ई-मेल संपर्क / E-Mail Contact

इन संदेशों को ई-मेल से प्राप्त करने के लिए अपना ई-मेल पता इस ई-मेल पर भेजें : rozkiroti@gmail.com / To Receive these messages by e-mail, please send your e-mail id to: rozkiroti@gmail.com

खराई लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
खराई लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 19 अप्रैल 2026

Blessed and Successful Life - 73 - Appropriately Handling God’s Word – 18 / आशीषित एवं सफल जीवन – 73 - परमेश्वर के वचन से उचित व्यवहार – 18

 

आशीषित एवं सफल जीवन – 73 - परमेश्वर के वचन के भण्डारी बनो – 58

Click Here for the English Translation

इस लेख पर चर्चा के लिये नीचे दिये लिंक्स पर क्लिक करें:

वीडियो चर्चा                            ऑडियो चर्चा

परमेश्वर के वचन से उचित व्यवहार – 18

 

पौलुस से परमेश्वर के वचन के उपयोग और व्यवहार को सीखते हुए, पिछले लेख में हमने बाइबल के एक नए खण्ड, 2 कुरिन्थियों 4:1-5 को देखना आरम्भ किया है। इस खण्ड के पहले पद को देखने में, उसकी पृष्ठभूमि को समझने के लिए पिछले लेख में हमने 2 कुरिन्थियों 3:12 में से पौलुस द्वारा कही गई बात, “हियाव के साथ बोलना” के तात्पर्य को देख और समझा था। हमने देखा था कि यद्यपि पौलुस कोई अच्छा वक्ता नहीं था, लेकिन फिर भी पवित्र आत्मा की अगुवाई और सामर्थ्य से वह स्पष्ट, सरल, सीधी भाषा का, बिना किसी भी हिचकिचाहट के उपयोग करता था, और अपनी सेवकाई में बहुत प्रभावी था (2 कुरिन्थियों 10:1, 10)। यह हमारे सामने परमेश्वर के वचन के प्रभावी उपयोग के लिए एक और पक्ष को  रखता है – पवित्र आत्मा की सामर्थ्य और अगुवाई में होकर, स्पष्ट, सरल, सीधी भाषा का, बिना किसी भी हिचकिचाहट के उपयोग करना।


पौलुस 2 कुरिन्थियों 4:1 में परमेश्वर की उसकी सेवकाई के बारे में कुछ और बातें भी बताता है। वह यहाँ पर तीन बातें कहता है – पहली, वह जो करता था, वह परमेश्वर द्वारा उसे सौंपी गई उसकी सेवकाई थी; दूसरी, क्योंकि पौलुस ने अपने परिवर्तन से पहले परमेश्वर के विरुद्ध किए गए उसके कार्यों के लिए परमेश्वर से दण्ड नहीं वरन दया प्राप्त की थी, इसलिए वह अपने चुने और सेवकाई के लिए बुलाए जाने में परमेश्वर की दया और अनुग्रह के एहसास के साथ सेवा करता था; तीसरी, पौलुस अपनी सेवकाई ‘बिना हियाव छोड़े’ करता था।


उसके पहले कथन के विषय, हम पहले के लेखों में देख चुके हैं कि किस प्रकार से पौलुस अपनी सेवकाई का परमेश्वर के द्वारा निर्धारित किए जाने और सौंपे जाने के बारे में अवगत भी था और दृढ़ भी। और इसी प्रकार से परमेश्वर ने अपनी सभी नया जन्म पाई हुई मसीही विश्वासी संतानों के लिए भी सेवकाई निर्धारित की और सौंपी है (इफिसियों 2:10)। इसीलिए पौलुस अपनी सेवकाई के लिए खराई से परिश्रम करता था, परमेश्वर ने उसे जो सौंपा था उसे पूरा करता था (1 कुरिन्थियों 15:10)। पौलुस अपने ही विचारों और समझ के अनुसार कोई सेवकाई निर्धारित कर के, और बोलने के लिये स्वयं ही शब्दों को गढ़ कर, फिर उन के अनुसार काम कर के, उसे परमेश्वर पर नहीं थोप देता था। वह यह अनुचित आशा कदापि नहीं रखता था कि परमेश्वर उसके प्रत्येक किये और कहे गए को स्वीकार करने, और उस सब के लिए उसे आशीष एवं प्रतिफल देने के लिए बाध्य है।


दूसरा, जैसा पौलुस के साथ था, और जैसा उसने 1 कुरिन्थियों 9:19-27; 15:9-10 में अपने कार्य के बारे में कहा है, उसी प्रकार से प्रभु के लिए हमारी सेवकाई में भी, प्रभु द्वारा हमें सौंपे गए कार्य के लिए, हमें भी कभी इस तथ्य को नहीं भुलाना चाहिए कि परमेश्वर ने अपनी दया में होकर हमें बचाया है, अपनी करुणा और अनुग्रह में हमें अनन्त काल के विनाश से खींच कर निकाला है। साथ ही, यद्यपि हम अपने किसी भी कार्य, किसी भी योग्यता से परमेश्वर को प्रसन्न नहीं कर सकते थे, हमारे ‘धार्मिकता के कार्य’ भी उसकी दृष्टि में मैले चिथड़ों के समान हैं (यशायाह 64:6) और यद्यपि हमारी स्वाभाविक मनसा भला नहीं बल्कि केवल बुरा ही करने की रहती है (भजन 53:2-3; सभोपदेशक 9:3), फिर भी परमेश्वर ने हमें अपने कार्य के लिए उपयोग करने के लिए चुना है। इसीलिए, यह हमारे लिए अनिवार्य है कि हम अपनी सेवकाई को परिश्रम और खराई से करें, जैसे पौलुस किया करता था, न कि लापरवाही से उसे हल्के में लेते हुए। जो लोग उसके द्वारा दिए गए वरदानों और सामर्थ्य के प्रति लापरवाह रहते हैं, उन्हें उपयुक्त रीति से उपयोग नहीं करते हैं, परमेश्वर फिर उनका मार्गदर्शन भी नहीं करता है, तथा उन्हें और अधिक सामर्थ्य भी प्रदान नहीं करता है। इसीलिए, पौलुस के समान, हमें भी परमेश्वर और उसके वचन के साथ समय बिताने वाला, और हमें सौंपे गए कार्यों को खरे प्रयासों के साथ पूरा करने वाला होना चाहिए।


तीसरा, परमेश्वर के लिए हमारी सेवकाई, किसी न किसी रीति से शैतान और उसकी सामर्थ्य के साथ एक युद्ध है (इफिसियों 6:12), और प्रभु की सेवकाई के दौरान हमें क्लेशों और समस्याओं में से होकर निकलना ही पड़ेगा (फिलिप्पियों 1:29); यह कभी भी सहज और आरामदेह नहीं होगी। शैतान की शक्तियों के विरुद्ध हमारे संघर्ष में, निराशा, शैतान द्वारा मसीही विश्वासियों के विरुद्ध उपयोग किया जाने वाला एक प्रबल हथियार है। उस पर विजयी होने का सर्वोत्तम तरीका है अपने खरे परिश्रम के परिणामों को प्रभु के हाथों में छोड़ देना, न कि परिणामों को लेकर व्यथित होना, चिंता करना (1 कुरिन्थियों 3:6-8; 15:58)। इसका आधारभूत विचार है, हमें परमेश्वर ने चुना है, उसी ने कार्य के लिए नियुक्त किया है, उस कार्य के उपयुक्त सामर्थ्य प्रदान की है, वही हमारा मार्गदर्शन करता है, और परमेश्वर ही आशीष और परिणाम भी देगा; अब क्योंकि सभी कुछ परमेश्वर ही के हाथों में है, हमारे हाथों में कुछ नहीं है, तो फिर परिणामों की चिंता क्यों करना, जबकि वे किसी भी प्रकार से हमारे हाथों में हैं ही नहीं? हमारा काम है खराई और परिश्रम से अपनी ज़िम्मेदारी का निर्वाह करना है; और जब तक हम वह ठीक से करते रहते हैं, हमें और किसी बात की चिन्ता करने की कोई आवश्यकता नहीं है।

अगले लेख में हम इससे अगले पद, 2 कुरिन्थियों 4:2 पर विचार आरम्भ करेंगे।

  

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। स्वेच्छा से अपने पापों के लिये पश्चाताप करके, प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु, मैं अपने पापों के लिए पश्चातापी हूँ, उनके लिए आप से क्षमा माँगता हूँ। मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मुझे और मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।


  

कृपया इस संदेश के लिंक को औरों को भी भेजें और साझा करें 

और

कृपया अपनी स्थानीय भाषा में अनुवाद और प्रसार करें

*************************************************************************

Blessed and Successful Life - 73 - Be Stewards of God’s Word – 58 

English Translation

Click On Links Below for discussion on Today's Article:

Video Discussion                     Audio Discussion

Appropriately Handling God’s Word – 18

 

In learning from Paul about how to utilize and handle the Word of God, since the previous article we have started considering a new passage from the Bible, 2 Corinthians 4:1-5. As a background to considering verse 1 of this passage, we had seen about Paul’s use of the phrase “boldness of speech” from 2 Corinthians 3:12. We had seen that despite not being an eloquent speaker, Paul under the guidance and power of the Holy Spirit used plain, simple, straightforward language, unhesitatingly, and was very effective in his ministry (2 Corinthians 10:1, 10). This places before us another aspect of utilizing God’s Word effectively – use plain, simple, straightforward language, confidently, under the guidance and power of the Holy Spirit.


In 2 Corinthians 4:1, Paul states some other things about his serving God. He says three things in this verse – first, what he was doing was his God given ministry; second, since Paul had received mercy and not retribution from the Lord for the deeds he had done against Him before his conversion, therefore he served with the realization of God’s grace and mercy in choosing and calling him for His service; thirdly, Paul fulfilled his ministry without ‘losing heart’, i.e., getting discouraged.


Regarding his first statement, we have seen in the earlier articles, how Paul was aware and sure of the ministry God had given to him; as God has given to all of His children, the Born-Again Christian Believers (Ephesians 2:10). Therefore, he ‘labored more abundantly’ to fulfil that which God had asked him to do (1 Corinthians 15:10). Paul never devised his own plans and ideas, nor the words he would say, then worked according to them, imposing them upon God for acceptance. Paul never labored with the assumption that God is under some kind of compulsion to accept whatever he spoke or did on his own, and will necessarily have to bless and reward him, for whatever he said or did.


Secondly, as was with Paul, and as he states it in 1 Corinthians 9:19-27; 15:9-10 about his working, similarly for us as well, in our service for the Lord, in fulfilling our God assigned ministry, we too should never lose sight of the fact that God in His mercy, has saved us, has drawn us out of eternal destruction in His love and grace towards us. Moreover, despite our being incapable of pleasing God through anything in us, since even our ‘works of righteousness’ are as filthy rags in the sight of God (Isaiah 64:6) and although our natural inclination is only to do evil not good (Psalm 53:2-3; Ecclesiastes 9:3), still, God has decided to use us for His work. He has placed His precious treasure in us earthen vessels (2 Corinthians 4:7). Therefore, it is incumbent upon us to labor diligently to fulfil our ministry, like Paul did, instead of being casual and careless about it. God will not guide and empower those who do not value His gifts and are not willing to use them worthily. Hence, like Paul, we too should be willing to spend time with God and His Word, and put in sincere efforts to carry out our assignments.


Thirdly, our ministry for God is, in one way or another, a battle against Satan and his powers (Ephesians 6:12), and we will have to pass through sufferings and problems (Philippians 1:29) in our service for the Lord; it will never be a cake-walk. In our struggle against the powers of evil, discouragement is often a potent weapon used by Satan against the Believers. The best way to overcome it is to leave the outcome of our sincere and diligent service in the hands of the Lord, instead of fretting about the results (1 Corinthians 3:6-8; 15:58). The underlying thought is, God has chosen us, God has appointed us, God has empowered us, God guides us, God will give the results and blessings; since everything is in God’s hands, nothing is in our hands, then, why worry about the results that in any way are not in our hands? Our work is to labor diligently and sincerely; and so long as we do that worthily, there is no need to worry about anything else.


In the next article, we will consider the next verse, i.e., 2 Corinthians 4:2.


If you have not yet accepted the discipleship of the Lord, make your decision in favor of the Lord Jesus now to ensure your eternal life and heavenly blessings. Where there is obedience to the Lord, where there is respect and obedience to His Word, there is also the blessing and protection of the Lord. Repenting of your sins, and asking the Lord Jesus for forgiveness of your sins, voluntarily and sincerely, surrendering yourself to Him - is the only way to salvation and heavenly life. You only have to say a short but sincere prayer to the Lord Jesus Christ willingly and with a penitent heart, and at the same time completely commit and submit your life to Him. You can also make this prayer and submission in words something like, “Lord Jesus, I am sorry for my sins and repent of them. I thank you for taking my sins upon yourself, paying for them through your life.  Because of them you died on the cross in my place, were buried, and you rose again from the grave on the third day for my salvation, and today you are the living Lord God and have freely provided to me the forgiveness, and redemption from my sins, through faith in you. Please forgive my sins, take me under your care, and make me your disciple. I submit my life into your hands." Your one prayer from a sincere and committed heart will make your present and future life, in this world and in the hereafter, heavenly and blessed for eternity.



Please Share the Link & Pass This Message to Others as Well 
&
Please Translate and Propagate in your Regional Language

रविवार, 29 अक्टूबर 2023

Blessed and Successful Life / आशीषित एवं सफल जीवन – 64 – Be Stewards of God’s Word / परमेश्वर के वचन के भण्डारी बनो – 50

परमेश्वर के वचन से उचित व्यवहार – 18

 

    पौलुस से परमेश्वर के वचन के उपयोग और व्यवहार को सीखते हुए, पिछले लेख में हमने बाइबल के एक नए खण्ड, 2 कुरिन्थियों 4:1-5 को देखना आरम्भ किया है। इस खण्ड के पहले पद को देखने में, उसकी पृष्ठभूमि को समझने के लिए पिछले लेख में हमने 2 कुरिन्थियों 3:12 में से पौलुस द्वारा कही गई बात, “हियाव के साथ बोलना” के तात्पर्य को देख और समझा था। हमने देखा था कि यद्यपि पौलुस कोई अच्छा वक्ता नहीं था, लेकिन फिर भी पवित्र आत्मा की अगुवाई और सामर्थ्य से वह स्पष्ट, सरल, सीधी भाषा का, बिना किसी भी हिचकिचाहट के उपयोग करता था, और अपनी सेवकाई में बहुत प्रभावी था। यह हमारे सामने परमेश्वर के वचन के प्रभावी उपयोग के लिए एक और पक्ष को  रखता है – पवित्र आत्मा की सामर्थ्य और अगुवाई में होकर, स्पष्ट, सरल, सीधी भाषा का, बिना किसी भी हिचकिचाहट के उपयोग करना।


    पौलुस 2 कुरिन्थियों 4:1 में परमेश्वर की उसकी सेवकाई के बारे में कुछ और बातें भी बताता है। वह यहाँ पर तीन बातें कहता है – पहली, वह जो करता था, वह परमेश्वर द्वारा उसे सौंपी गई उसकी सेवकाई थी; दूसरी, क्योंकि पौलुस ने परमेश्वर के विरुद्ध किए गए उसके कार्यों के लिए परमेश्वर से दण्ड नहीं वरन दया प्राप्त की थी, इसलिए वह अपने चुने और सेवकाई के लिए बुलाए जाने में परमेश्वर की दया और अनुग्रह के एहसास के साथ सेवा करता था; तीसरी, पौलुस अपनी सेवकाई ‘बिना हियाव छोड़े’ करता था।


    उसके पहले कथन के विषय, हम पहले के लेखों में देख चुके हैं कि किस प्रकार से पौलुस अपनी सेवकाई का परमेश्वर के द्वारा निर्धारित किए जाने और सौंपे जाने के बारे में अवगत भी था और दृढ़ भी। और इसी प्रकार से परमेश्वर ने अपनी सभी नया जन्म पाई हुई मसीही विश्वासी संतानों के लिए भी सेवकाई निर्धारित की और सौंपी है (इफिसियों 2:10)। इसीलिए पौलुस अपनी सेवकाई के लिए खराई से परिश्रम करता था, परमेश्वर ने उसे जो सौंपा था उसे पूरा करता था (1 कुरिन्थियों 15:10)। वह अपने ही विचारों और समझ के अनुसार कोई सेवकाई निर्धारित कर के  फिर उसके अनुसार काम कर के उसे परमेश्वर पर नहीं थोप देता था, इस अनुचित आशा के साथ कि परमेश्वर उसे स्वीकार करने और उसके लिए उसे आशीष देने के लिए बाध्य है।


    दूसरा, जैसा पौलुस के साथ था, और जैसा उसने 1 कुरिन्थियों 9:19-27; 15:9-10 में अपने कार्य के बारे में कहा है, उसी प्रकार से प्रभु के लिए हमारी सेवकाई में भी, प्रभु द्वारा हमें सौंपे गए कार्य के लिए, हमें भी कभी इस तथ्य को नहीं भुलाना चाहिए कि परमेश्वर ने अपनी दया में होकर हमें बचाया है, अपनी करुणा और अनुग्रह में हमें अनन्त काल के विनाश से खींच कर निकाला है। साथ ही, यद्यपि हम अपने किसी भी कार्य, किसी भी योग्यता से परमेश्वर को प्रसन्न नहीं कर सकते थे, हमारे ‘धार्मिकता के कार्य’ भी उसकी दृष्टि में मैले चिथड़ों के समान हैं (यशायाह 64:6) और यद्यपि हमारी स्वाभाविक मनसा भला नहीं बल्कि केवल बुरा ही करने की रहती है (भजन 53:2-3; सभोपदेशक 9:3), फिर भी परमेश्वर ने हमें अपने कार्य के लिए उपयोग करने के लिए चुना है। इसीलिए, यह हमारे लिए अनिवार्य है कि हम अपनी सेवकाई परिश्रम और खराई से करें, जैसे पौलुस किया करता था। जो लोग उसके द्वारा दिए गए वरदानों और सामर्थ्य के प्रति लापरवाह रहते हैं, उन्हें उपयुक्त रीति से उपयोग नहीं करते हैं, परमेश्वर फिर उनका मार्गदर्शन भी नहीं करता है, तथा उन्हें और अधिक सामर्थ्य भी प्रदान नहीं करता है। इसीलिए, पौलुस के समान, हमें भी परमेश्वर और उसके वचन के साथ समय बिताने वाला, और हमें सौंपे गए कार्यों को खरे प्रयासों के साथ पूरा करने वाला होना चाहिए।


    तीसरा, परमेश्वर के लिए हमारी सेवकाई, किसी न किसी रीति से शैतान और उसकी सामर्थ्य के साथ एक युद्ध है (इफिसियों 6:12), और प्रभु की सेवकाई के दौरान हमें क्लेशों और समस्याओं में से होकर निकलना ही पड़ेगा (फिलिप्पियों 1:29), यह कभी भी सहज और आरामदेह नहीं होगी। शैतान की शक्तियों के विरुद्ध हमारे संघर्ष में, निराशा, शैतान द्वारा मसीही विश्वासियों के विरुद्ध उपयोग किया जाने वाला एक प्रबल हथियार है। उस पर विजयी होने का सर्वोत्तम तरीका है अपने खरे परिश्रम के परिणामों को प्रभु के हाथों में छोड़ देना, न कि परिणामों को लेकर व्यथित होना, चिंता करना (1 कुरिन्थियों 3:6-8; 15:58)। इसका आधारभूत विचार है, हमें परमेश्वर ने चुना है, उसी ने कार्य के लिए नियुक्त किया है, उस कार्य के उपयुक्त सामर्थ्य प्रदान की है, वही हमारा मार्गदर्शन करता है, और परमेश्वर ही आशीष और परिणाम भी देगा; अब क्योंकि सभी कुछ परमेश्वर ही के हाथों में है, हमारे हाथों में कुछ नहीं है, तो फिर परिणामों की चिंता क्यों करना, जबकि वे भी हमारे हाथों में नहीं है? हमारा काम है खराई और परिश्रम से अपनी ज़िम्मेदारी का निर्वाह करना, और जब तक हम वह ठीक से करते रहते हैं, हमें और किसी बात की चिन्ता करने की कोई आवश्यकता नहीं है।


    यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु, मैं अपने पापों के लिए पश्चातापी हूँ, उनके लिए आप से क्षमा माँगता हूँ। मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मुझे और मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

कृपया इस संदेश के लिंक को औरों को भी भेजें और साझा करें

***********************************************************************

English Translation

Appropriately Handling God’s Word – 18

 

    In learning from Paul about how to utilize and handle the Word of God, in the previous article we had started with a new passage from the Bible, 2 Corinthians 4:1-5. As a background to considering verse 1 of this passage, we had considered about Paul’s using “boldness of speech” from 2 Corinthians 3:12. We had seen that despite not being an eloquent speaker, Paul under the guidance and power of the Holy Spirit used plain, simple, straightforward language, unhesitatingly, and was very effective in his ministry. This places before us another manner of utilizing God’s Word effectively – use plain, simple, straightforward language, confidently, under the guidance and power of the Holy Spirit.


    In 2 Corinthians 4:1, Paul states some other things about his serving God. He says three things in this verse – first, what he was doing was his God given ministry; second, since Paul had received mercy and not retribution from the Lord for his deeds against Him, therefore he served with the realization of God’s mercy in choosing and calling him for His service; thirdly, Paul fulfilled his ministry without ‘losing heart’, i.e., getting discouraged.


    Regarding his first statement, we have seen in the earlier articles, how Paul was aware and sure of the ministry God had given to him, as God has given to all of His children, the Born-Again Christian Believers (Ephesians 2:10). Therefore, he ‘labored more abundantly’ to fulfil that which God had asked him to do (1 Corinthians 15:10), instead of devising his own plans and ideas, then working according to them, and imposing them upon God, expecting God to accept and reward them, unrealistically.


    Secondly, as was with Paul, and as he states it in 1 Corinthians 9:19-27; 15:9-10 about his working, similarly for us as well, in our service for the Lord, in fulfilling our God assigned ministry, we too should never lose sight of the fact that God in His mercy, has saved us, has drawn us out of eternal destruction in His love and grace towards us. Moreover, despite our being incapable of pleasing God through anything in us, since even our ‘works of righteousness’ are as filthy rags in the sight of God (Isaiah 64:6) and although our natural inclination is only to do evil not good (Psalm 53:2-3; Ecclesiastes 9:3), God has still decided to use us for His work. He has placed His precious treasure in us earthen vessels (2 Corinthians 4:7). Therefore, it is incumbent upon us to labor diligently to fulfil our ministry, like Paul did, instead of being casual and careless about it. God will not guide and empower those who do not value His gifts and are not willing to use them worthily. Hence, like Paul, we too should be willing to spend time with God and His Word, and put in sincere efforts to carry out our assignments.


    Thirdly, our ministry for God is, in one way or another, a battle against Satan and his powers (Ephesians 6:12), and we must pass through sufferings and problems (Philippians 1:29) in our service for the Lord; it will never be a cake-walk. In our struggle against the powers of evil, discouragement is often a potent weapon used by Satan against the Believers. The best way to overcome it is to leave the outcome of our sincere and diligent service in the hands of the Lord, instead of fretting about the results (1 Corinthians 3:6-8; 15:58). The underlying thought is, God has chosen us, God has appointed us, God has empowered us, God guides us, God will give the results and blessings; since everything is in God’s hands, nothing is in our hands, then, why worry about the results that anyways are not in our hands? Our work is to labor diligently and sincerely, so long as we do that worthily, there is no need to worry about anything else.


    If you have not yet accepted the discipleship of the Lord, make your decision in favor of the Lord Jesus now to ensure your eternal life and heavenly blessings. Where there is obedience to the Lord, where there is respect and obedience to His Word, there is also the blessing and protection of the Lord. Repenting of your sins, and asking the Lord Jesus for forgiveness of your sins, voluntarily and sincerely, surrendering yourself to Him - is the only way to salvation and heavenly life. You only have to say a short but sincere prayer to the Lord Jesus Christ willingly and with a penitent heart, and at the same time completely commit and submit your life to Him. You can also make this prayer and submission in words something like, “Lord Jesus, I am sorry for my sins and repent of them. I thank you for taking my sins upon yourself, paying for them through your life.  Because of them you died on the cross in my place, were buried, and you rose again from the grave on the third day for my salvation, and today you are the living Lord God and have freely provided to me the forgiveness, and redemption from my sins, through faith in you. Please forgive my sins, take me under your care, and make me your disciple. I submit my life into your hands." Your one prayer from a sincere and committed heart will make your present and future life, in this world and in the hereafter, heavenly and blessed for eternity.


Please Share the Link & Pass This Message to Others as Well

मंगलवार, 7 अप्रैल 2020

खराई



     दक्षिणपूर्वी एशियाई खेलों की मैराथन दौड़ में जब सिंगापुर के धावक एशले ल्यू ने अचानक ही अपने आप को अकेला और सबसे आगे दौड़ते हुए पाया, तो वह समझ गया कि कुछ गड़बड़ है। शीघ्र ही उसे एहसास हो गया कि उस से आगे भाग रहे अन्य धावकों ने कहीं पर कोई गलत मोड़ ले लिया था, और इसलिए अब वे उससे पीछे हो गए थे। एशले उनकी इस गलती का फायदा उठा कर आगे भागता रह सकता था, किन्तु खरी खेल भावना ने उसे ऐसा करने से रोका, क्योंकि इस प्रकार की जीत वास्तविक जीत नहीं होती। वह इसलिए जीतना चाहता था क्योंकि वह सबसे तेज़ था, न कि इसलिए क्योंकि औरों ने गलती करी थी। अपनी खराई की भावना का पालन करते हुए एशले ने अपने भागने की गति को तब तक धीमा कर दिया, जब तक कि अन्य धावक उस तक नहीं पहुँच गए।

     अंततः एशले वह दौड़ हार गया, और पदक से वंचित रह गया। परन्तु उसने अपने देशवासियों के हृदयों को, और अपनी खराई के लिए एक अंतर्राष्ट्रीय पुरुस्कार को भी जीत लिया। यह उसके मसीही होने की एक उत्तम गवाही थी, जिससे कई लोग यह सोचने के लिए बाध्य हुए होंगे की उसने ऐसा कैसे कर लिया।

     एशले द्वारा किया कार्य मेरे लिए चुनौती है कि अपने जीवन के सभी कार्यों के द्वारा मैं अपने मसीही विश्वास को औरों के साथ बाँटू। ध्यानपूर्वक, दया, क्षमा आदि के साथ किए गए छोटे-छोटे कार्य भी परमेश्वर को महिमा प्रदान कर सकते हैं। पौलुस प्रेरित ने परमेश्वर के वचन बाइबल में लिखा, “सब बातों में अपने आप को भले कामों का नमूना बना: तेरे उपदेश में सफाई, गम्भीरता और ऐसी खराई पाई जाए, कि कोई उसे बुरा न कह सके; जिस से विरोधी हम पर कोई दोष लगाने का अवसर न पाकर लज्ज़ित हों” (तीतुस 2:7-8)।

     हमारे द्वारा औरों के प्रति किए गए सकारात्मक कार्य संसार को यह दिखा सकते हैं कि हम संसार से भिन्न हैं क्योंकि परमेश्वर का पवित्र आत्मा हम में होकर कार्य करता है। वही हमें अनुग्रह और सामर्थ्य देता है कि हम अधार्मिकता और गलत व्यवहार को अस्वीकार कर के खराई से जीवन जीएं; ऐसे जीवन जो लोगों को परमेश्वर की ओर इशारा करें। - लेस्ली कोह

ऐसे जीएं कि लोग प्रभु यीशु को जानने के लिए जिज्ञासु हों।

और इस संसार के सदृश न बनो; परन्तु तुम्हारी बुद्धि के नये हो जाने से तुम्हारा चाल-चलन भी बदलता जाए, जिस से तुम परमेश्वर की भली, और भावती, और सिद्ध इच्छा अनुभव से मालूम करते रहो। - रोमियों 12:2

बाइबल पाठ: तीतुस 2:7-8, 11-14
तीतुस 2:7 सब बातों में अपने आप को भले कामों का नमूना बना: तेरे उपदेश में सफाई, गम्भीरता
तीतुस 2:8 और ऐसी खराई पाई जाए, कि कोई उसे बुरा न कह सके; जिस से विरोधी हम पर कोई दोष लगाने का अवसर न पाकर लज्ज़ित हों।
तीतुस 2:11 क्योंकि परमेश्वर का अनुग्रह प्रगट है, जो सब मनुष्यों के उद्धार का कारण है।
तीतुस 2:12 और हमें चिताता है, कि हम अभक्ति और सांसारिक अभिलाषाओं से मन फेर कर इस युग में संयम और धर्म और भक्ति से जीवन बिताएं।
तीतुस 2:13 और उस धन्य आशा की अर्थात अपने महान परमेश्वर और उद्धारकर्ता यीशु मसीह की महिमा के प्रगट होने की बाट जोहते रहें।
तीतुस 2:14 जिसने अपने आप को हमारे लिये दे दिया, कि हमें हर प्रकार के अधर्म से छुड़ा ले, और शुद्ध कर के अपने लिये एक ऐसी जाति बना ले जो भले भले कामों में सरगर्म हो।

एक साल में बाइबल: 
  • 1 शमुएल 7-9
  • लूका 9:18-36



रविवार, 11 दिसंबर 2016

राज्य


   मैं अपनी सहेली के साथ एक प्राकृतिक विहार घूमने के लिए गई। आयोजकों ने वहाँ पाए जाने वाले जीव-जन्तुओं को लोगों को देखने और उनके बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिए रखा हुआ था। मेरी सहेली के छोटे बच्चे ने वहाँ काँच के डब्बे में बन्द करके रखे गए मोटे से साँप को देखकर उस काँच के डिब्बे को हाथ से थपथपाया, और वह साँप जो मेरी बाँह के बराबर मोटा था, धीरे से सरकता हुआ दूसरी ओर खिसक गया। यद्यपि मैं भली-भांति जानती था कि वह साँप उस डिब्बे के बाहर नहीं आ सकता है, तो भी उस खतरनाक जन्तु को एक छोटे बच्चे के इतना समीप देखकर मैं सिहर उठी, मेरे रोंगटे खड़े हो गए।

   परमेश्वर का वचन बाइबल, एक ऐसे समय के बारे में बताती है जब खतरनाक और घातक जानवर भी एक दूसरे के लिए और हम मनुष्यों के लिए कोई खतरा नहीं रहेंगे: "तब भेडिय़ा भेड़ के बच्चे के संग रहा करेगा, और चीता बकरी के बच्चे के साथ बैठा रहेगा, और बछड़ा और जवान सिंह और पाला पोसा हुआ बैल तीनों इकट्ठे रहेंगे, और एक छोटा लड़का उनकी अगुवाई करेगा। गाय और रीछनी मिलकर चरेंगी, और उनके बच्चे इकट्ठे बैठेंगे; और सिंह बैल की नाईं भूसा खाया करेगा। दूधपिउवा बच्चा करैत के बिल पर खेलेगा, और दूध छुड़ाया हुआ लड़का नाग के बिल में हाथ डालेगा" (यशायाह 11:6-8)। संसार मे रहने वाले सभी प्राणी पूर्ण शांति और सामंजस्य का अनुभव करेंगे।

   प्रभु सब के साथ रहने के लिए सुरक्षित वातावरण स्थापित, कर के देगा जब वह अपनी बुद्धिमता, सामर्थ और ज्ञान से संसार को बहाल कर देगा। उस समय वह धार्मिकता तथा खराई से संसार का न्याय करेगा (यशायाह 11:4), और सभी उसकी महानता का अंगीकार करेंगे: "...पृथ्वी यहोवा के ज्ञान से ऐसी भर जाएगी जैसा जल समुद्र में भरा रहता है" (यशायाह 11:9)।

   हम पाप और बुराई के कारण टूटे और बिगड़े हुए संसार में रहते हैं। अन्याय, मनमुटाव, भय, पीड़ा आदि हमारे व्यावाहरिक दैनिक जीवन के वास्तविक अंग हैं। लेकिन एक दिन परमेश्वर सब कुछ बदल देगा, और "परन्तु तुम्हारे लिये जो मेरे नाम का भय मानते हो, धर्म का सूर्य उदय होगा, और उसकी किरणों के द्वारा तुम चंगे हो जाओगे; और तुम निकल कर पाले हुए बछड़ों की नाईं कूदोगे और फांदोगे" (मलाकी 4:2)। वह प्रभु यीशु के धार्मिकता के अनन्त राज्य का समय होगा। - जेनिफर बेन्सन शुल्ट


अन्तिम न्याय को उस न्यायी परमेश्वर के हाथों में छोड़ दें।

फिर मैं ने सिंहासन में से किसी को ऊंचे शब्द से यह कहते सुना, कि देख, परमेश्वर का डेरा मनुष्यों के बीच में है; वह उन के साथ डेरा करेगा, और वे उसके लोग होंगे, और परमेश्वर आप उन के साथ रहेगा; और उन का परमेश्वर होगा। और वह उन की आंखों से सब आंसू पोंछ डालेगा; और इस के बाद मृत्यु न रहेगी, और न शोक, न विलाप, न पीड़ा रहेगी; पहिली बातें जाती रहीं। - प्रकाशितवाक्य 21:3-4

बाइबल पाठ: यशायाह 11:1-9
Isaiah 11:1 तब यिशै के ठूंठ में से एक डाली फूट निकलेगी और उसकी जड़ में से एक शाखा निकल कर फलवन्त होगी। 
Isaiah 11:2 और यहोवा की आत्मा, बुद्धि और समझ की आत्मा, युक्ति और पराक्रम की आत्मा, और ज्ञान और यहोवा के भय की आत्मा उस पर ठहरी रहेगी। 
Isaiah 11:3 ओर उसको यहोवा का भय सुगन्ध सा भाएगा।। वह मुंह देखा न्याय न करेगा और न अपने कानों के सुनने के अनुसार निर्णय करेगा; 
Isaiah 11:4 परन्तु वह कंगालों का न्याय धर्म से, और पृथ्वी के नम्र लोगों का निर्णय खराई से करेगा; और वह पृथ्वी को अपने वचन के सोंटे से मारेगा, और अपने फूंक के झोंके से दुष्ट को मिटा डालेगा। 
Isaiah 11:5 उसकी कटि का फेंटा धर्म और उसकी कमर का फेंटा सच्चाई होगी।
Isaiah 11:6 तब भेडिय़ा भेड़ के बच्चे के संग रहा करेगा, और चीता बकरी के बच्चे के साथ बैठा रहेगा, और बछड़ा और जवान सिंह और पाला पोसा हुआ बैल तीनों इकट्ठे रहेंगे, और एक छोटा लड़का उनकी अगुवाई करेगा। 
Isaiah 11:7 गाय और रीछनी मिलकर चरेंगी, और उनके बच्चे इकट्ठे बैठेंगे; और सिंह बैल की नाईं भूसा खाया करेगा। 
Isaiah 11:8 दूधपिउवा बच्चा करैत के बिल पर खेलेगा, और दूध छुड़ाया हुआ लड़का नाग के बिल में हाथ डालेगा। 
Isaiah 11:9 मेरे सारे पवित्र पर्वत पर न तो कोई दु:ख देगा और न हानि करेगा; क्योंकि पृथ्वी यहोवा के ज्ञान से ऐसी भर जाएगी जैसा जल समुद्र में भरा रहता है।

एक साल में बाइबल: 
  • होशे 5-8
  • प्रकाशितवाक्य 2


बुधवार, 2 दिसंबर 2015

खराई और ईमानदारी


   हम उसे ’खराई का संघ’ कहकर संबोधित करते हैं, किंतु वह दोपहर के भोजनकाल समय में हम बास्केटबॉल खेलने वाले कुछ लोगों का समूह ही है। खेलते समय हम से हुए नियमोलंघन हम स्वयं ही स्वीकार कर लेते हैं, पूरा प्रयास करते हैं कि खेल के आवेश में क्रोधित होकर अपशब्द ना बोलें और सब कुछ को सरल और आनन्दायक बनाए रखें। हम परस्पर प्रतियोगिता में तो रहते हैं और हम में से कोई भी हारना नहीं चाहता लेकिन हम सभी इस बात पर सहमत और समर्पित हैं कि खराई और ईमानदारी ही सर्वोपरि बनी रहनी चाहिए।

   परमेश्वर का वचन बाइबल हमें खराई और ईमानदारी के महत्व के बारे में स्पष्ट बताती है, और जब हम खराई और ईमानदारी का अपने जीवनों में पालन करते हैं, हम अपने सृष्टिकर्ता तथा उद्धारकर्ता परमेश्वर का आदर करते हैं। अपने वचन बाइबल के द्वारा परमेश्वर ने हमें खराई और ईमानदारी में चलते रहने के लिए स्पष्ट कारण दिए हैं (भजन 26:11)। जिस व्यक्ति के जीवन में खराई और ईमानदारी है उसके जीवन में शान्ति तथा सुरक्षा है (नीतिवचन 10:9)। परमेश्वर के अनुयायी जो खराई और ईमानदारी में विश्वास रखते हैं, परमेश्वर में अपने भरोसे के द्वारा सुरक्षित भी रहते हैं, क्योंकि वे अपने जीवन की हर परिस्थिति में परमेश्वर के नियंत्रण और मार्गदर्शन का सहारा लेते हैं (भजन 25:21)। साथ ही जो खराई और ईमानदारी का पालन करते हैं उन्हें सही मार्गदर्शन और दिशानिर्देश भी प्रदान किए जाते हैं: "सीधे लोग अपनी खराई से अगुवाई पाते हैं, परन्तु विश्वासघाती अपने कपट से विनाश होते हैं" (नीतिवचन 11:3)।

   हमारे लिए अपने जीवनों को ’खराई का संघ’ बनाना और मानना क्यों आवश्यक है? आवश्यक इसलिए है क्योंकि इस प्रकार परमेश्वर की आज्ञाकारिता के द्वारा हम दिखाते हैं कि हम अपने जीवनों में परमेश्वर और उसकी आज्ञाओं, उसके वचन बाइबल का आदर करते हैं, उस पर भरोसा रखते हैं और उसके प्रेम की ज्योति को दूसरों के जीवनों में चमकाना चाहते हैं। - डेव ब्रैनन


खराई और ईमानदारी मसीही चरित्र का व्यावाहरिक जीवन में प्रदर्शन है।

जो खराई से चलता है वह निडर चलता है, परन्तु जो टेढ़ी चाल चलता है उसकी चाल प्रगट हो जाती है। - नीतिवचन 10:9

बाइबल पाठ: भजन 26
Psalms 26:1 हे यहोवा, मेरा न्याय कर, क्योंकि मैं खराई से चलता रहा हूं, और मेरा भरोसा यहोवा पर अटल बना है। 
Psalms 26:2 हे यहोवा, मुझ को जांच और परख; मेरे मन और हृदय को परख। 
Psalms 26:3 क्योंकि तेरी करूणा तो मेरी आंखों के साम्हने है, और मैं तेरे सत्य मार्ग पर चलता रहा हूं।
Psalms 26:4 मैं निकम्मी चाल चलने वालों के संग नहीं बैठा, और न मैं कपटियों के साथ कहीं जाऊंगा; 
Psalms 26:5 मैं कुकर्मियों की संगति से घृणा रखता हूं, और दुष्टों के संग न बैठूंगा।
Psalms 26:6 मैं अपने हाथों को निर्दोषता के जल से धोऊंगा, तब हे यहोवा मैं तेरी वेदी की प्रदक्षिणा करूंगा, 
Psalms 26:7 ताकि तेरा धन्यवाद ऊंचे शब्द से करूं, 
Psalms 26:8 और तेरे सब आश्चर्यकर्मों का वर्णन करूं। हे यहोवा, मैं तेरे धाम से तेरी महिमा के निवास स्थान से प्रीति रखता हूं। 
Psalms 26:9 मेरे प्राण को पापियों के साथ, और मेरे जीवन को हत्यारों के साथ न मिला। 
Psalms 26:10 वे तो ओछापन करने में लगे रहते हैं, और उनका दाहिना हाथ घूस से भरा रहता है।
Psalms 26:11 परन्तु मैं तो खराई से चलता रहूंगा। तू मुझे छुड़ा ले, और मुझ पर अनुग्रह कर। 
Psalms 26:12 मेरे पांव चौरस स्थान में स्थिर है; सभाओं में मैं यहोवा को धन्य कहा करूंगा।

एक साल में बाइबल: 
  • यहेजकेल 42-44
  • 1यूहन्ना 1


सोमवार, 8 सितंबर 2014

हृदय की प्रार्थना


   उस दिन मैलकॉम द्वार करी गई वह प्रार्थना मुझे बहुत अच्छी लगी। अन्य 100 बच्चों के सामने खड़े होकर 7 वर्षीय मैलकॉम ने प्रार्थना करी, "प्रभु यीशु, आपका बहुत धन्यवाद कि हमें फुटबॉल खेलने और चर्च जाने का अवसर मिलता है; और इसके लिए भी धन्यवाद कि आप हमें यहाँ सुरक्षित लाए और आपने हमारे पाप क्षमा किए तथा हमें अनन्त जीवन दिया है। हे प्रभु, हम आपसे बहुत प्रेम करते हैं; कृप्या आप कभी यह नहीं भूलना कि हम आपसे कितना प्रेम करते हैं"।

   उस बच्चे का बड़ी मासूमियत और खराई से अपने हृदय को परमेश्वर के सामने खोलना सुनकर मेरी आँखें नम हो गईं। व्यसक होने के कारण हम अपनी प्रार्थनाओं को परमेश्वर के सामने कुछ विशेष शब्दों के प्रयोग द्वारा ’चमकाने’ का प्रयास करते हैं; यह सोच कर कि इस प्रकार वे परमेश्वर को अधिक अच्छी लगेंगी, या फिर इसलिए कि वे हमारे आस-पास के लोगों को सुनने में अच्छी लगें। लेकिन सच तो यह है कि परमेश्वर शब्दों की नहीं हृदय से निकलने वाले खरी बातों तथा भावनाओं की, जैसे मैलकॉम की वह प्रार्थना, कद्र करता है।

   परमेश्वर के वचन बाइबल के एक पात्र नहेम्याह ने जब सुना कि उसकी जन्मभूमि यरुशालेम की शहरपनाह टूटी पड़ी है और वहाँ लोग बड़ी दुर्दशा में हैं, तो उसका हृदय उनके लिए चिंतित हुआ (नहेम्याह 1:3)। उस स्थान और वहाँ के लोगों के लिए कुछ करने के लिए उसने परमेश्वर से प्रार्थना करी। उसने परमेश्वर की आराधना करी (पद 5), उससे पापों के लिए क्षमा माँगी (पद 6), उसकी वाचाओं को स्मरण कराया (पद 9) तथा राजा से भी दया याचना करी (पद 11)। परमेश्वर ने नहेम्याह की प्रार्थना सुनी, उसका उत्तर दिया, उसे आवश्यक संसाधन उपल्बध करवाए और परमेश्वर की सुरक्षा एवं सहायता से नहेम्याह यरुशालेम का पुनर्निमाण करने पाया।

   आज आपके मन में क्या है? परमेश्वर के प्रति धन्यवाद या जीवन के बोझ? जो भी है, अपने हृदय को परमेश्वर के आगे खोल दीजिए। वह आपके हृदय की प्रार्थना को सुनना चाहता है। - ऐनी सेटास


सर्वोच्च कोटि की प्रार्थना एक नम्र हृदय की गहरईयों से निकल कर आती है।

तब मैं अपना मुख परमेश्वर की ओर कर के गिड़गिड़ाहट के साथ प्रार्थना करने लगा, और उपवास कर, टाट पहिन, राख में बैठ कर वरदान मांगने लगा। - दानिय्येल 9:3 

बाइबल पाठ: नहेम्याह 1:1-11
Nehemiah 1:1 हकल्याह के पुत्र नहेम्याह के वचन। बीसवें वर्ष के किसलवे नाम महीने में, जब मैं शूशन नाम राजगढ़ में रहता था, 
Nehemiah 1:2 तब हनानी नाम मेरा एक भाई और यहूदा से आए हुए कई एक पुरुष आए; तब मैं ने उन से उन बचे हुए यहूदियों के विषय जो बन्धुआई से छूट गए थे, और यरूशलेम के विष्य में पूछा। 
Nehemiah 1:3 उन्होंने मुझ से कहा, जो बचे हुए लोग बन्धुआई से छूटकर उस प्रान्त में रहते हैं, वे बड़ी दुर्दशा में पड़े हैं, और उनकी निन्दा होती है; क्योंकि यरूशलेम की शहरपनाह टूटी हुई, और उसके फाटक जले हुए हैं। 
Nehemiah 1:4 ये बातें सुनते ही मैं बैठकर रोने लगा और कितने दिन तक विलाप करता; और स्वर्ग के परमेश्वर के सम्मुख उपवास करता और यह कह कर प्रार्थना करता रहा। 
Nehemiah 1:5 हे स्वर्ग के परमेश्वर यहोवा, हे महान और भययोग्य ईश्वर! तू जो अपने प्रेम रखने वाले और आज्ञा मानने वाले के विष्य अपनी वाचा पालता और उन पर करुणा करता है; 
Nehemiah 1:6 तू कान लगाए और आंखें खोले रह, कि जो प्रार्थना मैं तेरा दास इस समय तेरे दास इस्राएलियों के लिये दिन रात करता रहता हूँ, उसे तू सुन ले। मैं इस्राएलियों के पापों को जो हम लोगों ने तेरे विरुद्ध किए हैं, मान लेता हूँ। मैं और मेरे पिता के घराने दोनों ने पाप किया है। 
Nehemiah 1:7 हम ने तेरे साम्हने बहुत बुराई की है, और जो आज्ञाएं, विधियां और नियम तू ने अपने दास मूसा को दिए थे, उन को हम ने नहीं माना। 
Nehemiah 1:8 उस वचन की सुधि ले, जो तू ने अपने दास मूसा से कहा था, कि यदि तुम लोग विश्वासघात करो, तो मैं तुम को देश देश के लोगों में तितर बितर करूंगा। 
Nehemiah 1:9 परन्तु यदि तुम मेरी ओर फिरो, और मेरी आज्ञाएं मानो, और उन पर चलो, तो चाहे तुम में से निकाले हुए लोग आकाश की छोर में भी हों, तौभी मैं उन को वहां से इकट्ठा कर के उस स्थान में पहुंचाऊंगा, जिसे मैं ने अपने नाम के निवास के लिये चुन लिया है। 
Nehemiah 1:10 अब वे तेरे दास और तेरी प्रजा के लोग हैं जिन को तू ने अपनी बड़ी सामर्थ और बलवन्त हाथ के द्वारा छुड़ा लिया है। 
Nehemiah 1:11 हे प्रभु बिनती यह है, कि तू अपने दास की प्रार्थना पर, और अपने उन दासों की प्रार्थना पर, जो तेरे नाम का भय मानना चाहते हैं, कान लगा, और आज अपने दास का काम सफल कर, और उस पुरुष को उस पर दयालु कर। (मैं तो राजा का पियाऊ था।)

एक साल में बाइबल: 
  • यहेजकेल 15-18


रविवार, 3 अगस्त 2014

कार्यकारी विश्वास


   रॉजर गठिया रोग से पीड़ित था, जो सर्दियों में और अधिक कष्टदायी हो जाता था, इसलिए वह गर्म इलाके में रहने के लिए थाईलैंड के शहर बैंगकॉक आ गया। एक दिन उसे अपनी दादी का एक प्रीय गीत, "आप क्या हैं?" स्मरण हो आया, जिसके शब्द थे: "आप जो हैं वह आपके व्यवहार से इतने ऊँचे शब्दों में बयान होता है कि इस संबंध में आपके मूँह से कही बात किसी को सुनाई नहीं दे पाती; सब आपके चाल-चलन को देखते हैं आपकी आवाज़ सुनने में रुचि नहीं रखते; वे प्रतिदिन आपको आपके व्यवहार से आँकते हैं।"

   इस गीत को स्मरण कर रॉजर अपने घर के पास आधा मील तक सड़क के दोनों ओर रहने वाले बेघर लोगों को भोजन उपलब्ध करवाने के लिए प्रेरित हुआ और प्रति प्रातः वह 45 परिवारों को गर्म भोजन परोसने लगा। कई वर्षों के पश्चात, उन बेघर लोगों में से एक महिला ने प्रभु यीशु को जाना और अपने उद्धारकर्ता के रूप में ग्रहण किया, और वह रॉजर के पास आई कि उसे प्रभु यीशु के प्रेम से अवगत करवाने के लिए धन्यवाद करे।

   परमेश्वर के वचन बाइबल में याकूब की पत्री में स्पष्ट लिखा है कि कर्म बिना विश्वास मरा हुआ है (याकूब 2:17)। इस कथन का यह तात्पपर्य नहीं है कि कर्मों से विश्वास आ जाएगा, वरन यह कि बिना किसी प्रतिफल की चिन्ता किए, प्रभु यीशु के प्रेम में होकर निस्वार्थ रीति से करे गए भले कार्य, प्रभु यीशु में आपके विश्वास की वास्तविकता को प्रमाणित करेंगे। यह कहना बहुत सरल है कि "मैं प्रभु यीशु में विश्वास रखता हूँ" लेकिन केवल हमारे कार्य और व्यवहार ही हमारे इस कथन की खराई को प्रमाणित कर सकते हैं। बाइबल का एक नायक, इब्राहीम, इसका उत्तम उदाहरण है। इब्राहीम ने केवल अपने विश्वास के बारे में बात ही नहीं करी, वरन वह परमेश्वर की आज्ञाकारिता में होकर अपने एकलौते पुत्र इसहाक को भी बलिदान करने के लिए तैयार हो गया (याकूब 2:21-24; उत्पत्ति 22:1-18); और परमेश्वर ने इसहाक को बलि होने से बचा भी लिया।

   आज हम अपने मसीही विश्वास को, परमेश्वर के प्रति अपने प्रेम एवं उसमें अपने भरोसे को कार्यकारी रीति से कैसे संसार के समक्ष रख सकते हैं? संसार के लोगों के सामने केवल मूँह से कही बातें नहीं, वरन उन बातों को अपने निज जीवन में कार्यकारी रीति से दिखाना ही प्रभु यीशु में हमारे विश्वास की सच्चाई को प्रमाणित करेगा। - एलबर्ट ली


ना तो विश्वास एवं कार्य अर्थ रखते हैं, ना ही विश्वास अथवा कार्य का महत्व है; जो चाहिए वह है ऐसा मसीही विश्वास जो जीवनों में कार्यकारी हो।

इसलिये जो कोई मेरी ये बातें सुनकर उन्हें मानता है वह उस बुद्धिमान मनुष्य की नाईं ठहरेगा जिसने अपना घर चट्टान पर बनाया। - मत्ती 7:24

बाइबल पाठ: याकूब 2:14-26
James 2:14 हे मेरे भाइयों, यदि कोई कहे कि मुझे विश्वास है पर वह कर्म न करता हो, तो उस से क्या लाभ? क्या ऐसा विश्वास कभी उसका उद्धार कर सकता है? 
James 2:15 यदि कोई भाई या बहिन नगें उघाड़े हों, और उन्हें प्रति दिन भोजन की घटी हो। 
James 2:16 और तुम में से कोई उन से कहे, कुशल से जाओ, तुम गरम रहो और तृप्‍त रहो; पर जो वस्तुएं देह के लिये आवश्यक हैं वह उन्हें न दे, तो क्या लाभ? 
James 2:17 वैसे ही विश्वास भी, यदि कर्म सहित न हो तो अपने स्‍वभाव में मरा हुआ है।
James 2:18 वरन कोई कह सकता है कि तुझे विश्वास है, और मैं कर्म करता हूं: तू अपना विश्वास मुझे कर्म बिना तो दिखा; और मैं अपना विश्वास अपने कर्मों के द्वारा तुझे दिखाऊंगा। 
James 2:19 तुझे विश्वास है कि एक ही परमेश्वर है: तू अच्छा करता है: दुष्टात्मा भी विश्वास रखते, और थरथराते हैं। 
James 2:20 पर हे निकम्मे मनुष्य क्या तू यह भी नहीं जानता, कि कर्म बिना विश्वास व्यर्थ है? 
James 2:21 जब हमारे पिता इब्राहीम ने अपने पुत्र इसहाक को वेदी पर चढ़ाया, तो क्या वह कर्मों से धामिर्क न ठहरा था? 
James 2:22 सो तू ने देख लिया कि विश्वास ने उस के कामों के साथ मिल कर प्रभाव डाला है और कर्मों से विश्वास सिद्ध हुआ। 
James 2:23 और पवित्र शास्त्र का यह वचन पूरा हुआ, कि इब्राहीम ने परमेश्वर की प्रतीति की, और यह उसके लिये धर्म गिना गया, और वह परमेश्वर का मित्र कहलाया। 
James 2:24 सो तुम ने देख लिया कि मनुष्य केवल विश्वास से ही नहीं, वरन कर्मों से भी धर्मी ठहरता है। 
James 2:25 वैसे ही राहाब वेश्या भी जब उसने दूतों को अपने घर में उतारा, और दूसरे मार्ग से विदा किया, तो क्या कर्मों से धामिर्क न ठहरी? 
James 2:26 निदान, जैसे देह आत्मा बिना मरी हुई है वैसा ही विश्वास भी कर्म बिना मरा हुआ है।

एक साल में बाइबल: 
  • यशायाह 22-24


मंगलवार, 26 मार्च 2013

सही पहचान


   प्रसिद्ध समुद्री यात्री क्रिस्टोफर कोलम्बस की यात्राओं के बारे में सभी ने पढ़ा होगा। उनकी एक यात्रा से संबंधित कहानी है कि जब उनके पोत जैमिका के तट के पास लंगर डाल कर खड़े हुए थे तो उनकी भोजन सामग्री लगभग समाप्त हो चली। ऐसे में वहाँ के मूल निवासीयों ने उन्हें भोजन उपलब्ध कराया, लेकिन धीरे धीरे यह भी घटने लगा और भोजन के आभाव में नाविकों को परेशानी होने लगी। खगोल विद्या की पुस्तकों के द्वारा कोलम्बस जानता था कि शीघ्र ही चन्द्रग्रहण आने वाला है। उसने द्वीप निवासीयों के अगुवों को बुलाया और उन से कहा कि परमेश्वर उनके इस स्वार्थी बर्ताव से खिन्न है और चेतावनी के रूप में शीघ्र ही चन्द्रमा को अंधेरा कर देगा। पहले तो द्वीप के निवासी कोलम्बस का उपहास करने लगे, परन्तु जब चन्द्र-ग्रहण लगा तो वे डर गए और उन्हें तुरंत भोजन वस्तुएं दे दीं। तब कोलम्बस ने उन से कहा कि वह परमेश्वर से प्रार्थना करेगा और परमेश्वर चन्द्रमा को फिर से रौशन कर देगा। चाहे कोलम्बस की परिस्थिति को देखते हुए उसकी इस कुटिलता के लिए हम उसके साथ सहानुभूति रख सकते हैं, परन्तु सत्य तो यही है कि उसने परमेश्वर के नाम को अपनी स्वार्थ सिद्धी के लिए प्रयोग किया, भोले और अनजान लोगों को परमेश्वर के नाम से धोखा दिया, जो सर्वथा अनुचित था।

   परमेश्वर के वचन बाइबल में इस प्रकार के व्यवहार का कोई समर्थन नहीं है। प्रेरित पौलुस ने कुरिन्थुस की मण्डली को लिखी अपनी दूसरी पत्री में परमेश्वर के नाम द्वारा छलने वाले धूर्त लोगों के संबंध में लिखा: "क्योंकि हम उन बहुतों के समान नहीं, जो परमेश्वर के वचन में मिलावट करते हैं; परन्तु मन की सच्चाई से, और परमेश्वर की ओर से परमेश्वर को उपस्थित जानकर मसीह में बोलते हैं" (2 कुरिन्थियों 2:17)। अपनी अन्य पत्रियों में भी पौलुस ने इस बात के बारे में चिताया है।

   हम मसीही विश्वासियों को बहुत चौंकन्ना रहना है कि हम अपनी मनसा को ऊपर रखने के लिए परमेश्वर के वचन का दुरूपयोग नहीं करें, और ना ही इस पवित्र वचन की व्याख्या स्वार्थ-सिद्धी के लिए करें वरन परमेश्वर को समर्पित मन और जीवन के अनुरूप परमेश्वर के वचन के सत्य लोगों के साथ ईमानदारी और खराई के साथ बाँटें। अपने वचन और व्यवहार, दोनो के द्वारा संसार को जगत के उद्धारकर्ता मसीह यीशु की सही पहचान देना हमारा कर्तव्य है। - डेनिस फिशर


परमेश्वर के वचन को लोगों के साथ बाँटने का उद्देश्य अपनी समृद्धि नहीं लोगों की उन्नति है।

और मैं तुम से कहता हूं, कि जो जो निकम्मी बातें मनुष्य कहेंगे, न्याय के दिन हर एक बात का लेखा देंगे। - मत्ती 12:36

बाइबल पाठ: रोमियों 16:17-18; फिलिप्पियों 3:17-19
Romans 16:17 अब हे भाइयो, मैं तुम से बिनती करता हूं, कि जो लोग उस शिक्षा के विपरीत जो तुम ने पाई है, फूट पड़ने, और ठोकर खाने के कारण होते हैं, उन्हें ताड़ लिया करो; और उन से दूर रहो।
Romans 16:18 क्योंकि ऐसे लोग हमारे प्रभु मसीह की नहीं, परन्तु अपने पेट की सेवा करते है; और चिकनी चुपड़ी बातों से सीधे सादे मन के लोगों को बहका देते हैं।

Philippians 3:17 हे भाइयो, तुम सब मिलकर मेरी सी चाल चलो, और उन्हें पहिचान रखो, जो इस रीति पर चलते हैं जिस का उदाहरण तुम हम में पाते हो।
Philippians 3:18 क्योंकि बहुतेरे ऐसी चाल चलते हैं, जिन की चर्चा मैं ने तुम से बार बार किया है और अब भी रो रोकर कहता हूं, कि वे अपनी चालचलन से मसीह के क्रूस के बैरी हैं।
Philippians 3:19 उन का अन्‍त विनाश है, उन का ईश्वर पेट है, वे अपनी लज्ज़ा की बातों पर घमण्‍ड करते हैं, और पृथ्वी की वस्‍तुओं पर मन लगाए रहते हैं।

एक साल में बाइबल: 
  • यहोशू 22-24 
  • लूका 3


सोमवार, 3 सितंबर 2012

बचने के तरीके


   पांच वर्षीय जेना के दिन का आरंभ अच्छा नहीं हुआ था। अपनी इच्छा के अनुसार हर कार्य को करने के उसके प्रयास सफल नहीं हो रहे थे। तर्क करना किसी काम नहीं आया, मुँह फुलाना और बिगड़ी हुई सूरत बनाकर बैठ जाना व्यर्थ रहा, रोने और हठ करने से कुछ हासिल नहीं हुआ। उसकी इन हरकतों से परेशान होकर उसकी माँ ने उसे वह बाइबल पद स्मरण दिलाया जिसे जेना याद करने में लगी हुई थी: "मैं ने तेरे वचन को अपने हृदय में रख छोड़ा है, कि तेरे विरूद्ध पाप न करूं" (भजन ११९:११)।

   संभवतः जेना इस पद पर कुछ विचार कर चुकी थी; उसने तुरंत उत्तर दिया, "माँ ठीक है, किंतु इस पद में पाप न करने की संभावना के बारे में कहा गया है, निश्चितता के बारे में नहीं।" जेना का तर्क एक जाना पहचाना तर्क है। किसी नियम का उल्लंघन करना, किसी आज्ञा को तोड़ना, और ऐसा करने के लिए तोड़-मरोड़ कर शब्दों के प्रयोग या उनके अर्थों को निकालने कुछ लोगों को बड़ा अच्छा लगता है; वे ऐसे अवसरों की तलाश में रहते हैं।

   यह वर्तमान समय ही की बात नहीं है और ना ही केवल संसार के सामान्य लोगों की बात है। प्रभु यीशु ने अपने समय के धार्मिक अगुवों में भी इसी प्रवृत्ति को पाया जो परमेश्वर के नियमों का उल्लंघन अपनी स्वार्थसिधी के लिए करते थे और संसार के समक्ष नियमों की अवहेलना के दोष से बचने के तरीके रखते थे (मरकुस ७:१-१३)। परमेश्वर के नियम और आज्ञाएं उन्हें अपने माता-पिता की आवश्यकताओं की पूर्ति करने और अपनी संपत्ति द्वारा उनका ध्यान रखने को कहते थे। इस कारण वे अगुवे इस ज़िम्मेदारी से बचने के लिए अपनी संपत्ति परमेश्वर को उसके मन्दिर में ’कुर्बान’ कर देते थे। अब परमेश्वर को ’कुर्बान’ इस संपत्ति का उपयोग भला मन्दिर के बाहर कैसे हो सकता था? किंतु क्योंकि उन धार्मिक अगुवों का पालन-पोषण मन्दिर से होता था, इसलिए उनके अपने लिए वह संपत्ति उपलब्ध रहती थी! ऐसे तर्क देकर वे समाज को धोखा दे सकते थे, समाज की नज़रों में दोषी होने से बच सकते थे; लेकिन वे परमेश्वर को धोखा नहीं दे सकते थे, वे उसके समक्ष अनाज्ञाकारी होने के न्याय से नहीं बच सकते थे। प्रभु यीशु ने उन अगुवों को इसी बात के लिए कठोर शब्दों में चिताया।

   अपने जीवन में सावधान रहिए; जब भी आप किसी आज्ञा से बचने के तरीके ढ़ूंढते हैं, वास्तव में आप अनाज्ञाकारिता के तरीके खोजते हैं। - जूली ऐकैरमैन लिंक


चाहे हम किसी आज्ञा के ना मानने को वैध ठहराने के लिए कोई भी बहाना क्यों ना बना लें, परमेश्वर उसे अनाज्ञाकारिता ही मानता है।

मैं ने तेरे वचन को अपने हृदय में रख छोड़ा है, कि तेरे विरूद्ध पाप न करूं। - भजन ११९:११

बाइबल पाठ: मरकुस ७:१-१३
Mar 7:1   तब फरीसी और कई एक शास्त्री जो यरूशलेम से आए थे, उसके पास इकट्ठे हुए। 
Mar 7:2  और उन्‍होंने उसके कई चेलों को अशुद्ध अर्थात बिना हाथ धोए रोटी खाते देखा। 
Mar 7:3  क्‍योंकि फरीसी और सब यहूदी, पुरिनयों की रीति पर चलते हैं और जब तक भली भांति हाथ नहीं धो लेते तब तक नहीं खाते। 
Mar 7:4  और बाजार से आकर, जब तक स्‍नान नहीं कर लेते, तब तक नहीं खाते; और बहुत सी और बातें हैं, जो उन के पास मानने के लिये पहुंचाई गई हैं, जैसे कटोरों, और लोटों, और तांबे के बरतनों को धोना-मांझना। 
Mar 7:5  इसलिये उन फरीसियों और शास्‍त्रियों ने उस से पूछा, कि तेरे चेले क्‍यों पुरिनयों की रीतों पर नहीं चलते, और बिना हाथ धोए रोटी खाते हैं? 
Mar 7:6   उस ने उन से कहा; कि यशायाह ने तुम कपटियों के विषय में बहुत ठीक भविष्यद्ववाणी की; जैसा लिखा है, कि ये लोग होठों से तो मेरा आदर करते हैं, पर उन का मन मुझ से दूर रहता है। 
Mar 7:7  और ये व्यर्थ मेरी उपासना करते हैं, क्‍योंकि मनुष्यों की आज्ञाओं को धर्मोपदेश करके सिखाते हैं। 
Mar 7:8  क्‍योंकि तुम परमेश्वर की आज्ञा को टालकर मनुष्यों की रीतियों को मानते हो। 
Mar 7:9  और उस ने उन से कहा; तुम अपनी रीतियों को मानने के लिये परमेश्वर आज्ञा कैसी अच्‍छी तरह टाल देते हो! 
Mar 7:10 क्‍योंकि मूसा ने कहा है कि अपने पिता और अपनी माता का आदर कर; ओर जो कोई पिता वा माता को बुरा कहे, वह अवश्य मार डाला जाए। 
Mar 7:11 परन्‍तु तुम कहते हो कि यदि कोई अपने पिता वा माता से कहे, कि जो कुछ तुझे मुझ से लाभ पहुंच सकता था, वह कुरबान अर्थात संकल्प हो चुका। 
Mar 7:12  तो तुम उस को उसके पिता वा उस की माता की कुछ सेवा करने नहीं देते। 
Mar 7:13 इस प्रकार तुम अपनी रीतियों से, जिन्‍हें तुम ने ठहराया है, परमेश्वर का वचन टाल देते हो; और ऐसे ऐसे बहुत से काम करते हो।

एक साल में बाइबल: 
  • भजन १४०-१४२ 
  • १ कुरिन्थियों १४:१-२०

शुक्रवार, 11 मई 2012

ईमानदारी

   हास्य चित्रकार स्कौट एडम्स अपने हास्य चित्र श्रंखला ’डिलबर्ट’ के लिए प्रसिद्ध हैं जिसमें मनोरम्जक रीति से कार्य क्षेत्र में सामान्यतः देखने को मिलने वाली व्यर्थ बातों को उजागर किया जाता है। उन्होंने १९९० में इस हास्य चित्र श्रंखला से संबंधित एक पुस्तक भी लिखी "The Dilbert Principle" जिसमें उन्होंने प्रौद्योकी, नेतृत्व तथा प्रबंधन संबंधी अधिकारियों की सनक और अयोग्य प्रबंधकों पर परिहास किया है। बहुत से लोगों को उस पुस्तक में गिए गए उदहरणों और चित्रणों को अपने प्रतिदिन के जीवन और अनुभवों के साथ ताल-मेल देखने के द्वारा अच्छा मनोरंजन मिला है।

   अपनी उस पुस्तक में स्कौट एडम्स कर्मचारियों द्वारा आलसीपन और दिखावे के कार्यों के विषय में लिखते हैं: "कामचोर होने की कला मैंने इस कला के विशेषज्ञों से सीखी है। नौ वर्ष के अनुभव के बाद, किसी कार्य में लगे बिना ही व्यस्त दिखाई देने के बारे में जो कुछ सीखने का हो सकता है वह मैं ने सीख लिया है।"

   किंतु अपने कार्य और स्वामियों के प्रति व्यवहार के संबंध में मसीही विश्वासियों के पास एक बहुत श्रेष्ठ उद्देश्य और बुलाहट है। परमेश्वर का वचन बाइबल विश्वासियों को प्रोत्साहित करती है कि अपने अधिकारियों के प्रति आदर का रवैया बनाए रखें, और अपने कार्य में ईमानदार रहें, किसी मनुष्य को प्रसन्न करने के लिए नहीं वरन अपने प्रभु यीशु और परमेश्वर को प्रसन्न करने के उद्देश्य से: "हे दासो, जो लोग शरीर के अनुसार तुम्हारे स्‍वामी हैं, अपने मन की सीधाई से डरते, और कांपते हुए, जैसे मसीह की, वैसे ही उन की भी आज्ञा मानो। और मनुष्यों को प्रसन्न करने वालों की नाईं दिखाने के लिये सेवा न करो, पर मसीह के दासों की नाईं मन से परमेश्वर की इच्‍छा पर चलो" (इफिसीयों ६:५-६)।

   कार्य के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी के लिए सही रवैया ईमानदार मन से आता है, जहां हम किसी मनुष्य को नहीं वरन अपने प्रभु यीशु को अपना स्वामी मान कर उसके लिए प्रत्येक कार्य करते हैं। जब हम पूरी ईमानदारी के साथ अपने कार्यक्षेत्र की ज़िम्मेदारियों को निभाते हैं और अपने सांसारिक स्वामी के प्रति ईमानदार और खरे रहते हैं, तो इससे हम अपने प्रभु को भी प्रसन्न करते हैं। - डेनिस फिशर


आपका स्वामी चाहे कोई भी हो, अन्ततः आप परमेश्वर को ही जवाबदेह हैं।


और मनुष्यों को प्रसन्न करने वालों की नाई दिखाने के लिये सेवा न करो, पर मसीह के दासों की नाईं मन से परमेश्वर की इच्‍छा पर चलो। - इफिसीयों ६:६


बाइबल पाठ: इफिसीयों ६:१-६
Eph 6:1 हे बालकों, प्रभु में अपने माता पिता के आज्ञाकारी बनो, क्‍योंकि यह उचित है।
Eph 6:2  अपनी माता और पिता का आदर कर (यह पहिली आज्ञा है, जिस के साथ प्रतिज्ञा भी है)।
Eph 6:3  कि तेरा भला हो, और तू धरती पर बहुत दिन जीवित रहे।
Eph 6:4 और हे बच्‍चे वालों अपने बच्‍चों को रिस न दिलाओ परन्‍तु प्रभु की शिक्षा, और चितावनी देते हुए, उन का पालन-पोषण करो।
Eph 6:5 हे दासो, जो लोग शरीर के अनुसार तुम्हारे स्‍वामी हैं, अपने मन की सीधाई से डरते, और कांपते हुए, जैसे मसीह की, वैसे ही उन की भी आज्ञा मानो।
Eph 6:6 और मनुष्यों को प्रसन्न करने वालों की नाईं दिखाने के लिये सेवा न करो, पर मसीह के दासों की नाईं मन से परमेश्वर की इच्‍छा पर चलो।


एक साल में बाइबल: 

  • २ राजा १३-१४ 
  • यूहन्ना २

शुक्रवार, 12 अगस्त 2011

दर्शक कौन?

गोल्फ के व्यावसायिक खिलाड़ी रे फ्लोयड के खेल जीवन से संबंधित एक घटना ईमानदारी की मिसाल है। गोल्फ के खेल के नियमों के अनुसार यदि मारने से पहले गेंद ज़रा भी हिलती है तो खिलाड़ी को उसे मारने का अधिकार नहीं रहता, उसे दण्ड के रूप में अपनी बारी छोड़कर एक अतिरिक्त बारी लेनी होती है। रे एक प्रतियोगिता में भाग ले रहे थे जिसका ईनाम और एक बहुत बड़ी राशि थी। रे प्रतियोगिता के अग्रिम खिलाड़ियों में से एक थे, ऐसी स्थिति में अतिरिक्त बारी लेना या कोई अंक गंवाना उन के लिए प्रतियोगिता हारने के समान हो सकता था। अपनी बारी उन्हें गेंद को जिस छेद में डालना था, वे उस छेद के बहुत निकट गेंद को पहुँचा चुके थे और अब गेंद को घर पहुँचाना उनके लिए मात्र औपचारिकता ही रह गई थी। जब वे अपनी बारी लेने के लिए गेंद के निकट आए तो उन्हों ने देखा कि गेंद हलकी सी हिल गई है।

एक अन्य गोल्फ खिलाड़ी डेविड होलमैन बताते हैं कि ऐसी दशा में अधिकांश खिलाड़ी क्या करते: "वे अपने सिर को इधर उधर झटकते और अपने हाथ तेज़ी से हवा में इधर उधर हिलाते मानो उन पर किसी मधुमक्खी का हमला हो रहा हो और वे उससे बचने का प्रयास कर रहे हैं; फिर वे गेंद के समीप से हट कर अपनी आंख को पोंछने और साफ करने का उपक्रम करते, मानों उनकी आंख में कोई रेत का कण पड़ गया हो। इस सारी प्रक्रिया में उन की नज़रें वहां उपस्थित अन्य खिलाड़ीयों और लोगों को भांपती रहतीं कि कहीं किसी ने गेंद के हिलने को देख तो नहीं लिया। यदि वे निश्चिंत होते कि किसी ने नहीं देखा तो बे झिझक आगे बढ़कर गेंद को छेद में मार देते और अपने अंक बना लेते।"

किंतु रे फ्लोयड ने ऐसा नहीं किया। उसने गज़ब की ईमानदारी दिखाते हुए अपनी बारी छोड़ दी, अतिरिक्त बारी ली और अपने अंक बनाने से चूक गए।

परमेश्वर के वचन बाइबल में अय्युब ने भी उन बातों के विष्य में जिन में उसे कोई मनुष्य देख नहीं रहा था, अद्भुत ईमानदारी दिखाई। उसने अपने चरित्र की खराई को परमेश्वर का भय मान कर और बुराई से दूरी बनाए रखने के द्वारा कायम रखा। अय्युब जानता था कि परमेश्वर की निगाहें उस हर समय पर बनी हुई हैं, वह मनुष्यों से छुपा सकता है लेकिन परमेश्वर से नहीं। उसके लिए अपनी ईमानदारी और खराई को बनाए रखने के लिए यही पर्याप्त कारण था।

हमारी खराई और ईमानदारी की वास्तविक परख तब होती है जब कोई हमें देख नहीं रहा होता। ऐसे में यदि हम इस बात को ध्यान रखें कि और कोई हमारा दर्शक हो न हो किंतु परमेश्वर प्रतिपल हमारा दर्शक बना रहता है, तो हमारी ईमानदारी और खराई का स्तर स्वतः ही सुधर जाएगा। - मार्ट डी हॉन


सत्य के लिए नुकसान उठाना, झूठ के लिए पुरस्कार पाने से उत्तम है।

क्या वह मेरी गति नहीं देखता और क्या वह मेरे पग पग नहीं गिनता? - अय्युब ३१:४


बाइबल पाठ: अय्युब ३१:१-८

Job 31:1 मैं ने अपनी आंखों के विषय वाचा बान्धी है, फिर मैं किसी कुंवारी पर क्यों कर आंखें लगाऊं?
Job 31:2 क्योंकि ईश्वर स्वर्ग से कौन सा अंश और सर्वशक्तिमान ऊपर से कौन सी सम्पत्ति बांटता है?
Job 31:3 क्या वह कुटिल मनुष्यों के लिये विपत्ति और अनर्थ काम करने वालों के लिये सत्यानाश का कारण नहीं है?
Job 31:4 क्या वह मेरी गति नहीं देखता और क्या वह मेरे पग पग नहीं गिनता?
Job 31:5 यदि मैं व्यर्थ चाल चालता हूं, वा कपट करने के लिये मेरे पैर दौड़े हों;
Job 31:6 (तो मैं धर्म के तराजू में तौला जाऊं, ताकि ईश्वर मेरी खराई को जान ले)।
Job 31:7 यदि मेरे पग मार्ग से बहक गए हों, और मेरा मन मेरी आंखो की देखी चाल चला हो, वा मेरे हाथों को कुछ कलंक लगा हो;
Job 31:8 तो मैं बीज बोऊं, परन्तु दूसरा खाए; वरन मेरे खेत की उपज उखाड़ डाली जाए।

]एक साल में बाइबल:
  • भजन ८४-८६
  • रोमियों १२