बाइबल और मसीही विश्वास सम्बन्धी अपने प्रश्नों के लिए यहाँ क्लिक करें:

GotQuestions?org

Sunday, May 31, 2015

अस्थिर अनुयायी


   लोकमत देखते ही देखते बदल जाता है, समर्थन करने वाले लोग भी अचानक ही विरोधी हो जाते हैं। जब खेल में हमारी मनपसन्द टीम जीत रही होती है, तो हम उसकी प्रशंसा करते हैं, उसके गुणों का बखान करते हैं; परन्तु जब वह एक-दो खेल हार जाए तो उससे विमुख होकर उसकी आलोचना करने में हमें देर नहीं लगती। जब कोई नया और उत्साहवर्धक कार्य आरंभ होता है तो उसके साथ जुड़ने में हमें संकोच नहीं होता, लेकिन कुछ समय में जब उसका वह नयापन जाता रहता है और उसके कार्य नित्यप्रायः लगने लगते हैं तो उसके प्रति हमारे उत्साह का स्तर भी गिरने लगता है।

   प्रभु यीशु ने भी लोकमत की इस अस्थिरता को अनुभव किया। जब वे फसह का पर्व मनाने यरुशालेम में आए तो लोगों ने उसका स्वागत बड़े उत्साह के साथ किया, उसे राजा माना (यूहन्ना 12:13); परन्तु स्पताह का अन्त होते होते वही भीड़ उसे क्रूस पर चढ़ाए जाने की माँग कर रही थी (यूहन्ना 19:15)। यह केवल उस भीड़ का ही बर्ताव नहीं था। जब प्रभु यीशु को पकड़वाया गया तथा क्रूस पर चढ़ाने के लिए ले जाया गया, तो उसके प्रति प्रेम और वफादारी का, तथा उसके लिए अपनी जान भी देने का दावा करने वाले उसके अनुयायी उसे अकेला छोड़ कर भाग गए। यह केवल उन अनुयायियों का ही व्यवहार नहीं था; आज मेरे जीवन में भी यही बात पाई जाती है। जब प्रभु यीशु मेरे भले के लिए कुछ असंभव कर रहे होते हैं तो मुझे उनके साथ खड़ा रहना अच्छा लगता है; परन्तु जब वे मुझे कुछ कठिन या कष्टदायक करने को कहते हैं मैं बचकर निकल लेने के प्रयास करने लगती हूँ। भीड़ की गुमनामी का भाग बनकर प्रभु यीशु का अनुयायी होने का दावा करना सरल है; जब वे चतुर लोगों की चतुराई को व्यर्थ और सामर्थी लोगों की सामर्थ को विफल करते हैं तो उन पर विश्वास रखने का दावा करना सहज है; लेकिन जब वे उस विश्वास के लिए दुख उठाने, बलिदान देने और मृत्यु का सामना करने की बात करते हैं तो उसी विश्वास को असमंजस तथा आनाकानी में बदलेते देर नहीं लगती।

   मुझे यह सोचना अच्छा लगता है कि यदी मैं वहाँ होती तो प्रभु के चेलों की तरह उन्हें छोड़कर नहीं भागती, वरन उनके साथ क्रूस तक जाती। लेकिन स्वयं मुझे ही अपने बारे में इस में कुछ शंका भी है; आखिरकर जब मैं उनके लिए अपना मूँह वहाँ भी नहीं खोलती जहाँ एक सुरक्षित माहौल है, तो मैं यह कैसे कह सकती हूँ कि उनके विरोधियों की भीड़ के समक्ष मैं उनके पक्ष में आने भी पाऊँगी, ऐसे विरोध भरे माहौल में खड़े होकर उनकी प्रशंसा करना या उनके लिए कुछ कहना तो बहुत दूर की बात है।

   हम मसीही विश्वासियों को और मुझे प्रभु परमेश्वर के प्रति और कितना अधिक धन्यवादी तथा कृतज्ञ रहना चाहिए कि हमारी दशा और व्यवहार को भली भाँति जानने के बावजूद, उसने मुझ जैसे, हम जैसे अस्थिर अनुयायियों के लिए भी अपने प्राण बलिदान किए, वह हमें आज भी अपना मानता है, हमारे साथ बना रहता है, हमारी सहायता करता रहता है जिससे कि हम उसकी संगति में रहकर, उससे सामर्थ पा सकें और उसके वफादार तथा उसे समर्पित अनुयायी बन सकें। - जूली ऐकैरमैन लिंक


मसीह यीशु अपने लिए हमारी योग्यता नहीं, वरन उसके लिए हमारी उपलब्धता और हमारा समर्पण चाहता है।

परन्तु यीशु ने अपने आप को उन के भरोसे पर नहीं छोड़ा, क्योंकि वह सब को जानता था। और उसे प्रयोजन न था, कि मनुष्य उसके विषय में कोई गवाही दे, क्योंकि वह आप ही जानता था, कि मनुष्य के मन में क्या है। - यूहन्ना 2:24-25

बाइबल पाठ: यूहन्ना 12:12-19; 19:14-16
John 12:12 दूसरे दिन बहुत से लोगों ने जो पर्व में आए थे, यह सुनकर, कि यीशु यरूशलेम में आता है। 
John 12:13 खजूर की, डालियां लीं, और उस से भेंट करने को निकले, और पुकारने लगे, कि होशाना, धन्य इस्त्राएल का राजा, जो