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Tuesday, April 30, 2013

अनुग्रह


   प्रेरित पौलुस ने रोमियों को लिखी अपनी पत्री में एक बहुत महत्वपूर्ण बात कही: "...परन्तु जहां पाप बहुत हुआ, वहां अनुग्रह उस से भी कहीं अधिक हुआ" (रोमियों 5:20)। किंतु इस बात को लेकर लोगों ने परमेश्वर के अनुग्रह की सहजता और मनुष्य की उस अनुग्रह के दुरुपयोग की प्रवृति तथा दिखावे की धार्मिकता पर बहुत विवाद भी खड़ा कर लिया है। परमेश्वर के वचन बाइबल के एक और लेखक यहूदा ने चेतावनी दी कि परमेश्वर के अनुग्रह को मनमानी और लुचपन करने की छूट के रूप में ना लिया जाए (यहूदा 4) - जब निश्चित है कि क्षमा मिल ही जाएगी, तो भले एवं धर्मी क्यों बनें? परमेश्वर के वचन में पापों के लिए पश्चाताप पर दिया गया ज़ोर एवं महत्व भी कई लगों के मनों से इस विचार को पूर्णतः हटाने नहीं पाता है।

   इसी संदर्भ में पौलुस प्रेरित ने रोमियों की पत्री में आगे लिखा, "सो हम क्या कहें? क्या हम पाप करते रहें, कि अनुग्रह बहुत हो?" (रोमियों 6:1); और फिर साथ ही बड़ी दृढ़ता से उत्तर दिया: "कदापि नहीं, हम जब पाप के लिये मर गए तो फिर आगे को उस में क्योंकर जीवन बिताएं?" (रोमियों 6:2) - इस बात को प्रभावी बनाने के लिए पौलुस ने मृत्यु और जीवन को तुलनात्मक रूप में प्रयोग किया। नए जन्म का अनुभव पाया हुआ कोई भी मसीही विश्वासी पाप की लालसाओं के साथ जीवन व्यतीत कदापि नहीं कर सकता।

   लेकिन साथ ही यह भी सच है कि पाप और दुष्टता अपने साथ सदा ही मृत्यु की दुर्गन्ध लिए हुए नहीं आतीं; अनेक बार वे बहुत ही आकर्षक और लुभावने होते हैं। इसीलिए पौलुस की सलाह है कि: "ऐसे ही तुम भी अपने आप को पाप के लिये तो मरा, परन्तु परमेश्वर के लिये मसीह यीशु में जीवित समझो। इसलिये पाप तुम्हारे मरनहार शरीर में राज्य न करे, कि तुम उस की लालसाओं के आधीन रहो" (रोमियों 6:11-12)। पाप की लालसाओं से बचे रहने का यही एकमात्र मार्ग है, अन्य सभी मार्ग कुछ समय तक कारगर लगते हैं परन्तु किसी न किसी सीमा पर आकर समाप्त हो जाते हैं और मनुष्य फिर पाप में पड़ जाता है। परन्तु जो अपने आप को पाप के लिए तो मरा हुआ परन्तु मसीह यीशु में परमेश्वर के लिए जीवित मानकर जीवन व्यतीत करता है उस पर पाप हावी नहीं हो पाता और वह पाप करने से बचा रहता है।

   परमेश्वर का यही अनुग्रह है: मसीह यीशु में मिलने वाली पापों से क्षमा और उद्धार; यह अनुग्रह क्षमा मिलने के निश्चय के आधार पर हमें पाप करते रहने की स्वतंत्रता नहीं वरन पाप के लिए मरे हुए होने और पवित्रता का जीवन जीने को उभारता है। जो इस अनुग्रह को पाप करने की स्वतंत्रता के लिए प्रयोग करते हैं, उन्होंने इस अनुग्रह को वास्तविकता में कभी जाना ही नहीं है, पापों की क्षमा और नए जीवन का अनुभव किया ही नहीं है। इसीलिए जैसे "कि कुत्ता अपनी छांट की ओर और धोई हुई सुअरनी कीचड़ में लोटने के लिये फिर चली जाती है" (2 पतरस 2:22) ऐसे ही ये लोग भी पाप में जीवन व्यतीत करने की अपनी प्रवृति की ओर बार बार लौट जाते हैं और परमेश्वर के अनुग्रह का अनुचित लाभ उठाना चाहते हैं - जो संभव नहीं है, क्योंकि ना तो परमेश्वर ठठ्ठों में उड़ाया जा सकता है और ना ही कोई उसका मूर्ख बना कर मनमानी कर सकता है या उसे अपनी स्वार्थ सिद्धी के लिए उपयोग कर सकता है। ऐसा करने के प्रयास करने वाले एक बहुत ही कड़ुवे सच का सामना करने को तैयार रहें।

   यदि किसी ने अपने प्रति परमेश्वर के प्रेम की सच्चाई तथा उसके अनुग्रह की महानता को वास्तविकता से जाना है तो वह फिर उस अनुग्रह के दुरुपयोग के मार्ग ढूंढ़ने में नहीं वरन स्वतः ही उस अनुग्रह की विशालता और गहराई को समझने तथा स्वाभाविक रीति से उसे दूसरों के साथ बाँटने में अपने जीवन तथा समय को बितायगा। - फिलिप यैन्सी


परमेश्वर अपने अनुग्रह द्वारा हमें इसलिए नहीं बचाता कि हम अपने जीवन व्यर्थ और लुचपन की बातों में बिता