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शनिवार, 31 अगस्त 2024

Growth through God’s Word / परमेश्वर के वचन से बढ़ोतरी – 176

 

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मसीही जीवन से सम्बन्धित बातें – 21


मसीही जीवन के चार स्तम्भ - 2 - संगति (3) 



हम देखते आ रहे हैं कि परमेश्वर के वचन के अनुसार, मसीही विश्वास का व्यावहारिक जीवन जीने के लिए मसीही विश्वासी को परमेश्वर की किन बातों का पालन करते रहने का ध्यान रखना चाहिए। हमने देखा है कि प्रेरितों 2 अध्याय में सात बातें दी गई हैं, जिन में से अन्तिम चार, प्रेरितों 2:42 में दी गई हैं, जिन्हें “मसीही जीवन के स्तम्भ” भी कहा जाता है। इन चार “स्तम्भ” में से पहले, वचन का अध्ययन करना, को देखने के बाद अब हम दूसरे “स्तम्भ,” संगति रखना पर विचार कर रहे हैं। हमने देखा है कि संगति रखना आरम्भ से ही परमेश्वर की इच्छा रही है, और संगति के लिए ही उसने मनुष्य को अपने स्वरूप में सृजा। साथ ही, मनुष्य को भी परमेश्वर से तथा अन्य मनुष्यों से संगति रखनी थी। लेकिन संसार में पाप के प्रवेश ने इस संगति में परेशानियाँ खड़ी कर दीं; परमेश्वर के साथ मनुष्य की संगति टूट गई, और अन्य मनुष्यों के साथ उसकी संगति में अन्य बातों के आ जाने से उस संगति की मनोहरता एवं सामंजस्य समाप्त हो गया। पिछले लेख में हमने देखा था कि जहाँ पाप है वहाँ मनुष्य न तो परमेश्वर के साथ संगति रखने पाता है, और न ही अन्य मनुष्यों के साथ। किन्तु पाप का निवारण होते ही, मनुष्य की परमेश्वर तथा अन्य मनुष्यों के साथ संगति बहाल हो जाती है। संगति के बारे में हमारे सामने एक और बात भी आई है कि संगति का आधार और अभिव्यक्ति, चाहे संगति परमेश्वर के साथ हो, अथवा मनुष्यों के, परिवार और पारिवारिक सम्बन्ध हैं। आज हम इसी बात पर विचार करेंगे कि कैसे बाइबल के वचनों के आधार पर संगति में रहने से हम परमेश्वर के एक सार्वभौमिक, विश्वव्यापी परिवार के सदस्य बन जाते हैं; मानवीय विचारों और धारणाओं के आधार परस्पर विभाजन, असहमति, वर्चस्व, और शत्रुता की सारी दीवारें मिट जाती हैं।


हम देख चुके हैं कि पापों के लिए पश्चाताप करने, और प्रभु यीशु में विश्वास करने, उसे अपना जीवन समर्पित करने के द्वारा हमारा परमेश्वर के साथ मेल-मिलाप हो जाता है, उसके साथ हमारी संगति बहाल हो जाती है (रोमियों 5:1, 11)। लेकिन बात केवल मेल-मिलाप की बहाली तक ही सीमित नहीं है, वरन परमेश्वर मनुष्य के साथ पुनःस्थापित हुए इस सम्बन्ध और संगति को और भी आगे, और भी घनिष्ठता में, एक अकल्पनीय स्तर तक लेकर जाता है। ऐसे बहु-आयामी स्तर तक जो मनुष्यों के सोचने, समझने, कल्पनाओं, और उसकी किसी भी क्षमता से बिल्कुल परे है; और संसार में कहीं पर भी, अन्य किसी भी धर्म, विश्वास, ईश-मान्यता में जिसके समान कोई भी बात देखने को नहीं मिलती है। 


मसीह यीशु पर विश्वास करने से पापों की क्षमा प्राप्त करने और परमेश्वर के साथ संगति में बहाल हो जाने वालों को परमेश्वर अपनी सन्तान, अपने निज परिवार का एक सदस्य बना लेता है “परन्तु जितनों ने उसे ग्रहण किया, उसने उन्हें परमेश्वर के सन्तान होने का अधिकार दिया, अर्थात उन्हें जो उसके नाम पर विश्वास रखते हैं। वे न तो लहू से, न शरीर की इच्छा से, न मनुष्य की इच्छा से, परन्तु परमेश्वर से उत्पन्न हुए हैं।” (यूहन्ना 1:12-13)। वे अब मसीह के भाई-बँधु, उसके संगी वारिस बन जाते हैं “आत्मा आप ही हमारी आत्मा के साथ गवाही देता है, कि हम परमेश्वर की सन्तान हैं। और यदि सन्तान हैं, तो वारिस भी, वरन परमेश्वर के वारिस और मसीह के संगी वारिस हैं, जब कि हम उसके साथ दुख उठाएं कि उसके साथ महिमा भी पाएं।” (रोमियों 8:16-17)। और हम पिछले लेख में, रोमियों 10:12; 1 कुरिन्थियों 12:13; कुलुस्सियों 3:10-11 से देख चुके हैं कि इस प्रकार परमेश्वर के साथ सम्बन्ध में बहाल होते ही, परमेश्वर के परिवार का सदस्य बनते ही, सांसारिक बातों के कारण विभाजन और मतभेदों के सारे आधार समाप्त हो जाते हैं; मसीही विश्वासी एक परिवार के एक समान स्तर के सदस्य बन जाते हैं। जिन बातों और धारणाओं के आधार पर आज संसार के विभिन्न धर्म, विश्वास, मत, मान्यताओं, आदि को मानने वाले एक दूसरे के दुश्मन बने हुए हैं, दूसरों पर अधिकार रखने के लिए लड़-मर रहे हैं। किन्तु मसीही विश्वास में आते ही, उन सभी मतभेदों, विभाजनों, शत्रुता के अस्तित्व का आधार ही मिट जाता है; वे सभी जन एक ही संगति, और परमेश्वर की दृष्टि में एक ही समानता में आ जाते हैं।


प्रभु यीशु ने अपने अनुयायियों के साथ उसके इस पारिवारिक सम्बन्ध के बारे में, और इस सम्बन्ध के उसके शारीरिक जन्म के परिवार के साथ सम्बन्ध से भी बढ़कर होने के बारे में, पृथ्वी पर उसकी सेवकाई के दिनों में ही संसार के लोगों को बताया दिया था “और उस की माता और उसके भाई आए, और बाहर खड़े हो कर उसे बुलवा भेजा। और भीड़ उसके आसपास बैठी थी, और उन्होंने उस से कहा; देख, तेरी माता और तेरे भाई बाहर तुझे ढूंढते हैं। उसने उन्हें उत्तर दिया, कि मेरी माता और मेरे भाई कौन हैं? और उन पर जो उसके आस पास बैठे थे, दृष्टि कर के कहा, देखो, मेरी माता और मेरे भाई यह हैं। क्योंकि जो कोई परमेश्वर की इच्छा पर चले, वही मेरा भाई, और बहिन और माता है।” (मरकुस 3:31-35)। साथ ही प्रभु यीशु ने अपने शिष्यों को आश्वस्त किया था कि उसके पीछे हो लेने से यदि अपने जन्म के परिवार से दूर भी होना पड़े, तो भी कोई हानि नहीं है, क्योंकि यहीं संसार में छोड़े हुए का सौ गुणा, और स्वर्ग में अनन्त जीवन उन्हें मिल जाएगा “पतरस उस से कहने लगा, कि देख, हम तो सब कुछ छोड़कर तेरे पीछे हो लिये हैं। यीशु ने कहा, मैं तुम से सच कहता हूं, कि ऐसा कोई नहीं, जिसने मेरे और सुसमाचार के लिये घर या भाइयों या बहिनों या माता या पिता या लड़के-बालों या खेतों को छोड़ दिया हो। और अब इस समय सौ गुणा न पाए, घरों और भाइयों और बहिनों और माताओं और लड़के-बालों और खेतों को पर उपद्रव के साथ और परलोक में अनन्त जीवन।” (मरकुस 10:28-30)। प्रभु की इन बातों को ध्यान में रखने पर, प्रभु के द्वारा मत्ती 10:37 और लूका 14:26 में जन्म के परिवार के साथ सम्बन्धों के विषय कही गई बात को भी समझना सहज हो जाता है।


ऊपर कहा गया है कि परमेश्वर के साथ संगति में बहाली, मसीही विश्वासियों को एक ऐसे बहु-आयामी स्तर तक पहुँचा देती है, जो मनुष्यों के सोचने, समझने, कल्पनाओं, और उसकी किसी भी क्षमता से कहीं बढ़कर है। यह ऐसा स्तर है जिसके समान कोई भी बात संसार में कहीं पर भी, अन्य किसी भी धर्म, विश्वास, ईश-मान्यता में देखने को नहीं मिलती है। अगले लेख में हम संगति की बहाली के साथ मिलने वाली अन्य अद्भुत, अभूतपूर्व और अनुपम बातों को देखेंगे, ताकि इस संगति के महत्व और मूल्य को समझ सकें, उसका आदर कर सकें। 


यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु, मैं अपने पापों के लिए पश्चातापी हूँ, उनके लिए आप से क्षमा माँगता हूँ। मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मुझे और मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।


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English Translation


Things Related to Christian Living – 21


The Four Pillars of Christian Living - 2 - Fellowship (3)



We have, from God's Word, been looking into the things a Christian Believer should keep in mind and follow, in order to live a practical life of Christian faith. We have seen that there are seven things given in Acts 2; the last four of which, given in Acts 2:42, are also known as the “Pillars of the Christian Living.” Having considered the first of these four “pillars,” i.e., studying the Word, we are now considering the second “pillar,” i.e., keeping fellowship. We have seen that having fellowship has been God's desire from the beginning, and it is for this fellowship that He has created man in His own image. But man, also had to maintain the fellowship with God and also with other human beings. But the entry of sin into the world caused problems in this fellowship; Man's fellowship with God was broken, and as other things entered into his having fellowship with other men, the beauty and harmony of that fellowship was lost. In the previous article we saw that when there is sin, man is unable to have fellowship either with God or with other men. But once sin is taken care of, man's fellowship with God and other humans is restored. Another thing we have come to see about fellowship is that the basis and expression of fellowship is family and family relationships, whether the fellowship is with God or with humans. Today we will consider how living in fellowship based on the teachings of the Bible, makes us members of the universal, worldwide family of God; and all the walls of mutual division, disagreement, domination, and hostility based on human thoughts and ideas are destroyed.


We have seen that by repenting of sins, and believing in the Lord Jesus, by surrendering our lives to Him, we are reconciled to God, restored to our fellowship with Him (Romans 5:1, 11). But it is not just about the restoration of fellowship, rather God takes this restored relationship and fellowship with man even further, to an even more intimate, to an unimaginable level. He elevates it to a multi-dimensional level that is completely beyond what humans can think, understand, imagine; and simply do not have the capacity for ever attaining to that level on their own. Nothing similar to this can be seen anywhere in the world, in any other religion, belief or any concept of divinity.


Those who have received forgiveness of sins and are restored to fellowship with God through faith in Christ Jesus, God makes them His children, members of His own family "But as many as received Him, to them He gave the right to become children of God, to those who believe in His name: who were born, not of blood, nor of the will of the flesh, nor of the will of man, but of God." (John 1:12-13). They now become Christ's brothers and sisters, His joint heirs "The Spirit Himself bears witness with our spirit that we are children of God, and if children, then heirs - heirs of God and joint heirs with Christ, if indeed we suffer with Him, that we may also be glorified together"  (Romans 8:16-17). And we have seen in the previous article, from Romans 10:12; 1 Corinthians 12:13; and Colossians 3:10-11 that once thus restored to relationship with God, having become a member of God's family, all grounds for divisions and differences due to worldly considerations get eliminated; all Born-Again Christians become co-equal members of one family. It is on the basis of these worldly considerations and notions, that people of different religions, beliefs, opinions, concepts, etc. in the world have become enemies of each other; they are fighting each other for dominion, they are killing and dying for those things. But as soon as they come into the Christian faith, the very basis of the existence of all these differences, divisions, enmities, etc. disappears; All the people become part of the same fellowship, all having an equal status before God.


The Lord Jesus, during the days of His ministry on earth, had told the people of the world about this family relationship that He has with His followers; and that this relationship was even greater than His relationship with His family of physical birth "Then His brothers and His mother came, and standing outside they sent to Him, calling Him. And a multitude was sitting around Him; and they said to Him, 'Look, Your mother and Your brothers are outside seeking You.’ But He answered them, saying, ‘Who is My mother, or My brothers?’ And He looked around in a circle at those who sat about Him, and said, ‘Here are My mother and My brothers! For whoever does the will of God is My brother and My sister and mother.’" (Mark 3:31-35). At the same time, Lord Jesus had assured his disciples that by following Him, even if they have to be away from their family of birth, they will not suffer any loss, because right here in this world, they will be rewarded a hundred times of whatever they have to leave behind, and they will get eternal life in heaven “Then Peter began to say to Him, ‘See, we have left all and followed You.’ So Jesus answered and said, ‘Assuredly, I say to you, there is no one who has left house or brothers or sisters or father or mother or wife or children or lands, for My sake and the gospel's, who shall not receive a hundredfold now in this time--houses and brothers and sisters and mothers and children and lands, with persecutions--and in the age to come, eternal life.’” (Mark 10:28-30). Keeping these things stated by the Lord in mind, it becomes easier to understand what the Lord meant when He said in Matthew 10:37 and Luke 14:26 about relationships with the family of birth.


As stated above, restoration into fellowship with God elevates Christians to a multi-dimensional level that is far beyond what man can think, understand, imagine, and be able to accomplish on his own. This is such a level that nothing like it can be seen anywhere in the world, in any other religion, belief or concept of divinity. In the next article we will look at other marvelous, unprecedented, and unique things that come with the restoration of fellowship, so that we can understand and respect the importance and value of this fellowship.


If you have not yet accepted the discipleship of the Lord, make your decision in favor of the Lord Jesus now to ensure your eternal life and heavenly blessings. Where there is obedience to the Lord, where there is respect and obedience to His Word, there is also the blessing and protection of the Lord. Repenting of your sins, and asking the Lord Jesus for forgiveness of your sins, voluntarily and sincerely, surrendering yourself to Him - is the only way to salvation and heavenly life. You only have to say a short but sincere prayer to the Lord Jesus Christ willingly and with a penitent heart, and at the same time completely commit and submit your life to Him. You can also make this prayer and submission in words something like, “Lord Jesus, I am sorry for my sins and repent of them. I thank you for taking my sins upon yourself, paying for them through your life.  Because of them you died on the cross in my place, were buried, and you rose again from the grave on the third day for my salvation, and today you are the living Lord God and have freely provided to me the forgiveness, and redemption from my sins, through faith in you. Please forgive my sins, take me under your care, and make me your disciple. I submit my life into your hands." Your one prayer from a sincere and committed heart will make your present and future life, in this world and in the hereafter, heavenly and blessed for eternity.

 

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शुक्रवार, 12 मार्च 2021

निर्देश

 

          मुझे पहले ही देर हो चुकी थी; परन्तु मेरे सामने सड़क पर रखी संकेत पट्टिका पर लिखा था “देरी हो जाने की संभावना है” और वहाँ से आगे गाड़ियां धीरे चल रही थीं; मैंने खिसिया कर प्रतिक्रिया दी, अरे! क्या यह कोई मज़ाक हो रहा है? लेकिन मुझे फिर हँसी आ गई। मेरी अपेक्षा थी कि सभी कार्य मेरी आदर्श समय-सारणी के अनुसार होते रहेंगे; मैंने यह बात सोची ही नहीं थी कि मेरे मार्ग में कही सड़क की मरम्मत होने की आवश्यकता होगी, जिससे यातायात फिर धीमा हो जाएगा, और समय अधिक लगेगा।

          यदि इसी बात को आत्मिक स्तर पर देखा जाए, हम में से बहुत कम ऐसे होते हैं जो अपने जीवन में किसी ऐसी समस्या की संभावना रखते हुए योजनाएँ बनाते हैं, जिन के कारण हमें धीमा होना या मार्ग बदलना या रुकना पड़ सकता है। किन्तु फिर भी जब मैं पीछे मुड़कर जीवन को देखता हूँ, तो अनेकों बार ऐसा हुआ है कि परिस्थितियों ने मुझे किसी भिन्न मार्ग पर चलने की ओर पुनः निर्देशित किया है; आगे बढ़ने में देरी उत्पन्न की है।

          परमेश्वर के वचन बाइबल में राजा सुलैमान ने मेरे समान कभी “देरी हो जाने की संभावना है” वाली संकेत पट्टिका का सामना नहीं किया। किन्तु नीतिवचन 16 अध्याय में वह हमारी अपनी योजनाओं की तुलना परमेश्वर के मार्गदर्शन के साथ करता है। इस अध्याय के पहले पद को हम अपने शब्दों में कुछ इस प्रकार से भी कह सकते हैं, “नश्वर मनुष्य बहुत बड़ी-बड़ी योजनाएँ बनाते हैं; परन्तु अंतिम निर्णय परमेश्वर ही का होता है।” इसी विचार को सुलैमान ने फिर से पद 9 में इस प्रकार व्यक्त किया, जिसे हम अपने ही शब्दों में यूँ कह सकते हैं, “हम अपने मार्ग निर्धारित करते हैं ... परन्तु प्रभु  ही हमारे कदमों को सही दिशा देता है।” अर्थात, आगे क्या होना है, इसके विषय हमारे अपने विचार तो हो सकते हैं, परन्तु संभव है कि परमेश्वर की योजना कुछ और हो।

          इस आत्मिक सत्य को हम कैसे नजरंदाज कर देते हैं? हम अपनी योजनाएँ बनाने लगते हैं, और परमेश्वर से उसकी योजनाओं के बारे में पूछना भूल जाते हैं। और फिर जब मेरी योजनाओं और मार्गों में बाधाएँ आती हैं, विलम्ब होते हैं, तब हम खिसियाते हैं, परेशान होते हैं।

          परन्तु चिंता करने के स्थान पर हम, जैसा सुलैमान ने सिखाया है, परमेश्वर पर भरोसा बनाए रखें, विश्वास रखें कि वह कदम-कदम करके हमारा मार्गदर्शन करेगा। हमें प्रार्थना पूर्वक उसके खोजी बने रहने, उसके उत्तर की प्रतीक्षा करते रहने, और उसके मार्गदर्शन की बाट जोहनी है। हमारी भलाई के लिए वही हमें सही मार्ग पर सही रीति से, अपने समय और योजनाओं के अनुसार लिए चलेगा। - एडम होल्ज़

 

चिंता के स्थान पर भरोसे को अपना लें; परमेश्वर आपका मार्गदर्शन करता रहेगा।


तू अपनी समझ का सहारा न लेना, वरन सम्पूर्ण मन से यहोवा पर भरोसा रखना। उसी को स्मरण कर के सब काम करना, तब वह तेरे लिये सीधा मार्ग निकालेगा। - नीतिवचन 3:5-6

बाइबल पाठ: नीतिवचन 16:1-9

नीतिवचन 16:1 मन की युक्ति मनुष्य के वश में रहती है, परन्तु मुंह से कहना यहोवा की ओर से होता है।

नीतिवचन 16:2 मनुष्य का सारा चाल चलन अपनी दृष्टि में पवित्र ठहरता है, परन्तु यहोवा मन को तौलता है।

नीतिवचन 16:3 अपने कामों को यहोवा पर डाल दे, इस से तेरी कल्पनाएं सिद्ध होंगी।

नीतिवचन 16:4 यहोवा ने सब वस्तुएं विशेष उद्देश्य के लिये बनाईं हैं, वरन दुष्ट को भी विपत्ति भोगने के लिये बनाया है।

नीतिवचन 16:5 सब मन के घमण्डियों से यहोवा घृणा करता है; मैं दृढ़ता से कहता हूं, ऐसे लोग निर्दोष न ठहरेंगे।

नीतिवचन 16:6 अधर्म का प्रायश्चित कृपा और सच्चाई से होता है; और यहोवा के भय मानने के द्वारा मनुष्य बुराई करने से बच जाते हैं।

नीतिवचन 16:7 जब किसी का चाल चलन यहोवा को भावता है, तब वह उसके शत्रुओं का भी उस से मेल कराता है।

नीतिवचन 16:8 अन्याय के बड़े लाभ से, न्याय से थोड़ा ही प्राप्त करना उत्तम है।

नीतिवचन 16:9 मनुष्य मन में अपने मार्ग पर विचार करता है, परन्तु यहोवा ही उसके पैरों को स्थिर करता है।

 

एक साल में बाइबल: 

  • व्यवस्थाविवरण 17-19
  • मरकुस 13:1-20

शुक्रवार, 4 अक्टूबर 2019

रुकावटें



      विशेषज्ञ इस बात पर सहमत हैं कि प्रति दिन रुकावटों के कारण बहुत सा समय व्यर्थ हो जाता है। हम चाहे घर पर हों या कार्य-स्थल पर, कोई अनपेक्षित फोन-कॉल या अनायास ही किसी का आ जाना, हमें उस समय के लिए हमारे मुख्य उद्देश्य से भटका सकता है। हम बहुधा अपने जीवनों में आने वाली रुकावटों को पसन्द नहीं करते हैं, विशेषकर तब जब उनके कारण हमारे कार्यक्रम बाधित होते हैं या हमें अपने कार्यक्रम में कुछ परिवर्तन लाने पड़ते हैं।

      परन्तु परमेश्वर के वचन बाइबल में हम प्रभु यीशु मसीह के जीवन से देखते हैं कि प्रभु यीशु ने ऐसी अन्यायास और अनपेक्षित बाधाओं के प्रति बिलकुल भिन्न रवैया अपनाया था। सुसमाचारों में हम बारंबार देखते हैं कि किसी व्यक्ति की सहायता के पुकार के प्रत्युत्तर में प्रभु रुक कर उसकी सहायता करते थे।

      लूका रचित सुसमाचार में हम देखते हैं कि जब प्रभु यीशु यरूशलेम की ओर जा रहे थे, जहाँ उन्हें क्रूस पर चढ़ाकर मार डालने के लिए पकड़ावाया जाना था, तो मार्ग के किनारे बैठे एक अंधे भिखारी ने उन्हें पुकारा, “हे यीशु दाऊद की सन्तान, मुझ पर दया कर” (लूका 18:38)। प्रभु के साथ चल रही लोगों की भीड़ में से कुछ ने उसे शान्त हो जाने के लिए कहा, किन्तु वह प्रभु यीशु को पुकारता ही रहा। प्रभु यीशु रुके और उससे पूछा, “तू क्या चाहता है, कि मैं तेरे लिये करूं?” और उस अंधे भिखारी ने कहा “हे प्रभु यह कि मैं देखने लगूं” प्रत्युत्तर में प्रभु यीशु ने उससे कहा, “देखने लग, तेरे विश्वास ने तुझे अच्छा कर दिया है” (पद 41-42)।

      जब किसी ऐसे व्यक्ति के द्वारा हमारे काम या योजनाओं में रुकावट आती है, जिसे वास्तव में हमारी सहायता की आवश्यकता है, तब खीजने की बजाए हमें परमेश्वर से प्रार्थना कर के, उस व्यक्ति की सहायता करने के लिए सामर्थ्य और मार्गदर्शन प्राप्त करना चाहिए। जिसे हम रुकावट समझ रहे हैं, हो सकता है कि वह परमेश्वर की ओर से हमें आशीषित करने के लिए भेजा गया दिव्य अवसर हो। - डेविड मैक्कैसलैंड

रुकावटें सेवा करने के अवसर हो सकते हैं।

पहुनाई करना न भूलना, क्योंकि इस के द्वारा कितनों ने अनजाने स्‍वर्गदूतों की पहुनाई की है। - इब्रानियों 13:2  

बाइबल पाठ: लूका 18:35-43
Luke 18:35 जब वह यरीहो के निकट पहुंचा, तो एक अन्‍धा सड़क के किनारे बैठा हुआ भीख मांग रहा था।
Luke 18:36 और वह भीड़ के चलने की आहट सुनकर पूछने लगा, यह क्या हो रहा है?
Luke 18:37 उन्होंने उसको बताया, कि यीशु नासरी जा रहा है।
Luke 18:38 तब उसने पुकार के कहा, हे यीशु दाऊद की सन्तान, मुझ पर दया कर।
Luke 18:39 जो आगे जाते थे, वे उसे डांटने लगे कि चुप रहे: परन्तु वह और भी चिल्लाने लगा, कि हे दाऊद की सन्तान, मुझ पर दया कर।
Luke 18:40 तब यीशु ने खड़े हो कर आज्ञा दी कि उसे मेरे पास लाओ, और जब वह निकट आया, तो उसने उस से यह पूछा।
Luke 18:41 तू क्या चाहता है, कि मैं तेरे लिये करूं? उसने कहा; हे प्रभु यह कि मैं देखने लगूं।
Luke 18:42 यीशु ने उस से कहा; देखने लग, तेरे विश्वास ने तुझे अच्छा कर दिया है।
Luke 18:43 और वह तुरन्त देखने लगा; और परमेश्वर की बड़ाई करता हुआ उसके पीछे हो लिया, और सब लोगों ने देख कर परमेश्वर की स्‍तुति की।

एक साल में बाइबल: 
  • यशायाह 20-22
  • इफिसियों 6



बुधवार, 3 फ़रवरी 2016

संकल्प


   सामान्यतः लोग नव-वर्ष के आगमन पर अपने जीवनों में सुधार के लिए कुछ संकल्प करते हैं, परन्तु मैंने नव-वर्ष के साथ नए संकल्प करना सन 1975 से छोड़ रखा है। मुझे नए संकल्प करने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती - अभी तो मैं अभी पुराने संकल्प जैसे कि, प्रतिदिन जो परमेश्वर मुझे सिखाता है उसे लिख कर संकलित करके रखना, परमेश्वर के वचन बाइबल को नियमित प्रतिदिन पढ़ना, परमेश्वर के साथ प्रार्थना में प्रतिदिन समय बिताना, अपने समय को नियोजित करके उसका सदुप्योग करना, अपने कमरे को साफ-सुथरा रखना (अब तो मेरे पास साफ-सुथरा रखने के लिए पूरा घर है) आदि को ही भली-भांति पूरे करने के प्रयास में लगी हूँ!

   लेकिन इस वर्ष मैंने अपने संकल्पों की सूचि में एक नया संकल्प जोड़ा है, जो मुझे प्रेरित पौलुस द्वारा रोम के मसीही विश्वासियों को लिखी गई पत्री से मिला: "सो आगे को हम एक दूसरे पर दोष ना लगाएं पर तुम यही ठान लो कि कोई अपने भाई के साम्हने ठेस या ठोकर खाने का कारण न रखे" (रोमियों 14:13)। यद्यपि यह संकल्प नया नहीं, अपितु लगभग 2000 वर्ष पुराना है, परन्तु फिर भी यह एक ऐसा संकल्प है जिसे हमें हर वर्ष दोहराते रहना चाहिए। जैसे उस समय रोम के मसीही विश्वासी कर रहे थे, आज के मसीही विश्वासी भी कई बार वैसा ही करते हैं - दूसरों के पालन के लिए नियम बनाते हैं, और दूसरों को बाध्य करते हैं कि वे कुछ ऐसी बातों और व्यवहार पर चलें जिनके बारे में बाइबल या तो कुछ कहती ही नहीं है अथवा उनकी बात से अलग ही कहती है। उनके बनाए ऐसे नियम और व्यवहार लोगों के लिए ठोकर का कारण बनते हैं, मसीही विश्वासियों के जीवनों में कठिनाई लाते हैं तथा दूसरों को मसीह यीशु के पास आने में बाधा बनते हैं।

   प्रभु यीशु ने यह स्पष्ट सिखाया, और बाइबल में भी स्पष्ट लिखा गया है कि उद्धार केवल प्रभु के अनुग्रह से ही है, ना कि किसी परिवार में जन्म लेने अथवा कुछ कर्मों के द्वारा (गलतियों 2:16); पापों की क्षमा प्राप्त करने और उद्धार पाने के लिए प्रत्येक जन को व्यक्तिगत रीति और स्वेच्छा से प्रभु यीशु की मृत्यु और पुनरुत्थान तथा प्रभु यीशु पर विश्वास करना है। इसके विप्रीत बहुत से लोग इस साधारण मसीही विश्वास को धर्म-कर्म और विधि-विधानों के साथ जोड़ देते हैं, जो प्रभु यीशु तथा बाइबल की शिक्षाओं से बिलकुल मेल नहीं खाता है।

   आईए इस नए वर्ष में हम प्रभु यीशु के आगमन के सुसमाचार को लोगों के साथ बाँटने का और उनके आगे प्रभु के निकट आने या प्रभु के साथ साधारण विश्वास का जीवन बिताने में कोई भी अड़चन या बाधा या ठोकर का कारण ना रखने का संकल्प ले कर चलें। - जूली ऐकरमैन लिंक


विश्वास पहले वह हाथ है जो परमेश्वर के वरदान को ग्रहण करता है, फिर वह पाँव है जो परमेश्वर के साथ चलता है

तौभी यह जानकर कि मनुष्य व्यवस्था के कामों से नहीं, पर केवल यीशु मसीह पर विश्वास करने के द्वारा धर्मी ठहरता है, हम ने आप भी मसीह यीशु पर विश्वास किया, कि हम व्यवस्था के कामों से नहीं पर मसीह पर विश्वास करने से धर्मी ठहरें; इसलिये कि व्यवस्था के कामों से कोई प्राणी धर्मी न ठहरेगा। - गलतियों 2:16

बाइबल पाठ: रोमियों 14:1-13
Romans 14:1 जो विश्वास में निर्बल है, उसे अपनी संगति में ले लो; परन्तु उसी शंकाओं पर विवाद करने के लिये नहीं। 
Romans 14:2 क्योंकि एक को विश्वास है, कि सब कुछ खाना उचित है, परन्तु जो विश्वास में निर्बल है, वह साग पात ही खाता है। 
Romans 14:3 और खानेवाला न-खाने वाले को तुच्छ न जाने, और न-खानेवाला खाने वाले पर दोष न लगाए; क्योंकि परमेश्वर ने उसे ग्रहण किया है। 
Romans 14:4 तू कौन है जो दूसरे के सेवक पर दोष लगाता है? उसका स्थिर रहना या गिर जाना उसके स्वामी ही से सम्बन्ध रखता है, वरन वह स्थिर ही कर दिया जाएगा; क्योंकि प्रभु उसे स्थिर रख सकता है। 
Romans 14:5 कोई तो एक दिन को दूसरे से बढ़कर जानता है, और कोई सब दिन एक सा जानता है: हर एक अपने ही मन में निश्चय कर ले। 
Romans 14:6 जो किसी दिन को मानता है, वह प्रभु के लिये मानता है: जो खाता है, वह प्रभु के लिये खाता है, क्योंकि वह परमेश्वर का धन्यवाद करता है, और जा नहीं खाता, वह प्रभु के लिये नहीं खाता और परमेश्वर का धन्यवाद करता है। 
Romans 14:7 क्योंकि हम में से न तो कोई अपने लिये जीता है, और न कोई अपने लिये मरता है। 
Romans 14:8 क्योंकि यदि हम जीवित हैं, तो प्रभु के लिये जीवित हैं; और यदि मरते हैं, तो प्रभु के लिये मरते हैं; सो हम जीएं या मरें, हम प्रभु ही के हैं। 
Romans 14:9 क्योंकि मसीह इसी लिये मरा और जी भी उठा कि वह मरे हुओं और जीवतों, दोनों का प्रभु हो। 
Romans 14:10 तू अपने भाई पर क्यों दोष लगाता है? या तू फिर क्यों अपने भाई को तुच्छ जानता है? हम सब के सब परमेश्वर के न्याय सिंहासन के साम्हने खड़े होंगे। 
Romans 14:11 क्योंकि लिखा है, कि प्रभु कहता है, मेरे जीवन की सौगन्ध कि हर एक घुटना मेरे साम्हने टिकेगा, और हर एक जीभ परमेश्वर को अंगीकार करेगी। 
Romans 14:12 सो हम में से हर एक परमेश्वर को अपना अपना लेखा देगा।
Romans 14:13 सो आगे को हम एक दूसरे पर दोष न लगाएं पर तुम यही ठान लो कि कोई अपने भाई के साम्हने ठेस या ठोकर खाने का कारण न रखे। 

एक साल में बाइबल: 
  • निर्गमन 31-33
  • मत्ती 22:1-22


गुरुवार, 28 जनवरी 2016

बाधाएं तथा असुविधाएं


   बाधाएं कोई नई बात नहीं हैं; हमारा शायद ही कोई दिन पूर्णतयः पूर्वनियोजित रीति से निकल पाता होगा। जीवन असुविधाओं से भरा रहता है; हमारी योजनाएं हमारे नियंत्रण से बाहर बातों के द्वारा प्रभावित तथा कुंठित होती रहती हैं। ऐसा करने वाली बाधाओं और असुविधाओं की सूचि लंबी और बदलती रहने वाली है - बीमारी, संघर्ष और विरोध, यातायात में अटकना या फंसना, उपकरणों का ठीक काम ना करना, व्यवहार में अशिष्टता, सुस्ती और टालना, अधीरता, अयोग्यता या अक्षमता आदि जैसे अनेकों कारण हमारी योजनाओं पर पानी फेरते रहते हैं, उन्हें बदलते या बिगाड़ते रहते हैं।

   लेकिन इन असुविधाओं और बाधाओं का एक दूसरा पक्ष भी है जिसे अकसर हम नहीं देख पाते हैं। हमारा विचार होता है कि हमें निराश और हताश करने, हमारे जीवन को कठिन बनाने और हमारी योजनाओं को व्यर्थ करने के इलावा इन बाधाओं और असुविधाओं का कोई अन्य उद्देश्य नहीं है। किंतु ये बाधाएं और असुविधाएं हमें किसी अनजाने और अनदेखे खतरे से बचा कर रखने का परमेश्वर का तरीका, या फिर हमारे द्वारा दूसरों के प्रति परमेश्वर के समान अनुग्रह और क्षमा को प्रदर्शित करने अवसर भी हो सकती हैं। ये परिस्थितियाँ परमेश्वर द्वारा हमारी अपनी आशा और योजना से कुछ बेहतर के आरंभ करने का, या फिर विपरीत परिस्थितियों के प्रति हमारे प्रत्युत्तर और हमारी भावनाओं को हमारे समक्ष लाने का माध्यम भी हो सकती हैं जिससे हम अपना आंकलन कर सकें और समय रहते अपने आपको सुधार सकें। इन बाधाओं और असुविधाओं का कारण चाहे जो भी हो, चाहे हम परमेश्वर की बातों और उद्देश्यों ना भी समझने पाएं, तो भी हम मसीही विश्वासी इस बात पर भरोसा रख सकते हैं, उसे लेकर निश्चिंत रह सकते हैं कि सभी बातों के द्वारा परमेश्वर हमारा भला कर रहा है (रोमियों 8:28), हमें हमारा उद्धारकर्ता प्रभु यीशु की समानता में ढालता जा रहा है और हमारे द्वारा अपने स्वर्गीय राज्य का प्रचार और प्रसार कर रहा है।

   यह कहना कि संपूर्ण इतिहास में परमेश्वर के अनुयायी बाधाओं तथा असुविधाओं में रहे हैं कोई अतिश्योक्ति नहीं है; लेकिन परमेश्वर के उन अनुयायियों के जीवन इस बात के भी गवाह हैं कि इन सब बातों के द्वारा परमेश्वर के बड़े उद्देश्यों की पूर्ति और उसकी महिमा उनके जीवन से हुई है। यह जानते और समझते हुए, हमें बाधाओं तथा असुविधाओं के लिए भी परमेश्वर के धन्यवादी होना चाहिए, इस विश्वास के साथ कि वह हमें समय के सदुपयोग का अवसर दे रहा है (इफिसियों 5:16, 20)। - जूली ऐकैअरमैन लिंक


हमारे साथ जो होता है वह इतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना वह जो परमेश्वर हम में और हमारे द्वारा कर रहा है।

और हम जानते हैं, कि जो लोग परमेश्वर से प्रेम रखते हैं, उन के लिये सब बातें मिलकर भलाई ही को उत्पन्न करती है; अर्थात उन्हीं के लिये जो उस की इच्छा के अनुसार बुलाए हुए हैं। - रोमियों 8:28

बाइबल पाठ: इफिसियों 5:15-21
Ephesians 5:15 इसलिये ध्यान से देखो, कि कैसी चाल चलते हो; निर्बुद्धियों की नाईं नहीं पर बुद्धिमानों की नाईं चलो। 
Ephesians 5:16 और अवसर को बहुमूल्य समझो, क्योंकि दिन बुरे हैं। 
Ephesians 5:17 इस कारण निर्बुद्धि न हो, पर ध्यान से समझो, कि प्रभु की इच्छा क्या है? 
Ephesians 5:18 और दाखरस से मतवाले न बनो, क्योंकि इस से लुचपन होता है, पर आत्मा से परिपूर्ण होते जाओ। 
Ephesians 5:19 और आपस में भजन और स्‍तुतिगान और आत्मिक गीत गाया करो, और अपने अपने मन में प्रभु के साम्हने गाते और कीर्तन करते रहो। 
Ephesians 5:20 और सदा सब बातों के लिये हमारे प्रभु यीशु मसीह के नाम से परमेश्वर पिता का धन्यवाद करते रहो। 
Ephesians 5:21 और मसीह के भय से एक दूसरे के आधीन रहो।

एक साल में बाइबल: 
  • निर्गमन 19-20
  • मत्ती 18:21-35


शनिवार, 17 अक्टूबर 2015

बाधा


   कुछ समय पहले की बात है मैंने अपने पड़ौसी के घर की ओर से एक चिड़िया की परेशान चहचहाने की आवाज़ सुनी। मैंने देखा कि चिड़िया का घोंसला और उसमें उसके बच्चे एक ऐसे स्थान पर थे जिसके आगे परदा आ गया था और वह चिड़िया अपने बच्चों को भोजन करा पाने में असमर्थ, परेशान चहचहाती हुई इधर-उधर उड़ रही थी, बच्चों तक पहुँचने का मार्ग खोज रही थी। मैंने अपने पड़ौसियों को स्थिति से अवगत कराया और उन्होंने वह घोंसला और उन बच्चों को एक अन्य खुले किंतु सुरक्षित स्थान पर रख दिया।

   प्रेम के बीच में बाधा डालने वाली बात से बढ़कर हृदयविदारक शायद ही कोई बात होगी। इस्त्राएल हज़ारों साल से अपने मुक्तिदाता मसीहा की बाट जोह रहा था, परन्तु जब वह वाचा किया हुआ मुक्तिदाता प्रभु यीशु अपने लोगों के पास आया, तो उन्होंने उसका और उसके प्रेम का तिरिस्कार कर दिया। प्रभु यीशु ने उनके उसे तिरिस्कृत करने, उसे ग्रहण ना करने को दर्शाने के लिए मुर्गी और उसके बच्चों का उदाहरण लिया: "हे यरूशलेम, हे यरूशलेम; तू जो भविष्यद्वक्ताओं को मार डालता है, और जो तेरे पास भेजे गए, उन्हें पत्थरवाह करता है, कितनी ही बार मैं ने चाहा कि जैसे मुर्गी अपने बच्‍चों को अपने पंखों के नीचे इकट्ठे करती है, वैसे ही मैं भी तेरे बालकों को इकट्ठे कर लूं, परन्तु तुम ने न चाहा" (मत्ती 23:37)।

   हमारे पाप हमारे और परमेश्वर के बीच में आनी वाली बाधा हैं: "परन्तु तुम्हारे अधर्म के कामों ने तुम को तुम्हारे परमेश्वर से अलग कर दिया है, और तुम्हारे पापों के कारण उस का मुँह तुम से ऐसा छिपा है कि वह नहीं सुनता" (यशायाह 59:2)। परमेश्वर हम सब से प्रेम करता है और चाहता है कि प्रभु यीशु में सेंत-मेंत उपलब्ध पापों से मुक्ति पाकर सब उसके पास आ जाएं: "क्योंकि परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम रखा कि उसने अपना एकलौता पुत्र दे दिया, ताकि जो कोई उस पर विश्वास करे, वह नाश न हो, परन्तु अनन्त जीवन पाए" (यूहन्ना 3:16)। परमेश्वर के साथ हमारे संबंध में हमारे पाप बाधा बनते हैं, परन्तु कलवरी के क्रूस पर अपने बलिदान और पुनरुत्थान के द्वारा प्रभु यीशु ने उस बाधा को हटाने का कार्य पूरा कर दिया है (रोमियों 5:8-17; 8:11)।

   अब परमेश्वर हमारे साथ संगति रखने और हमें आशीषित करने को लालायित रहता है, हमारी प्रतीक्षा में रहता है। वह चाहता है कि हम उसके इस उपहार को स्वीकार करें और उसके साथ अनन्त जीवन में प्रवेश कर लें। - डेनिस फिशर


अपने क्रूस के द्वारा प्रभु यीशु पाप के दण्ड से बचाता है, शैतान के हाथों से छुड़ाता है, परमेश्वर के साथ मेल-मिलाप कराता है।

वह अपने घर आया और उसके अपनों ने उसे ग्रहण नहीं किया। परन्तु जितनों ने उसे ग्रहण किया, उसने उन्हें परमेश्वर के सन्तान होने का अधिकार दिया, अर्थात उन्हें जो उसके नाम पर विश्वास रखते हैं। वे न तो लोहू से, न शरीर की इच्छा से, न मनुष्य की इच्छा से, परन्तु परमेश्वर से उत्पन्न हुए हैं। - यूहन्ना 1:11-13

बाइबल पाठ: मत्ती 23:37-39
Matthew 23:37 हे यरूशलेम, हे यरूशलेम; तू जो भविष्यद्वक्ताओं को मार डालता है, और जो तेरे पास भेजे गए, उन्हें पत्थरवाह करता है, कितनी ही बार मैं ने चाहा कि जैसे मुर्गी अपने बच्‍चों को अपने पंखों के नीचे इकट्ठे करती है, वैसे ही मैं भी तेरे बालकों को इकट्ठे कर लूं, परन्तु तुम ने न चाहा। 
Matthew 23:38 देखो, तुम्हारा घर तुम्हारे लिये उजाड़ छोड़ा जाता है। 
Matthew 23:39 क्योंकि मैं तुम से कहता हूं, कि अब से जब तक तुम न कहोगे, कि धन्य है वह, जो प्रभु के नाम से आता है, तब तक तुम मुझे फिर कभी न देखोगे।

एक साल में बाइबल: 
  • यशायाह 50-52
  • 1 थिस्सलुनीकियों 5


शुक्रवार, 30 जनवरी 2015

बाधाएं



   मैंने कुछ लोगों को इस रवैये के साथ कार्य करते देखा है कि यदि उन्हें कोई ऐसा विचार आता है जो उनकी दृष्टि में अच्छा है, या कोई ऐसा अवसर दिखाई देता है जो उन्हें लाभप्रद प्रतीत होता है तो वे उसे पूरा करने के लिए कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं, उस की पूर्ति के लिए अपने सारे साधन लगा देते हैं, और यदि उस पूर्ति में कोई बाधा आए तो उन्हें फिर चाहे बाधा के ऊपर होकर जाना पड़े या फिर उसके नीचे से, चाहे बाधा में होकर जाना पड़े या बाधा के इर्द-गिर्द घूम कर, लेकिन उस पूर्ति के लिए वह बाधा को हर रीति से पार करने के लिए तैयार रहते हैं। उनकी यह निष्ठा अच्छी तो प्रतीत होती है, लेकिन आवश्यक नहीं कि यह बात हमेशा सही ही हो; और इस बात को प्रमाणित करने के लिए मैं बिलाम नामक एक आदमी तथा उसके गदहे को आपके सामने रखना चाहता हूँ।

   परमेश्वर के वचन बाइबल में बिलाम नाम के एक व्यक्ति का उल्लेख आता है जो पहली नज़र में परमेश्वर का आज्ञाकारी भक्त दिखाई देता है, लेकिन वास्तव में परमेश्वर के नाम से अपनी ही लालसाओं और लालचों के आधीन कार्य करने वाला था। जब परमेश्वर इस्त्राएल को मिस्त्र के दासत्व से निकाल कर कनान देश में बसाने के लिए ले कर जा रहा था, तो मार्ग के एक स्थान के राजा ने उन इस्त्राएलियों का नाश करने के लिए बिलाम की सहायता माँगी, और बिलाम को इसके प्रतिफल में अच्छा ईनाम देने का वायदा किया। बिलाम ने परमेश्वर से इस बात के लिए आज्ञा माँगी लेकिन परमेश्वर ने उसे मना कर दिया। तब राजा ने बिलाम को और भी अधिक ईनाम का लालच दिया, और बिलाम फिर से परमेश्वर से इस्त्राएल के विरुद्ध हाथ बढ़ाने की अनुमति माँगने लगा। क्योंकि परमेश्वर बिलाम के हृदय की दशा जानता था, इसलिए उसने बिलाम को आज्ञा तो दे दी लेकिन कुछ सख्त शर्तें साथ जोड़ दीं, लेकिन फिर भी परमेश्वर बिलाम से प्रसन्न नहीं था। इसलिए जब बिलाम इस्त्राएल को श्राप देने के लिए अपने गदहे पर बैठा जा रहा था तो मार्ग में एक बहुत संकरे स्थान पर परमेश्वर ने अपने एक दूत को खड़ा कर दिया जिससे बिलाम का आगे बढ़ना रुक जाए; बिलाम उस दूत को नहीं देख पा रहा था लेकिन वह उसके गदहे को दिखाई दे रहा था और वह जानवर उस दूत को देख कर वहीं रुक गया। बिलाम के बहुत प्रयास करने पर भी जब वह गदहा आगे नहीं बढ़ा तो बिलाम गदहे पर बहुत क्रोधित हुआ और उसे पीटा भी। तब परमेश्वर का दूत उस पर प्रगट हुआ और बिलाम को अपनी गलती का एहसास हुआ।

   बिलाम के साथ हुई यह घटना हमें सिखाती है कि ज़रूरी नहीं कि प्रत्येक बाधा से पार निकलने का प्रयास किया जाए; कभी कभी परमेश्वर हमारे मार्ग अवरुद्ध करता है ताकि हम कुछ मूर्खतापूर्ण या अनुचित ना कर बैठें। इसलिए जब हमारी कुछ योजनाएं पूरी नहीं हो पा रही हों, कुछ प्रयास बारंबार विफल हो रहे हों तो हमें यही नहीं मान लेना चाहिए कि शैतान हमारे रास्ते में बाधा डाल रहा है। हो सकता है कि परमेश्वर ही वह बाधा डाल रहा हो जिससे हम किसी नुकसान में पड़ने से बच जाएं। इसलिए बाधा में भी परमेश्वर की इच्छा जानने और फिर उस इच्छा के अनुसार कार्य करने की प्रवृति रखना लाभप्रद है। - जूली ऐकरमैन लिंक


परमेश्वर हर समय अपने बच्चों की रखवाली तथा रक्षा करता रहता है; तब भी जब उन्हें आभास भी नहीं होता कि उन्हें उसकी आवश्यकता है।

और मैं तुझे तेरे लोगों से और अन्यजातियों से बचाता रहूंगा, जिन के पास मैं अब तुझे इसलिये भेजता हूं। कि तू उन की आंखे खोले, कि वे अंधकार से ज्योति की ओर, और शैतान के अधिकार से परमेश्वर की ओर फिरें; कि पापों की क्षमा, और उन लोगों के साथ जो मुझ पर विश्वास करने से पवित्र किए गए हैं, मीरास पाएं। - प्रेरितों 26:17-18

बाइबल पाठ: गिनती 22:10-34
Numbers 22:10 बिलाम ने परमेश्वर से कहा सिप्पोर के पुत्र मोआब के राजा बालाक ने मेरे पास यह कहला भेजा है, 
Numbers 22:11 कि सुन, जो दल मिस्र से निकल आया है उस से भूमि ढंप गई है; इसलिये आकर मेरे लिये उन्हें शाप दे; सम्भव है कि मैं उनसे लड़कर उन को बरबस निकाल सकूंगा। 
Numbers 22:12 परमेश्वर ने बिलाम से कहा, तू इनके संग मत जा; उन लोगों को शाप मत दे, क्योंकि  वे आशीष के भागी हो चुके हैं। 
Numbers 22:13 भोर को बिलाम ने उठ कर बालाक के हाकिमों से कहा, तुम अपने देश को चले जाओ; क्योंकि यहोवा मुझे तुम्हारे साथ जाने की आज्ञा नहीं देता। 
Numbers 22:14 तब मोआबी हाकिम चले गए और बालाक के पास जा कर कहा, कि बिलाम ने हमारे साथ आने से ना किया है। 
Numbers 22:15 इस पर बालाक ने फिर और हाकिम भेजे, जो पहिलों से प्रतिष्ठित और गिनती में भी अधिक थे। 
Numbers 22:16 उन्होंने बिलाम के पास आकर कहा, कि सिप्पोर का पुत्र बालाक यों कहता है, कि मेरे पास आने से किसी कारण ना न कर; 
Numbers 22:17 क्योंकि मैं निश्चय तेरी बड़ी प्रतिष्ठा करूंगा, और जो कुछ तू मुझ से कहे वही मैं करूंगा; इसलिये आ, और उन लोगों को मेरे निमित्त शाप दे। 
Numbers 22:18 बिलाम ने बालाक के कर्मचारियों को उत्तर दिया, कि चाहे बालाक अपने घर को सोने चांदी से भरकर मुझे दे दे, तौभी मैं अपने परमेश्वर यहोवा की आज्ञा को पलट नहीं सकता, कि उसे घटाकर वा बढ़ाकर मानूं। 
Numbers 22:19 इसलिये अब तुम लोग आज रात को यहीं टिके रहो, ताकि मैं जान लूं, कि यहोवा मुझ से और क्या कहता है। 
Numbers 22:20 और परमेश्वर ने रात को बिलाम के पास आकर कहा, यदि वे पुरूष तुझे बुलाने आए हैं, तो तू उठ कर उनके संग जा; परन्तु जो बात मैं तुझ से कहूं उसी के अनुसार करना। 
Numbers 22:21 तब बिलाम भोर को उठा, और अपनी गदही पर काठी बान्धकर मोआबी हाकिमों के संग चल पड़ा। 
Numbers 22:22 और उसके जाने के कारण परमेश्वर का कोप भड़क उठा, और यहोवा का दूत उसका विरोध करने के लिये मार्ग रोककर खड़ा हो गया। वह तो अपनी गदही पर सवार हो कर जा रहा था, और उसके संग उसके दो सेवक भी थे। 
Numbers 22:23 और उस गदही को यहोवा का दूत हाथ में नंगी तलवार लिये हुए मार्ग में खड़ा दिखाई पड़ा; तब गदही मार्ग छोड़कर खेत में चली गई; तब बिलाम ने गदही को मारा, कि वह मार्ग पर फिर आ जाए। 
Numbers 22:24 तब यहोवा का दूत दाख की बारियों के बीच की गली में, जिसके दोनों ओर बारी की दीवार थी, खड़ा हुआ। 
Numbers 22:25 यहोवा के दूत को देखकर गदही दीवार से ऐसी सट गई, कि बिलाम का पांव दीवार से दब गया; तब उसने उसको फिर मारा। 
Numbers 22:26 तब यहोवा का दूत आगे बढ़कर एक सकेत स्थान पर खड़ा हुआ, जहां न तो दाहिनी ओर हटने की जगह थी और न बाईं ओर। 
Numbers 22:27 वहां यहोवा के दूत को देखकर गदही बिलाम को लिये दिये बैठ गई; फिर तो बिलाम का कोप भड़क उठा, और उसने गदही को लाठी से मारा। 
Numbers 22:28 तब यहोवा ने गदही का मुंह खोल दिया, और वह बिलाम से कहने लगी, मैं ने तेरा क्या किया है, कि तू ने मुझे तीन बार मारा? 
Numbers 22:29 बिलाम ने गदही से कहा, यह कि तू ने मुझ से नटखटी की। यदि मेरे हाथ में तलवार होती तो मैं तुझे अभी मार डालता। 
Numbers 22:30 गदही ने बिलाम से कहा क्या मैं तेरी वही गदही नहीं जिस पर तू जन्म से आज तक चढ़ता आया है? क्या मैं तुझ से कभी ऐसा करती थी? वह बोला, नहीं। 
Numbers 22:31 तब यहोवा ने बिलाम की आंखे खोलीं, और उसको यहोवा का दूत हाथ में नंगी तलवार लिये हुए मार्ग में खड़ा दिखाई पड़ा; तब वह झुक गया, और मुंह के बल गिरके दण्डवत की। 
Numbers 22:32 यहोवा के दूत ने उस से कहा, तू ने अपनी गदही को तीन बार क्यों मारा? सुन, तेरा विरोध करने को मैं ही आया हूं, इसलिये कि तू मेरे साम्हने उलटी चाल चलता है; 
Numbers 22:33 और यह गदही मुझे देखकर मेरे साम्हने से तीन बार हट गई। जो वह मेरे साम्हने से हट न जाती, तो नि:सन्देह मैं अब तक तुझ को मार ही डालता, परन्तु उसको जीवित छोड़ देता। 
Numbers 22:34 तब बिलाम ने यहोवा के दूत से कहा, मैं ने पाप किया है; मैं नहीं जानता था कि तू मेरा साम्हना करने को मार्ग में खड़ा है। इसलिये अब यदि तुझे बुरा लगता है, तो मैं लौट जाता हूं।

एक साल में बाइबल: 
  • निर्गमन 23-24
  • मत्ती 20:1-16



गुरुवार, 29 जनवरी 2015

लाल फीताशाही


   "लाल फीताशाही" एक वाक्यांश है जो अभिव्यक्त करता है कार्य करने के उस कष्टदायक तरीके को जिसके द्वारा किसी भी प्रकार की नौकरशाही के द्वारा सामन्य व्यक्तियों के लिए किसी कार्य को किए जाने में बाधाएं डाली जाती हैं। इस वाक्यांश का आरंभ हुआ था सरकारी दस्तावेज़ों को लाल फीते से बांधे जाने के कारण, और यह वाक्यांश प्रसिद्ध हुआ स्कॉटलैण्ड के इतिहासकार थौमस कार्लाइल द्वारा सन 1800 के आरंभिक वर्षों में लिखे गए लेखों के कारण, जब वे धीमी गति से कार्य करने वाली सरकारी कार्यविधि का विरोद्ध कर रहे थे। अमेरीकी गृह-युद्ध के पश्चात "लाल-फीताशाही" की समस्या फिर से व्यापक रूप से सामने आई जब युद्ध से सेवा-निवृत हुए लोगों को उनके मिलने वाले लाभ प्राप्त करने के लिए संघर्ष करना पड़ा। आज भी यह वाक्यांश उन निराशाओं और हताशाओं के लिए प्रयोग होता है जो कार्यों की पूर्ति में लगाई जाने वाली बाधाओं के कारण होती हैं; और यह आज के समय में भी कामकाज की विधियों से जुड़ी बातों की एक ऐसी ज्वलंत समस्या है जिसका सामना प्रायः प्रत्येक स्थान पर, प्रत्येक कार्य के लिए किसी ना किसी रूप में सभी जन-साधारण को करना पड़ता रहता है।

   लेकिन इस सृष्टि में एक स्थान है जहाँ यह लाल फीताशाही किसी भी रूप में लेश-मात्र भी विद्यमान नहीं है - परमेश्वर के सिंहासन के सामने। परमेश्वर के वचन बाइबल में प्रेरित पौलुस ने मसीह यीशु के लिए लिखा, "...तो अपने प्रभु यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर के साथ मेल रखें। जिस के द्वारा विश्वास के कारण उस अनुग्रह तक, जिस में हम बने हैं, हमारी पहुंच भी हुई..." (रोमियों 5:1-2)। जब मन दुखी होते हों, या हृदय टूट रहे हों, और आप परमेश्वर के सामने अपने मन की बात रखना चाहते हों तो स्मरण रखें कि उस तक पहुँचने और उससे बात-चीत करने में अब आपके सामने कोई रुकावट नहीं है। मसीह यीशु ने मनुष्यों के समान जीवन व्यतीत करके तथा उनके पापों के लिए अपने प्राणों का बलिदान दे के, सभी मनुष्यों के लिए हियाव के साथ परमेश्वर के सम्मुख पहुँच पाने का मार्ग बना कर दे दिया है (इब्रानियों 4:15-16)।

   इसलिए जब भी आपको परमेश्वर के सामने आने और अपने मन की बात कहने की इच्छा हो, तो निश्चिंत रहें के आपको किसी लाल फीताशाही को पार करने, किसी रस्म, किसी विधि-विधान आदि की पूर्ति की कतई आवश्यकता नहीं है। मसीह यीशु में होकर आपके लिए परमेश्वर के सामने तुरंत प्रस्तुत होने और उसे संबोधित करने का मार्ग तैयार है, देरी केवल आपके निर्णय लेने और कदम बढ़ाने मात्र की है। - बिल क्राउडर


परमेश्वर पिता के सिंहासन तक उसके बच्चों के जाने में कोई बाधा नहीं है।

क्योंकि हमारा ऐसा महायाजक नहीं, जो हमारी निर्बलताओं में हमारे साथ दुखी न हो सके; वरन वह सब बातों में हमारी नाईं परखा तो गया, तौभी निष्‍पाप निकला। इसलिये आओ, हम अनुग्रह के सिंहासन के निकट हियाव बान्‍धकर चलें, कि हम पर दया हो, और वह अनुग्रह पाएं, जो आवश्यकता के समय हमारी सहायता करे। - इब्रानियों 4:15-16

बाइबल पाठ: रोमियों 5:1-8
Romans 5:1 सो जब हम विश्वास से धर्मी ठहरे, तो अपने प्रभु यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर के साथ मेल रखें।
Romans 5:2 जिस के द्वारा विश्वास के कारण उस अनुग्रह तक, जिस में हम बने हैं, हमारी पहुंच भी हुई, और परमेश्वर की महिमा की आशा पर घमण्ड करें। 
Romans 5:3 केवल यही नहीं, वरन हम क्लेशों में भी घमण्ड करें, यही जानकर कि क्लेश से धीरज। 
Romans 5:4 ओर धीरज से खरा निकलना, और खरे निकलने से आशा उत्पन्न होती है। 
Romans 5:5 और आशा से लज्ज़ा नहीं होती, क्योंकि पवित्र आत्मा जो हमें दिया गया है उसके द्वारा परमेश्वर का प्रेम हमारे मन में डाला गया है। 
Romans 5:6 क्योंकि जब हम निर्बल ही थे, तो मसीह ठीक समय पर भक्तिहीनों के लिये मरा। 
Romans 5:7 किसी धर्मी जन के लिये कोई मरे, यह तो र्दुलभ है, परन्तु क्या जाने किसी भले मनुष्य के लिये कोई मरने का भी हियाव करे। 
Romans 5:8 परन्तु परमेश्वर हम पर अपने प्रेम की भलाई इस रीति से प्रगट करता है, कि जब हम पापी ही थे तभी मसीह हमारे लिये मरा।

एक साल में बाइबल: 
  • निर्गमन 21-22
  • मत्ती 19



गुरुवार, 9 जनवरी 2014

बाधा या आशीष?


   यदि आप का जीवन भी मेरे जीवन के समान है तो आप समझ सकते हैं कि पूरे दिन के कार्य को पहले से योजनाबद्ध रखने का क्या तात्पर्य है। मेरा एक कैलेण्डर है जो मुझे सारे दिन में मेरे समय पर कब किस का अधिकार है बताता है - कब किससे कितनी देर के लिए मिलना है, कब क्या करना है, आदि सब उसमें दर्ज रहता है। लेकिन साथ ही अवश्य ही कोई ना कोई बाधा या अनेपक्षित बात मेरे इस योजनाबद्ध दिन को अस्त-व्यस्त कर देती है। अकसर ये बातें और बाधाएं खिसिया देने वाली होती हैं, लेकिन कभी कभी वे उपयोगी और लाभकारी भी हो जाती हैं।

   परमेश्वर का वचन बाइबल हमें दिखाती है कि परमेश्वर द्वारा किए गए अनेक महान कार्य, लोगों के जीवन में ऐसी ’बाधा’ बनकर आए जिसने उनके सामन्य चल रहे जीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया। उदाहरणस्वरूप मरियम के जीवन को ही देखिए। मरियम एक कुँवारी कन्या थी जिसकी मंगनी हो गई थी, इसलिए जब परमेश्वर के स्वर्गदूत ने आकर उसे सन्देश दिया कि वह गर्भवती होगी और पुत्र जनेगी जिसका नाम यीशु रखा जाएगा तो निस्सन्देह उसके सामान्य रूप से चल रहे जीवन के लिए यह बहुत बेचैन करने वाला और चिंता का विषय था (लूका 1:26-31)। इसी प्रकार आरंभिक मसीही विश्वास और विश्वासियों के कट्टर विरोधी उन्मादी शाउल को ही लीजिए, जो और मसीही विश्वासियों को पकड़ कर लाने के लिए दमिश्क की ओर जा रहा था जब उसका सामना प्रभु यीशु मसीह से हुआ (प्रेरितों 9:1-9); इस जीवन परिवर्तन कर देने वाली बाधा ने मसीह यीशु विरोधी उन्मादी शाउल को मसीह यीशु का अडिग विश्वासी प्रेरित पौलुस बना दिया जो मसीही विश्वास की बढ़ोतरी और परमेश्वर के वचन की कई पुस्तकों और पत्रियों के लिखे जाने का कारण हुआ।

   भजनकार हमें स्मरण दिलाता है कि "यहोवा अन्य अन्य जातियों की युक्ति को व्यर्थ कर देता है; वह देश देश के लोगों की कल्पनाओं को निष्फल करता है" (भजन 33:10)। लेकिन फिर भी हम अकसर अपने व्यवस्थित और सामान्य चल रहे जीवन में आई बाधाओं के कारण कुंठित हो जाते हैं, उन बाधाओं के कारण खिसियाते हैं, सन्देह करते हैं, डरते हैं। जब भी ऐसी कोई परिस्थिति आए हमें स्मरण रखना चाहिए कि प्रत्येक मसीही विश्वासी का जीवन परमेश्वर के हाथों में सुरक्षित है और वह हर परिस्थिति में अपने जन के लिए केवल भला ही होने देगा। इसलिए बाधाओं से विचिलित ना हों वरन उन्हें आशीषों के अवसर के रूप में देखें - परमेश्वर हमारी योजना के स्थान पर अपनी भली योजना हमारे जीवन में कार्यान्वित कर रहा है। - जो स्टोवैल


अपने जीवन में आने वाली अगली बाधा से खिसियाएं नहीं वरन उसमें परमेश्वर की योजना ढूँढ कर उसे पूरी करने का प्रयास करें।

मनुष्य के मन में बहुत सी कल्पनाएं होती हैं, परन्तु जो युक्ति यहोवा करता है, वही स्थिर रहती है। - नीतिवचन 19:21

बाइबल पाठ: भजन 33:10-15
Psalms 33:10 यहोवा अन्य अन्य जातियों की युक्ति को व्यर्थ कर देता है; वह देश देश के लोगों की कल्पनाओं को निष्फल करता है। 
Psalms 33:11 यहोवा की युक्ति सर्वदा स्थिर रहेगी, उसके मन की कल्पनाएं पीढ़ी से पीढ़ी तक बनी रहेंगी। 
Psalms 33:12 क्या ही धन्य है वह जाति जिसका परमेश्वर यहोवा है, और वह समाज जिसे उसने अपना निज भाग होने के लिये चुन लिया हो! 
Psalms 33:13 यहोवा स्वर्ग से दृष्टि करता है, वह सब मनुष्यों को निहारता है; 
Psalms 33:14 अपने निवास के स्थान से वह पृथ्वी के सब रहने वालों को देखता है, 
Psalms 33:15 वही जो उन सभों के हृदयों को गढ़ता, और उनके सब कामों का विचार करता है।

एक साल में बाइबल: 

  • उत्पत्ति 27-29


बुधवार, 2 मार्च 2011

उपकारी बन्धन

मेरे बचपन के पसंदीदा कामों में से एक था पतंग उड़ाना। घंटों तक उस कागज़ की बनी ’चिड़िया’ को अपनी उंगली से अटके धागे के साथ अटखेलियां कराने में मुझे बड़ा मज़ा आता। यदि वह पतंग बोल सकती तो शायद कहती, "देखो मैं कैसे मज़े से इतनी ऊँचाई पर उड़ सकती हूँ, आकाश में लहरा सकती हूँ। यह सब उस लड़के के बावजूद जो इस धागे से मुझे बांधकर अपनी उंगली के इशारों से मुझे नचा रहा है, मुझे यह कतई पसंद नहीं है। यदि यह धागा मुझे बांधे हुए न होता तो मैं और भी कितना ऊँचा उड़ जाती, कहां कहां चली जाती।"

कभी कभी पतंग उड़ाते समय मेरा ध्यान बंट जाता और मैं धागे को ढीला छोड़ देता। ढील मिलते ही वह पतंग डगमगाती हुई नीचे की ओर आने लगती और यदि समय रहते मैं उसे न संभालता तो किसी पेड़ में फंस कर फट जाती और कभी उड़ने नहीं पाती। ऐसे में वह घमंडी पतंग क्या कहती? यदि वह सच्ची होती तो उसे मानना पड़ता कि जिस धागे और लड़के को वह रोकने वाले बन्धन समझ रही थी वे ही उसके उड़ सकने और सुरक्षित रहने के वास्तविक कारण थे। उनके नियंत्रण से ही उसका जीवन था, उसकी क्षमता थी, वह उड़ पाती थी।

हमारे मसीही जीवन की उन्नति का एक बड़ा कारण हमारे जीवन में आने वाली कठिनाईयां और बाधाएं हैं। हम इन परीक्षाओं के कारण अक्सर फड़फड़ाते हैं लेकिन यदि परमेश्वर इन्हें हमारे जीवनों से निकल दे तो हमारे जीवन उस ढील मिली पतंग की तरह डगमगाने वाले हो जाएंगे और कमज़ोर होकर कर नीचे की ओर गिरने लगेंगे। याकूब ने कहा "हे मेरे भाइयों, जब तुम नाना प्रकार की परीक्षाओं में पड़ो तो इसे पूरे आनन्‍द की बात समझो, यह जानकर, कि तुम्हारे विश्वास के परखे जाने से धीरज उत्‍पन्न होता है।" - याकूब १:२, ३

ये परीक्षाएं ही वे उपकारी बन्धन हैं जिन से बांध कर और अपनी निगरानी में रखकर परमेश्वर अपने बच्चों को उंचाईयों को छूते हुए देखना चाहता है। - पौल वैन गोर्डर


यदि जीवन मार्ग में परीक्षाओं के रोड़े ना होते तो जीवन मार्ग में सम्भलकर चलना भी नहीं होता।

हे मेरे भाइयों, जब तुम नाना प्रकार की परीक्षाओं में पड़ो तो इसे पूरे आनन्‍द की बात समझो, यह जानकर, कि तुम्हारे विश्वास के परखे जाने से धीरज उत्‍पन्न होता है। - याकूब १:२, ३

बाइबल पाठ: याकूब १:१-१२
परमेश्वर के और प्रभु यीशु मसीह के दास याकूब की ओर से उन बारहों गोत्रों को जो तित्तर बित्तर होकर रहते हैं नमस्‍कार पहुंचे।
हे मेरे भाइयों, जब तुम नाना प्रकार की परीक्षाओं में पड़ो
तो इसे पूरे आनन्‍द की बात समझो, यह जानकर, कि तुम्हारे विश्वास के परखे जाने से धीरज उत्‍पन्न होता है।
पर धीरज को अपना पूरा काम करने दो, कि तुम पूरे और सिद्ध हो जाओ और तुम में किसी बात की घटी न रहे।
पर यदि तुम में से किसी को बुद्धि की घटी हो, तो परमेश्वर से मांगे, जो बिना उलाहना दिए सब को उदारता से देता है और उस को दी जाएगी।
पर विश्वास से मांगे, और कुछ सन्‍देह न करे; क्‍योंकि सन्‍देह करने वाला समुद्र की लहर के समान है जो हवा से बहती और उछलती है।
ऐसा मनुष्य यह न समझे, कि मुझे प्रभु से कुछ मिलेगा।
वह व्यक्ति दुचित्ता है, और अपनी सारी बातों में चंचल है।
दीन भाई अपने ऊंचे पद पर घमण्‍ड करे।
और धनवान अपनी नीच दशा पर: क्‍योंकि वह घास के फूल की नाई जाता रहेगा।
क्‍योंकि सूर्य उदय होते ही कड़ी धूप पड़ती है और घास को सुखा देती है, और उसका फूल फड़ जाता है, और उस की शोभा जाती रहती है; उसी प्रकार धनवान भी अपने मार्ग पर चलते चलते धूल में मिल जाएगा।
धन्य है वह मनुष्य, जो परीक्षा में स्थिर रहता है क्‍योंकि वह खरा निकल कर जीवन का वह मुकुट पाएगा, जिस की प्रतिज्ञा प्रभु ने अपने प्रेम करने वालों को दी है।
एक साल में बाइबल:
  • गिनती २६-२७
  • मरकुस ८:१-२१