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शुक्रवार, 26 अप्रैल 2013

कल्पना से बाहर


   जब कभी मैं और मेरी पत्नि कहीं छुट्टियाँ बिताने जाने की योजना बनाते हैं तो हम उस स्थान के बारे में अधिक से अधिक जानकारी एकत्रित करते हैं, वहाँ से संबंधित नक्शों और चित्रों का अध्ययन करते हैं और फिर उन बातों को प्रत्यक्ष देखने के रोमांच से भरे वहाँ पहुँचने की प्रतीक्षा में रहते हैं। जो लोग मसीही विश्वासी हैं, उनका भी एक गन्तव्य स्थान है - स्वर्ग, जहाँ वे अनन्त काल तक अपने प्रभु और उद्धारकर्ता मसीह यीशु के साथ रहेंगे।

   लेकिन मुझे यह कुछ विचित्र सा लगता है कि बहुतेरे मसीही विश्वासी स्वर्ग पहुँचने और वहाँ के बारे में जानने में अधिक रुचि नहीं लेते। ऐसा क्यों? संभवतः इसलिए क्योंकि हम स्वर्ग को अधिक समझ नहीं पाते। हम वहाँ चोखे सोने से बनी सड़कों और मोतियों से बने द्वारों की बात तो करते हैं, किन्तु वास्तव में वह कैसा स्थान है और वहाँ हम क्या कुछ देखने पाएंगे, किन किन से मिलने पाएंगे, क्या कुछ करेंगे आदि बातें स्वर्ग के बारे में हमारी उत्सुकता को जगाने नहीं पातीं।

   मेरे विचार से स्वर्ग के बारे में कही गई बातों में से सबसे गहन प्रेरित पौलुस द्वारा फिलिप्पियों की मण्डली को लिखी पत्री के एक पद में मिलती है; पौलुस ने कहा: "... जी तो चाहता है कि कूच कर के मसीह के पास जा रहूं, क्योंकि यह बहुत ही अच्छा है" (फिलिप्पियों 1:23)। जब मेरे 8 वर्षीय पोते ने स्वर्ग के बारे में मुझ से पूछा तो मैंने उसे यही उत्तर दिया। अपने उत्तर को देने से पहले मैंने उससे पूछा, "तुम्हारे जीवन में सबसे रोमांचक बात कौन सी है?" उसने अपने कंप्यूटर पर खेले जाने वाले खेलों के बारे में बताना आरंभ किया और कंप्यूटर पर वह क्या कुछ कर लेता है। तब मैंने उससे कहा, स्वर्ग इन सबसे भी कहीं अधिक अच्छा और रोमांचकारी है। उसने थोड़ा सा सोच कर उत्तर दिया, "दादा, इस की तो कल्पना भी करना कठिन है।"

   आप अपने जीवन में किस बात की आशा रखते हैं? क्या है जो आपको उत्तेजित करता है? क्या है जिसकी कल्पना मात्र भी आपको रोमांचित कर देती है? वह जो कुछ भी हो, स्वर्ग उससे भी कहीं बढकर है - चाहे यह बात कल्पना से बाहर ही क्यों ना हो! - जो स्टोवैल


आप जितना स्वर्ग की प्रतीक्षा में रहेंगे, पृथ्वी की इच्छाएं उतनी ही कम होती जाएंगी।

क्योंकि मैं दोनों के बीच अधर में लटका हूं; जी तो चाहता है कि कूच कर के मसीह के पास जा रहूं, क्योंकि यह बहुत ही अच्छा है। - फिलिप्पियों 1:23

बाइबल पाठ: फिलिप्पियों 1:19-26
Philippians 1:19 क्योंकि मैं जानता हूं, कि तुम्हारी बिनती के द्वारा, और यीशु मसीह की आत्मा के दान के द्वारा इस का प्रतिफल मेरा उद्धार होगा।
Philippians 1:20 मैं तो यही हार्दिक लालसा और आशा रखता हूं, कि मैं किसी बात में लज्ज़ित न होऊं, पर जैसे मेरे प्रबल साहस के कारण मसीह की बड़ाई मेरी देह के द्वारा सदा होती रही है, वैसा ही अब भी हो चाहे मैं जीवित रहूं या मर जाऊं।
Philippians 1:21 क्योंकि मेरे लिये जीवित रहना मसीह है, और मर जाना लाभ है।
Philippians 1:22 पर यदि शरीर में जीवित रहना ही मेरे काम के लिये लाभदायक है तो मैं नहीं जानता, कि किस को चुनूं।
Philippians 1:23 क्योंकि मैं दोनों के बीच अधर में लटका हूं; जी तो चाहता है कि कूच कर के मसीह के पास जा रहूं, क्योंकि यह बहुत ही अच्छा है।
Philippians 1:24 परन्तु शरीर में रहना तुम्हारे कारण और भी आवश्यक है।
Philippians 1:25 और इसलिये कि मुझे इस का भरोसा है सो मैं जानता हूं कि मैं जीवित रहूंगा, वरन तुम सब के साथ रहूंगा जिस से तुम विश्वास में दृढ़ होते जाओ और उस में आनन्‍दित रहो।
Philippians 1:26 और जो घमण्‍ड तुम मेरे विषय में करते हो, वह मेरे फिर तुम्हारे पास आने से मसीह यीशु में अधिक बढ़ जाए।

एक साल में बाइबल: 
  • 2 शमूएल 23-24 
  • लूका 19:1-27


गुरुवार, 25 अप्रैल 2013

अपना भोजन


   नॉर्फोक वन्स्पति उद्यान में लगे एक कैमरे से बड़ा रोचक घटनाक्रम दिखाया जा रहा था - उस उद्यान में चील के एक घोंसले में चील के तीन चूज़े भूखे थे और ऐसा प्रतीत हो रहा था कि उनके माता-पिता इस बात कि अन्देखी कर रहे हैं। उन चूज़ों में से एक ने स्वयं ही अपनी भूख की समस्या का समाधान निकालने का प्रयास किया - वह अपने पास की घोंसले की लकड़ी को चबाने का प्रयास करने लगा। किंतु शीघ्र ही उसने यह करना छोड़ दिया - संभवतः उसे वह स्वादिष्ट नहीं लगी, या वह उसे चबा नहीं पाया।

   लेकिन जिस बात ने मुझे विस्मित किया वह चूज़े का लकड़ी चबाने का प्रयास नहीं था, वरन यह कि उन चूज़ों के पीछे ही एक बड़ी मछली घोंसले में पड़ी हुई थी, लेकिन वे उसे अपना पेट भरने के लिए उपयोग नहीं कर रहे थे। उन चूज़ों ने अब तक अपना भोजन आप लेना नहीं सीखा था; वे अभी भी अपने माता-पिता द्वारा भोजन छोटे छोटे टुकड़ों में बना कर उनके मुँह में डाले जाने के आदी थे। संभवतः चूज़ों के माता-पिता उन चूज़ों को अपनी निगरानी में भूखा रख कर प्रयास कर रहे थे कि चूज़े भोजन को पहचानें और अपना भोजन आप ही खाना सीखें - क्योंकि यदि वे अपना भोजन आप जुटाना और खाना नहीं सीखेंगे तो फिर उनका जीवित बने रहना खतरे में पड़ जाएगा।

   आत्मिक जीवन में भी यह बात इतनी ही महत्वपूर्ण है। बहुत से लोग आत्मिक संगति तो करते हैं परन्तु सदा ही आत्मिक शिक्षाओं और उससे होने वाली आत्मिक बढ़ोतरी के लिए दूसरों पर ही निर्भर रहते हैं। परमेश्वर अपने प्रत्येक सन्तान को व्यक्तिगत रीति से सिखाना चाहता है, उनसे संपर्क रखना चाहता है, किंतु लोग इस बात को अन्देखा कर, परमेश्वर की बजाए अन्य मनुष्यों पर ही निर्भर रहते हैं। यह समस्या आज की नहीं है, यही प्रवृति पुराने नियम में इस्त्राएली समाज में और फिर नए नियम में प्राथमिक मसीही विश्वासी मण्डली में भी देखी जाती थी तथा आज भी मसीही विश्वासी मण्डलियों में विद्यमान है। बजाए परमेश्वर की उपस्थिति में परमेश्वर के वचन बाइबल के साथ बैठ कर उस पर स्वयं मनन करने के, वे सदा दूसरों के मनन और प्रवचन से सीखने की प्रवृति रखते हैं। आत्मिक भोजन उनके पास है, परन्तु उसे ग्रहण करना वे नहीं जानते, और इस कारण आत्मिक रीति से कमज़ोर रहते हैं। इब्रानियों की मण्डली को लिखी अपनी पत्री में लेखक के द्वारा परमेश्वर का आत्मा कहता है: "समय के विचार से तो तुम्हें गुरू हो जाना चाहिए था, तौभी क्या यह आवश्यक है, कि कोई तुम्हें परमेश्वर के वचनों की आदि शिक्षा फिर से सिखाए और ऐसे हो गए हो, कि तुम्हें अन्न के बदले अब तक दूध ही चाहिए" (इब्रानियों 5:12)।

   प्रचारकों और वचन के शिक्षकों से परमेश्वर के वचन को सीखना अच्छा है और कई बातों में लाभप्रद भी है, किंतु यह कभी स्वयं परमेश्वर के वचन पर मनन के द्वारा परमेश्वर से सीखने का स्थान नहीं ले सकता। आत्मिक सामर्थ और बढ़ोतरी के लिए अपना आत्मिक भोजन आप जुटाना भी आवश्यक है। - जूली ऐकरमैन लिंक


आत्मिक बढ़ोतरी परमेश्वर के वचन के ठोस भोजन से ही संभव है।

समय के विचार से तो तुम्हें गुरू हो जाना चाहिए था, तौभी क्या यह आवश्यक है, कि कोई तुम्हें परमेश्वर के वचनों की आदि शिक्षा फिर से सिखाए और ऐसे हो गए हो, कि तुम्हें अन्न के बदले अब तक दूध ही चाहिए। - इब्रानियों 5:12

बाइबल पाठ: इब्रानियों 5:12-6:2
Hebrews 5:12 समय के विचार से तो तुम्हें गुरू हो जाना चाहिए था, तौभी क्या यह आवश्यक है, कि कोई तुम्हें परमेश्वर के वचनों की आदि शिक्षा फिर से सिखाए और ऐसे हो गए हो, कि तुम्हें अन्न के बदले अब तक दूध ही चाहिए।
Hebrews 5:13 क्योंकि दूध पीने वाले बच्‍चे को तो धर्म के वचन की पहिचान नहीं होती, क्योंकि वह बालक है।
Hebrews 5:14 पर अन्न सयानों के लिये है, जिन के ज्ञानेन्‍द्रिय अभ्यास करते करते, भले बुरे में भेद करने के लिये पक्के हो गए हैं।
Hebrews 6:1 इसलिये आओ मसीह की शिक्षा की आरम्भ की बातों को छोड़ कर, हम सिद्धता की ओर आगे बढ़ते जाएं, और मरे हुए कामों से मन फिराने, और परमेश्वर पर विश्वास करने।
Hebrews 6:2 और बपतिस्मों और हाथ रखने, और मरे हुओं के जी उठने, और अन्‍तिम न्याय की शिक्षारूपी नेव, फिर से न डालें।

एक साल में बाइबल: 
  • 2 शमूएल 21-22 
  • लूका 18:24-43


बुधवार, 24 अप्रैल 2013

वैध प्रवेश


   मैं अपनी पत्नि के साथ अमेरिका से बाहर के एक देश में शिक्षण कार्य के लिए निकला। जिस देश में हमें जाना था जब हम वहाँ पहुँचे तो हमारे वीसा (प्रवेश आज्ञा पत्र) में कुछ गड़बड़ के कारण हमें प्रवेश करने से रोक दिया गया। हम इस विश्वास में थे कि हमें बिलकुल सही वीसा मिले हैं, परन्तु जब उस देश में प्रवेश करने के लिए उन्हें जांचा गया तो उनमें त्रुटियाँ पाई गईं। कई लोगों, सरकारी और गैर-सरकारी ने, हमारे प्रवेश कर पाने के लिए बहुत प्रयास किए, हमारे भले उद्देश्य और अच्छे चरित्र की दुहाई दी, किंतु कुछ भी नहीं हो सका और हमें अमेरिका जाने वाले अगले ही वायु यान में बैठा कर वापस भेज दिया गया। किसी की ओर से कोई भी प्रयास इस तथ्य को बदल नहीं सका कि हमारे प्रवेश पत्र वैध नहीं थे और हमें उन अवैध प्रवेश पत्रों के आधार पर प्रवेश कदापि नहीं मिल सकता था। हमारे चरित्र, हमारे उद्देश्य, हमारे कार्य, हमारे लिए करी गई सिफारिशें आदि कुछ भी काम नहीं आए और हमें लौटना ही पड़ा। केवल एक ही उपाय था, एक नए कार्यक्रम के अन्तर्गत और वैध तथा सही प्रवेश पत्र लेकर हम पुनः वहाँ आएं।

   वीसा संबंधित यह अनुभव अति असुविधाजनक तो था, लेकिन इससे मेरा ध्यान एक और प्रकार के अवैध प्रवेशों के प्रयासों की ओर गया, जिनमें संसार का प्रायः अधिकांश लोग लिप्त रहते आए हैं और लिप्त हैं। मेरा तात्पर्य स्वर्ग में परमेश्वर के पास प्रवेश से है। अन्तिम क्षण पर जब फिर कभी कुछ नहीं हो सकता, स्वर्ग के द्वार से लौटना एक ऐसा दर्दनाक और भयावह अनुभव है जिसकी कल्पना भी हम मनुष्यों की बुद्धि से परे है और उस परदेश की सीमा से हमारे लौटने की असुविधा तो उसके सामने कुछ भी नहीं है। संसार के लोग इस बात को भूल जाते हैं या अन्देखा करते हैं कि स्वर्ग परमेश्वर का निवास स्थान है, कोई छुट्टी बिताने या सैलानियों के समान कुछ समय के लिए घूमने जाने का स्थान नहीं है जहां आप अपनी इच्छा, अपनी योजनाओं और अपनी सुविधानुसार पहुंच जाएं। परमेश्वर के निवास स्थान में जो प्रवेश पाएगा वह परमेश्वर की अनुमति से और परमेश्वर द्वारा निर्धारित शर्तों के आधार पर ही यह करने पाएगा; ना कि अपनी इच्छा, अपनी योजनाओं या अपनी किन्ही योग्यताओं के आधार पर।

   ऐसे असंख्य लोग हैं जो अपने धर्म-कर्म और भलाई के जीवन को इस प्रवेश के लिए वैध समझते हैं, किंतु परमेश्वर का वचन सभी मनुष्यों के लिए कहता है "जैसा लिखा है, कि कोई धर्मी नहीं, एक भी नहीं। कोई समझदार नहीं, कोई परमेश्वर का खोजने वाला नहीं। इसलिये कि सब ने पाप किया है और परमेश्वर की महिमा से रहित हैं" (रोमियों 3:10, 11, 23)। बहुतेरे अपने अच्छे चरित्र और समाज में अच्छे नाम को प्रवेश के लिए वैध समझते हैं, किंतु परमेश्वर का वचन कहता है "हम तो सब के सब अशुद्ध मनुष्य के से हैं, और हमारे धर्म के काम सब के सब मैले चिथड़ों के समान हैं। हम सब के सब पत्ते की नाईं मुर्झा जाते हैं, और हमारे अधर्म के कामों ने हमें वायु की नाईं उड़ा दिया है" (यशायाह 64:6)। कितने ही अपने पूर्वजों के नाम और अपनी उच्च वंशावली को अपने लिए स्वर्ग में प्रवेश का वैध आधार मानते हैं, लेकिन परमेश्वर का वचन सिखाता है कि "क्योंकि तुम जानते हो, कि तुम्हारा निकम्मा चाल-चलन जो बाप दादों से चला आता है उस से तुम्हारा छुटकारा चान्दी सोने अर्थात नाशमान वस्‍तुओं के द्वारा नहीं हुआ" (1 पतरस 1:18 )। परमेश्वर की चेतावनी सब के  लिए है: "हे भाइयों, मैं यह कहता हूं कि मांस और लोहू परमेश्वर के राज्य के अधिकारी नहीं हो सकते, और न विनाशी अविनाशी का अधिकारी हो सकता है" (1 कुरिन्थियों 15:50); "यीशु ने उसको उत्तर दिया; कि मैं तुझ से सच सच कहता हूं, यदि कोई नये सिरे से न जन्मे तो परमेश्वर का राज्य देख नहीं सकता। क्योंकि जो शरीर से जन्मा है, वह शरीर है; और जो आत्मा से जन्मा है, वह आत्मा है" (यूहन्ना 3:3, 6)।

   परमेशवर के निवास स्थान अर्थात परमेश्वर के पास प्रवेश का केवल एक ही वैध प्रवेश मार्ग है: "यीशु ने उस से कहा, मार्ग और सच्चाई और जीवन मैं ही हूं; बिना मेरे द्वारा कोई पिता के पास नहीं पहुंच सकता" (यूहन्ना 14:6)। केवल प्रभु यीशु ही है जिसने समस्त मानव जाति के पापों लिए अपने प्राणों के बलिदान और फिर मृत्कों में से पुनरुत्थान के द्वारा परमेश्वर के पास प्रवेश का मार्ग संभव किया है और केवल वह ही परमेश्वर की उपस्थिति में आने के लिए हमें उस पर लाए गए विश्वास और उससे प्राप्त होने वाली पापों की क्षमा द्वारा वैध प्रवेश प्रदान कर सकता है।

   क्या आपने प्रभु यीशु पर विश्वास किया है, उससे पापों की क्षमा मांगी है? समय कब पूरा हो जाए और अन्तिम यात्रा कब करनी पड़ जाए, कोई नहीं जानता। अब और अभी ही स्वर्ग में अपने प्रवेश की वैधता को सुनिश्चित कर लीजिए। - बिल क्राउडर


केवल प्रभु यीशु के माध्यम से ही हम प्रमेश्वर पिता के समक्ष प्रवेश पा सकते हैं।

यीशु ने उस से कहा, मार्ग और सच्चाई और जीवन मैं ही हूं; बिना मेरे द्वारा कोई पिता के पास नहीं पहुंच सकता। - यूहन्ना 14:6

बाइबल पाठ: यूहन्ना 14:1-10
John 14:1 तुम्हारा मन व्याकुल न हो, तुम परमेश्वर पर विश्वास रखते हो मुझ पर भी विश्वास रखो।
John 14:2 मेरे पिता के घर में बहुत से रहने के स्थान हैं, यदि न होते, तो मैं तुम से कह देता क्योंकि मैं तुम्हारे लिये जगह तैयार करने जाता हूं।
John 14:3 और यदि मैं जा कर तुम्हारे लिये जगह तैयार करूं, तो फिर आकर तुम्हें अपने यहां ले जाऊंगा, कि जहां मैं रहूं वहां तुम भी रहो।
John 14:4 और जहां मैं जाता हूं तुम वहां का मार्ग जानते हो।
John 14:5 थोमा ने उस से कहा, हे प्रभु, हम नहीं जानते कि तू कहां जाता है तो मार्ग कैसे जानें?
John 14:6 यीशु ने उस से कहा, मार्ग और सच्चाई और जीवन मैं ही हूं; बिना मेरे द्वारा कोई पिता के पास नहीं पहुंच सकता।
John 14:7 यदि तुम ने मुझे जाना होता, तो मेरे पिता को भी जानते, और अब उसे जानते हो, और उसे देखा भी है।
John 14:8 फिलेप्पुस ने उस से कहा, हे प्रभु, पिता को हमें दिखा दे: यही हमारे लिये बहुत है।
John 14:9 यीशु ने उस से कहा; हे फिलेप्पुस, मैं इतने दिन से तुम्हारे साथ हूं, और क्या तू मुझे नहीं जानता? जिसने मुझे देखा है उसने पिता को देखा है: तू क्यों कहता है कि पिता को हमें दिखा।
John 14:10 क्या तू प्रतीति नहीं करता, कि मैं पिता में हूं, और पिता मुझ में हैं? ये बातें जो मैं तुम से कहता हूं, अपनी ओर से नहीं कहता, परन्तु पिता मुझ में रहकर अपने काम करता है।

एक साल में बाइबल: 
  • 2 शमूएल 19-20 
  • लूका 18:1-23

मंगलवार, 23 अप्रैल 2013

सहायता


   अमेरिका के बहुत से वन प्राणी संख्या में घटते जा रहे हैं और उनकी प्रजातियाँ लुप्त होने के कगार पर पहुँच रही हैं। इस स्थिति का एक प्रमुख कारण शिकारीयों की बन्दूकें नहीं वरन सड़कों पर भारी यातायात और रिहायशी इलाकों की बढ़ती हुई सीमाएं हैं जो उनके विचरण और रहने के क्षेत्रों पर कब्ज़ा जमाते जा रहे हैं और उन वन प्राणियों को विस्थापित कर रहे हैं। मुझे इन वन प्राणियों की दयनीय स्थिति का सजीव उदाहरण तब देखने को मिला जब मैं एक बार गाड़ी चलाते हुए जा रहा था कि अचानक एक मादा हिरन बड़ी तेज़ी से मेरी गाड़ी के आगे से होकर भागी, फिर सड़क की दूसरी ओर पहुँच कर रुक गई और पलट कर देखने लगी। मैंने भी उसी ओर देखा जिधर उसकी नज़रें लगी थीं और पाया कि उसके दो नन्हे शावक बड़ी बेबसी से सड़क के पार खड़ी अपनी माँ की ओर देख रहे थे, लेकिन सड़क पर चल रही गाड़ियों के कारण पार नहीं हो पा रहे थे। कुछ देर तक ऐसे ही बेबस खड़े रहने के बाद वे दोनो बच्चे वापस जंगल की ओर मुड़ गए; शायद एक परिवार सदा के लिए एक दुसरे से बिछड़ गया था।

   संसार पर पाप के प्रभाव, सांसारिकता तथा जीवन में पाप की प्रवृति से समस्त मानव जाति भी विनाश के कगार पर खड़ी है। पाप की इस अव्यवस्था के दुषप्रभाव से, उस हिरनी और उसके शावकों के समान, हम भी अपने आप को अनापेक्षित परिस्थितियों, अनभिज्ञ खतरों अथवा विषम परिस्थितियों में पा कर असहाय तथा निरुपाय अनुभव कर सकते हैं। पाप के प्रभाव और दोष से पार पाने में हमारे अपने प्रयास और क्षमताएं तथा योजनाएं चाहे अक्षम हों, लेकिन वास्तव में हम असहाय या निरुपाय नहीं हैं; हम सब को पाप के दोष और उसके दुषप्रभावों से बचाने के लिए स्वर्गीय परमेश्वर पिता की सहायता की उपल्बध है। चाहे वे दुषपरिणाम पूर्वजों के पापों के कारण हो और हमें उन से उभरने तथा अपने जीवन में उन्हें ना दोहराने की समझ और शक्ति की आवश्यकता हो (नहेमेयाह 9:2-3); या उस प्रेमी परमेश्वर और ध्यानपूर्वक हमारी देखभाल करने वाले धैर्यवान पिता के पास पश्चाताप के साथ लौटने के लिए हिम्मत और सदबुद्धि की आवश्यकता हो (लूका 15:8), परमेश्वर हमारी सहायता के लिए सदैव तत्पर और तैयार है। परमेश्वर ने हमें पाप के दोष से छुड़ाने और स्वर्गीय जीवन जीने के लिए हमारी सहायता करने को प्रभु यीशु के रूप में अपना हाथ हमारी ओर बढ़ाया है। किंतु उसके बढ़े हुए हाथ की ओर अपना हाथ बढ़ाकर उसे थामने और पाप से निवारण के उसके उपाय को स्वीकार करने की बजाए यदि हम अपनी ही सीमित समझ और युक्तियों के सहारे कार्य करते रहेंगे, और फिर परिणामस्वरूप परेशानियों में पड़े रहने को सही एवं बुद्धिमतापूर्ण समझते रहेंगे तो समस्या का निवारण नहीं हो पाएगा।

   केवल हमारा स्वर्गीय परमेश्वर पिता ही हमारे जीवनों के संचालन के लिए हमें वह परिपूर्ण अनुग्रह, संपूर्ण क्षमा, खरा उदाहरण और भीतरी शान्ति प्रदान कर सकता है जिसके साथ हम जीवन की कठिन परिस्थितियों का सामना कर सकें। वह हमारी वास्तविकता, हमारी क्षमता और कमज़ोरियाँ जानता है और इसीलिए उसने अपने पुत्र और संसार के उद्धारकर्ता प्रभु यीशु मसीह के द्वारा सेंत-मेंत बचाए जाने, तथा पापों से क्षमा और उद्धार पाने का मार्ग समस्त संसार के सभी लोगों के लिए बना कर दिया है। जो कोई उसके इस खुले निमंत्रण को स्वीकार करके प्रभु के पीछे हो लेता है, उसे वह सहायता के लिए अपना पवित्र आत्मा भी देता है, जो उस व्यक्ति में निवास करता है, उसकी सहायता करता है और उसका मार्गदर्शन करता है।

   परमेश्वर नहीं चाहता कि उसकी सृष्टि, उसके बच्चे अपने पापों में बने रहने के कारण उससे बिछड़ें इसलिए उसने अपने साथ चलने और बने रहने का मार्ग, क्षमा और सामर्थ सब के लिए दे दी है। उसकी इस प्रेम-भेंट को स्वीकार करके उसकी बात को मानना और उसका अनुसरण करना, अब यह प्रत्येक व्यक्ति का अपना निर्णय है। - मार्ट डी हॉन


परमेश्वर की ओर वापस लौट आने का मार्ग इस जीवन में ही खुला मिलता है।

और इस्राएलियों में से बहुतेरों को उन के प्रभु परमेश्वर की ओर फेरेगा। - (लूका 1:16)

बाइबल पाठ: मलाकी 4:4-6; मत्ती 1:21-23
Malachi 4:4 मेरे दास मूसा की व्यवस्था अर्थात जो जो विधि और नियम मैं ने सारे इस्रएलियों के लिये उसको होरेब में दिए थे, उन को स्मरण रखो।
Malachi 4:5 देखो, यहोवा के उस बड़े और भयानक दिन के आने से पहिले, मैं तुम्हारे पास एलिय्याह नबी को भेजूंगा।
Malachi 4:6 और वह माता पिता के मन को उनके पुत्रों की ओर, और पुत्रों के मन को उनके माता-पिता की ओर फेरेगा; ऐसा न हो कि मैं आकर पृथ्वी को सत्यानाश करूं।
Matthew 1:21 वह पुत्र जनेगी और तू उसका नाम यीशु रखना; क्योंकि वह अपने लोगों का उन के पापों से उद्धार करेगा।
Matthew 1:22 यह सब कुछ इसलिये हुआ कि जो वचन प्रभु ने भविष्यद्वक्ता के द्वारा कहा था; वह पूरा हो।
Matthew 1:23 कि, देखो एक कुंवारी गर्भवती होगी और एक पुत्र जनेगी और उसका नाम इम्मानुएल रखा जाएगा जिस का अर्थ यह है “परमेश्वर हमारे साथ”।

एक साल में बाइबल: 
  • 2 शमूएल 16-18 
  • लूका 17:20-37


सोमवार, 22 अप्रैल 2013

संयम


   प्रसिद्ध अमेरीकी अभिनेता जॉन वेन ने एक बार कहा था, "धीमा बोलें, धीरे बोलें और कम बोलें।" मेरे लिए उनका यह परामर्श मानना कठिन है क्योंकि मैं तेज़ गति से बोलने वाली हूँ, ऊँची आवाज़ में बोलती हूँ और जब बोलती हूँ तो बहुत कुछ कह जाती हूँ। लेकिन अपने शब्दों पर नियंत्रण रखना क्रोध तथा आवेश की स्थिति को काबू में रखने के लिए एक बहुत उपयोगी माध्यम हो सकता है। परमेश्वर का वचन बाइबल हमें सिखाती है कि "...हर एक मनुष्य सुनने के लिये तत्‍पर और बोलने में धीरा और क्रोध में धीमा हो" (याकूब 1:19), तथा "कोमल उत्तर सुनने से जलजलाहट ठण्डी होती है, परन्तु कटुवचन से क्रोध धधक उठता है" (नीतिवचन 15:1)।

   बाइबल में न्यायियों के समय की घटना इन शिक्षाओं का जीवता उदाहरण है। न्यायियों की पुस्तक के 8 अध्याय में कुछ इस्त्राएलियों की गिदोन के साथ झड़प हुई। इस्त्राएली क्रोधित थे क्योंकि गिदोन उन्हें अपने साथ लिए बिना ही युद्ध के लिए निकल गया था और मिदियानी सेना को उखाड़ फेंका था - वास्तव में गिदोन परमेश्वर की आज्ञा पर परमेश्वर द्वारा उसे प्रदान किए गए केवल 300 लोगों के साथ ही मिदियानी सेना से युद्ध के लिए गया था। जब उसने मिदियानी सेना को उखाड़ फेंका और मिदियानी तितर-बितर होकर इधर-उधर भागने लगे तब गिदोन ने शेष इस्त्राएल के लोगों को उनका पीछा करके घात करने का सन्देश भेजा। इस जय का मुख्य श्रेय गिदोन को मिलने से बाकी इस्त्राएली चिढ़े हुए थे। गिदोन ने प्रत्युत्तर में उन्हें कोई कटु उत्तर नहीं दिया और ना ही उन पर कोई कटाक्ष किया। इसके विपरीत उसने बड़ी नम्रता से व्यवहार किया और उन इस्त्राएलियों को स्मरण कराया कि मिदियानी राजाओं को पकड़ने वाले और घात करने वाले तो वे ही थे, जबकि गिदोन सैनिकों के साथ ही युद्ध में उलझा था; उसने कहा: "तुम्हारे ही हाथों में परमेश्वर ने ओरब और जेब नाम मिद्यान के हाकिमों को कर दिया; तब तुम्हारे बराबर मैं कर ही क्या सका? जब उसने यह बात कही, तब उनका जी उसकी ओर से ठंड़ा हो गया" (न्यायियों 8:3)। गिदोन ने क्रोधित इस्त्राएलियों को आदर भी दिया और उनके क्रोध को शांत भी किया, और फिर इस्त्राएलियों ने उसे अपना न्यायी भी ठहरा लिया।

   परमेश्वर की सहायता से, अपने शब्दों को नियंत्रण में रखने के द्वारा हम क्रोधित लोगों और विस्फोटक स्थितियों को नियंत्रण में ला सकते हैं और उत्तेजित वातावरण को शांत कर सकते हैं। संयम और नम्रता का व्यवहार लोगों के क्रोध को शांत करने और आपसी मेलजोल को बढ़ाने तथा परमेश्वर की महिमा के लिए एक अच्छा उदाहरण प्रस्तुत करने में बहुत उपयोगी होता है। - जेनिफर बेन्सन शुल्ट


इससे पहले कि आपकी जीभ दूसरों को कष्ट दे, आप अपनी जीभ को दबा लें।

कोमल उत्तर सुनने से जलजलाहट ठण्डी होती है, परन्तु कटुवचन से क्रोध धधक उठता है। - नीतिवचन 15:1

बाइबल पाठ: न्यायियों 7:24-8:3
Judges 7:24 और गिदोन ने एप्रैम के सब पहाड़ी देश में यह कहने को दूत भेज दिए, कि मिद्यानियों से मुठभेड़ करने को चले आओ, और यरदन नदी के घाटों को बेतबारा तक उन से पहिले अपने वश में कर लो। तब सब एप्रैमी पुरूषों ने इकट्ठे हो कर यरदन नदी को बेतबारा तक अपने वश में कर लिया।
Judges 7:25 और उन्होंने ओरेब और जेब नाम मिद्यान के दो हाकिमों को पकड़ा; और ओरेब को ओरेब नाम चट्टान पर, और जेब को जेब नाम दाखरस के कुण्ड पर घात किया; और वे मिद्यानियों के पीछे पड़े; और ओरेब और जेब के सिर यरदन के पार गिदोन के पास ले गए।
Judges 8:1 तब एप्रैमी पुरूषों ने गिदोन से कहा, तू ने हमारे साथ ऐसा बर्ताव क्यों किया है, कि जब तू मिद्यान से लड़ने को चला तब हम को नहीं बुलवाया? सो उन्होंने उस से बड़ा झगड़ा किया।
Judges 8:2 उसने उन से कहा, मैं ने तुम्हारे समान भला अब किया ही क्या है? क्या एप्रैम की छोड़ी हुई दाख भी अबीएजेर की सब फसल से अच्छी नहीं है?
Judges 8:3 तुम्हारे ही हाथों में परमेश्वर ने ओरब और जेब नाम मिद्यान के हाकिमों को कर दिया; तब तुम्हारे बराबर मैं कर ही क्या सका? जब उसने यह बात कही, तब उनका जी उसकी ओर से ठंड़ा हो गया।

एक साल में बाइबल: 
  • 2 शमूएल 14-15 
  • लूका 17:1-19


रविवार, 21 अप्रैल 2013

पराजय से आगे


   अपने मसीही विश्वास में कमज़ोर पड़कर यदि हम से कोई ऐसा कार्य हो जाए जिससे हमारे परिवार और मित्र जनों में परमेश्वर का नाम और राज्य निन्दित हो, तो इस परिस्थिति का सामना हमें कैसे करना चाहिए?

   परमेश्वर के वचन बाइबल में राजा दाऊद का एक ऐसा ही उदाहरण है जिससे हम इस विषय पर शिक्षा ले सकते हैं। दाऊद अपने एक वफादार सैनिक ऊरिय्याह की पत्नि बतशेबा के साथ व्यभिचार में पड़ा, जिससे बतशेबा गर्भवती हुई। अपने पाप को छिपाने के लिए दाऊद ने ऊरिय्याह को छल से युद्ध भूमि में मरवा दिया। उसकी इस बात के लिए परमेश्वर ने अपने नबी नातान द्वारा दाऊद के पास अपनी नाराज़गी का सन्देश भेजा और कहा कि दाऊद को अपने इस पाप का प्रतिफल भोगना पड़ेगा। उस पाप के दर्दनाक परिणामों से तो दाऊद बच तो नहीं सका, लेकिन उसने परमेश्वर से अपने संबंध को टूटने भी नहीं दिया और वह लौट कर फिर परमेश्वर की संगति में आ सका, परमेश्वर के लिए फिर से उपयोगी हो सका। दाऊद के समान ही हम भी ऐसा कर सकते हैं।

   बाइबल के 2 शमूएल 12:13-23 में दिया गया राजा दाऊद के पुनःस्थापन का नमूना आज हमारे लिए भी परमेश्वर की संगति में लौट आने का मार्ग दिखाता है। पाप से मिली पराजय से आगे बढ़कर फिर से परमेश्वर की संगति और आशीषों में लौटने के लिए सबसे पहला कार्य है खुलकर अपने दोष का अंगीकार कर लेना (पद 13) और उसके लिए परमेश्वर से क्षमा माँगना तथा परमेश्वर से प्रार्थना करना कि हमारे पापों के दुषप्रभावों से अन्य संबंधित लोग बचे रहें (पद 16)। फिर यह पहचानना कि उन पापों के प्रतिफलों से बच पाना सदा ही संभव नहीं होता, और उन दुषपरिणामों को धैर्य पूर्वक सहन करना, उनके लिए परमेश्वर से प्रार्थना करते रहना। हम उन दुषपरिणामों के लिए दुखी हो सकते हैं, शोक कर सकते हैं लेकिन परमेश्वर पर अपना भरोसा सदा बनाए रहें। उन दुषपरिणामों को अपने ऊपर इतना हावी भी ना होने दें कि हम परमेश्वर से कट जाएं; सदा परमेश्वर से प्रार्थना का भाव बनाए रखें और यह परमेश्वर से संबंध को जोड़े रहेगा, शांति के मार्ग को खुला रखेगा (पद 20-23)।

   शैतान ना केवल हमें पाप में गिराने और फंसाने से प्रसन्न होता है वरन हमें आत्मिक तौर से निषक्रीय करने और पछतावे में निढाल होकर बैठे रहने तथा व्यर्थ हाथ मलते रहने से भी उसे आनन्द मिलता है। परमेश्वर हमें दुख और पछतावे में बैठे देख कर आनन्दित नहीं होता; वह आनन्दित होता है उस पछतावे और दुख में उससे पाप की क्षमा माँग कर हमारे आगे बढ़ने और उसकी भलाई तथा प्रेम पर विश्वास रख कर फिर से उसके लिए कार्यकारी होने से। उसका प्रेम हमारे लिए कभी कम नहीं होता, उसके मार्ग सदा अपने बच्चों के लिए खुले रहते हैं और वह उनके लौट आने की सदा प्रतीक्षा करता है तथा लौटने वालों का स्वागत आनन्द और आदर से करता है (लूका 15:11-24)।

   यदि हमने अपनी मसीही जीवन की गवाही बिगाड़ ली है तो उसके लिए पश्चातापी और दीन होना आवश्यक है; लेकिन इसका यह तात्पर्य नहीं कि हम बिलकुल चुपचाप होकर, संसार और लोगों से छुप कर बैठ जाएं। ऐसा करने से उस पाप के दुषपरिणाम हम पर और भी हावी होंगे। पाप के लिए क्षमा याचना के साथ परमेश्वर का हाथ फिर से थाम कर आगे बढ़ें; यही पराजय से आगे बढ़ने की कुंजी है। - रैंडी किलगोर


परमेश्वर हमारे पापों को क्षमा करके सदा ही हमें अपनी संगति तथा कार्य में फिर से स्थापित रखना चाहता है।

मैं वही हूं जो अपने नाम के निमित्त तेरे अपराधों को मिटा देता हूं और तेरे पापों को स्मरण न करूंगा। - (यशायाह 43:25)

बाइबल पाठ: 2 शमूएल 12:1-23
2 Samuel 12:1 तब यहोवा ने दाऊद के पास नातान को भेजा, और वह उसके पास जा कर कहने लगा, एक नगर में दो मनुष्य रहते थे, जिन में से एक धनी और एक निर्धन था।
2 Samuel 12:2 धनी के पास तो बहुत सी भेड़-बकरियां और गाय बैल थे;
2 Samuel 12:3 परन्तु निर्धन के पास भेड़ की एक छोटी बच्ची को छोड़ और कुछ भी न था, और उसको उसने मोल ले कर जिलाया था। और वह उसके यहां उसके बाल-बच्चों के साथ ही बढ़ी थी; वह उसके टुकड़े में से खाती, और उसके कटोरे में से पीती, और उसकी गोद मे सोती थी, और वह उसकी बेटी के समान थी।
2 Samuel 12:4 और धनी के पास एक बटोही आया, और उसने उस बटोही के लिये, जो उसके पास आया था, भोजन बनवाने को अपनी भेड़-बकरियों वा गाय बैलों में से कुछ न लिया, परन्तु उस निर्धन मनुष्य की भेड़ की बच्ची ले कर उस जन के लिये, जो उसके पास आया था, भोजन बनवाया।
2 Samuel 12:5 तब दाऊद का कोप उस मनुष्य पर बहुत भड़का; और उसने नातान से कहा, यहोवा के जीवन की शपथ, जिस मनुष्य ने ऐसा काम किया वह प्राण दण्ड के योग्य है;
2 Samuel 12:6 और उसको वह भेड़ की बच्ची का चौगुणा भर देना होगा, क्योंकि उसने ऐसा काम किया, और कुछ दया नहीं की।
2 Samuel 12:7 तब नातान ने दाऊद से कहा, तू ही वह मनुष्य है। इस्राएल का परमेश्वर यहोवा यों कहता है, कि मैं ने तेरा अभिषेक करा के तुझे इस्राएल का राजा ठहराया, और मैं ने तुझे शाऊल के हाथ से बचाया;
2 Samuel 12:8 फिर मैं ने तेरे स्वामी का भवन तुझे दिया, और तेरे स्वामी की पत्नियां तेरे भोग के लिये दीं; और मैं ने इस्राएल और यहूदा का घराना तुझे दिया था; और यदि यह थोड़ा था, तो मैं तुझे और भी बहुत कुछ देने वाला था।
2 Samuel 12:9 तू ने यहोवा की आज्ञा तुच्छ जान कर क्यों वह काम किया, जो उसकी दृष्टि में बुरा है? हित्ती ऊरिय्याह को तू ने तलवार से घात किया, और उसकी पत्नी को अपनी कर लिया है, और ऊरिय्याह को अम्मोनियों की तलवार से मरवा डाला है।
2 Samuel 12:10 इसलिये अब तलवार तेरे घर से कभी दूर न होगी, क्योंकि तू ने मुझे तुच्छ जानकर हित्ती ऊरिय्याह की पत्नी को अपनी पत्नी कर लिया है।
2 Samuel 12:11 यहोवा यों कहता है, कि सुन, मैं तेरे घर में से विपत्ति उठा कर तुझ पर डालूंगा; और तेरी पत्नियों को तेरे साम्हने ले कर दूसरे को दूंगा, और वह दिन दुपहरी में तेरी पत्नियों से कुकर्म करेगा।
2 Samuel 12:12 तू ने तो वह काम छिपाकर किया; पर मैं यह काम सब इस्राएलियों के साम्हने दिन दुपहरी कराऊंगा।
2 Samuel 12:13 तब दाऊद ने नातान से कहा, मैं ने यहोवा के विरुद्ध पाप किया है। नातान ने दाऊद से कहा, यहोवा ने तेरे पाप को दूर किया है; तू न मरेगा।
2 Samuel 12:14 तौभी तू ने जो इस काम के द्वारा यहोवा के शत्रुओं को तिरस्कार करने का बड़ा अवसर दिया है, इस कारण तेरा जो बेटा उत्पन्न हुआ है वह अवश्य ही मरेगा।
2 Samuel 12:15 तब नातान अपने घर चला गया। और जो बच्चा ऊरिय्याह की पत्नी से दाऊद के द्वारा उत्पन्न था, वह यहोवा का मारा बहुत रोगी हो गया।
2 Samuel 12:16 और दाऊद उस लड़के के लिये परमेश्वर से बिनती करने लगा; और उपवास किया, और भीतर जा कर रात भर भूमि पर पड़ा रहा।
2 Samuel 12:17 तब उसके घराने के पुरनिये उठ कर उसे भूमि पर से उठाने के लिये उसके पास गए; परन्तु उसने न चाहा, और उनके संग रोटी न खाई।
2 Samuel 12:18 सातवें दिन बच्चा मर गया, और दाऊद के कर्मचारी उसको बच्चे के मरने का समाचार देने से डरे; उन्होंने तो कहा था, कि जब तक बच्चा जीवित रहा, तब तक उसने हमारे समझाने पर मन न लगाया; यदि हम उसको बच्चे के मर जाने का हाल सुनाएं तो वह बहुत ही अधिक दु:खी होगा।
2 Samuel 12:19 अपने कर्मचारियों को आपस में फुसफुसाते देखकर दाऊद ने जान लिया कि बच्चा मर गया; तो दाऊद ने अपने कर्मचारियों से पूछा, क्या बच्चा मर गया? उन्होंने कहा, हां, मर गया है।
2 Samuel 12:20 तब दाऊद भूमि पर से उठा, और नहाकर तेल लगाया, और वस्त्र बदला; तब यहोवा के भवन में जा कर दण्डवत्‌ की; फिर अपने भवन में आया; और उसकी आज्ञा पर रोटी उसको परोसी गई, और उसने भोजन किया।
2 Samuel 12:21 तब उसके कर्मचारियों ने उस से पूछा, तू ने यह क्या काम किया है? जब तक बच्चा जीवित रहा, तब तक तू उपवास करता हुआ रोता रहा; परन्तु ज्योंही बच्चा मर गया, त्योंही तू उठ कर भोजन करने लगा।
2 Samuel 12:22 उसने उत्तर दिया, कि जब तक बच्चा जीवित रहा तब तक तो मैं यह सोच कर उपवास करता और रोता रहा, कि क्या जाने यहोवा मुझ पर ऐसा अनुग्रह करे कि बच्चा जीवित रहे।
2 Samuel 12:23 परन्तु अब वह मर गया, फिर मैं उपवास क्यों करूं? क्या मैं उसे लौटा ला सकता हूं? मैं तो उसके पास जाऊंगा, परन्तु वह मेरे पास लौट न आएगा।

एक साल में बाइबल: 
  • 2 शमूएल 12-13 
  • लूका 16


शनिवार, 20 अप्रैल 2013

परमेश्वर की इच्छा


   एक युवक अनिश्चित भविष्य का सामना कर रहा था और समझ नहीं पा रहा था कि आता वर्ष उसके लिए कैसा होगा, अन्ततः अपनी निराशाओं और कुंठाओं में होकर वह इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि परमेश्वर की इच्छा क्या है यह कोई नहीं जानता। क्या वह सही था? क्या भविष्य के बारे में अनिश्चित होने का तात्पर्य है परमेश्वर की इच्छा जान पाना संभव नहीं है?

   परमेश्वर की इच्छा जानने का तात्पर्य अधिकांश लोगों के लिए यह जान पाने तक ही सीमित होता है कि "भविष्य में हम किस स्थिति में होंगे?" यद्यपि परमेश्वर की इच्छा के संबंध में इस बात का अवश्य ही एक महत्वपूर्ण स्थान है, लेकिन परमेश्वर की इच्छा से संबंधित केवल यही सब कुछ नहीं है। परमेश्वर की इच्छा से संबंधित एक और तथा उतना ही महत्वपूर्ण भाग है परमेश्वर की प्रगट इच्छा का प्रतिदिन पालन करते रहना।

   परमेश्वर ने हमारे प्रतिदिन के जीवन के बारे में कई बातें हम पर प्रगट करी हैं; उसके प्रति हमारे दायित्वों के बारे में हम सब काफी कुछ जानते हैं; उदाहरणस्वरूप, परमेश्वर की इच्छा है कि हम मसीही विश्वासी:

- अपने देश के अच्छे और ईमानदार नागरिक बनें, और हमारा यह भला चरित्र मसीह विरोधियों के लिए एक चुनौती हो। (1 पतरस 2:15)

- हर बात में, चाहे वह कैसी भी क्यों ना हो, हम परमेश्वर का धन्यवाद करें। (1 थिस्सलुनीकियों 5:18)

- सदा पवित्रता में बने रहें और हर प्रकार के लुचपन तथा व्यभिचार से बचे रहें। (1 थिस्सलुनीकियों 4:13)

- सदा परमेश्वर के पवित्र आत्मा की आधीनता में रहें और चलें। (इफिसीयों 5:18)

- परमेश्वर की स्तुति आराधना करते रहें। (इफिसीयों 5:19)

- मेलजोल के साथ एक दूसरे के आधीन रहें। (इफिसीयों 5:21)

 जैसे जैसे हम परमेश्वर की इन तथा अन्य ऐसी विदित इच्छाओं के प्रति समर्पित एवं आज्ञाकारी होते जाएंगे, वैसे वैसे हम रोमियों 12:2 में दिए निर्देष: "और इस संसार के सदृश न बनो; परन्तु तुम्हारी बुद्धि के नये हो जाने से तुम्हारा चाल-चलन भी बदलता जाए, जिस से तुम परमेश्वर की भली, और भावती, और सिद्ध इच्छा अनुभव से मालूम करते रहो" के अनुसार अन्य बातों के लिए परमेश्वर की इच्छा को अपने अनुभवों से मालुम करते रहने वाले भी होते जाएंगे। जो जो परमेश्वर हम पर प्रगट करता जाता है यदि हम उस पर फिर आगे भी बने रहते हैं, और उस पर चलते रहते हैं तो परमेश्वर फिर और बातें भी हम पर प्रगट करता जाता है। जो परमेश्वर की विदित इच्छानुसार उसकी सहमति और स्वीकृति में बना रहता है, वह परमेश्वर से आते समय के लिए मार्गदर्शन भी पाता रहता है।

   यदि भविष्य के लिए परमेश्वर की इच्छा जाननी है तो वर्तमान में उसकी प्रगट इच्छा की आज्ञाकारिता में रहना भी अनिवार्य है। - डेव ब्रैनन


यदि हम प्रतिदिन परमेश्वर से प्रेम करें और उसके आज्ञाकारी रहें तो वह स्वतः ही भविष्य की परतें भी हम पर खोलता चला जाएगा।

और इस संसार के सदृश न बनो; परन्तु तुम्हारी बुद्धि के नये हो जाने से तुम्हारा चाल-चलन भी बदलता जाए, जिस से तुम परमेश्वर की भली, और भावती, और सिद्ध इच्छा अनुभव से मालूम करते रहो। (रोमियों 12:2)

बाइबल पाठ: इफिसीयों 5:15-21
Ephesians 5:15 इसलिये ध्यान से देखो, कि कैसी चाल चलते हो; निर्बुद्धियों की नाईं नहीं पर बुद्धिमानों की नाईं चलो।
Ephesians 5:16 और अवसर को बहुमोल समझो, क्योंकि दिन बुरे हैं।
Ephesians 5:17 इस कारण निर्बुद्धि न हो, पर ध्यान से समझो, कि प्रभु की इच्छा क्या है?
Ephesians 5:18 और दाखरस से मतवाले न बनो, क्योंकि इस से लुचपन होता है, पर आत्मा से परिपूर्ण होते जाओ।
Ephesians 5:19 और आपस में भजन और स्‍तुतिगान और आत्मिक गीत गाया करो, और अपने अपने मन में प्रभु के साम्हने गाते और कीर्तन करते रहो।
Ephesians 5:20 और सदा सब बातों के लिये हमारे प्रभु यीशु मसीह के नाम से परमेश्वर पिता का धन्यवाद करते रहो।
Ephesians 5:21 और मसीह के भय से एक दूसरे के आधीन रहो।

एक साल में बाइबल: 
  • 2 शमूएल 9-11 
  • लूका 15:11-32