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शनिवार, 9 अक्टूबर 2010

आँसुओं के लिये खेद?

मेरी एक सहेली अपने जीवन में एक बड़ा परिवर्तन कर रही थी - ५० वर्ष से जिसके लिये वह कार्य करती रही, उसे छोड़कर अब वह एक नए काम के लिये जा रही थी। अपने सहकर्मियों से विदा लेते समय वह रोती भी जा रही थी और अपने आँसुओं के लिये क्षमा भी मांगती जा रही थी।

अपने आँसुओं के लिये हम कभी कभी खेदित क्यों होते हैं? शायद हम आँसुओं को कमज़ोरी की निशानी और हमारे चरित्र में किसी बात के लिये असहाय होने का सूचक मानते हैं और अपनी कमज़ोरी को लोगों के सामने लाना नहीं चाहते। या, हो सकता हो कि हमें लगता है कि हमारे आँसु दूसरों को दुखी कर रहे हैं इसलिये हम उनसे क्षमा मांगते हैं।

हमें स्मरण रखना चाहिये कि हमारी भावनाएं हमें परमेश्वर द्वारा दी गई हैं, हम उसके स्वरूप में सृजे गए हैं (उत्पत्ति १:२७)। परमेश्वर भी खेदित होता है, दुखी होता है - उत्पत्ति ६:६, ७ में बताया है कि वह अपने लोगों के पापों और उनके कारण जो उसमें और लोगों में विच्छेद आया, उससे वह दुखी और क्रोधित हुआ। देहधारी परमेश्वर, प्रभु यीशु, अपने मित्रों मरियम और मार्था के साथ उनके भाई लाज़र की मृत्यु पर शोकित हुआ, उसकी आत्मा दुखी हुई और इस दुख में वह सबके सामने रोया भी (यूहन्ना ११:२८-४४), किंतु अपने दुख के खुले प्रगटिकरण के लिये उसने किसी से क्षमा नहीं मांगी।

जब अन्ततः हम स्वर्ग पहुंचेंगे, तो वहां कोई दुख, वियोग या दर्द नहीं होगा। परमेश्वर हमारी आँखों से सब आँसु पोंछ डालेगा (प्रकाशितवाक्य २१:४); लेकिन तब तक जो आँसु बहते हैं उनके लिये खेदित होने और क्षमा मांगने की आवश्यक्ता नहीं है। - एनी सेटास


जब मन में सन्देह उठे कि क्या प्रभु यीशु मेरी परवाह करता है, तो उसके आँसुओं को स्मरण करना।

जब यीशु ने उस को और उन यहूदियों को जो उसके साथ आए थे रोते हुए देखा, तो आत्मा में बहुत ही उदास हुआ - यूहन्ना ११:३३


बाइबल पाठ: यूहन्ना ११:३२-४४

जब मरियम वहां पहुंची जहां यीशु था, तो उसे देखते ही उसके पांवों पर गिर के कहा, हे प्रभु, यदि तू यहां होता तो मेरा भाई न मरता।
जब यीशु ने उस को और उन यहूदियों को जो उसके साथ आए थे रोते हुए देखा, तो आत्मा में बहुत ही उदास हुआ, और घबरा कर कहा, तुम ने उसे कहां रखा है?
उन्‍होंने उस से कहा, हे प्रभु, चलकर देख ले।
यीशु के आंसू बहने लगे।
तब यहूदी कहने लगे, देखो, वह उस से कैसी प्रीति रखता था।
परन्‍तु उन में से कितनों ने कहा, क्‍या यह जिस ने अन्‍धे की आंखें खोली, यह भी न कर सका कि यह मनुष्य न मरता?
यीशु मन में फिर बहुत ही उदास होकर कब्र पर आया, वह एक गुफा थी, और एक पत्थर उस पर धरा था।
यीशु ने कहा पत्थर को उठाओ: उस मरे हुए की बहिन मार्था उस से कहने लगी, हे प्रभु, उस में से अब तो र्दुगंध आती है क्‍योंकि उसे मरे चार दिन हो गए।
यीशु ने उस से कहा, क्‍या मैं ने तुझ से न कहा कि यदि तू विश्वास करेगी, तो परमेश्वर की महिमा को देखेगी।
तब उन्‍होंने उस पत्थर को हटाया, फिर यीशु ने आंखें उठाकर कहा, हे पिता, मैं तेरा धन्यवाद करता हूं कि तू ने मेरी सुन ली है।
और मै जानता था, कि तू सदा मेरी सुनता है, परन्‍तु जो भीड़ आस पास खड़ी है, उन के कारण मैं ने यह कहा, जिस से कि वे विश्वास करें, कि तू ने मुझे भेजा है।
यह कहकर उस ने बड़े शब्‍द से पुकारा, कि हे लाजर, निकल आ।
जो मर गया या, वह कफन से हाथ पांव बन्‍धे हुए निकल आया और उसका मुंह अंगोछे से लिपटा हुआ था और यीशु ने उन से कहा, उसे खोलकर जाने दो।

एक साल में बाइबल:
  • यशायाह ३२, ३३
  • कुलुस्सियों १

शुक्रवार, 8 अक्टूबर 2010

प्रभु की बुलाहट

मैं सोचता हूँ कि उस प्रातः झील के किनारे, अवश्य प्रभु के चेलों ने प्रभु के साथ अपने प्रथम अनुभव को पुनःअनुभव किया होगा। यूहन्ना अध्याय २१ में प्रभु और चेलों की एक घटना दी गई है। अपनी परिस्थितियों और हाल की घटनाओं से निराश और विचिलित होकर कुछ चेलों ने प्रभु के पीछे चलने की बजाए, वापस अपने पुराने जिविका कमाने के तरीके पर लौटने का निर्णय किया। वे पहले मछुआरे थे, और अब फिर मछलीयां पकड़ने निकल पड़े। वे सारी रात मेहनत करते रहे पर कुछ भी हाथ न लगा।

भोर के समय झील के किनारे से किसी ने उन से कहा "नाव की दाहिनी ओर जाल डालो, तो पाओगे, तब उन्‍होंने जाल डाला, और अब मछिलयों की बहुतायत के कारण उसे खींच न सके" (यूहन्ना २१:६)। तब उन्होंने पहचान लिया कि बात करने वाल प्रभु यीशु ही था। निसन्देह उनका ध्यान प्रभु यीशु से हुई उनकी पहले की एक मुलाकात की ओर गया होगा; तब भी प्रभु ने रात भर की असफल मेहनत के बाद ऐसे ही मछलियां पकड़ने का आशचर्यकर्म उनके जीवन में किया था, और फिर उन्हें आमंत्रण दिया कि वे अपने जाल और नाव छोड़कर उसके पीछे हो लें (लूका ५:१-११)।

उन चेलों के समान, जब हम प्रभु के साथ के अपने सफर में निराशाओं में घिरने लगते हैं और हमें कुछ मार्ग नहीं सूझ पड़ता, तो स्वाभाविक प्रतिक्रीया होती है कि वापस अपनी पुरानी ज़िन्दगी कि ओर लौट चलें और अपने मार्ग खुद तलाश करें। ऐसे में फिर से प्रभु अपना अनुग्रह और क्षमा लिये हमारे समीप आकर हमें बुलाता है, अपनी विश्वासयोग्यता और अपनी सामर्थ को फिर हमारे सम्मुख लाता है, प्रभु के साथ हमारे पिछले अनुभवों को स्मरण दिलाता है और फिर से हमें उस सेवकाई के लिये जिसके लिये उसने हमें बुलाया था तैयार करके खड़ा करता है।

उसकी बुलाहट, सामर्थ और संगति हमारे साथ सदा बनी रहती है। - जो स्टोवैल


प्रभु यीशु हमें अपने साथ चलने के लिये बुलाता है और जब आवश्यक होता है उस बुलाहट को दोहराता है।

इन
बातों के बाद यीशु ने अपने आप को तिबिरियास झील के किनारे चेलों पर प्रगट किया और इस रीति से प्रगट किया। - यूहन्ना २१:१

बाइबल पाठ: यूहन्ना २१:१-१४

इन बातों के बाद यीशु ने अपने आप को तिबिरियास झील के किनारे चेलों पर प्रगट किया और इस रीति से प्रगट किया।
शमौन पतरस और थोमा जो दिदुमुस कहलाता है, और गलील के काना नगर का नतनएल और जब्‍दी के पुत्र, और उसके चेलों में से दो और जन इकट्ठे थे।
शमौन पतरस ने उन से कहा, मैं मछली पकड़ने जाता हूं: उन्‍होंने उस से कहा, हम भी तेरे साथ चलते हैं: सो वे निकलकर नाव पर चढ़े, परन्‍तु उस रात कुछ न पकड़ा।
भोर होते ही यीशु किनारे पर खड़ा हुआ, तौभी चेलों ने न पहचाना कि यह यीशु है।
तब यीशु ने उन से कहा, हे बालको, क्‍या तुम्हारे पास कुछ खाने को है? उन्‍होंने उत्तर दिया कि नहीं।
उस ने उन से कहा, नाव की दाहिनी ओर जाल डालो, तो पाओगे, तब उन्‍होंने जाल डाला, और अब मछिलयों की बहुतायत के कारण उसे खींच न सके।
इसलिये उस चेले ने जिस से यीशु प्रेम रखता था पतरस से कहा, यह तो प्रभु है: शमौन पतरस ने यह सुनकर कि प्रभु है, कमर में अंगरखा कस लिया, क्‍योंकि वह नंगा था, और झील में कूद पड़ा।
परन्‍तु और चेले डोंगी पर मछिलयों से भरा हुआ जाल खींचते हुए आए, क्‍योंकि वे किनारे से अधिक दूर नहीं, कोई दो सौ हाथ पर थे।
जब किनारे पर उतरे, तो उन्‍होंने कोएले की आग, और उस पर मछली रखी हुई, और रोटी देखी।
यीशु ने उन से कहा, जो मछिलयां तुम ने अभी पकड़ी हैं, उन में से कुछ लाओ।
शमौन पतरस ने डोंगी पर चढ़कर एक सौ तिर्पन बड़ी मछिलयों से भरा हुआ जाल किनारे पर खींचा, और इतनी मछिलयां होने पर भी जाल न फटा।
यीशु ने उन से कहा, कि आओ, भोजन करो और चेलों में से किसी को हियाव न हुआ, कि उस से पूछे, कि तू कौन है?
यीशु आया, और रोटी लेकर उन्‍हें दी, और वैसे ही मछली भी।
यह तीसरी बार है, कि यीशु ने मरे हुओं में से जी उठने के बाद चेलों को दर्शन दिए।

एक साल में बाइबल:
  • यशायाह ३०, ३१
  • फिलिप्पियों ४

गुरुवार, 7 अक्टूबर 2010

आपसी समझ

किसी भी आदमी के लिये अपनी पत्नि से प्रेम रखने का सर्वोत्तम तरीका है उसे समझना। पतरस ने कहा, अनिवार्य है कि "...हे पतियों, तुम भी बुद्धिमानी से पत्‍नियों के साथ जीवन निर्वाह करो..." (१ पतरस ३:७)।

यह सिद्धांत दोनो पक्षों पर लागू होता है। पति भी चाहते हैं कि पत्नियां उन्हें समझें। वास्तव में हम सब ऐसा चाहते हैं, चाहे हम शादीशुदा हों या नहीं। प्रत्येक व्यक्ति चाहता है कि उससे संबंधित लोग उसे भली भांति समझ सकें। हम इस इच्छा के साथ पैदा होते हैं और यह जीवन भर हमारे साथ बनी रहती है।

किसी के लिये हमारा यह कहना कि मैं उसे नहीं समझ पा रहा हूँ, बात टालने का सूचक है। अगर चाहें तो हम दूसरे को समझ सकते हैं और हमें समझना भी है। इसके लिये आवश्यक है उस व्यक्ति के प्रति धैर्य और उसके लिये समय निकालना। जब हम समय लगाकर, धैर्य के साथ दूसरे की सुनने को तैयार हों, बातों को स्पष्ट करने के लिये उससे विनम्रता के साथ बात करने और उसकी बातों को महत्व देने को तैयार हों, तो यह संभव हो सकता है - यह बस इतना ही सरल अथवा कठिन है! कोई भी व्यक्ति किसी दूसरे के हृदय की गहराईयों को पूरी तरह चाहे नहीं समझ पाए, परन्तु उसके बारे में प्रतिदिन कुछ नया ज़रूर सीख सकता है। नीतिवचन के ज्ञानी लेखक ने कहा "जिसके पास बुद्धि है, उसके लिये वह जीवन का सोता है..." (नीतिवचन १६:२२)।

आज ही परमेश्वर से प्रार्थना में मांगें कि वह आपको यह अनुग्रह दे कि आप अपने जीवन से संबंधित लोगों के लिये समय निकल सकें, उनको समझ सकें। - डेविड रोपर


सुनना, समझने के लिये खुला द्वार है।

मनुष्य के मन की युक्ति अथाह तो है, तौभी समझ वाला मनुष्य उसको निकाल लेता है। - नीतिवचन २०:५


बाइबल पाठ: नीतिवचन १६:१६-२२

बुद्धि की प्राप्ति चोखे सोने से क्या ही उत्तम है! और समझ की प्राप्ति चान्दी से अति योग्य है।
बुराई से हटना सीधे लोगों के लिये राजमार्ग है, जो अपने चालचलन की चौकसी करता, वह अपने प्राण की भी रक्षा करता है।
विनाश से पहिले गर्व, और ठोकर खाने से पहले घमण्ड होता है।
घमण्डियों के संग लूट बांट लेने से, दीन लोगों के संग नम्र भाव से रहना उत्तम है।
जो वचन पर मन लगाता, वह कल्याण पाता है, और जो यहोवा पर भरोसा रखता, वह धन्य होता है।
जिसके हृदय में बुद्धि है, वह समझ वाला कहलाता है, और मधुर वाणी के द्वारा ज्ञान बढ़ता है।
जिसके पास बुद्धि है, उसके लिये वह जीवन का सोता है, परन्तु मूढ़ों को शिक्षा देना मूढ़ता ही होती है।

एक साल में बाइबल:
  • यशायाह २८, २९
  • फिलिप्पियों ३

बुधवार, 6 अक्टूबर 2010

चिरस्थाई और उतम भाग

एक सर्वेक्षण में, जो १३९ देशों और २०,००० से अधिक मसिही विश्वासी कार्यकर्ताओं में किया गया, पाया गया कि विश्व भर में, औसतन ४० प्रतिशत मसीही कहते हैं कि वे एक कार्य से दूसरे कार्य के लिये हमेशा या अकसर भागते रहते हैं; और लगभग ६० प्रतिशत मानते हैं कि कार्य की व्यस्तता हमेशा या अकसर उनके जीवन में परमेश्वर के साथ अच्छा संबंध विकिसित करने में बाधा होती है। स्पष्ट है कि जीवन के कार्यों में व्यस्त होना, परमेश्वर के साथ हमारी संगति करने में एक बाधा है।

मार्था के लिये भी कार्यों में व्यस्त होना प्रभु यीशु के साथ संगति करने में बाधा बना। मार्था ने प्रभु यीशु और उसके चेलों को अपने घर में आमंत्रित किया, जब वे आए तो वह उनके पांव धोने, उनके लिए भोजन बनाने, उन्हें आराम से रखने में व्यस्त हो गई। यह सब करना तो आवश्यक था, परन्तु यह सब उसके लिए प्रभु के साथ बैठने और उसकी बात सुनने से अधिक महत्वपूर्ण हो गया, प्रभु के साथ उसकी संगति में आनन्दमग्न होने में बाधा बन गया। इसके विपरीत उसकी बहन मरियम ने प्रभु के चरणों पर बैठकर प्रभु की बात सुनना पसन्द किया और "प्रभु ने उसे उत्तर दिया, मार्था, हे मार्था, तू बहुत बातों के लिये चिन्‍ता करती और घबराती है। परन्‍तु एक बात अवश्य है, और उस उत्तम भाग को मरियम ने चुन लिया है: जो उस से छीना न जाएगा।" (लूका १०:३८-४२)

आज आपका क्या हाल है? क्या आप भी एक कार्य से दूसरे कार्य की भाग-दौड़ में इतने व्यस्त हैं कि आपका ध्यान प्रभु से हट गया है, और उसके साथ संगति का मधुर आनन्द आपके जीवन में नहीं है? यदि ऐसा है तो परमेश्वर से प्रार्थना में मांगें कि वह आपका ध्यान प्रभु यीशु मसीह पर केंद्रित करने और जीवन की व्यस्तता से निकालने में आपकी सहायता करे, जिससे आप प्रभु की संगति और शांत जीवन के आनन्द का वह उत्तम भाग पा सकें, जो आपसे कभी छीना नहीं जा सकता। - मारविन विलियम्स


यदि आप परमेश्वर के लिये उचित समय नहीं निकल पा रहे हैं तो आप वास्तव में अनआवश्यक तौर पर व्यस्त हैं।

पर मार्था सेवा
करते करते घबरा गई - लूका १०:४२

बाइबल पाठ: लूका १०:३८-४२

फिर जब वे जा रहे थे, तो वह एक गांव में गया, और मार्था नाम एक स्त्री ने उसे अपने घर में उतारा।
और मरियम नाम उस की एक बहिन थी, वह प्रभु के पांवों के पास बैठकर उसका वचन सुनती थी।
पर मार्था सेवा करते करते घबरा गई और उसके पास आकर कहने लगी, हे प्रभु, क्‍या तुझे कुछ भी सोच नहीं कि मेरी बहिन ने मुझे सेवा करने के लिये अकेली ही छोड़ दिया है सो उस से कह, कि मेरी सहायता करे।
प्रभु ने उसे उत्तर दिया, मार्था, हे मार्था, तू बहुत बातों के लिये चिन्‍ता करती और घबराती है।
परन्‍तु एक बात अवश्य है, और उस उत्तम भाग को मरियम ने चुन लिया है: जो उस से छीना न जाएगा।

एक साल में बाइबल:
  • यशायाह २६, २७
  • फिलिप्पियों २

मंगलवार, 5 अक्टूबर 2010

मृत्यु के काबिल

१९४० के दशक में कठोर नाट्ज़ी प्रशासन के नियंत्रण द्वारा अपने देश का पतन होते हुए देख सोफी शौल नामक एक जर्मन युवती ठान लिया कि वह देश की दशा सुधारने के लिये कुछ करेगी। वह और उसके भाई और उनके कुछ मित्रों ने मिलकर शांतिपूर्ण ढंग से नाट्ज़ी प्रशासन के सिद्धांतों और योजनाओं का जो वे देश पर थोप रहे थे, विरोध करना आरंभ किया।

सोफी और उसके साथ के लोग बन्दी बना लिये गए और अपने देश में हो रही बुराई के विरुद्ध आवाज़ उठाने के अपराध में उन्हें मृत्यु दण्ड दिया गया। यद्यपि सोफी मरने के लिये उत्सुक्त नहीं थी फिर भी देश की स्थिति को देखते हुए उसने ठान लिया कि कुछ तो करना है, चाहे इसके लिये मरना ही क्यों न पड़े।

सोफी की कहानी हमारे लिये एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाती है - क्या हमारे लिये कुछ ऐसा महत्वपूर्ण है जिसके लिये हम मरने को भी तैयार हों?

जिम इलियट, नेट सैंट, पीट फ्लेमिंग, रौजर युडेरिअन, एड मैक्कुल्ली - पांच जवान व्यक्ति, जिन्होंने अपने घरों, परिवारों और प्रीय जनों को छोड़ दक्षिण अमेरिका के जंगलों में सुसमाचार पहुंचाने की ठान ली, उसके लिये जान का जोखिम उठाया और अपने निर्ण्य को निभाते हुए सुसमाचार के लिये बलिदान हो गए। इलियट के एक लेख से ऐसे बलिदान होने का ठान लेने वालों के मन का अन्दाज़ा होता है; उसने लिखा "जो व्यक्ति, उस चीज़ को जिसे वह कभी अपने पास रख नहीं सकता, दे कर बदले में ऐसी चीज़ कमा लेता है जिसे वह कभी खो नहीं सकता, वह कदापि मूर्ख नहीं है।"

पौलुस प्रेरित ने इस भाव को दूसरे शब्दों में बयान किया - "क्‍योंकि मेरे लिये जीवित रहना मसीह है, और मर जाना लाभ है।" (फिलिप्पियों १:२१)

कुछ बातें हैं जो वास्तव में ज़िन्दगी की कीमत पर भी करने के योग्य हैं, इस जीवन में भी और मरणोपरांत भी, और परमेश्वर की ओर से उनका प्रतिफल अति महान है - "पर तू सब बातों में सावधान रह, दुख उठा, सुसमाचार प्रचार का काम कर और अपनी सेवा को पूरा कर। भविष्य में मेरे लिये धर्म का वह मुकुट रखा हुआ है, जिसे प्रभु, जो धर्मी, और न्यायी है, मुझे उस दिन देगा और मुझे ही नहीं, वरन उन सब को भी, जो उसके प्रगट होने को प्रिय जानते हैं।" ( २ तिमुथियुस ४:५, ८) - बिल क्राउडर


जो इस जीवन में विश्वासयोग्यता के साथ अपना क्रूस उठाकर चलते हैं, वे आते जीवन में प्रभु से जीवन का मुकुट पहनेंगे।

क्‍योंकि मेरे लिये जीवित रहना मसीह है, और मर जाना लाभ है। - फिलिप्पियों १:२१


बाइबल पाठ: फिलिप्पियों १:१९-२६

क्‍योंकि मैं जानता हूं, कि तुम्हारी बिनती के द्वारा, और यीशु मसीह की आत्मा के दान के द्वारा इस का प्रतिफल मेरा उद्धार होगा।
मैं तो यही हादिर्क लालसा और आशा रखता हूं, कि मैं किसी बात में लज्ज़ित न होऊं, पर जैसे मेरे प्रबल साहस के कारण मसीह की बड़ाई मेरी देह के द्वारा सदा होती रही है, वैसा ही अब भी हो, चाहे मैं जीवित रहूं अथवा मर जाऊं।
क्‍योंकि मेरे लिये जीवित रहना मसीह है, और मर जाना लाभ है।
पर यदि शरीर में जीवित रहना ही मेरे काम के लिये लाभदायक है तो मैं नहीं जानता, कि किस को चुनूं।
क्‍योंकि मैं दोनों के बीच अधर में लटका हूं; जी तो चाहता है कि कूच करके मसीह के पास जा रहूं, क्‍योंकि यह बहुत ही अच्‍छा है।
परन्‍तु शरीर में रहना तुम्हारे कारण और भी आवश्यक है।
और इसलिये कि मुझे इस का भरोसा है सो मैं जानता हूं कि मैं जीवित रहूंगा, वरन तुम सब के साथ रहूंगा जिस से तुम विश्वास में दृढ़ होते जाओ और उस में आनन्‍दित रहो।
और जो घमण्‍ड तुम मेरे विषय में करते हो, वह मेरे फिर तुम्हारे पास आने से मसीह यीशु में अधिक बढ़ जाए।

एक साल में बाइबल:
  • यशायाह २३-२५
  • फिलिप्पियों १

सोमवार, 4 अक्टूबर 2010

प्रभु की सेवा में

जब डेव और जॉय म्युलर को परमेश्वर की बुलाहट सुडान देश में मिशनरी बनकर जाने के लिये हुई, तो उन्हें अपने भविष्य का कुछ पता नहीं था। वे बस इतना जानते थे कि गृहयुद्ध से बरबाद हुए उस देश में वे एक अस्पताल बनाने में सहायता करने के लिये जा रहे हैं। उन्हें क्या पता था कि उनका भविष्य बकरियों में है!

सुडान में जब जॉय वहां कि स्त्रियों के बीच में काम करने लगी तो उसने पाया कि बहुत सी स्त्रियां वहां के विनाशकारी गृहयुद्ध के कारण विधवाएं थीं और उनके पास आमदनी का कोई स्त्रोत नहीं था। तब जॉय को एक उपाय सूझा - यदि वह एक गर्भवति बकरी एक विधवा स्त्री को दे तो उसे अपने पोष्ण के लिये दूध भी मिलेगा और आमदनी का स्त्रोत भी। इस कार्यक्रम को जारी रखने के लिये यह ज़रूरी था कि जिसे बकरी मिले, वह उस बकरी का बच्चा जॉय को लौट देगी, उस बकरी से मिलने वाला बाकी सब कुछ उस स्त्री का ही रहेगा। वह बच्चा कुछ समय बाद ऐसे ही किसी दूसरे ज़रूरतमंद परिवार को इसी शर्त के साथ दे दिया जाता। प्रभु यीशु के नाम में प्रेम से दी गई यह भेंट बहुतेरी सुडानी विधवाओं के जीवन को बदलने, और जॉय के लिये उद्धार के सुसमाचार को उनके पास लाने का माध्यम बनीं।

आज आपके पास ऐसे देने के लिये क्या है? अपने किसी पड़ौसी, मित्र या किसी अजनबी को भी आप प्रभु के नाम से क्या दे सकते हैं - अपनी कार में सवारी, उसके लिये कोई काम, उसकी सहायता के लिये अपनी कोई वस्तु?

मसीही विश्वासी होने के नाते दूसरों की आवश्यक्ताओं की चिंता करना हमारी ज़िम्मेदारी है - "पर जिस किसी के पास संसार की संपत्ति हो और वह अपने भाई को कंगाल देखकर उस पर तरस न खाना चाहे, तो उस में परमेश्वर का प्रेम क्‍योंकर बना रह सकता है?" (१ यूहन्ना ३:१७)। प्रेम में होकर किये गए हमारे कार्य दिखाते हैं कि प्रभु यीशु हमारे हृदयों मे निवास करता है, और दुसरों की आवश्यक्ताओं में उनकी सहायता करना हमें उनके साथ सुसमाचार बांटने का अवसर प्रदान करता है। - डेव ब्रैनन


परमेश्वर हमें हमारी आवश्यक्ता की हर चीज़ देता है जिससे हम भी दुसरों की आवश्यक्ताओं में उनकी सहायता करें।

पर जिस किसी के पास संसार की संपत्ति हो और वह अपने भाई को कंगाल देखकर उस पर तरस न खाना चाहे, तो उस में परमेश्वर का प्रेम क्‍योंकर बना रह सकता है? - १ यूहन्ना ३:१७


बाइबल पाठ: १ यूहन्ना ३:१६-२०

हम ने प्रेम इसी से जाना, कि उस ने हमारे लिये अपने प्राण दे दिए, और हमें भी भाइयों के लिये प्राण देना चाहिए।
पर जिस किसी के पास संसार की संपत्ति हो और वह अपने भाई को कंगाल देखकर उस पर तरस न खाना चाहे, तो उस में परमेश्वर का प्रेम क्‍योंकर बना रह सकता है?
हे बालको, हम वचन और जीभ ही से नहीं, पर काम और सत्य के द्वारा भी प्रेम करें।
इसी से हम जानेंगे, कि हम सत्य के हैं, और जिस बात में हमारा मन हमें दोष देगा, उस विषय में हम उसके साम्हने अपने अपने मन को ढाढ़स दे सकेंगे।
क्‍योंकि परमेश्वर हमारे मन से बड़ा है, और सब कुछ जानता है।

एक साल में बाइबल:
  • यशायाह २०-२२
  • इफिसियों ६

रविवार, 3 अक्टूबर 2010

सही समझ

नक्शे बनाने वालों को गोलाकार धरती को सपाट नक्शे पर दिखाने के लिये विकृतियों का सामना करना पड़ता है। क्योंकि इस समस्या का कोई सिद्ध उपाय नहीं है, इसलिये कुछ नक्शों में ग्रीनलैंड औस्ट्रेलिया से बड़ा दिखता है।

मसीही विश्वासियों को भी ऐसे ही कुछ बातों में बिगड़े स्वरूपों का सामना करना पड़ता है। जब हम भौतिक संसार की सीमाओं में बंधे, आत्मिक बातों को समझने का प्रयास करते हैं तो हो सकता है कि हम छोटी बातों को बढ़ा-चढ़ा कर और प्रधान बातों के महत्व को कम आंक कर देखते हों।

नए नियम में बहुत बार लोकप्रीय उपदेशकों की शिक्षाओं को परमेश्वर के वचन की शिक्षा से अधिक महत्व देने की विकृत प्रवृति के बारे में सिखाया गया है। पौलुस प्रेरित ने बताया कि परमेश्वर की "आज्ञा का सारांश यह है, कि शुद्ध मन और अच्‍छे विवेक, और कपट रहित विश्वास से प्रेम उत्‍पन्न हो। इन को छोड़कर कितने लोग फिरकर बकवाद की ओर भटक गए हैं" ( १ तिमुथियुस १:५, ६)। सही उपदेश परमेश्वर के वचन को विकृत नहीं करता और न ही परमेश्वर की मण्डली में फूट डालता है। इसके विपरीत, सही शिक्षा द्वारा विश्वासियों की एकता बढ़ती है और मसीह की देह अर्थात मण्डली की उन्नति होती है, जिससे मण्डली का प्रत्येक सदस्य एक दुसरे की देख रेख करने (१ कुरिन्थियों १२:२५) और संसार में परमेश्वर के कार्य को बढ़ाने में उपयोगी होता है।

परमेश्वर को समझ पाने के सभी मानवीय प्रयास अपर्याप्त हैं और मानवीय समझ के सहारे परमेश्वर को समझना हमारी प्राथमिकताओं को बिगाड़ सकता है, हमें असमंजस में डाल सकता है और हमारी आत्मिक बातों की समझ को टेढ़ा कर सकता है। परमेश्वर के सत्य को विकृत करने से बचने के लिये हमें किसी मनुष्य की समझ पर नहीं वरन परमेश्वर ही पर आधारित रहना चाहिये - "इसलिये कि तुम्हारा विश्वास मनुष्यों के ज्ञान पर नहीं, परन्‍तु परमेश्वर की सामर्थ पर निर्भर हो" (१ कुरिन्थियों २:५)। उसका वायदा है कि "पर यदि तुम में से किसी को बुद्धि की घटी हो, तो परमेश्वर से मांगे, जो बिना उलाहना दिए सब को उदारता से देता है, और उस को दी जाएगी" (याकूब १:५), "मुझ से प्रार्थना कर और मैं तेरी सुनकर तुझे बढ़ी-बड़ी और कठिन बातें बताऊंगा जिन्हें तू अभी नहीं समझता" (यर्मियाह ३३:३)। - जूली ऐकैरमैन लिंक


सही गलत की उचित पहचान करने के लिये हर बात को परमेश्वर के सत्य की ज्योति के सम्मुख लाईये।

इसलिये कि तुम्हारा विश्वास मनुष्यों के ज्ञान पर नहीं, परन्‍तु परमेश्वर की सामर्थ पर निर्भर हो। - १ कुरिन्थियों २:५


बाइबल पाठ: १ कुरिन्थियों २:१-१६

और हे भाइयों, जब मैं परमेश्वर का भेद सुनाता हुआ तुम्हारे पास आया, तो वचन या ज्ञान की उत्तमता के साथ नहीं आया।
क्‍योंकि मैं ने यह ठान लिया था, कि तुम्हारे बीच यीशु मसीह, वरन क्रूस पर चढ़ाए हुए मसीह को छोड़ और किसी बात को न जानूं।
और मैं निर्बलता और भय के साथ, और बहुत थरथरता हुआ तुम्हारे साथ रहा।
और मेरे वचन, और मेरे प्रचार में ज्ञान की लुभाने वाली बातें नहीं, परन्‍तु आत्मा और सामर्थ का प्रमाण था।
इसलिये कि तुम्हारा विश्वास मनुष्यों के ज्ञान पर नहीं, परन्‍तु परमेश्वर की सामर्थ पर निर्भर हो।
फिर भी सिद्ध लोगों में हम ज्ञान सुनाते हैं: परन्‍तु इस संसार का और इस संसार के नाश होने वाले हाकिमों का ज्ञान नहीं।
परन्‍तु हम परमेश्वर का वह गुप्‍त ज्ञान, भेद की रीति पर बताते हैं, जिसे परमेश्वर ने सनातन से हमारी महिमा के लिये ठहराया।
जिसे इस संसार के हाकिमों में से किसी ने नहीं जाना, क्‍योंकि यदि जानते, तो तेजोमय प्रभु को क्रूस पर न चढ़ाते।
परन्‍तु जैसा लिखा है, कि जो आंख ने नहीं देखा, और कान ने नहीं सुना, और जो बातें मनुष्य के चित्त में नहीं चढ़ीं वे ही हैं, जो परमेश्वर ने अपनेके प्रेम रखने वालों के लिये तैयार की हैं।
परन्‍तु परमेश्वर ने उन को अपने आत्मा के द्वारा हम पर प्रगट किया, क्‍योंकि आत्मा सब बातें, वरन परमेश्वर की गूढ़ बातें भी जांचता है।
मनुष्यों में से कौन किसी मनुष्य की बातें जानता, केवल मनुष्य की बातें भी कोई नहीं जानता, केवल परमेवर का आत्मा।
परन्‍तु हम ने संसार की आत्मा नहीं, परन्‍तु वह आत्मा पाया है, जो परमेश्वर की ओर से है, कि हम उन बातों को जानें, जो परमेश्वर ने हमें दी हैं।
जिन को हम मनुष्यों के ज्ञान की सिखाई हुई बातों में नहीं, परन्‍तु आत्मा की सिखाई हुई बातों में, आत्मिक बातें आत्मिक बातों से मिला मिलाकर सुनाते हैं।
परन्तु शारीरिक मनुष्य परमेश्वर के आत्मा की बातें ग्रहण नहीं करता, क्‍योंकि वे उस की दृष्‍टि में मूर्खता की बातें हैं, और न वह उन्‍हें जान सकता है क्‍योंकि उन की जांच आत्मिक रीति से होती है।
आत्मिक जन सब कुछ जांचता है, परन्‍तु वह आप किसी से जांचा नहीं जाता।
क्‍योंकि प्रभु का मन किस ने जाना है, कि उसे सिखलाए परन्‍तु हम में मसीह का मन है।
एक साल में बाइबल:
  • यशायाह १७-१९
  • इफिसियों ५:१७-३३