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शनिवार, 3 अगस्त 2024

Growth through God’s Word / परमेश्वर के वचन से बढ़ोतरी – 148

 

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आरम्भिक बातें – 110


परमेश्वर की क्षमा और न्याय – 16


क्षमा किए और भुलाए गए पापों का स्मरण – 8

 

इब्रानियों 6:1-2 में दी गई आरम्भिक बातों में से छठी बात, “अंतिम न्याय” के हमारे इस अध्ययन में, पिछले लेखों में हमने देखा है कि पाप का यह दूसरा प्रभाव, जब तक हम इस पापमय शरीर में हैं, हमारे लिए दुःख, परेशानी, परिश्रम को बनाए रखेगा; लेकिन इस में होकर भी परमेश्वर के हमारे लिए कुछ लाभकारी उद्देश्य हैं। ये लाभ केवल स्वर्गीय, या परलोक  के लिए नहीं हैं, वरन हमारे दिन-प्रतिदिन के इस पृथ्वी के जीवनों के लिए भी हैं। कुल मिलाकर, जीवन भर के इस दुःख, परेशानी, और परिश्रम के द्वारा परमेश्वर ने एक तरीका प्रदान किया है जो हमें निरन्तर पाप, अर्थात परमेश्वर की आज्ञाओं के उल्लंघन, के परिणामों को स्मरण दिलाता रहे; लेकिन इसके साथ ही परमेश्वर ने इन दुःखों में होकर हमें पृथ्वी के तथा स्वर्गीय लाभों को भी प्रदान किया है। यह पापी मनुष्य के प्रति परमेश्वर के प्रेम और देखभाल का एक अनुपम और विलक्षण उदाहरण है, उसकी इस लालसा का, कि उसके द्वारा तैयार करके दिए मार्ग – प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास करने के द्वारा, मनुष्य परमेश्वर के पास लौट आए, उस से मेल-मिलाप कर ले। पिछले लेख में, दुःखों द्वारा मिलने वाले सांसारिक लाभों के बारे में देखते हुए, हमने प्रभु द्वारा उन्हें, जो उसकी इच्छा पूरी करने के लिए, उसके द्वारा उन्हें सौंपी गई ज़िम्मेदारी का निर्वाह करने के लिए, दुःख उठाने को तैयार हैं, उन्हें मिलने वाले शारीरिक और भौतिक लाभों के बारे में देखा था। आज हम परमेश्वर की सन्तानों को इस पृथ्वी पर मिलने वाले आत्मिक लाभों के बारे में देखेंगे, जो दुःख उठाने के द्वारा उन्हें प्राप्त होते हैं; अर्थात ऐसे लाभ जो हमें हमारे मसीही जीवनों में बढ़ने और दृढ़ होने में सहायक होते हैं; और यह भी देखेंगे कि किस प्रकार से वे हमारे प्रभु में बने हुए होने के बारे में हमें आश्वस्त करते हैं।

हम देखते हैं की रोमियों 5:3-5 में लिखा है, “केवल यही नहीं, वरन हम क्लेशों में भी घमण्ड करें, यही जानकर कि क्लेश से धीरज। ओर धीरज से खरा निकलना, और खरे निकलने से आशा उत्पन्न होती है। और आशा से लज्जा नहीं होती, क्योंकि पवित्र आत्मा जो हमें दिया गया है उसके द्वारा परमेश्वर का प्रेम हमारे मन में डाला गया है।” यहाँ पर हम मसीही विश्वासियों द्वारा दुःख उठाने से, उनमें क्रमवार होने वाले चार प्रभावों को देखते हैं। ये प्रभाव हैं, धीरज, जिसके द्वारा हम में खरा निकलना होता है, जो फिर हम में आशा को उत्पन्न करता है, और आशा हमें कभी लज्जित नहीं होने देती, अर्थात हमें कभी निराश और हताश नहीं होने देती है। मसीही विश्वासियों के विरुद्ध शैतान का एक प्रबल हथियार है लज्जा, या हताशा और निराशा। यहाँ पर हम शैतान के इस हथियार को विफल करने का परमेश्वर द्वारा दिया गया उपाय देखते हैं; किन्तु इस उपाय का कार्यान्वित होना दुःख उठाने के साथ होता है। हम सभी अपने व्यक्तिगत अनुभवों से जानते हैं कि समस्याओं के उत्पन्न होने, या बढ़ जाने का एक प्रमुख कारण है हमारा धीरज नहीं रखना। हम बिना सोचे-विचारे शब्दों और कार्यों के लिए प्रतिक्रिया दे देते हैं, हम चाहते हैं कि हर बात तुरन्त या शीघ्रता से हो जाए, हम बहुत बार औरों को कई बातों के लिए थोड़ा सा भी समय देना नहीं चाहते हैं, इत्यादि; और ये सभी, अन्ततः, केवल या तो समस्याओं को उत्पन्न करते हैं, या उन्हें और बिगाड़ देते हैं।

इसलिए, हमें धीरज सिखाने के लिए, परमेश्वर हमें अकसर दुःखदायी परिस्थितियों में जा लेने देता है, जहाँ पर हमारे पास परमेश्वर के द्वारा दिए गए उपाय के अतिरिक्त अन्य कोई उपाय नहीं होता है, और हमें परमेश्वर के द्वारा हमें उस परिस्थिति से बाहर निकाले जाने के लिए धीरज धरना ही पड़ता है। समय के साथ, जब हम हर बात और हर परिस्थिति के लिए परमेश्वर पर निर्भर होना, उस पर भरोसा रख कर धीरज धरना सीखते हैं, तो यह हमारे चरित्र को निखारता है और हमें खराई से रहना सिखाता है, लोगों को दिखने लगता है कि हम सँसार के अन्य लोगों से भिन्न हैं। हमारा धीरज, हमारा खराई से रहना, परमेश्वर के साथ हमारे अनुभव, हमें परमेश्वर में हमेशा भरोसा रखते हुए जीवन जीते रहने में सहायता करते हैं। और जब हम परमेश्वर में भरोसा और आशा रखते हुए जीवन जीते हैं, तो शैतान के पास हमें लज्जित करने, या हमें हताश और निराश करने, और हमें परमेश्वर के मार्गों से बहका देने के लिए कारगर कोई भी युक्ति शेष नहीं रहने पाती है। यह एक उपाय है, जिसके द्वारा परमेश्वर हमें इस पृथ्वी पर हमारे आत्मिक जीवनों में उन्नति करने और दृढ़ बने रहने में सहायता करता है। याकूब ने भी इसी बात को दोहराया है “हे मेरे भाइयों, जब तुम नाना प्रकार की परीक्षाओं में पड़ो तो इसको पूरे आनन्द की बात समझो, यह जान कर, कि तुम्हारे विश्वास के परखे जाने से धीरज उत्पन्न होता है। पर धीरज को अपना पूरा काम करने दो, कि तुम पूरे और सिद्ध हो जाओ और तुम में किसी बात की घटी न रहे” (याकूब 1:2-4)।

एक और बात जो परीक्षाएँ और दुःख हमारे जीवनों में करते हैं, वह है इस बात का प्रमाण प्रदान करना कि हम सही मार्ग पर अग्रसर हैं, परमेश्वर के पथ पर हैं। परमेश्वर का वचन कहता है “फिर यदि मसीह के नाम के लिये तुम्हारी निन्दा की जाती है, तो धन्य हो; क्योंकि महिमा का आत्मा, जो परमेश्वर का आत्मा है, तुम पर छाया करता है” (1 पतरस 4:14)। दूसरे शब्दों में हमें अपने विश्वास के लिए जिस निन्दा का सामना करना पड़ता है, जो दुःख उठाने पड़ते हैं, वे इस बात का प्रमाण हैं कि “महिमा का आत्मा” हम पर छाया करता है। इसे यशायाह 59:2 के साथ देखिए, जहाँ पर लिखा है “परन्तु तुम्हारे अधर्म के कामों ने तुम को तुम्हारे परमेश्वर से अलग कर दिया है, और तुम्हारे पापों के कारण उस का मुँह तुम से ऐसा छिपा है कि वह नहीं सुनता;” अर्थात, यदि हम में कोई अधर्म या बुराई होगी, तो उस के कारण हम में और परमेश्वर में दूरी आ जाएगी, वह हमारी नहीं सुनेगा, और हम परमेश्वर के लिए उपयोगी नहीं रहेंगे। जब हम परमेश्वर से दूर होंगे, परमेश्वर हमारी नहीं सुन रहा होगा, हम परमेश्वर के लिए अनुपयोगी होंगे, तब शैतान अपनी चालों और शक्तियों को हम पर क्यों लगाएगा? इसलिए हम पर उसके हमले कम और हल्के हो जाएँगे, और हम, तुलना में, एक कम कष्टों और समस्याओं वाला जीवन व्यतीत करने लगेंगे। दूसरे शब्दों में प्रभु के लिए एक सक्रिय विश्वासी के जीवन में शैतानी हमलों का घट जाना इस बात का संकेत है कि वह किसी शैतानी युक्ति में फँस गया है, और अब सही मार्ग पर, परमेश्वर के पथ पर नहीं चल रहा है। लेकिन जब तक हम परमेश्वर की आज्ञाकारिता में परमेश्वर के पीछे-पीछे चलते रहेंगे, तो यह शैतान के लिए समस्याएँ उत्पन्न करता रहेगा, इसलिए, फिर वह भी हमें परेशान करता रहेगा। अर्थात, मसीही विश्वासी के जीवन में दुःखों या समस्याओं का बना रहना, इस बात का संकेत है कि वह सही मार्ग पर, परमेश्वर के पथ पर चल रहा है, और प्रभु के लिए उपयोगी बना हुआ है।

इस प्रकार से, जब तक हम इस पृथ्वी पर हैं, दुःख, परेशानियाँ, परिश्रम हमारे लिए शारीरिक और भौतिक लाभ लाएंगे, हमें आत्मिक या मसीही जीवन में बढ़ने और दृढ़ होने में सहायता करेंगे, और हमें आश्वस्त रखेंगे कि हम अपने जीवनों के लिए परमेश्वर के मार्गों पर बने हुए हैं। अगले लेख में हम दुःखों से होने वाले स्वर्गीय या परलोक के लाभों के बारे में देखेंगे।

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु, मैं अपने पापों के लिए पश्चातापी हूँ, उनके लिए आप से क्षमा माँगता हूँ। मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मुझे और मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

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English Translation


The Elementary Principles – 110


God’s Forgiveness and Justice – 16


Remembrance of Sin Forgiven and Forgotten - 8

   

In this study on “Eternal Judgement,” the sixth elementary principle given in Hebrews 6:1-2, in the previous articles we have seen that the second effect of sin, i.e., life long suffering and toil while we are in this physical body with a sin nature, has some God given and beneficial purposes in our lives. These benefits are not just heavenly, i.e., only for the next world, but are also for this world as we live our day-to-day lives. In effect, through this life-long suffering, problems, and toil, God has put in place a mechanism for us to live with a constant reminder of the consequences of sin, i.e., of transgressing God’s law; but at the same time God has also put in place earthly as well as heavenly benefits through the sufferings. This is a unique, remarkable evidence of the love and care of God for sinful man, and His desire that man be reconciled with Him, by coming to Him through the way He has prepared – through faith in the Lord Jesus Christ. In the last article, while looking at the earthly benefits through suffering, we had seen about the physical or material blessings promised by the Lord for those who are willing to suffer in His will and for His work assigned to them by Him. Today we will look at some spiritual blessings for God’s children, that come through sufferings; i.e., blessings that help us to build up and grow in our Christian lives, and will see how they also assure us of our standing with the Lord.

We find written in Romans 5:3-5 “And not only that, but we also glory in tribulations, knowing that tribulation produces perseverance; and perseverance, character; and character, hope. Now hope does not disappoint, because the love of God has been poured out in our hearts by the Holy Spirit who was given to us.” Here we have four sequential effects, one thing leading to another, because of tribulations faced by the Christian Believers. These effects are perseverance or patience, which develops our character, which in turn gives us hope, and the net effect is that we do not live a disappointed life. One of Satan’s potent weapons against God’s people is to discourage and disappoint them about many things. Here we have God’s antidote to this satanic device of disappointments; but it starts with tribulations. We well know from our experiences, that one major cause of problems getting created or aggravated is our lack of patience. We react to words and actions without thinking over it, we want things done in a hurry, we are often very reluctant to give others a little time about many things, etc. and all of these eventually only lead to problems or aggravate them.

Therefore, to teach us patience, God often allows us to get into painful situations, where we have no other way out, than the one God provides, and we can do nothing other than patiently wait for Him to deliver us from the situation. With time, as we learn to trust and wait on the Lord in and for every situation, it develops our character, makes it evident to the people around us that we are different from the people of the world. Our patience and character, our experiences with God, help us to live lives ever hopeful in God; and when we are trusting and hopeful in God, Satan cannot beguile us away through disappointments and discouragement. This is one way through which God helps us to develop and grow in our spiritual lives on earth. James also says the same “My brethren, count it all joy when you fall into various trials, knowing that the testing of your faith produces patience. But let patience have its perfect work, that you may be perfect and complete, lacking nothing” (James 1:2-4).

Another thing the presence of trials and afflictions do in our lives is provide proof that we are on the right path, the way of God. God’s Word says “If you are reproached for the name of Christ, blessed are you, for the Spirit of glory and of God rests upon you. On their part He is blasphemed, but on your part He is glorified” (1 Peter 4:14). In other words, the reproaches that we suffer for our faith in the Lord, these sufferings are a proof that the “the Spirit of glory and of God” rests upon us. Consider this in relation to Isaiah 59:2 “But your iniquities have separated between you and your God, and your sins have hid [his] face from you, that he will not hear” i.e., if there is any iniquity in our lives, it creates a distance between us and God, and He does not hear us; making us ineffective for God. When we are away from God, God is not hearing us, we are no longer effective for God, why would Satan concentrate his energies and efforts on us, so his attacks against us will decrease and we will start living a relatively “trouble free” life. In other words, for an active Christian Believer, the lack or diminution of satanic attacks is an indication that he has fallen for some satanic ploy, and is no longer on the right way, on God’s path. But so long as we are obeying and following God, it will keep bothering Satan, and he will keep troubling us to make us fall away from God. The implication is that the constant presence of problems in a Christian Believers life, is an indicator, that he is on the right path – God’s way, and is effective for God.

So, while we are here on earth, sufferings, problems, trials, and toil bring physical and temporal benefits, help us grow and mature in our spiritual lives, and keep us assured that we are on God’s path for our lives. In the next article, we will consider the heavenly or the next world benefits of sufferings.

If you have not yet accepted the discipleship of the Lord, make your decision in favor of the Lord Jesus now to ensure your eternal life and heavenly blessings. Where there is obedience to the Lord, where there is respect and obedience to His Word, there is also the blessing and protection of the Lord. Repenting of your sins, and asking the Lord Jesus for forgiveness of your sins, voluntarily and sincerely, surrendering yourself to Him - is the only way to salvation and heavenly life. You only have to say a short but sincere prayer to the Lord Jesus Christ willingly and with a penitent heart, and at the same time completely commit and submit your life to Him. You can also make this prayer and submission in words something like, “Lord Jesus, I am sorry for my sins and repent of them. I thank you for taking my sins upon yourself, paying for them through your life.  Because of them you died on the cross in my place, were buried, and you rose again from the grave on the third day for my salvation, and today you are the living Lord God and have freely provided to me the forgiveness, and redemption from my sins, through faith in you. Please forgive my sins, take me under your care, and make me your disciple. I submit my life into your hands." Your one prayer from a sincere and committed heart will make your present and future life, in this world and in the hereafter, heavenly and blessed for eternity.

 

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गुरुवार, 18 अप्रैल 2024

Growth through God’s Word / परमेश्वर के वचन से बढ़ोतरी – 44

 


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आरम्भिक बातें – 4

धीरज और निबाहना

 

    आरंभिक बातों से सम्बन्धित पिछले लेखों में, परिचय के रूप में हमने इब्रानियों 5:11-14 से देखा था कि मसीही विश्वासी के लिए परमेश्वर के वचन को सीखते रहना, तथा साथ ही उसको औरों को सिखाते भी रहना, क्यों और कैसे आवश्यक है। यदि मसीही विश्वासी अपने मसीही जीवन और  सेवकाई के इस पक्ष को अनदेखा कर देता है तो वह अपनी आत्मिक परिपक्वता और बढ़ोतरी में पिछड़ने लग जाता है और, इतना पिछड़ सकता है कि आत्मिक शिशु अवस्था या छोटे बालक के समान हो जाए, और उसे आरंभिक बातों को फिर से सिखाने की आवश्यकता हो जाए। ऐसे में इन सिद्धान्तों को फिर से सिखाया जाना आवश्यक है क्योंकि ये आरम्भिक बातें प्रत्येक मसीही विश्वासी के लिए आधारभूत हैं। यदि विश्वासी इन से अवगत नहीं है, इन में स्थापित नहीं है तो वह और आगे की गूढ़ बातें, परमेश्वर के वचन की उन्नत और गम्भीर बातें समझ और सीख नहीं पाएगा, जैसा कि इस पत्री के लेखक ने इब्रानियों 5:11-12 में कहा है। यह लेखक की, अर्थात परमेश्वर पवित्र आत्मा की, जिसकी अगुवाई में ये पत्री लिखी गई है, अपेक्षा थी कि जिन विश्वासियों को यह पत्री लिखे गई थी, वे इतने परिपक्व हो गए होंगे कि न केवल औरों को सिखाने पाएँ, वरन, परमेश्वर के वचन के गूढ़ शिक्षाओं को भी ग्रहण कर लें। किन्तु क्योंकि वे इस अपेक्षा पर खरे नहीं उतरे इसलिए इस पत्री का लेखक उन्हें उन आरंभिक बातों को, इब्रानियों 6:1-2 में उन बातों का नाम लेकर, उनका स्मरण करवाता है।

    इब्रानियों 6:1-2 से हम देखते हैं कि लेखक इन आरम्भिक बातों की चर्चा में नहीं जाता है, उन्हें केवल इन छः मौलिक बातों का स्मरण करवा देता है; और फिर सिद्धता के ओर आगे बढ़ने की बात कहता है। यहाँ पर उल्लेखित ये छः मौलिक आरंभिक बातें हैं, मरे हुए कामों से मन फिराना, परमेश्वर पर विश्वास करना, बपतिस्मों, हाथ रखना, मरे हुओं के जी उठना, और अन्तिम न्याय। प्रकट तात्पर्य है कि उन मसीही विश्वासियों से अपेक्षा की गई थी कि इन मौलिक बातों या सिद्धान्तों के बारे में अपनी जानकारी और शिक्षाओं को वे दोहराएंगे, और ध्यान में ले आएँगे; जिसके लिए उनमें निवास करने वाला पवित्र आत्मा उनकी सहायता करेगा। यहाँ पर आज के मसीही विश्वासियों के लिए एक महत्वपूर्ण शिक्षा है, कि उन्हें गूढ़ बातों को सीखने के साथ ही, मसीही विश्वास की इन आधारभूत बातों से सम्बन्धित शिक्षाओं को दोहराते रहना और ताज़ा बनाए रखना चाहिए। इन आधारभूत बातों को ध्यान में ताज़ा बनाए रखना बहुत आवश्यक है क्योंकि उनकी सेवकाई में उनके समय का एक मुख्य भाग नए विश्वासियों या बाल्यावस्था से निकल कर आगे बढ़ने वाले विश्वासियों के साथ संपर्क और वार्तालाप में व्यतीत होगा। इसलिए उन्हें इन आधारभूत बातों की आवश्यकता, गूढ़ बातों से कहीं अधिक पड़ेगी। साथ ही जैसा हमने इब्रानियों 5:13-14 से देखा है, “ठोस आहार” या “अन्न” सयानों के लिए होता है; इसलिए गूढ़ बातें सीखने के बाद भी, उन्हें शिशुओं और बच्चों के मध्य में उपयोग नहीं किया जा सकेगा। नि:सन्देह, गूढ़ बातों को सीखना और जानना आवश्यक है, परन्तु आधारभूत बातों की अनदेखी करने या उन्हें भूल जाने की कीमत पर नहीं।

    साथ ही यह बात यह भी दिखाती है कि हमारा प्रभु परमेश्वर कितना धीरज रखने वाला और निबाहने वाला है। उसके लोगों, उसके बच्चों के उसकी अपेक्षाओं पर खरे न उतरने और अपनी जिम्मेदारियों को पूरा न करने के कारण खिसियाने और परेशान होने की बजाय, वह फिर से उन्हें नए सिरे से सिखाने में लग जाता है; उन्हें सिखाता और दिखाता है कि उन्हें कैसे पुनः आरम्भ करना है और कैसे खोए हुए समय को पुनः प्राप्त करना है। प्रभु के अनुग्रहकारी रवैये का यही एकमात्र उदाहरण नहीं है। प्रभु द्वारा पतरस की असफलताओं के साथ व्यवहार करने के बारे में ध्यान कीजिए; पतरस ने न केवल प्रभु का तीन बार इनकार किया, लेकिन पुनरुत्थान के बाद प्रभु को देखने के बाद भी वह अपने मछली पकड़ने के काम पर लौट गया, और उसके साथ छः और शिष्य भी चले गए; लेकिन प्रभु ने फिर भी उसके साथ इतने प्रेम और धीरज के साथ व्यवहार किया, और उसे उसकी सेवकाई में बहाल कर दिया (यूहन्ना 21)। और पिन्तेकुस्त के दिन, पतरस ने ही भक्त यहूदियों के सामने प्रचार किया जिससे लगभग तीन हजार ने प्रभु को ग्रहण किया। वह पतरस ही था जो धार्मिक अगुवों के सामने दृढ़ता से खड़ा हुआ जब उन्होंने उन्हें सुसमाचार प्रचार से रोकना चाहा (प्रेरितों 4:8-20; 5:29-32); और यह पतरस की सेवकाई के द्वारा ही था कि सुसमाचार को अन्य जातियों में भेजा गया, कुरनेलियुस के घराने को किए गए प्रचार के द्वारा (प्रेरितों 10,11)। इन बातों के अतिरिक्त और भी कई बातें हैं जो दिखाती है कि पतरस कितनी सामर्थी रीति से पहले कलीसिया में उपयोग किया गया; केवल इसलिए, क्योंकि प्रभु उसके साथ धीरजवन्त रहा और उसे मौका देने के लिए तैयार रहा। इसी प्रकार एक निष्फल जन के प्रति धीरज रखने, उसके साथ निबाहने, और उसे अवसर देने का एक और उदाहरण यूहन्ना मरकुस का जीवन है, जिसे पौलुस और बरनबास के साथ सेवकाई का अवसर मिला, किन्तु वह बीच में ही छोड़कर वापस लौट गया। इस कारण पौलुस उसे फिर से अवसर देने और साथ ले जाने के लिए तैयार नहीं था, और इस बात को लेकर हुए विवाद से पौलुस और बरनबास अलग-अलग हो गए; पौलुस सिलास को लेकर चला गया, जबकि बरनबास यूहन्ना मरकुस को अपने साथ लेकर कुप्रुस को चला गया (प्रेरितों 12:25; 1536-39)। बाद में हम देखते हैं कि फिलेमोन 1:24 में यूहन्ना मरकुस का नाम पौलुस के सहकर्मियों में आया है, और उसकी सेवकाई एवं जीवन के अन्त के समय में पौलुस उसे सेवकाई के लिए उपयोगी कहता है (2 तीमुथियुस 4:11); और पतरस उसे अपने पुत्र के समान कहता है (1 पतरस 5:13); और उसी के द्वारा मरकुस रचित सुसमाचार भी लिखा गया। यदि बरनबास ने उसके साथ धीरज रख कर उससे निबाहा नहीं होता, तो संभवतः वह कलीसिया में फिर से इतना उपयोगी नहीं बन पाता। प्रभु का जाना-पहचाना, निष्फल अंजीर के वृक्ष का दृष्टान्त (लूका 13:6-9) भी प्रभु के इसी गुण को चित्रित करता है।

    यह मसीही विश्वासियों के लिए एक शिक्षा है कि लोगों से, उनके साथ जो उनकी अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतारते हैं, व्यवहार करने में अधीर और गर्म-दिमाग़ के न हों; बल्कि प्रभु के समान, लोगों को अवसर दें, उन्हें बढ़ाने का प्रयास करें, उनके जीवन की कमजोरी के हिस्सों में उनकी सहायता कर के उन्हें दृढ़ बनाने का प्रयास करें, उनका सही पोषण करें। आने वाले समयों में, ये आज लड़खड़ाने और कमज़ोर दिखने वाले लोग, परमेश्वर की सामर्थ्य और मार्गदर्शन से प्रभु के लिए सामर्थी रीति से उपयोग होने वाले बन सकते हैं।

    अब अगले लेख से, हम इन आरम्भिक बातों को एक-एक करके देखना आरम्भ करेंगे। अगले लेख में हम पहली बात, मरे हुए कामों से मन फिराने के बारे में देखेंगे।

    यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु, मैं अपने पापों के लिए पश्चातापी हूँ, उनके लिए आप से क्षमा माँगता हूँ। मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मुझे और मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

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English Translation


The Elementary Principles – 4

Patience and Perseverance


    In the previous articles on the elementary principles, as an introduction, we have seen from Hebrews 5:11-14 how and why it is necessary for every Christian Believer to keep learning the Word of God, and simultaneously to keep teaching it to others as well. If a Believer neglects this aspect of his Christian living and ministry, then he starts going downhill in his spiritual maturity and growth, and eventually may come down to the level of being a spiritual infant or babe, and he needs to be taught the elementary principles all over again. The re-teaching of these principles is necessary, since these elementary principles are foundational for every Believer. Unless the Believer is well versed and established in them, he will not be able to comprehend the higher things, the more serious and advanced teachings of God’s Word, as the author of this letter has said in Hebrews 5:11-12. It was the expectation of the author, thereby, of God the Holy Spirit, under whose inspiration this letter was written, that the Believers to whom this letter was addressed should have matured to not only be teaching others, but also to receive the more profound teachings of God’s Word. But since they had not lived up to the expectations, therefore through the Holy Spirit, the author of this letter reminds them of these elementary principles by naming them in Hebrews 6:1-2.

    From Hebrews 6:1-2 we see that the author is not going into the discussions about these elementary principles, but only reminding them what these six foundational principles are; and then asking them to move ahead, to go on to perfection. The principles stated here are, repentance from dead works, faith towards God, doctrine of baptisms, of laying of hands, of resurrection of the dead, and of eternal judgment. The evident implication is that these Christian Believers were expected to revise and brush up their learning about these principles; and God the Holy Spirit residing in them would be helping them to do so. There is an important teaching here for the Christian Believers today, to keep revising and brushing up on their learning of the fundamental principles of faith, besides aspiring to learn the higher things. Keeping in touch with the foundational principles is very important, since in their ministry, a significant portion of their time will be spent communicating and interacting with either new Believers, or those still growing out of their spiritual childhood. Hence, they will need to use these foundational principles much more than the higher things. Moreover, as we have seen from Hebrews 5:14 in the previous article, the “solid food” belongs to those who are mature; so even after learning the higher things, they will not be able to use them amongst the spiritual infants and small children. For sure, the higher things have to be learnt, but not at the cost of neglecting or forgetting the foundational teachings.

    This also shows how patient and longsuffering our Lord God is. Instead of getting perturbed and agitated about His people, His children not living up to the expectations, not fulfilling their responsibilities, He once again gets down to giving them a fresh start; showing them where and how to start and to catch up on lost time. This is not the only instance of this gracious attitude of the Lord. Recall the Lord’s handling of Peter’s failures; Peter had not only denied the Lord thrice, but even after being forgiven by the Lord and restored back, even after seeing the resurrected Lord, he once again went back to his fishing, and six other disciples also decided to go with him; but the Lord once again dealt so patiently and lovingly with him, and restored him back to his ministry (John 21). And, on the day of Pentecost, it was Peter who preached to the devout Jews and three thousand accepted the Lord. Again, it was Peter who stood up to the religious leaders when they tried to prevent them from preaching the gospel (Acts 4:8-20; 5:29-32); and it was through Peter that the gospel was sent to the Gentiles, the household of Cornelious (Acts 10, 11). Besides these, there were many other ways in which Peter was mightily used in the first Church, all because, the Lord was patient and longsuffering with him, and was willing to give him another chance. Another instance of this patience, forbearance, and willingness to give another chance to the unfruitful, is the life of John Mark, who was given ministry opportunity with Paul and Barnabas, but left in-between, and returned, so Paul was no longer willing to give take him along; because of this Paul and Barnabas broke up, and Paul went with Silas, while Barnabas took John Mark with him to Cyprus (Acts 12:25; 15:36-39). Later we find that John Mark is mentioned as a laborer with Paul, along with others (Philemon 1:24), and towards the end of his time, Paul refers to him as someone useful for him in his ministry in 2 Timothy 4:11; and Peter refers to him as his son in 1 Peter 5:13; and we have the Gospel of Mark written for us through him. Had Barnabas not persevered with him, he might not have been restored back and used so effectively in the first Church. The Lord’s well-known parable of the fruitless Fig tree (Luke 13:6-9) also illustrates this attribute of our Lord.

    This is a lesson for the Christian Believers to not be impatient and short-tempered in handling people who do not live up to their expectations, but like the Lord, give people time and try to build them up, nurture them, help them in the weak areas of their lives by pointing those areas out to them and work with them to strengthen those areas. In times to come these currently faltering people, through the strength and guidance of God can turn into those through whom God works mightily.

    We will now begin to consider these elementary principles one by one from the next article. From the next article we will begin considering the first elementary principle, i.e., repentance from dead works.

    If you have not yet accepted the discipleship of the Lord, make your decision in favor of the Lord Jesus now to ensure your eternal life and heavenly blessings. Where there is obedience to the Lord, where there is respect and obedience to His Word, there is also the blessing and protection of the Lord. Repenting of your sins, and asking the Lord Jesus for forgiveness of your sins, voluntarily and sincerely, surrendering yourself to Him - is the only way to salvation and heavenly life. You only have to say a short but sincere prayer to the Lord Jesus Christ willingly and with a penitent heart, and at the same time completely commit and submit your life to Him. You can also make this prayer and submission in words something like, “Lord Jesus, I am sorry for my sins and repent of them. I thank you for taking my sins upon yourself, paying for them through your life.  Because of them you died on the cross in my place, were buried, and you rose again from the grave on the third day for my salvation, and today you are the living Lord God and have freely provided to me the forgiveness, and redemption from my sins, through faith in you. Please forgive my sins, take me under your care, and make me your disciple. I submit my life into your hands." Your one prayer from a sincere and committed heart will make your present and future life, in this world and in the hereafter, heavenly and blessed for eternity.

 

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गुरुवार, 15 अक्टूबर 2020

भरोसा

 

         मैं छोटा लड़का था, और पानी से बहुत डरता था, परन्तु मेरे पिता चाहते थे कि मैं तैरना सीखूँ। वो जानबूझकर मुझे ताल के किनारे से हटाकर गहरे छोर की ओर ले जाते थे, जहाँ पानी मेरे सिर के भी ऊपर से होकर निकलता था, और उस स्थान पर केवल वे ही मेरा एकमात्र सहारा होते थे; और मैं उनसे कहता, “पापा, मुझे मत छोड़ना” और वो मुझे आश्वस्त करते, “नहीं, मैं नहीं छोडूंगा; मेरा वायदा है।” फिर वो मुझे तनाव मुक्त होकर तैरना सिखाते थे।

         वह केवल तैराकी की पाठ ही नहीं था; वह भरोसा रखने का भी पाठ था। मैं जानता था कि मेरे पिता मुझ से प्रेम करते हैं और वे कभी जानबूझकर मुझे किसी हानि में नहीं पड़ने देंगे, परन्तु साथ ही मुझे डर भी लगता था। आरंभ में तो मैं कसकर उनके गले से लिपट कर रहता था, परन्तु वो बड़े धीरज और कोमलता के साथ मुझे सिखाते और समझाते रहे, और अन्ततः मैंने तैरना आरंभ कर दिया, परन्तु पहले मुझे उन पर भरोसा करना सीखना था।

         आज भी जब भी मैं किसी ऐसी स्थिति में होता हूँ, जो मुझे मेरे सिर के भी ऊपर से निकलती हुई प्रतीत होती है, मैं उन समयों को स्मरण करता हूँ। उन्हें स्मरण करने से परमेश्वर के वचन बाइबल में मुझे परमेश्वर पिता के द्वारा अपने लोगों को दिया गया आश्वासन ध्यान आता है : “तुम्हारे बुढ़ापे में भी मैं वैसा ही बना रहूंगा और तुम्हारे बाल पकने के समय तक तुम्हें उठाए रहूंगा। मैं ने तुम्हें बनाया और तुम्हें लिये फिरता रहूंगा” (यशायाह 46:4)।

         हमें चाहे परमेश्वर की बाहें अपने नीचे सहारा देती हुई महसूस न हों, परन्तु प्रभु परमेश्वर का हमसे वायदा है कि वह हमें कभी नहीं छोड़ेगा (इब्रानियों 13:5)। हम जब उसकी देखभाल और प्रतिज्ञाओं में आश्वस्त होकर विश्राम करते हैं वह हमारी सहायता करता है कि हम उसकी विश्वासयोग्यता में भरोसा रखें। जब हम उसमें भरोसा बनाए रखते हैं, वह हमें हमारी चिंताओं से ऊपर उठा कर उसमें एक नई शान्ति पा लेना सिखाता है। - जेम्स बैंक्स

 

जब हम परमेश्वर पर भरोसा रखते हैं, वह हमें अनुग्रह के नए स्थानों में लिए चलता है।


तुम्हारा स्वभाव लोभरहित हो, और जो तुम्हारे पास है, उसी पर संतोष किया करो; क्योंकि उसने आप ही कहा है, कि मैं तुझे कभी न छोडूंगा, और न कभी तुझे त्यागूंगा। - इब्रानियों 13:5

बाइबल पाठ: यशायाह 46:3-13

यशायाह 46:3 हे याकूब के घराने, हे इस्राएल के घराने के सब बचे हुए लोगों, मेरी ओर कान लगाकर सुनो; तुम को मैं तुम्हारी उत्पत्ति ही से उठाए रहा और जन्म ही से लिये फिरता आया हूं।

यशायाह 46:4 तुम्हारे बुढ़ापे में भी मैं वैसा ही बना रहूंगा और तुम्हारे बाल पकने के समय तक तुम्हें उठाए रहूंगा। मैं ने तुम्हें बनाया और तुम्हें लिये फिरता रहूंगा;

यशायाह 46:5 मैं तुम्हें उठाए रहूंगा और छुड़ाता भी रहूंगा। तुम किस से मेरी उपमा दोगे और मुझे किस के समान बताओगे, किस से मेरा मिलान करोगे कि हम एक समान ठहरें?

यशायाह 46:6 जो थैली से सोना उण्डेलते और कांटे में चान्दी तौलते हैं, जो सुनार को मजदूरी देकर उस से देवता बनवाते हैं, तब वे उसे प्रणाम करते वरन दण्डवत भी करते हैं!

यशायाह 46:7 वे उसको कन्धे पर उठा कर लिये फिरते हैं, वे उसे उसके स्थान में रख देते और वह वहीं खड़ा रहता है; वह अपने स्थान से हट नहीं सकता; यदि कोई उसकी दोहाई भी दे, तौभी न वह सुन सकता है और न विपत्ति से उसका उद्धार कर सकता है।

यशायाह 46:8 हे अपराधियों, इस बात को स्मरण करो और ध्यान दो, इस पर फिर मन लगाओ।

यशायाह 46:9 प्राचीनकाल की बातें स्मरण करो जो आरम्भ ही से है; क्योंकि ईश्वर मैं ही हूं, दूसरा कोई नहीं; मैं ही परमेश्वर हूं और मेरे तुल्य कोई भी नहीं है।

यशायाह 46:10 मैं तो अन्त की बात आदि से और प्राचीनकाल से उस बात को बताता आया हूं जो अब तक नहीं हुई। मैं कहता हूं, मेरी युक्ति स्थिर रहेगी और मैं अपनी इच्छा को पूरी करूंगा।

यशायाह 46:11 मैं पूर्व से एक उकाब पक्षी को अर्थात दूर देश से अपनी युक्ति के पूरा करने वाले पुरुष को बुलाता हूं। मैं ही ने यह बात कही है और उसे पूरी भी करूंगा; मैं ने यह विचार बान्धा है और उसे सफल भी करूंगा।

यशायाह 46:12 हे कठोर मन वालो तुम जो धर्म से दूर हो, कान लगाकर मेरी सुनो।

यशायाह 46:13 मैं अपनी धार्मिकता को समीप ले आने पर हूं वह दूर नहीं है, और मेरे उद्धार करने में विलम्ब न होगा; मैं सिय्योन का उद्धार करूंगा और इस्राएल को महिमा दूंगा।

 

एक साल में बाइबल: 

  • यशायाह 45-46
  • 1 थिस्सलुनीकियों 3

गुरुवार, 30 अगस्त 2018

प्रभाव



उनके अमेरिका के 26वें (1901-1909) राष्ट्रपति बनने के कुछ वर्ष पहले थियोडोर रूजवेल्ट को समाचार मिला कि उनका सबसे ज्येष्ठ पुत्र, थियोडोर जूनियर (टेड), अस्वस्थ है। उनका पुत्र तो उस बीमारी से स्वस्थ हो गया, किन्तु टेड की बीमारी के कारण ने रूजवेल्ट को गंभीर आघात पहुंचाया। डाक्टरों ने उन्हें बताया कि वे ही अपने पुत्र की बीमारी का कारण हैं। टेड अत्याधिक “मानसिक थकावट” से ग्रस्त था क्योंकि उसके पिता उस पर निर्ममता के साथ एक “वीर-नायक” बनने का दबाव डालते रहते थे, क्योंकि वे स्वयं अपने बचपन की कमजोरियों के कारण वैसे नहीं बनने पाए थे। यह जानने के पश्चात, रूजवेल्ट ने प्रण किया कि वे कभी अपने पुत्र के मन या शरीर पर किसी प्रकार का कोई भी दबाव नहीं डालेंगे।

      वे अपने इस प्रण के प्रति खरे बने रहे, और उन्होंने टेड के प्रति अपने व्यवहार पर बहुत ध्यान बनाए रखा। उनके उसी पुत्र ने आगे चलकर दूसरे विश्वयुद्ध में वीरता के साथ मित्र देशों की सेना का ऊटाह तट पर उतरने  में नेतृत्व किया।

      परमेश्वर ने हम सब को दूसरों के जीवनों पर प्रभाव डालने  की क्षमता दी है। उन जीवनों के प्रति इस दायित्व के निर्वाह की हम पर गंभीर जिम्मेदारी है, वे चाहे हमारे जोड़ीदार एवँ सन्तान हों, या हमारे मित्र, कर्मचारी, अथवा ग्राहक, कोई भी हों। दूसरों पर अत्याधिक दबाव डालना, उनसे बहुत अधिक की अपेक्षा रखना, उन्हें उन्नति करने के लिए बाध्य करना, उनके सफल होने के लिए हस्तक्षेप करना, आदि व्यवहार अपनाने का प्रलोभन उनकी हानि कर सकता है, चाहे हमें इसका एहसास भी न हो।

      इसी कारण परमेश्वर का वचन बाइबल हमें बताता है कि हम औरों के साथ धीराज्वंत और कोमल रहें (कुलुस्सियों 3:12)। क्योंकि हमारा और समस्त जगत का उद्धारकर्ता, परमेश्वर का पुत्र प्रभु यीशु दीन और नम्र होकर सँसार में आया, तो फिर हम जो उसके अनुयायी हैं, औरों पर अपने प्रभाव में उससे भिन्न व्यवहार कैसे कर सकते हैं? – रैंडी किल्गोर


परमेश्वर जो हमारे लिए करता है, हमें औरों के साथ वैसा ही करना है।

जैसा मसीह यीशु का स्‍वभाव था वैसा ही तुम्हारा भी स्‍वभाव हो। - फिलिप्पियों 2:5

बाइबल पाठ: कुलुस्सियों 3:12-17
Colossians 3:12 इसलिये परमेश्वर के चुने हुओं के समान जो पवित्र और प्रिय हैं, बड़ी करूणा, और भलाई, और दीनता, और नम्रता, और सहनशीलता धारण करो।
Colossians 3:13 और यदि किसी को किसी पर दोष देने को कोई कारण हो, तो एक दूसरे की सह लो, और एक दूसरे के अपराध क्षमा करो: जैसे प्रभु ने तुम्हारे अपराध क्षमा किए, वैसे ही तुम भी करो।
Colossians 3:14 और इन सब के ऊपर प्रेम को जो सिद्धता का कटिबन्‍ध है बान्‍ध लो।
Colossians 3:15 और मसीह की शान्‍ति जिस के लिये तुम एक देह हो कर बुलाए भी गए हो, तुम्हारे हृदय में राज्य करे, और तुम धन्यवादी बने रहो।
Colossians 3:16 मसीह के वचन को अपने हृदय में अधिकाई से बसने दो; और सिद्ध ज्ञान सहित एक दूसरे को सिखाओ, और चिताओ, और अपने अपने मन में अनुग्रह के साथ परमेश्वर के लिये भजन और स्‍तुतिगान और आत्मिक गीत गाओ।
Colossians 3:17 और वचन से या काम से जो कुछ भी करो सब प्रभु यीशु के नाम से करो, और उसके द्वारा परमेश्वर पिता का धन्यवाद करो।


एक साल में बाइबल: 
  • भजन 129-131
  • 1कुरिन्थियों 11:1-16



बुधवार, 25 जुलाई 2018

परीक्षा



      क्रिकेट के खेल में टेस्ट-मैच खेलना बहुत थका देने वाला हो सकता है। खिलाड़ी प्रातः 11 बजे से लेकर संध्या 6 बजे तक खेलते हैं, इसके बीच में चाय और दोपहर के भोजन के अवकाश भी होते हैं। एक टेस्ट-मैच पाँच दिन तक चल सकता है। यह धीरज और कौशल की परख होता है।

      इसी प्रकार से जीवन में हम जिन परिस्थितियों का सामना करते हैं, वे कभी-कभी इसलिए और भी विकट लगने लगती हैं क्योंकि उनका अन्त होता हुआ दिखाई ही नहीं देता है। नौकरी मिलने की लंबी तलाश, अकेलेपन के लंबे समय, कैंसर के साथ चल रहा लंबा द्वंद, यह सब और भी कठिन लगने लगता है क्योंकि हम सोचने लग जाते हैं कि क्या यह कभी समाप्त भी होगा?

      शायद इसीलिए भजनकार ने पुकारा, “हे प्रभु तू कब तक देखता रहेगा? इस विपत्ति से, जिस में उन्होंने मुझे डाला है मुझ को छुड़ा! जवान सिंहों से मेरे प्राण को बचा ले” (भजन 35:17)। बाइबल के व्य्ख्याकर्ताओं का मानना है कि यह उस समय की बात है जब राजा शाऊल लंबे समय तक दाऊद का पीछा करता रहा था, और राजा के सलाहकार दाऊद  पर दोष मढ़ते रहते थे – दाऊद  के लिए यह परिक्षा का ऐसा समय था जो वर्षों तक चला था।

      परन्तु फिर भी अन्त में दाऊद ने गाया कि, “...यहोवा की बड़ाई हो, जो अपने दास के कुशल से प्रसन्न होता है” (पद 27)। उसकी परिक्षा उसे परमेश्वर पर और भी अधिक भरोसा रखने की गहराईयों में ले गई। दाऊद के समान, हमारी लंबी परीक्षाएं, कठिनाईयां, या हानि भी हमें परमेश्वर पर और गहरा भरोसा करने के अनुभवों से होकर निकाल सकती हैं; परमेश्वर पर भरोसे को बनाए रखें, अन्ततः आपका भला ही होगा। - बिल क्राउडर


जब आपके बोझ आप पर हावी होने लगें, 
तो स्मरण रखें कि परमेश्वर की सामर्थी भुजाएँ आपको संभाले हुए हैं।

अनादि परमेश्वर तेरा गृहधाम है, और नीचे सनातन भुजाएं हैं। वह शत्रुओं को तेरे साम्हने से निकाल देता, और कहता है, उन को सत्यानाश कर दे। - व्यवस्थाविवरण 33:27

बाइबल पाठ: भजन 35:17-28
Psalms 35:17 हे प्रभु तू कब तक देखता रहेगा? इस विपत्ति से, जिस में उन्होंने मुझे डाला है मुझ को छुड़ा! जवान सिंहों से मेरे प्राण को बचा ले!
Psalms 35:18 मैं बड़ी सभा में तेरा धन्यवाद करूंगा; बहुतेरे लोगों के बीच में तेरी स्तुति करूंगा।
Psalms 35:19 मेरे झूठ बोलने वाले शत्रु मेरे विरुद्ध आनन्द न करने पाएं, जो अकारण मेरे बैरी हैं, वे आपस में नैन से सैन न करने पांए।
Psalms 35:20 क्योंकि वे मेल की बातें नहीं बोलते, परन्तु देश में जो चुपचाप रहते हैं, उनके विरुद्ध छल की कल्पनाएं करते हैं।
Psalms 35:21 और उन्होंने मेरे विरुद्ध मुंह पसार के कहा; आहा, आहा, हम ने अपनी आंखों से देखा है!
Psalms 35:22 हे यहोवा, तू ने तो देखा है; चुप न रह! हे प्रभु, मुझ से दूर न रह!
Psalms 35:23 उठ, मेरे न्याय के लिये जाग, हे मेरे परमेश्वर, हे मेरे प्रभु, मेरे मुकद्दमा निपटाने के लिये आ!
Psalms 35:24 हे मेरे परमेश्वर यहोवा, तू अपने धर्म के अनुसार मेरा न्याय चुका; और उन्हें मेरे विरुद्ध आनन्द करने न दे!
Psalms 35:25 वे मन में न कहने पाएं, कि आहा! हमारी तो इच्छा पूरी हुई! वह यह न कहें कि हम उसे निगल गए हैं।
Psalms 35:26 जो मेरी हानि से आनन्दित होते हैं उनके मुंह लज्जा के मारे एक साथ काले हों! जो मेरे विरुद्ध बड़ाई मारते हैं वह लज्जा और अनादर से ढ़ंप जाएं!
Psalms 35:27 जो मेरे धर्म से प्रसन्न रहते हैं, वह जयजयकार और आनन्द करें, और निरन्तर कहते रहें, यहोवा की बड़ाई हो, जो अपने दास के कुशल से प्रसन्न होता है!
Psalms 35:28 तब मेरे मुंह से तेरे धर्म की चर्चा होगी, और दिन भर तेरी स्तुति निकलेगी।


एक साल में बाइबल: 
  • भजन 37-39
  • प्रेरितों 26



गुरुवार, 8 फ़रवरी 2018

फल


   मैं अपने किए को पलट नहीं सकती थी। एक महिला ने मेरे आगे अपनी कार को मार्ग में खड़ा किया और पास रखे डिब्बे में कुछ चीज़ों को डालने के लिए चली गई, जिससे पेट्रोल भरवाने के पम्प तक पहुँचाने का मेरा मार्ग अवरुद्ध हुआ। क्योंकि मैं प्रतीक्षा नहीं करना चाहती थी, इसलिए मैंने क्रोधावेश में जोर से हॉर्न बजाया और अपने गाड़ी को पीछे कर के घुमा कर पेट्रोल पम्प की ओर चली गई। तुरंत ही मुझे अपने इस प्रकार अधीर और क्रोधित होने का बुरा लगा, कि मैं उस महिला के लौटकर अपनी कार को आगे बढ़ा लेने का, जिसमें उसे 30 सेकेंड से अधिक नहीं लगते, प्रतीक्षा नहीं कर सकी। मैंने परमेश्वर से क्षमा माँगी। यह ठीक है कि उसे अपनी गाड़ी निर्धारित स्थान पर खड़ी करनी चाहिए थी, परन्तु मुझे भी तो उस कड़ुवाहट के स्थान पर नम्रता और धीरज दिखाना चाहिए था। लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी, वह महिला जा चुकी थी, और अब मैं उससे अपने इस कठोर व्यवहार के लिए क्षमा नहीं माँग सकती थी।

   परमेश्वर के वचन बाइबल में नीतिवचन नामक पुस्तक में अनेकों ऐसी शिक्षाएँ दी गई हैं जो हमें सिखाती हैं कि जब औरों के द्वारा हमारे मार्ग या योजनाएं बाधित हों, तो हमें कैसे प्रत्युत्तर देना चाहिए। एक स्थान पर लिखा है, “मूढ़ की रिस उसी दिन प्रगट हो जाती है, परन्तु चतुर अपमान को छिपा रखता है” (नीतिवचन 12:16)। एक अन्य में कहा गया है, “मुकद्दमे से हाथ उठाना, पुरूष की महिमा ठहरती है; परन्तु सब मूढ़ झगड़ने को तैयार होते हैं” (20:3)। और यह भी है जो सीधे हृदय को स्पर्श करती है, “मूर्ख अपने सारे मन की बात खोल देता है, परन्तु बुद्धिमान अपने मन को रोकता, और शान्त कर देता है” (29:11)।

   कभी-कभी नम्रता और धैर्य में बढना बहुत कठिन लगता है, परन्तु पौलुस प्रेरित ने बताया है कि ये गुण विक्सित करना परमेश्वर द्वारा संभव है; क्योंकि ये परमेश्वर के पवित्र आत्मा के फल है (गलतियों 5:22-23)। हम अपने व्यवहार में जितना अधिक परमेश्वर के आत्मा के साथ सहयोग करते हैं, उस पर निर्भर होते हैं, उतना अधिक वह हमारे अन्दर अपने फल उत्पन्न करता जाता है।

   हे प्रभु हमें अन्दर से परिवर्तित कीजिए, हमारे अन्दर बहुतायत से अपनी आत्मा के फल उत्पन्न कीजिए! – ऐनी सेटास

                  
परमेश्वर हमारे हृदयों को विशाल करने के लिए हमारे धैर्य की परिक्षा लेता है।

तुम ने मुझे नहीं चुना परन्तु मैं ने तुम्हें चुना है और तुम्हें ठहराया ताकि तुम जा कर फल लाओ; और तुम्हारा फल बना रहे, कि तुम मेरे नाम से जो कुछ पिता से मांगो, वह तुम्हें दे। - यूहन्ना 15:16

बाइबल पाठ: गलतियों 5:13-26
Galatians 5:13 हे भाइयों, तुम स्‍वतंत्र होने के लिये बुलाए गए हो परन्तु ऐसा न हो, कि यह स्‍वतंत्रता शारीरिक कामों के लिये अवसर बने, वरन प्रेम से एक दूसरे के दास बनो।
Galatians 5:14 क्योंकि सारी व्यवस्था इस एक ही बात में पूरी हो जाती है, कि तू अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रख।
Galatians 5:15 पर यदि तुम एक दूसरे को दांत से काटते और फाड़ खाते हो, तो चौकस रहो, कि एक दूसरे का सत्यानाश न कर दो।
Galatians 5:16 पर मैं कहता हूं, आत्मा के अनुसार चलो, तो तुम शरीर की लालसा किसी रीति से पूरी न करोगे।
Galatians 5:17 क्योंकि शरीर आत्मा के विरोध में, और आत्मा शरीर के विरोध में लालसा करती है, और ये एक दूसरे के विरोधी हैं; इसलिये कि जो तुम करना चाहते हो वह न करने पाओ।
Galatians 5:18 और यदि तुम आत्मा के चलाए चलते हो तो व्यवस्था के आधीन न रहे।
Galatians 5:19 शरीर के काम तो प्रगट हैं, अर्थात व्यभिचार, गन्‍दे काम, लुचपन।
Galatians 5:20 मूर्ति पूजा, टोना, बैर, झगड़ा, ईर्ष्या, क्रोध, विरोध, फूट, विधर्म।
Galatians 5:21 डाह, मतवालापन, लीलाक्रीड़ा, और इन के जैसे और और काम हैं, इन के विषय में मैं तुम को पहिले से कह देता हूं जैसा पहिले कह भी चुका हूं, कि ऐसे ऐसे काम करने वाले परमेश्वर के राज्य के वारिस न होंगे।
Galatians 5:22 पर आत्मा का फल प्रेम, आनन्द, मेल, धीरज,
Galatians 5:23 और कृपा, भलाई, विश्वास, नम्रता, और संयम हैं; ऐसे ऐसे कामों के विरोध में कोई भी व्यवस्था नहीं।
Galatians 5:24 और जो मसीह यीशु के हैं, उन्होंने शरीर को उस की लालसाओं और अभिलाषाओं समेत क्रूस पर चढ़ा दिया है।
Galatians 5:25 यदि हम आत्मा के द्वारा जीवित हैं, तो आत्मा के अनुसार चलें भी।
Galatians 5:26 हम घमण्‍डी हो कर न एक दूसरे को छेड़ें, और न एक दूसरे से डाह करें।

एक साल में बाइबल: 
  • लैव्यवस्था 4-5
  • मत्ती 24:29-51



रविवार, 12 नवंबर 2017

कठिन लोग


   हम जब अपने वर्तमान घर में आए, तो मैं निकट ही स्थित हंसों और उनके घोंसलों की सुन्दरता को निहार्ता था। जिस प्रकार वे एक दुसरे का ध्यान रखते थे और पानी में एक सीधी पंक्ति में तैरते थे तथा हवा में V का आकार बनाकर उडते थे, मुझे वह सब देखना अच्छा लगता था। उन्हें अपने बच्चों की देखभाल करके बड़ा करते हुए देखना भी बहुत आनन्दायक था। फिर ग्रीष्म ऋतु आई, और मुझे उन हंसों के बारे में कुछ कम रुचिकर बातें पता लगीं। हंसों को घास खाना अच्छा लगता है, और ऐसा करने के लिए उन्हें कोई चिन्ता नहीं होती है कि वे किसी के परिश्रम से लगाए और बना कर रखे गए लॉन को खराब कर रहे हैं। इससे भी बुरी बात यह है कि जो गन्दगी वे अपने पीछे छोड़ जाते हैं उसके कारण लॉन पर टहलना एक अप्रिय अनुभव हो जाता है।

   जब भी मुझे कुछ कठिन लोगों के साथ व्यवहार करना होता है, मैं उन हंसों के बारे में सोचता हूँ। कभी-कभी मैं चाहता हूँ कि ऐसे लोगों को अपने जीवन से बाहर वैसे ही भगा दूँ, जैसे कि उन हंसों को अपने लॉन से भगाता हूँ। जब ऐसी भावना मेरे अन्दर उठती है तब परमेश्वर मुझे स्मरण दिलाता है कि कठिन व्यक्तियों में भी कुछ सुन्दरता अवश्य ही होती है, यदि हम उनके निकट आकर उसे देखने का प्रयास करें; यह भी संभव है कि जो पीड़ा वे दूसरों को दे रहे हैं वह उस पीड़ा का भाग है जिसे वे स्वयं अनुभव कर रहे हैं।

   परमेश्वर के वचन बाइबल में प्रेरित पौलुस ने रोम के मसीही विश्वासियों को लिखी अपनी पत्री में लिखा, "जहां तक हो सके, तुम अपने भरसक सब मनुष्यों के साथ मेल मिलाप रखो" (रोमियों 12:18)। इसलिए मैं परमेश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि औरों के "कठिन" स्वभाव का सामना करते समय मुझे धीरजवन्त रखें। इससे सदा ही अच्छा परिणाम तो नहीं आता है, परन्तु उल्लेखनीय बात यह है कि इस धीरज एक कारण परमेश्वर ने कितने ही संबंधों को बचा कर रखा है।

   जब भी हमारा सामना कठिन लोगों से हो, तो परमेश्वर के अनुग्रह तथा दृष्टिकोण के द्वारा हम उनसे प्रेम कर सक्ते हैं, उनके साथ निभा सकते हैं। - रैंडी किलगोर


यदि हम नम्र उत्तर दें तो शांति स्थापित रह सकती है।

जो मनुष्य बुद्धि से चलता है वह विलम्ब से क्रोध करता है, और अपराध को भुलाना उसको सोहता है। - नीतिवचन 19:11

बाइबल पाठ: रोमियों 12:12-21
Romans 12:12 आशा मे आनन्दित रहो; क्लेश मे स्थिर रहो; प्रार्थना मे नित्य लगे रहो। 
Romans 12:13 पवित्र लोगों को जो कुछ अवश्य हो, उस में उन की सहायता करो; पहुनाई करने में लगे रहो। 
Romans 12:14 अपने सताने वालों को आशीष दो; आशीष दो श्राप न दो। 
Romans 12:15 आनन्द करने वालों के साथ आनन्द करो; और रोने वालों के साथ रोओ। 
Romans 12:16 आपस में एक सा मन रखो; अभिमानी न हो; परन्तु दीनों के साथ संगति रखो; अपनी दृष्टि में बुद्धिमान न हो। 
Romans 12:17 बुराई के बदले किसी से बुराई न करो; जो बातें सब लोगों के निकट भली हैं, उन की चिन्ता किया करो। 
Romans 12:18 जहां तक हो सके, तुम अपने भरसक सब मनुष्यों के साथ मेल मिलाप रखो। 
Romans 12:19 हे प्रियो अपना पलटा न लेना; परन्तु क्रोध को अवसर दो, क्योंकि लिखा है, पलटा लेना मेरा काम है, प्रभु कहता है मैं ही बदला दूंगा। 
Romans 12:20 परन्तु यदि तेरा बैरी भूखा हो तो उसे खाना खिला; यदि प्यासा हो, तो उसे पानी पिला; क्योंकि ऐसा करने से तू उसके सिर पर आग के अंगारों का ढेर लगाएगा। 
Romans 12:21 बुराई से न हारो परन्तु भलाई से बुराई का जीत लो।

एक साल में बाइबल: 
  • यिर्मयाह 51-52
  • इब्रानियों 9