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मंगलवार, 25 जनवरी 2022

प्रभु यीशु की कलीसिया या मण्डली – पहला स्तंभ; वचन की शिक्षा

      

प्रभु यीशु में स्थिरता और दृढ़ता का पहला स्तंभ, वचन में स्थापित      

पिछले कुछ लेखों में हम देखते आ रहे हैं कि प्रभु की कलीसिया के साथ प्रभु द्वारा जोड़ दिए जाने वाले उसके जन, एक वास्तविक मसीही विश्वासी के जीवन में, कलीसिया से जुड़ने के साथ ही सात बातें भी जुड़ जाती हैं, उसके जीवन में दिखने लगती हैं। ये सातों बातें प्रेरितों 2:38-42 में दी गई हैं, और प्रत्येक मसीही विश्वासी के जीवन में इनका विद्यमान होना कलीसिया के आरंभ से ही देखा जा रहा है। आज भी व्यक्ति के जीवन में इन बातों की सत्यनिष्ठ उपस्थिति यह दिखाती है कि वह व्यक्ति प्रभु का जन है, उसकी कलीसिया के साथ जोड़ दिया गया है। इनमें से पहली तीन को हम पिछले लेखों में देख चुके हैं। प्रेरितों 2:42 में शेष चार बातें दी गई हैं, जिनमें उस प्रथम कलीसिया के सभी लोगलौलीन रहे। ये चारों बातें साथ मिलकर मसीही जीवन और कलीसिया के लिए चार स्तंभ का कार्य करती हैं, जिससे व्यक्ति का मसीही जीवन और कलीसिया स्थिर और दृढ़ बने रह सकें। आज से हम इन चारों बातों को अलग-अलग देखना आरंभ करेंगे। 

प्रेरितों 2:42 में दी गई पहली बात हैप्रेरितों से शिक्षा पाना। जिस समय प्रेरितों 2 अध्याय की घटना घटित हुई, और प्रथम कलीसिया की स्थापना हुई, उस समय परमेश्वर का वचन जो लोगों के पास था, वह हमारी वर्तमान बाइबल कापुराना नियमखंड था; और वह भी फरीसियों, शास्त्रियों, सदूकियों के नियंत्रण में था। ये लोग उस वचन को अपनी सुविधा के अनुसार तोड़-मरोड़ कर अपने स्वार्थ के लिए प्रयोग किया करते थे (मत्ती 15:1-9)। साथ ही उन्होंने उस वचन की बहुत सी गलत व्याख्याएं भी लोगों में फैला रखी थीं; इसीलिए प्रभु यीशु के पहाड़ी उपदेश (मत्ती 5-7 अध्याय) में हम बारंबार प्रभु को यह कहते पाते हैं, “तुम सुन चुके हो”, “तुम्हें कहा गया है”, आदि, और फिरपरंतु मैं तुम से कहता हूँ” - अर्थात प्रभु ने वचन की गलत शिक्षाओं को उनके वास्तविक और सही रूप में लोगों के सामने रखा। उस समय के यहूदी समाज के ये धर्म के अगुवे प्रभु यीशु के विरोधी थे, और प्रभु की शिक्षाओं तथा प्रभु यीशु में पापों की क्षमा एवं उद्धार के सुसमाचार के प्रचार और प्रसार का विरोध करते थे। इसलिए इन धर्म के अगुवों के विरोध और उनके परमेश्वर के वचन की उनकी गलत समझ एवं जानकारी के कारण यह संभव ही नहीं था कि प्रभु की सही शिक्षाएं जन-सामान्य तक पहुंचाई जातीं। इसीलिए प्रभु ने यह दायित्व अपने चुने हुए लोगों, अपने प्रेरितों को, अपने स्वर्गारोहण के समय सौंपा था (मत्ती 28:18-20)। प्रभु ने अपनी शिक्षाओं का भण्डारी अपने इन प्रेरितों को बनाया था, और उनकी ज़िम्मेदारी थी कि वे लोगों को प्रभु की शिक्षाएं सिखाएं। जैसे-जैसे मण्डली या कलीसिया बढ़ने लगी, शैतान ने भी वचन की सही शिक्षा को लोगों तक पहुँचने से रोकने के प्रयास किए (प्रेरितों 6:1-7) किन्तु उन प्रेरितों ने प्रार्थना और वचन की सेवकाई के प्रति अपने दायित्व की प्राथमिकता को नहीं छोड़ा (6:4), परिणामस्वरूप, वचन का प्रसार हुआ, शिष्यों की संख्या भी बढ़ी, और यहूदी याजकों का भी एक बड़ा समुदाय प्रभु के शिष्यों के साथ जुड़ गया (6:7) 

जब वचन सभी स्थानों पर फैलने लगा, प्रभु यीशु के अनुयायी बढ़ने लगे, तो प्रभु ने वचन की इस सेवकाई, वचन की शिक्षा उसके लोगों तक पहुँचाने के लिए और लोगों को भी कलीसिया में नियुक्त किया (1 कुरिन्थियों 12:28; इफिसियों 4:11-12)। पौलुस प्रेरित में होकर कलीसिया की देखभाल करने वालों को वचन की सही शिक्षा देने (2 तिमुथियुस 3:16-17) का दायित्व सौंपा गया, तथा उन्हें इस बात का ध्यान रखने को कहा गया कि वे भविष्य के लिए वचन की सही शिक्षा देने वालों को भी तैयार करें (2 तिमुथियुस 2:1-2)। और तब से लेकर आज तक यह सिलसिला इसी प्रकार चलता चला आ रहा है - प्रभु के समर्पित और आज्ञाकारी सेवक, जिन्हें प्रभु ने वचन की इस सेवकाई के लिए नियुक्त किया है, वे प्रार्थना और वचन के अध्ययन में प्रभु के साथ समय बिताते हैं, प्रभु से सीखते हैं, और फिर उन शिक्षाओं को प्रभु के लोगों तक पहुँचा देते हैं, तथा भावी पीढ़ी में इसी सेवकाई के लिए प्रभु और लोगों को उन से सीखने तथा औरों को सिखाने के लिए उनमें जोड़ता चला जाता है। 

ध्यान कीजिए, प्रभु ने कभी भी, कहीं भी, अपने शिष्यों से यह नहीं कहा कि भले बनो, भलाई करो, भलाई की बातें सिखाओ, और परमेश्वर तुम्हारे साथ रहेगा। प्रभु ने अपने शिष्यों से सुसमाचार प्रचार करने के लिए कहा, उसकी बातें संसार के लोगों को सिखाने के लिए कहा (प्रेरितों 1:8)। लोगों को परमेश्वर और उसके वचन से भटकाने और उन्हें उनके पापों में फँसाए रखने के लिए शैतान ने ही यह प्रभु के वचन और प्रभु की आज्ञाकारिता मेंलौलीन रहनेके स्थान परभले बनो, भला करोकामंत्रलोगों में डाला है। भले बनना और भला करना अच्छा है, किन्तु इसे परमेश्वर के वचन और उसकी आज्ञाकारिता के स्थान पर रखना अच्छा नहीं, घातक है। जो प्रभु परमेश्वर के वचन के आज्ञाकारी रहेंगे, वे स्वतः ही भले भी हो जाएंगे, और भलाई भी करेंगे। किन्तु भले बनने और भलाई करने से कोई प्रभु के वचन को नहीं सीख अथवा सिखा सकता है। ध्यान कीजिए, संसार का पहला पाप था परमेश्वर के वचन, उसके द्वारा दिए गए निर्देश की अनाज्ञाकारिता करना; और हव्वा से यह पाप करवाने के लिए शैतान ने उसके मन में परमेश्वर के वचन, उसके निर्देशों की सार्वभौमिकता और भलाई के प्रति संदेह उत्पन्न किया। आज भी शैतान इसी कुटिलता का ऐसे ही प्रयोग करता है - परमेश्वर के वचन और आज्ञाकारिता से ध्यान भटका कर, उनके प्रति संदेह उत्पन्न कर के, अपनी बातों में फँसा लेता है, पाप में गिरा देता है।

कनान देश में प्रवेश करने से ठीक पहले परमेश्वर ने यहोशू से कहा, “इतना हो कि तू हियाव बान्धकर और बहुत दृढ़ हो कर जो व्यवस्था मेरे दास मूसा ने तुझे दी है उन सब के अनुसार करने में चौकसी करना; और उस से न तो दाहिने मुड़ना और न बांए, तब जहां जहां तू जाएगा वहां वहां तेरा काम सफल होगा। व्यवस्था की यह पुस्तक तेरे चित्त से कभी न उतरने पाए, इसी में दिन रात ध्यान दिए रहना, इसलिये कि जो कुछ उस में लिखा है उसके अनुसार करने की तू चौकसी करे; क्योंकि ऐसा ही करने से तेरे सब काम सफल होंगे, और तू प्रभावशाली होगा। क्या मैं ने तुझे आज्ञा नहीं दी? हियाव बान्धकर दृढ़ हो जा; भय न खा, और तेरा मन कच्चा न हो; क्योंकि जहां जहां तू जाएगा वहां वहां तेरा परमेश्वर यहोवा तेरे संग रहेगा” (यहोशू 1:7-9)। और कनान देश में इस्राएलियों को बसाने के बाद यहोशू ने अंत में आकर लोगों से कहा, “इसलिये अब यहोवा का भय मानकर उसकी सेवा खराई और सच्चाई से करो; और जिन देवताओं की सेवा तुम्हारे पुरखा महानद के उस पार और मिस्र में करते थे, उन्हें दूर कर के यहोवा की सेवा करो। और यदि यहोवा की सेवा करनी तुम्हें बुरी लगे, तो आज चुन लो कि तुम किस की सेवा करोगे, चाहे उन देवताओं की जिनकी सेवा तुम्हारे पुरखा महानद के उस पार करते थे, और चाहे एमोरियों के देवताओं की सेवा करो जिनके देश में तुम रहते हो; परन्तु मैं तो अपने घराने समेत यहोवा की सेवा नित करूंगा” (यहोशू 24:14-15)

यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं तो ध्यान रखिए कि आत्मिककनान देश’ - प्रभु की आशीषों, सुरक्षा, और संगति में प्रवेश करने वाले प्रत्येकइस्राएलीअर्थात प्रभु के जन के लिए इसी प्रकार से प्रभु के वचन में स्थिर और दृढ़ बने रहना अनिवार्य है। ऐसा करने से, जैसा यहोवा ने यहोशू को प्रतिज्ञा दी, वैसे ही मसीही विश्वासी के लिए भी, “तब जहां जहां तू जाएगा वहां वहां तेरा काम सफल होगा”; “ऐसा ही करने से तेरे सब काम सफल होंगे, और तू प्रभावशाली होगा”; “जहां जहां तू जाएगा वहां वहां तेरा परमेश्वर यहोवा तेरे संग रहेगा। प्रभु यीशु मसीह ने कहा है कि उसके वचन से व्यक्ति का प्रेम और आज्ञाकारिता ही व्यक्ति के प्रभु से प्रेम का माप है, वास्तविक सूचक है (यूहन्ना 14:21, 23)। प्रभु द्वारा दिए गए इस माप-दण्ड के आधार पर आज आप वचन की शिक्षा के संदर्भ में कहाँ खड़े हैं? अभी समय और अवसर है, जो आवश्यक हैं, अपने जीवन में वे सुधार कर लीजिए, जिससे कल की किसी बड़ी हानि की संभावना से बच सकें।   

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • निर्गमन 12-13     
  • मत्ती 16 

सोमवार, 24 जनवरी 2022

प्रभु यीशु की कलीसिया या मण्डली - चार स्तंभ

 

प्रभु यीशु की कलीसिया - स्थिरता और दृढ़ता का उपाय  

प्रभु यीशु की कलीसिया में जुड़ने के साथ ही, सच्चे मसीही विश्वासी में, वास्तविकता में प्रभु के जन बन जाने वाले व्यक्ति में सात बातें देखी जाती हैं, जो प्रेरितों 2:38-42 में दी गई हैं, और जिन्हें हम पिछले कुछ लेखों में क्रमवार देखते आ रहे हैं। अभी तक हम पहली तीन बातें - अपने पापों के लिए पश्चाताप और उनके लिए प्रभु यीशु से क्षमा माँगने के साथ यीशु को प्रभु स्वीकार करना, प्रभु द्वारा किए गए भीतरी परिवर्तन की बपतिस्मे के द्वारा सार्वजनिक गवाही देना, और प्रभु के प्रति पूर्णतः समर्पित एवं आज्ञाकारी होकर, अपने आप को संसार तथा सांसारिक लालसाओं से पृथक करना और प्रभु के कार्य में संलग्न रहना, चाहे इसके लिए कोई भी कीमत क्यों न चुकानी पड़े। प्रकट है कि प्रभु के प्रति सच्चे और वास्तविक समर्पण के बिना यह कर पाना संभव नहीं है, क्योंकि सताव और विपरीत परिस्थितियों में भी प्रभु के प्रति प्रतिबद्ध और आज्ञाकारी बने रहना परमेश्वर पवित्र आत्मा की सामर्थ्य के बिना संभव नहीं है; और पवित्र आत्मा की सामर्थ्य केवल प्रभु यीशु के वास्तविक शिष्यों के साथ ही होगी, किसी मानवीय अथवा संस्थागत रीति से, अपनी ही ओर सेकलीसियासे जुड़ जाने वालों के साथ नहीं। यहीं पर प्रभु के सच्चे और समर्पित लोगों तथा दिखाने भर के लिएकलीसियासे जुड़ने वालों के मध्य अंतर प्रकट हो जाता है।

 प्रेरितों 2:41 में एक परिवर्तन दिखाया गया है, पतरस द्वारा किए गए उस प्रचार के फलस्वरूप, “सो जिन्होंने उसका वचन ग्रहण किया उन्होंने बपतिस्मा लिया; और उसी दिन तीन हजार मनुष्यों के लगभग उन में मिल गएसात में से शेष चार बातें उन लोगों के प्रभु के शिष्यों के साथ जुड़ जाने के बाद उनके जीवन में निरंतर पाई जाने वाली बातें थीं; इन चार बातों के लिए प्रेरितों 2:42 में लिखा है कि ये नए मसीही विश्वासी इसके बाद से इन मेंलौलीन रहे”, अर्थात, ये बातें उनके जीवन का अभिन्न अंग, उनके लिए प्राथमिकता से निर्वाह का विषय बन गईं। ये चार बातें हैं प्रेरितों से शिक्षा पाना, अर्थात प्रभु के वचन की शिक्षा और अध्ययन, प्रभु के लोगों के साथ संगति में बने रहना, प्रभु के नाम से रोटी तोड़ना या प्रभु भोज या प्रभु की मेज़ में सम्मिलित होते रहना, और प्रार्थना करना। ये चार बातें कलीसिया के लिए, मसीही विश्वासी के मसीही जीवन के लिए स्थिरता और दृढ़ता देने वाले चारों कोनों के चार स्तंभ हैं। जिस भी मसीही विश्वासी के जीवन में इनमें से एक भी स्तंभ कमजोर पड़ेगा, या हट जाएगा, उसका मसीही विश्वास का जीवन तुरंत कमजोर पड़ जाएगा। जिस स्थानीय कलीसिया में ये बातें नहीं होंगी, या इनकी प्राथमिकता नहीं होगी, वह स्थानीय कलीसिया दुर्बल पड़ जाएगी, प्रभु के लिए अप्रभावी हो जाएगी, और शैतान को उस कलीसिया में अपने कार्य करने के लिए प्रचुर अवसर मिलने लगेंगे। इन चारों बातों के एक साथ निर्वाह करने और इनके सामूहिक महत्व को दिखाने के लिए ही इन्हें एक साथ, एक ही वाक्य में लिखवाया गया है, और साथ ही यह भी लिखवाया गया है कि वे आरंभिक विश्वासी इन चारों में “लौलीन रहे 

अपने आप को ईसाई या मसीही कहने वाले अधिकांश लोगों में, उनके व्यक्तिगत जीवन में तथा उनकीकलीसियाकी सामूहिक जीवन में भी, इन चारों बातों का महत्व और निर्वाह आज देखने को या मिलता ही नहीं है, या इनमें से किसी एक या दो का पालन करना एक औपचारिकता मात्र बन कर रह गया है। यही इस बात का एक बड़ा प्रमाण है कि उनका जीवन वास्तव में प्रभु के साथ जुड़ा हुआ नहीं है; वे केवल ऊपरी रीति से, दिखाने भर के लिए प्रभु की कलीसिया से जुड़े हैं, वास्तविकता में नहीं। वास्तविकता में वे अभी भी संसार के साथ ही जुड़े हुए हैं, संसार ही के जन हैं, इसीलिए संसार और सांसारिकता की बातें उनके लिए अधिक महत्व रखती हैं और उन्हीं बातों का पालन करना उनकी प्राथमिकता है। यदि वे नश्वर संसार की नाशमान बातों से कुछ समय निकालने पाते हैं, तो प्रभु के प्रति अपने दायित्व के लिए, दिखाने भर का औपचारिकता का हल्का सा प्रयास कर लेते हैं। यदि इन सातों बातों के क्रम के अनुसार देखें, तो जो वास्तव में सच्चा पश्चाताप करेगा, मन फिराएगा, और अपने इस मन फिराव की वास्तविकता की सार्वजनिक गवाही देगा, और अपने आप को संसार तथा सांसारिकता की बातों से अलग करेगा, उसके अन्दर स्वतः ही इन शेष चार बातों के लिए भी स्वाभाविक लालसा बनी रहेगी, और वे इनमें लौलीन भी रहेंगे। हम अगले लेख से इन चारों बातों को एक-एक करके कुछ विस्तार से देखेंगे। 

अपने आप को ईसाई या मसीही कहने वाले लोगों में इन चारों बातों को पूरा न करने को लेकर एक बहुत सामान्य धारणा पाई जाती है - समय ही नहीं होता है, कैसे करें? संसार और सांसारिकता की बातों के बाद उनके पास समय ही नहीं बचता है कि वे प्रभु के साथ समय बिताएं, प्रभु के लिए कुछ करें। फिर इसके साथ एक दूसरा बहाना भी जोड़ दिया जाता है, “प्रभु हमारे दिल और जीवन के हाल तो जानता है; उसे पता है कि हम उससे प्रेम करते हैं, बस उपयुक्त समय नहीं देने पाते हैं। वह हमारी स्थिति समझता है, दयालु और करुणामय है, और अपनी दया और करुणा में होकर हमसे व्यवहार करेगा।लेकिन ये लोग इस बात पर बिलकुल विचार नहीं करते हैं कि क्या होगा जब न्याय के दिन प्रभु उनसे कहेगा, “हाँ, मैं दयालु और करुणामय हूँ, और इसीलिए मैं, इतने सालों तक, बारंबार, तुम्हारे पास संगति के लिए, तुम्हें विश्राम और आशीष देने के लिए, तुम्हारी सहायता और मार्गदर्शन करने के लिए प्रतिदिन आता रहा और तुमसे समय माँगता रहा, अपने लोगों के द्वारा तुम्हें संदेश भेजता रहा, तुम्हें अपनी प्राथमिकताएं सही करने की शिक्षाएं देता रहा, किन्तु तुमने हर बार नश्वर संसार की नाशमान बातों को मुझ अविनाशी परमेश्वर और उसकी अनन्तकालीन आशीषों से अधिक महत्वपूर्ण समझा, संसार को ही प्राथमिकता दी। तुम जानते थे कि मुझे छोड़कर तुम जिसके लिए परिश्रम और प्रयास करने में लगे हुए हो, एक दिन वह सब नष्ट हो जाएगा, तुम्हारे साथ उसका कुछ अंश भी नहीं जाएगा। तुम ये भी जानते थे कि तुम्हें प्रतिफल तुम्हारे कार्यों के अनुसार दिए जाएंगे; लेकिन फिर भी तुमने संसार को ही प्राथमिकता दी, उसी के लिए उपयोगी बने रहे, मेरे लिए नहीं। आज, यह मेरे उस सच्चे और खरे न्याय का दिन है, जिसके विषय तुम्हें मैं चिताता रहा, किन्तु तुम नहीं चेते; इसलिए आज, तुम्हारे द्वारा जानते-बुझते-समझते हुए किए गए निर्णय के अनुसार ही तुम वही फसल पाओगे, जिसके बीज तुमने अपने लिए स्वेच्छा से अपने जीवन में बोए हैं। नाशमान बातों को अपने जीवन में बोया है, विनाश की कटनी ही काटने को मिलेगी।” 

प्रभु यीशु के लिए समय, प्रयास, और परिश्रम व्यर्थ या निष्फल नहीं है, वरन ऐसे निवेश (investment) के समान है, जिसका कम-से-कम सौ-गुना प्रतिफल, और अनन्तकालीन आशीषें बिलकुल निश्चित हैं (मरकुस 10:29, 30)। जो अपना पहला समय, परिश्रम, प्राथमिकता प्रभु को देते हैं, प्रभु उन्हें शेष कार्य करने के लिए उपयुक्त समय, परिश्रम और प्रतिफल भी देता रहता है, जिससे वे अपने सांसारिक कार्यों में भी सफल रहते हैं, और प्रभु के लिए भी उपयोगी होकर आशीषित बने रहते हैं। आवश्यकता प्रभु पर भरोसा रखते हुए विश्वास के साथ सही दिशा में कदम बढ़ाने की है। 

यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं, तो अभी समय और अवसर रहते अपने जीवन को जाँच-परख कर देख लीजिए कि आप इन सातों बातों के संदर्भ में, कहाँ खड़े हैं? प्रभु की बातें और आज्ञाकारिता आपके जीवन में क्या स्थान पाती हैं? यदि प्रभु यीशु, उसका वचन, और उसकी आज्ञाकारिता आपके जीवन की प्राथमिकता नहीं है, तो आपको बहुत गंभीरता से अपने जीवन का पुनःअवलोकन और आँकलन (review and re-assessment) करने की तथा आवश्यक सुधारों को लाने की आवश्यकता है। 

       यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • निर्गमन 9-11     
  • मत्ती 15:21-39  

रविवार, 23 जनवरी 2022

प्रभु यीशु की कलीसिया या मण्डली - अलगाव का जीवन

 

प्रभु यीशु की कलीसिया - प्रभु की आज्ञाकारी   

प्रभु यीशु की कलीसिया में, प्रभु यीशु द्वारा व्यक्ति के जोड़े जाने साथ ही, उस सच्चे और वास्तविक मसीही विश्वासी के जीवन में कुछ बातों की उपस्थिति भी अनिवार्य और आवश्यक हो जाती है। प्रभु का जन कहलाए जाने वाले व्यक्ति के जीवन में इन बातों की उपस्थिति यह दिखाती और प्रमाणित करती है कि वह प्रभु का जन है, प्रभु की कलीसिया में प्रभु द्वारा जोड़ा गया है। इन बातों के द्वारा वह जन अपने मसीही जीवन में बढ़ता जाता है, प्रभु की कलीसिया के लिए उपयोगी बना रहता है, और उसके द्वारा अन्य लोग भी प्रभु की निकटता में आने लगते हैं। प्रेरितों 2 अध्याय में प्रथम कलीसिया स्थापित हो जाने के साथ ही उन प्रथम विश्वासियों के जीवनों में भी ये सात बातें दिखने लगीं थीं, और तब से लेकर आज तक संसार के हर स्थान में प्रभु की कलीसिया के प्रत्येक सच्चे सदस्य में ये सात बातें होना ही उसके वास्तविक मसीही विश्वासी होने का प्रमाण रही हैं (प्रेरितों 2:39)। ये सात बातें हमें प्रेरितों 2:38-42 में मिलती है, और इनमें से पद 38 में दी गई पहली दो, पापों के लिए पश्चाताप और बपतिस्मे द्वारा मसीही विश्वास में आ जाने की सार्वजनिक गवाही देने से संबंधित कुछ बातों को हम पिछले लेखों में देख चुके हैं।

तीसरी बात प्रेरितों 2:40 में दी गई है -उसने बहुत ओर बातों में भी गवाही दे देकर समझाया कि अपने आप को इस टेढ़ी जाति से बचाओ; अर्थात, बुरे और प्रभु विरोधी लोगों ही अलग होकर प्रभु के साथ और उसकी आज्ञाकारिता में बने रहो। एक सच्चे मसीही विश्वासी का जीवन, संसार और सांसारिकता से बच कर रहने, संसार की नश्वर बातों से हटकर परमेश्वर के वचन के अनुसार चलने का जीवन होता है। मसीही विश्वासी हर परिस्थिति में प्रभु को महिमा देता है, उसके कार्य को, सुसमाचार को औरों तक पहुँचाने में संलग्न रहता है। इस संदर्भ में बाइबल के कुछ पद देखते हैं:

  • जब पतरस और यूहन्ना को यहूदी धर्म के अगुवों ने प्रभु यीशु के बारे में कुछ भी कहने से मना किया, तब उनकी प्रतिक्रिया:तब उन्हें बुलाया और चितौनी देकर यह कहा, कि यीशु के नाम से कुछ भी न बोलना और न सिखलाना। परन्तु पतरस और यूहन्ना ने उन को उत्तर दिया, कि तुम ही न्याय करो, कि क्या यह परमेश्वर के निकट भला है, कि हम परमेश्वर की बात से बढ़कर तुम्हारी बात मानें। क्योंकि यह तो हम से हो नहीं सकता, कि जो हम ने देखा और सुना है, वह न कहें” (प्रेरितों 4:18-20)
  • जब उनसे फिर भी प्रभु यीशु के सुसमाचार का प्रचार करते रहने के विषय पूछा गया, तो उनका उत्तर:क्या हम ने तुम्हें चिताकर आज्ञा न दी थी, कि तुम इस नाम से उपदेश न करना? तौभी देखो, तुम ने सारे यरूशलेम को अपने उपदेश से भर दिया है और उस व्यक्ति का लहू हमारी गर्दन पर लाना चाहते हो। ​तब पतरस और, और प्रेरितों ने उत्तर दिया, कि मनुष्यों की आज्ञा से बढ़कर परमेश्वर की आज्ञा का पालन करना ही कर्तव्य कर्म है” (प्रेरितों के काम 5:28-29)
  • और जब अपने इस उत्तर के लिए वे पीटे गए, तो उनकी प्रतिक्रिया:तब उन्होंने उस की बात मान ली; और प्रेरितों को बुलाकर पिटवाया; और यह आज्ञा देकर छोड़ दिया, कि यीशु के नाम से फिर बातें न करना। वे इस बात से आनन्दित हो कर महासभा के सामने से चले गए, कि हम उसके नाम के लिये निरादर होने के योग्य तो ठहरे। और प्रति दिन मन्दिर में और घर घर में उपदेश करने, और इस बात का सुसमाचार सुनाने से, कि यीशु ही मसीह है न रुके” (प्रेरितों के काम 5:40-42)
  • स्तिफनुस के मारे जाने के बाद उस प्रथम कलीसिया पर भारी क्लेश आया, और उन सताए गए मसीही विश्वासियों की प्रतिक्रिया थी, “उसी दिन यरूशलेम की कलीसिया पर बड़ा उपद्रव होने लगा और प्रेरितों को छोड़ सब के सब यहूदिया और सामरिया देशों में तित्तर बित्तर हो गए” “जो तित्तर बित्तर हुए थे, वे सुसमाचार सुनाते हुए फिरे” (प्रेरितों 8:1, 4) - जिस बात के लिए वे सताए और बेघर किए गए, तित्तर बित्तर हो गए, वे उस बात से - अपने मसीही विश्वास और उसके दायित्व से पीछे नहीं हटे, वरन जहाँ भी गए, सुसमाचार सुनाते हुए ही गए।

हम उपरोक्त उदाहरणों से देखते हैं कि उन प्राथमिक मसीही विश्वासियों के अन्दर तुरंत ही कितना भारी परिवर्तन, और अपने मसीही विश्वास के दायित्व के प्रति कितना गहरा समर्पण आ गया था। वे हर हाल, हर परिस्थिति में, सताव सह कर भी, संसार और संसार के लोगों के साथ समझौते का नहीं, वरन विपरीत हालात में भी प्रभु की आज्ञाकारिता का जीवन जीते थे; उसके लिए सब कुछ सहने के लिए तैयार थे। परमेश्वर पवित्र आत्मा ने इसके विषय मसीही विश्वासियों के लिए लिखवाया है:

  • और वह इस निमित्त सब के लिये मरा, कि जो जीवित हैं, वे आगे को अपने लिये न जीएं परन्तु उसके लिये जो उन के लिये मरा और फिर जी उठा” (2 कुरिन्थियों 5:15) 
  • तुम न तो संसार से और न संसार में की वस्तुओं से प्रेम रखो: यदि कोई संसार से प्रेम रखता है, तो उस में पिता का प्रेम नहीं है। क्योंकि जो कुछ संसार में है, अर्थात शरीर की अभिलाषा, और आंखों की अभिलाषा और जीविका का घमण्ड, वह पिता की ओर से नहीं, परन्तु संसार ही की ओर से है। और संसार और उस की अभिलाषाएं दोनों मिटते जाते हैं, पर जो परमेश्वर की इच्छा पर चलता है, वह सर्वदा बना रहेगा” (1 यूहन्ना 2:15-17)
  • हे व्यभिचारिणयों, क्या तुम नहीं जानतीं, कि संसार से मित्रता करनी परमेश्वर से बैर करना है सो जो कोई संसार का मित्र होना चाहता है, वह अपने आप को परमेश्वर का बैरी बनाता है” (याकूब 4:4)

       इसीलिए प्रभु यीशु मसीह ने कहा था, “उसने सब से कहा, यदि कोई मेरे पीछे आना चाहे, तो अपने आप से इनकार करे और प्रति दिन अपना क्रूस उठाए हुए मेरे पीछे हो ले” (लूका 9:23)। आज प्रभु की खेती में शैतान द्वारा बोए गए झूठेमसीहीतरह-तरह की गलत शिक्षाओं का प्रचार और संसार के साथ समझौते का जीवन जीने की बातों को सिखाते और दिखाते हैं। जैसे जब इस्राएली मिस्र के दासत्व से छुड़ाए गए, तो उनके साथ एक मिली-जुली भीड़ भी निकल आई (निर्गमन 12:38)। ये भीड़ इस्राएलियों के साथ ही रहती और चलती थी; उन्हें भी मन्ना मिलता था, परमेश्वर की देखभाल और सुरक्षा उन पर भी रहती थी। किन्तु यह मिली-जुली भीड़ इस्राएलियों के लिए दुख और पतन का कारण बन गई, उसने इस्राएलियों को परमेश्वर के कोप का भागी बना दिया (गिनती 11:4-6, 10, 33), और अन्ततः कनान में प्रवेश के समय उस मिली-जुली भीड़ का इस्राएलियों के साथ होने का कोई उल्लेख नहीं है; बलवाई इस्राएलियों के साथ वे भी जंगल में नाश हो गए, आशीष की भूमि तक नहीं पहुँच सके। 

       यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं, तो हर परिस्थिति में प्रभु और उसके निर्देशों के प्रति सच्चे और आज्ञाकारी बने रहने में ही आपकी आशीष और सुरक्षित भविष्य है। आज के ईसाई या मसीही समाज में शैतान के द्वारा कलीसिया में घुसाए गए झूठेविश्वासियोंकी कमी नहीं है। ये झूठे विश्वासी हमेशा संसार के समान कार्य और व्यवहार करने, संसार के लोगों के साथ समझौते करने, परमेश्वर के वचन की अनदेखी और अनाज्ञाकारिता करने के लिए ही उकसाते रहते हैं, विश्वासियों के मसीही विश्वास और जीवन में अग्रसर होने को बाधित करते रहते हैं। प्रत्येक सच्चे मसीही विश्वासी के लिए प्रभु का निर्देश है, “अपने आप को इस टेढ़ी जाति से बचाओ” (प्रेरितों 2:40)  

       यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • निर्गमन 7-8     
  • मत्ती 15:1-20 

शनिवार, 22 जनवरी 2022

प्रभु यीशु की कलीसिया या मण्डली - बपतिस्मे द्वारा गवाही देना

प्रभु यीशु की कलीसिया में बपतिस्मे की भूमिका 

पिछले लेखों से हम देख चुके हैं कि प्रभु यीशु की कलीसिया में कोई भी, किसी भी रीति अथवा विधि के द्वारा स्वतः ही नहीं जुड़ सकता है। जिस प्रकार से प्रभु ने अपनी कलीसिया से संबंधित सभी बातों को स्वयं ही निर्धारित किया है, और स्वयं ही अपनी कलीसिया को प्रबंधित और संचालित भी करता है, उसी प्रकार से प्रभु अपनी कलीसिया में स्वयं ही लोगों को जोड़ता भी है (प्रेरितों 2:47), और उसके द्वारा जोड़े जाने से संबंधित प्रक्रिया और बातें भी प्रभु द्वारा ही निर्धारित कर दी गई हैं। प्रथम कलीसिया की स्थापना से लेकर आज तक, सारे संसार के सभी स्थानों में प्रभु की कलीसिया के साथ जुड़ने के लिए प्रभु द्वारा स्थापित इसी एक प्रक्रिया का निर्वाह किया जाता है। इस प्रक्रिया में सात बातें हैं, जिन्हें परमेश्वर पवित्र आत्मा ने प्रेरितों 2:38-42 में लिखवाया है। इनमें से पहली बात, 2:38 में प्रभु की कलीसिया के साथ जुड़ने का आरंभ, प्रत्येक व्यक्ति द्वारा अपने पापों से पश्चाताप करना है, जिसे हम पिछले लेख में देख चुके हैं। उस लेख में हमने यह भी समझा है कि जिस पश्चाताप की यहाँ बात की गई है, वह वास्तविक पश्चाताप, ईसाई समाज और संस्थाओं में सामान्यतः देखे जाने वाले सांसारिक और औपचारिक पश्चाताप से, जो मृत्यु उत्पन्न करते हैं, बहुत भिन्न है। हमने उस वास्तविक पश्चाताप के गुणों, पहचान, और प्रभाव के बारे में बाइबल से समझा है जो प्रभु की कलीसिया से जुड़ने के लिए अनिवार्य है। हमने यह भी देखा है कि  इसी पद, 2:38 में दूसरी बात भी लिखी गई है - हर एक पश्चाताप करने वाले के द्वारा यीशु मसीह के नाम से बपतिस्मा लेना।

परमेश्वर के वचन, बाइबल में जब भी बपतिस्मा लेने या देने की बात आई है, उसके साथ कुछ महत्वपूर्ण बातें भी जुड़ी हुई देखी जाती हैं, जिनकी अवहेलना करने के द्वारा बपतिस्मे को लेकर बहुत सी गलत शिक्षाएं बनाकर फैला दी गई हैं। इसलिए पहले यह समझना आवश्यक है कि बपतिस्मा क्यों लिया या दिया जाए; उसके बाद ही उसकी विधि, या नामों के प्रयोग, आदि का महत्व समझ में आ सकता है। पापों से पश्चाताप करने और प्रभु यीशु मसीह से पापों की क्षमा मांग लेने, उसे अपना जीवन समर्पित कर देने, और स्वेच्छा तथा सच्चे मन से उसकी अधीनता में जीवन जीने का निर्णय कर लेने के बाद, बपतिस्मा, व्यक्ति द्वारा किए गए अपने उस निर्णय की तथा उससे उसके जीवन में आए भीतरी परिवर्तन की केवल एक बाहरी सार्वजनिक गवाही मात्र है। 

मत्ती 28:18-20 में दिए गए क्रम को ध्यान से देखिए; यहाँ स्वयं प्रभु यीशु मसीह के शब्दों में, प्रभु ने पहले शिष्य बनाने को कहा, और फिर उन शिष्यों को बपतिस्मा देने के लिए कहा। प्रेरितों 2 में भी पतरस के प्रचार के बाद, जिन्होंने पश्चाताप किया और प्रभु को ग्रहण किया, केवल उन्हें ही बपतिस्मा दिया गया (प्रेरितों 2:41); दमिश्क के मार्ग में प्रभु का दर्शन पाने, और उसेप्रभुस्वीकार करने के बाद ही पौलुस (उस समय शाऊल) को बपतिस्मा दिया गया (प्रेरितों 9:5, 18); इसी प्रकार से प्रेरितों 19:1-5 के वार्तालाप में प्रकट है कि पौलुस जिन से बात कर रहा था, उन्होंने प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास कर लिया था। इन सभी उदाहरणों में वही क्रम दिया गया है - पहले प्रभु के शिष्य बनना, अर्थात उसे अपना उद्धारकर्ता स्वीकार कर लेना, और तब प्रभु यीशु के उन शिष्यों को ही बपतिस्मा दिया जाना। 

  यूहन्ना बपतिस्मा देने वाला यरदन नदी के आस-पास के क्षेत्र में बपतिस्मा देता था, और वहीं प्रभु यीशु का बपतिस्मा भी हुआ (यूहन्ना 1:28; 3:23; मत्ती 3:6, 13-16; मरकुस 1:5, 9-11; लूका 3:3)। प्रभु यीशु और उनके चेलों के द्वारा भी बपतिस्मा दिया जाने का उल्लेख है (यूहन्ना 3:22; 4:1-2), किन्तु यह नहीं लिखा गया है कि वे किस नदी अथवा जलाशय में बपतिस्मा देते थे। फिलिप्पुस ने सामरिया में बपतिस्मा दिया (प्रेरितों 8:12-13) किन्तु यह नहीं लिखा है कि किस नदी अथवा जलाशय में बपतिस्मा दिया गया। बाद में फिलिप्पुस ने कूश देश के खोजे को, मार्ग के किनारे के एक जलाशय में बपतिस्मा दिया (प्रेरितों 8:36-37)। तो बपतिस्मा बहते या खड़े पानी, दोनों में ही दिया जा सकता है, इसमें कोई अनिवार्यता नहीं है कि बपतिस्मा किसी नदी में ही दिया जाए। इन हवालों से यह बात भी स्पष्ट है कि बपतिस्मा जहाँ भी दिया गया, वहाँ इतना पानी अवश्य होता था कि लोग उसमें उतर कर पानी के अंदर जा सकें, और बाहर आ सकें। कहीं पर भी छिड़काव का या पानी में उँगली भिगोकर माथे अथवा सिर पर क्रूस का निशान बना देने के द्वारा बपतिस्मा दिए जाने का बाइबल में कोई उदाहरण या उल्लेख नहीं है। बाइबल में कहीं पर भी किसी शिशु अथवा बच्चे के बपतिस्मे का उल्लेख नहीं है; हमेशा ही वयस्कों को, उनकी स्वेच्छा के अनुसार बपतिस्मा दिया गया।  

  जो प्रभु के शिष्य बन गए, अर्थात जिन्होंने प्रभु यीशु को अपना उद्धारकर्ता स्वीकार कर लिया और अपना जीवन उन्हें समर्पित कर दिया, वे स्वतः ही, बपतिस्मा लेने से पहले ही प्रभु के अनुयायी, परमेश्वर की संतान, और स्वर्ग में जाने के अधिकारी हो गए। बपतिस्मा न तो उद्धार प्रदान करता है, और न ही व्यक्ति को परमेश्वर की दृष्टि में धर्मी अथवा स्वीकार्य बनाता है – बपतिस्मा केवल प्रभु यीशु में लाए गए विश्वास के द्वारा बदले हुए जीवन की सार्वजनिक रीति से गवाही देने का एक माध्यम है। ध्यान कीजिए, क्रूस पर टंगे हुए डाकू ने पापों की क्षमा पाई, और स्वर्ग चला गया – बिना बपतिस्मा लिए। ऐसे न जाने कितने लोग होंगे जिन्होंने प्रभु पर विश्वास किया, पापों से पश्चाताप किया, किन्तु किसी-न-किसी कारण वश, कोई बाधा अथवा विपरीत परिस्थिति के कारण बपतिस्मा नहीं लेने पाए – किसी दुर्घटना के बाद, किसी युद्ध भूमि में घायल होने के बाद अंतिम साँसें लेते हुए; रेगिस्तान अथवा बर्फीले इलाके में प्रभु को ग्रहण करने पर भी बपतिस्मे की सुविधा न होने के कारण; किसी सुदूर एकांत के इलाके में रेडियो पर सुसमाचार सुनकर विश्वास करने किन्तु किसी अन्य विश्वासी जन के उनके पास या साथ न होने के कारण – ऐसी कितनी ही परिस्थितियाँ हो सकती हैं, जिनके अंतर्गत बपतिस्मा लेना कई बार संभव नहीं होता है, और मनुष्य चाह कर भी बपतिस्मा नहीं लेने पाता है। क्या ऐसे लोग केवल इसलिए स्वर्ग में प्रवेश नहीं पाएँगे, क्योंकि सांसारिक परिस्थितियों के कारण वे चाहते हुए भी बपतिस्मा नहीं लेने पाए? यदि क्रूस पर लटका हुआ डाकू पश्चाताप करके, बिना बपतिस्मा लिए स्वर्ग जा सकता है, तो अन्य कोई क्यों नहीं?

  साथ ही, ध्यान कीजिए, शमौन टोन्हा करने वाले के समान (प्रेरितों 8:9-13, 18-24), सभी कलीसियाओं में ऐसे अनगिनत लोग हैं जिन्होंने रस्म के समान बपतिस्मा तो लिया, किन्तु उन्होंने सच्चा पश्चाताप कभी नहीं किया, उनके जीवनों में कोई परिवर्तन नहीं आया, वे अभी भी अपने पापों और सांसारिकता के जीवन में बने हुए हैं। वे प्रभु भोज में भी भाग लेते हैं, कलीसिया के सदस्य भी हैं, त्यौहार और पर्व भी मनाते हैं, किन्तु पाप और समझौते तथा सांसारिकता का जीवन भी जीते हैं। उनके बपतिस्मे से उन्हें क्या लाभ हुआ? क्या परमेश्वर उनके बपतिस्मे से मजबूर हो गया कि उसे अब उन्हें स्वर्ग में प्रवेश देना ही पड़ेगा, यद्यपि उनके जीवन दिखा रहे हैं कि उन्होंने उद्धार नहीं पाया है?

एक अन्य व्यर्थ बहस करने की बात बपतिस्मा प्रभु यीशु मसीह के नाम से दिया गया, यापिता, पुत्र और पवित्र आत्माके नाम से को लेकर उठाई जाती है। मत्ती 28:19 के अनुसार, प्रभु यीशु मसीह के ही शब्दों में बपतिस्मापिता, पुत्र, और पवित्र आत्माके नाम से दिया जाना है – ये तीनों ही त्रिएक परमेश्वर के स्वरूप हैं और पूर्णतः एक समान हैं, कोई भी दूसरे से न तो भिन्न है और न किसी रीति से कम है। यहीत्रिएक परमेश्वरजब इस धरती पर अवतरित होकर सदेह आया, तो उसका नामयीशुरखा गया; अर्थातयीशुत्रिएक परमेश्वर ही का नाम है, जो उसके उद्धारकर्ता स्वरूप को दिखाता है (मत्ती 1:21)। इसलिए चाहे तीनों का नाम लो, या किसी एक का, अभिप्राय तो उसी एक परमेश्वर को आदर देने और उसकी आज्ञाकारिता को पूरा करना है। इसलिए कोई फर्क नहीं पड़ता है कि केवल प्रभु यीशु मसीह के नाम से बपतिस्मा दिया/लिया जाए, या तीनों, पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के नाम से कहकर दिया/लिया जाए; बात एक ही है। यह शिक्षा, कि केवल यीशु के नाम में दिया गया बपतिस्मा ही सही है अन्यथा नहीं, विलियम ब्रैनहैम के Jesus Only समुदाय के द्वारा फैलाई जाती रही है; और ये लोग त्रिएक परमेश्वर पर विश्वास नहीं रखते हैं। वे केवल यीशु ही को मानते हैं, इसलिए त्रिएक परमेश्वर के अस्तित्व और बातों पर जहाँ और जैसे संभव है, संदेह उत्पन्न करते हैं, उसके विरोध में धारणाएं उत्पन्न करते हैं। और उनके इसी प्रयास की एक कड़ी उनके द्वारा बपतिस्मे के बारे फैलाई जाने वाली यह शिक्षा है। 

   परमेश्वर के नाम, तथा पानी के स्थान के साथ बपतिस्मे को जायज़-नाजायज़ दिखाना, शैतान के द्वारा लोगों को गलत शिक्षाओं और व्यर्थ के वाद-विवादों में फंसा कर, उनका ध्यान कर्मों की धार्मिकता की ओर लगाने का प्रयास है, जिससे वे परमेश्वर के अनुग्रह से मिलने वाली क्षमा और धार्मिकता की सादगी और आशीष से निकलकर व्यर्थ के अनुचित कर्मों में फँसे रहें, आपस में विवाद करते, लड़ते रहें, पापों से पश्चाताप के स्थान पर विधि-विधानों के निर्वाह के चक्करों में पड़कर प्रभु के मार्गों से भटक जाएँ। इन बातों को ध्यान में रखते हुए, यह प्रकट है कि महत्व बपतिस्मे को लेने का है, बपतिस्मे के समय किस या किन नामों का उच्चारण किया जाता है, उसे बहते पाने में दिया/लिया जाता है अथवा खड़े पानी में, इन बातों का नहीं। इसलिए बपतिस्मे को अनावश्यक रीति से ऐसा कोई महत्व नहीं देना चाहिए जो प्रभु ने उसके लिए नहीं कहा अथवा सिखाया है। बपतिस्मा लेना प्रभु की आज्ञा है, और आज्ञाकारिता में आशीष है। किन्तु बपतिस्मा न लेने से उद्धार नहीं चला जाता है; और बपतिस्मा ले लेने से उद्धार नहीं मिल जाता है।

     यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं तो आपके लिए यह बिलकुल स्पष्ट समझना बहुत आवश्यक है कि प्रत्येक उद्धार पाए हुए मसीही विश्वासी को, समय और अवसर के अनुसार, प्रभु की आज्ञा के अनुसार बपतिस्मा अवश्य ही लेना है – अनुग्रह से मिले उद्धार को स्थापित करने के लिए नहीं, वरन उस उद्धार की सार्वजनिक गवाही देने के लिए। यह बपतिस्मा व्यक्ति चाहे पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के नाम से ले अथवा दे, या यीशु के नाम से; बहते पाने में ले या खड़े पानी में – इससे उसके उद्धार की दशा और परमेश्वर के साथ बने संबंध पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है। किन्तु जैसे पश्चाताप के लिए, वैसे ही बपतिस्मे के लिए भी है - यह कोई रस्म का निर्वाह करना, एक औपचारिकता पूरी करना नहीं है। इसका अपना महत्व और उद्देश्य है, जिसकी सीमाओं के अंतर्गत इसे देखना, समझना, और निभाना चाहिए। 

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।    

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • निर्गमन 4-6     
  • मत्ती 14:22-36

शुक्रवार, 21 जनवरी 2022

प्रभु यीशु की कलीसिया या मण्डली - पश्चाताप द्वारा जोड़े जाना

प्रभु यीशु की कलीसिया में जुड़ना - पश्चाताप को समझना  

हम पिछले लेखों में देख चुके हैं कि परमेश्वर की अनन्तकालीन आशीषों और स्वर्गीय जीवन का संभागी होने का एकमात्र मार्ग है प्रभु यीशु मसीह की कलीसिया का अंग, उसका सदस्य होना। प्रभु यीशु मसीह की कलीसिया का अंग होने, उसमें जुड़ने की प्रक्रिया, कोई रहस्यमय या गुप्त बात नहीं है जो केवल कुछ विशिष्ट लोगों पर ही प्रकट की गई है, या जिसे हर किसी पर प्रकट नहीं किया जाता है। न ही यह किसी व्यक्ति अथवा संस्था या डिनॉमिनेशन आदि के द्वारा अपने लिए स्वतः ही निर्धारित कर लेने वाली कोई बात है। जिस प्रकार से परमेश्वर अपनी कलीसिया की हर बात के संबंध में बिलकुल निश्चित और सटीक है, हर बात को स्वयं निर्धारित करता है, उन बातों में किसी प्रकार के परिवर्तन या छेड़-छाड़ को स्वीकार नहीं करता है, उसी प्रकार से उसकी कलीसिया में सम्मिलित होने की भी परमेश्वर द्वारा एक निर्धारित प्रक्रिया है, जिसे उसने अपने वचन में सभी के लिए प्रकट कर दिया है। प्रभु की प्रथम कलीसिया की स्थापना के वृतांत, प्रेरितों 2 अध्याय में यह स्पष्ट वर्णित है। जिस रीति से वह प्रथम कलीसिया स्थापित हुई, और प्रभु द्वारा उसमें लोग जोड़े गए; उसी प्रकार से तब से लेकर आज तक भी, संसार के हर स्थान से, प्रभु यीशु के द्वारा उसकी कलीसिया के साथ लोग जोड़े जाते रहे हैं, और प्रभु के दूसरे आगमन तथा कलीसिया के उठाए जाने तक लोगों को कलीसिया में जोड़ते जाने के लिए उसी प्रक्रिया का निर्वाह होता रहेगा। 

पिछले लेख में हमने प्रेरितों 2 अध्याय से देखा था कि कोई अपने आप से प्रभु की कलीसिया में नहीं जुड़ सकता है, वरन प्रभु ही अपने लोगों को अपनी कलीसिया में जोड़ता है (प्रेरितों 2:47)। न तो जोड़े जाने वाले लोगों की भक्ति की, उनके द्वारा उनके धर्म के निर्वाह की, और न ही उन लोगों के परिवार या वंशावली की कलीसिया के साथ प्रभु की कलीसिया में जोड़े जाने में कोई भूमिका है। इस प्रक्रिया के दो पक्ष हैं - पहला प्रभु यीशु मसीह में पापों की क्षमा और उद्धार के सुसमाचार को लोगों तक पहुँचाने वाले, जन सामान्य को प्रभु के इस सुसमाचार के बारे में बताने वाले; और दूसरे वे लोग जो इस सुसमाचार को सुनकर, इसके प्रति स्वीकृति की, सकारात्मक प्रतिक्रिया देते हैं। जो सच्चे मन से यह सकारात्मक प्रतिक्रिया देते हैं, प्रभु की कलीसिया में जुड़ते हैं, उनके जीवनों में होने वाली सात बातें प्रेरितों 2:38-42 में लिखी गई हैं। इस प्रक्रिया का आरंभ पवित्र आत्मा की सामर्थ्य से दिए गए सुसमाचार द्वारा लोगों के मनों कोछेदने”, या उन्हें उनके पापों के प्रति कायल करने और फिर उन कायल होने वालों में उनके पापों के समाधान की आवश्यकता के बोध के साथ होता है (2:37)। जो पवित्र आत्मा द्वारा सुसमाचार से पापों के लिए कायल किए जाते हैं, और पापों के समाधान के लिए कोई अपना अथवा किसी प्रकार का मानवीय या संस्थागत समाधान ढूँढने के स्थान पर परमेश्वर के समाधान के खोजी होते हैं, और उस समाधान को स्वीकार करते हैं, उसका पालन करते हैं, प्रभु की कलीसिया में उनके जुड़ने का कार्य पश्चाताप के साथ आरंभ होता है (2:38) 

प्रभु की कलीसिया के साथ किसी भी व्यक्ति के जुड़ने का आरंभ उस व्यक्ति द्वारा अपने पापों के लिए पश्चाताप करने के साथ होता है। इस विषय पर हम कुछ विस्तार से 7 जनवरी के लेख में देख चुके हैं। आज हम इस अति-महत्वपूर्ण शब्दपश्चातापयामन-फिराओको और उसके अभिप्राय को समझने का प्रयास करते हैं। मूल यूनानी भाषा के जिस शब्द का अनुवादपश्चातापयामन-फिराओकिया गया है, उसका शब्दार्थ होता है पहले से बिलकुल भिन्न, उससे उलट सोच-विचार, मान्यताएं, और धारणाएं रखना। अर्थात, जिस बात के लिए पश्चाताप किया जाए, या जिसके विषय मन फिराया जाए, वह वास्तविक तब ही होगा जब व्यक्ति उन बातों के विषय अपना सोच-विचार-व्यवहार पूर्णतः बदल कर भिन्न कर ले, ऐसा कर ले जो पहले वाले के विपरीत हो। इसीलिए परमेश्वर पवित्र आत्मा ने मसीही विश्वास में आने वाले व्यक्ति के लिए लिखवाया है, “सो यदि कोई मसीह में है तो वह नई सृष्टि है: पुरानी बातें बीत गई हैं; देखो, वे सब नई हो गईं” (2 कुरिन्थियों 5:17)। प्रकट है, बाइबल की परिभाषा के अनुसार किया गयापश्चातापयामन-फिरावएक औपचारिकता, मुँह से कुछ शब्दों का दोहरा देना, और फिर वापस उसी पहले वाली सोच-विचार-व्यवहार की स्थिति में लौट जाना नहीं है। यदि व्यक्ति द्वारा किया गया यहपश्चातापयामन-फिराववास्तविक होगा, तो उस व्यक्ति में दिखने वाली दो बातों के द्वारा प्रकट एवं प्रमाणित हो जाएगा:

  1. रोमियों 12:2 “और इस संसार के सदृश न बनो; परन्तु तुम्हारी बुद्धि के नये हो जाने से तुम्हारा चाल-चलन भी बदलता जाए, जिस से तुम परमेश्वर की भली, और भावती, और सिद्ध इच्छा अनुभव से मालूम करते रहोसच्चापश्चातापयामन-फिरावकरने के बाद, फिर उस व्यक्ति में संसार के सदृश्य रहने, सोचने, व्यवहार करने आदि बातों के निर्वाह की प्रवृत्ति नहीं रहेगी। उसका चाल-चलन बदल जाएगा, और निरंतर बदलता चला जाएगा। अब वह हर बात में परमेश्वर की इच्छा जानने और मानने वाला हो जाएगा, और इसी पथ पर अग्रसर बना रहेगा। यह एक आजीवन चलती रहने वाली प्रक्रिया है - परमेश्वर पवित्र आत्मा व्यक्ति को उसके पापों के विषय कायल करता रहता है, और व्यक्ति विनम्र एवं आज्ञाकारी होकर न पापों के लिए पश्चाताप के साथ अपने मसीही जीवन एवं चाल-चलन को सुधारता रहता है। इस प्रक्रिया का प्रभाव होता है कि व्यक्ति अंश-अंश करके प्रभु यीशु मसीह के स्वरूप में ढलता चला जाता है (2 कुरिन्थियों 3:18; रोमियों 8:29)। सच्चे पश्चाताप का यह प्रथम प्रत्यक्ष एवं सर्व-विदित प्रभाव है, जिसके लिए किसी को दावा करने की आवश्यकता ही नहीं है; उसका बदला हुआ जीवन स्वयं ही उसके अंदर आए परिवर्तन को बताता है। 
  2. 2 कुरिन्थियों 7:10 “क्योंकि परमेश्वर-भक्ति का शोक ऐसा पश्चाताप उत्पन्न करता है जिस का परिणाम उद्धार है और फिर उस से पछताना नहीं पड़ता: परन्तु संसारी शोक मृत्यु उत्पन्न करता हैवास्तविक पश्चाताप या मन-फिराव, व्यक्ति के मन में परमेश्वर के सम्मुख उसके पापमय व्यवहार के लिए एक गहरा और गंभीर शोक भी उत्पन्न करता है। यह केवल दिखावे का या औपचारिकता का शोक नहीं है, इस शोक में परमेश्वर भक्ति भी सम्मिलित रहती है। अर्थात, सच्चा पश्चाताप व्यक्ति को संसार के लगाव से निकालकर संसार के प्रति अलगाव और परमेश्वर के प्रति लगाव की ओर ले जाता है। यह एक बड़ी स्वाभाविक बात है कि जिसने संसार और सांसारिकता की बातों के लिए सच्चा पश्चाताप किया है, अर्थात उस सोच-विचार-व्यवहार को वास्तव में छोड़ दिया है, उससे पलट गया है, वह उसी  सोच-विचार-व्यवहार में लिप्त कैसे रहेगा? अगर वह अभी भी लिप्त है, तो उसने उस सोच-विचार-व्यवहार के लिए वास्तविक पश्चाताप किया ही नहीं है। यही वह बनावटी या सांसारिक शोक है जिसके लिए इस पद में लिखा है कि वह मृत्यु उत्पन्न करता है; क्योंकि व्यक्ति शब्दों की औपचारिकता के निर्वाह के द्वारा यही सोचता रहता है कि उसनेवैधानिक”, या परंपरागत आवश्यकता को पूरा कर लिया है, और अब उसकी दशा ठीक और स्वीकार्य है, जबकि ऐसा होता नहीं है। अन्ततः जब तक उसे अपने उस औपचारिक पश्चाताप की वास्तविकता एवं व्यर्थता समझ में आती है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है, और व्यक्ति अनन्त विनाश में चला जाता है।

प्रभु यीशु की कलीसिया के साथ जुड़ना सच्चे पश्चाताप के साथ आरंभ होता है, जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण पश्चाताप करने वाले उस व्यक्ति के जीवन में आया पूर्ण परिवर्तन, पश्चातापी जीवन, तथा अंश-अंश करके प्रभु यीशु के स्वरूप में ढलते चले जाना और पापमय जीवन एवं व्यवहार के लिए शोक में तथा ईश्वरीय भक्ति में बढ़ते चले जाना होता है। 

यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं, तो प्रभु यीशु की कलीसिया में अपने सम्मिलित होने को भली-भांति सुनिश्चित कर लीजिए। अपने जीवन को जाँच-परख कर देख लीजिए कि आप में उपरोक्त सच्चे पश्चाताप या मन-फिराव के गुण और प्रमाण विद्यमान हैं कि नहीं? यदि लेशमात्र भी संदेह हो, तो अभी समय और अवसर रहते स्थिति को ठीक कर लीजिए। कहीं थोड़ी सी लापरवाही, बात को गंभीरता से न लेना, अनन्तकाल की पीड़ा न बन जाए। 

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी। 

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • निर्गमन 1-3     
  • मत्ती 14:1-21