में देखेंगे। यह रोचक बात है कि इस पद में, और पद 8 से 10 में दिए गए पवित्र आत्मा के वरदानों में से ऐसे वरदान, जिनसे अपने आप को प्रमुख, या महत्वपूर्ण, या विशिष्ट दिखाया जा सके, जैसे कि प्रेरित, भविष्यद्वक्ता और भविष्यवाणी, आश्चर्यकर्म और चंगा करने वाले, अन्य भाषा बोलना, आदि के लिए तो सामान्यतः लोग बहुत लालसा रखते हैं, उन्हें प्राप्त करने के लिए प्रार्थना और प्रयास करते हैं; किन्तु अन्य वरदानों जैसे शिक्षक, उपकार या सहायता करने वाले, बुद्धि, ज्ञान, और विश्वास, आत्माओं की परख, आदि के लिए सामान्यतः लोगों में कोई रुचि नहीं होती है। जबकि 1 कुरिन्थियों 8-10, 28 में परमेश्वर पवित्र आत्मा ने सबसे पहले इन्हीं वरदानों को लिखवाया है, जिनके लिए आज लोग कम चाह रखते हैं। साथ ही इन कम चाहे जाने वाले वरदानों के साथ यह भी है कि उनके निर्वाह के लिए परमेश्वर के साथ बैठना और समय बिताना पड़ता है, लोगों के मध्य परिश्रम करना पड़ता है, और बहुधा सामान्य लोगों को क्योंकि परमेश्वर की खरी बातें रास नहीं आती हैं, इसलिए इन वरदानों का प्रयोग करने वालों को संसार में आदर, ओहदा, और उच्च स्थान भी कम ही मिलते हैं, तिरस्कार और विरोध अधिक मिलता है। संभवतः इसीलिए मसीही विश्वासियों में इन वरदानों के लिए चाह बहुत कम है।  

हम वचन से ही वचन की शिक्षा दिए जाने और उसकी प्रभावों के कुछ उदाहरणों को देखते हैं:

प्रभु यीशु मसीह ने जब लोगों को सिखाया, तब, शास्त्रियों के समान नहीं, परंतु अधिकारी के समान सिखाया (मरकुस 1:22), अर्थात ‘किताबी या मानवीय’ ज्ञान के अनुसार नहीं वरन वचन की गहराई से समझ और दृढ़ता के साथ सिखाया। किन्तु साथ ही वह लोगों को उनकी समझ के अनुसार सिखाता था, और परमेश्वर की शिक्षाओं को सरल दृष्टांतों के द्वारा लोगों को समझाता था (मरकुस 4:33-34)। मसीही शिक्षक को वचन की शिक्षा देने की विधि का यही उदाहरण लेकर चलना चाहिए। 

पौलुस ने कुरिन्थुस की मण्डली को उन्हें उससे मिली सुसमाचार की शिक्षा के विषय स्मरण दिलाया, “और हे भाइयों, जब मैं परमेश्वर का भेद सुनाता हुआ तुम्हारे पास आया, तो वचन या ज्ञान की उत्तमता के साथ नहीं आया। और मेरे वचन, और मेरे प्रचार में ज्ञान की लुभाने वाली बातें नहीं; परन्तु आत्मा और सामर्थ्य का प्रमाण था। इसलिये कि तुम्हारा विश्वास मनुष्यों के ज्ञान पर नहीं, परन्तु परमेश्वर की सामर्थ्य पर निर्भर हो” (1 कुरिन्थियों 2:1, 4-5)। अर्थात, पौलुस जैसे ज्ञानवान और पवित्र शास्त्र की उत्तम शिक्षा पाए हुए व्यक्ति के द्वारा पवित्र आत्मा की अगुवाई में जो सुसमाचार की शिक्षा दी गई, वह आत्मा की सामर्थ्य से तो थी, किन्तु ज्ञान बघारने की बातें, या संसार के ज्ञान की बातें नहीं थीं। 

इसी प्रकार थिस्सलुनीकिया की मसीही मण्डली को पौलुस ने लिखा, “क्योंकि हमारा सुसमाचार तुम्हारे पास न केवल वचन मात्र ही में वरन सामर्थ्य और पवित्र आत्मा, और बड़े निश्चय के साथ पहुंचा है; जैसा तुम जानते हो, कि हम तुम्हारे लिये तुम में कैसे बन गए थे। और तुम बड़े क्लेश में पवित्र आत्मा के आनन्द के साथ वचन को मान कर हमारी और प्रभु की सी चाल चलने लगे” (1 थिस्स्लुनीकियों 1:5, 6)। यहाँ पर भी हम देखते हैं कि पौलुस द्वारा वचन की शिक्षा मनुष्य के ज्ञान के द्वारा नहीं, वरन, पवित्र आत्मा की सामर्थ्य और बड़ी दृढ़ता से दी गई। साथ ही हम यह भी देखते हैं कि परमेश्वर के वचन का पालन करने में थिस्सलुनीकिया के मसीही विश्वासियों को क्लेश तो उठाना पड़ा, किन्तु साथ ही उनमें पवित्र आत्मा का आनंद भी था, और उनके जीवन में परिवर्तन आया, और वे प्रभु की सी चाल चलने लगे - जो वचन के सच्चे, खरे, और परमेश्वर की ओर से होने का प्रमाण है। 

परमेश्वर पवित्र आत्मा की अगुवाई में पौलुस ने लोगों को वचन की शिक्षा देने के संदर्भ तिमुथियुस को लिखा था:

o अपने आप को परमेश्वर का ग्रहण योग्य और ऐसा काम करने वाला ठहराने का प्रयत्न कर, जो लज्जित होने न पाए, और जो सत्य के वचन को ठीक रीति से काम में लाता हो। पर अशुद्ध बकवाद से बचा रह; क्योंकि ऐसे लोग और भी अभक्ति में बढ़ते जाएंगे” (2 तीमुथियुस 2:15-16)। अर्थात, वचन की सेवकाई करने वाले को यह ध्यान रखना है कि वह वचन को अपने स्वार्थ या इच्छा-पूर्ति के लिए नहीं, वरन, ठीक रीति से काम में लाए, अशुद्ध बकवाद से बचा रहे, उसका जीवन और व्यवहार किसी भी रीति से लज्जित करने वाला न हो, और वह तथा उसका कार्य मनुष्यों को नहीं वरन परमेश्वर को ग्रहण योग्य हो - परमेश्वर के कहे और इच्छा के अनुसार हो, न कि लोगों को लुभाने वाला हो।  

o कि तू वचन को प्रचार कर; समय और असमय तैयार रह, सब प्रकार की सहनशीलता, और शिक्षा के साथ उलाहना दे, और डांट, और समझा। क्योंकि ऐसा समय आएगा, कि लोग खरा उपदेश न सह सकेंगे पर कानों की खुजली के कारण अपनी अभिलाषाओं के अनुसार अपने लिये बहुतेरे उपदेशक बटोर लेंगे। और अपने कान सत्य से फेरकर कथा-कहानियों पर लगाएंगे। पर तू सब बातों में सावधान रह, दुख उठा, सुसमाचार प्रचार का काम कर और अपनी सेवा को पूरा कर” (2 तीमुथियुस 4:2-5)। अर्थात, वचन की शिक्षा देने वाले को हर समय अपने आप को तैयार रखना चाहिए, और धैर्य के साथ इस सेवकाई को निभाना चाहिए। वचन के शिक्षक को, वचन को समझाने के लिए यदि आवश्यकता पड़े तो लोगों को उलाहना देने और डांटने की भी अनुमति है, वरन, ऐसा करने की ज़िम्मेदारी है; इसमें निहित है कि वचन की शिक्षा पाने वालों को उलाहना और डाँट सुनने के लिए भी तैयार और नम्र रहना चाहिए। वचन के शिक्षक को सार्थक और सच्ची बातों के द्वारा खराई से परमेश्वर की बातों, निर्देशों, और शिक्षाओं को लोगों तक पहुँचाना है, चाहे वे कटु सत्य ही क्यों न हों। उसे लुभावनी बातें सुनाकर लोगों से प्रशंसा और प्रमुख स्थान पाने से बच कर रहना है। चाहे यह सब करने के लिए उसे लोगों से विरोध का सामना ही क्यों न करना पड़े, दुख ही क्यों न उठाने पड़ें। 

o हर एक पवित्र शास्त्र परमेश्वर की प्रेरणा से रचा गया है और उपदेश, और समझाने, और सुधारने, और धर्म की शिक्षा के लिये लाभदायक है। ताकि परमेश्वर का जन सिद्ध बने, और हर एक भले काम के लिये तत्पर हो जाए” (2 तीमुथियुस 3:16-17)। अर्थात मसीही शिक्षक को परमेश्वर की शिक्षाओं को लोगों तक पहुँचाने के लिए परमेश्वर के वचन ही का प्रयोग करना चाहिए, जिसे स्मरण करवाने, सिखाने, और समझाने के लिए प्रत्येक मसीही विश्वासी में पवित्र आत्मा निवास करता है (यूहन्ना 14:26; 16:13-14; 1 कुरिन्थियों 2:10-13)। परमेश्वर के वचन के प्रयोग के द्वारा ही लोग परमेश्वर की वास्तविक शिक्षाओं को सीखने पाते हैं, और उसी से वे सिद्ध बनकर भले कार्यों के लिए तैयार होने पाते हैं; साथ ही इफिसियों 4:11-12 भी देखें। 

उपरोक्त सभी उदाहरणों में हम वचन की शिक्षा से संबंधित कहीं किसी नाटकीय व्यवहार, या सांसारिक अथवा शारीरिक लाभ की बातों को नहीं पाते हैं। हर उदाहरण परमेश्वर के वचन के खराई से प्रयोग, और पवित्र आत्मा की सामर्थ्य के साथ था, जिसका प्रमाण लोगों के जीवन बदलने के द्वारा देखा गया, न कि कुछ समय के लिए कुछ अच्छा अनुभव हुआ, सुनने में अच्छा लगा, और फिर जीवन बदले बिना ही व्यक्ति अपनी पहले की से दशा में फिर से पहुँच गया। वचन को सुनने और मानने वालों ने इसके लिए क्लेश सहना भी स्वीकार किया, किन्तु वचन की खराई और सच्चाई से पीछे नहीं हटे। परमेश्वर की ओर से नियुक्त शिक्षक जब परमेश्वर पवित्र आत्मा की सामर्थ्य से परमेश्वर के वचन को बताते और सिखाते हैं, तो वह ‘मनुष्य की अभिलाषाओं के अनुसार कानों की खुजली’ मिटाने वाली कथा-कहानियों का प्रचार नहीं होता है (2 तिमुथियुस 4:3-4), वरन मन और जीवन बदलने वाली सामर्थी शिक्षाएं, परमेश्वर की दोधारी तलवार होता है जो “जीव, और आत्मा को, और गांठ गांठ, और गूदे गूदे को अलग कर के, वार पार छेदता है; और मन की भावनाओं और विचारों को जांचता है” (इब्रानियों 4:11)। 

यदि आप मसीही विश्वासी हैं, और आपको लोगों को परमेश्वर के वचन की शिक्षा देने का दायित्व मिल है, परमेश्वर ने आपके लिए यह सेवकाई निर्धारित की है, तो अपनी सेवकाई के लिए परमेश्वर से यशायाह 50:4 आपके लिए पूरा करना माँगिए। उपरोक्त बातों और प्रभु यीशु के शिक्षा देने के उदाहरण का ध्यान रखिए और पालन कीजिए। यह आपके लिए भी तथा औरों के लिए भी उन्नति का कारण ठहरेगा। आप जितना वचन को औरों के साथ बाँटेंगे, आप पाएंगे के आप स्वयं भी वचन की समझ और गहराई में उतना अधिक बढ़ते चले जा रहे हैं, और परमेश्वर अपने वचन के गूढ़ भेद आप पर और भी अधिक प्रकट करता जा रहा है। परंतु सावधान रहिए, ऐसा होने से शैतान आपके अन्दर कोई घमण्ड न ले आए, आप अपने आप को विद्वान और विशिष्ट न समझने लगें; जहाँ घमंड होगा, वहाँ बहुत शीघ्र ही पतन भी आ जाएगा। 

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।  

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • मीका 1-3
  • प्रकाशितवाक्य 11   

रविवार, 19 दिसंबर 2021

मसीही सेवकाई और पवित्र आत्मा के वरदान - 17

 

आत्मिक वरदानों के प्रयोगकर्ता - भविष्यद्वक्ता और भविष्यवाणी  

  पिछले लेख में हमने 1 कुरिन्थियों 12:28 में दिए आत्मिक वरदानों में से दूसरे वरदान - भविष्यद्वक्ता होने के बारे में देखना आरंभ किया था। यह वरदान मसीही विश्वासियों की मण्डली में वचन की सेवकाई से संबंधित वरदान है। हमने देखा था कि बाइबल के अनुसार भविष्यद्वक्ता होने और भविष्यवाणी करने का अर्थ केवल आने वाले समय में होने वाली बातें बताना नहीं था, किन्तु परमेश्वर की ओर से मिले संदेश या शिक्षा को लेकर लोगों के समक्ष खड़े होना, और हर कीमत पर उसे खराई से बताना था। उन भविष्यद्वक्ताओं के परमेश्वर के प्रति पूर्णतः समर्पित सत्यवादी होने, और अपनी भविष्यवाणियों द्वारा लोगों के पाप और बुराई तथा परमेश्वर के विमुख होने को प्रकट किए जाने के कारण न तो वे और न ही उनके संदेश लोगों में लोकप्रिय होते थे। बाइबल में उल्लेखित भविष्यद्वक्ताओं ने सामान्यतः दुख, तिरस्कार, और सताव झेलकर अपनी इस सेवकाई को परमेश्वर के लिए पूरा किया। न तो वे लोकप्रिय नहीं होते थे और न ही अपने भविष्यद्वक्ता होने को आदर और प्रशंसा पाने के लिए किसी पदवी या उपाधि के समान प्रयोग करते थे। आज बहुत से लोग अपने आप को पवित्र आत्मा की ओर सेभविष्यद्वक्ताकहते हैं, और अनेकों लोग पवित्र आत्मा की सामर्थ्य सेभविष्यवाणियाँकरने के दावे करते हैं, किन्तु उनकीसेवकाईसमाज और लोगों से आदर, प्रशंसा, और सांसारिक लाभ प्राप्त करने से संबंधित होती है, लोगों पर उनकी वास्तविक आत्मिक स्थिति और उनके बारे में परमेश्वर के विचार खराई से प्रकट करने वाली नहीं। उनके जीवन और बातें शारीरिक और सांसारिक लाभ और लोक-लुभावनी बातों से भरी होती हैं, जो परमेश्वर के वचन (2 तिमुथियुस 3:16-17; 4:1-5) के अनुरूप कदापि नहीं है; आरंभिक मसीही मण्डली में परमेश्वर पवित्र आत्मा की ओर से नियुक्त भविष्यद्वक्ताओं और उनकी भविष्यवाणियों से पूर्णतः भिन्न है।

आज हम परमेश्वर के वचन से देखेंगे कि पुराने और नए नियम मेंभविष्यवाणीयानबूवतशब्द कितने विभिन्न अभिप्रायों के लिए प्रयोग किया गया है, तथा यह पहचानेंगे और समझेंगे कि बाइबल मेंभविष्यवाणीयानबूवतशब्द का अभिप्राय केवल भविष्य की बातें बताना ही नहीं है, जैसा ये लुभावनी बातें कर के लोगों को भरमाने और बहकाने वाले कहते और करते हैं, जबकि उनकी कही अधिकांशभविष्यवाणीकी बातें पूरी भी नहीं होती हैं। हमने कल देखा था कि नए नियम की मूल यूनानी भाषा में इनके लिए प्रयोग किए गए शब्दों का अर्थ हैसामने या समक्ष, अथवा आगे, बोलने वाला”, औरसामने या समक्ष, अथवा आगे, बोला गया”; और इसके समान पुराने नियम की मूल इब्रानी भाषा के शब्दों का भी यही अर्थ और अभिप्राय होता है। इस शब्दार्थ से यह प्रकट है कि मूल भाषा के शब्दों के अनुसार, न केवल भविष्य की बातें बताने वाला और भविष्य की बातों को बताना भविष्यद्वक्ता और भविष्यवाणी है, वरन यदि कोई लोगों के सामने या समक्ष आकर परमेश्वर की ओर से बोले, वर्तमान की ही किसी बात के लिए सन्देश अथवा शिक्षा दे, तो वह भी भविष्यद्वक्ता है, और उसकी कही बात भी भविष्यवाणी है।

बाइबल मेंभविष्यवाणीयानबूवतशब्द के प्रयोग के कुछ उदाहरण हैं:

  • किसी देवता के नाम को पुकारना - 1 राजाओं 18:29 - बाल देवता के नबियों द्वारा अपने देवता को पुकारना।  
  • किसी विषय या संदेश को परमेश्वर की ओर से लोगों को बताना या उनके सामने रखना - 1 कुरिन्थियों 14:3
  • परमेश्वर की ओर से किसी होने वाली भावी घटना के बारे में सचेत करना - यहेजकेल 36:1, 3, 6; 37:12-14 
  • परमेश्वर की ओर से कोई आज्ञा देना - यहेजकेल 37:4, 9-10 
  • परमेश्वर के प्रभाव में आकर बात करना - आमोस 3:8
  • परमेश्वर की आराधना और स्तुति, भजन और गीतों के द्वारा तथा संगीत वाद्य बजाकर करना - 1 इतिहास 25:1-6 
  • किसी छिपी हुई बात को प्रकट करना - लूका 22:64

साथ ही नए नियम में परमेश्वर पवित्र आत्मा की अगुवाई में प्रेरित पौलुस के द्वारा तिमुथियुस को उसकी सेवकाई के विषय जो शिक्षाएं दी गईं, जो तिमुथियुस के नाम लिखी दोनों पत्रियों में मिलती हैं, वे भी हमें नए नियम के इस समय में परमेश्वर की ओर से बोलने वाले व्यक्ति में पाए जाने वाले गुणों, और उसके संदेश तथा शिक्षाओं में आवश्यक बातों को बताती हैं। 2 तिमुथियुस 2 अध्याय बताता है कि परमेश्वर की ओर से बोलने और सिखाने वाले व्यक्ति में क्या गुण होने चाहिएं। उसकी शिक्षाओं के परमेश्वर की ओर से होने के बारे में 2 तीमुथियुस 3:16-17 में लिखा है किहर एक पवित्र शास्त्र परमेश्वर की प्रेरणा से रचा गया है और उपदेश, और समझाने, और सुधारने, और धर्म की शिक्षा के लिये लाभदायक है। ताकि परमेश्वर का जन सिद्ध बने, और हर एक भले काम के लिये तत्पर हो जाएअर्थात, परमेश्वर की ओर से वचन की सेवकाई करने वाले को अपनी इच्छा और समझ की बातों के द्वारा नहीं, पवित्र शास्त्र की बातों के उपयोग के द्वारा अपनी सेवकाई करनी है। इस सेवकाई के निर्वाह के लिए उस पवित्र शास्त्र की बातों के द्वारा लोगों कोउपदेश, और समझाने, और सुधारने, और धर्म की शिक्षा”” देनी है। परमेश्वर के उस जन कोसब प्रकार की सहनशीलता, और शिक्षा के साथ उलाहना दे, और डांट, और समझा” (2 तिमुथियुस 4:2) के द्वारा यह करना है। परमेश्वर पवित्र आत्मा द्वारा दी गई बाइबल की इन स्पष्ट और खरी बातों तथा शिक्षाओं की तुलना वर्तमान केभविष्यद्वक्ताकहलाने वाले औरभविष्यवाणियाँकरने वाले लोगों के जीवनों और कार्यों तथा प्रचार से कीजिए; तुरंत प्रकट हो जाएगा कि उन लोगों की बातें और व्यवहार पवित्र आत्मा की ओर से हैं या नहीं, क्योंकि पवित्र आत्मासत्य का आत्माहै औरसब सत्य का मार्गही बताता है (यूहन्ना 16:13), वह न तो कभी झूठ बोलता है, और न कभी दोगलापन करता है। 

यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं, तो निवेदन है कि किसी शब्द अथवा वाक्यांश के बाइबल में प्रयोग के विभिन्न उदाहरणों से समझें कि वचन के अनुसार उसका सही अर्थ और अभिप्राय क्या है, और गलत शिक्षाओं में पड़ने से बचें। परमेश्वर के वचन से ही पहचानें कि वास्तव मेंभविष्यद्वक्तायानबीकौन है; और परमेश्वर के वचन मेंभविष्यवाणीयानबूवतशब्द को कितने भिन्न अभिप्रायों के साथ प्रयोग किया गया है। यह जाँचें कि वर्तमान केभविष्यद्वक्तायानबीकहलाए जाने वाले और उनकीभविष्यवाणीयानबूवतकी बातें क्या वचन के इन उदाहरणों से मेल खाते हैं, वचन की सच्चाई के अनुसार हैं कि नहीं? स्वयं भी शैतान द्वारा फैलाई जा रही गलत शिक्षाओं से बचें तथा औरों को भी बचाएं, और बाहर निकालें।

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।    

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • योना 1-4    
  • प्रकाशितवाक्य 10

शनिवार, 18 दिसंबर 2021

मसीही सेवकाई और पवित्र आत्मा के वरदान - 16

  

आत्मिक वरदानों के प्रयोगकर्ता - भविष्यद्वक्ता  

हम परमेश्वर के वचन से मसीही जीवन और सेवकाई के लिए परमेश्वर पवित्र आत्मा द्वारा दिए जाने वाले वरदानों के बारे में देख रहे हैं। यद्यपि पवित्र आत्मा के द्वारा दिए गए सभी आत्मिक वरदान और परमेश्वर द्वारा निर्धारित की गई सभी सेवकाइयां समान स्तर की हैं, और कोई किसी अन्य से छोटी या बड़ी अथवा कम या अधिक महत्वपूर्ण नहीं है; किन्तु मण्डली में उनके अधिकांशतः या कभी-कभी उपयोग करने के अनुसार, 1 कुरिन्थियों 12:28 में कुछ वरदानों को उपयोगिता के अनुसार वरीयता क्रम में रखा गया है। इस क्रम में सबसे अधिक उपयोगी वचन की सेवकाई से संबंधित वरदान हैं; और सबसे कम उपयोग में आने वाले अन्य भाषाएं बोलने और अनुवाद करने के वरदान हैं। अन्य भाषाएं बोलने से संबंधित वरदानों के बारे में हम पहले देख चुके हैं। वचन की सेवकाई से संबंधित वरदानों में सबसे पहले प्रेरित होने का वरदान है, जिसके बारे में हम पिछले दो लेखों में देख चुके हैं। आज हम वचन की सेवकाई से संबंधित दूसरे वरदान, भविष्यद्वक्ता होने के बारे में परमेश्वर के वचन से देखेंगे।

सामान्यतः जब शब्द भविष्यद्वक्ता या भविष्यवाणी करना हमारे सामने आते हैं, तो हम यही समझते हैं कि इसका अर्थ है भविष्य की बातें बताने वाला व्यक्ति, अथवा भविष्य की बातें बताना। किन्तु बाइबल की मूल भाषाओं में प्रयोग किए गए शब्दों का केवल यही अनुवाद अथवा अर्थ नहीं है। नए नियम की मूल यूनानी भाषा में प्रयोग किए गए शब्दों का अर्थ हैसामने या समक्ष, अथवा आगे, बोलने वाला”, औरसामने या समक्ष, अथवा आगे, बोला गया”; और इसके समान पुराने नियम की मूल इब्रानी भाषा के शब्दों का भी यही अर्थ और अभिप्राय होता है। इस शब्दार्थ से यह प्रकट है कि मूल भाषा के शब्दों के अनुसार, न केवल भविष्य की बातें बताने वाला और भविष्य की बातों को बताना भविष्यद्वक्ता और भविष्यवाणी है, वरन यदि कोई लोगों के सामने या समक्ष आकर परमेश्वर की ओर से बोले,  वर्तमान की ही किसी बात के लिए सन्देश अथवा शिक्षा दे, तो वह भी भविष्यद्वक्ता है, और उसकी कही बात भी भविष्यवाणी है। 

इस संदर्भ में बाइबल की एक और बहुत महत्वपूर्ण शिक्षा का भी ध्यान कीजिए - यद्यपि परमेश्वर ने ऐसे लोगों को खड़ा किया जो उसकी ओर से दर्शन और संदेश पाकर उसके लोगों को उनका भविष्य, उन पर आने वाले दण्ड अथवा आशीषें, और संसार के अंत एवं न्याय आदि के बारे में बताएं, और परमेश्वर की ओर से नियुक्त किए गए इन लोगों को बाइबल में नबी या भविष्यद्वक्ता, और उनकी बातों और संदेशों को भविष्यवाणी कहा गया, किन्तु यह बात न तो पुराने नियम में परमेश्वर के लोगों, इस्राएल पर सामान्यतः, और न ही नए नियम में मसीही विश्वासियों पर सामान्य रीति से, परमेश्वर के नाम से बोलने वाले सभी व्यक्तियों के लिए लागू और वैध कही गई है। बाइबल में सामान्यतः, दोनों पुराने और नए नियमों में, भविष्य की बातों को बताने वालों के विरुद्ध लिखा गया है, उन्हें परमेश्वर और उसकी शिक्षाओं के विमुख एवं दण्डनीय बताया गया है, दुष्टात्माओं के प्रभाव में आकर कार्य करने वाले शैतान के लोग दिखाया गया है (व्यवस्थाविवरण 18:9-14; प्रेरितों 16:16-18)। तात्पर्य यह कि हर वह जन जो परमेश्वर के नाम में बोलने और भविष्य की बातें बताने का दावा करता है, वह निश्चित ही परमेश्वर की ओर से नहीं है; शैतान भी अपने लोगों को इन्हीं शक्तियों के साथ खड़ा कर सकता है। और वास्तविकता यही है कि परमेश्वर के कार्यों में बाधा तथा लोगों भ्रम उत्पन्न करने के लिए शैतान ऐसा करता भी हैसाथ ही हम बाइबल में यह भी देखते हैं कि अपने आप को भविष्यद्वक्ता कहने वाले और भविष्यवाणी करने वाले के लिए यह भी बाध्य था कि उसकी कही बात पूरी भी हो; अन्यथा परमेश्वर ने अपनी व्यवस्था में ऐसे नबियों/लोगों को मार डालने की आज्ञा दी थी (व्यवस्थाविवरण 18:20-22); जिससे लोग परमेश्वर के भविष्यद्वक्ता होने और उसके नाम में व्यर्थ भविष्यवाणी करके उसके लोगों न बहकाएं, न ही परमेश्वर के लोगों से कोई अनुचित लाभ ले सकें। और नए नियम में झूठे  भविष्यद्वक्ताओं की पहचान करके उनसे सचेत रहने के लिए कहा गया है (1 यूहन्ना 4:1-6)

परमेश्वर की ओर से नियुक्त भविष्यद्वक्ता होने, और परमेश्वर की ओर से उसके लोगों तक परमेश्वर के संदेश पहुँचाने वालों के लिए एक और संबंधित एवं महत्वपूर्ण बात यह भी थी कि यदि वह अपनी समझ और इच्छा से परमेश्वर के नाम से कुछ कह दे, तो परमेश्वर उसकी ऐसी बात को अस्वीकार कर देता था। उस नबी की केवल वही बात परमेश्वर को स्वीकार्य होती थी, जो परमेश्वर उसे कहने के लिए कहता था, यदि वह अपनी ओर से परमेश्वर के नाम में कुछ कहता था, तो परमेश्वर उसे उसकी गलती ता देता था, और सही करने के लिए कहता था, जैसे नातान द्वारा परमेश्वर के नाम में दाऊद के साथ परमेश्वर का मंदिर बनवाने के लिए सहमत होना, और फिर परमेश्वर द्वारा उसे गलती सुधार कर सही बात दाऊद से कहने के लिए भेजना (2 शमूएल 7:1-5)। इसके विपरीत, यदि परमेश्वर द्वारा नियुक्त कोई नबी, परमेश्वर की बात कहने में आनाकानी करता था, परमेश्वर की बात को नहीं बताता था, तो भी वह परमेश्वर के सत्य को कहने की ज़िम्मेदारी से बच नहीं सकता था। ऐसे नबियों के अन्दर परमेश्वर ऐसी बेचैनी उत्पन्न करता था कि अन्ततः उन्हें बोलना ही पड़ता था (यिर्मयाह 20:9), या उनके चारों ओर ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न करता था कि उन्हें परमेश्वर के कहे के अनुसार करना ही पड़ता था, जैसे योना नबी द्वारा नीनवे में प्रचार करने से बचने के प्रयास करना और फिर जाकर वहाँ प्रचार करना। 

परमेश्वर के वचन बाइबल के अनुसार, परमेश्वर का नबी या भविष्यद्वक्ता, अर्थात परमेश्वर का संदेशवाहक होना, और परमेश्वर के नाम में भविष्यवाणी करना, अर्थात, परमेश्वर की बात को लोगों के सामने बोलना - यह चाहे भविष्य की बात बताना हो अथवा वर्तमान के किसी विषय पर कोई संदेश या शिक्षा देना हो, कोई हल्के में लिए जाने वाली बात न तो कभी थी, और न ही है। परमेश्वर का भविष्यद्वक्ता कहलाना कोई पदवी या उपाधि प्राप्त करना और फिर उसके द्वारा लोगों से प्रशंसा, आदर, और महत्व पाने की कामना रखने का तरीका नहीं था, वरन परमेश्वर द्वारा दी गई सेवकाई और ज़िम्मेदारी थी, और अभी भी है। यदि हम बाइबल के भविष्यद्वक्ताओं को देखें, वे चाहे पुराने नियम के हों या नए नियम के, उन सभी का जीवन कठिन था, लोगों द्वारा उन्हें कोई विशेष महत्व नहीं दिया जाता था, और बहुत कम लोग उनकी बातों पर ध्यान देते थे या उनकी बातों को पसंद करते थे। परमेश्वर का भविष्यद्वक्ता होना और परमेश्वर की ओर से भविष्यवाणी करना समाज में बुरा बनना और लोगों से बैर मोल लेना होता था, क्योंकि वे भविष्यद्वक्ता अधिकारियों, लोगों और समाज से संबंधित परमेश्वर के कटु सत्य; उनके समय-काल के समाज, अधिकारियों और लोगों की बुराइयाँ, और उनका परमेश्वर से विमुख होने कोसमाज से तिरस्कृत होकर, और अपनी जान पर खेल कर भी प्रकट करते थे, अपने समय के लोगों से इसके लिए सताव और उत्पीड़न को झेलते थे किन्तु इसके विपरीत, आजभविष्यद्वक्ताकहलाना, औरभविष्यवाणीकरना, समाज और लोगों से उनकी पसंद के अनुसार बातें कहने, लोगों से उनकी संपन्नता, प्रसन्नता, और सांसारिक लाभ की प्रतिज्ञाएं करने के लिए प्रयोग किया जाता है। आज लोग इस आत्मिक वरदान को समाज तथा लोगों में व्याप्त बुराइयों को प्रकट करने और उन पर परमेश्वर के सत्य प्रकट करने के लिए नहीं, वरन, अपने आप को विशिष्ट और आदरणीय दिखाने के लिए एक उपाधि, या पदवी के समान प्रयोग करते हैं, जो बाइबल के अनुरूप नहीं है। हम अगले लेख में देखेंगे कि परमेश्वर के वचन मेंभविष्यवाणीशब्द किन विभिन्न अभिप्रायों में प्रयोग किया गया है, और उसके द्वारा इन शब्दों के बाइबल के अनुसार अर्थ को और गहराई से समझेंगे। 

यदि आप मसीही विश्वासी हैं, तो आपको भी परमेश्वर के वचन के अनुसार वचन में लिखी बातों को देखना, जानना, और समझना चाहिए। सेवकाई के आत्मिक वरदान को परमेश्वर के सत्य के स्थान पर लुभावनी बातें कहने और शारीरिक या सांसारिक महत्व एवं स्थान प्राप्त करने के लिए प्रयोग करने वालों से बच कर रहना चाहिए, और वचन की वास्तविकता के अनुसार देख-परख कर ही लोगों द्वारा कही जाने वाली बातों को मानना चाहिए। 

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।  

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • ओबद्याह 1    
  • प्रकाशितवाक्य 9