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बुधवार, 8 अक्टूबर 2014

बाधा


   मेरी बेटी डेब्बी एक छोटी बच्ची थी, उसने बैले नृत्य सीखना आरंभ किया था। उस नृत्य के एक अभ्यास में डेब्बी को लपेट कर रखे हुई व्यायाम करने वाली दरी के ऊपर से कूद कर निकलना था। डेब्बी का पहला प्रयास अच्छा नहीं रहा, वह उस बाधा पर लड़खड़ा कर नीचे गिर गई। गिरते ही पल भर को तो वह भूमि पर स्तब्ध पड़ी रही, और फिर उसने रोना आरंभ कर दिया। मैं एक दम कूद कर उसके पास पहुँचा, उसे उठाया, उससे सांत्वना के शब्द कहे, उसे शान्त करवाया और उसे फिर से प्रयास करने के लिए प्रोत्साहित किया। अब कि बार मैंने उसका हाथ पकड़कर उसके साथ दौड़ लगाई, और तब तक उसके साथ लगा रहा जब तक कि वह उस बाधा पर से सफलतापूर्वक पार नहीं हो गई। उसके बाद डेब्बी उस बाधा से नहीं डरी; लेकिन ऐसा होने तक उसे मेरी सहायता तथा प्रोत्साहन की आवश्यकता बनी हुई थी।

   परमेश्वर के वचन बाइबल में जब प्रेरित पौलुस अपने साथी बरनबास के साथ अपनी पहली सेवकाई की यात्रा पर निकला तो उन्होंने अपने साथ एक जवान, मरकुस को भी ले लिया। यात्रा के समय मरकुस को कुछ कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा और वह पौलुस तथा बरनबास को छोड़कर बीच यात्रा से ही वापस घर लौट गया। बाद में जब पौलुस और बरनाबास अपनी दूसरी सेवकाई यात्रा पर निकलने लगे तो बरनबास ने फिर से मरकुस को एक और अवसर देने के लिए साथ ले चलना चाहा, लेकिन पौलुस ने पहली यात्रा के अनुभव के आधार पर इसका विरोध किया। पौलुस और बरनबास में इस बात को लेकर अनबन इतनी बढ़ी कि बरनबास मरकुस के साथ अलग रास्ते चल दिया और पौलुस एक दूसरे साथी को लेकर अलग दिशा में चल दिया (प्रेरितों 15:36-39)।

   बाइबल हमें यह तो नहीं बताती कि सेवकाई की बाधा को पार करवाने के बरनबास के इस प्रयास को लेकर मरकुस की आरंभिक प्रतिक्रीया और अनुभव कैसे थे, या बरनबास ने उससे क्या कहा और कैसे प्रोत्साहित किया, लेकिन यह स्पष्ट है कि मरकुस ने अपने आप को अब कि बार सेवकाई के लिए योग्य प्रमाणित अवश्य कर दिया और फिर आगे चलकर पौलुस के साथ भी उसके मतभेद दूर हो गए, क्योंकि बाद में पौलुस ने मरकुस के विषय में अपनी एक पत्री में लिखा, "...मरकुस को ले कर चला आ; क्योंकि सेवा के लिये वह मेरे बहुत काम का है" (2 तिमुथियुस 4:11)। साथ ही हम पाते हैं कि बाइबल में दी गई प्रभु यीशु की जीवनियों में से एक मरकुस द्वारा लिखी गई।

   जब हम किसी मसीही विश्वासी को असफलता के साथ संघर्ष करते देखते हैं, तो हमारा प्रतिक्रीया क्या होती है? क्या हम उसे सहायता तथा प्रोत्साहन द्वारा उठा कर सफलता की सीढ़ी चढ़वाते हैं, या आलोचना द्वारा निरुत्साहित करके असफलता में और गहरा धंसने देते हैं? हमारा कर्तव्य और मसीही विश्वास उसे सहायता और प्रोत्साहन प्रदान करने को कहता है। क्या आज आपके ध्यान में कोई ऐसा जन है जिसे कोई बाधा पार करने के लिए आपकी सहायता की आवश्यकता है? - डेनिस फिशर


जब समस्याएं और असफलताएं किसी को निराशा में दबाती हैं, तब सहृदयता और प्रेम उन्हें उठा कर खड़ा करवाते हैं।

हे भाइयों, यदि कोई मनुष्य किसी अपराध में पकड़ा भी जाए, तो तुम जो आत्मिक हो, नम्रता के साथ ऐसे को संभालो, और अपनी भी चौकसी रखो, कि तुम भी परीक्षा में न पड़ो। - गलतियों 6:1

बाइबल पाठ: प्रेरितों 15:36-41
Acts 15:36 कुछ दिन बाद पौलुस ने बरनबास से कहा; कि जिन जिन नगरों में हम ने प्रभु का वचन सुनाया था, आओ, फिर उन में चलकर अपने भाइयों को देखें; कि कैसे हैं। 
Acts 15:37 तब बरनबास ने यूहन्ना को जो मरकुस कहलाता है, साथ लेने का विचार किया। 
Acts 15:38 परन्तु पौलुस ने उसे जो पंफूलिया में उन से अलग हो गया था, और काम पर उन के साथ न गया, साथ ले जाना अच्छा न समझा। 
Acts 15:39 सो ऐसा टंटा हुआ, कि वे एक दूसरे से अलग हो गए: और बरनबास, मरकुस को ले कर जहाज पर कुप्रुस को चला गया। 
Acts 15:40 परन्तु पौलुस ने सीलास को चुन लिया, और भाइयों से परमेश्वर के अनुग्रह पर सौंपा जा कर वहां से चला गया। 
Acts 15:41 और कलीसियाओं को स्थिर करता हुआ, सूरिया और किलिकिया से होते हुआ निकला।

एक साल में बाइबल: 
  • ज़कर्याह 1-2


मंगलवार, 7 अक्टूबर 2014

बुलावा


   कभी कभी फसल देर से तैयार होती है; कभी आप बड़ी आशा से बीज तो बोते हैं किंतु फसल का क्या होगा यह अज्ञात रहता है; और कभी आपके द्वारा बोए गए बीज से फसल ऐसे समय या स्वरूप में आती है जैसी कि आपने कभी कलपना भी नहीं करी होगी।

   हमारी बेटी मेलिस्सा ने परमेश्वर से उद्धार का उपहार छोटी उम्र में ही पा लिया था, लेकिन उसने कभी अपने आप को एक ऐसे महान मसीही विश्वासी के रूप में नहीं देखा था जो लोगों के जीवन बदलने की क्षमता रखता हो। वह तो साधारण सी 17 वर्षीय छात्रा थी जो अपनी पढ़ाई, मित्र-मण्डली, खेल-कूद में रुचि, एक छोटी सी नौकरी आदि के बीच परस्पर तालमेल जमा कर परमेश्वर की इच्छानुसार जीवन जीने का प्रयास कर रही थी। लेकिन अचानक ही सन 2002 में परमेश्वर से उसे बुलावा आ गया और वह इस संसार से कूच करके अपने उद्धा्रकर्ता प्रभु यीशु के पास चली गई। ऐसा होने की कोई चेतावनी नहीं थी, किसी के साथ कोई बिगड़ी हुई बात सुधारने का कोई अवसर नहीं था, ना ही प्रभु यीशु के लिए फलवन्त होने का कोई नया अवसर उसे मिला। बस उसका प्रभु यीशु में विश्वास और उस विश्वास के अनुसार उसका जीवन ही उसके साथ थे, और आज हमारे साथ है।

   मेलिस्सा का सदा यह प्रयास रहा था कि वह ऐसा जीवन जीए जो उसके प्रभु को भावता हुआ हो - और उसका जीवन आज भी प्रभु के लिए फल ला रहा है। अभी हाल ही में मुझे एक ऐसे युवक के बारे में बताया गया जिसने एक खेल शिविर में मेलिस्सा की कहानी सुनी और फलस्वरूप प्रभु यीशु पर विश्वास कर के उसे अपने उद्धारकर्ता के रूप में ग्रहण कर लिया।

   हम सब अपने जीवनों से एक कहानी लिख रहे हैं - ऐसी कहानी जो आज भी दूसरों को प्रभावित कर रही है और हमारे बाद भी करती रहेगी। लेकिन क्या हम परमेश्वर की इच्छानुसार जीवन व्यतीत करने और अपने जीवनों की गवाही द्वारा उसे प्रसन्न रखने, उसे महिमा देने का भी प्रयास कर रहे हैं? हमारा बुलावा कब आ जाएगा, कोई नहीं जानता; इसलिए प्रति दिन उस बुलावे के लिए तैयार रहें, परमेश्वर की इच्छानुसार जीवन व्यतीत करते रहें। - डेव ब्रैनन


परमेश्वर के प्रति विश्वासयोग्य जीवन ही परमेश्वर के लिए फलवन्त जीवन हो सकता है।

उसी प्रकार तुम्हारा उजियाला मनुष्यों के साम्हने चमके कि वे तुम्हारे भले कामों को देखकर तुम्हारे पिता की, जो स्वर्ग में है, बड़ाई करें। - मत्ती 5:16

बाइबल पाठ: यूहन्ना 15:8-17
John 15:8 मेरे पिता की महिमा इसी से होती है, कि तुम बहुत सा फल लाओ, तब ही तुम मेरे चेले ठहरोगे। 
John 15:9 जैसा पिता ने मुझ से प्रेम रखा, वैसा ही मैं ने तुम से प्रेम रखा, मेरे प्रेम में बने रहो। 
John 15:10 यदि तुम मेरी आज्ञाओं को मानोगे, तो मेरे प्रेम में बने रहोगे: जैसा कि मैं ने अपने पिता की आज्ञाओं को माना है, और उसके प्रेम में बना रहता हूं। 
John 15:11 मैं ने ये बातें तुम से इसलिये कही हैं, कि मेरा आनन्द तुम में बना रहे, और तुम्हारा आनन्द पूरा हो जाए। 
John 15:12 मेरी आज्ञा यह है, कि जैसा मैं ने तुम से प्रेम रखा, वैसा ही तुम भी एक दूसरे से प्रेम रखो। 
John 15:13 इस से बड़ा प्रेम किसी का नहीं, कि कोई अपने मित्रों के लिये अपना प्राण दे। 
John 15:14 जो कुछ मैं तुम्हें आज्ञा देता हूं, यदि उसे करो, तो तुम मेरे मित्र हो। 
John 15:15 अब से मैं तुम्हें दास न कहूंगा, क्योंकि दास नहीं जानता, कि उसका स्‍वामी क्या करता है: परन्तु मैं ने तुम्हें मित्र कहा है, क्योंकि मैं ने जो बातें अपने पिता से सुनीं, वे सब तुम्हें बता दीं। 
John 15:16 तुम ने मुझे नहीं चुना परन्तु मैं ने तुम्हें चुना है और तुम्हें ठहराया ताकि तुम जा कर फल लाओ; और तुम्हारा फल बना रहे, कि तुम मेरे नाम से जो कुछ पिता से मांगो, वह तुम्हें दे। 
John 15:17 इन बातें की आज्ञा मैं तुम्हें इसलिये देता हूं, कि तुम एक दूसरे से प्रेम रखो।

एक साल में बाइबल: 
  • हग्गै 1-2


सोमवार, 6 अक्टूबर 2014

शिथिल हाथ


   बचपन में मैं बहुत चंचल स्वभाव का था और कुछ स्थानों पर, जैसे कि चर्च में, मेरे लिए शान्त बैठे रहना बहुत कठिन होता था। चर्च में थोड़ी थोड़ी देर में मेरी माँ को मेरे घुटने दबा कर मुझे शान्त बैठे रहने के लिए कहते रहना पड़ता था। इसलिए जब मेरे सामने परमेश्वर के वचन बाइबल का पद, "चुप हो जाओ, और जान लो, कि मैं ही परमेश्वर हूं" (भजन 46:10) आता था तो मेरी समझ यही रहती थी कि इसका तात्पर्य चंचल या व्याकुल ना होने से है।

   कई वर्ष बाद मुझे मालूम हुआ कि मूल इब्रानी भाषा के जिस शब्द का अनुवाद "शान्त" या "चुप" हो जाना हुआ है उसका वास्तविक अर्थ मेरी धारणा से कहीं अधिक गहरा है; उसका वास्तविक अर्थ है "व्याकुलता छोड़ देना"। वह शब्द बताता है कि अपने हाथ और प्रयास शिथिल छोड़कर, सब कुछ परमेश्वर के हाथों में छोड़ दें, अपनी ओर से उसे कार्य करने दें और उसके कार्य में अपने सुझावों या प्रयासों का व्यवधान ना डालें। इस शब्द का यह चित्रण रोचक है क्योंकि हम अकसर अपने हाथों को ही व्यवधान के लिए प्रयोग करते हैं, चाहे वह किसी वस्तु का सामने से हटाने के लिए हो, या फिर उसे सामने लाने के लिए हो, या अपने बचाव के लिए कुछ बीच में लाने के लिए हो अथवा किसी पर प्रहार करने के लिए हो - हमारे हाथ ही सबसे पहले आगे आते हैं। जब हम अपने हाथों को शिथिल कर के नीचे लटका देते हैं तो हम अपने आप को कमज़ोर तथा असुरक्षित अनुभव करने लगते हैं। इस असुरक्षा और असहाय होने की स्थिति से हम तब ही बच सकते हैं जब हम परमेश्वर पर पूरा-पूरा भरोसा कर के यह स्वीकार कर लें कि, "परमेश्वर हमारा शरणस्थान और बल है, संकट में अति सहज से मिलने वाला सहायक" (पद 1) तथा "सेनाओं का यहोवा हमारे संग है; याकूब का परमेश्वर हमारा ऊंचा गढ़ है" (पद 7); दूसरे शब्दों में, व्याकुल होकर फड़फड़ाने की बजाए परमेश्वर को अपना कार्य अपनी रीति से करने दें और उसके समय की प्रतीक्षा करें।

   जीवन की हर परिस्थिति में हम परमेश्वर पर भरोसा रखने से आने वाली शान्ति का अनुभव कर सकते हैं (यूहन्ना 14:27)। हर परेशानी में परमेश्वर की सामर्थ हम मसीही विश्वासियों के साथ बनी रहती है, हमें बस प्रार्थनापूर्वक और बिना व्याकुल हुए उसके समय और विधि की प्रतीक्षा करनी है, और वह हमारे लिए मार्ग निकालेगा, हमें सुरक्षित रखे हुए उस मार्ग पर लेकर चलता रहेगा जब तक परेशानी से हमारा छुटकारा ना हो जाए। इसलिए अपनी हर परेशानी को परमेश्वर के हाथों में सौंप कर अपने हाथों को शिथिल छोड़ दें, व्याकुल ना हों और परमेश्वर को अपना कार्य अपनी रीति से करने दें; वह जो करेगा सर्वोत्तम करेगा और आपके भले के लिए ही करेगा। आपके शिथिल हाथ ही आपकी सबसे सामर्थी और कारगर सहायता होंगे। - जो स्टोवैल


जब हम अपने हाथ परमेश्वर के हाथों में छोड़ देते हैं, तब वह अपनी शान्ति हमारे मनों में भर देता है।

मैं तुम्हें शान्‍ति दिए जाता हूं, अपनी शान्‍ति तुम्हें देता हूं; जैसे संसार देता है, मैं तुम्हें नहीं देता: तुम्हारा मन न घबराए और न डरे। - यूहन्ना 14:27  

बाइबल पाठ: भजन 46
Psalms 46:1 परमेश्वर हमारा शरणस्थान और बल है, संकट में अति सहज से मिलने वाला सहायक। 
Psalms 46:2 इस कारण हम को कोई भय नहीं चाहे पृथ्वी उलट जाए, और पहाड़ समुद्र के बीच में डाल दिए जाएं; 
Psalms 46:3 चाहे समुद्र गरजे और फेन उठाए, और पहाड़ उसकी बाढ़ से कांप उठें।। 
Psalms 46:4 एक नदी है जिसकी नहरों से परमेश्वर के नगर में अर्थात परमप्रधान के पवित्र निवास भवन में आनन्द होता है। 
Psalms 46:5 परमेश्वर उस नगर के बीच में है, वह कभी टलने का नहीं; पौ फटते ही परमेश्वर उसकी सहायता करता है। 
Psalms 46:6 जाति जाति के लोग झल्ला उठे, राज्य राज्य के लोग डगमगाने लगे; वह बोल उठा, और पृथ्वी पिघल गई। 
Psalms 46:7 सेनाओं का यहोवा हमारे संग है; याकूब का परमेश्वर हमारा ऊंचा गढ़ है।
Psalms 46:8 आओ, यहोवा के महाकर्म देखो, कि उसने पृथ्वी पर कैसा कैसा उजाड़ किया है। 
Psalms 46:9 वह पृथ्वी की छोर तक लड़ाइयों को मिटाता है; वह धनुष को तोड़ता, और भाले को दो टुकड़े कर डालता है, और रथों को आग में झोंक देता है! 
Psalms 46:10 चुप हो जाओ, और जान लो, कि मैं ही परमेश्वर हूं। मैं जातियों में महान हूं, मैं पृथ्वी भर में महान हूं! 
Psalms 46:11 सेनाओं का यहोवा हमारे संग है; याकूब का परमेश्वर हमारा ऊंचा गढ़ है।

एक साल में बाइबल: 
  • सपन्याह 1-3


रविवार, 5 अक्टूबर 2014

प्रभावी से प्रभावहीन


   इंटरनेट पर प्रकाशित होने वाली पत्रिका 24/7 Wall St में एक विचित्र सुची प्रकाशित हुई जिसका शीर्षक था The 100 Least Powerful People in the World (संसार के सबसे कम प्रभाव रखने वाले 100 लोग)। इस सूची में जिनके नाम आए वे कभी व्यवसाय जगत के उच्च अधिकारी, खेल जगत में ख्याति प्राप्त, राजनितिज्ञ और अन्य प्रसिद्धि प्राप्त लोग थे। इन सब लोगों में एक बात सामान्य थी - कभी वे सभी बहुत प्रभावी हुआ करते थे, परन्तु अब उनका प्रभाव जाता रहा था। कुछ तो परिस्थितियों के शिकार हो गए, कुछ ने गलत निर्णय लिए, कुछ नैतिक पतन में चले गए, कुछ लापरवाह हो गए - कारण चाहे भिन्न थे परन्तु परिणाम एक ही था, वे सब अति प्रभावी से प्रभावहीन हो गए।

   परमेश्वर के वचन बाइबल में भी इसी संदर्भ में 1 कुरिन्थियों 10 अध्याय में प्रेरित पौलुस इस्त्राएल के इतिहास से उदाहरण लेकर एक गंभीर उदाहरण प्रस्तुत करता है। जब मूसा उन इस्त्राएलियों को मिस्त्र के दासत्व से निकाल कर परमेश्वर द्वारा वाचा किए हुए कनान देश की ओर लेकर चला, तो उस यात्रा में परमेश्वर की सामर्थ को प्रकट देखने वाले तथा उस की ही सामर्थ से छुड़ाए गए वे लोग बारंबार परमेश्वर से विमुख होने लगे (पद 1-5)। वे मूर्तिपूजा, अनैतिकता एवं व्यभिचार और कुड़कुड़ाने तथा ऐसी ही अनेक बातों में पड़ने से अपने पतन की ओर चल निकले (पद 6-10)। उनके जीवनों के उदाहरण को प्रस्तुत करके पौलुस सभी के लिए यह चेतावनी देता है: "इसलिये जो समझता है, कि मैं स्थिर हूं, वह चौकस रहे; कि कहीं गिर न पड़े" (1 कुरिन्थियों 10:12)। साथ ही में पौलुस सभी मसीही विश्वासियों को यह आश्वासन भी देता है कि परमेश्वर उन्हें कभी उनकी सामर्थ के बाहर किसी परीक्षा में पड़ने नहीं देगा, और हर परीक्षा के साथ बचने का मार्ग भी देगा (पद 13)। 

    हम सब मसीही विश्वासियों को परमेश्वर की ओर से यह सामर्थ दी गई है कि अपने मसीही विश्वास द्वारा अन्य लोगों को मसीह यीशु के लिए प्रभावित करें, उनमें प्रभावी बने। परमेश्वर की यह सामर्थ, मार्गदर्शन और सहायता हमें जीवन की अद्भुत ऊँचाईयों पर ले जा सकती है। लेकिन यदि हम सावधान नहीं रहे और वही गलतियाँ दोहराने लगे जो उन 100 लोगों ने, या उन इस्त्राएलियों ने करीं थीं, तो उनके समान ही हमारा भी प्रभावी से प्रभावहीन हो जाना निश्चित है। यह कितना दुखदायी होगा कि संसार के नश्वर और अल्पकालीन सुख पाने की लालसा में किसी ऐसी परीक्षा में, जिसका सामना करने और जिससे बच निकलने की सामर्थ परमेश्वर ने हमें प्रदान करी हुई है, गिर कर हम अपने अविनाशी तथा अनन्त सुख को क्षतिग्रस्त कर लें। - डेविड मैक्कैसलैंड


परीक्षा आने पर बचने का सबसे उत्तम उपाय है परमेश्वर की शरण में भाग जाना।

इसलिये हे प्रियो तुम लोग पहिले ही से इन बातों को जान कर चौकस रहो, ताकि अधर्मियों के भ्रम में फंस कर अपनी स्थिरता को हाथ से कहीं खो न दो। - 2 पतरस 3:17

बाइबल पाठ: 1 कुरिन्थियों 10:1-13
1 Corinthians 10:1 हे भाइयों, मैं नहीं चाहता, कि तुम इस बात से अज्ञात रहो, कि हमारे सब बाप दादे बादल के नीचे थे, और सब के सब समुद्र के बीच से पार हो गए। 
1 Corinthians 10:2 और सब ने बादल में, और समुद्र में, मूसा का बपितिस्मा लिया। 
1 Corinthians 10:3 और सब ने एक ही आत्मिक भोजन किया। 
1 Corinthians 10:4 और सब ने एक ही आत्मिक जल पीया, क्योंकि वे उस आत्मिक चट्टान से पीते थे, जो उन के साथ-साथ चलती थी; और वह चट्टान मसीह था। 
1 Corinthians 10:5 परन्तु परमेश्वर उन में के बहुतेरों से प्रसन्न न हुआ, इसलिये वे जंगल में ढेर हो गए। 
1 Corinthians 10:6 ये बातें हमारे लिये दृष्‍टान्‍त ठहरी, कि जैसे उन्होंने लालच किया, वैसे हम बुरी वस्‍तुओं का लालच न करें। 
1 Corinthians 10:7 और न तुम मूरत पूजने वाले बनों; जैसे कि उन में से कितने बन गए थे, जैसा लिखा है, कि लोग खाने-पीने बैठे, और खेलने-कूदने उठे। 
1 Corinthians 10:8 और न हम व्यभिचार करें; जैसा उन में से कितनों ने किया: एक दिन में तेईस हजार मर गये । 
1 Corinthians 10:9 और न हम प्रभु को परखें; जैसा उन में से कितनों ने किया, और सांपों के द्वारा नाश किए गए। 
1 Corinthians 10:10 और न कुड़कुड़ाएं, जिस रीति से उन में से कितने कुड़कुड़ाए, और नाश करने वाले के द्वारा नाश किए गए। 
1 Corinthians 10:11 परन्तु यें सब बातें, जो उन पर पड़ी, दृष्‍टान्‍त की रीति पर भी: और वे हमारी चितावनी के लिये जो जगत के अन्‍तिम समय में रहते हैं लिखी गईं हैं। 
1 Corinthians 10:12 इसलिये जो समझता है, कि मैं स्थिर हूं, वह चौकस रहे; कि कहीं गिर न पड़े। 
1 Corinthians 10:13 तुम किसी ऐसी परीक्षा में नहीं पड़े, जो मनुष्य के सहने से बाहर है: और परमेश्वर सच्चा है: वह तुम्हें सामर्थ से बाहर परीक्षा में न पड़ने देगा, वरन परीक्षा के साथ निकास भी करेगा; कि तुम सह सको।

एक साल में बाइबल: 
  • हबक्कुक 1-3


शनिवार, 4 अक्टूबर 2014

सही समय


   कुछ महीने बीत जाने के बाद ही मुझे पता चला कि जिसे मैं एक संयोगात्मक मुलाकात का परिणाम समझे बैठी थी, वास्तव में वह मेरे होने वाले पति के द्वारा सही समय का प्रयोग था। हमारी पहली औपचारिक मुलाकात होने से पहले उन्होंने मुझे चर्च की बॉलकनी से देखा, अन्दाज़ा लगाया कि मैं किस ओर से बाहर निकलूँगी, दौड़ कर दो मंज़िल सीढ़ियाँ नीचे उतरे और मेरे पहुँचने से कुछ सेकेंड पहले ही पहुँच कर दरवाज़ा पकड़ कर खड़े हो गए और फिर बहाने से मुझ से वार्तालाप आरंभ कर लिया। मुझे बाद में ही यह भी पता चला कि जो उस समय मुझे भोजन के लिए बाहर मिलने का एक आकस्मिक निमंत्रण प्रतीत हुआ था, वह भी उनके द्वारा सही समय का प्रयोग था जो उन्होंने बड़े विचार और योजना के साथ मेरे सामने उस "आकस्मिक" रीति से रखा था। उस "सही समय" के प्रयोग से मुलाकातों का सिलसिला बना और बढ़ा और सही समय पर फिर हम पति-पत्नि भी हो गए।

   हम मनुष्यों के लिए सही समय की प्रतीक्षा और उपयोग की अपेक्षा, अधीरता तथा जल्दबाज़ी अधिक सामान्य व्यवहार रहता है। लेकिन परमेश्वर के हमारे लिए विशेष उद्देश्य और योजनाएं रहती हैं, और उसका समय सर्वदा सही समय होता है। जो हमें संयोग लगता है, वह परमेश्वर की योजना और निर्धारण होता है।

   परमेश्वर के वचन बाइबल में हम अनेक उदाहरण पाते हैं जहाँ प्रतीत होने वाला संयोग वास्तव में परमेश्वर द्वारा निर्धारित सही समय पर पूरा हुआ कार्य था; जैसे कि: अब्राहम के सेवक ने अपने स्वामी की आज्ञानुसार सही पुत्रवधु से मिलवाने के लिए परमेश्वर से प्रार्थना करी और उसकी मुलाकात रिबका से हो गई (उत्पत्ति 24); यूसुफ को उसके भाईयों ने दास बनाकर बेच दिया, फिर वह निर्दोष होने पर भी कैदखाने में डाला गया, लेकिन एक समय ऐसा आया जब परमेश्वर ने उसे लाकर मिस्त्र के राजा के सामने खड़ा कर दिया और यूसुफ वहाँ का प्रधानमंत्री और राजा के बाद सबसे अधिक अधिकार रखने वाला बना, और उसकी सलाह तथा कार्य से लाखों लोगों का जीवन अकाल में नाश होने से बचा, उसके अपने उन कुटिल भाईयों का भी (उत्पत्ति 45:5-8; 50:20); मोर्देकै के "क्योंकि जो तू इस समय चुपचाप रहे, तो और किसी न किसी उपाय से यहूदियों का छुटकारा और उद्धार हो जाएगा, परन्तु तू अपने पिता के घराने समेत नाश होगी। फिर क्या जाने तुझे ऐसे ही कठिन समय के लिये राजपद मिल गया हो?" (एस्तेर 4:14) कहने पर एस्तेर रानी ने अपनी जान जोखिम में डालकर राजा के सामने जाना स्वीकार किया और उसके प्रयास से यहूदीयों की जान बच सकी।

   क्या आज आप अपने जीवन में परमेश्वर की योजना की गति को लेकर निराश हैं? क्या आपको लग रहा है कि परमेश्वर ने आपको छोड़ दिया है, आपको भूल गया है या आपकी परवाह नहीं करता है? परमेश्वर पर भरोसा रखिए (भजन 37:3); सही समय पर वह आपके लिए सही कार्य करने के सही दरवाज़े भी खोलेगा और अपनी योजनाओं को आपके जीवन में पूरा भी करेगा, और उसकी योजना से बेहतर आपके लिए और कुछ हो नहीं सकता। - सिंडी हैस कैस्पर


परमेश्वर का समय ही सिद्ध तथा सही समय है - सर्वदा।

यद्यपि तुम लोगों ने मेरे लिये बुराई का विचार किया था; परन्तु परमेश्वर ने उसी बात में भलाई का विचार किया, जिस से वह ऐसा करे, जैसा आज के दिन प्रगट है, कि बहुत से लोगों के प्राण बचे हैं। - उत्पत्ति 50:20 

बाइबल पाठ: भजन 37:3-11
Psalms 37:3 यहोवा पर भरोसा रख, और भला कर; देश में बसा रह, और सच्चाई में मन लगाए रह। 
Psalms 37:4 यहोवा को अपने सुख का मूल जान, और वह तेरे मनोरथों को पूरा करेगा।
Psalms 37:5 अपने मार्ग की चिन्ता यहोवा पर छोड़; और उस पर भरोसा रख, वही पूरा करेगा। 
Psalms 37:6 और वह तेरा धर्म ज्योति की नाईं, और तेरा न्याय दोपहर के उजियाले की नाईं प्रगट करेगा।
Psalms 37:7 यहोवा के साम्हने चुपचाप रह, और धीरज से उसका आसरा रख; उस मनुष्य के कारण न कुढ़, जिसके काम सफल होते हैं, और वह बुरी युक्तियों को निकालता है! 
Psalms 37:8 क्रोध से परे रह, और जलजलाहट को छोड़ दे! मत कुढ़, उस से बुराई ही निकलेगी। 
Psalms 37:9 क्योंकि कुकर्मी लोग काट डाले जाएंगे; और जो यहोवा की बाट जोहते हैं, वही पृथ्वी के अधिकारी होंगे। 
Psalms 37:10 थोड़े दिन के बीतने पर दुष्ट रहेगा ही नहीं; और तू उसके स्थान को भलीं भांति देखने पर भी उसको न पाएगा। 
Psalms 37:11 परन्तु नम्र लोग पृथ्वी के अधिकारी होंगे, और बड़ी शान्ति के कारण आनन्द मनाएंगे।

एक साल में बाइबल: 
  • नहूम 1-3


शुक्रवार, 3 अक्टूबर 2014

कीमत


   जब मैं युवा थी तो मुझे लगता था कि अपने माता-पिता के साथ उनके घर में रहने की मुझे एक बड़ी कीमत देनी पड़ रही है। आज, जब मैं उन बातों के बारे में सोचती हूँ तो अपने पर हँसी आती है कि उस समय मेरा शिकायत करना कितना बचकाना था। ऐसा नहीं है कि मेरे माता-पिता ने मुझ से अपने साथ घर में रहने के लिए कभी एक भी पैसा लिया हो; जिस "कीमत" की मैं बात कर रही हूँ वह थी आज्ञाकारिता। वे तो बस इतना ही चाहते थे कि मैं बस कुछ नियमों का पालन करती रहूँ, जैसे कि अपने पीछे कोई गन्दगी ना छोड़ूँ सब कुछ साफ-सफाई से रखूँ, सब के साथ शालीनता तथा नम्रता से व्यवहार करूँ, नियमित रूप से चर्च जाया करूँ इत्यादि। ये नियम ना तो कठिन थे और ना ही इनके पालन से मेरा कुछ नुकसान होता था, परन्तु फिर भी उनका पालन करना मुझे कठिन लगता था और मुझसे अनाज्ञाकारिता होती रहती थी। कभी-कभी, आवश्यकतानुसार नियम और उनका पालन और कड़ा भी कर दिया जाता था; किन्तु सदा ही मेरे माता-पिता मुझे बस स्मरण दिलाते रहते थे कि ये नियम मेरी भलाई के लिए हैं, मेरी सुरक्षा के लिए हैं, मुझे कोई नुक्सान पहुँचाने के लिए नहीं। ऐसा कभी नहीं हुआ कि कभी किसी अनाज्ञाकारिता के कारण मुझे घर से निकाला गया हो, या मुझे किसी बात से वंचित रखा गया हो। लेकिन आज्ञाकारिता की माँग और नियमों का स्मरण कराना लगा रहता था।

   परमेश्वर के वचन बाइबल में भी हम यही स्थिति परमेश्वर के लोगों के लिए परमेश्वर की ओर से लिए पाते हैं। इस्त्राएली समाज को वाचा किए हुए देश, कनान में बने रहने की भी यही "कीमत" चुकानी थी - आज्ञाकारिता। कनान देश में इस्त्राएल के प्रवेश से पहले जब मूसा ने उन्हें संबोधित किया, तब भी उन्हें यही स्मरण कराया कि उस देश में परमेश्वर की आशीषों में बने रहने का केवल एक ही मार्ग है, उनका परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारी रहना (व्यवस्थाविवरण 30:16)। इससे पहले भी जब इस्त्राएली मिस्त्र की गुलामी से निकलकर कनान की ओर कूच कर रहे थे, तब भी मूसा में होकर परमेश्वर ने उन्हें समझाया था कि, "इन बातों को जिनकी आज्ञा मैं तुझे सुनाता हूं चित्त लगाकर सुन, कि जब तू वह काम करे जो तेरे परमेश्वर यहोवा की दृष्टि में भला और ठीक है, तब तेरा और तेरे बाद तेरे वंश का भी सदा भला होता रहे" (व्यवस्थाविवरण 12:28)।

   कुछ लोगों को लगता है कि बाइबल में पालन करने के लिए बहुत नियम हैं और उनका पालन करना बड़ा कठिन कार्य है; परन्तु स्थिति इससे बिलकुल विपरीत है: "और परमेश्वर का प्रेम यह है, कि हम उस की आज्ञाओं को मानें; और उस की आज्ञाएं कठिन नहीं" (1 यूहन्ना 5:3)। लेकिन साथ ही ऐसी धारणा रखने वालों को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि परमेश्वर ने जो आज्ञाएं हमारे पालन के लिए दी हैं वे हमारी भलाई के लिए और हमें परस्पर शान्ति तथा समृद्धि से रखने के लिए ही हैं।

   परमेश्वर की आज्ञाकारिता, परमेश्वर के परिवार का सदस्य होने तथा उसकी आशीषों के संभागी होने की "कीमत" है; और जो इस "कीमत" को चुकाने के लाभ पहिचान गए हैं, आत्मिक जीवन में परिपक्व हो गए हैं वे अब भली-भांति समझते हैं कि इस आज्ञाकारिता की "कीमत" चुकाने के लिए शिकायत करना कितना बचकाना है। परमेश्वर की आज्ञाकारिता ही परमेश्वर से मिलने वाली हमारी समृद्धि, सुरक्षा तथा सहायता का आधार है। - जूली ऐकैरमैन लिंक


बाइबल जीवन के लिए बोझिल नहीं वरन आनन्दमय जीवन की मार्गदर्शक है।

भला होता कि उनका मन सदैव ऐसा ही बना रहे, कि वे मेरा भय मानते हुए मेरी सब आज्ञाओं पर चलते रहें, जिस से उनकी और उनके वंश की सदैव भलाई होती रहे! - व्यवस्थाविवरण 5:29

बाइबल पाठ: व्यवस्थाविवरण 30:15-20
Deuteronomy 30:15 सुन, आज मैं ने तुझ को जीवन और मरण, हानि और लाभ दिखाया है। 
Deuteronomy 30:16 क्योंकि मैं आज तुझे आज्ञा देता हूं, कि अपने परमेश्वर यहोवा से प्रेम करना, और उसके मार्गों पर चलना, और उसकी आज्ञाओं, विधियों, और नियमों को मानना, जिस से तू जीवित रहे, और बढ़ता जाए, और तेरा परमेश्वर यहोवा उस देश में जिसका अधिकारी होने को तू जा रहा है, तुझे आशीष दे। 
Deuteronomy 30:17 परन्तु यदि तेरा मन भटक जाए, और तू न सुने, और भटककर पराए देवताओं को दण्डवत करे और उनकी उपासना करने लगे, 
Deuteronomy 30:18 तो मैं तुम्हें आज यह चितौनी दिए देता हूं कि तुम नि:सन्देह नष्ट हो जाओगे; और जिस देश का अधिकारी होने के लिये तू यरदन पार जा रहा है, उस देश में तुम बहुत दिनों के लिये रहने न पाओगे। 
Deuteronomy 30:19 मैं आज आकाश और पृथ्वी दोनों को तुम्हारे साम्हने इस बात की साक्षी बनाता हूं, कि मैं ने जीवन और मरण, आशीष और शाप को तुम्हारे आगे रखा है; इसलिये तू जीवन ही को अपना ले, कि तू और तेरा वंश दोनों जीवित रहें; 
Deuteronomy 30:20 इसलिये अपने परमेश्वर यहोवा से प्रेम करो, और उसकी बात मानों, और उस से लिपटे रहो; क्योंकि तेरा जीवन और दीर्घ जीवन यही है, और ऐसा करने से जिस देश को यहोवा ने इब्राहीम, इसहाक, और याकूब, तेरे पूर्वजों को देने की शपथ खाई थी उस देश में तू बसा रहेगा।

एक साल में बाइबल: 
  • मीका 5-7


गुरुवार, 2 अक्टूबर 2014

सन्तुष्ट


   सन्तुष्ट रहना बहुत कठिन है। विश्वास के नायक, प्रेरित पौलुस को भी सन्तुष्ट रहना सीखना पड़ा (फिलिप्पियों 4:11); उसके लिए भी सन्तुष्टि, चरित्र का एक स्वाभाविक गुण नहीं था। पौलुस के द्वारा यह लिखा जाना कि वह हर परिस्थिति में सन्तुष्ट रहता है वास्तव में अचरजपूर्ण है, क्योंकि जब पौलुस ने फिलिप्पियों को अपनी पत्री लिखी, तब वह शासन के प्रति राजद्रोह और विश्वासघात जैसे गंभीर अपराधों के आरोप में जेलखाने में कैद था। उसने अपने न्याय के लिए रोमी साम्राज्य के सर्वोच्च स्थान अर्थात कैसर की अदालत में गुहार लगाई थी, परन्तु क्योंकि उसके पास ना तो कोई वैधानिक सहायक थे और ना ही कोई ऐसा मित्र-जानकार जो उसके लिए ऊँचे पदों पर कार्य करता, इसलिए पौलुस को अपने मुकदमे की सुनवाई के लिए कैदखाने में पड़े पड़े ही प्रतीक्षा करनी पड़ रही थी। ऐसे में पौलुस के लिए अधीर और अप्रसन्न होना बहुत ही स्वाभाविक बात होती, लेकिन इसके विप्रीत इन परिस्थितियों में भी वह फिलिप्पियों के मसीही विश्वासियों को लिखता है कि उसने ऐसे में भी सन्तुष्ट रहना सीख लिया है।

   ऐसा पौलुस ने कैसे सीखा - एक एक कदम कर के, जब तक कि उसने असुविधाजनक परिस्थितियों में भी सन्तुष्ट रहने का पाठ भली भाँति सीख नहीं लिया। पहले उसने सीखा कि जो भी परिस्थिति उसके मार्ग में आए वह उसे स्वीकार करे (पद 12), फिर उसने सीखा कि जो कुछ भी सहायता उसे उसके साथी मसीही विश्वासियों से मिलती है उसके लिए वह धन्यवादी रहे (पद 14-18), और सबसे बड़ी बात जो उसने सीखी वह थी कि हर परिस्थिति में परमेश्वर ही है जो उसकी हर आवश्यकता को पूरी करता है (पद 19)।

   सन्तुष्ट रहना हमारे लिए भी स्वाभाविक गुण नहीं है। हमारे अन्दर पाई जाने वाली परस्पर स्पर्धा करने की प्रवृति हमें दूसरों के साथ तुलना करने, शिकायत करने तथा लालच करने के लिए उकसाती रहती है। हम में से शायद ही कोई होगा जो पौलुस के समान कठिनाईयों में पड़ा हो, इसलिए पौलुस का जीवन हमें सिखाता है कि हम भी उसके समान हर परिस्थिति में परमेश्वर पर भरोसा रखें और सन्तुष्ट रहें। - सी. पी. हिया


सन्तुष्टि का अर्थ प्रत्येक ऐच्छित बात प्राप्त करना नहीं है, वरन हर प्राप्त बात के लिए परमेश्वर का धन्यवादी रहना है।

तुम्हारा स्‍वभाव लोभरिहत हो, और जो तुम्हारे पास है, उसी पर संतोष किया करो; क्योंकि उसने आप ही कहा है, कि मैं तुझे कभी न छोडूंगा, और न कभी तुझे त्यागूंगा। - इब्रानियों 13:5

बाइबल पाठ: फिलिप्पियों 4:10-20
Philippians 4:10 मैं प्रभु में बहुत आनन्‍दित हूं कि अब इतने दिनों के बाद तुम्हारा विचार मेरे विषय में फिर जागृत हुआ है; निश्‍चय तुम्हें आरम्भ में भी इस का विचार था, पर तुम्हें अवसर न मिला। 
Philippians 4:11 यह नहीं कि मैं अपनी घटी के कारण यह कहता हूं; क्योंकि मैं ने यह सीखा है कि जिस दशा में हूं, उसी में सन्‍तोष करूं। 
Philippians 4:12 मैं दीन होना भी जानता हूं और बढ़ना भी जानता हूं: हर एक बात और सब दशाओं में तृप्‍त होना, भूखा रहना, और बढ़ना-घटना सीखा है। 
Philippians 4:13 जो मुझे सामर्थ देता है उस में मैं सब कुछ कर सकता हूं। 
Philippians 4:14 तौभी तुम ने भला किया, कि मेरे क्‍लेश में मेरे सहभागी हुए। 
Philippians 4:15 और हे फिलप्‍पियो, तुम आप भी जानते हो, कि सुसमाचार प्रचार के आरम्भ में जब मैं ने मकिदुनिया से कूच किया तब तुम्हें छोड़ और किसी मण्‍डली ने लेने देने के विषय में मेरी सहयता नहीं की। 
Philippians 4:16 इसी प्रकार जब मैं थिस्सलुनीके में था; तब भी तुम ने मेरी घटी पूरी करने के लिये एक बार क्या वरन दो बार कुछ भेजा था। 
Philippians 4:17 यह नहीं कि मैं दान चाहता हूं परन्तु मैं ऐसा फल चाहता हूं, जो तुम्हारे लाभ के लिये बढ़ता जाए। 
Philippians 4:18 मेरे पास सब कुछ है, वरन बहुतायत से भी है: जो वस्तुएं तुम ने इपफ्रुदीतुस के हाथ से भेजी थीं उन्हें पाकर मैं तृप्‍त हो गया हूं, वह तो सुगन्‍ध और ग्रहण करने के योग्य बलिदान है, जो परमेश्वर को भाता है। 
Philippians 4:19 और मेरा परमेश्वर भी अपने उस धन के अनुसार जो महिमा सहित मसीह यीशु में है तुम्हारी हर एक घटी को पूरी करेगा। 
Philippians 4:20 हमारे परमेश्वर और पिता की महिमा युगानुयुग होती रहे। आमीन।

एक साल में बाइबल: 
  • मीका 1-4