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बुधवार, 13 अक्टूबर 2021

मसीही विश्वास एवं शिष्यता - 13

 

मसीही विश्वासी के गुण - पश्चाताप (2)

 

पिछले लेख में हमने देखा था कि पतरस द्वारा पिन्तेकुस्त के दिन संसार भर से धार्मिक पर्व मनाने और व्यवस्था की विधि को पूरा करने के लिए आए हुएभक्त यहूदियों के हृदय छिद गए, और उन्हें इस बात का बोध हुआ कि उनकी यह धर्म-कर्म-रस्म की धार्मिकता उन्हें उद्धार या नया जन्म देने और परमेश्वर को स्वीकार्य बनाने के लिए पर्याप्त नहीं है। तब उन्होंने पतरस और अन्य प्रेरितों से इसके समाधान के विषय प्रश्न पूछा, और पतरस ने उद्धार या नया जन्म प्राप्त करने के लिए उन्हें जो प्रभु यीशु के शिष्यता का मार्ग बताया, उसका पहला कदम था अपने-अपने पापों से पश्चाताप करना और प्रभु का शिष्य हो जाने पर अपने पुराने जीवन की पापमय प्रवृत्तियों और व्यवहार से मन फिरा लेना। मन फिराव की इस बात के महत्व को हम और अधिक स्पष्टता से परमेश्वर के वचन में से इससे संबंधित पदों के उदाहरणों से समझ सकते हैं, जो मुख्यतः बाइबल के नए नियम में खण्ड में दिए गए हैं। बाइबल में दिए गए निम्न-लिखित कुछ उदाहरणों से हम देखते हैं कि उद्धार पाने और प्रभु यीशु का शिष्य या अनुयायी होने के लिए पापों से पश्चाताप और मन फिराव करने का विषय:

  • यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले के प्रचार का आरंभ थाउन दिनों में यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाला आकर यहूदिया के जंगल में यह प्रचार करने लगा कि मन फिराओ; क्योंकि स्वर्ग का राज्य निकट आ गया है” (मत्ती 3:1-2) 
  • प्रभु यीशु मसीह द्वारा पृथ्वी पर अपनी सेवकाई के आरंभ का प्रचार थायूहन्ना के पकड़वाए जाने के बाद यीशु ने गलील में आकर परमेश्वर के राज्य का सुसमाचार प्रचार किया। और कहा, समय पूरा हुआ है, और परमेश्वर का राज्य निकट आ गया है; मन फिराओ और सुसमाचार पर विश्वास करो” (मरकुस 1:14-15) 
  • प्रभु यीशु मसीह द्वारा अपने शिष्यों को पहले प्रचार पर भेजे जाने के समय उनके प्रचार का विषय थाऔर उन्होंने जा कर प्रचार किया, कि मन फिराओ”(मरकुस 6:12).
  • प्रभु यीशु द्वारा स्वर्गारोहण से ठीक पहले शिष्यों को संसार भर में प्रचार करने के लिए दिया गया विषयऔर यरूशलेम से ले कर सब जातियों में मन फिराव का और पापों की क्षमा का प्रचार, उसी के नाम से किया जाएगा” (लूका 24:47) 
  • पवित्र आत्मा प्राप्त करने के बाद शिष्यों द्वारा संसार भर से यरूशलेम आए भक्त यहूदियों के समक्ष किए गए पहले सुसमाचार प्रचार का विषयपतरस ने उन से कहा, मन फिराओ, और तुम में से हर एक अपने अपने पापों की क्षमा के लिये यीशु मसीह के नाम से बपतिस्मा ले; तो तुम पवित्र आत्मा का दान पाओगे” (प्रेरितों 2:38)
  • पतरस द्वारा यरूशलेम के इस्राएलियों के सामने किए गए प्रचार का विषयइसलिये, मन फिराओ और लौट आओ कि तुम्हारे पाप मिटाए जाएं, जिस से प्रभु के सम्मुख से विश्रान्ति के दिन आएं” (प्रेरितों 3:19) 
  • परमेश्वर द्वारा सारे संसार के सभी लोगों के लिए दी गई आज्ञा का विषयइसलिये परमेश्वर अज्ञानता के समयों में आनाकानी कर के, अब हर जगह सब मनुष्यों को मन फिराने की आज्ञा देता है” (प्रेरितों 17:30) 
  • पौलुस द्वारा यहूदियों और अन्य जातियों में किए जाने वाले प्रचार एवं सेवकाई का विषयवरन यहूदियों और यूनानियों के सामने गवाही देता रहा, कि परमेश्वर की ओर मन फिराना, और हमारे प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास करना चाहिए” (प्रेरितों 20:21); “परन्तु पहिले दमिश्क के, फिर यरूशलेम के रहने वालों को, तब यहूदिया के सारे देश में और अन्यजातियों को समझाता रहा, कि मन फिराओ और परमेश्वर की ओर फिर कर मन फिराव के योग्य काम करो” (प्रेरितों 26:20)
  • प्रकाशितवाक्य पुस्तक के 2 और 3 अध्याय में संबोधित कलीसियाओं को दिए गए चेतावनी के संदेशों का विषय (प्रकाशितवाक्य 2:5, 16, 21, 22; 3:3, 19) 
  • प्रकाशितवाक्य पुस्तक में परमेश्वर के प्रकोप और दंड को सहने का कारण - पश्चाताप न करना (प्रकाशितवाक्य 9:20, 21; 16:9, 11)
  • पुराने नियम के भविष्यद्वक्ताओं एवं परमेश्वर के सेवकों के प्रचार का विषय भी पश्चाताप या मन फिराव ही था, “और यद्यपि यहोवा तुम्हारे पास अपने सारे दासों अथवा भविष्यद्वक्ताओं को भी यह कहने के लिये बड़े यत्न से भेजता आया है कि अपनी अपनी बुरी चाल और अपने अपने बुरे कामों से फिरो: तब जो देश यहोवा ने प्राचीनकाल में तुम्हारे पित्रों को और तुम को भी सदा के लिये दिया है उस पर बसे रहने पाओगे; परन्तु तुम ने न तो सुना और न कान लगाया है” (यिर्मयाह 25:4-5) 

 

       प्रभु यीशु मसीह का अनुयायी होने का अर्थ है पुरानी बातों, विचारधाराओं, धारणाओं, व्यवहार आदि को छोड़कर, प्रभु यीशु मसीह की शिष्यता में एक पूर्णतः बदला हुआ नया जीवन जीनासो यदि कोई मसीह में है तो वह नई सृष्टि है: पुरानी बातें बीत गई हैं; देखो, वे सब नई हो गईं” (2 कुरिन्थियों 5:17); ऐसा जीवन जो किसी धर्म-कर्म-रस्म पर आधारित नहीं है, वरन परमेश्वर के वचन की आज्ञाकारिता पर आधारित है, जैसा कि प्रभु यीशु ने अपने शिष्यों से, उन्हें उलाहना देते हुए, स्वयं कहाजब तुम मेरा कहना नहीं मानते, तो क्यों मुझे हे प्रभु, हे प्रभु, कहते हो?” (लूका 6:46)। प्रभु की शिष्यता और आज्ञाकारिता के इस जीवन में उठाया गया पहल कदम स्वेच्छा एवं सच्चे मन से पश्चाताप करना है, पुराने सांसारिक जीवन से नए आत्मिक जीवन की ओर मुड़ जाना है। बिना सच्चे पश्चाताप के प्रभु का शिष्य न तो बना जा सकता है, और न उस शिष्यता को निभाया जा सकता है। मसीही विश्वासी या प्रभु यीशु के अनुयायी होने के लिए किसी धर्म परिवर्तन की नहीं, वरन पापमय प्रवृत्तियों से मन परिवर्तन की, और परिवर्तित जीवन का निर्वाह करने की आवश्यकता है। इसलिए यदि आपने अभी तक अपने आप को प्रभु यीशु मसीह की शिष्यता में समर्पित नहीं किया है, और आप अभी भी अपने एक परिवार विशेष में जन्म अथवा उस परिवार और अपने जन्म से संबंधित धर्म तथा उसकी रीतियों के पालन के आधार पर अपने आप को प्रभु का जन समझ रहे हैं, तो आपको भी अपनी इस गलतफहमी से बाहर निकलकर परमेश्वर के वचन बाइबल की सच्चाई (प्रेरितों 17:30) को स्वीकार करने और उसका पालन करने की आवश्यकता है। 

आज और अभी आपके पास अपनी अनन्तकाल की स्थिति को सुधारने का अवसर है; प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी। 

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • यशायाह 41-42     
  • 1 थिस्सलुनीकियों 1

मंगलवार, 12 अक्टूबर 2021

मसीही विश्वास एवं शिष्यता - 12

 

मसीही विश्वासी के गुण - पश्चाताप (1)

       पिछले लेखों में हमने परमेश्वर के वचन बाइबल की प्रेरितों के काम पुस्तक, जो प्रथम चर्च या मण्डली के आरंभ तथा गतिविधियों का संक्षिप्त इतिहास है, में से उस मण्डली के लोगों, अर्थात मसीही  विश्वासियों से संबंधित सात बातों को देखा, जिनमें से चार में वेलौलीनरहते थे, और पाँचवीं, बपतिस्मा लेना, प्रत्येक मसीही विश्वासी की ज़िम्मेदारी थी। साथ ही हमने यह भी देखा कि जो मसीही विश्वासियों के लिएलौलीनरहने वाली बातें है, उन्हें तथा बपतिस्मा लेने को मसीही या ईसाई धर्म का पालन करने वालों ने एक रीति या रस्म बना लिया है, और उन्हें उस गणित के समीकरण के समान देखते, सिखाते, और निभाते हैं, कि मसीही विश्वासी इन बातों का पालन करते हैं इसलिए इन बातों का पालन करने वाले भी स्वतः ही मसीही विश्वासी होंगे। इन धर्म-कर्म-रस्म का पालन करने में भरोसा रखने वालों ने उन बातों के निर्वाह के संबंध में अपने ही नियम और विधियाँ, जिनका बाइबल में कोई उल्लेख नहीं है, स्थापित कर के, इन बातों के निर्वाह करने को धर्म के निर्वाह के लिए एक अपेक्षित तथा वांछनीय औपचारिकता बना दिया है। किन्तु जैसे प्रभु यीशु मसीह ने अपने समय के धर्म के अगुवों से, उनके द्वारा मनुष्यों की बनाई हुई विधियों को परमेश्वर की बातें कहकर सिखाने को व्यर्थ उपासना करना कहा था, और चिताया था कि सब व्यर्थ बातें हटा दी जाएँगी (मत्ती 15:9, 13-14), वैसे ही आज भी प्रभु की यही बात वर्तमान में भी मनुष्यों के गढ़े हुए विधि-विधानों पर उतनी ही लागू है, उनके विषय उतनी ही सत्य है जितनी तब थी।

       हमने यह भी देखा था कि सच्चे मसीही विश्वासियों के इन सात गुणों के बारे में लोगों को बताए जाने का आरंभ, यरूशलेम में धार्मिक पर्व मनाने के लिए एकत्रित हुए भक्त यहूदियों के मध्य में प्रभु यीशु के शिष्यों द्वारा किए गए सुसमाचार प्रचार के बाद, उन भक्त यहूदियों द्वारा उठाए गए एक प्रश्न से हुआ था, “तब सुनने वालों के हृदय छिद गए, और वे पतरस और शेष प्रेरितों से पूछने लगे, कि हे भाइयो, हम क्या करें?” (प्रेरितों 2:37)। उनके इस प्रश्न के उत्तर में पतरस द्वारा दिए गए उत्तर में हम इन सात बातों को देखते हैं। हम सात में से उन पाँच बातों को देख चुके हैं, जिन्हें मसीही विश्वास के स्थान पर मसीही या ईसाई धर्म का पालन करने वाले औपचारिकता के रूप में निभाते रहते हैं, और समझते हैं कि ऐसा करने से वे भी मसीही विश्वासियों के समान उद्धार या नया जन्म पाए हुए हो गए हैं; जो परमेश्वर के वचन बाइबल के अनुसार एक बिल्कुल गलत धारणा है। आज हम शेष दो बातों, पश्चाताप करना और सांसारिकता से पृथक होने में से पहली बात, पश्चाताप करना, के बारे में कुछ विस्तार से देखेंगे। 

मूल यूनानी भाषा के जिस शब्द का अंग्रेजी अनुवाद ‘Repent’ और हिन्दी अनुवादमन फिराओकिया गया है, उसका शब्दार्थ हैबिलकुल भिन्न सोच या विचारधारा रखना। अर्थात किसी बात के लिए पश्चाताप करने का अर्थ है, उस बात के लिए अपनी सोच या विचारधारा को पूर्णतः बदल देना, और उसे परमेश्वर की सोच और विचारधारा के अनुरूप ले आना, जिससे वह परमेश्वर की सोच और विचारधारा से संगत हो जाए, परमेश्वर को स्वीकार्य हो जाए। पश्चाताप करना कोई औपचारिकता पूरी करना अथवा किसी धार्मिक रीति का निर्वाह करना नहीं है; यह पूरे मन से उस बात के प्रति अपनी समझ और व्यवहार को पूर्णतः परिवर्तित कर लेना है, अपनी भूतपूर्व सोच और विचारधारा से बिलकुल बदल कर, एक नई सोच और विचारधारा को स्वीकार करना और पालन करना है। संसार भर से आए हुए ये भक्त यहूदी यरूशलेम में इसलिए एकत्रित थे कि वे अपने धर्म और धार्मिक अनुष्ठानों के निर्वाह के द्वारा परमेश्वर की दृष्टि में भी धर्मी ठहरें और परमेश्वर को स्वीकार्य हो जाएं। किन्तु पवित्र शास्त्र में दी गई जिस व्यवस्था और बातों के आधार पर वे ऐसी धारणा रखे हुए थे, जब उसी पवित्र शास्त्र में से पतरस ने परमेश्वर पवित्र आत्मा की अगुवाई और सामर्थ्य से उनके मध्य में परमेश्वर को स्वीकार्य होने की वास्तविकता को रखा, तो उनकी आँखें खुल गईं। पतरस की बात सुनकर उनके हृदय छिद गए, उन्हें बोध हुआ कि उनकी यह धर्म-कर्म-रस्म की धार्मिकता उनके किसी काम की नहीं है, उसे निभाने के बाद भी वे परमेश्वर को वैसे ही अस्वीकार्य हैं, जैसे पहले थे। और तब, जब उन्हें परमेश्वर की दृष्टि में धर्मी एवं स्वीकार्य होने के लिए और कुछ नहीं सूझ पड़ा, तो उन्होंने पतरस तथा शेष प्रेरितों से ही पूछाहे भाइयों हम क्या करें?”

पतरस के उत्तर की सर्वप्रथम बात थी, ‘मन फिराओ’; अर्थात धार्मिकता के प्रति अपनी वर्तमान विचारधारा और व्यवहार से निकाल कर, अपने-अपने पापों की क्षमा, उद्धार, तथा परमेश्वर को स्वीकार्य धार्मिकता की समझ एवं निर्वाह के लिए प्रभु यीशु मसीह द्वारा किए गए कार्य को स्वीकार करो; अपने जीवन में उसका पालन करो। पतरस द्वारा दिए गए इस उत्तर में निहित है कि मसीही विश्वास और परमेश्वर को स्वीकार्य धार्मिकता के जीवन का आरंभ प्रत्येक व्यक्ति द्वारा व्यक्तिगत रीति से अपने जीवन में विद्यमान पापों का अंगीकार करने, फिर उनके लिए प्रभु यीशु मसीह से क्षमा माँगने के द्वारा होता है। यह करने के पश्चात, जिन बातों से उसके जीवन में पाप को प्रवेश और पैठ मिलती है उनसे संबंधित अपने विचारों और व्यवहारों के मार्ग को दृढ़ निश्चय के साथ पूर्णतः छोड़ देना है। साथ ही, प्रभु यीशु मसीह की शिष्यता में उनके द्वारा दिखाए गए मार्ग पर चल निकलने तथा हर परिस्थिति का सामना करते हुए चलते ही रहने के लिए कटिबद्ध हो जाना है।  

आज के मसीही या ईसाई समाज में ऐसी कितनी ही बातों, रीति-रिवाजों, त्यौहारों, आदि को मानने और मनाने पर ज़ोर दिया जाता है, जिनका उल्लेख भी बाइबल में नहीं है, और जिनके लिए प्रभु यीशु अथवा पवित्र आत्मा ने कभी कोई शिक्षा नहीं दी है। फिर भी उन्हें बहुत उत्साह और लग्न से माना और मनाया जाता है; यहाँ तक कि यदि कोई उन बातों को न माने या मनाए, अथवा उनके मानने और मनाने के बारे में कोई प्रश्न उठाए, तो उसे विधर्मी समझा जाता है, उसके मसीही होने पर संदेह किया जाता है। किन्तु पश्चाताप और मन फिराव जैसे महत्वपूर्ण विषय को, जो बाइबल के अनुसार मसीही विश्वास में प्रवेश का, उद्धार एवं पापों की क्षमा प्राप्त करने के लिए व्यक्ति द्वारा उठाया जाने वाला पहला कदम है, उसके बारे में न बताया या सिखाया जाता है, और न ही इसके महत्व के बारे में शिक्षा दी जाती है। अगले लेख में हम इस बात के परम-महत्व को समझने के लिए परमेश्वर के वचन बाइबल में से पश्चाताप या मन फिराव से संबंधित कुछ पदों को देखेंगे।

यदि आप ने अभी तक अपने पापों से पश्चाताप नहीं किया है, अपना जीवन स्वेच्छा और सच्चे मन प्रभु यीशु को समर्पित नहीं किया है, तो आज और अभी आपके पास अपनी अनन्तकाल की स्थिति को सुधारने का अवसर है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी। 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • यशायाह 39-40     
  • कुलुस्सियों

सोमवार, 11 अक्टूबर 2021

मसीही विश्वास एवं शिष्यता - 11


मसीही विश्वासी के गुण

       पिछले लेखों में हमने परमेश्वर के वचन बाइबल की प्रेरितों के काम पुस्तक, जो प्रथम चर्च या मण्डली के आरंभ तथा गतिविधियों का संक्षिप्त इतिहास है, में से उस मण्डली के लोगों से संबंधित पाँच बातों को देखा, जिनमें वेलौलीनरहते थे। साथ ही हमने यह भी देखा कि जो मसीही विश्वासियों के लिएलौलीनरहने वाली बातें है, उन्हीं को मसीही या ईसाई धर्म का पालन करने वालों ने एक रीति या रस्म बना लिया है, और उन्हें उस गणित के समीकरण के समान देखते, सिखाते, और निभाते हैं, कि मसीही विश्वासी इन बातों का पालन करते हैं इसलिए इन बातों का पालन करने वाले भी स्वतः ही मसीही विश्वासी होंगे। इन धर्म-कर्म-रस्म का पालन करने में भरोसा रखने वालों ने उन बातों के निर्वाह के संबंध में अपने ही नियम और विधियाँ, जिनका बाइबल में कोई उल्लेख नहीं है, स्थापित कर के, इन बातों के निर्वाह करने को धर्म के निर्वाह के लिए एक अपेक्षित तथा वांछनीय औपचारिकता बना दिया है। किन्तु जैसे प्रभु यीशु मसीह ने अपने समय के धर्म के अगुवों से, उनके द्वारा मनुष्यों की बनाई हुई विधियों को परमेश्वर की बातें कहकर सिखाने को व्यर्थ उपासना करना कहा था, “और ये व्यर्थ मेरी उपासना करते हैं, क्योंकि मनुष्यों की विधियों को धर्मोपदेश कर के सिखाते हैं” (मत्ती 15:9), वैसे ही आज भी प्रभु की यही बात वर्तमान में भी मनुष्यों के गढ़े हुए विधि-विधानों पर उतनी ही लागू है, उनके विषय उतनी ही सत्य है जितनी तब थी। प्रभु ने उन बातों और उनके औपचारिक निर्वाह की शिक्षा देने वालों के लिए एक और बात भी कही थी, और वो भी आज के लिए उतनी ही महत्वपूर्ण है, “उसने उत्तर दिया, हर पौधा जो मेरे स्वर्गीय पिता ने नहीं लगाया, उखाड़ा जाएगा। उन को जाने दो; वे अन्धे मार्ग दिखाने वाले हैं: और अन्‍धा यदि अन्धे को मार्ग दिखाए, तो दोनों गड़हे में गिर पड़ेंगे” (मत्ती 15:13-14)

       प्रेरितों 2 अध्याय में, परमेश्वर पवित्र आत्मा के सामर्थ्य प्राप्त करने के तुरंत बाद यरूशलेम में संसार के विभिन्न भागों से पर्व मनाने के लिए एकत्रितभक्त यहूदियोंको प्रेरित पतरस द्वारा किया गया प्रथम सुसमाचार प्रचार दर्ज है। पतरस द्वारा किए गए इस सुसमाचार प्रचार की प्रतिक्रिया में, लिखा है, “तब सुनने वालों के हृदय छिद गए, और वे पतरस और शेष प्रेरितों से पूछने लगे, कि हे भाइयो, हम क्या करें?” (प्रेरितों 2:37)। उनके इस प्रश्न का पतरस द्वारा दिया गया उत्तर थापतरस ने उन से कहा, मन फिराओ, और तुम में से हर एक अपने अपने पापों की क्षमा के लिये यीशु मसीह के नाम से बपतिस्मा ले; तो तुम पवित्र आत्मा का दान पाओगे। क्योंकि यह प्रतिज्ञा तुम, और तुम्हारी सन्तानों, और उन सब दूर दूर के लोगों के लिये भी है जिन को प्रभु हमारा परमेश्वर अपने पास बुलाएगा। उसने बहुत और बातों में भी गवाही दे देकर समझाया कि अपने आप को इस टेढ़ी जाति से बचाओ” (प्रेरितों 2:38-40)। यहाँ हम पवित्र आत्मा की अगुवाई में पतरस द्वारा उन मसीही विश्वासियों के करने के लिए कही गई तीन बातों को देखते हैं:मन फिराओ”, “बपतिस्मा लो”, औरअपने आप को इस टेढ़ी जाति से बचाओ। दिए गए क्रम के अनुसार, मसीही विश्वासी, या प्रभु यीशु मसीह का अनुयायी हो जाने के लिए उठाया जाने वाला पहला कदम है व्यक्ति के द्वारा मन-फिराव, अर्थात पापों से पश्चाताप करके, पापी जीवन से मुँह मोड़ लेना, और उन बातों को छोड़ देना। फिर दूसरा कदम है अपने मन-फिराव के निर्णय को लोगों पर बपतिस्मा लेने के द्वारा प्रकट करना, और तब तीसरा कदम है अपने इस बदले हुए मन और जीवन के अनुसार अपनी संगति को सुधारना और उन लोगों से पृथक हो जाना जो वापस उन्हीं बुराइयों और सांसारिकता की बातों में ले जा सकते हैं - अपने आप को इस टेढ़ी जाति से बचाओ 

       जो मसीही विश्वासी बन जाते हैं, फिर वे प्रेरितों 2:42 की चारों बातों में, जिन्हें हम देख चुके हैं, लौलीन रहते हैं। अर्थात, हमें यहाँ पर परमेश्वर पवित्र आत्मा ने पतरस के द्वारा मसीही विश्वासी हो जाने के सात चिह्न प्रदान किए हैं:

  1. स्वेच्छा से मन-फिराव का निर्णय ले लेना 
  2. अपने बदले हुए जीवन की गवाही के लिए बपतिस्मा लेना 
  3. बदले हुए जीवन की सुरक्षा और अपनी आत्मिक उन्नति के लिए बुरी संगति और बातों से अपने आप को पृथक कर लेना 

प्रभु परमेश्वर और व्यावहारिक मसीही जीवन को जानने, उसमें बढ़ने, और उसे जीने के लिए:

    4.        बाइबल की शिक्षा लेते रहना 

    5.        अन्य मसीही विश्वासियों की संगति में बने रहना 

    6.        प्रभु-भोज में नियमित भाग लेते रहना 

    7.        प्रार्थना में लगे रहना 

        उपरोक्त सभी बातों से स्पष्ट है कि बाइबल के अनुसार मसीही विश्वास का जीवन किसी धर्म के निर्वाह का जीवन नहीं है, वरन प्रभु यीशु की शिष्यता और आज्ञाकारिता का जीवन है। साथ ही मसीही विश्वासी या प्रभु यीशु के अनुयायी होने के लिए किसी धर्म परिवर्तन की नहीं, वरन मन परिवर्तन की, और परिवर्तित जीवन का निर्वाह करने की आवश्यकता है। इसलिए यदि आपने अभी तक अपने आप को प्रभु यीशु मसीह की शिष्यता में समर्पित नहीं किया है, और आप अभी भी अपने एक परिवार विशेष में जन्म अथवा उस परिवार और अपने जन्म से संबंधित धर्म तथा उसकी रीतियों के पालन के आधार पर अपने आप को प्रभु का जन समझ रहे हैं, तो आपको भी अपनी इस गलतफहमी से बाहर निकलकर परमेश्वर के वचन बाइबल की सच्चाई को स्वीकार करने और उसका पालन करने की आवश्यकता है। 

आज और अभी आपके पास अपनी अनन्तकाल की स्थिति को सुधारने का अवसर है; प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी। 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • यशायाह 37-38     
  • कुलुस्सियों

रविवार, 10 अक्टूबर 2021

मसीही विश्वास एवं शिष्यता - 10


बपतिस्मा - गणित का समीकरण? (6)   

पिछले लेखों में हमने देखा कि मसीही विश्वास के स्थान पर मसीही या ईसाई धर्म का निर्वाह करने वाले प्रेरितों 2:42 में दी गई मसीही विश्वासियों के लिएलौलीनरहने वाली चार बातों (वचन की शिक्षा पाना, संगति रखना, प्रभु-भोज में सम्मिलित होना, प्रार्थना करना) को उद्धार या नया जन्म प्राप्त कर लेने के लिए गणित के एक समीकरण के समान, एक रस्म के समान मान तथा मना लेते हैं। वे इन चारों बातों के वास्तविक महत्व को समझने और उसके आधार पर प्रभु की आज्ञाकारिता में उनका निर्वाह करने की बजाए एक रीति के समान इनकी औपचारिकता को पूरा करने के द्वारा समझते हैं कि वे भी नया जन्म या उद्धार पाए हुए हैं। किन्तु बाइबल की शिक्षाओं के अनुसार उनका यह मान्यता रखना एक सर्वथा गलत धारणा ही है, तथा धर्म-कर्म-रस्म के निर्वाह द्वारा प्रभु परमेश्वर की दृष्टि में स्वीकार्य होने के लिए उनका एक व्यर्थ एवं निष्फल प्रयास हैं। पिछले लेखों में हम प्रेरितों 2:42 की चारों बातों के औपचारिक निर्वाह के बारे में देख चुके हैं। आज हम प्रेरितों 2 अध्याय में स्थापित हुई पहली मण्डली के लोगों के साथ तब जुड़ी, और आज मसीही विश्वासियों तथा ईसाई धर्म-समाज के साथ भी घनिष्ठता से जुड़ी एक और बात के बारे में कुछ और विस्तार से देखेंगे, जिसे भी गणित के समीकरण के समान लेकर, उसके विषय भी गलत धारणा बना ली गई है, और उसे मनुष्यों द्वारा दिए गए भिन्न स्वरूपों में बड़ी निष्ठा से निभाया भी जाता है, बिना यह देखे और विचारे कि बाइबल में उसके बारे में क्या कुछ लिखा और सिखाया गया है। यह पाँचवीं बात है बपतिस्मा।  

5. बपतिस्मा: प्रभु यीशु मसीह और बाइबल की शिक्षा है कि जो प्रभु यीशु मसीह का शिष्य बने उसे ही बपतिस्मा दिया जाएइसलिये तुम जा कर सब जातियों के लोगों को चेला बनाओ और उन्हें पिता और पुत्र और पवित्रआत्मा के नाम से बपतिस्मा दो” (मत्ती 28:19)। अर्थात बपतिस्मा उनके लिए है जो प्रभु यीशु का शिष्य बनना स्वीकार करता है, जो अपने इस मसीही विश्वास के द्वारा प्रभु का जन बन जाता है। जब हम यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले के द्वारा पहले दिए जा रहे बपतिस्मे के बारे में देखते हैं, और फिर बाद में प्रभु यीशु की उपरोक्त आज्ञाकारिता में उनके शिष्यों के द्वारा दिए जाने वाले बपतिस्मे के बारे में देखते हैं, तो यह प्रकट है कि बाइबल में तो बपतिस्मा केवल उन्हें ही दिया गया जो पापों के लिए पश्चाताप और प्रभु के प्रति सच्चे समर्पण के साथ बपतिस्मा लेने के उद्देश्य से स्वेच्छा से आए। यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले ने अपनी सेवकाई का आरंभ मन फिराव के आह्वान के साथ किया (मत्ती 3:2); और यही प्रभु यीशु ने भी किया (मरकुस 1:15)। यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले के प्रचार को मानकर जो लोग अपने पापों का अंगीकार करते थे, उन्हें वह बपतिस्मा देता था (मत्ती 3:5, 6) - यूहन्ना उन्हें बपतिस्मा देने के लिए नहीं जाता था, लोग स्वतः बपतिस्मा लेने के लिए यूहन्ना के पास आते थे। किन्तु जब कपटी फरीसी और सदूकी, पाखण्ड में होकर उससे बपतिस्मा लेने के लिए आए, तो उसने उनकी भर्त्सना की और पहले मन फिराने के लिए कहा (मत्ती 3:7-8)। यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले ने स्पष्ट कहा कि वहमन फिराव का बपतिस्मादेता था (मत्ती 3:11)। प्रभु यीशु मसीह ने भी अपने शिष्यों से उन्हें ही बपतिस्मा देने के लिए कहा जो पहले स्वेच्छा से उसके शिष्य बनना स्वीकार कर चुके थे (मत्ती 28:19-20), और हम पहले देख चुके हैं कि प्रभु यीशु का शिष्य बनने के लिए व्यक्ति को पहले अपने पापों से पश्चाताप करना अनिवार्य है। अर्थात प्रभु यीशु द्वारा दिए गए बपतिस्मा देने और लेने के निर्देश में पहले व्यक्ति द्वारा पश्चाताप करना अनिवार्यतः निहित है। यही बात, अपने आप में, शिशुओं या बच्चों के, तथा चर्च की रीति पूरी करने के लिए बपतिस्मा देने या लेने को निषेध कर देती है। 

संपूर्ण बाइबल में कहीं भी किसी शिशु अथवा बच्चे को बपतिस्मा देने का कोई उदाहरण नहीं है; जिनका भी बपतिस्मा होने के उदाहरण हैं वे सभी वयस्क थे और उन्होंने स्वेच्छा से पापों से पश्चाताप करने के पश्चात ही बपतिस्मा लिया। साथ ही जहां कहीं भी बपतिस्मा दिए जाने का उल्लेख है, वहाँ यह भी स्पष्ट संकेत है कि वह पानी के छिड़काव या माथे पर पानी से चिह्न बना देने के द्वारा नहीं, वरन किसी नदी या बहुत जल के स्थान पर पानी के अंदर उतर कर, फिर पानी में से बाहर आने, अर्थात डुबकी के द्वारा दिया गया बपतिस्मा था (मत्ती 3:16; यूहन्ना 1:28; 3:23; प्रेरितों 8:36-39)। और न ही बाइबल में किसी दृढ़ीकरण या confirmation की कोई बात, आवश्यकता, अथवा विधि दी गई है। 

किन्तु इससमीकरणवाली धारणा के अधीन, लोग सामान्यतः यही मान लेते हैं कि किसी भी आयु में, किसी भी प्रकार काबपतिस्मालेने से वे मसीह के जन, उसके शिष्य, और उद्धार या नया जन्म पाए हुए व्यक्ति बन जाते हैं; जो कदापि सत्य नहीं है, बाइबल और प्रभु यीशु की शिक्षा नहीं है। बपतिस्मा न तो नया जन्म देता है, न उद्धार और पापों की क्षमा देता है, और न ही प्रभु यीशु का शिष्य बनाता है। प्रत्येक चर्च अथवा मण्डली में ऐसे कितने ही लोग मिल जाएंगे, जिन्होंने एक रस्म या रीति के तौर पर बपतिस्मा तो लिया और उससे संबंधित विधि-विधान तो पूरे किए, किन्तु सच्चे मन से पापों से पश्चाताप नहीं किया, न ही प्रभु यीशु मसीह को अपना उद्धारकर्ता ग्रहण किया। उनके जीवन, आदतें, बोल-चाल, व्यवहार, यदि सभी कुछ दिखा देते हैं कि वे वास्तव में उद्धार पाए हुए नहीं हैं। उनके बपतिस्मे ने उनका जीवन नहीं बदला; वे अभी भी अपने पापों ही में जी रहे हैं। उद्धार या नया जन्म पाए हुए व्यक्ति के लिए बपतिस्मा प्रभु का निर्देश है; किन्तु हर बपतिस्मा पाया हुआ व्यक्ति उद्धार पाया हुआ और प्रभु का जन नहीं होता है - मनुष्यों द्वारा गढ़ी और लागू की गई इस गलत धारणा की बाइबल में कहीं कोई समर्थन अथवा पुष्टि नहीं है।

आज मसीही विश्वास के स्थान पर ईसाई धर्म को मानने और मनाने वाले लोग बड़ी निष्ठा और लगन से किन्तु गलत धारणा और विचारधारा के साथ प्रभु भोज और बपतिस्मे में सम्मिलित तो होते हैं, किन्तु यह नहीं जानते और समझते हैं कि यदि उन्होंने पापों से पश्चाताप नहीं किया है, प्रभु यीशु को स्वेच्छा से अपना उद्धारकर्ता ग्रहण नहीं किया है, सच्चे मन से उसके शिष्य नहीं बने हैं, तो यह सब उनके लिए व्यर्थ और निष्फल है; वे अभी भी अपने पापों में पड़े हुए हैं और अनन्त विनाश के मार्ग पर ही अग्रसर हैं। इसलिए यदि आपने अभी तक अपने आप को प्रभु यीशु मसीह की शिष्यता में समर्पित नहीं किया है, और आप अभी भी अपने एक परिवार विशेष में जन्म अथवा उस परिवार और अपने जन्म से संबंधित धर्म तथा उसकी रीतियों के पालन के आधार पर अपने आप को प्रभु का जन समझ रहे हैं, तो आपको भी अपनी इस गलतफहमी से बाहर निकलकर परमेश्वर के वचन बाइबल की सच्चाई को स्वीकार करने और उसका पालन करने की आवश्यकता है। 

आज और अभी आपके पास अपनी अनन्तकाल की स्थिति को सुधारने का अवसर है; प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • यशायाह 34-36     
  • कुलुस्सियों 2

शनिवार, 9 अक्टूबर 2021

मसीही विश्वास एवं शिष्यता - 9


प्रभु भोज - गणित का समीकरण? (5)    

    पिछले लेखों में हम देख रहें हैं कि मसीही विश्वास के स्थान पर मसीही या ईसाई धर्म का निर्वाह करने वाले प्रेरितों 2:42 में दी गई मसीही विश्वासियों के लिएलौलीनरहने वाली चार बातों (वचन की शिक्षा पाना, संगति रखना, प्रभु-भोज में सम्मिलित होना, प्रार्थना करना) को उद्धार या नया जन्म प्राप्त कर लेने के लिए गणित के एक समीकरण के समान, एक रस्म के समान मान तथा मना लेते हैं; और इनके वास्तविक महत्व को समझने और उसके आधार पर उनका निर्वाह करने की बजाए इनकी औपचारिकता को पूरा करने के द्वारा समझते हैं कि वे भी नया जन्म या उद्धार पाए हुए हैं। किन्तु बाइबल की शिक्षाओं के अनुसार यह मान्यता रखना गलत धारणा ही है, और यह करना धर्म-कर्म-रस्म के निर्वाह द्वारा प्रभु परमेश्वर को स्वीकार्य होने के व्यर्थ एवं निष्फल प्रयास हैं। पिछले लेख में हम प्रेरितों 2:42 की चार में से तीन बातों, बाइबल अध्ययन, प्रार्थना करना, और संगति रखना के औपचारिक निर्वाह के बारे में देख चुके हैं। आज हम प्रेरितों 2:42 की शेष एक बात, प्रभु-भोज में सम्मिलित होने के बारे में कुछ और विस्तार से देखेंगे।  

4.  प्रभु-भोज में भाग लेना: प्रभु यीशु मसीह ने अपने पकड़वाए जाने से पहले अपने शिष्यों के साथ फसह का पर्व मनाया, और उस भोज को खाने के दौरान उन्होंने अपने शिष्यों के लिए प्रभु-भोज की स्थापना की, जैसा कि पौलुस ने लिखा:क्योंकि यह बात मुझे प्रभु से पहुंची, और मैं ने तुम्हें भी पहुंचा दी; कि प्रभु यीशु ने जिस रात वह पकड़वाया गया रोटी ली। और धन्यवाद कर के उसे तोड़ी, और कहा; कि यह मेरी देह है, जो तुम्हारे लिये है: मेरे स्मरण के लिये यही किया करो। इसी रीति से उसने बियारी के पीछे कटोरा भी लिया, और कहा; यह कटोरा मेरे लहू में नई वाचा है: जब कभी पीओ, तो मेरे स्मरण के लिये यही किया करो” (1 कुरिन्थियों 11:23-25)। उद्धार, या नया जन्म, तथा पापों की क्षमा पाया हुआ व्यक्ति, प्रभु की आज्ञा के अनुसार अपने आप को जाँचते हुए प्रभु भोज में भाग लेता है। किन्तु जैसे अन्य तीनों बातों के साथ है, वैसे ही प्रभु भोज के साथ भी है, कि बहुत से लोग इसे केवल एक रस्म के समान समझकर, केवल एक रीति को पूरी करने के लिए प्रभु-भोज में भाग लेते हैं, इस विचार से कि इसके द्वारा वे परमेश्वर के दृष्टि में धर्मी ठहरेंगे, और अपने लिए स्वर्ग में कुछ प्रतिफल अर्जित कर लेंगे। जबकि यह उसीसमीकरणवाली मानसिकता के अधीन, केवल उनकी धारणा ही है, यथार्थ, या बाइबल की अथवा प्रभु यीशु की शिक्षा नहीं। 

जब प्रभु ने अपने पकड़वाए जाने से ठीक पहले प्रभु भोज की स्थापना की, उस समय केवल उसके चुने हुए वे बारह शिष्य ही उसके साथ थे, जिनमें से एक यहूदा इस्करियोती भी था, जो उसे पकड़वाने का निर्णय ले चुका था और यह करने के लिए पूर्णतः तैयार था। भोजन के आरंभ होने पर प्रभु यीशु ने उसे भोजन का पहला टुकड़ा दिया, जो उसके प्रति प्रभु के प्रेम का प्रतीक था, और तब यहूदा वहाँ से चला गया (यूहन्ना 13:26-30)प्रभु-भोज के लिए रोटी तोड़ कर शिष्यों को देना और प्याला लेकर उन शिष्यों को देना प्रभु ने भोजन के दौरान, बियारी के पीछे (बियारीका अर्थ मुख्य भोजन है) किया (मत्ती 26:26-29; मरकुस 14:22, 23; लूका 22:20)। अर्थात प्रभु-भोज की स्थापना किए जाने के समय यहूदा इस्करियोती उनके मध्य में नहीं था। उसे मुख्य भोजन में तो हिस्सा मिला, अपितु उस मुख्य भोजन का पहला टुकड़ा प्रभु ने उसे ही दिया; किन्तु उसे मुख्य भोज के बाद स्थापित प्रभु-भोज में भाग नहीं मिला, वह तब तक प्रभु को छोड़ कर उसे पकड़वाने के लिए जा चुका था। अर्थात, मन में या व्यवहार में पाप रखने वाले व्यक्ति के लिए प्रभु-भोज में भाग नहीं है। इसीलिए 1 कुरिन्थियों 11:17-34, जो प्रभु भोज से संबंधित व्याख्या है, में 28 पद में स्पष्ट कहा गया है कि प्रभु-भोज में भाग लेने से पहले प्रत्येक व्यक्ति अपने आप को व्यक्तिगत रीति से जाँच ले, और अपने आप को प्रभु के सामने सही करके, अपने पापों को मान कर, उनके लिए पश्चाताप करके ही इसमें भाग ले। फिर पद 29-32 बताते हैं कि जो अपने आप को जाँचे और सुधारे बिना प्रभु भोज में भाग लेते हैं वे दंड के भागी हैं, और इस कारण कई तोसोभी गए अर्थात उन्हें अनुचित भाग लेते रहने के कारण मृत्यु को भी सहना पड़ा।

किन्तु प्रभु भोज में भाग लेने से पहले अपने आप को और अपने जीवन को प्रभु के सम्मुख जाँचना और सभी बातों को प्रभु के साथ ठीक करके, सही रीति से भाग लेना भी आज एक औपचारिकता बन कर रह गई है। बिना उद्धार या नया जन्म, और पापों की क्षमा पाए हुए लोग भी अपने धार्मिक अगुवे के पीछे-पीछे उनकी किताबों में छपी हुई रीतियों को बोलते और दोहराते हैं, और समझते हैं कि सब सही हो गया, फिर जाकर प्रभु भोज में भाग ले लेते हैं; और फिर वहाँ से बाहर निकलकर जीवन वैसा ही सांसारिकता में चलता रहता है जैसा पहले चल रहा था। साथ ही हम यह भी देखते हैं कि पहली मण्डली के लोग प्रतिदिन घर-घर मन की सिधाई से रोटी तोड़ते थे (प्रेरितों 2:46); जो फिर सप्ताह के पहले दिन जब वे लोग आराधना और उपासना के लिए एकत्रित होते थे, तब होने लगा (प्रेरितों 20:7)। किन्तु आज अधिकांश चर्च में यह महीने में एक बार किया जाता है, जिसका बाइबल में कोई समर्थन नहीं है; और कहीं-कहीं तो वर्ष में एक बार भी किया जाता है, जिसका भी बाइबल से कोई समर्थन अथवा औचित्य नहीं है। यदि व्यक्ति को प्रभु भोज में भाग लेने से पहले अपने आप को जाँचना है, अपने जीवन का पुनःअवलोकन करके अपनी कमियों और बुराइयों को प्रभु के सामने मानना है, तो प्रतिदिन अथवा सप्ताह में एक बार प्रभु-भोज का औचित्य समझ में आता है, क्योंकि इतना समय-अंतराल जीवन के पुनःअवलोकन करने के लिए उपयुक्त है। किन्तु महीने या वर्ष में एक बार यदि यह करना है, तो व्यक्ति कैसे सभी कुछ स्मरण कर सकता है और फिर गलतियों को पहचान कर उन्हें मान सकता है? ऐसे में तो प्रभु-भोज का औचित्य तथा कारण व्यर्थ हो जाते हैं और यह मात्र एक औपचारिकता ही रह जाता है - जिसका निर्वाह इसी रूप में अधिकांशतः किया भी जाता है, न कि उसकी गंभीरता और उसके सही अभिप्राय के साथ। 

फिर वही गणित के समीकरण की मानसिकता, मसीही विश्वासी को प्रभु भोज में भाग लेना है; इसलिए प्रभु भोज में भाग लेने वाला भी मसीही विश्वासी है। ऐसे लोगों में इस भोज के महत्व की कोई समझ नहीं, इसके प्रति कोई गंभीरता नहीं; एक रस्म पूरी करनी थी, सो कर ली, इसलिए अब यह मान लिया जाता है कि क्योंकि उन्होंने प्रभु-भोज में भाग ले लिया है इसलिए प्रभु भी उन्हें स्वीकार करने और आशीष देने के लिए बाध्य हो गया है। किन्तु प्रभु परमेश्वर किसी मनुष्य के कर्म से कुछ करने के लिए बाध्य नहीं होता है, और न मनुष्य के चलाए चलता है। यह मानसिकता रखने वाले लोग 1 कुरिन्थियों 11:29 के अनुसार, अपने लिए आशीष नहीं, श्राप कमा रहे हैं, और उन्हें एक दिन इसके लिए बहुत गंभीर परिस्थिति का सामना करना पड़ेगा।

आज प्रभु भोज में सम्मिलित होने के बारे में देखने के बाद, अगले लेख में परमेश्वर के वचन बाइबल की शिक्षाओं में से हम ऐसे ही बड़ी लगन से किन्तु गलत मानसिकता के साथ निभाए जाने वाली एक अन्य बात, बपतिस्मे को देखेंगे। किन्तु यदि आपने अभी तक अपने आप को प्रभु यीशु मसीह की शिष्यता में समर्पित नहीं किया है, और आप अभी भी अपने जन्म अथवा संबंधित धर्म तथा उसकी रीतियों के पालन के आधार पर अपने आप को प्रभु का जन समझ रहे हैं, तो आपको भी अपनी इस गलतफहमी से बाहर निकल कर सच्चाई को स्वीकार करने और उसका पालन करने की आवश्यकता है। आज और अभी आपके पास अपनी अनन्तकाल की स्थिति को सुधारने का अवसर है; प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • यशायाह 32-33    
  • कुलुस्सियों 1

शुक्रवार, 8 अक्टूबर 2021

मसीही विश्वास एवं शिष्यता - 8

 

संगति रखना - गणित का समीकरण? (4) 

पिछले लेख में हमने देखा कि मसीही विश्वास के स्थान पर मसीही या ईसाई धर्म का पालन करने वाले प्रेरितों 2:42 की चारों बातों (वचन की शिक्षा पाना, संगति रखना, प्रभु-भोज में सम्मिलित होना, प्रार्थना करना) को उद्धार या नया जन्म प्राप्त कर लेने के लिए गणित के एक समीकरण के समान, एक रस्म के समान लेते हैं और इनके वास्तविक महत्व को समझने और उसका निर्वाह करने की बजाए इनकी औपचारिकता को पूरा करने के द्वारा समझते हैं कि वे भी नया जन्म या उद्धार पाए हुए हैं। किन्तु बाइबल की शिक्षाओं के अनुसार यह मान्यता रखना गलत धारणा ही है, और यह करना धर्म-कर्म-रस्म के निर्वाह वाले भले जीवन और भले कामों वाले आरंभिक उदाहरण के समान, प्रभु परमेश्वर को स्वीकार्य होने के लिए, बिल्कुल भी उपयोगी नहीं हैं। पिछले लेख में हम प्रेरितों 2:42 की चार में से दो बातों, बाइबल अध्ययन और प्रार्थना के औपचारिक निर्वाह के बारे में देख चुके हैं। आज हम प्रेरितों 2:42 की शेष दो बातों में से एक और, संगति रखने के बारे में कुछ और विस्तार से देखेंगे।   

3. संगति रखना: आरंभिक मसीही विश्वासी जिन बातों में प्रेरितों 2:42 के अनुसार ‘लौलीन’ रहते थे, उनमें से एक परस्पर संगति रखना भी था। इसी 42 पद के बाद, पद 44 से 46 में, उस आरंभिक मण्डली में इस संगति रखने के अर्थ को सजीव उदाहरण से बताया गया है। उनके लिए लिखा गया है, “और वे सब विश्वास करने वाले इकट्ठे रहते थे, और उन की सब वस्तुएं साझे की थीं। और वे अपनी अपनी सम्पत्ति और सामान बेच बेचकर जैसी जिस की आवश्यकता होती थी बांट दिया करते थे। और वे प्रति दिन एक मन हो कर मन्दिर में इकट्ठे होते थे, और घर घर रोटी तोड़ते हुए आनन्द और मन की सिधाई से भोजन किया करते थे” (प्रेरितों 2:44-46)। यद्यपि इसके बाद यह बात फिर कभी किसी अन्य मण्डली में न देखने को मिली, और न ही इसका उदाहरण बनाकर कभी कहीं कोई शिक्षा दी गई, न ऐसा करते रहने के लिए कभी कहा गया; किन्तु उन लोगों की संगति एक घनिष्ठ आत्मीयता, परस्पर प्रेम के साथ परिवार के समान रहने की बात थी। मण्डली या चर्च के लोगों का परस्पर संगति रखने का महत्व एक-दूसरे से सीखने, एक-दूसरे की आत्मिक और साँसारिक स्थिति तथा परिस्थितियों से अवगत होने और एक-दूसरे के लिए समय और परिस्थिति के अनुसार सहायक होने, एक-दूसरे के लिए प्रार्थना करने, आदि के लिए तब भी था और आज भी है। 

हम पौलुस की पत्रियों से देखते हैं कि वह उन मसीही विश्वासियों के लिए भी प्रभु में आनंदित होता था और प्रार्थनाएँ करता था, जिनसे वह कभी मिला भी नहीं था बस उनके बारे में सुना ही था (कुलुससियों 1:3, 4, 9)। इसी प्रकार से यरूशलेम में स्थित आरंभिक कलीसिया के अगुवों ने जब इस्राएल के क्षेत्र से बाहर अन्य-जातियों के मध्य पौलुस की सेवकाई के बारे में जाना, तो उन्होंने भी उसकी सेवकाई को अपनी सेवकाई के समान स्वीकार किया और उसका अनुमोदन एवं समर्थन किया (गलातियों 2:7-10)। हम परस्पर मेल-मिलाप और आदर के बारे में एक और बहुत महत्वपूर्ण बात भी देखते हैं, पौलुस ने पतरस का उसकी गलती के लिए उसके मुँह पर सामना किया (गलातियों 2:11-14); किन्तु इससे पतरस और पौलुस में विरोध या टकराव अथवा विभाजन उत्पन्न नहीं हुआ, वरन बाद में पतरस अपनी पत्री में पौलुस की और उसके मसीही ज्ञान की सराहना करता है, उसे प्रिय भाई कहकर संबोधित करता है (2 पतरस 3:15-16)। मसीही विश्वासियों की इस व्यावहारिक एक-मनता के सामने आज के मसीहियों की औपचारिक परस्पर संगति और एक-दूसरे की देख-भाल कितनी फीकी और छिछली है, पाखण्ड के समान है। 

इन अंत के दिनों के लिए, जिनमें हम रह रहे हैं, परस्पर संगति रखने के संबंध में बाइबल की शिक्षा है “और प्रेम, और भले कामों में उकसाने के लिये एक दूसरे की चिन्‍ता किया करें। और एक दूसरे के साथ इकट्ठा होना ने छोड़ें, जैसे कि कितनों की रीति है, पर एक दूसरे को समझाते रहें; और ज्यों ज्यों उस दिन को निकट आते देखो, त्यों त्यों और भी अधिक यह किया करो” (इब्रानियों 10:24-25)। किन्तु चर्च अथवा मण्डलियों में आज अपने समूह के अतिरिक्त अन्य समूहों के मसीही लोगों से मिलने, उनसे संगति रखने, उनके साथ प्रार्थना करने अथवा वचन के अध्ययन में सम्मिलित होने को मना किया जाता है, रोका जाता है। आरंभिक मसीही मण्डलियों के लोग परस्पर मिलने और संपर्क रखने तथा जुड़ने के लिए लालायित रहते थे; आज के मसीही एक दूसरे से पृथक रहने और दूरी बनाने के अवसर और तरीके ढूंढते हैं। बस अपनी ही मण्डली अथवा चर्च में इतवार के दिन की एक औपचारिक संगति को ही पर्याप्त और उचित मान तथा बता कर इस संगति रखने बात के निर्वाह को सही और पूर्ण समझ लिया जाता है; गणित के समीकरण के समान, संगति रख ली इसलिए मसीही विश्वासी हैं समझ लिया जाता है।

परमेश्वर के वचन बाइबल की शिक्षाओं में से हम ऐसे ही बड़े लगन के किन्तु गलत मानसिकता के साथ निभाए जाने वाली अन्य बातों, प्रभु भोज में सम्मिलित होना, और बपतिस्मे को, अगले लेखों में देखेंगे। किन्तु यदि आपने अभी तक अपने आप को प्रभु यीशु मसीह की शिष्यता में समर्पित नहीं किया है, और आप अभी भी अपने जन्म अथवा संबंधित धर्म तथा उसकी रीतियों के पालन के आधार पर अपने आप को प्रभु का जन समझ रहे हैं, तो आपको भी अपनी इस गलतफहमी से बाहर निकलकर सच्चाई को स्वीकार करने और उसका पालन करने की आवश्यकता है। आज और अभी आपके पास अपनी अनन्तकाल की स्थिति को सुधारने का अवसर है; प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • यशायाह 30-31    

  • फिलिप्पियों 4 

गुरुवार, 7 अक्टूबर 2021

मसीही विश्वास एवं शिष्यता - 7

   

बाइबल अध्ययन और प्रार्थना - गणित का समीकरण? (3)   

पिछले लेख में हमने देखा कि प्रेरितों 2:42 की चारों बातों (वचन की शिक्षा पाना, संगति रखना, प्रभु-भोज में सम्मिलित होना, प्रार्थना करना) को उद्धार या नया जन्म प्राप्त कर लेने के लिए गणित के एक समीकरण के समान देखना, एक रस्म के समान इनकी औपचारिकता को पूरा करते रहना, बाइबल के अनुसार गलत धारणाएं ही हैं, और प्रभु परमेश्वर को स्वीकार्य होने के लिए, धर्म-कर्म-रस्म के निर्वाह वाले भले जीवन और भले कामों वाले पहले के उदाहरण के समान, उपयोगी नहीं हैं। आज हम प्रेरितों 2:42 की इन चारों बातों के बारे में कुछ और विस्तार से देखेंगे। 

1. बाइबल की शिक्षा पाना: पापों की क्षमा और उद्धार पाया हुआ व्यक्ति बाइबल को पढ़ने, सीखने और बाइबल की शिक्षाओं का पालन करने में रुचि रखता है, समय बिताता है। किन्तु बाइबल में रुचि दिखाने, उसे सीखने, जानने, और मानने का प्रयास करने वाला हर व्यक्ति उद्धार, नया जन्म, और पापों की क्षमा पाया हुआ व्यक्ति नहीं होता है। संसार में ऐसे भी अनेकों व्यक्ति हैं जो मसीह यीशु के जगत का उद्धारकर्ता होने तथा बाइबल के परमेश्वर का वचन होने में विश्वास नहीं रखते हैं। किन्तु ऐसे लोग फिर भी, चाहे उसकी आलोचना करने के लिए, अथवा उसके प्रति कौतूहल से, या उस में से कुछ भली बातों को सीखने की इच्छा से बाइबल में रुचि रखते हैं, उसे पढ़ते और सीखते हैं, और उसकी कुछ शिक्षाओं से प्रभावित होकर उन्हें अपने जीवन में लागू करने के भी प्रयास करते हैं। किन्तु ऐसा करने से वे मसीही विश्वासी, परमेश्वर की संतान, स्वर्ग के वारिस नहीं हो जाते हैं। क्योंकि वे प्रभु के जन नहीं हैं, इसलिए वे परमेश्वर पवित्र आत्मा की बजाए, मनुष्यों से और मनुष्यों के ज्ञान तथा पुस्तकों से बाइबल के बारे में सीखते हैं; इसलिए बाइबल की सही शिक्षा से वंचित रहते हैं (1 कुरिन्थियों 2:10-15)। उन्हें बाइबल के बारे में बहुत सा ज्ञान तो हो सकता है, किन्तु उनके द्वारा की जाने वाली बाइबल की व्याख्या और दी जाने वाली शिक्षाओं में किताबी ज्ञान या मनुष्यों के विचार भरे होते हैं, और वह आत्मिकता और आत्मिक सामर्थ्य नहीं होती है जो परमेश्वर पवित्र आत्मा की अगुवाई में बाइबल सीखने, पालन करने, और सिखाने में देखने को मिलती है, “जब यीशु ये बातें कह चुका, तो ऐसा हुआ कि भीड़ उसके उपदेश से चकित हुई। क्योंकि वह उन के शास्त्रियों के समान नहीं परन्तु अधिकारी के समान उन्हें उपदेश देता था” (मत्ती 7:28-29) 

2. प्रार्थना करना: जो बात ऊपर बाइबल की शिक्षाओं के संबंध में कही गई है, वही प्रार्थना करने के विषय भी सत्य है। प्रार्थना करना, परमेश्वर से वार्तालाप करना है; एक घनिष्ठ, विश्वासयोग्य, सर्वसामर्थी अंतरंग मित्र के साथ अपने मन की बात साझा करना, और उससे अपनी भलाई के लिए परामर्श प्राप्त करना, और फिर उस परामर्श का पालन करना। किन्तु अधिकांश लोगों के लिए प्रार्थना एक औपचारिकता है, कुछ रटी हुई बातों को दोहराते रहना है, और कुछ के लिए तो इन बातों को दोहराते रहने की एक निर्धारित संख्या को पूरा करना है। वे कभी आत्मिकता में प्रभु के साथ जुड़ कर उसके साथ यह प्रार्थना रूपी वार्तालाप नहीं करने पाते हैं। अधिकांश लोग तो प्रार्थना के नाम पर न केवल परमेश्वर को अपनी समस्या बताते हैं, वरन उसे यह भी बताते हैं कि वह उस समस्या का क्या समाधान करे, कैसे करे, कब करे, और उसके साथ-साथ उनके लिए और क्या कुछ करे। वे परमेश्वर को अल्लादीन के चिराग के जिन्न के समान प्रयोग करना चाहते हैं - प्रार्थना रूपीचिरागको रगड़ा, औरपरमेश्वरनामक जिन्न को बता दिया कि वह उनके लिए क्या करे, और कैसे करे, आदि। उन्हें परमेश्वर की इच्छा जानने और पूरी करने में कोई रुचि नहीं होती है; वे केवल परमेश्वर को अपनी स्वार्थ-सिद्धि और सांसारिक बातों की उन्नति के लिए प्रयोग करना चाहते हैं। 

उसी गणित के समीकरण के समान, जैसे मसीही विश्वासी भी प्रार्थना करते हैं, ये औपचारिकता निभाने वाले भीप्रार्थनाके नाम पर कुछ करते हैं; किन्तु दोनों कीप्रार्थनामें जमीन-आसमान का अंतर है। मसीही विश्वासी परमेश्वर से उसकी इच्छा जानकर उसे पूरी करने, परमेश्वर के लिए उपयोगी होने के लिए प्रार्थना करता और सामर्थ्य माँगता है; रस्म या औपचारिकता को निभाने वाले परमेश्वर को अपनी इच्छाएं और लालसाएँ बताकर, उसे अपने लिए प्रयोग करने और सांसारिक बातों में बढ़ना चाहते हैं। उनके शिष्यों के अनुरोध पर कि प्रार्थना क्या है, और उसका खाका कैसा होना चाहिए, यह समझाने तथा प्रार्थना करने में लोगों की सहायता के लिए प्रभु ने उन्हें प्रार्थना से संबंधित कुछ शिक्षाएं (मत्ती 6:5-15) और नमूने के रूप में एक प्रार्थना (पद 9-13) दी। 

गणित के समीकरण समानमसीही विश्वासी प्रार्थना करता है; इसलिए प्रार्थना करने वाला मसीही विश्वासी होता हैदेखने वालों, और इसे औपचारिकता के समान निभाने वालों ने प्रभु के द्वारा दी गई इस नमूने की प्रार्थना को भी एक रस्म और औपचारिकता बना दिया है। और अब प्रभु द्वारा दिया गया प्रार्थना का यह नमूनाप्रभु की प्रार्थनाके नाम से रट कर, बिना उस पर विचार किए, बिना उसे समझे, मसीही या ईसाई धर्म के मानने वालों के द्वारा धर्म और कर्म के निर्वाह के लिए बड़ी निष्ठा के साथ दोहराया जाता है। उनकी कोई प्रार्थना, कोई सभा, कोई रस्म बिना इस रटी हुईप्रार्थनाको व्यक्तिगत अथवा सामूहिक रीति से दोहराए पूरी ही नहीं होती है; और यदि ऐसा न करवाया जाए, तो उन्हें लगता है कि कुछ अपूर्ण और अधूरा रह गया है जिसका कुछ बुरा परिणाम आ सकता है। इनमें से कोई भी जन, न सामान्य व्यक्ति और न ही धार्मिक अगुवा इस बात पर ध्यान करता है कि प्रभु ने स्पष्ट कहा किइस रीति से प्रार्थना किया करो”; न कियह प्रार्थना किया करो। और न वे इस बात का ध्यान करते हैं कि सुसमाचारों के अतिरिक्त, संपूर्ण नए नियम में और कहीं भी न तो किसी व्यक्ति अथवा प्रेरित ने और न ही किसी और ने कभी भी यहप्रार्थनाफिर कभी दोहराई, या उसे करने के विषय शिक्षा दी, या लोगों को इसके लिए प्रोत्साहित किया। सुसमाचारों में भी, जहाँ प्रभु ने यह शिक्षा दी और शिष्यों को प्रार्थना का यह खाका या नमूना दिया, उसके अतिरिक्त फिर कभी न तो प्रभु ने और न उनके शिष्यों ने कभी भी इस नमूने को एक अनिवार्य प्रार्थना के समान दोहराया या स्मरण करवाया, या इसे अनिवार्य बनाया। 

 शेष दो बातों के पालन से संबंधित परमेश्वर के वचन बाइबल की कुछ शिक्षाओं को हम अगले लेख में आगे देखेंगे। किन्तु यदि आपने अभी तक अपने आप को प्रभु यीशु मसीह की शिष्यता में समर्पित नहीं किया है, और आप अभी भी अपने जन्म अथवा संबंधित धर्म तथा उसकी रीतियों के पालन के आधार पर अपने आप को प्रभु का जन समझ रहे हैं, तो आपको भी अपनी इस गलतफहमी से बाहर निकलकर सच्चाई को स्वीकार करने और उसका पालन करने की आवश्यकता है। आज और अभी आपके पास अपनी अनन्तकाल की स्थिति को सुधारने का अवसर है; प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • यशायाह 28-29   
  • फिलिप्पियों 3