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Sunday, May 31, 2015

अस्थिर अनुयायी


   लोकमत देखते ही देखते बदल जाता है, समर्थन करने वाले लोग भी अचानक ही विरोधी हो जाते हैं। जब खेल में हमारी मनपसन्द टीम जीत रही होती है, तो हम उसकी प्रशंसा करते हैं, उसके गुणों का बखान करते हैं; परन्तु जब वह एक-दो खेल हार जाए तो उससे विमुख होकर उसकी आलोचना करने में हमें देर नहीं लगती। जब कोई नया और उत्साहवर्धक कार्य आरंभ होता है तो उसके साथ जुड़ने में हमें संकोच नहीं होता, लेकिन कुछ समय में जब उसका वह नयापन जाता रहता है और उसके कार्य नित्यप्रायः लगने लगते हैं तो उसके प्रति हमारे उत्साह का स्तर भी गिरने लगता है।

   प्रभु यीशु ने भी लोकमत की इस अस्थिरता को अनुभव किया। जब वे फसह का पर्व मनाने यरुशालेम में आए तो लोगों ने उसका स्वागत बड़े उत्साह के साथ किया, उसे राजा माना (यूहन्ना 12:13); परन्तु स्पताह का अन्त होते होते वही भीड़ उसे क्रूस पर चढ़ाए जाने की माँग कर रही थी (यूहन्ना 19:15)। यह केवल उस भीड़ का ही बर्ताव नहीं था। जब प्रभु यीशु को पकड़वाया गया तथा क्रूस पर चढ़ाने के लिए ले जाया गया, तो उसके प्रति प्रेम और वफादारी का, तथा उसके लिए अपनी जान भी देने का दावा करने वाले उसके अनुयायी उसे अकेला छोड़ कर भाग गए। यह केवल उन अनुयायियों का ही व्यवहार नहीं था; आज मेरे जीवन में भी यही बात पाई जाती है। जब प्रभु यीशु मेरे भले के लिए कुछ असंभव कर रहे होते हैं तो मुझे उनके साथ खड़ा रहना अच्छा लगता है; परन्तु जब वे मुझे कुछ कठिन या कष्टदायक करने को कहते हैं मैं बचकर निकल लेने के प्रयास करने लगती हूँ। भीड़ की गुमनामी का भाग बनकर प्रभु यीशु का अनुयायी होने का दावा करना सरल है; जब वे चतुर लोगों की चतुराई को व्यर्थ और सामर्थी लोगों की सामर्थ को विफल करते हैं तो उन पर विश्वास रखने का दावा करना सहज है; लेकिन जब वे उस विश्वास के लिए दुख उठाने, बलिदान देने और मृत्यु का सामना करने की बात करते हैं तो उसी विश्वास को असमंजस तथा आनाकानी में बदलेते देर नहीं लगती।

   मुझे यह सोचना अच्छा लगता है कि यदी मैं वहाँ होती तो प्रभु के चेलों की तरह उन्हें छोड़कर नहीं भागती, वरन उनके साथ क्रूस तक जाती। लेकिन स्वयं मुझे ही अपने बारे में इस में कुछ शंका भी है; आखिरकर जब मैं उनके लिए अपना मूँह वहाँ भी नहीं खोलती जहाँ एक सुरक्षित माहौल है, तो मैं यह कैसे कह सकती हूँ कि उनके विरोधियों की भीड़ के समक्ष मैं उनके पक्ष में आने भी पाऊँगी, ऐसे विरोध भरे माहौल में खड़े होकर उनकी प्रशंसा करना या उनके लिए कुछ कहना तो बहुत दूर की बात है।

   हम मसीही विश्वासियों को और मुझे प्रभु परमेश्वर के प्रति और कितना अधिक धन्यवादी तथा कृतज्ञ रहना चाहिए कि हमारी दशा और व्यवहार को भली भाँति जानने के बावजूद, उसने मुझ जैसे, हम जैसे अस्थिर अनुयायियों के लिए भी अपने प्राण बलिदान किए, वह हमें आज भी अपना मानता है, हमारे साथ बना रहता है, हमारी सहायता करता रहता है जिससे कि हम उसकी संगति में रहकर, उससे सामर्थ पा सकें और उसके वफादार तथा उसे समर्पित अनुयायी बन सकें। - जूली ऐकैरमैन लिंक


मसीह यीशु अपने लिए हमारी योग्यता नहीं, वरन उसके लिए हमारी उपलब्धता और हमारा समर्पण चाहता है।

परन्तु यीशु ने अपने आप को उन के भरोसे पर नहीं छोड़ा, क्योंकि वह सब को जानता था। और उसे प्रयोजन न था, कि मनुष्य उसके विषय में कोई गवाही दे, क्योंकि वह आप ही जानता था, कि मनुष्य के मन में क्या है। - यूहन्ना 2:24-25

बाइबल पाठ: यूहन्ना 12:12-19; 19:14-16
John 12:12 दूसरे दिन बहुत से लोगों ने जो पर्व में आए थे, यह सुनकर, कि यीशु यरूशलेम में आता है। 
John 12:13 खजूर की, डालियां लीं, और उस से भेंट करने को निकले, और पुकारने लगे, कि होशाना, धन्य इस्त्राएल का राजा, जो प्रभु के नाम से आता है। 
John 12:14 जब यीशु को एक गदहे का बच्‍चा मिला, तो उस पर बैठा। 
John 12:15 जैसा लिखा है, कि हे सिय्योन की बेटी, मत डर, देख, तेरा राजा गदहे के बच्‍चा पर चढ़ा हुआ चला आता है। 
John 12:16 उसके चेले, ये बातें पहिले न समझे थे; परन्तु जब यीशु की महिमा प्रगट हुई, तो उन को स्मरण आया, कि ये बातें उसके विषय में लिखी हुई थीं; और लोगों ने उस से इस प्रकार का व्यवहार किया था। 
John 12:17 तब भीड़ के लोगों ने जो उस समय उसके साथ थे यह गवाही दी कि उसने लाजर को कब्र में से बुलाकर, मरे हुओं में से जिलाया था। 
John 12:18 इसी कारण लोग उस से भेंट करने को आए थे क्योंकि उन्होंने सुना था, कि उसने यह आश्चर्यकर्म दिखाया है। 
John 12:19 तब फरीसियों ने आपस में कहा, सोचो तो सही कि तुम से कुछ नहीं बन पड़ता: देखो, संसार उसके पीछे हो चला है।

John 19:14 यह फसह की तैयारी का दिन था और छठे घंटे के लगभग था: तब उसने यहूदियों से कहा, देखो, यही है, तुम्हारा राजा! 
John 19:15 परन्तु वे चिल्लाए कि ले जा! ले जा! उसे क्रूस पर चढ़ा: पीलातुस ने उन से कहा, क्या मैं तुम्हारे राजा को क्रूस पर चढ़ाऊं? महायाजकों ने उत्तर दिया, कि कैसर को छोड़ हमारा और कोई राजा नहीं। 
John 19:16 तब उसने उसे उन के हाथ सौंप दिया ताकि वह क्रूस पर चढ़ाया जाए।

एक साल में बाइबल: 
  • 2 इतिहास 13-14
  • यूहन्ना 12:1-26


Saturday, May 30, 2015

नम्र मन


   साहित्य में अकसर देखा जाता है कि चरित्र का कोई छोटा सा ऐब, कहानी के नायक के पतन का कारण हो जाता है। परमेश्वर के वचन बाइबल में भी हम ऐसे उदाहरण पाते हैं, जिनमें से एक है राजा उज़्ज़ियाह का। उज़्ज़ियाह 16 वर्ष की आयु में यहूदा का राजा बना; राजा बनने के कई वर्ष पश्चात तक वह परमेश्वर का खोजी रहा और जब तक वह ऐसा करता रहा, परमेश्वर उसे सफलता तथा उन्नति देता रहा, उसे सामर्थी करता रहा (2 इतिहास 26:4-5)। इस सफलता, उन्नति तथा सामर्थ से उसकी ख्याति चारों ओर फैल गई; किंतु इससे उसके अन्दर घमंड भी आ गया, जो फिर उसके विनाश का कारण बन गया (2 इतिहास 26:15-16)।

   अपने घमंड में उज़्ज़ियाह को लगा कि वह परमेश्वर के नियमों की अवहेलना कर सकता है, अपनी मन-मर्ज़ी कर सकता है। वह मन्दिर में गया और मन्दिर के पुजारी के कार्य को करने लगा - परमेश्वर की वेदी पर धूप जलाने लगा। पुजारियों ने उसे चिताया कि यह करना उसके लिए सही नहीं है और रोकना चाहा, परन्तु वह उल्टे पुजारियों पर क्रोधित होने लगा; तब परमेश्वर ने उसे कोढ़ी कर दिया और वह कोढ़ की दशा में मन्दिर तथा राज-पद से निकाल दिया गया (2 इतिहास 26:16-20)।

   साहित्य तथा जीवन, दोनों में ही हम पाते हैं कि सुनामी और प्रतिष्ठित व्यक्ति अपने ही घमंड या किसी अन्य ऐब के कारण अपमान तथा कष्ठ में गिर जाते हैं; "और उज्जिय्याह राजा मरने के दिन तक कोढ़ी रहा, और कोढ़ के कारण अलग एक घर में रहता था, वह तो यहोवा के भवन में जाने न पाता था। और उसका पुत्र योताम राजघराने के काम पर नियुक्त किया गया और वह लोगों का न्याय भी करता था" (2 इतिहास 26:21)।

   प्रशंसा के अमृत को अहंकार का विष बनने से रोकने का एक ही मार्ग है, एक नम्र तथा आज्ञाकारी मन के साथ प्रभु परमेश्वर की आज्ञाकारिता में चलते रहना; उसे ही अपने मन तथा जीवन में प्राथमिकता और महिमा का स्थान देना। - डेविड मैक्कैसलैंड


जैसे चान्दी के लिये कुठाई और सोने के लिये भट्ठी हैं, वैसे ही मनुष्य के लिये उसकी प्रशंसा है। - नीतिवचन 27:21

विनाश से पहिले गर्व, और ठोकर खाने से पहिले घमण्ड होता है। - नीतिवचन 16:18

बाइबल पाठ: 2 इतिहास 26:3-21
2 Chronicles 26:3 जब उज्जिय्याह राज्य करने लगा, तब वह सोलह वर्ष का था। और यरूशलेम में बावन वर्ष तक राज्य करता रहा, और उसकी माता का नाम यकील्याह था, जो यरूशलेम की थी। 
2 Chronicles 26:4 जैसे उसका पिता अमस्याह, किया करता था वैसा ही उसने भी किया जो यहोवा की दृष्टि में ठीक था। 
2 Chronicles 26:5 और जकर्याह के दिनों में जो परमेश्वर के दर्शन के विषय समझ रखता था, वह परमेश्वर की खोज में लगा रहता था; और जब तक वह यहोवा की खोज में लगा रहा, तब तक परमेश्वर उसको भाग्यवान किए रहा। 
2 Chronicles 26:6 तब उसने जा कर पलिश्तियों से युद्ध किया, और गत, यब्ने और अशदोद की शहरपनाहें गिरा दीं, और अशदोद के आसपास और पलिश्तियों के बीच में नगर बसाए। 
2 Chronicles 26:7 और परमेश्वर ने पलिश्तियों और गूर्बालवासी, अरबियों और मूनियों के विरुद्ध उसकी सहायता की। 
2 Chronicles 26:8 और अम्मोनी उज्जिय्याह को भेंट देने लगे, वरन उसकी कीर्ति मिस्र के सिवाने तक भी फैल गई्र, क्योंकि वह अत्यन्त सामथीं हो गया था। 
2 Chronicles 26:9 फिर उज्जिय्याह ने यरूशलेम में कोने के फाटक और तराई के फाटक और शहरपनाह के मोड़ पर गुम्मट बनवा कर दृढ़ किए। 
2 Chronicles 26:10 और उसके बहुत जानवर थे इसलिये उसने जंगल में और नीचे के देश और चौरस देश में गुम्मट बनवाए और बहुत से हौद खुदवाए, और पहाड़ों पर और कर्म्मेल में उसके किसान और दाख की बारियों के माली थे, क्योंकि वह खेती किसानी करने वाला था। 
2 Chronicles 26:11 फिर उज्जिय्याह के योद्धाओं की एक सेना थी जिनकी गिनती यीएल मुंशी और मासेयाह सरदार, हनन्याह नामक राजा के एक हाकिम की आज्ञा से करते थे, और उसके अनुसार वह दल बान्ध कर लड़ने को जाती थी। 
2 Chronicles 26:12 पितरों के घरानों के मुख्य मुख्य पुरुष जो शूरवीर थे, उनकी पूरी गिनती दो हजार छ: सौ थी। 
2 Chronicles 26:13 और उनके अधिकार में तीन लाख साढ़े सात हजार की एक बड़ी बड़ी सेना थी, जो शत्रुओं के विरुद्ध राजा की सहायता करने को बड़े बल से युद्ध करने वाले थे। 
2 Chronicles 26:14 इनके लिये अर्थात पूरी सेना के लिये उज्जिय्याह ने ढालें, भाले, टोप, झिलम, धनुष और गोफन के पत्थर तैयार किए। 
2 Chronicles 26:15 फिर उसने यरूशलेम में गुम्मटों और कंगूरों पर रखने को चतुर पुरुषों के निकाले हुए यन्त्र भी बनवाए जिनके द्वारा तीर और बड़े बड़े पत्थर फेंके जाते थे। और उसकी कीर्ति दूर दूर तक फैल गई, क्योंकि उसे अदभुत सहायता यहां तक मिली कि वह सामथीं हो गया। 
2 Chronicles 26:16 परन्तु जब वह सामथीं हो गया, तब उसका मन फूल उठा; और उसने बिगड़ कर अपने परमेश्वर यहोवा का विश्वासघात किया, अर्थात वह धूप की वेदी पर धूप जलाने को यहोवा के मन्दिर में घुस गया। 
2 Chronicles 26:17 और अजर्याह याजक उसके बाद भीतर गया, और उसके संग यहोवा के अस्सी याजक भी जो वीर थे गए। 
2 Chronicles 26:18 और उन्होंने उज्जिय्याह राजा का साम्हना कर के उस से कहा, हे उज्जिय्याह यहोवा के लिये धूप जलाना तेरा काम नहीं, हारून की सन्तान अर्थात उन याजकों ही का काम है, जो धूप जलाने को पवित्र किए गए हैं। तू पवित्र स्थान से निकल जा; तू ने विश्वासघात किया है, यहोवा परमेश्वर की ओर से यह तेरी महिमा का कारण न होगा। 
2 Chronicles 26:19 तब उज्जिय्याह धूप जलाने को धूपदान हाथ में लिये हुए झुंझला उठा। और वह याजकों पर झुंझला रहा था, कि याजकों के देखते देखते यहोवा के भवन में धूप की वेदी के पास ही उसके माथे पर कोढ़ प्रगट हुआ। 
2 Chronicles 26:20 और अजर्याह महायाजक और सब याजकों ने उस पर दृष्टि की, और क्या देखा कि उसके माथे पर कोढ़ निकला है! तब उन्होंने उसको वहां से झटपट निकाल दिया, वरन यह जान कर कि यहोवा ने मुझे कोढ़ी कर दिया है, उसने आप बाहर जाने को उतावली की। 
2 Chronicles 26:21 और उज्जिय्याह राजा मरने के दिन तक कोढ़ी रहा, और कोढ़ के कारण अलग एक घर में रहता था, वह तो यहोवा के भवन में जाने न पाता था। और उसका पुत्र योताम राजघराने के काम पर नियुक्त किया गया और वह लोगों का न्याय भी करता था।

एक साल में बाइबल: 
  • 2 इतिहास 10-12
  • यूहन्ना 11:30-57


Friday, May 29, 2015

शान्ति


   मेरी सहेली इलूइस जीवन की सामान्य बातों को चतुराई से अलग ही परिपेक्ष्य में ढाल देती है। एक दिन मैं ने उस से पूछा, "कहो, कैसी हो?" मुझे आशा थी कि वह इस प्रश्न का सामान्यतः दिया जाने वाला जाना-पहचाना उत्तर देगी, "ठीक हूँ"। किंतु उसने उत्तर दिया, "मुझे जाकर उसे जगाना है!" मैं यह सुनकर चकरा गई और उस से उसकी इस बाता का अर्थ पूछा। उसने बच्चों के समान चकित हुए कहा, "तुम अपनी बाइबल भी नहीं जानतीं?" फिर वह बोली, "जब प्रभु के चेलों के सामने संकट आया, तो वे प्रभु यीशु को जगाने गए थे ना; मुझे भी प्रभु को जगाने जाना है!"

   जब हम किसी परेशान कर देने वाली परिस्थिति में आ जाते हैं और उस से निकलने का कोई मार्ग सूझ नहीं पड़ता, तब हम क्या करते हैं? हो सकता है कि प्रभु के चेलों के समान हम भी प्रभु यीशु के पास जाते हैं (मरकुस 4:35-41)। लेकिन कभी कभी हम अपने ही प्रयासों से अपने आप को परिस्थिति से बाहर निकालने के प्रयास करते हुए, हमारी परिस्थिति के लिए ज़िम्मेदार व्यक्ति से बदला लेना चाहते हैं; या उसे बदनाम करने लगते हैं; या निराश और हताश होकर किसी कोने में दुबक कर बैठ जाते हैं।

   हमें प्रभु यीशु के चेलों से शिक्षा लेनी चाहिए, जो विकट परिस्थिति में अपनी एकमात्र आशा प्रभु यीशु के पास आए। हो सकता है कि प्रभु हमें तुरंत ही या हमारे सोचे तरीके से उस परिस्थिति से बाहर ना निकाले, किंतु यह ध्यान रखना कि हमारे संकट में वह हमारे साथ खड़ा है, सांत्वना देता है। हमें उसका धन्यवादी होना चाहिए कि वह सदा हमारे साथ बना रहता है और हमारे जीवन के तूफानों को भी कहता है, "शान्त रह, थम जा" (मरकुस 4:39)।

   इसलिए अपने जीवन के तूफानों में उसकी ओर देखें, उसे पुकारें, और वह अपनी शान्ती आपके जीवन में भर देगा। - जो स्टोवैल


जब जीवन में परेशानियों के तूफान भयभीत करें तो समाधान के लिए मसीह यीशु को अपना प्रथम विकल्प बनाएं।

प्रभु यीशु ने कहा: मैं तुम्हें शान्‍ति दिए जाता हूं, अपनी शान्‍ति तुम्हें देता हूं; जैसे संसार देता है, मैं तुम्हें नहीं देता: तुम्हारा मन न घबराए और न डरे। -  यूहन्ना 14:27

बाइबल पाठ: मरकुस 4:35-41
Mark 4:35 उसी दिन जब सांझ हुई, तो उसने उन से कहा; आओ, हम पार चलें,। 
Mark 4:36 और वे भीड़ को छोड़कर जैसा वह था, वैसा ही उसे नाव पर साथ ले चले; और उसके साथ, और भी नावें थीं। 
Mark 4:37 तब बड़ी आन्‍धी आई, और लहरें नाव पर यहां तक लगीं, कि वह अब पानी से भरी जाती थी। 
Mark 4:38 और वह आप पिछले भाग में गद्दी पर सो रहा था; तब उन्होंने उसे जगाकर उस से कहा; हे गुरू, क्या तुझे चिन्‍ता नहीं, कि हम नाश हुए जाते हैं? 
Mark 4:39 तब उसने उठ कर आन्‍धी को डांटा, और पानी से कहा; “शान्‍त रह, थम जा”: और आन्‍धी थम गई और बड़ा चैन हो गया। 
Mark 4:40 और उन से कहा; तुम क्यों डरते हो? क्या तुम्हें अब तक विश्वास नहीं? 
Mark 4:41 और वे बहुत ही डर गए और आपस में बोले; यह कौन है, कि आन्‍धी और पानी भी उस की आज्ञा मानते हैं?

एक साल में बाइबल: 
  • 2 इतिहास 7-9
  • यूहन्ना 11:1-29



Thursday, May 28, 2015

महिमा


   खेलों में से मुझे बचपन से ही बेसबॉल बहुत पसन्द रहा है और मैं इस खेल का शौकीन रहा हूँ। बेसबॉल खेलने वाली टीमों में से मेरी पसन्दीदा टीम रही है डेट्रौइट टाइगर्स। लेकिन हाल ही में खेल की एक श्रंखला में खराब खेल के कारण इस टीम को कई बार हार का सामना करना पड़ा जिससे मुझे बड़ी निराशा हुई। इसलिए अपनी भलाई के लिए मैंने निर्णय किया कि मैं अवकाश लूँगा और अपनी मन-पसन्द टीम से संबंधित किसी भी बात में मैंने चार दिन तक कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। उन चार दिनों में मैं मनन करने लगा कि किसी ऐसी बात को छोड़ना, जिसके हम अभ्यस्त हो चुके हैं, कितना कठिन होता है।

  लेकिन हमारे निज जीवनों में भी कभी कभी ऐसे समय आते हैं जहाँ परमेश्वर हमें दिखाता है कि हम कुछ बातों को छोड़ दें। यह तब हो सकता है जब हम किसी ऐसे कार्य में संलग्न हो रखे हैं जो हमें किसी अन्य बात के लिए समय नहीं निकालने देती, और हम यह एहसास करने लगते हैं कि उस कार्य को सीमित कर देना ही भला होगा (1 कुरिन्थियों 6:12)। या फिर हमारे अन्दर कोई आदत या पसन्द है जिस के बारे में हम जानते हैं कि उस से परमेश्वर को प्रसन्ना नहीं हो सकता। क्योंकि हम मसीही विश्वासी परमेश्वर से प्रेम रखते हैं तथा अपने जीवनों से परमेश्वर को महिमा देना चाहते हैं, इसलिए हमें यह आभास भी होता है कि अपनी उस आदत या पसन्द को हमें छोड़ देना चाहिए।

   जब परमेश्वर की सहायता से हम उन बातों को पहचानने लगते हैं जो परमेश्वर के साथ हमारे संबंध में आड़े आती हैं, तो परमेश्वर की ही सहायता से हमें उन्हें छोड़ भी देना चाहिए। इसके लिए परमेश्वर ने हमें उचित प्रावधान दिए भी हैं (1 कुरिन्थियों 10:13), और हमारे अन्दर निवास करने वाला परमेश्वर का पवित्र आत्मा इसके लिए हमें सामर्थ भी देता है (रोमियों 8:5)।

   हम मसीही विश्वासियों का कर्तव्य और उद्देश्य है कि हम अपने जीवनों से परमेश्वर की महिमा करें (1 कुरिन्थियों 6:19-20); हम कुछ भी ऐसा ना करें जिससे संसार के सामने परमेश्वर की महिमा धूमिल होने पाए। - डेव ब्रैनन


मसीह यीशु के निकट बने रहने से हम मसीह यीशु की समानता में ढलते जाते हैं।

क्या तुम नहीं जानते, कि तुम्हारी देह पवित्रात्मा का मन्दिर है; जो तुम में बसा हुआ है और तुम्हें परमेश्वर की ओर से मिला है, और तुम अपने नहीं हो? क्योंकि दाम देकर मोल लिये गए हो, इसलिये अपनी देह के द्वारा परमेश्वर की महिमा करो। - 1 कुरिन्थियों 6:19-20

बाइबल पाठ: रोमियों 8:1-10
Romans 8:1 सो अब जो मसीह यीशु में हैं, उन पर दण्ड की आज्ञा नहीं: क्योंकि वे शरीर के अनुसार नहीं वरन आत्मा के अनुसार चलते हैं। 
Romans 8:2 क्योंकि जीवन की आत्मा की व्यवस्था ने मसीह यीशु में मुझे पाप की, और मृत्यु की व्यवस्था से स्वतंत्र कर दिया। 
Romans 8:3 क्योंकि जो काम व्यवस्था शरीर के कारण दुर्बल हो कर न कर सकी, उसको परमेश्वर ने किया, अर्थात अपने ही पुत्र को पापमय शरीर की समानता में, और पाप के बलिदान होने के लिये भेज कर, शरीर में पाप पर दण्ड की आज्ञा दी। 
Romans 8:4 इसलिये कि व्यवस्था की विधि हम में जो शरीर के अनुसार नहीं वरन आत्मा के अनुसार चलते हैं, पूरी की जाए। 
Romans 8:5 क्योंकि शरीरिक व्यक्ति शरीर की बातों पर मन लगाते हैं; परन्तु आध्यात्मिक आत्मा की बातों पर मन लगाते हैं। 
Romans 8:6 शरीर पर मन लगाना तो मृत्यु है, परन्तु आत्मा पर मन लगाना जीवन और शान्ति है। 
Romans 8:7 क्योंकि शरीर पर मन लगाना तो परमेश्वर से बैर रखना है, क्योंकि न तो परमेश्वर की व्यवस्था के आधीन है, और न हो सकता है। 
Romans 8:8 और जो शारीरिक दशा में है, वे परमेश्वर को प्रसन्न नहीं कर सकते। 
Romans 8:9 परन्तु जब कि परमेश्वर का आत्मा तुम में बसता है, तो तुम शारीरिक दशा में नहीं, परन्तु आत्मिक दशा में हो। यदि किसी में मसीह का आत्मा नहीं तो वह उसका जन नहीं। 
Romans 8:10 और यदि मसीह तुम में है, तो देह पाप के कारण मरी हुई है; परन्तु आत्मा धर्म के कारण जीवित है।

एक साल में बाइबल: 
  • 2 इतिहास 4-6
  • यूहन्ना 10:24-42



Wednesday, May 27, 2015

तूफान


   कहा जाता है कि वर्तमान इतोपिया देश में लाल सागर के तट पर स्थित प्राचीन देश अक्सुम के निवासियों ने खोज करी कि वर्षा ऋतु की तूफानी हवाओं के वेग को नाव में लगे पाल द्वारा वश में लेकर तेज़ी से नौकावाहन किया जा सकता है। इससे उन्होंने तेज़ हवाओं और ऊँची लहरों से डर कर रहने की बजाए, उन तूफानी परिस्थितियों को अपने लाभ के लिए उपयोग करना सीख लिया।

   परमेश्वर के वचन बाइबल में भजन 107 भी हमारे लिए जीवन में तूफानों की भूमिका का एक उत्तम शब्दचित्र प्रस्तुत करता है। इस भजन में भजनकार वर्णन करता है कि कैसे परमेश्वर हमारे जीवन में तूफानों को आने देता है और फिर उनमें हमें सुरक्षित निकाल कर ले आता है जिससे हम हर परिस्थिति में उस पर विश्वास रखना सीख सकें।

   परेशान परिस्थितियों में परमेश्वर पर भरोसा बनाए रखना बाइबल में अनेक बार दोहराया गया विषय है। इब्रानियों के नाम लिखी पत्री के 11वें अध्याय में लेखक उन अनेक परमेश्वर के विश्वासी जनों का उल्लेख करता है जिन्होंने अपनी समस्याओं तथा विकट परिस्थितियों को परमेश्वर के प्रति अपने विश्वास को व्यक्त करने का अवसर बनाया और परमेश्वर के अनुग्रह, प्रावाधान तथा छुटकारे का अनुभव किया (इब्रानियों 11:33-34)।

   जीवन में अनेकों तूफानों का आना तो अवश्यंभावी हैं; उन तूफानों के प्रति चाहे हमारी प्रथम प्रतिक्रीया उन से बचकर भाग निकल पाने के प्रयास की हो, फिर भी हम परमेश्वर से प्रार्थना में माँग सकते हैं कि वह हमें उन तूफानों में उस पर अपने विश्वास को बनाए रखना सिखाए और उन तूफानों का उपयोग उसकी निकटता में बढ़ने तथा उस से आशीषें प्राप्त करने के लिए करना सिखाए। - डेनिस फिशर


मसीह यीशु के साथ तूफान से होकर निकलना मसीह यीशु के बिना आरामदायक जीवन जीने से बेहतर है।

इन्‍होंने विश्वास ही के द्वारा राज्य जीते; धर्म के काम किए; प्रतिज्ञा की हुई वस्तुएं प्राप्त की, सिंहों के मुंह बन्‍द किए। आग की ज्‍वाला को ठंडा किया; तलवार की धार से बच निकले, निर्बलता में बलवन्‍त हुए; लड़ाई में वीर निकले; विदेशियों की फौजों को मार भगाया। - इब्रानियों 11:33-34

बाइबल पाठ: भजन 107:23-32
Psalms 107:23 जो लोग जहाजों में समुद्र पर चलते हैं, और महासागर पर हो कर व्यापार करते हैं; 
Psalms 107:24 वे यहोवा के कामों को, और उन आश्चर्यकर्मों को जो वह गहिरे समुद्र में करता है, देखते हैं। 
Psalms 107:25 क्योंकि वह आज्ञा देता है, वह प्रचण्ड बयार उठ कर तरंगों को उठाती है। 
Psalms 107:26 वे आकाश तक चढ़ जाते, फिर गहराई में उतर आते हैं; और क्लेश के मारे उनके जी में जी नहीं रहता; 
Psalms 107:27 वे चक्कर खाते, और मतवाले की नाईं लड़खड़ाते हैं, और उनकी सारी बुद्धि मारी जाती है। 
Psalms 107:28 तब वे संकट में यहोवा की दोहाई देते हैं, और वह उन को सकेती से निकालता है। 
Psalms 107:29 वह आंधी को थाम देता है और तरंगें बैठ जाती हैं। 
Psalms 107:30 तब वे उनके बैठने से आनन्दित होते हैं, और वह उन को मन चाहे बन्दर स्थान में पहुंचा देता है। 
Psalms 107:31 लोग यहोवा की करूणा के कारण, और उन आश्चर्यकर्मों के कारण जो वह मनुष्यों के लिये करता है, उसका धन्यवाद करें। 
Psalms 107:32 और सभा में उसको सराहें, और पुरनियों के बैठक में उसकी स्तुति करें।

एक साल में बाइबल: 
  • 2 इतिहास 1-3
  • यूहन्ना 10:1-23


Tuesday, May 26, 2015

ऋणी


   कहा जाता है कि युवक रॉबर्ट रॉबिन्सन (1735-1790) को अपने मित्रों के साथ मिलकर लोगों को परेशान करने का शौक था। उसने 17 वर्ष की आयु में जॉर्ज व्हिटफील्ड द्वारा परमेश्वर के वचन बाइबल में मत्ती 3:7 पर दिया गया सन्देश सुना और उसे अपने जीवन में मसीह यीशु में मिलने वाले उद्धार का बोध हुआ। प्रभु ने रॉबिन्सन के जीवन को परिवर्तित किया, और वह एक प्रचारक बन गया। उसने प्रभु की स्तुति तथा आराधना के अनेक गीत भी लिखे, जिनमें से सबसे प्रसिद्ध हुआ, "ऐ खुदा, कमाल के चश्मे"।

   हाल ही में मैं रॉबर्ट रॉबिन्सन द्वारा लिखे गए उस गीत की अन्तिम कड़ी, "मैं प्रतिदिन उस महान अनुग्रह का ऋणी हूँ" पर मनन कर रही थी। इससे मुझे प्रेरित पौलुस द्वारा लिखे गए शब्द, "क्योंकि मसीह का प्रेम हमें विवश कर देता है; इसलिये कि हम यह समझते हैं, कि जब एक सब के लिये मरा तो सब मर गए। और वह इस निमित्त सब के लिये मरा, कि जो जीवित हैं, वे आगे को अपने लिये न जीएं परन्तु उसके लिये जो उन के लिये मरा और फिर जी उठा" (2 कुरिन्थियों 5:14-15) स्मरण हो आए।

   हम हमारे प्रति परमेश्वर के प्रेम तथा अनुग्रह को किसी रीति से कमा नहीं सकते; उसे केवल एक उपहार के समान उससे धन्यवाद सहित स्वीकार ही कर सकते हैं। परन्तु क्योंकि परमेश्वर ने अपना यह प्रेम और अनुग्रह बहुतायत से हम पर सेंत-मेंत में उण्डेला है, इसलिए हम उससे प्रेम करे बिना और उसके लिए जीवन व्यतीत किए बिना रह भी कैसे सकते हैं? मुझे हमारे द्वारा परमेश्वर के प्रति प्रेम को शब्दों में व्यक्त करना नहीं आता, किंतु मैं निश्चित हूँ कि इस अभिव्यक्ति में उसके समीप रहना, उसकी सुननना, उसके वचन को जानना, कृतज्ञता के साथ उसकी सेवा करना तथा उसका आज्ञाकारी रहना सम्मिलित होंगे।

   हम मसीही विश्वासी अपने तथा जगत के उद्धारकर्ता प्रभु यीशु के सदा ऋणी रहेंगे क्योंकि हमें बचाने के लिए उसने अपने प्राण बलिदान कर दिए। - ऐनी सेटास


जो परमेश्वर के अनुग्रह को जानते हैं, वे अपने जीवन से उसे प्रदर्शित भी करते हैं।

यीशु ने उस से कहा, पुनरुत्थान और जीवन मैं ही हूं, जो कोई मुझ पर विश्वास करता है वह यदि मर भी जाए, तौभी जीएगा। - यूहन्ना 11:25

बाइबल पाठ: 2 कुरिन्थियों 5:12-17
2 Corinthians 5:12 हम फिर भी अपनी बड़ाई तुम्हारे साम्हने नहीं करते वरन हम अपने विषय में तुम्हें घमण्‍ड करने का अवसर देते हैं, कि तुम उन्हें उत्तर दे सको, जो मन पर नहीं, वरन दिखवटी बातों पर घमण्‍ड करते हैं। 
2 Corinthians 5:13 यदि हम बेसुध हैं, तो परमेश्वर के लिये; और यदि चैतन्य हैं, तो तुम्हारे लिये हैं। 
2 Corinthians 5:14 क्योंकि मसीह का प्रेम हमें विवश कर देता है; इसलिये कि हम यह समझते हैं, कि जब एक सब के लिये मरा तो सब मर गए। 
2 Corinthians 5:15 और वह इस निमित्त सब के लिये मरा, कि जो जीवित हैं, वे आगे को अपने लिये न जीएं परन्तु उसके लिये जो उन के लिये मरा और फिर जी उठा। 
2 Corinthians 5:16 सो अब से हम किसी को शरीर के अनुसार न समझेंगे, और यदि हम ने मसीह को भी शरीर के अनुसार जाना था, तौभी अब से उसको ऐसा नहीं जानेंगे। 
2 Corinthians 5:17 सो यदि कोई मसीह में है तो वह नई सृष्‍टि है: पुरानी बातें बीत गई हैं; देखो, वे सब नई हो गईं।

एक साल में बाइबल: 
  • 1 इतिहास 28-29
  • यूहन्ना 9:24-41


Monday, May 25, 2015

सच्चा बलिदान


   एरिक एक अच्छा व्यक्ति था। वह एक पुलिस अफसर था और अपने कार्य को समाज की सेवा के रूप में देखता था; वह अपने कार्य के प्रति पूर्णतः समर्पित था, तथा उसे वह हर कीमत पर निभाने को तैयार था। उसके इस समर्पण का सूचक था पुलिस स्टेशन में एरिक की अलमारी पर लगा स्टिकर जिस पर परमेश्वर के वचन बाइबल में से "इस से बड़ा प्रेम किसी का नहीं, कि कोई अपने मित्रों के लिये अपना प्राण दे" (यूहन्ना 15:13) लिखा हुआ था। ये शब्द एरिक के लिए केवल सुनाने-दिखाने भर के उत्कृष्ट आदर्श वाक्य मात्र नहीं थे; वे अपने कार्य के प्रति एरिक की वचनबद्धता का कथन थे, जिसे एरिक ने अपने कार्य के दौरान अपनी जान देकर निभाया और दिखाया। एरिक ने सच्चे बलिदान को वास्तविकता में दिखाया।

   प्रभु यीशु मसीह ने भी में अपने द्वारा यूहन्ना 15:13 में कहे गए उन शब्दों को कहने के कुछ ही घंटों में पूरा कर के अपने दावे को प्रमाणित किया। उस रात प्रभु यीशु ने अपने चेलों के साथ भोजन करते समय उनसे वह वार्तालाप किया जिसमें उन्होंने ये शब्द कहे जिन्हें एरिक ने अपनी अलमारी पर लगा रखा था, फिर प्रभु यीशु ने गतसमनी के बाग़ में जाकर प्रार्थना में परमेश्वर के साथ समय बिताया, फिर उन्हें विश्वासघात द्वारा बन्दी बनाकर रत भर झूठे मुकद्दमों में इधर से उधर घसीटा गया, यातनाएं दी गईं, अपमानित किया गया और फिर अगले दिन ठठ्ठा करती हुई भीड़ के समक्ष मारे जाने के लिए क्रूस पर चढ़ा दिया गया, जहाँ उन्होंने समस्त संसार के सभी जनों के लिए अपने प्राण बलिदान कर दिए।

   परमेश्वर का पुत्र होने के नाते प्रभु यीशु उस क्रूर दुख, ताड़ना, यातना से बच सकते थे; वे निष्पाप तथा निष्कलंक थे, उन्हें मरने की कोई आवश्यकता नहीं थी। किंतु मानव-जाति के प्रति उनका वह प्रेम, जो सच्चे बलिदान का ईंधन है, उन्हें कलवरी के क्रूस पर बलिदान होने के लिए लेकर गया; और उनके ईश्वरीय सामर्थ तथा गुण उन्हें तीसरे दिन मृतकों में से वापस ले आए। परिणामस्वरूप, आज जो भी उनके इस बलिदान और मृतकों में से पुनरुत्थान को सच्चे साधारण विश्वास के साथ ग्रहण करता है, उनसे अपने पापों की क्षमा मांगता है, वह उस क्षमा तथा उद्धार को पाता है, परमेश्वर की सन्तान बनने का गौरव प्राप्त करता है तथा स्वर्ग में अपने परमेश्वर पिता के साथ रहना सुनिश्चित कर लेता है।

   क्या आपने आपके पापों के संति उस सच्चे बलिदान को देने वाले यीशु को साधा