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बुधवार, 17 नवंबर 2021

मसीही सेवकाई में पवित्र आत्मा की भूमिका - 17


मसीही सेवकाई में पवित्र आत्मा की कार्य-विधि (यूहन्ना 16:12-13) - 3.

पिछले लेख में हमने देखा था कि एक बार फिर प्रभु यीशु मसीह ने परमेश्वर पवित्र आत्मा कोसत्य का आत्माकह कर संबोधित किया; अर्थात पवित्र आत्मा से संबंधित और उनकी हर बात केवल सत्य ही होगी, और वे केवल सत्य ही का मार्ग बताएंगे; वे किसी भी प्रकार के प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष असत्य के साथ कभी किसी रूप में सम्मिलित नहीं होंगे। साथ ही हमने यह भी देखा था कि परमेश्वर के वचन बाइबल के अनुसारसत्यप्रभु यीशु मसीह और उनका वचन है। तात्पर्य यह हुआ कि परमेश्वर पवित्र आत्मा की हर बात प्रभु यीशु मसीह और उनके वचन की बातों में से होगी, उन शिक्षाओं और बातों के साथ संगत होगी, कभी उनसे भिन्न अथवा अतिरिक्त नहीं होगी। साथ ही हमने यह भी देखा था कि बाइबल से संबंधित किसी भी सिद्धांत को स्वीकार करने से पहले, उसे तीन बातों के आधार पर जाँच लेना चाहिए; ये बातें हैं - i. सुसमाचारों में प्रचार किया गया; ii. प्रेरितों के काम में व्यावहारिक मसीही या मण्डली के जीवन में प्रदर्शित किया गया; iii. पत्रियों में उसकी व्याख्या की गई या उसके विषय सिखाया गया। जिस बात में ये तीनों गुण नहीं हैं, उसे तुरंत स्वीकार नहीं करना चाहिए; बेरिया के विश्वासियों के समान (प्रेरितों 17:11) वचन से यह देखना चाहिए कि जो कहा और बताया जा रहा है, वास्तव में पवित्र शास्त्र में वैसा ही लिखा है या नहीं - यह खरे आत्मिक ज्ञान का चिह्न है 1 कुरिन्थियों 2:15

यूहन्ना 16:13 में परमेश्वर पवित्र आत्मा द्वारातुम्हेंअर्थात प्रभु यीशु के शिष्यों की सार्वजनिक मसीही सेवकाई से संबंधित तीन बातों का उल्लेख है:

(i) वह सब सत्य का मार्ग बताएगा

(ii) वह अपनी ओर से नहीं कहेगा, परंतु जो कुछ सुनेगा, वही कहेगा;

(iii) वह आने वाली बातें बताएगा।

 

(i) आज परमेश्वर पवित्र आत्मा के नाम से बहुतायत से किए जाने वाले भ्रामक प्रचार, गलत शिक्षाओं, और मन-गढ़न्त बातों के संदर्भ में, उन बातों और शिक्षाओं को जाँचने और परखने, उनकी सत्यता को जानने और पहचानने के लिए, ऐसी शिक्षाओं और उनके प्रचारकों को स्वीकार अथवा अस्वीकार करने के लिए, ये तीनों बातें बहुत सहायक तथा महत्वपूर्ण हैं। ऐसे सभी प्रचारक सामान्यतः परमेश्वर के वचन की शिक्षा (1 यूहन्ना 2:15-17) के विपरीत, सांसारिक सुख-समृद्धि-संपत्ति और शारीरिक चंगाई या लाभ प्राप्त करने ही की बातें करते हैं। उनके प्रचार में पापों के लिए पश्चाताप करने (प्रेरितों 2:38), प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास द्वारा उद्धार (प्रेरितों 15:11; 16:31), प्रभु यीशु के शिष्य बनने और उससे आने वाले मन-परिवर्तन के बारे में (रोमियों 12:1-2; 2 कुरिन्थियों 5:17), और अपने आप को संसार में यात्री और परदेशी होकर सांसारिक नहीं वरन स्वर्गीय वस्तुओं पर मन लगाने (1 पतरस 2:11; कुलुस्सियों 3:1-2), मसीही विश्वास और सेवकाई में दुख आने और उठाने की अनिवार्यता (फिलिप्पियों 1:29; 2 तिमुथियुस 3:12), आदि, सुसमाचार की बातें या तो होती ही नहीं हैं, अथवा बहुत कम होती हैं। उनका प्रचार, और जीवन मुख्यतः पार्थिव, नश्वर, शारीरिक सुख-सुविधा की बातों से ही संबंधित होता है। और फिर वे यह सब पवित्र आत्मा की ओर से अथवा उनकी अगुवाई में होकर कहने का दावा करते हैं। वे शरीरों के विचित्र हाव-भाव-हरकतों और मुँह से अजीब-अजीब आवाज़ें निकालकर लोगों को प्रभावित करने और यह विश्वास दिलाने के प्रयास करते हैं कि यह सब पवित्र आत्मा उनमें होकर कर रहा है या उनसे करवा रहा है। जबकि पवित्र आत्मा के संबंध में ऐसी कोई शिक्षा, कोई बात परमेश्वर के वचन में कहीं नहीं दी गई है। तो फिर वहसत्य का आत्माजो केवल सत्य अर्थात परमेश्वर के वचन और प्रभु यीशु की बातों का मार्ग बताता है, वह यह सब कैसे कर सकता है? या तो प्रभु यीशु की कही यूहन्ना 16:13 की बात झूठ है, अन्यथा पवित्र आत्मा के नाम पर किए जा रहे ये भ्रामक एवं नाटकीय प्रचार और व्यवहार झूठ हैं। 

(ii) इस प्रकार का गलत प्रचार करने वालों में एक और बात बहुधा देखी जाती है - वे पवित्र आत्मा की ओर से नए दर्शन, नई शिक्षाएं, नई बातें बोलने के दावे करते हैं। किन्तु प्रभु यीशु मसीह ने यहाँ पर परमेश्वर पवित्र आत्मा के विषय स्पष्ट कहा है कि वेअपनी ओर न कहेगा, परंतु जो कुछ सुनेगा, वही कहेगा”; साथ ही प्रभु यीशु मसीह ने इससे पहले कहा थापरन्तु सहायक अर्थात पवित्र आत्मा जिसे पिता मेरे नाम से भेजेगा, वह तुम्हें सब बातें सिखाएगा, और जो कुछ मैं ने तुम से कहा है, वह सब तुम्हें स्मरण कराएगा (यूहन्ना 14:26)। अब जब परमेश्वर का वचन अपनी पूर्णता में लिखा जा चुका है, अनन्तकाल के लिए स्वर्ग में स्थापित हो चुका है (भजन 119:89), साथ ही प्रभु यीशु द्वारा कही गई उपरोक्त बातों को भी ध्यान में रखते हुए, तो फिर यह कैसे संभव है कि परमेश्वर पवित्र आत्मा उस वचन के अतिरिक्त और कुछ नया किसी मनुष्य को बताए या सिखाए? यह तो उपरोक्त बातों के विरुद्ध होगा, उन्हें झूठ दिखाएगा - जोसत्य के आत्मापवित्र आत्मा के गुणों के विरुद्ध है। एक और बार हमारे समान फिर वही आँकलन आ जाता है - या तो परमेश्वर का वचन सही है, तो फिर ये प्रचारक और उनकी शिक्षाएं और व्यवहार झूठे होंगे; अन्यथा ये प्रचारक और उनके दावे सही हैँ, तो फिर परमेश्वर के वचन की शिक्षाएं स्थिर, स्थापित और सच्ची नहीं हैं, वरन परिवर्तनीय हैं, अविश्वासयोग्य हैं क्योंकि लिखा कुछ है और हो कुछ और ही रहा है! आप किस पर विश्वास करेंगे - परमेश्वर और परमेश्वर के वचन पर या मनुष्य और उसके वचन, व्यवहार, और दावों पर?

(iii) एक और बात जिसका दावा ये भ्रामक एवं नाटकीय प्रचार और व्यवहार करने वाले अकसर करते हैं, वह हैभविष्यवाणियाँ। अवश्य ही प्रभु यीशु ने शिष्यों से कहा कि पवित्र आत्मा 'तुम्हें' अर्थात प्रभु यीशु के शिष्यों को आने वाली बातें बताएगा। किन्तु यदि नए नियम की बातों के आधार पर इस बात को देखें, तो इस बात का जो अर्थ सामने आता है वह है कि पवित्र आत्मा मसीही सेवकाई और सुसमाचार प्रचार के दौरान शिष्यों को आने वाली बातों को बताता है, अर्थात उन्हें सचेत रखता था। ऐसा बिलकुल नहीं था कि पवित्र आत्मा लोगों को अपना ढिंढोरा पीटने और अपने आप को लोगों के सामने भविष्यद्वक्ता दिखा कर वाह-वाही लूटने के लिए कहता था। वरन वह सुसमाचार प्रचार में लगे प्रभु के शिष्यों को हर परिस्थिति के लिए तैयार और आगाह रखता था, जो शिष्यों की सेवकाई के लिए बहुत महत्वपूर्ण बात थी (प्रेरितों 9:16; 13:4; 20:22-23; 21:4, 11; 23:16)। दूसरी बात, यदि लोगों द्वारापवित्र आत्मा की ओर सेमिली और की जा रही भविष्यवाणियों के विषयों को देखें, और उनके पूरा होने का आँकलन करें, तो स्पष्ट हो जाता है कि उनभविष्यवाणियोंके विषय और सामग्री, सामान्यतः परमेश्वर के वचन से बाहर या अतिरिक्त होते हैं - जो, जैसा हम ऊपर देख चुके हैं, पवित्र आत्मा की ओर से किया जाना संभव नहीं है। साथ ही यदि उनके पूरे होने के आधार पर आँकलन करने के लिए उन्हें परमेश्वर के वचन की शिक्षा से देखें, तो लिखा है , “और यदि तू अपने मन में कहे, कि जो वचन यहोवा ने नहीं कहा उसको हम किस रीति से पहचानें? तो पहचान यह है कि जब कोई नबी यहोवा के नाम से कुछ कहे; तब यदि वह वचन न घटे और पूरा न हो जाए, तो वह वचन यहोवा का कहा हुआ नहीं; परन्तु उस नबी ने वह बात अभिमान कर के कही है, तू उस से भय न खाना” (व्यवस्थाविवरण 18:21-22)। अर्थात दोनों ही रीति से ऐसे लोगों द्वारा की जा रहीभविष्यवाणियोंके परमेश्वर की ओर से होने की पुष्टि नहीं होती है। फिर भी ये लोग, बेधड़क होकर, परमेश्वर पवित्र आत्मा के नाम से कुछ भी कहते और करते रहते हैं; तथा लोग सच्चाई की पहचान करने और फिर स्वीकार करने के स्थान पर, उनकी बातों में आकर मूर्ख बनते रहते हैं, उनके पीछे चलते रहते हैं। 

यदि आप मसीही विश्वासी हैं तो यह आपके लिए अनिवार्य है कि आप परमेश्वर पवित्र आत्मा के विषय वचन में दी गई शिक्षाओं को गंभीरता से सीखें, समझें और उनका पालन करें; और सत्य को जान तथा समझ कर ही उचित और उपयुक्त व्यवहार करें, सही शिक्षाओं का प्रचार करें। आपको अपनी हर बात का हिसाब प्रभु को देना होगा (मत्ती 12:36-37)। जब वचन आपके हाथ में है, वचन को सिखाने के लिए पवित्र आत्मा आपके साथ है, तो फिर बिना जाँचे और परखे गलत शिक्षाओं में फँस जाने, तथा मनुष्यों और उनके समुदायों और शिक्षाओं को आदर देते रहने के लिए उन गलत शिक्षाओं में बने रहने के लिए कोई उत्तर नहीं दे सकेंगे। 

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो थोड़ा थम कर विचार कीजिए, क्या मसीही विश्वास के अतिरिक्त आपको कहीं और यह अद्भुत और विलक्षण आशीषों से भरा सौभाग्य प्राप्त होगा, कि आप जैसी भी दशा में हैं, उसी में परमेश्वर आपको स्वीकार कर लेगा, और सदा काल के लिए अपना बना लेगा। साथ ही क्या किसी पापी मनुष्य के लिए कहीं और यह संभव है कि परमेश्वर स्वयं आप में आ कर सर्वदा के लिए निवास करे; आपको धर्मी बनाए; आपको अपना वचन सिखाए; और आपको शैतान की युक्तियों और हमलों से सुरक्षित रखने के सभी प्रयोजन करके दे? और फिर, आप में होकर अपने आप को तथा अपनी धार्मिकता को औरों पर प्रकट करे, आपको खरा आँकलन करने और सच्चा न्याय करने वाला बनाए; तथा आप में होकर पाप में भटके लोगों को उद्धार और अनन्त जीवन प्रदान करने के अपने अद्भुत कार्य करे, जिससे अंततः आपको ही अपनी ईश्वरीय आशीषों से भर सके? इसलिए अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। स्वेच्छा और सच्चे मन से अपने पापों के लिए पश्चाताप करके, उनके लिए प्रभु से क्षमा माँगकर, अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आप अपने पापों के अंगीकार और पश्चाताप करके, प्रभु यीशु से समर्पण की प्रार्थना कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए मेरे सभी पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।प्रभु की शिष्यता तथा मन परिवर्तन के लिए सच्चे पश्चाताप और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • यहेजकेल 5-7 
  • इब्रानियों 12

मंगलवार, 16 नवंबर 2021

मसीही सेवकाई में पवित्र आत्मा की भूमिका - 16

 

       

मसीही सेवकाई में पवित्र आत्मा की कार्य-विधि (यूहन्ना 16:12-13) - 2.


पिछले लेख में हमने देखा था कि मसीही विश्वास और सेवकाई से संबंधित कुछ बातें और कुछ शिक्षाएं ऐसी भी हैं, जिन्हें समझने और मानने के लिए परमेश्वर पवित्र आत्मा की सहायता की आवश्यकता होती है, जैसा प्रभु यीशु मसीह ने स्वयं शिष्यों से कहा है। इसका एक उदाहरण हमें यूहन्ना 6:60-66 में हमें मिलता है, जहाँ आने वाले समय में स्थापित किए जाने वाले प्रभु-भोज से संबंधित प्रभु की शिक्षाओं को उनके उस समय के कई शिष्य समझ नहीं सके, सहन नहीं कर सके, और इस कारण प्रभु यीशु को छोड़कर चले गए। उद्धार पाने के साथ ही, तुरंत ही पवित्र आत्मा मसीही विश्वासी में आकर निवास करने लगता है, किन्तु जब तक उद्धार पाया हुआ व्यक्ति पवित्र आत्मा की अगुवाई में, उनकी आज्ञाकारिता में चलने न लगे, तब तक उसमें मसीही जीवन जीने के लिए वह परिपक्वता और समझ-बूझ विकसित नहीं होती है, जो समय के अनुसार हो जानी चाहिए। पौलुस ने कुरिन्थुस के मसीही विश्वासियों को उनके अपरिपक्व व्यवहार के लिए उलाहना दिया, उन्हें बालक और शारीरिक कहा (1 कुरिन्थियों 3:1-4) क्योंकि उनके अंदर पवित्र आत्मा के फलों (गलातियों 5:22-23) दिखाई देने की बजाए सांसारिकता का व्यवहार दिखाई दे रहा था। इसी प्रकार से इब्रानियों का लेखक भी अपने पाठकों को झिड़कता है, क्योंकि वे अभी भी मसीही विश्वास में आने के उनके समय के अनुसार उनसे अपेक्षित परिपक्वता तक नहीं पहुँचे थे, उन्हें अभी भी मसीही विश्वास की मूल बातें समझना और सीखना आवश्यक था (इब्रानियों 5:11-14)। 


अर्थात मसीही विश्वासी में पवित्र आत्मा की उपस्थिति, स्वतः ही उसे मसीही सेवकाई के लिए उपयुक्त नहीं बना देती है। हर व्यक्ति को मसीही जीवन जीना, उसमें बढ़ना, और परमेश्वर के वचन की आज्ञाकारिता में रहना सीखना पड़ता है; और परमेश्वर पवित्र आत्मा इसमें सहायक तथा मार्गदर्शक होता है। यदि व्यक्ति सीखने और मानने वाला न बने, सांसारिक बातों में ही लगा रहे (इफिसियों 4 अध्याय), तो इससे पवित्र आत्मा शोकित होता है (इफिसियों 4:30)। पवित्र आत्मा की अगुवाई में पौलुस प्रेरित ने लिखा, “पर मैं कहता हूं, आत्मा के अनुसार चलो, तो तुम शरीर की लालसा किसी रीति से पूरी न करोगे” (गलातियों 5:16); अर्थात जीवन में सांसारिकता तथा शरीर की लालसाओं की पूर्ति की अभिलाषाएं यह प्रमाणित करते हैं कि उद्धार पाया हुआ व्यक्ति अभी पवित्र आत्मा के चलाए नहीं चल रहा है, मसीही परिपक्वता की ओर अग्रसर नहीं है। इसके विपरीत उस व्यक्ति का बदला हुआ जीवन, उसके जीवन में दिखने वाले पवित्र आत्मा के फल, उसका परमेश्वर के वचन को प्राथमिकता देना और उस वचन की आज्ञाकारिता में चलते रहना, उसके जीवन तथा व्यवहार से सांसारिक लोगों का पाप, धार्मिकता, और न्याय के विषय कायल होना, आदि बातें प्रत्यक्ष प्रमाण होते हैं के व्यक्ति में पवित्र आत्मा विद्यमान है, और वह व्यक्ति पवित्र आत्मा के चलाए चल रहा है।


यूहन्ना 16:13 में, पवित्र आत्मा के शिक्षक होने के कार्य के संबंध में एक बार फिर उन्हें 'सत्य का आत्मा' कहा गया है; अर्थात उनकी हर बात सत्य है, और वे केवल सत्य ही का मार्ग बताएंगे; वे किसी भी असत्य के साथ कभी सम्मिलित नहीं होंगे। परमेश्वर का वचन बाइबल ही ‘सत्य’ को पुराने तथा नए नियम में परिभाषित करती है:

भजन संहिता 119:160 तेरा सारा वचन सत्य ही है; और तेरा एक एक धर्ममय नियम सदा काल तक अटल है

यूहन्ना 14:6 यीशु ने उस से कहा, मार्ग और सच्चाई और जीवन मैं ही हूं; बिना मेरे द्वारा कोई पिता के पास नहीं पहुंच सकता

यूहन्ना 17:17 सत्य के द्वारा उन्हें पवित्र कर: तेरा वचन सत्य है


अर्थात, जिस सत्य की बात वचन में की जाती है, वह सांसारिक मानकों और परिभाषाओं के अनुसार नहीं है, वरन परमेश्वर के वचन, तथा प्रभु यीशु मसीह और उनकी शिक्षाओं के अनुसार ‘सत्य’ है। इसका सीधा और स्पष्ट तात्पर्य है कि जो भी व्यवहार एवं शिक्षा परमेश्वर के वचन में नहीं दी गई है, अथवा प्रभु यीशु मसीह के जीवन, व्यवहार, और शिक्षाओं में देखने को नहीं मिलती है, वह सब मसीही जीवन, विश्वास, और सेवकाई के संबंध में असत्य है, अनुचित है। ऐसी हर शिक्षा और व्यवहार  मसीही विश्वासी के लिए अस्वीकार्य है, क्योंकि, जैसा कि प्रभु यीशु मसीह ने कहा, हर असत्य शैतान की ओर से होता है, शैतान ही झूठ का पिता है (यूहन्ना 8:44)। मसीही विश्वास एवं सेवकाई में सही शिक्षा और सिद्धान्तों की पहचान करने के लिए उसमें तीन गुण विद्यमान होने चाहिएं:

i. उसे सुसमाचारों में प्रचार किया गया हो, अर्थात प्रभु यीशु मसीह द्वारा कहे और सिखाए गए होना।

ii. वे प्रेरितों के काम में व्यावहारिक मसीही या मण्डली के जीवन में प्रदर्शित किए गए हों; अर्थात उनका प्रथम एवं आरंभिक मंडलियों द्वारा माना गया और पालन किया गया होना चाहिए।

iii. पत्रियों में उसकी व्याख्या की गई या उसके विषय सिखाया गया हो; अर्थात परमेश्वर पवित्र आत्मा ने उन शिक्षाओं और व्यवहारों की पुष्टि की है, और उनसे संबंधित और बातें को भी परमेश्वर के वचन में सिखाया तथा लिखवाया है।

जिस भी शिक्षा, व्यवहार, या बात में ये तीनों गुण नहीं हैं, उसे तुरंत स्वीकार नहीं करना चाहिए, उसे बताने वाला चाहे कोई भी हो, कितना भी प्रसिद्ध और ज्ञानी क्यों न हो। पहले, सचेत होकर तथा प्रार्थना के साथ, बेरिया के विश्वासियों के समान, वचन से यह देखना चाहिए कि जो उस शिक्षा अथवा व्यवहार में कहा और बताया जा रहा है, वास्तव में पवित्र शास्त्र में वैसा ही लिखा है या नहीं - यह करना कोई आपत्तिजनक बात नहीं वरन खरे आत्मिक जन होने का चिह्न है 1 कुरिन्थियों 2:15।


यदि आप मसीही विश्वासी हैं, तो क्या आप किसी मसीही सेवकाई में भी संलग्न हैं? आपके लिए यह करना अनिवार्य है क्योंकि परमेश्वर पिता ने अपनी सभी संतानों के लिए कुछ-न-कुछ सेवकाई पहले से तय की हुई है (इफिसियों 2:10), और आपका उसे पूरा न करना, अनाज्ञाकारिता है, आपके अनन्त जीवन के प्रतिफलों के लिए हानिकारक है। आप जिन बातों, शिक्षाओं, व्यवहार का पालन करते हैं या औरों को उन्हें सिखाते और उन से करवाते हैं, उनके विषय बहुत सचेत रहने वाले और उन्हें परमेश्वर के वचन के अनुसार खराई से जाँचने वाले बनें। अन्यथा शैतान अपनी चतुराई से आपको आकर्षक तथा प्रबल लगने वाली किन्तु गलत शिक्षाओं और व्यवहार के द्वारा बहका कर बहुत नुकसान में फंसा देगा (2 कुरिन्थियों 11:3; कुलुस्सियों 2:4, 6-8)। 


यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो थोड़ा थम कर विचार कीजिए, क्या मसीही विश्वास के अतिरिक्त आपको कहीं और यह अद्भुत और विलक्षण आशीषों से भरा सौभाग्य प्राप्त होगा, कि आप जैसी भी दशा में हैं, उसी में परमेश्वर आपको स्वीकार कर लेगा, और सदा काल के लिए अपना बना लेगा। साथ ही क्या किसी पापी मनुष्य के लिए कहीं और यह संभव है कि परमेश्वर स्वयं आप में आ कर सर्वदा के लिए निवास करे; आपको धर्मी बनाए; आपको अपना वचन सिखाए; और आपको शैतान की युक्तियों और हमलों से सुरक्षित रखने के सभी प्रयोजन करके दे? और फिर, आप में होकर अपने आप को तथा अपनी धार्मिकता को औरों पर प्रकट करे, आपको खरा आँकलन करने और सच्चा न्याय करने वाला बनाए; तथा आप में होकर पाप में भटके लोगों को उद्धार और अनन्त जीवन प्रदान करने के अपने अद्भुत कार्य करे, जिससे अंततः आपको ही अपनी ईश्वरीय आशीषों से भर सके? इसलिए अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। स्वेच्छा और सच्चे मन से अपने पापों के लिए पश्चाताप करके, उनके लिए प्रभु से क्षमा माँगकर, अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आप अपने पापों के अंगीकार और पश्चाताप करके, प्रभु यीशु से समर्पण की प्रार्थना कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए मेरे सभी पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” प्रभु की शिष्यता तथा मन परिवर्तन के लिए सच्चे पश्चाताप और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी। 


एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • यहेजकेल 3-4 

  • इब्रानियों 11:20-40


सोमवार, 15 नवंबर 2021

मसीही सेवकाई में पवित्र आत्मा की भूमिका - 15

        

मसीही सेवकाई में पवित्र आत्मा की कार्य-विधि (यूहन्ना 16:12-13) - 1.


हम देखते आ रहे हैं कि मसीही विश्वासी की मसीही सेवकाई परमेश्वर पवित्र आत्मा की सहायता और मार्गदर्शन से ही संभव है। हमने यूहन्ना 16:8-11 से इस सेवकाई के विषय में देखा है, कि मसीही सेवक में परमेश्वर पवित्र आत्मा की उपस्थिति का प्रमाण, उस मसीही के जीवन, व्यवहार, और कार्य के द्वारा संसार के लोगों को ‘निरुत्तर’ या कायल किया जाना है। मसीही विश्वासी, पवित्र आत्मा की सहायता और मार्गदर्शन द्वारा, संसार के लोगों पर पाप, धार्मिकता, और न्याय के बारे में उन लोगों के विचार, व्यवहार, और धारणाओं की तुलना में मसीही शिक्षाओं और जीवन को रखता है, अपने जीवन से उन्हें प्रदर्शित करता है। संसार और मसीही विश्वास के मध्य का यह तुलनात्मक प्रकटीकरण, स्वतः ही संसार के लोगों को कायल करने के लिए पर्याप्त है। बाइबल के अनुसार यही अपने आप में मसीही विश्वासी में पवित्र आत्मा की उपस्थिति का प्रमाण है। मसीही विश्वासियों के परिवर्तित जीवन, उनका खरा व्यवहार, और परमेश्वर के भय में होकर किए गए उनके कार्य, संसार के लोगों में उनके प्रति एक ऐसे ‘भय’ या आदर का भाव उत्पन्न कर देते हैं (प्रेरितों 2:43; 5:11; 9:31; 19:17), जो अपने आप में उनके संसार के लोगों से पृथक तथा उनमें एक अलौकिक सामर्थ्य के विद्यमान होने का प्रमाण होता है। 


आज बहुत से लोग, मत, समुदाय, और डिनॉमिनेशंस पवित्र आत्मा के नाम पर बाइबल से बाहर की बातों, व्यवहार, और शिक्षाओं के आधार पर लोगों को पवित्र आत्मा की उपस्थिति दिखाने और प्रमाणित करने की शिक्षाएं देने में लगे हुए हैं। किन्तु प्रभु द्वारा कही गई इन बातों पर ध्यान देना, उन्हें बताना और सिखाना उनके ‘प्रमाणों’ का भाग नहीं हैं। न ही संसार के लोग उनके जीवन तथा व्यवहार के कारण पाप, धार्मिकता, और न्याय के विषय कायल होते हैं; और न ही उनके प्रति वह आदर या ‘भय’ की भावना संसार के लोगों में उत्पन्न होती है, जो आरंभिक मसीही विश्वासियों के जीवन और कार्यों से सभी स्थानों के लोगों के मध्य होती थी। वरन इन गलत शिक्षाओं को बताने और सिखाने वालों के व्यवहार को लेकर, लोगों में 1 कुरिन्थियों 14:23 के अनुसार प्रतिक्रिया अधिक देखी जाती है। उनका यह बाइबल की शिक्षाओं से पूर्णतः भिन्न व्यवहार और अनुचित शिक्षाएं न तो उनमें परमेश्वर पवित्र आत्मा की उपस्थिति को प्रमाणित करते हैं, और न ही परमेश्वर की महिमा का कारण ठहरते हैं; वरन परमेश्वर और बाइबल की बातों के उपहास और अविश्वास को ही बढ़ावा देते हैं। 


मसीही सेवकाई के लिए शिष्यों को तैयार करते हुए, यूहन्ना 16 अध्याय की चर्चा में, प्रभु ने 12 और 13 पद में एक और बात अपने शिष्यों के समक्ष रखी: “मुझे तुम से और भी बहुत सी बातें कहनी हैं, परन्तु अभी तुम उन्हें सह नहीं सकते। परन्तु जब वह अर्थात सत्य का आत्मा आएगा, तो तुम्हें सब सत्य का मार्ग बताएगा, क्योंकि वह अपनी ओर से न कहेगा, परन्तु जो कुछ सुनेगा, वही कहेगा, और आने वाली बातें तुम्हें बताएगा” (यूहन्ना 16:12-13)। ये शिष्य लगभग साढ़े-तीन वर्ष से प्रभु यीशु के साथ रहे थे, प्रभु से सीखते रहे थे, प्रभु के भेजे जाने पर सुसमाचार प्रचार के लिए भी गए थे और उन्होंने आश्चर्यकर्म भी किए तथा दुष्टात्माओं को भी निकाला था। किन्तु अब, अपनी पृथ्वी की सेवकाई के अंतिम समय में आ कर, और उन्हें उनकी आने वाले दिनों की सेवकाई के विषय, प्रभु उनसे कहता है “मुझे तुम से और भी बहुत सी बातें कहनी हैं, परन्तु अभी तुम उन्हें सह नहीं सकते” मूल यूनानी भाषा के जिस शब्द का हिन्दी अनुवाद ‘सह’ किया गया है, उसका मूल भाषा का अर्थ है “उठाना” या “निर्वाह करना”। अर्थात प्रभु से साढ़े तीन वर्ष प्रशिक्षण पाने, और सामर्थी कार्य कर लेने के बाद भी उनके लिए सेवकाई से संबंधित अभी “बहुत सी बातें” थीं, जिन्हें उन शिष्यों को जानना, सीखना, और समझना अभी शेष था। और जैसा यूहन्ना 16:13 में लिखा है, ये बातें, परमेश्वर पवित्र आत्मा ने ही आ कर उन्हें सिखाना था। इन बातों का, जो केवल पवित्र आत्मा की सामर्थ्य और सहायता से सीखी, समझी, और निर्वाह की जा सकती हैं, एक उदाहरण यूहन्ना 6:60-66 में हमें मिलता है, जहाँ आने वाले समय में स्थापित किए जाने वाले प्रभु-भोज से संबंधित प्रभु की शिक्षाओं को उनके कई शिष्य समझ नहीं सके, सहन नहीं कर सके, और उन्हें छोड़कर चले गए। किन्तु आज, मसीही विश्वासियों के लिए, उनके लिए जिनमें उद्धार के साथ ही पवित्र आत्मा आकार निवास करने लगता है, प्रभु-भोज से संबंधित इन शिक्षाओं को ग्रहण करना कठिन नहीं है; क्योंकि उनमें बसने वाला पवित्र आत्मा उन्हें उन बातों के विषय बताता है, उनका पालन करना सिखाता है।


यदि आप मसीही विश्वासी हैं, तो आपके जीवन में परमेश्वर पवित्र आत्मा की क्या भूमिका और कार्य प्रकट होते हैं? क्या आपका मसीही जीवन आज संसार के लोगों के समक्ष एक आधारभूत परिवर्तन का जीवन, उन लोगों के जीवन और व्यवहार से पृथक तुलना का जीवन प्रस्तुत करता है? क्या संसार के लोगों में आपके जीवन, व्यवहार, कार्य, आदि के द्वारा आपके तथा आपके परमेश्वर के प्रति एक आदर का, ‘भय’ का भाव उत्पन्न होता है? या फिर वे आपकी बातों और व्यवहार के कारण आपका तथा आपके परमेश्वर और विश्वास का उपहास करते हैं, और अविश्वास करते हैं? अपने मसीही जीवन, व्यवहार, और शिक्षाओं को परख कर देखें (1 थिस्सलुनीकियों 5:21), और केवल उन बातों को ही थामें रहने जो परमेश्वर के वचन के अनुसार हैं; न कि उन बातों के पालन में लगे रहें जो आपके मत या डिनॉमिनेशन के अनुसार हैं (गलातीयों 1:10)। तब ही आप प्रभावी मसीही सेवक बन सकेंगे; अन्यथा विचित्र व्यवहार, और चिह्न-चमत्कारों के चक्करों में पड़े हुए, इन बातों पर आधारित गलत शिक्षाओं में भटकते रहेंगे, इन्हें ही पवित्र आत्मा की उपस्थिति और सामर्थ्य के प्रमाण मानते रहेंगे। और अंततः जब आँख खुलेगी, समझ आएगी कि शैतान भी अपनी शक्ति से यही सब कर सकता है और करता रहता है (2 कुरिन्थियों 11:3, 13-15; 2 थिस्सलुनीकियों 2:9-12), तब तक बहुत देर हो चुकेगी, आप सब कुछ गँवा चुके होंगे, और गलती सुधारने के अवसर समाप्त हो चुके होंगे।


यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो थोड़ा थम कर विचार कीजिए, क्या मसीही विश्वास के अतिरिक्त आपको कहीं और यह अद्भुत और विलक्षण आशीषों से भरा सौभाग्य प्राप्त होगा, कि स्वयं परमेश्वर आप में आ कर सर्वदा के लिए निवास करे; आपको धर्मी बनाए; आपको अपना वचन सिखाए; और आपको शैतान की युक्तियों और हमलों से सुरक्षित रखने के सभी प्रयोजन करके दे? और फिर, आप में होकर अपने आप को तथा अपनी धार्मिकता को औरों पर प्रकट करे, आपको खरा आँकलन करने और सच्चा न्याय करने वाला बनाए; तथा आप में होकर पाप में भटके लोगों को उद्धार और अनन्त जीवन प्रदान करने के अपने अद्भुत कार्य करे, जिससे अंततः आपको ही अपनी ईश्वरीय आशीषों से भर सके? इसलिए अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। स्वेच्छा और सच्चे मन से अपने पापों के लिए पश्चाताप करके, उनके लिए प्रभु से क्षमा माँगकर, अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आप अपने पापों के अंगीकार और पश्चाताप करके, प्रभु यीशु से समर्पण की प्रार्थना कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए मेरे सभी पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” प्रभु की शिष्यता तथा मन परिवर्तन के लिए सच्चे पश्चाताप और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी। 

 


एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • यहेजकेल 1-2 

  • इब्रानियों 11:1-19


रविवार, 14 नवंबर 2021

मसीही सेवकाई में पवित्र आत्मा की भूमिका - 14

       

मसीही सेवकाई में पवित्र आत्मा का प्रमाण - न्याय के लिए कायल करना (यूहन्ना 16:11).

पिछले लेखों में हमने देखा है कि मसीही सेवकाई में, परमेश्वर पवित्र आत्मा अपने कार्य और सामर्थ्य को प्रभु यीशु के शिष्यों, अर्थात मसीही विश्वासियों में होकर करता है, और उनमें होकर संसार के लोगों के समक्ष मसीही जीवन के उदाहरण तथा वचन की शिक्षाओं को प्रत्यक्ष करता है। इस प्रकार से परमेश्वर पवित्र आत्मा मसीही विश्वासी यानि कि प्रभु यीशु के शिष्य बनने वालों के जीवन, व्यवहार, और विचारधारा में, मसीही विश्वास में आने के बाद आए परिवर्तन का प्रत्यक्ष एवं व्यावहारिक प्रमाण प्रदान करता है। साथ ही यह प्रत्यक्ष एवं व्यावहारिक प्रमाण औरों को भी प्रभावित एवं प्रोत्साहित करता है कि जैसा औरों के जीवन में हुआ है, वैसे ही उनके जीवन में भी हो। यूहन्ना 16:8 में पवित्र आत्मा ने तीन बातें लिखवाई हैं, जिनके विषय वह प्रभु यीशु के शिष्यों में होकर संसार को दोषी ठहराता, या कायल करता है। ये तीन बातें हैं - पाप, धार्मिकता, और न्याय। और फिर पद 9, 10, और 11 में इन तीनों के विषय टिप्पणी दी है। इनमें से पहली दो बातें, पाप तथा धार्मिकता के विषय कायल करना को हम यूहन्ना 16:9, 10 से पिछले दो लेखों में देख चुके हैं। आज हम तीसरी बात, न्याय के लिए कायल करने के विषय हम यूहन्ना 16:11 “न्याय के विषय में इसलिये कि संसार का सरदार दोषी ठहराया गया हैसे कुछ शिक्षाएं लेंगे।

मूल यूनानी भाषा के जिस शब्द का अनुवाद यहाँन्यायकिया गया है, उसका अर्थ होता हैपहचान करनायानिर्णय लेना। जिससेन्यायशब्द का सामान्य अभिप्राय, वैधानिक या कानूनी न्याय करना, यानि कि उनके अपराधों के लिए लोगों को दोषी ठहराना और दण्ड देना ध्यान में आता है। किन्तु इस शब्द का केवल यही - दोषी ठहराना और दण्ड देना ही एकमात्र अभिप्राय और प्रयोग नहीं है। इस शब्द का प्रयोग और अर्थ सही पहचान करने, परिस्थितियों का सही विश्लेषण करने, या व्यक्तियों का सही आँकलन करने और उनके विषय सही निर्णय करने, आदि के लिए भी किया जाता है। यूहन्ना 16:11 में पवित्र आत्मा द्वारा करवाए गएन्यायऔरसंसार का सरदारअर्थात शैतान केन्यायके मध्य एक तुलना (contrast) खी गई है। अर्थात, दोनों केन्यायकरने, यानि कि सही निर्णय देने, या सही पहचान, अथवा आँकलन करने में भिन्नता है। और परमेश्वर पवित्र आत्मा, मसीही विश्वासियों में होकर बिलकुल सटीक, सही, और पक्षपात रहित न्याय, उचित व्यवहार, या निर्णय करवाने के द्वारा, ऐसे उदाहरण प्रस्तुत करेगा जो संसार के लोगों द्वारा सांसारिक विचार और व्यवहार के अनुसार, “संसार के सरदारके प्रभाव में होकर किए जाने वाले अनुचित एवं अपूर्ण न्याय, या निर्णय के बारे में उनको दोषी ठहराएंगे। एकमात्र सच्चे और जीवते प्रभु परमेश्वर का न्याय सदा सच्चा, खरा, और पक्षपात रहित होता है। परमेश्वर के वचन बाइबल से इसके विषय कुछ हवाले देखिए:

परमेश्वर का भय मानने वाले, तथा परमेश्वर के भय में होकर राज्य करने वाले यहूदा के राजा यहोशापात ने अपने प्रजा के ऊपर जब न्यायी ठहराए:फिर उसने यहूदा के एक एक गढ़ वाले नगर में न्यायी ठहराया। और उसने न्यायियों से कहा, सोचो कि क्या करते हो, क्योंकि तुम जो न्याय करोगे, वह मनुष्य के लिये नहीं, यहोवा के लिये करोगे; और वह न्याय करते समय तुम्हारे साथ रहेगा। अब यहोवा का भय तुम में बना रहे; चौकसी से काम करना, क्योंकि हमारे परमेश्वर यहोवा में कुछ कुटिलता नहीं है, और न वह किसी का पक्ष करता और न घूस लेता है” (2 इतिहास 19:5-7)

प्रभु यीशु मसीह ने अपने समय के धर्म के अगुवों को उनके व्यवहार औरन्यायके विषय उलाहना देते हुए, उनधार्मिकलोगों से अपने विषय में कहा, “मैं अपने आप से कुछ नहीं कर सकता; जैसा सुनता हूं, वैसा न्याय करता हूं, और मेरा न्याय सच्चा है; क्योंकि मैं अपनी इच्छा नहीं, परन्तु अपने भेजने वाले की इच्छा चाहता हूं” (यूहन्ना 5:30); औरमुंह देखकर न्याय न चुकाओ, परन्तु ठीक ठीक न्याय चुकाओ” (यूहन्ना 7:24) 

निष्कर्ष यह कि मसीही विश्वास में आने के द्वारा व्यक्ति के मन, जीवन, विचार, और व्यवहार में जो परिवर्तन आता है, वह उसे परमेश्वर पवित्र आत्मा की अधीनता में खरा और सच्चा न्याय करने, या जाँच-परख करने, या सही आँकलन करके पक्षपात रहित निर्णय करने वाला बना देता है। उसका यह बदला हुआ व्यवहार, उसमें परमेश्वर पवित्र आत्मा की उपस्थिति का प्रमाण है। साथ ही उसका इस प्रकार का जीवन, पाप और पापमय प्रवृत्तियों तथा विचारधाराओं में रहने वाले, “संसार के सरदारके प्रभाव में होकर कार्य करने वाले लोगों के समक्ष एक तुलना (contrast) रखता है, और उन्हें उनके अनुचित न्याय, व्यवहार, और विचार के लिए दोषी ठहराता है। 

यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं, तो यूहन्ना 16:11 के समक्ष आपका जीवन कैसा है? यदि आप अभी इस पद के समक्ष अपने आप को दोषी पाते हैं, तो फिर आपको 2 कुरिन्थियों 13:5 के अनुसार अपने आप को और अपने मसीही विश्वास में होने के दावे का पुनः अवलोकन करने, अपने मसीही विश्वासी होने की समीक्षा करने की आवश्यकता है। मसीही विश्वासी होने के नाते, आप में विद्यमान परमेश्वर पवित्र आत्मा आपको संसार के लोगों के समान अनुचित न्याय नहीं करने देगा। आप जब भी ऐसा करेंगे, वह आपके जीवन में खलबली उत्पन्न करेगा, आपके जीवन में तब तक बेचैनी रहेगी जब तक आप अपने इस गलत व्यवहार को सही नहीं कर लेंगे। और यदि आप फिर भी ढिठाई में ऐसे व्यवहार में बने रहेंगे, जो एक मसीही विश्वासी के लिए सही नहीं है, तो आपको ताड़ना में से भी होकर निकलना पड़ेगा, जिससे आप सुधारे जा सकें (इब्रानियों 12:5-11)

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो थोड़ा थम कर विचार कीजिए, क्या मसीही विश्वास के अतिरिक्त आपको कहीं और यह अद्भुत और विलक्षण आशीषों से भरा सौभाग्य प्राप्त होगा, कि स्वयं परमेश्वर आप में आ कर सर्वदा के लिए निवास करे; आपको धर्मी बनाए; आपको अपना वचन सिखाए; और आपको शैतान की युक्तियों और हमलों से सुरक्षित रखने के सभी प्रयोजन करके दे? और फिर, आप में होकर अपने आप को तथा अपनी धार्मिकता को औरों पर प्रकट करे, आपको खरा आँकलन करने और सच्चा न्याय करने वाला बनाए; तथा आप में होकर पाप में भटके लोगों को उद्धार और अनन्त जीवन प्रदान करने के अपने अद्भुत कार्य करे, जिससे अंततः आपको ही अपनी ईश्वरीय आशीषों से भर सके? इसलिए अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। स्वेच्छा और सच्चे मन से अपने पापों के लिए पश्चाताप करके, उनके लिए प्रभु से क्षमा माँगकर, अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आप अपने पापों के अंगीकार और पश्चाताप करके, प्रभु यीशु से समर्पण की प्रार्थना कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए मेरे सभी पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।प्रभु की शिष्यता तथा मन परिवर्तन के लिए सच्चे पश्चाताप और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी। 


एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • विलापगीत 3-5 
  • इब्रानियों 10:19-39

शनिवार, 13 नवंबर 2021

मसीही सेवकाई में पवित्र आत्मा की भूमिका - 13

       

मसीही सेवकाई में पवित्र आत्मा का प्रमाण - धार्मिकता के लिए कायल करना (यूहन्ना 16:10).

पिछले लेखों में हमने देखा है कि मसीही सेवकाई में, परमेश्वर पवित्र आत्मा अपने कार्य और सामर्थ्य को प्रभु यीशु के शिष्यों, अर्थात मसीही विश्वासियों में होकर करता है, और उनमें होकर संसार के लोगों के समक्ष मसीही जीवन के उदाहरण तथा वचन की शिक्षाओं को प्रत्यक्ष करता है। इस प्रकार से परमेश्वर पवित्र आत्मा मसीही विश्वासी यानि कि प्रभु यीशु के शिष्य बनने वालों के जीवनों, मनोदशा, और विचारधारा में आए परिवर्तन का प्रत्यक्ष एवं व्यावहारिक प्रमाण प्रदान करता है। साथ ही यह प्रत्यक्ष एवं व्यावहारिक प्रमाण औरों को भी प्रोत्साहित करता है कि जैसा औरों के जीवन में हुआ है, वैसे ही मेरे भी जीवन में भी इसी प्रकार का परिवर्तन और परमेश्वर के लिए उपयोगिता संभव है। यूहन्ना 16:8 में पवित्र आत्मा ने तीन बातें लिखवाई हैं, जिनके विषय वह प्रभु यीशु के शिष्यों में होकर संसार को दोषी ठहराता है। ये तीन बातें हैं - पाप, धार्मिकता, और न्याय। और फिर पद 9, 10, और 11 में इन तीनों के विषय टिप्पणी दी है। इनमें से पहली बात, पाप के विषय कायल करना को हम यूहन्ना 16:9 से पिछले लेख में देख चुके हैं। आज हम दूसरी बात, धार्मिकता के बारे में कायल करने के बारे में हम यूहन्ना 16:10 से कुछ शिक्षाएं लेंगे।

मूल यूनानी भाषा के लेख में जिस शब्द का प्रयोग किया गया है, जिसे यहाँधार्मिकताअनुवाद किया गया है, उसका अर्थ होता है चरित्र एवं व्यवहार में दोष रहित होना। अर्थात, यहाँ पर धार्मिकता का अर्थ धार्मिक बातों, प्रथाओं, और रीति-रिवाजों का निर्वाह तथा धार्मिक अनुष्ठानों की पूर्ति के आधार पर व्यक्ति काधर्मीसमझा जाना नहीं है। यह एक बहुत आम बात है, जिससे सभी भली-भांति अवगत हैं, कि बाहरी रीति से सब कुछ करने के बावजूद, सामान्यतः व्यक्ति अंदर से और व्यवहार से फिर भी पापमय लालसाएँ और गुप्त में पापमय व्यवहार रखते हैं। उनकी यह बाहरीधार्मिकताएक दिखावा है, उनके मन अभी भी पाप के विचार और व्यवहार के दोषी हैं। बाइबल के अनुसार इसीलिए मसीही विश्वास की शिक्षा धर्म परिवर्तन की नहीं, बल्कि मन परिवर्तन करने की है। यह मन परिवर्तन मनुष्य अपने किसी धर्म के कामों से नहीं करने पाता है, नहीं तो संसार भर में इतने धर्मों और धार्मिक अनुष्ठानों, और कार्यों के द्वारा, अब तक संसार से पाप की समस्या कब की मिट चुकी होती। यह मन परिवर्तन केवल प्रभु यीशु मसीह में लाए गए विश्वास और पापों के पश्चाताप के द्वारा ही संभव है।

बाइबल यह भी सिखाती है कि मन की इस पवित्रता के बिना, जब कोई भी प्रभु को देख भी नहीं सकता हैसब से मेल मिलाप रखने, और उस पवित्रता के खोजी हो जिस के बिना कोई प्रभु को कदापि न देखेगा” (इब्रानियों 12:14), तो फिर उसके साथ संगति और निवास कैसे करेगा? किन्तु प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास लाने के द्वारा, प्रभु यीशु मसीह के द्वारा समस्त मानव जाति के उद्धार के लिए क्रूस पर बहाए गए लहू के द्वारा मनुष्य परमेश्वर की दृष्टि में धर्मी ठहरता है, उसका मेल-मिलाप परमेश्वर के साथ हो जाता है, और वह पाप के दण्ड से बच जाता है :सो जब हम विश्वास से धर्मी ठहरे, तो अपने प्रभु यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर के साथ मेल रखें” (रोमियों 5:1); “सो जब कि हम, अब उसके लहू के कारण धर्मी ठहरे, तो उसके द्वारा क्रोध से क्यों न बचेंगे? क्योंकि बैरी होने की दशा में तो उसके पुत्र की मृत्यु के द्वारा हमारा मेल परमेश्वर के साथ हुआ फिर मेल हो जाने पर उसके जीवन के कारण हम उद्धार क्यों न पाएंगे?” (रोमियों 5:9-10) 

प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास लाना, और ईसाई धर्म का निर्वाह करना, दो बिलकुल भिन्न बातें हैं; और ईसाई धर्म का निर्वाह व्यक्ति को परमेश्वर की दृष्टि में धर्मी नहीं बनाता है। व्यक्ति किसी भी धर्म को माने, किसी भी परिवार में जन्म ले, सभी के लिए परमेश्वर की आज्ञा पापों से पश्चाताप करने की हैइसलिये परमेश्वर अज्ञानता के समयों में आनाकानी कर के, अब हर जगह सब मनुष्यों को मन फिराने की आज्ञा देता है। क्योंकि उसने एक दिन ठहराया है, जिस में वह उस मनुष्य के द्वारा धर्म से जगत का न्याय करेगा, जिसे उसने ठहराया है और उसे मरे हुओं में से जिलाकर, यह बात सब पर प्रमाणित कर दी है” (प्रेरितों 17:30-31)। प्रेरितों 2 अध्याय में, पतरस का पहला प्रचार यरूशलेम में धार्मिक रीतियों और अनुष्ठानों को निभाने आए हुएभक्त यहूदियोंके मध्य किया गया था (प्रेरितों 2:5)। पतरस द्वारा उनभक्त यहूदियोंको किए गए प्रचार को सुनकरतब सुनने वालों के हृदय छिद गए, और वे पतरस और शेष प्रेरितों से पूछने लगे, कि हे भाइयो, हम क्या करें? पतरस ने उन से कहा, मन फिराओ, और तुम में से हर एक अपने अपने पापों की क्षमा के लिये यीशु मसीह के नाम से बपतिस्मा ले; तो तुम पवित्र आत्मा का दान पाओगे” (प्रेरितों के काम 2:37-38)। जैसे तब उनभक्त यहूदियोंके लिए धार्मिकता और व्यवस्था के निर्वाह के बावजूद पश्चाताप और समर्पण अनिवार्य था, उसी प्रकार आज ईसाई धर्म का निर्वाह करने वालों के लिए भी अनिवार्य है। 

प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास लाने के द्वारा धर्मी ठहरने, परमेश्वर से मेल-मिलाप हो जाने, पाप के दण्ड से बच जाने की इस पूरी प्रक्रिया को समझने; तथा परमेश्वर की दृष्टि में पाप क्या है, और पाप और उसके निवारण तथा समाधान किस प्रकार संभव है, आदि के विषयों पर बाइबल में दी गई शिक्षाओं पर एक विस्तृत चर्चा पहले प्रस्तुत की जा चुकी है। इस विस्तृत चर्चा की शृंखला का आरंभपाप और उद्धारपर लेख के साथ हुआ था; और जिन पाठकों ने इसे नहीं देखा है, वे इस लेख के लिंक से उसे देख सकते हैं, अध्ययन कर सकते हैं।

प्रभु यीशु मसीह द्वारा सभी मनुष्यों के पापों के लिए कलवरी के क्रूस पर दिए गए बलिदान को स्वीकार करने, अपने पापों से पश्चाताप करने, और अपने पापों के लिए प्रभु से क्षमा मांगने से ही व्यक्ति परमेश्वर की दृष्टि में धर्मी ठहरता है; क्योंकि वह अपने इस विश्वास में आने के द्वारा प्रभु यीशु मसीह कोपहनलेता हैऔर तुम में से जितनों ने मसीह में बपतिस्मा लिया है उन्होंने मसीह को पहिन लिया है” (गलतियों 3:27)। इसलिए अब मसीह यीशु में उस व्यक्ति के सभी पाप ढाँप दिए गए हैं, और मसीह यीशु में होकर वह धर्मी है। प्रभु यीशु ने यूहन्ना 16:10 में कहा कि वह अब सभी मनुष्यों के उद्धार के लिए अपना कार्य पूरा करके पिता के पास जाता है। जैसे प्रभु यीशु मसीह अपनी धर्मी दशा में परमेश्वर के पास जा सकता था, उसी प्रकार, जो विश्वास में आने के द्वारा प्रभु यीशु मसीह में धर्मी ठहराए गए हैं, वे भी परमेश्वर के पास जा सकते हैं। किन्तु यह आदर संसार के उन लोगों को उपलब्ध नहीं है जो अभी भी अपनीधर्म-कर्म-रस्मके निर्वाह की धार्मिकता के आधार पर परमेश्वर के पास आना चाहते हैं। जैसे ऊपर कहा गया, प्रभु यीशु मसीह से मिली इस पवित्रता के बिना तो वे परमेश्वर को देख भी नहीं सकते हैं, उसके पास जाएंगे कैसे?

सच्चे और वास्तविक मसीही विश्वासी के जीवन जीने वालों में, और संसार के मानकों के अनुसारधार्मिकताका जीवन जीने वालों में परमेश्वर पवित्र आत्माधार्मिकताकी यह तुलना प्रस्तुत करता है। मसीही विश्वास की धार्मिकता की तुलना में, सांसारिक धार्मिकता के विषय सांसारिक लोगों को दोषी ठहराता है। यदि आप मसीही विश्वासी हैं, तो आपकीधार्मिकताका आधार क्या है - आपका पापों से पश्चाताप, मसीह यीशु में लाया गया विश्वास, मसीह यीशु को पूर्णतः समर्पित और उसके वचन की आज्ञाकारिता का जीवन; या, किसी परिवार विशेष में जन्म तथाधर्म-कर्म-रस्मके निर्वाह की धार्मिकता? आपके मसीही विश्वास की वास्तविकता, और आप में परमेश्वर पवित्र आत्मा की उपस्थिति की पुष्टि आपकी मसीही सेवकाई के द्वारा होती है। यदि आपकी धार्मिकता, मसीही विश्वास की धार्मिकता है, तो फिर आप में होकर पवित्र आत्मा संसार के लोगों को उनकी सांसारिक धार्मिकता के विषय कायल करेगा, उन्हें उसकी अपूर्णता का एहसास करवाएगा।  

       यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो थोड़ा थम कर विचार कीजिए, क्या मसीही विश्वास के अतिरिक्त आपको कहीं और यह अद्भुत और विलक्षण आशीषों से भरा सौभाग्य प्राप्त होगा, कि स्वयं परमेश्वर आप में आ कर सर्वदा के लिए निवास करे; आपको धर्मी बनाए; आपको अपना वचन सिखाए; और आपको शैतान की युक्तियों और हमलों से सुरक्षित रखने के सभी प्रयोजन करके दे? और फिर, आप में होकर अपने आप को तथा अपनी धार्मिकता को औरों पर प्रकट करे, तथा आप में होकर पाप में भटके लोगों को उद्धार और अनन्त जीवन प्रदान करने के अपने अद्भुत कार्य करे, जिससे अंततः आपको ही अपनी ईश्वरीय आशीषों से भर सके? इसलिए अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। स्वेच्छा और सच्चे मन से अपने पापों के लिए पश्चाताप करके, उनके लिए प्रभु से क्षमा माँगकर, अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आप अपने पापों के अंगीकार और पश्चाताप करके, प्रभु यीशु से समर्पण की प्रार्थना कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए मेरे सभी पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।प्रभु की शिष्यता तथा मन परिवर्तन के लिए सच्चे पश्चाताप और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी। 

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • विलापगीत 1-2 
  • इब्रानियों 10:1-18  

शुक्रवार, 12 नवंबर 2021

मसीही सेवकाई में पवित्र आत्मा की भूमिका - 12

       

मसीही सेवकाई में पवित्र आत्मा का प्रमाण - पाप के लिए कायल करना (यूहन्ना 16:9).

पिछले लेख में हमने देखा था कि मसीही की सेवकाई में, परमेश्वर पवित्र आत्मा अपने कार्य और सामर्थ्य को प्रभु यीशु के शिष्यों, अर्थात मसीही विश्वासियों में होकर करता है, और उनमें होकर संसार के लोगों के समक्ष उदाहरण तथा शिक्षाओं को रखता है। न केवल परमेश्वर पवित्र आत्मा द्वारा इस प्रकार से अपना कार्य करना मसीही विश्वासी यानि कि प्रभु यीशु के शिष्य बनने वालों के जीवनों, मनोदशा, और विचारधारा में आए परिवर्तन का प्रत्यक्ष एवं व्यावहारिक प्रमाण होता है, वरन साथ ही यह औरों को भी प्रोत्साहित करता है कि जैसा एक मनुष्य के जीवन में हुआ है, वैसे ही मेरे भी तथा औरों के जीवनों में भी इसी प्रकार का परिवर्तन और परमेश्वर के लिए उपयोगिता संभव है। यूहन्ना 16:8 में पवित्र आत्मा ने तीन बातें लिखवाई हैं, जिनके विषय वह प्रभु यीशु के शिष्यों में होकर संसार को दोषी ठहराता है। ये तीन बातें हैं - पाप, धार्मिकता, और न्याय। और फिर पद 9, 10, और 11 में इन तीनों के विषय टिप्पणी दी है। 

यदि हम थोड़ा सा विचार करें, तो मानव जाति और संसार की सभी समस्याओं की जड़, संसार के लोगों, विशेषकर पदाधिकारियों द्वारा, इन्हीं तीन बातों का अनुचित एवं अनुपयुक्त निर्वाह अथवा अवहेलना करना है। सारे संसार के विभिन्न लोगों और धर्मों के निर्वाह, रीति-रिवाजों की पूर्ति, अनुष्ठानों के किए जाने, आदि के बावजूद, लोगों में से इन तीनों समस्याओं को मिटा पाना संभव नहीं होने पाया है, वरन इनके विषय स्थिति सुधारने की बजाए और बिगड़ती ही जा रही है। यही अपने आप में एक जग-विदित प्रमाण है कि धर्म-कर्म-रस्म का निर्वाह इस समस्या का समाधान नहीं है। इस बढ़ती हुई समस्या का कारण, इस पद में प्रभु के कथन में निहित है - क्योंकि संसार के लोग अपने आप को इन तीनों के विषय दोषी नहीं समझते अथवा स्वीकारते हैं। और परमेश्वर पवित्र आत्मा, प्रभु यीशु मसीह के शिष्यों के परिवर्तित जीवन और व्यवहार में होकर संसार के लोगों को इन बातों के विषय दोषी ठहराता है - प्रभु के वास्तविक और सच्चे शिष्यों के जीवनों से तुलना के द्वारा संसार के लोगों को उनकी वास्तविक दशा दिखाता है। आज हम यूहन्ना 16:9 से इन तीनों में से पहली बात, पाप के विषय दोषी ठहराए जाने के बारे में थोड़ा सा देखेंगे। 

यूहन्ना 16:9 पाप के विषय में इसलिये कि वे मुझ पर विश्वास नहीं करते। प्रभु यीशु ने कहा कि पवित्र आत्मा सबसे पहले संसार के लोगों को उनके पाप के विषय दोषी ठहराएगा - क्योंकि संसार के लोग प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास नहीं करते हैं। परमेश्वर की दृष्टि में पाप क्या है, और बाइबल में पाप और उसके निवारण तथा समाधान के विषय दी गई शिक्षाओं पर एक विस्तृत चर्चा पहले प्रस्तुत की जा चुकी है; इस विस्तृत चर्चा की शृंखला का आरंभ इस लेख के साथ हुआ था : http://rozkiroti.blogspot.com/2021/08/Bible-Word-Sin-1-Fellowship-Heart-Problem-Root.html ; और जिन पाठकों ने इसे नहीं देखा है, वे इस लेख के लिंक से उसे देख सकते हैं, अध्ययन कर सकते हैं। संक्षेप में, परमेश्वर के वचन बाइबल के अनुसार, पाप, मन-ध्यान-विचार-व्यवहार में किया गया परमेश्वर की आज्ञाओं और निर्देशों का उल्लंघन अथवा अवहेलना है (1 यूहन्ना 3:4)। हमारे आदि माता-पिता, आदम और हव्वा के द्वारा किए गए प्रथम पाप के साथ ही पाप ने सृष्टि में प्रवेश किया, और आदम की संतानों में फैल गया (रोमियों 5:12-14)। मनुष्यों में आनुवंशिक रीति से विद्यमान पाप करने की इस प्रवृत्ति का निवारण और समाधान, उस व्यक्ति द्वारा किए गए अपने पापों के अंगीकार तथा उन से पश्चाताप, प्रभु यीशु मसीह द्वारा मिली पापों की क्षमा और उद्धार, तथा उसे स्वेच्छा से अपना जीवन समर्पण करने वाले व्यक्ति में प्रभु के द्वारा किया गया मन-ध्यान-विचार और व्यवहार में आधारभूत परिवर्तन, के द्वारा होता है। 

जब इस प्रकार पापों से पश्चाताप और प्रभु यीशु को किए गए जीवन समर्पण के द्वारा प्राप्त हुए परिवर्तित एवं आशीषित जीवन की गवाही उद्धार पाने वाला व्यक्ति संसार के सामने रखता है, और अपने प्रतिदिन के व्यावहारिक जीवन में उस परिवर्तन को जी कर संसार के समक्ष प्रत्यक्ष दिखाता है, तो स्वतः ही वह संसार के लोगों के सामने, उनके तथा उस उद्धार पाए हुए व्यक्ति के जीवन और व्यवहार में एक तुलना ले आता है, संसार के लोगों को उनके जीवन और व्यवहार के लिए स्वतः ही दोषी ठहरा देता है। जिन्हें अपने पापों के दोष का बोध होता है, फिर वे अपनी समस्तधार्मिकताके प्रयासों के बावजूद अपने में विद्यमान पापों की समस्या का निवारण और समाधान ढूँढते हैं, और वह समाधान प्रभु यीशु मसीह है:तब सुनने वालों के हृदय छिद गए, और वे पतरस और शेष प्रेरितों से पूछने लगे, कि हे भाइयो, हम क्या करें? पतरस ने उन से कहा, मन फिराओ, और तुम में से हर एक अपने अपने पापों की क्षमा के लिये यीशु मसीह के नाम से बपतिस्मा ले; तो तुम पवित्र आत्मा का दान पाओगे” (प्रेरितों के काम 2:37-38)। इसीलिए शैतान और उसके दूत, लोगों तक सुसमाचार पहुँचने नहीं देना चाहते हैं, क्योंकि उस सुसमाचार में जीवन बदलने की सामर्थ्य है; उन्होंने लोगों के मनों को अंधा कर रखा है कि सुसमाचार की जीवन दायक ज्योति उन पर न चमकने पाएऔर उन अविश्वासियों के लिये, जिन की बुद्धि को इस संसार के ईश्वर ने अन्‍धी कर दी है, ताकि मसीह जो परमेश्वर का प्रतिरूप है, उसके तेजोमय सुसमाचार का प्रकाश उन पर न चमके” (2 कुरिन्थियों 4:4)। प्रभु यीशु मसीह ने धर्म के अगुवों और पवित्र शास्त्र के विद्वानों से कहातुम पवित्र शास्त्र में ढूंढ़ते हो, क्योंकि समझते हो कि उस में अनन्त जीवन तुम्हें मिलता है, और यह वही है, जो मेरी गवाही देता है। फिर भी तुम जीवन पाने के लिये मेरे पास आना नहीं चाहते” (यूहन्ना 5:39-40)

यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं, अर्थात किसी धर्म-कर्म-रस्म के निर्वाह के अंतर्गत नहीं, वरन आप ने अपने पापों के लिए पश्चाताप करके, उनके लिए प्रभु यीशु से क्षमा याचना करके, और स्वेच्छा तथा सच्चे मन से अपना जीवन प्रभु यीशु को समर्पित किया है, तो क्या आपके जीवन में प्रभु की ओर, उसके वचन और आज्ञाकारिता की ओर परिवर्तन आया है? क्या परमेश्वर का वचन और उसकी आज्ञाकारिता आपके जीवन में प्राथमिक स्थान पाते हैं (यूहन्ना 14:15, 21, 23)? क्या पवित्र आत्मा के फलों (गलातीयों 5:22-23) से आपका जीवन सुसज्जित है? आपका परिवर्तित जीवन, परमेश्वर के वचन बाइबल के नियमित एवं गंभीर अध्ययन के प्रति आपकी लालसा, जीवन में पवित्र आत्मा के फलों की उपस्थिति, और लगन तथा गंभीरता से प्रेरितों 2:42 का पालन करते रहने की लालसा ही प्रमाणित करेगी कि आप में परमेश्वर पवित्र आत्मा की उपस्थिति है। और यदि आपका जीवन पवित्र आत्मा की अगुवाई और आज्ञाकारिता में जिया जाएगा (गलातीयों 5:18, 25), तो फिर आपके जीवन के द्वारा संसार के लोग, यूहन्ना 16:9 के अनुसार, प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास न करने के कारण दोषी भी ठहराए जाएंगे, कायल किए जाएंगे, उनमें उनके पापों के प्रति संवेदनशीलता तथा बोध उत्पन्न होगा, और फिर वे भी आपके परिवर्तित जीवन से आकर्षित होकर प्रभु की ओर आकर्षित होंगे, आप से उद्धार का मार्ग जानने के लिए लालायित होंगे। ध्यान रखिए, परमेश्वर पवित्र आत्मा मसीही विश्वासियों में, आप में, होकर ही कार्य करता है। 

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो थोड़ा थम कर विचार कीजिए, क्या मसीही विश्वास के अतिरिक्त आपको कहीं और यह अद्भुत और विलक्षण आशीषों से भरा सौभाग्य प्राप्त होगा, कि स्वयं परमेश्वर आप में आ कर सर्वदा के लिए निवास करे; आपको अपना वचन सिखाए; और आपको शैतान की युक्तियों और हमलों से सुरक्षित रखने के सभी प्रयोजन करके दे? और फिर, आप में होकर अपने आप को औरों पर प्रकट करे, तथा पाप में भटके लोगों को उद्धार और अनन्त जीवन प्रदान करने के अपने अद्भुत कार्य करे, जिससे अंततः आपको ही अपनी ईश्वरीय आशीषों से भर सके? इसलिए अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। स्वेच्छा और सच्चे मन से अपने पापों के लिए पश्चाताप करके, उनके लिए प्रभु से क्षमा माँगकर, अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आप अपने पापों के अंगीकार और पश्चाताप करके, प्रभु यीशु से समर्पण की प्रार्थना कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए मेरे सभी पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।प्रभु की शिष्यता तथा मन परिवर्तन के लिए सच्चे पश्चाताप और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।   

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • यिर्मयाह 51-52 
  • इब्रानियों