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शुक्रवार, 10 दिसंबर 2021

मसीही सेवकाई और पवित्र आत्मा के वरदान - 8


आत्मिक वरदान - समान महत्व के, सब के लाभ के लिए, पवित्र आत्मा के द्वारा   

पिछले लेख में हमने देखा था कि परमेश्वर पवित्र आत्मा चाहता है कि सभी मसीही विश्वासी आत्मिक वरदानों के बारे में सही समझ सीखें और रखें। साथ ही हमने यह भी देखा था कि परमेश्वर द्वारा उसके लिए निर्धारित सेवकाई के अनुसार प्रत्येक मसीही विश्वासी को उपयुक्त आत्मिक वरदान दिए जाते हैं। परमेश्वर की दृष्टि में न तो कोई सेवकाई छोटी अथवा बड़ी है, और न ही कोई आत्मिक वरदान बड़ा या प्रमुख, अथवा, छोटा या गौण है। इस प्रकार की भिन्नता या भेदभाव करना मनुष्य की प्रवृत्ति एवं भावना है, परमेश्वर की नहीं। यहाँ पर 1 कुरिन्थियों 12:31 के आधार पर वरदानों को बड़ा या छोटा कहने से पहले, इस पद को उसके संदर्भ में सही समझना आवश्यक है। इससे पहले के 12-27 पद में पौलुस ने शरीर को रूपक के समान प्रयोग करते हुए यह निष्कर्ष दिया कि जिस प्रकार देह के सभी अंग देह के लिए समान महत्व के और उसकी कार्य-क्षमता तथा कुशलता के लिए अपने-अपने स्थान पर आवश्यक हैं, कोई अंग कम अथवा अधिक महत्वपूर्ण, या बड़ा अथवा छोटा नहीं है, उसी प्रकार मण्डली में भी सभी मसीही विश्वासी, अपने भिन्न-भिन्न वरदानों और कार्यों के साथ, प्रभु की मण्डली रूपी देह के लिए समान महत्व रखते हैं, न तो कोई मसीही विश्वासी, न उसकी सेवकाई, न उसके वरदान, औरों की तुलना में बड़े अथवा छोटे, या कम अथवा अधिक महत्वपूर्ण है, सभी समान हैं। फिर इसके बाद पद 28 में पौलुस उस मण्डली रूपी एक देह में विभिन्न जिम्मेदारियों और कार्यों का उल्लेख करता है, और उन्हें क्रमवार बताते हुए उनकी क्रम-संख्या भी बताता है। फिर पद 29-30 में पौलुस पूछे गए प्रश्नों के द्वारा यह दिखाता है कि हर किसी को एक ही, या सारी ज़िम्मेदारियाँ नहीं दी गई हैं; सभी को अपनी-अपनी ज़िम्मेदारी निभानी है। और तब पद 31 में उसके द्वाराबड़े से बड़े वरदानवाक्यांश का प्रयोग किया गया है। इस पद को अन्य पदों के साथ, उसके संदर्भ में देखने से यह प्रकट हो जाता है किबड़े से बड़ेसे अभिप्राय अधिक से अधिक ज़िम्मेदारी वाले वरदान के लिए है। अर्थात पौलुस में होकर परमेश्वर पवित्र आत्मा मसीही विश्वासियों को यह बता रहा है कि मसीही मण्डली में अधिक से अधिक ज़िम्मेदारी उठाने वाले, यानि कि प्रभु के लिए अधिक से अधिक उपयोग में आने वाले व्यक्ति होने की धुन में रहो या लालसा रखो। यदि इसे वरदानों और सेवकाइयों में बड़े-छोटे के लिए समझा जाए तो फिर पद 12-27 में दी गई चर्चा व्यर्थ है; फिर तो प्रभु की मण्डली रूपी देह में सभी समान महत्व के नहीं हैं, और पवित्र आत्मा ने बड़े या छोटे आत्मिक वरदान देने के द्वारा भेद-भाव किया है। और यह बात परमेश्वर के स्वरूप और वचन की शिक्षाओं के साथ बिल्कुल मेल नहीं खाती है, इसलिए स्वीकार्य भी नहीं है

दूसरी बहुत महत्वपूर्ण बात जो इस अध्याय के 7 पद में, आत्मिक वरदानों के उल्लेख से भी पहले कही गई है, किन्तु जिस पर अधिकांशतः लोग ध्यान नहीं देते हैं, वह है, “किन्तु सब के लाभ पहुंचाने के लिये हर एक को आत्मा का प्रकाश दिया जाता है” (1 कुरिन्थियों 12:7)। हम इससे पहले परमेश्वर की कार्यविधि को समझते हुए, 8 दिसंबर के लेख में यह देख चुके हैं कि हमारा परमेश्वर पिता हमेशा सभी की भलाई के लिए ही कार्य करता है, और जो आशीषें वह देता है, वह किसी व्यक्ति के अपने निज लाभ और प्रयोग के लिए ही नहीं होती हैं, वरन, उस व्यक्ति में होकर सभी के लाभ और उन्नति के लिए होती हैं। यही बात यहाँ इस 7 पद में कही गई है। पवित्र आत्मा स्वयं इस बात को पहले ही लिखवा दे रहा है कि हर एक को जो भी आत्मिक वरदान पवित्र आत्मा की ओर से दिया गया है, वह सभी के लाभ के लिए है। इसकी पुष्टि एक बार फिर से 1 कुरिन्थियों 14:12 “इसलिये तुम भी जब आत्मिक वरदानों की धुन में हो, तो ऐसा प्रयत्न करो, कि तुम्हारे वरदानों की उन्नति से कलीसिया की उन्नति होमें हो जाती है। यद्यपि यह बात अन्य-भाषा बोलने के संदर्भ में कही गई है, किन्तु फिर भी यहाँ पर यह बलपूर्वक दोहराया गया है कि सभी के आत्मिक वरदानों के द्वारा कलीसिया ही की उन्नति होनी चाहिए; और 1 कुरिन्थियों 14:2-5 पद तथा इस अध्याय के अन्य पद भी यह स्पष्ट कर देते हैं कि अन्य भाषा बोलना भी कलीसिया की उन्नति के लिए ही है, किसी भी व्यक्ति के अपने निज प्रयोग अथवा लाभ के लिए नहीं। यद्यपि यह हमारे वर्तमान विषय से बाहर की चर्चा है, किन्तु इस संदर्भ में यह कहना बहुत आवश्यक है कि बाइबल में जिसेअन्य भाषाकहा गया है वह पृथ्वी की ही, और जानी पहचानी भाषाएं हैं, जिनके नाम हैं, जो विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में मनुष्यों द्वारा बोली जाती हैं, और जिनके अनुवाद किसी अन्य क्षेत्र की भाषा में किए जा सकते हैं। पवित्र आत्मा के नाम से गलत शिक्षाएं फैलाने वालों की इस गलत शिक्षा का कि अन्य भाषाएं अलौकिक, पृथ्वी के बाहर की भाषा है, बाइबल में कोई समर्थन नहीं है। 1 कुरिन्थियों 14 अध्याय ही ध्यान से और प्रार्थना पूर्वक पढ़ लीजिए, वास्तविकता स्वतः ही प्रकट हो जाएगी।

आत्मिक वरदानों से संबंधित तीसरी महत्वपूर्ण बात हम 1 कुरिन्थियों 12:, 11 पद में देखते हैं - हर एक आत्मिक वरदान, परमेश्वर पवित्र आत्मा प्रदान करता है, और अपनी इच्छा यानि उस व्यक्ति की निर्धारित सेवकाई के अनुसार प्रदान करता है। किसे कौन सा आत्मिक वरदान दिया जाना है, यह व्यक्ति की लालसा या उसके कहे अथवा मांगे जाने के अनुसार नहीं है। सभी को उसे उचित एवं उपयुक्त रीति से प्रयोग करना है, जो परमेश्वर ने उसे दिया है, उसके लिए रखा है। हम ऊपर देख चुके हैं किबड़े से बड़े वरदानों की धुन में रहो” (पद 31) का अर्थ मण्डली में अधिक से अधिक ज़िम्मेदारी निभाने के लिए है, अपने वरदान के स्थान पर कोई अन्य वरदान प्राप्त करने के लिए नहीं है। हम पहले भी, दिसंबर 5 और 6 के लेखों में देख चुके हैं कि परमेश्वर ने जिसके लिए जो ज़िम्मेदारी निर्धारित की है, उसे वो व्यक्ति ही निभा सकता है, कोई अन्य नहीं। परमेश्वर अपने निर्णय और बातें किसी के कहे के अनुसार बदलता नहीं है। उसके निर्णय अनन्तकाल के परिप्रेक्ष्य में लिए गए निर्णय हैं, अल्प-कालीन या मनुष्य की सोच और इच्छा के अनुसार लिए गए नहीं। मसीही विश्वासी की आशीष उसके द्वारा परमेश्वर की आज्ञाकारिता में है, न कि परमेश्वर को अपनी इच्छा के अनुसार कार्य करने के लिए बाध्य करने के प्रयासों में। 

यदि आप मसीही विश्वासी हैं तो आपको अपने मसीही जीवन और सेवकाई में पवित्र आत्मा से संबंधित गलत शिक्षाओं से बच कर रहने के लिए इन उपरोक्त बातों का ध्यान रखना बहुत आवश्यक है। न तो कोई सेवकाई और न कोई आत्मिक वरदान परमेश्वर की दृष्टि में बड़ा अथवा छोटा है। हर वरदान परमेश्वर की ओर से, सभी की भलाई के लिए दिया गया है, किसी के व्यक्तिगत उपयोग के लिए नहीं। इस संदर्भ में अन्य भाषा बोलना भी कलीसिया की भलाई और उपयोग के लिए ही है, जैसा 1 कुरिन्थियों 14 अध्याय के अध्ययन से स्पष्ट है, न कि किसी व्यक्ति के द्वारा मुँह से विचित्र ध्वनियाँ निकालकर और विचित्र हाव-भाव दिखाने के द्वारा लोगों पर यह प्रभाव जमाने के लिए कि उन्हें पवित्र आत्मा का कोई विशेष अनुग्रह या सामर्थ्य मिली हुई है। और किसे क्या देना है, हर आत्मिक वरदान परमेश्वर ही निर्धारित करता है, यह मनुष्य की इच्छा के अनुसार निर्धारित नहीं होता है। किसी को भी 1 कुरिन्थियों 12:31 की गलत व्याख्या के आधार पर वचन की इन सच्चाइयों को बदलने का प्रयास नहीं करना चाहिए। 

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • होशे 1-4    
  • प्रकाशितवाक्य 1

गुरुवार, 9 दिसंबर 2021

मसीही सेवकाई और पवित्र आत्मा के वरदान - 7

 

पवित्र आत्मा के वरदानों की समझ 

मसीही जीवन और सेवकाई में परमेश्वर पवित्र आत्मा की भूमिका और उनके द्वारा दिए जाने वाले आत्मिक वरदानों के अध्ययन में हम यह देख चुके हैं कि परमेश्वर प्रत्येक मसीही विश्वासी से कुछ न कुछ कार्य, जो हर एक के लिए परमेश्वर द्वारा पूर्व-निर्धारित हैं, चाहता है। परमेश्वर द्वारा निर्धारित इन कार्यों को करने के लिए प्रत्येक मसीही विश्वासी को उसमें निवास करने वाले परमेश्वर पवित्र आत्मा की सहायता उपलब्ध है, और साथ ही पवित्र आत्मा ने सभी को उनके कार्य और सेवकाई के लिए उचित और उपयुक्त वरदान, या क्षमताएं और योग्यताएं भी दी हैं, जिससे वह अपनी सेवकाई सुचारु रीति से और परमेश्वर की इच्छा के अनुसार कर सके, कि उसकी सेवकाई परमेश्वर को स्वीकार्य हो। इस संदर्भ में हम यह भी देख चुके हैं कि परमेश्वर को वही स्वीकार्य होता है जो उसकी इच्छा के अनुसार और उसकी आज्ञाकारिता में होकर किया जाता है। कोई मनुष्य अपनी मन-मर्ज़ी से परमेश्वर के नाम से कुछ भी करे, और अपेक्षा रखे कि परमेश्वर उसे स्वीकार करेगा, उसके लिए आशीष देगा, तो यह उस मनुष्य की अपनी सोच और समझ है। परमेश्वर उसकी इस सोच और समझ के साथ सहमत नहीं है, और उसे तथा उसके ऐसे सभी कार्यों को अस्वीकार कर देता है। इसलिए अति-आवश्यक है कि जब मसीही विश्वासी अपनी निर्धारित सेवकाई के कार्य करे, अपने वरदानों का उपयोग करे तो इस अनिवार्य बात का ध्यान रखते हुए करे। 

इसके लिए स्वाभाविक है कि प्रत्येक मसीही विश्वासी को आत्मिक वरदानों के प्रति सही समझ-बूझ और ज्ञान रखना चाहिए। परमेश्वर ने भी अपने लोगों को इस विषय में अनभिज्ञ एवं निःसहाय नहीं छोड़ा है। पवित्र आत्मा ने बाइबल की पुस्तकों में इन वरदानों, और उनके उपयोग के बारे में उपयुक्त विवरण लिखवाया है। अन्य स्थानों के अतिरिक्त, रोम के, और कुरिन्थुस के मसीही विश्वासियों को पौलुस प्रेरित के द्वारा लिखी पत्रियों में इसके विषय इसके बारे में प्रमुख शिक्षाएं मिलती हैं। कुरिन्थुस की मसीही मण्डली को लिखी अपने पहली पत्री में, पौलुस ने लिखाहे भाइयों, मैं नहीं चाहता कि तुम आत्मिक वरदानों के विषय में अज्ञात रहो” (1 कुरिन्थियों 12:1); और यहाँ से आरंभ कर के 14 अध्याय के अंत तक की चर्चा पवित्र आत्मा के वरदानों के बारे में है। इसी प्रकार से रोमियों को लिखी पत्री का 12 अध्याय भी पवित्र आत्मा के वरदानों के बारे में है। मसीही सेवकाई में लगे प्रत्येक मसीही विश्वासी को प्रार्थना के साथ, इन अध्यायों में दी गई शिक्षाओं के लिए पवित्र आत्मा का मार्गदर्शन मांगते हुए, इन अध्यायों को बहुत गंभीरता से और बारंबार पढ़ना चाहिए, और इनमें लिखी बातों को अपने जीवन और सेवकाई में लागू करना चाहिए। आज से हम 1 कुरिन्थियों 12 में आत्मिक वरदानों के बारे में लिखी बातों को देखना आरंभ करेंगे। 

जैसा उपरोक्त पहले पद के हवाले से स्पष्ट है, पौलुस प्रेरित में होकर परमेश्वर पवित्र आत्मा की यह हार्दिक इच्छा है कि मसीही विश्वासी इन आत्मिक वरदानों के विषय ज्ञान और समझ रखें। फिर 4 से 6 पद में पौलुस लिखता है कि वरदान, सेवा, और प्रभावशाली कार्य कई प्रकार के हैं, किन्तु इनके पीछे, इनमें होकर कार्य करने वाला आत्मा, प्रभु, और परमेश्वर एक ही है। अभिप्राय यह, कि न तो किसी का कार्य, न उसकी सेवा, और न उस सेवकाई का प्रकट प्रभाव, परमेश्वर की दृष्टि में छोटा अथवा बड़ा, या महत्वपूर्ण अथवा गौण है। जिसके लिए परमेश्वर ने जो और जैसा निर्धारित किया है, वही उसके लिए सही, सबसे उपयुक्त, और सबसे महत्वपूर्ण है; चाहे मनुष्यों की दृष्टि एवं आँकलन में वह कैसा भी हो - परमेश्वर उसे अपने मापदंड और आँकलन के अनुसार देखेगा और प्रतिफल देगा; मनुष्यों की बातों के अनुसार नहीं। इसे समझने के लिए बाइबल से कुछ उदाहरणों को देखते हैं: मत्ती 25:14-30 में प्रभु यीशु मसीह द्वारा कहा गया परदेश जाते समय एक मनुष्य द्वारा अपने दासों को दिए गए तोड़ों का दृष्टांत है। उस मनुष्य ने एक दास को पाँच, एक को दो और एक को एक ही तोड़ा दिया; और वापस लौटने पर तीनों से समान ही हिसाब लिया। इस पूरे दृष्टांत में कहीं यह संकेत अथवा बात नहीं दी गई है कि उस स्वामी की दृष्टि में उन दासों या उसके द्वारा उनका आँकलन करने या उन्हें परखने में कोई भिन्नता थी। यद्यपि उनकी व्यक्तिगत क्षमता के अनुसार स्वामी ने हर एक को दिया (पद 15), किन्तु वे तीनों और उनका आँकलन स्वामी की दृष्टि में समान था। एक तोड़ा पाने वाला अपने निकम्मेपन के कारण दण्ड का भागी हुआ, न कि स्वामी की उसके प्रति किसी पूर्व-धारणा के कारण। प्रभु ने मत्ती 20:1-16 में दाख की बारी के स्वामी का दृष्टांत बताया, जो दिन के अलग-अलग पहरों में जाकर अपनी बारी में काम करने के लिए मज़दूरों को लाता रहा, यहाँ तक कि अंतिम घंटे में भी और मज़दूर काम के लिए बुलाए। फिर उसने सभी को समान मेहनताना दिया। सारे दिन कार्य करने वालों और एक घंटा काम करने वालों में कोई भिन्नता नहीं की। जिन मज़दूरों ने भिन्नता करवानी भी चाही, उन्हें भी चुप कर दिया। निष्कर्ष स्पष्ट है, प्रभु द्वारा निर्धारित और सौंपा गया कोई भी सेवकाई या कार्य छोटा या बड़ा नहीं है; इसलिए उस सेवकाई या कार्य को करने से संबंधित कोई भी आत्मिक वरदान छोटा या बड़ा, अथवा कम या अधिक महत्व का नहीं है। जिसने भी प्रभु द्वारा निर्धारित कार्य को वफादारी से किया, प्रभु द्वारा उसे उपलब्ध करवाए गए संसाधनों का सही और उचित उपयोग किया, वह प्रभु द्वारा कभी भी किसी से भी छोटा या कम महत्व वाला नहीं समझा गया। उसे भी वही आदर और सम्मान तथा प्रतिफल और आशीषें मिलीं जो किसी अन्य को, चाहे मनुष्यों की दृष्टि में उसकी सेवकाई का महत्व एवं आँकलन कुछ भी हो।

यदि आप मसीही विश्वासी हैं, तो मनुष्यों की बातों और धारणाओं के बहकावे में आए बिना, प्रभु द्वारा आपको सौंपी गई सेवकाई का पूरे लगन से और वफादारी से निर्वाह कीजिए। प्रभु की दृष्टि में आप भी उतने ही महत्वपूर्ण और उपयोगी हैं, जितना कोई भी अन्य व्यक्ति। साथ ही यह भी ध्यान रखिए, ऐसे अनेकों हैं जो अपनी ही इच्छा के अनुसार प्रभु के नाम से बहुत कुछ करने में लगे हुए हैं, उनकी संसार में बहुत प्रशंसा और प्रतिष्ठा है, वे स्वयं अपने आप को तथा लोग भी उन्हें बहुत ऊंचे दर्जे का या महान समझते हैं। किन्तु अंतिम न्याय के समय उन्हें प्रभु से सुनने को मिलेगा, “मैं ने तुम को कभी नहीं जाना, हे कुकर्म करने वालों, मेरे पास से चले जाओ” (मत्ती 7:23); और तब उनकी क्या दशा होगी? इसलिए मनुष्यों के आँकलन और राय या विचार पर मत जाइए। जो प्रभु ने आप को सौंपा है, जो करने को कहा है, उसे वफादारी और ईमानदारी से पूरा कीजिए और प्रभु आपको कभी किसी से छोटा नहीं होने देगा। 

       यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • दानिय्येल 11-12    
  • यहूदा 1   

बुधवार, 8 दिसंबर 2021

मसीही सेवकाई और पवित्र आत्मा के वरदान - 6


पुनःअवलोकन, निष्कर्ष, परमेश्वर की कार्य-विधि, और शैतान की भ्रामक युक्तियाँ  

पुनःअवलोकन:

मसीही जीवन और सेवकाई में परमेश्वर पवित्र आत्मा द्वारा मसीही विश्वासियों को दिए गए वरदानों की इस अध्ययन शृंखला में हम अभी तक उन आधारभूत बातों को देखते आए हैं, जिनकी समझ और विचार रखना, पवित्र आत्मा के वरदानों के उपयोग के बारे में समझने के लिए अनिवार्य है। यदि परमेश्वर के वचन की इन मौलिक शिक्षाओं को ध्यान में रखे बिना हम पवित्र आत्मा के वरदानों और उपयोग को समझने के प्रयास करेंगे, तो बहुत सी गलतियों में पड़ सकते हैं, जो हमें सत्य से भटका देंगी। इस संदर्भ में हम अभी तक देख चुके हैं कि:

  • परमेश्वर स्वयं कार्यशील है और अपने लोगों को भी कार्यशील देखना चाहता है। 
  • परमेश्वर ने लोगों को मसीही विश्वास में निठल्ले होने तथा निष्क्रिय एवं निष्फल रहते हुए परमेश्वर की आशीषों को उपयोग करते रहने के लिए नहीं लिया है। 
  • परमेश्वर ने प्रत्येक मसीही विश्वासी द्वारा परमेश्वर के लिए करने के लिए कुछ न कुछ कार्य निर्धारित किए हैं। 
  • परमेश्वर द्वारा निर्धारित किए गए इन कार्यों को सुचारु रीति से करने के लिए परमेश्वर पवित्र आत्मा स्वतः ही प्रत्येक मसीही विश्वासी को उस कार्य के लिए उपयुक्त कोई न कोई वरदान अवश्य देता है। 

साथ ही हमने मसीही विश्वासी के जीवन और सेवकाई में परमेश्वर पवित्र आत्मा की भूमिका के संदर्भ में यह भी देखा है कि मसीही विश्वास में आते ही तुरंत ही उसी पल से हर विश्वासी के अन्दर पवित्र आत्मा आकर निवास करने लगता है; इसके किसी को लिए कोई अलग से प्रार्थना या प्रयास नहीं करना पड़ता है। यह मसीही विश्वास में आने के साथ ही, परमेश्वर द्वारा निर्धारित की गई और स्वतः ही होने वाली स्वाभाविक प्रक्रिया है। इससे संबंधित जो दूसरी महत्वपूर्ण बात हमने देखी थी वह थी कि व्यक्ति में पवित्र आत्मा की उपस्थिति उस व्यक्ति के बदले हुए जीवन और उसमें दिखने वाले आत्मा के फलों (गलातीयों 5:22-23) के द्वारा प्रमाणित होती है, न कि बाइबल के बाहर की विचित्र हरकतों, उछल-कूद, शोर-शराबे आदि के व्यवहार से, अथवा चिह्न-चमत्कार आदि करने के द्वारा।

निष्कर्ष:

शैतान का उद्देश्य सदा ही परमेश्वर के कार्य में बाधाएं डालना और उसकी योजनाओं को असफल करने के प्रयास करना रहता है। क्योंकि परमेश्वर मसीही विश्वासियों में होकर संसार में और संसार के लोगों के समक्ष अपने कार्य करता है, इसलिए परमेश्वर के कार्यों को बाधित करने के लिए शैतान मसीही विश्वासियों को व्यर्थ की बातों में उलझा कर रखता है जिससे वे अपने निर्धारित कार्य न कर सकें, और उसके द्वारा फैलाई जाने वाली भक्तिपूर्ण प्रतीत होने वाली किन्तु वास्तविकता में भरमाने वाली युक्तियों में उलझे रह कर समय बर्बाद करते रहें। अपने इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए वह मसीही विश्वासियों को जाने-अनजाने में परमेश्वर का अनाज्ञाकारी भी बना कर रखता है। यह समझते हुए कि वे परमेश्वर के लिए, या परमेश्वर की ओर से कार्य कर रहे हैं, वे अपनी ही धारणाओं, इच्छाओं, और मनुष्यों की मन-गढ़न्त बातों तथा गलत शिक्षाओं के अनुसार कार्य करते रहते हैं, और अन्ततः उनके सभी कार्य और प्रयास व्यर्थ एवं निष्फल होते हैं। शैतान की एक और कार्य-विधि है मसीही विश्वासी को उसके वरदानों और उनकी उपयोगिता के बारे में अनभिज्ञ रखना, या उन्हें ठीक से उपयोग नहीं करने देना, उनके बारे में उसे गलत शिक्षाओं में फंसा देना। 

परमेश्वर की कार्य-विधि:

परमेश्वर ने सदा ही समस्त मानवजाति की भलाई के लिए ही कार्य किया है। जब पृथ्वी पर पाप  बहुत बढ़ गया, और परमेश्वर ने जल-प्रलय के द्वारा पापी मनुष्यों के नाश की ठान ली, तब भी उसने उनके लिए जो पापों से पश्चाताप कर लें, उसकी चेतावनियों को मान लें, अपनी बुराई से पलट जाएं, उनके बचाए जाने के लिए नूह के द्वारा एक जहाज़ बनवाया; किन्तु नूह और उसके परिवार को छोड़ और किसी ने परमेश्वर की नहीं सुनी, संसार के लोगों ने परमेश्वर की चेतावनियों को गंभीरता से नहीं लिया, और जल-प्रलय में नाश हो गए। जब परमेश्वर अब्राहम को मूर्तिपूजकों में से निकालकर कनान में लेकर आया, तो अब्राहम को दी गई परमेश्वर की प्रतिज्ञा में भी समस्त पृथ्वी की भलाई की योजना थी। उस समय, “यहोवा ने अब्राम से कहा, अपने देश, और अपनी जन्मभूमि, और अपने पिता के घर को छोड़कर उस देश में चला जा जो मैं तुझे दिखाऊंगा। और मैं तुझ से एक बड़ी जाति बनाऊंगा, और तुझे आशीष दूंगा, और तेरा नाम बड़ा करूंगा, और तू आशीष का मूल होगा। और जो तुझे आशीर्वाद दें, उन्हें मैं आशीष दूंगा; और जो तुझे कोसे, उसे मैं शाप दूंगा; और भूमण्डल के सारे कुल तेरे द्वारा आशीष पाएंगे” (उत्पत्ति 12:1-3)। जब परमेश्वर ने अब्राहम के वंशजों, इस्राएलियों को अपने लोग होने के लिए चुना, तो उनमें होकर सच्चे परमेश्वर के विमुख एवं अनाज्ञाकारी हो चुके संसार के लोगों के सामने अपनी भलाई, अपने लोगों की देखभाल, और उनमें होकर अपनी सामर्थ्य तथा सार्वभौमिकता को दिखाया। किन्तु उसके सभी प्रमाणों के बावजूद संसार ने इस्राएल के परमेश्वर को नहीं अपनाया, वरन उलटे इस्राएल ने ही संसार की बातों को अपना लिया और परमेश्वर से दूर चला गया। उसका हर रीति से तिरस्कार किए जाने के बावजूद, फिर भी परमेश्वर सभी की देखभाल करता रहता है, सभी मनुष्यों को उसकी सृष्टि का उपयोग करने देता है, सभी की आवश्यकताओं को पूरा करता रहता हैजिस से तुम अपने स्वर्गीय पिता की सन्तान ठहरोगे क्योंकि वह भलों और बुरों दोनों पर अपना सूर्य उदय करता है, और धर्मियों और अधर्मियों दोनों पर मेंह बरसाता है” (मत्ती 5:45)। प्रभु यीशु मसीह में होकर भी परमेश्वर ने किसी जाति-विशेष, अथवा कुछ विशेष लोगों के लिए नहीं, परंतु समस्त मानवजाति के पापों की क्षमा, उद्धार, और परमेश्वर के साथ मेल-मिलाप कर लेने और अनन्तकाल के लिए परमेश्वर के साथ स्वर्ग के निवासी होने के लिए मार्ग बनाकर दिया। 

परमेश्वर के कार्यों और वरदानों के संबंध में यह एक बहुत महत्वपूर्ण सिद्धांत है, कि परमेश्वर का हर कार्य, हर आशीष, हर योजना, उसके द्वारा प्रदान की जाने वाली हर सामर्थ्य, कभी भी किसी व्यक्ति विशेष के लिए ही नहीं होती है, वरन उस व्यक्ति में होकर सभी की भलाई और उन्नति के लिए, संसार के लोगों को परमेश्वर के बारे में बताने, उसकी ओर आकर्षित करने, और उसकी निकटता में लाने के लिए होती है। परमेश्वर द्वारा दी जाने वाली बातों और सामर्थ्य से संबंधित इस मौलिक सिद्धांत की कभी अनदेखी नहीं करनी चाहिए, अन्यथा बहुत सी गलतियों में पड़ जाएंगे। और पवित्र आत्मा द्वारा दिए जाने वाले वरदानों को लेकर शैतान ने बहुत से लोगों को, विशेषकर उनको जो पवित्र आत्मा के नाम से गलत शिक्षाओं को सिखाते और फैलाते हैं, इसी गलती में फंसा रखा है।

शैतान की भ्रामक युक्तियाँ:

यदि आप थोड़ा सा भी विचार करें तो यह तुरंत ही प्रकट हो जाता है कि ये गलत शिक्षाएं फैलाने वाले लोग जिन पवित्र आत्मा के वरदानों और सामर्थ्य की बातें करते हैं, जिन्हें मांगने और पाने के लिए सिखाते हैं, वे सभी व्यक्ति द्वारा अपने उपयोग के लिए या व्यक्ति की प्रतिष्ठा और सामाजिक अथवा मण्डली में स्तर को बढ़ाने, लोगों से प्रशंसा पाने, व्यक्ति के अहम को बढ़ाने वाले होते हैं। दुख की बात यह है कि इन सभी वरदानों को भी परमेश्वर पवित्र आत्मा ने मण्डली तथा लोगों की भलाई के लिए दिया है, किन्तु जिस प्रकार से और जिस स्वरूप में ये लोग उन वरदानों को प्रस्तुत करते हैं, उससे उनकी वास्तविक उपयोगिता एवं दिए जाने का उद्देश्य भ्रष्ट हो जाता है। यह भक्ति और आत्मिकता के भेष में ढाँप कर, शैतान की कुटिलता और झूठ को लोगों में बैठा देने और फैला देने का तरीका है। शैतान के इस चंगुल में फँस कर वे लोग अपने इन वरदानों को व्यर्थ कर देते हैं, और जिनकी सेवकाई के लिए ये वरदान थे, वे लोग निष्क्रिय तथा निष्फल हो जाते हैं, अपनी आशीषों को गँवा देते हैं। उनके लिए वह दिन और समय कितना भयानक और हृदय-विदारक होगा, जब मत्ती 7:23 के अनुरूप, प्रभु यीशु मसीह उनसे कहेगा, “मैं ने तुम को कभी
नहीं जाना, हे कुकर्म करने वालों, मेरे पास से चले जाओ यदि उन्होंने परमेश्वर के वचन को गंभीरता से लिया होता, मनुष्यों की धारणाओं और मन-गढ़न्त बातों के अनुसार नहीं वरन बाइबल की बातों के अनुसार सीखा होता, स्वीकार करने से पहले सभी शिक्षाओं को बारीकी से जाँचा-परख होता, तो वे कभी शैतान की इन चालों में नहीं फँसते, परमेश्वर पवित्र आत्मा उन्हें वचन की सच्चाइयों को दिखाता, बताता, और समझाता। किन्तु उन्होंने परमेश्वर के वचन के स्थान पर मनुष्यों की बातों को अधिक महत्व दिया, और अपनी सेवकाई व्यर्थ कर ली, अपनी अनन्तकालीन आशीषें गँवा दीं। 

यदि आप मसीही विश्वासी हैं, तो पवित्र आत्मा के वरदानों से संबंधित अपने विचारों, मान्यताओं, और धारणाओं को परमेश्वर के वचन से जाँच-परख लें, और सुनिश्चित कर लें कि आप किसी गलत शिक्षा अथवा मनुष्य की गढ़ी हुई बातों में नहीं फंसे हुए हैं, वरन वचन की खराई और सही शिक्षा में ही स्थापित हैं। समय रहते सुधार न करने के परिणाम, वर्तमान में तथा अनन्तकाल के लिए, बहुत हानिकारक हो सकते हैं। प्रभु द्वारा मत्ती 7:23 में तथा उन पाँच मूर्ख कुँवारियों से कही गई बात को स्मरण कीजिए - बाद में सुधार का प्रयास करने से उन्हें कुछ लाभ नहीं हुआ, वे प्रभु से दूर ही रहे। 

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • दानिय्येल 8-10    
  • 3 यूहन्ना 1

मंगलवार, 7 दिसंबर 2021

मसीही सेवकाई और पवित्र आत्मा के वरदान - 5

 

आत्मिकता का प्रमाण - आज्ञाकारिता या चिन्ह और चमत्कार?

  पिछले लेख में हमने देखा है कि मनुष्य द्वारा परमेश्वर को प्रसन्न करने और उसके कार्य करने के लिए परमेश्वर की दृष्टि में परमेश्वर की आज्ञाकारिता का ही सर्वोपरि स्थान है। हम यह भी देख चुके हैं कि परमेश्वर अपने सभी अनुयायियों से कुछ न कुछ कार्य चाहता है, और उसने वे कार्य पहले से ही निर्धारित भी किए हुए हैं, तथा उस सेवकाई के लिए उपयुक्त सामर्थ्य एवं योग्यता प्रदान करने के लिए मसीही विश्वासी में सर्वदा निवास करने वाला परमेश्वर पवित्र आत्मा प्रत्येक मसीही विश्वासी को आवश्यक वरदान भी देता है। यह बाइबल का स्थापित तथ्य है कि उद्धार पाते ही, वास्तविकता में मसीही विश्वासी बनते ही, उसी पल से परमेश्वर पवित्र आत्मा उद्धार पाए हुए व्यक्ति में आकर निवास करने लग जाता है; और व्यक्ति में उनकी उपस्थिति उस व्यक्ति के बदल हुए जीवन तथा पवित्र आत्मा के फलों के दिखने लग जाने के द्वारा प्रमाणित हो जाती है (मत्ती 7:15-20)। ये सभी परमेश्वर द्वारा पूर्व-निर्धारित और उसकी योजना के अनुसार दी जाने वाली बातें हैं, जिनके लिए किसी भी उद्धार पाए हुए जन को अलग से कोई प्रयास अथवा प्रार्थनाएं करने की आवश्यकता नहीं है। 

किन्तु फिर भी पवित्र आत्मा के नाम से अनेकों प्रकार की गलत शिक्षाएं और अनुचित धारणाएं बताने-सिखाने वाले लोग, मसीही विश्वासी में पवित्र आत्मा के होने को लेकर लोगों में भ्रम और संदेह उत्पन्न करते रहते हैं, और पवित्र आत्मा की उपस्थिति प्रमाणित करने के लिए व्यक्ति में विभिन्न बातों के होने की अनिवार्यता को सिखाते हैं, नाहक उन पर बल देते रहते हैं। इन गलत शिक्षाओं को सिखाने वाले लोगों द्वारा कही जाने वाली बातों में से एक है पवित्र आत्मा पाए हुए व्यक्ति में अद्भुत चिह्न और चमत्कार करने की सामर्थ्य होना। निःसंदेह चिह्न और चमत्कार करने की सामर्थ्य देना परमेश्वर पवित्र आत्मा द्वारा दिए जाने वाले वरदानों में से एक है; किन्तु बाइबल में ऐसी कोई शिक्षा नहीं है कि यह वरदान प्रत्येक मसीही विश्वासी को दिया जाएगा, या, किसी व्यक्ति में इस गुण की उपस्थिति उसमें पवित्र आत्मा होने का प्रमाण है। वरन, इसके ठीक विपरीत, परमेश्वर ने पुराने और नए नियम, दोनों में अपने लोगों को सचेत किया है कि वे चिह्न और चमत्कारों के द्वारा लोगों को भरमाने और परमेश्वर से दूर कर देने वालों से सावधान रहें, उनके छल में फंस न जाएं, और परमेश्वर के वचन को ही वास्तविकता को जाँचने की खरी कसौटी के समान प्रयोग करें।

यह न केवल बाइबल का, वरन सामान्य जीवन का भी एक व्यावहारिक सत्य है कि शैतान और उसके दूत भी अद्भुत कार्य, चिह्न और चमत्कार, जादू-टोना, भावी कहना, आदि करने की सामर्थ्य रखते हैं और इनके द्वारा लोगों को प्रभावित करते हैं, अपने वश में लाते हैं, और परमेश्वर के वचन की सच्चाई एवं वास्तविकता से बहका देते हैं, गलत मार्गों पर भटका देते हैं। कुछ लोगों में ऐसा करने की योग्यता और इसके द्वारा समाज पर उनका प्रभाव होना यह प्रमाणित करता है कि उनमें कुछ ऐसी शक्तियां थीं जिनके द्वारा वे ये सब किया करते थे। अन्यथा, यदि उनमें ये सब करने की शक्ति नहीं होती तो लोग क्यों उन्हें मानते और उनके अधीनता में आते? और साथ ही जब परमेश्वर ने उनके साथ न जाने, उनसे दूर रहने के लिए निर्देश दिए, तो यह प्रकट है कि उन लोगों की शक्ति परमेश्वर की ओर से नहीं थी, वरन परमेश्वर के बैरी और विरोधी शैतान की ओर से थी।  

 इस संदर्भ में बाइबल से ही कुछ उदाहरणों को देखते हैं:

  • मूसा तथा हारून ने परमेश्वर की आज्ञाकारिता और सामर्थ्य से जो चिह्न फिरौन के सामने दिखाए, फिरौन केपंडितों और टोन्हाकरने वालों ने भी वही करके दिखा दिया (निर्गमन 7:8-12, 19-22; 8:5-7) 
  • परमेश्वर ने अपनी व्यवस्था में भावी कहने वालों, शुभ-अशुभ मुहूर्तों को मानने वालों, टोन्हा करने वालों, और तांत्रिकों, आदि से दूर रहने को कहा (व्यवस्थाविवरण 8:9-14)
  • राजा नबूकदनेस्सर ने अपने दरबार में ज्योतिषी, तन्त्री, टोन्हे, आदि रखे हुए थे; किन्तु अब वे परमेश्वर द्वारा दिखाए गए स्वप्न को नहीं बूझ सके (दानिय्येल 2:2-7; 4:4-7) 
  • शमौन टोन्हा करने वाला लोगों को अपनी विद्या और कार्यों से चकित करता था, और लोग इतने प्रभावित थे कि उसमें ईश्वरीय शक्ति होने की बात करते थे (प्रेरितों 8:9-11) 
  • पौलुस ने एक दासी में से भावी कहने वाली आत्मा को निकाला, जो भावी कहा करती थी (प्रेरितों 16:16-18) 
  • मसीही विश्वास में आने से पहले जादू करने वालों ने मसीही विश्वास में आने के बाद अपनी पुस्तकें लाकर जलाईं (प्रेरितों 19:18-19); अर्थात उनकी विद्या मानी, सीखी, और सिखाई जाती थी। अन्यथा उस समय में जब सभी पुस्तकें हाथ से लिखी जाती थीं, तो ऐसी बातों के लिए जो मिथ्या और प्रमाण-रहित थीं, पुस्तकें क्यों लिखी जातीं? उन पुस्तकों की बातों में चाहे सब कुछ न सही, किन्तु कुछ तो यथार्थ होगा, जिसके द्वारा जन-साधारण को प्रभावित एवं वशीभूत किया जाता था।
  • परमेश्वर पवित्र आत्मा ने पौलुस द्वारा थिस्सलुनीकियों को लिखवाई पत्री में मसीही विश्वासियों को सचेत किया कि वे चिह्न-चमत्कारों के पीछे न जाएं, क्योंकि अंत के दिनों में शैतान ऐसे कार्यों के द्वारा लोगों को भटका देगा और विनाश में ले जाएगा, क्योंकि उन्होंने परमेश्वर के वचन पर विश्वास करने के स्थान पर अलौकिक बातों पर विश्वास किया और झूठ में फंस गए (2 थिस्सलुनीकियों 2:9-12);
  • प्रभु यीशु ने, और पुराने नियम के नबियों तथा नए नियम के प्रेरितों ने तो मुर्दों में प्राण डाले थे; किन्तु अंत के समय में तो यहाँ तक होगा कि शैतान मूरत में भी प्राण डालेगा और उससे बुलवाएगा (प्रकाशितवाक्य 13:14-15)

 

परमेश्वर का वचन इस बात के लिए बहुत स्पष्ट है परमेश्वर की दृष्टि में प्राथमिकता और महत्व परमेश्वर के वचन और उसकी आज्ञाकारिता का है। प्रभु यीशु ने अपने पहाड़ी उपदेश में, एक बहुत महत्वपूर्ण शिक्षा दी है, “जो मुझ से, हे प्रभु, हे प्रभु कहता है, उन में से हर एक स्वर्ग के राज्य में प्रवेश न करेगा, परन्तु वही जो मेरे स्वर्गीय पिता की इच्छा पर चलता है। उस दिन बहुतेरे मुझ से कहेंगे; हे प्रभु, हे प्रभु, क्या हम ने तेरे नाम से भविष्यवाणी नहीं की, और तेरे नाम से दुष्टात्माओं को नहीं निकाला, और तेरे नाम से बहुत अचम्भे के काम नहीं किए? तब मैं उन से खुलकर कह दूंगा कि मैं ने तुम को कभी नहीं जाना, हे कुकर्म करने वालों, मेरे पास से चले जाओ” (मत्ती 7:21-23)। यहाँ प्रभु द्वारा कही गई बातों पर ध्यान दीजिए:

  • जिनके लिए प्रभु ने यह बात कही है, वे प्रभु को संबोधित कर रहे थे, किसी अन्य देवी-देवता या अलौकिक शक्ति को नहीं;
  • वे संख्या मेंबहुतेरेहोंगे, थोड़े से नहीं
  • उन्होंने जो कुछ भी किया, वह प्रभु यीशु के नाम से किया, अपने नाम से या किसी अन्य देवी-देवता के नाम से नहीं;
  • उन्होंने जो कुछ किया, वह वही सब था जो आज पवित्र आत्मा के नाम से गलत शिक्षाएं सिखाने और फैलाने वाले करने पर ज़ोर देते हैं - भविष्यवाणियाँ करना, दुष्टात्माओं को निकालना, अचंभे के कार्य करना;
  • उन्होंने यह सब थोड़ा सा या कभी-कभार नहीं वरन बहुतायत से किया;
  • उन्होंने यह नहीं कहा किहमने करने के प्रयास किए”, याहमने यह सब करने की लालसा रखी”; वरन यह कि हमने किया! अर्थात ये सभी कार्य उनके द्वारा हुए, उनके ये कार्य लोगों के सामने प्रत्यक्ष थे। 
  • प्रभु यीशु ने उन से यह नहीं कहा कितुमने यह सब करने का प्रयास तो किया किन्तु तुम से हो नहीं सका”; वरन उनके इन दावों को झूठ या गलत न बताने के द्वारा प्रभु ने अप्रत्यक्ष रीति से उनके द्वारा यह सब किए जाने की पुष्टि भी की;
  • किन्तु फिर भी प्रभु ने उन्हें कहामैंने तुम्हें कभी नहीं जानाऔर उन्हें पूर्णतः अस्वीकार कर दिया;
  • प्रभु ने उनके कार्यों को झुठलाया नहीं, वरन उन कार्यों कोकुकर्मकहा।

प्रभु द्वारा उनके लिए कही गई इस अनपेक्षित और कठोर बात का आधार पद 21 के अंत में प्रभु यीशु द्वारा कहा गया वाक्य हैवही जो मेरे स्वर्गीय पिता की इच्छा पर चलता है”; अर्थात इन लोगों में परमेश्वर तथा उसके वचन की आज्ञाकारिता का स्थान नहीं था। चाहे वे संख्या में बहुत थे, और वे प्रभु के नाम से और बहुतायत से ये सभी भविष्यवाणियाँ, चिह्न और चमत्कार करते थे किन्तु वे परमेश्वर की इच्छा पर नहीं चलते थे, उनकी अपनी ही धारणाएं, अपने ही विश्वास, अपनी ही बातें और शिक्षाएं थीं, जिन्हें वे मानते, मनाते, और मनवाते थे - और अपनी यह मन-गढ़न्त बातें, अपनी मन-मर्ज़ी वे प्रभु परमेश्वर के नाम से बताते, चलाते, सिखाते और दिखाते थे। किन्तु उनके द्वारा अपनी बातों को प्रभु के नाम से बताने, सिखाने, और दिखाने के द्वारा, उनकी बातें प्रभु परमेश्वर की बातें नहीं बन गईं। वे मनुष्यों की बातें और शिक्षाएं थीं, और मनुष्यों ही की रहीं; प्रभु परमेश्वर ने उन्हें कोई महत्व अथवा स्वीकृति नहीं दी, बल्कि न केवल उन्हें पूर्णतः तिरस्कार कर दिया, वरन ऐसा करने वालों को अपने पास से निकाल बाहर भी कर दिया। 

हमारी आत्मिकता का प्रमाण हमारे द्वारा प्रभु परमेश्वर और उसके वचन को दी जाने वाली प्राथमिकता और आज्ञाकारिता है; हम में विद्यमान पवित्र आत्मा के फलों की हमारे जीवन और व्यवहार उपस्थिति है। जो प्रभु के वचन को आदर और महत्व देता है, प्रभु और परमेश्वर पिता उसे आदर और महत्व देते हैं, उसमें और उसके साथ आकर रहते हैं, और परमेश्वर के वचन के प्रति उस व्यक्ति का प्रेम ही परमेश्वर के प्रति उसके प्रेम का सूचक एवं प्रमाण है (यूहन्ना 14:21, 23)। इसके अतिरिक्त और कोई प्रमाण परमेश्वर ने बाइबल में नहीं दिया है। 

यदि आप मसीही विश्वासी हैं, तो अपने जीवन को जाँच-परख कर देख लीजिए कि परमेश्वर के वचन और आज्ञाकारिता के प्रति आपकी स्थिति, आपके जीवन में उनके लिए प्राथमिकता की दशा क्या है? क्या आप परमेश्वर के प्रति अपने समर्पण, और उसकी आज्ञाकारिता में जीवन जीने के द्वारा अपनी आत्मिकता को प्रदर्शित एवं प्रमाणित करते हैं; या फिर उन झूठी शिक्षाएं देने वालों और चिह्न-चमत्कारों की बातों पर ज़ोर देने वालों की बातों में फंसे हुए हैं? सही और गलत की पहचान करना कठिन नहीं है, बहुत सीधा और स्पष्ट है - जो बातें, कार्य, और व्यवहार लोग पवित्र आत्मा के नाम से करते हैं, क्या प्रभु यीशु मसीह और उनके शिष्यों की बातों, कार्यों, और व्यवहार में वे देखने को मिलती हैं? यदि नहीं, तो फिर क्यों केवल उनके कहने भर से, उनके द्वारा किए जाने वाले विचित्र व्यवहार, उछल-कूद, शोर-शराबे, और बाइबल से बाहर की बातों को पवित्र आत्मा की ओर से करवाया गया माना जाए? क्यों उनकी अपने मन से कही गई बातों को प्राथमिकता दी जाए, और परमेश्वर के अटल और सदा सच्चे वचन की बातों को अनदेखा किया जाए? वास्तविकता को पहचानिए और विनाश से बचने के लिए हर एक गलत शिक्षा से तथा गलत शिक्षा देने वाले की संगति से बाहर निकलकर परमेश्वर तथा उसके वचन के प्रति समर्पित और आज्ञाकारिता का जीवन व्यतीत कीजिए। 

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • दानिय्येल 5-7    
  • 2 यूहन्ना 1

सोमवार, 6 दिसंबर 2021

मसीही सेवकाई और पवित्र आत्मा के वरदान – 4

 

आज्ञाकारिता - परमेश्वर की, या मनुष्यों की?

 पिछले लेख में हम देख चुके हैं कि परमेश्वर की दृष्टि में, उसके प्रति मनुष्य की आज्ञाकारिता ही सबसे महत्वपूर्ण और अनिवार्य बात है। कोई मनुष्य अपनी स्वेच्छा से, या अपने बनाए विधि-विधानों, रीति-रिवाज़ों, और तौर-तरीकों से परमेश्वर को प्रसन्न नहीं कर सकता है। यदि मनुष्य परमेश्वर को प्रसन्न करना चाहता है, तो उसे वही और वैसा ही करना होगा, जैसा परमेश्वर ने करने को कहा है। उसके अतिरिक्त अन्य कुछ भी, वह चाहे कितना भी उत्तम, भक्तिपूर्ण, और मानवीय बुद्धि एवं समझ के अनुसार भला और प्रशंसनीय क्यों न हो, परमेश्वर को प्रसन्न नहीं कर सकता है; और इस उद्देश्य के लिए व्यर्थ है। मसीही जीवन और मसीही सेवकाई में भी, तथा मसीही सेवकाई में पवित्र आत्मा द्वारा दिए गए वरदानों के उचित उपयोग में भी यह बात इतनी ही महत्वपूर्ण है। इसलिए मसीही विश्वासियों और सेवकाई में लगे लोगों को यह जानना और समझना बहुत आवश्यक, अनिवार्य है कि वे मसीह के नाम में, अपनी इच्छा के अनुसार कुछ करके, परमेश्वर को प्रसन्न नहीं कर सकते हैं, चाहे उनके वे कार्य मनुष्यों की दृष्टि में कितने भी प्रशंसनीय, लोगों के लिए लाभकारी, और भक्तिपूर्ण क्यों न दिखाई दें। 

प्रभु यीशु मसीह ने स्वयं अपने जीवन से इस आज्ञाकारिता के महत्व को दिखाया, और शिष्यों को सिखाया भी। प्रभु यीशु का समस्त मानवजाति के लिए पापों की क्षमा और उद्धार का मार्ग बनाकर देने के लिए पृथ्वी पर आगमन ही परमेश्वर की इच्छा में, परमेश्वर के वचन में पहले से प्रभु के विषय लिखी गई बातों की पूर्ति के लिए था (इब्रानियों 10:5-7; 1 कुरिन्थियों 15:1-4; लूका 24:44; यूहन्ना 5:39)। अपने पृथ्वी के जीवन के दौरान, प्रभु ने यह स्पष्ट किया कि वह अपनी इच्छा नहीं, वरन परमेश्वर पिता की इच्छा के अनुसार कार्य करता है, जैसा पिता परमेश्वर बताता है, वही कहता है और वैसे ही कार्य करता ही (यूहन्ना 4:34; 5:19, 30; 6:38; 8:28)। इसीलिए प्रभु यीशु को उदाहरण बनाकर मसीही सेवकों के लिए लिखा गया है, “जैसा मसीह यीशु का स्वभाव था वैसा ही तुम्हारा भी स्वभाव हो। जिसने परमेश्वर के स्वरूप में हो कर भी परमेश्वर के तुल्य होने को अपने वश में रखने की वस्तु न समझा। वरन अपने आप को ऐसा शून्य कर दिया, और दास का स्वरूप धारण किया, और मनुष्य की समानता में हो गया। और मनुष्य के रूप में प्रगट हो कर अपने आप को दीन किया, और यहां तक आज्ञाकारी रहा, कि मृत्यु, हां, क्रूस की मृत्यु भी सह ली। इस कारण परमेश्वर ने उसको अति महान भी किया, और उसको वह नाम दिया जो सब नामों में श्रेष्ठ है” (फिलिप्पियों 2:5-9) 

प्रभु यीशु के पृथ्वी के समय पर जो लोग परमेश्वर के वचन के ज्ञाता, धर्म के अगुवे, और परमेश्वर के मंदिर के अधिकारी माने जाते थे, उन्होंने परमेश्वर के वचन में, अपनी समझ और इच्छा के अनुसार अपनी ही व्याख्या और अर्थ डाल देने के द्वारा, बहुत सेसंशोधनकर लिए थे, जिससे उनके लिए परमेश्वर के वचन का निर्वाह करना अधिक सुविधाजनक एवं लाभकारी हो जाए। वे लोग जन-सामान्य को अपनी यही व्याख्या और अर्थ सिखाया और समझाया करते थे; और लोगों को यही कहते थे कि जो वो कह रहे हैं, उन्हें वही मानना है और वैसा ही करना है। और आज भी मसीही या ईसाई धर्म के निर्वाह में यही स्थिति देखी जाती है। मत-समुदाय-डिनॉमिनेशंस के अगुवे और अधिकारी जो और जैसा बोल देते हैं, उस मण्डली के लोग वह और वैसा करते हैं। आज भी जन-साधारण के लोगों के लिए परमेश्वर के वचन को जानना और मानना उतना महत्व नहीं रखता है जितना अपने मत-समुदाय-डिनॉमिनेशंस के अगुवे और अधिकारियों की कही बातों और शिक्षाओं को जानना और मानना रखता है। ये लोग यह भूल जाते हैं कि अन्ततः उन्हें अपने न्याय के लिए, अपने जीवन का हिसाब देने के लिए प्रभु यीशु मसीह के सामने खड़े होना पड़ेगा, और उनके साथ ही उनके ये अगुवे और अधिकारी भी अपनी गलत शिक्षाओं एवं धारणाओं के लिए हिसाब देने के लिए प्रभु के सामने खड़े होंगे। क्योंकि हम सभी का न्याय तो परमेश्वर के वचन के अनुसार होगा (यूहन्ना 5:45-46;12:48), न कि किसी मत-समुदाय-डिनॉमिनेशंस के अगुवे और अधिकारियों की बातों और शिक्षाओं के अनुसार।

प्रभु यीशु ने अपने समय के इन धर्म-अधिकारियों की उनके इस व्यवहार के लिए भर्त्सना करते हुए उन्हें कपटी कहा और यशायाह नबी की कही बात स्मरण करवाई, “हे कपटियों, यशायाह ने तुम्हारे विषय में यह भविष्यवाणी ठीक की। कि ये लोग होंठों से तो मेरा आदर करते हैं, पर उन का मन मुझ से दूर रहता है। और ये व्यर्थ मेरी उपासना करते हैं, क्योंकि मनुष्यों की विधियों को धर्मोपदेश कर के सिखाते हैं” (मत्ती 15:7-9)। जब प्रभु के शिष्यों ने प्रभु से कहा कि उन धर्म-अधिकारियों को प्रभु की कही बात रास नहीं आई थी, तो प्रभु ने भी अपने शिष्यों को बता दिया, कि उन धर्म-अधिकारियों की कोई बात बचेगी नहीं, सभी मिटा दी जाएंगीतब चेलों ने आकर उस से कहा, क्या तू जानता है कि फरीसियों ने यह वचन सुनकर ठोकर खाई? उसने उत्तर दिया, हर पौधा जो मेरे स्वर्गीय पिता ने नहीं लगाया, उखाड़ा जाएगा” (मत्ती 15:12-13)। इसीलिए अपने पहाड़ी उपदेश (मत्ती 5-7 अध्याय) में प्रभु ने अपने अनुयायियों से बारंबार उस समय की प्रचलित गलत शिक्षाओं के विषय कहा, “तुम सुन चुके हो”, और फिर उन शिक्षाओं का सही स्वरूप बताते हुए कहापरंतु मैं तुम से कहता हूँ” - प्रभु उन्हें सिखा रहा था कि मनुष्यों द्वारा बताई और सिखाई जाने वाली बातों पर नहीं वरन परमेश्वर के वचन की सही शिक्षाओं को सीखो और उनका पालन करो। और आज हमें परमेश्वर के वचन को सिखाने और समझाने के लिए प्रभु ने अपना पवित्र आत्मा हम में सर्वदा रहने के लिए प्रदान किया है (यूहन्ना 14:16, 26; 16:13, 14)। यदि हम उसके द्वारा किए गए इस प्रावधान का सदुपयोग नहीं करेंगे, और स्वेच्छा से गलत शिक्षाओं एवं मनुष्यों द्वारा गढ़ी गई बातों के निर्वाह में ही लगे रहेंगे, तो अन्ततः होने वाली हमारी हानि के लिए हमारे अतिरिक्त और कौन ज़िम्मेदार होगा?

यदि आप मसीही विश्वासी हैं, तो आपके लिए यह अनिवार्य है कि परमेश्वर के वचन को पढ़ने, अध्ययन करने और सीखने, तथा उसका पालन करने में समय बिताएं। तब ही आप अपनी मसीही सेवकाई का ठीक से निर्वाह करने पाएंगे, पवित्र आत्मा द्वारा आपको इस सेवकाई के लिए दिए गए वरदानों का सही उपयोग करने पाएंगे, और परमेश्वर को प्रसन्न करने वाले तथा उसके लिए उपयोगी ऐसे जन बनने पाएंगे, जिनके साथ प्रभु परमेश्वर रहता है (यूहन्ना 14:21, 23)गंभीरता से विचार कीजिए, यदि स्वयं प्रभु यीशु के लिए अपने समय के धर्म-अधिकारियों के बैर को आमंत्रित करते हुए भी, उनकी सभी गलत शिक्षाओं और मन-गढ़न्त धारणाओं और मनुष्यों की गढ़ी हुई बातों से हट कर, परमेश्वर की आज्ञाकारिता एवं उसके समर्पण का जीवन जीना अनिवार्य था, तो मैं और आप यह करने से कैसे बच सकते हैं? इसलिए, अपने आत्मिक वरदानों के उचित उपयोग के लिए मनुष्यों के नहीं, परमेश्वर के आज्ञाकारी बनिए। 

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

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