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सोमवार, 23 फ़रवरी 2026

Blessed and Successful Life - 18 - Implications of the Nature of God’s Word - 2 / आशीषित एवं सफल जीवन – 18 - परमेश्वर के वचन के स्वरूप के निहितार्थ - 2

 

आशीषित एवं सफल जीवन – 18 - परमेश्वर के वचन के भण्डारी बनो – 3

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परमेश्वर के वचन के स्वरूप के निहितार्थ - 2

 

परमेश्वर के वचन बाइबल का एक योग्य भण्डारी हो के अपने इस ज़ारी अध्ययन के अन्तर्गत, हमने पिछले लेख में देखा था कि चाहे पुराने नियम के समय में हो अथवा नए नियम के, परमेश्वर का लोगों के साथ वार्तालाप करने का तरीका उसके द्वारा चुने गए कुछ लोगों में होकर करना ही रहा है। उसने नबियों, प्रेरितों, तथा कुछ अन्यों से सीधे बोल कर बातें कीं, उन से दर्शनों और स्वप्नों के द्वारा बातें कीं (इब्रानियों 1:1)। फिर इन लोगों ने परमेश्वर की ओर से, परमेश्वर के सन्देश को, सँसार के लोगों तक पहुँचाया। परमेश्वर पवित्र आत्मा ने इन चुने हुए लोगों को प्रेरित किया और उनसे उन बातों को लिखवाया जो परमेश्वर ने उन से कही थीं (2 तीमुथियुस 3:16-17)। पवित्र आत्मा ही की अगुवाई में इन लेखों को एकत्रित एवं संकलित किया गया, जो अब हमारे हाथों में पूर्ण बाइबल के रूप में है – जो परमेश्वर का अनन्तकालीन, बिना किसी गलती वाला, अटल, अपरिवर्तनीय, सिद्ध और सम्पूर्ण वचन है जो अनन्त काल के लिए स्वर्ग में स्थापित है (भजन 119:89, 160)।


तो, हम बाइबल के इतिहास से देखते हैं कि कुछ डिनॉमिनेशंस द्वारा किए जाने वाले दावों और सामान्य प्रचलित धारणाओं के विपरीत, परमेश्वर ने उन सब से जो उसके नाम से जाने जाते हैं, न तो सीधे बोल कर बातें कीं, और न ही उन सभी को अपने बारे में दर्शन दिए या सभी से स्वप्न में कुछ कहा, वरन केवल कुछ ही लोगों को इसके लिए उपयोग किया। इसलिए वर्तमान में लोगों द्वारा सीधे परमेश्वर से सन्देश, दर्शन, या स्वप्न प्राप्त करने का दावा करना, और वह भी उन बातों के बारे में जो बाइबल में दी ही नहीं गई हैं, अर्थात् परमेश्वर के स्थापित वचन में और बातों को जोड़ना, और फिर योएल 2:28 और उसके जैसे बाइबल के पदों के द्वारा अपने आप को सही ठहराने के तर्क देना, परमेश्वर के वचन का दुरुपयोग करना है, क्योंकि परमेश्वर कभी भी उस वचन के बाहर या अतिरिक्त, जो वह पवित्र शास्त्र में दे चुका है, कभी कुछ नहीं कहेगा या देगा।


यह सम्पूर्ण और संकलित वचन अनन्त काल के लिए स्वर्ग में स्थिर रखा गया है (भजन 119:89); और परमेश्वर ने अपने इसी वचन को अपने बड़े नाम से भी अधिक महत्व दिया है (भजन 138:2)। उसने अपने वचन बाइबल में पहले से ही न केवल जीवन और भक्ति से संबंधित हर बात दे दी है; वरन साथ ही सँसार की सड़ाहट से बचाने तथा ईश्वरीय स्वभाव के संभागी होने का मार्ग भी दे दिया है (2 पतरस 1:3-4)। इसलिए, बाइबल में होकर परमेश्वर ने पहले से ही हमें उसके बारे में सीखने, उसके सम्मुख आने, उसे और उसकी इच्छा को जानने, उससे संपर्क एवं वार्तालाप करने, अपने जीवन और मार्गों का आँकलन करने के माप दण्ड, कि हमारा जीवन हमारे लिए परमेश्वर की इच्छा के अनुसार है कि नहीं, सब कुछ हमें पहले से ही दे दिया है। इसलिए, इसका तात्पर्य यही है कि अब इन बातों के बारे में परमेश्वर को किसी को भी कोई नए संदेश अथवा दर्शन देने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि यह सभी कुछ पहले से ही दे दिया गया है और बाइबल में सभी के लिये उपलब्ध है।

 

किन्तु यदि अब भी परमेश्वर को जीवन और भक्ति से संबंधित तथा संसार की सड़ाहट से बचने और ईश्वरीय स्वभाव के संभागी होने के लिए, किसी को कोई नए संदेश अथवा दर्शन देने पड़ते हैं, तो इसका यही अर्थ हुआ कि परमेश्वर ने जो 2 पतरस 1:3-4 में लिखवाया है वह सही नहीं है – अर्थात् , या तो परमेश्वर ने झूठ बोल, या फिर, परमेश्वर के वचन में गलतियाँ हैं और वह पूर्ण नहीं है, अभी भी उसमें नए दर्शनों और संदेशों के द्वारा और बातें डाले जाने की आवश्यकता है। क्योंकि परमेश्वर कभी झूठ बोल ही नहीं सकता है (गिनती 23:19; 1 शमूएल 15:29; इब्रानियों 6:18), और परमेश्वर का वचन जो प्रभु यीशु मसीह का एक स्वरूप है (यूहन्ना 1:1, 14), न तो गलत हो सकता है और न ही अपूर्ण; इसलिए जो बात गलत है, जिस पर कभी विश्वास नहीं करना चाहिए, न ही कभी उसे स्वीकार करना चाहिए, वह है वे दावे जो यह दर्शन और भविष्यवाणियाँ प्राप्त करने का दिखावा करने वाले प्रचार करते हैं, सिखाते हैं; और अकसर उनके बातें न केवल बाइबल के बाहर की होती हैं, बल्कि शायद ही कभी पूरी भी होती हैं। और परमेश्वर के वचन के साथ यह छेड़-छाड़, उसका दुरुपयोग एवं अनादर करना है, अर्थात्  परमेश्वर का अनादर, उसके साथ दुर्व्यवहार करना है, जिसके बहुत गम्भीर और हानिकारक परिणाम होते हैं (व्यवस्थाविवरण 4:2; 12:32; नीतिवचन 30:6; प्रकाशितवाक्य 22:18-19)।

हम आज के विषय को अगले लेख में भी जारी रखेंगे। लेकिन अभी के लिए, इस बात पर विचार करें कि आप बाइबिल का अध्ययन कैसे कर रहे हैं और उसे अपने जीवन में कैसे लागू कर रहे हैं, तथा उसकी शिक्षाओं को दूसरों के साथ कैसे साझा कर रहे हैं? क्या आप वास्तव में इन बातों में परमेश्वर के वचन के एक सच्चे और विश्वासयोग्य भण्डारी बन रहे हैं? या फिर, क्या आप कुछ संप्रदायों (denominations) की शिक्षाओं, और कुछ पंथों या व्यक्तियों द्वारा प्रचार और प्रसार की जा रही शिक्षाओं में फंसे हुए हैं, और उन्हीं का अनुसरण व प्रसार कर रहे हैं? क्या आप संप्रदायों, पंथों या व्यक्तियों की शिक्षाओं से इतने प्रभावित और सम्मोहित हैं कि उन्हें मानने और उनका अनुसरण करने से पहले, आप परमेश्वर के वचन से सीधे उनकी जाँच करने की सावधानी नहीं बरतते हैं? क्या आप किसी भी उपदेश या शिक्षा को स्वीकार करने से पहले प्रार्थना करते हैं और परमेश्वर से माँगते हैं कि वह आपको सच्चाई दिखाए और आपको असत्य से सुरक्षित रखे? याद रखें, हव्वा को पाप करने के लिए उकसाने से पहले, शैतान ने पहले उसके मन-मस्तिष्क के साथ खेल खेला; उसने उसे वही देखने, सोचने और विश्वास करने के लिए आकर्षित किया जो वह उससे करवाना चाहता था, बजाय उसके जो परमेश्वर ने आदम और हव्वा को पहले ही निर्देशित किया था; और फिर चालाकी से उसे पाप करने की ओर ले गया। 

यही शैतानी रणनीति आज भी उतनी ही प्रभावशीलता के साथ काम कर रही है। यह शैतानी रणनीति हमेशा एक बहुत ही सरल और ऐसे कारण से सफल रही है, जिसे पूरी तरह से रोका जा सकता है, जिससे आसानी से बचा जा सकता है — स्वीकार करने से पहले परमेश्वर से पूछ लेना।  लोग परमेश्वर और उस के वचन के साथ बैठने के लिए और सीधे मूल स्रोत से सच्चाई सीखने के लिये समय नहीं निकालते हैं — जब कि परमेश्वर चाहता है कि हर मसीही करे। आज भी, लोग इस बात की जाँच और पुष्टि करने का कष्ट नहीं करते कि परमेश्वर के मार्गदर्शन में उन्हें परमेश्वर के नाम पर जो परोसा जा रहा है वह ग्रहण योग्य है कि नहीं? इसके बजाय, वे उपदेशों और शिक्षाओं को आँख बंद करके स्वीकार कर लेते हैं, केवल इसलिए क्योंकि वे एक प्रभावशाली, आकर्षक, लोकप्रिय, और प्रत्यक्ष रूप से तर्कसंगत तथा ज्ञानवान स्रोत या व्यक्ति से आ रही हैं। इस प्रकार वे एक भारी और घातक त्रुटि पर विश्वास करने और उसका अनुसरण करने के लिए गुमराह हो जाते हैं (2 कुरिन्थियों 11:3, 13-15), और बिना सच को समझे, अनजाने में ही, वे विनाश की ओर चले जाते हैं।

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। स्वेच्छा से अपने पापों के लिये पश्चाताप करके, प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु, मैं अपने पापों के लिए पश्चातापी हूँ, उनके लिए आप से क्षमा माँगता हूँ। मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मुझे और मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।



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Blessed and Successful Life - 18 - Be Stewards of God’s Word – 3 

English Translation

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Implications of the Nature of God’s Word - 2

 

In our ongoing study of being a worthy steward of God’s Word the Bible, we saw in the previous article, that whether in the times of the Old Testament, or of the New, God’s method of communicating with the world was through His few chosen people, the Prophets, the Apostles, and some others, by speaking to them or through visions and dreams (Hebrews 1:1). These people then, on God’s behalf, conveyed God’s message to the world. God the Holy Spirit inspired these chosen people of God to write down what God communicated to and through them (2 Timothy 3:16-17). These writings were compiled under the guidance of the Holy Spirit to give us what we now have as the complete Bible – God’s eternal, inerrant, infallible, unalterable, perfect and complete Word, forever settled in heaven for all eternity (Psalm 119:89, 160).


So, we see from the history of God’s Word that unlike a popular perception and claim by people of some denominations, God neither spoke with, nor gave visions and dreams about Himself and what He wanted to communicate, to everybody known by His name; but He did so only to a select few; whether in the Old Testament or the New Testament times. Therefore, for people to nowadays claim receiving direct spoken communication, dreams, visions, from God, and that too about things not already mentioned in the Bible, i.e., adding things to the already settled Word of God, and then wanting to justify it on the basis of Joel 2:28 is misusing the Scriptures because God will never speak or say anything outside of what He has already given in the Scriptures.


This completed and compiled Word of God is kept in heaven for all eternity (Psalm 119:89); and God has given more importance to this i.e., His Word, than even to His name (Psalm 138:2). In His Word, The Bible, He has already given to us not only everything that pertains to life and godliness; but also the way to escape the corruptions of the world; and become partakers of the divine nature (2 Peter 1:3-4). Therefore, in the Bible, God has given us a complete package to learn about Him, approach Him, know Him, know His will, communicate with Him, evaluate and measure our life and our ways to check if they are in accordance with what God wants from us. Therefore, the implication is that now there is no need for God to give anyone any fresh or new messages or visions about these things, since they have already been given and made available in the Bible for everyone. 


If still God has to give any new revelations about things pertaining to life and godliness, escaping corruption from the world and being partakers of the divine nature, then that means what was written by God in 2 Peter 1:3-4 was incorrect – God either lied, or, the Word of God is neither correct nor complete, it still needs to be supplemented with fresh revelations. Since God cannot lie (Numbers 23:19; 1 Samuel 15:29; Hebrews 6:18), and God’s Word being a physical form of the Lord Jesus (John 1:1, 14) cannot be incorrect or incomplete, therefore, the only thing that is incorrect, and one that should neither be believed nor accepted, is the claim made by those who show-off, preach, and teach receiving such revelations and prophesies, that usually never come to pass and are often extra-Biblical. So, this tampering with God’s Word, is misusing and insulting God’s Word; i.e., is insulting God and misbehaving with Him, and it also has very serious and very harmful consequences (Deuteronomy 4:2; 12:32; Proverbs 30:6; Revelation 22:18-19).


We will continue with today's topic in the next article as well. But for now, ponder over how you are studying and applying the Bible to your life, and about sharing its teachings with others? Are you actually being a true and faithful steward of God’s Word in these things? Or, are you caught up in some denominational teachings, and teachings being preached and propagated by some sects or some persons, and following them, propagating them? Are you so impressed and obsessed with the teachings of denominations, sects, or persons, that you are not careful to verify them directly from God’s Word, before believing and following them? Are you first praying and asking God to show you the truth, and keep you safe from the untruth, before you accept any preaching or teaching? Remember, before inducing Eve to commit sin, Satan first played with her mind, got her to see, think, and believe what he wanted her to do, instead of what God had already instructed Adam and Eve; and then subtly attracted her to commit sin. 


The same satanic strategy is at work even today, and equally effectively. This satanic strategy has always been very successful for one very simple reason, which is totally and very easily avoidable - ask God about it, before accepting anything. People do not take time to sit with God and His Word to learn the truth from the very source - which God wants every Christian to do always. Even today, people do not bother to examine and verify under God’s guidance what is being fed to them in the name of God. Rather, they blindly accept the preaching and teachings, just because they are coming from an impressive, appealing, popular, seemingly logical and knowledgeable source or person, and thereby get misled into believing and following a gross and fatal error (2 Corinthians 11:3, 13-15), and quite unsuspectingly, they go into damnation.


If you have not yet accepted the discipleship of the Lord, make your decision in favor of the Lord Jesus now to ensure your eternal life and heavenly blessings. Where there is obedience to the Lord, where there is respect and obedience to His Word, there is also the blessing and protection of the Lord. Repenting of your sins, and asking the Lord Jesus for forgiveness of your sins, voluntarily and sincerely, surrendering yourself to Him - is the only way to salvation and heavenly life. You only have to say a short but sincere prayer to the Lord Jesus Christ willingly and with a penitent heart, and at the same time completely commit and submit your life to Him. You can also make this prayer and submission in words something like, “Lord Jesus, I am sorry for my sins and repent of them. I thank you for taking my sins upon yourself, paying for them through your life.  Because of them you died on the cross in my place, were buried, and you rose again from the grave on the third day for my salvation, and today you are the living Lord God and have freely provided to me the forgiveness, and redemption from my sins, through faith in you. Please forgive my sins, take me under your care, and make me your disciple. I submit my life into your hands." Your one prayer from a sincere and committed heart will make your present and future life, in this world and in the hereafter, heavenly and blessed for eternity.


 

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मंगलवार, 12 सितंबर 2023

Blessed and Successful Life / आशीषित एवं सफल जीवन – 17 – Be Stewards of God’s Word / परमेश्वर के वचन के भण्डारी बनो – 3

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बाइबल के स्वरूप के निहितार्थ – 2

 

    हमने पिछले लेख में देखा था कि चाहे पुराने नियम के समय में हो अथवा नए नियम के, परमेश्वर का लोगों के साथ वार्तालाप करने का तरीका उसके द्वारा चुने गए कुछ लोगों में होकर करना ही रहा है। उसने नबियों, प्रेरितों, तथा कुछ अन्यों से सीधे बोल कर बातें कीं, उन से दर्शनों और स्वप्नों के द्वारा बातें कीं। फिर इन लोगों ने परमेश्वर की ओर से, परमेश्वर के सन्देश को, सँसार के लोगों तक पहुँचाया। परमेश्वर पवित्र आत्मा ने इन चुने हुए लोगों को प्रेरित किया और उनसे उन बातों को लिखवाया जो परमेश्वर ने उन से कही थीं। पवित्र आत्मा ही की अगुवाई में इन लेखों को एकत्रित एवं संकलित किया गया, जो अब हमारे हाथों में पूर्ण बाइबल के रूप में है – जो परमेश्वर का अनन्तकालीन, बिना किसी गलती वाला, अटल, अपरिवर्तनीय, सिद्ध और सम्पूर्ण वचन है जो अनन्त काल के लिए स्वर्ग में स्थापित है।


    तो, हम बाइबल के इतिहास से देखते हैं कि कुछ डिनॉमिनेशंस द्वारा किए जाने वाले दावों और सामान्य प्रचलित धारणाओं के विपरीत, परमेश्वर ने उन सब से जो उसके नाम से जाने जाते हैं, न तो सीधे बोल कर बातें कीं, और न ही उन सभी को अपने बारे में दर्शन दिए या सभी से स्वप्न में कुछ कहा, वरन केवल कुछ ही लोगों को इसके लिए उपयोग किया। इसलिए वर्तमान में लोगों द्वारा सीधे परमेश्वर से सन्देश, दर्शन, या स्वप्न प्राप्त करने का दावा करना, और वह भी उन बातों के बारे में जो बाइबल में दी ही नहीं गई हैं, और फिर योएल 2:28 और उसके जैसे बाइबल के पदों के द्वारा अपने आप को सही ठहराने के तर्क देना, परमेश्वर के वचन का दुरुपयोग करना है, क्योंकि परमेश्वर कभी भी उस वचन के बाहर या अतिरिक्त, जो वह पवित्र शास्त्र में दे चुका है, कभी कुछ नहीं कहेगा या देगा।


    यह सम्पूर्ण और संकलित वचन अनन्त काल के लिए स्वर्ग में स्थिर रखा गया है (भजन 119:89); और परमेश्वर ने अपने इसी वचन को अपने बड़े नाम से भी अधिक महत्व दिया है (भजन 138:2)। उसने अपने वचन बाइबल में पहले से ही न केवल जीवन और भक्ति से संबंधित हर बात दे दी है; वरन साथ ही सँसार की सड़ाहट से बचाने तथा ईश्वरीय स्वभाव के संभागी होने का मार्ग भी दे दिया है (2 पतरस 1:3-4)। इसलिए, बाइबल में होकर परमेश्वर ने पहले से ही हमें उसके बारे में सीखने, उसके सम्मुख आने, उसे और उसकी इच्छा को जानने, उससे संपर्क एवं वार्तालाप करने, अपने जीवन और मार्गों का आकलन करने के माप दण्ड, कि हमारा जीवन हमारे लिए परमेश्वर की इच्छा के अनुसार है कि नहीं, सब कुछ हमें पहले से ही दे दिया है। इसलिए, इसका तात्पर्य यही है कि अब इन बातों के बारे में परमेश्वर को किसी को भी कोई नए संदेश अथवा दर्शन देने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि यह सभी कुछ बाइबल में पहले से ही उपलब्ध है। किन्तु यदि अब भी परमेश्वर को जीवन और भक्ति से संबंधित तथा संसार की सड़ाहट से बचने और ईश्वरीय स्वभाव के संभागी होने के लिए, किसी को कोई नए संदेश अथवा दर्शन देने पड़ते हैं, तो इसका यही अर्थ हुआ कि उसने जो 2 पतरस 1:3-4 में लिखवाया है वह सही नहीं है – अर्थात, या तो परमेश्वर ने झूठ बोल, या फिर, परमेश्वर के वचन में गलतियाँ हैं और वह पूर्ण नहीं है, अभी भी उसमें नए दर्शनों और संदेशों के द्वारा और बातें डाले जाने की आवश्यकता है। क्योंकि परमेश्वर कभी झूठ बोल ही नहीं सकता है (गिनती 23:19; 1 शमूएल 15:29; इब्रानियों 6:18), और परमेश्वर का वचन जो प्रभु यीशु मसीह का एक स्वरूप है न तो गलत हो सकता है और न ही अपूर्ण; इसलिए जो बात गलत है, जिस पर कभी विश्वास नहीं करना चाहिए, न ही कभी उसे स्वीकार करना चाहिए, वह है वे दावे जो यह दर्शन और भविष्यवाणियाँ प्राप्त करने का दिखावा करने वाले प्रचार करते हैं, सिखाते हैं; और अकसर उनके बातें न केवल बाइबल के बाहर की होती हैं, बल्कि शायद ही कभी पूरी भी होती हैं। और परमेश्वर के वचन के साथ यह छेड़-छाड़, उसका दुरुपयोग एवं अनादर करना है, अर्थात परमेश्वर का अनादर, उसके साथ दुर्व्यवहार करना है।


    यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु, मैं अपने पापों के लिए पश्चातापी हूँ, उनके लिए आप से क्षमा माँगता हूँ। मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मुझे और मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

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Implications of Nature of The Bible - 2

 

    We saw in the previous article that whether in the times of the Old Testament, or of the New, God’s method of communicating with the world was through His few chosen people, the Prophets, the Apostles, and some others, by speaking to them or through visions and dreams. These people then, on God’s behalf, would convey God’s message to the world. God the Holy Spirit had inspired these chosen people of God write down what God communicated to and through them. These writings were compiled under the guidance of the Holy Spirit to give us what we now have as the complete Bible – God’s eternal, inerrant, infallible, unalterable, perfect and complete Word, forever settled in heaven for all eternity.


    So, we see from the history of God’s Word that unlike a popular perception and claim by people of some denominations, God did neither spoke with, nor gave visions and dreams about Himself and what He wanted to communicate, to everybody known by His name, but only to a select few; whether in the Old Testament or the New Testament times. Therefore, for people to nowadays claim receiving direct spoken communication, dreams, visions, from God, and that too about things not already mentioned in the Bible, and then wanting to justify it on the basis of Joel 2:28 is misusing the Scriptures because God will never speak or say anything outside of what He has already given in the Scriptures.


    This completed and compiled Word of God is kept in heaven for all eternity (Psalm 119:89); and God has given more importance to this His Word, than even to His name (Psalm 138:2). In His Word, The Bible, He has already given to us not only everything that pertains to life and godliness; but also the way to escape the corruptions of the world; and become partakers of the divine nature (2 Peter 1:3-4). Therefore, in the Bible, God has given us a complete package to learn about Him, approach Him, know Him, know His will, communicate with Him, evaluate and measure our life and our ways to check if they are in accordance with what God wants from us. Therefore, the implications is that now there is no need for God to give anyone any fresh or new messages or visions about these things, since they have already been made available in the Bible. If still God has to give any new revelations about things pertaining to life and godliness, escaping corruption from the world and being partakers of the divine nature, then that means what was said by Him in 2 Peter 1:3-4 was incorrect – God either lied, or, the Word of God is neither correct nor complete, it still needs to be supplemented with fresh revelations. Since God cannot lie (Numbers 23:19; 1 Samuel 15:29; Hebrews 6:18), and God’s Word being a physical form of the Lord Jesus cannot be incorrect or incomplete, therefore, the only thing incorrect that should neither be believed nor accepted, is the claim made by those who show-off, preach, and teach receiving such revelations and prophesies, that usually never come to pass and are often extra-Biblical. So, this tampering with God’s Word, is misusing and insulting God’s Word; i.e., is insulting God and maltreating Him.


    If you have not yet accepted the discipleship of the Lord, make your decision in favor of the Lord Jesus now to ensure your eternal life and heavenly blessings. Where there is obedience to the Lord, where there is respect and obedience to His Word, there is also the blessing and protection of the Lord. Repenting of your sins, and asking the Lord Jesus for forgiveness of your sins, voluntarily and sincerely, surrendering yourself to Him - is the only way to salvation and heavenly life. You only have to say a short but sincere prayer to the Lord Jesus Christ willingly and with a penitent heart, and at the same time completely commit and submit your life to Him. You can also make this prayer and submission in words something like, “Lord Jesus, I am sorry for my sins and repent of them. I thank you for taking my sins upon yourself, paying for them through your life.  Because of them you died on the cross in my place, were buried, and you rose again from the grave on the third day for my salvation, and today you are the living Lord God and have freely provided to me the forgiveness, and redemption from my sins, through faith in you. Please forgive my sins, take me under your care, and make me your disciple. I submit my life into your hands." Your one prayer from a sincere and committed heart will make your present and future life, in this world and in the hereafter, heavenly and blessed for eternity.

 

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बुधवार, 10 फ़रवरी 2021

प्रकाश

 

          काम के सिलसिले में मुझे और मेरे एक सहकर्मी को 250 मील की यात्रा पर जाना पड़ा था, और जब तक हम वापस घर की ओर लौटने लगे, तो दिन ढलने लग गया था। वृद्धावस्था और उससे धुंधलाती आँखों के कारण मैं रात के समय गाड़ी चलाना पसंद नहीं करता हूँ, इसलिए मैंने अपने मित्र से कहा कि पहले वह आराम कर ले, और मैं गाड़ी चलाऊँगा, और फिर बाद में मैं आराम करूँगा और वह गाड़ी चला लेगा। मैंने गाड़ी के स्टीयरिंग को कस कर पकड़ा, और धुंधलाती रौश्नी में ध्यान से देखते हुए, कम प्रकाश वाली सड़क पर गाड़ी चलाने लग गया। गाड़ी चलाते हुए मैंने ध्यान किया कि जब पीछे से आती किसी गाड़ी की लाइटें मेरे सामने की सड़क पर पड़ने लगती थीं तो मुझे सड़क और बेहतर दिखने लगती थी। मुझे तब बहुत राहत मिली जब मेरे मित्र ने गाड़ी चलाने के लिए मुझ से ली, और मुझे आराम करने के लिए कहा। जब वह गाड़ी चलाने लगा, तब उसे मालूम पड़ा कि मैं इतनी देर से गाड़ी की मुख्य बड़ी लाईट जलाकर नहीं, वरन छोटी लाईट जलाकर, जो धुंध के समय प्रयोग करने के लिए होती हैं, चल रहा था। जैसे ही उसने गाड़ी की मुख्य बड़ी लाइटें जलाईं, सामने की सड़क साफ़ दिखाई देने लगी!

          परमेश्वर के वचन बाइबल में भजन 119 का लेखक यह अच्छे से समझता था कि परमेश्वर का वचन हमें हमारे प्रतिदिन के कार्य के लिए आवश्यक प्रकाश और मार्गदर्शन प्रदान करता है (पद 105)। लेकिन फिर भी हम कितनी ही बार अपने आप को वैसी ही असुविधाजनक स्थितियों में पाते हैं, जैसे उस दिन मैं गाड़ी चलाते समय था। क्योंकि हम परमेश्वर के वचन के प्रकाश का सही उपयोग नहीं करते हैं, इसलिए हम कितनी ही बार या तो स्पष्ट देख नहीं पाते हैं, या फिर कई बार मार्ग से भी भटक जाते हैं। भजन 119 हमें प्रोत्साहित करता है कि हम जीवन के मार्गों पर परमेश्वर के वचन के प्रकाश का सही उपयोग करें, उससे अपने मार्गों को प्रकाशित रखें। जब हम ऐसा करते हैं, तब क्या होता है? हमें पवित्रता में बने रहने के लिए समझ मिलती रहती है (पद 9-11); हमें इधर-उधर भटकने की बजाए सही मार्ग पर चलते रहने के लिए प्रेरणा और प्रोत्साहन मिलता है (पद 101-102)। और जब हम उस वचन के प्रकाश से अपने जीवन और जीवन-पथ को प्रकाशमान रखते हैं, तो भजनकार के समान हम भी कहने पाते हैं,अहा! मैं तेरी व्यवस्था से कैसी प्रीति रखता हूं! दिन भर मेरा ध्यान उसी पर लगा रहता है” (भजन 119:97)। - आर्थर जैक्सन

 

परमेश्वर के वचन की ज्योति में चलने वाले कभी भटकेंगे नहीं।


तेरी बातों के खुलने से प्रकाश होता है; उस से भोले लोग समझ प्राप्त करते हैं। - भजन 119:130

बाइबल पाठ:  भजन 119:9-16; 97-105

भजन 119:9 जवान अपनी चाल को किस उपाय से शुद्ध रखे? तेरे वचन के अनुसार सावधान रहने से।

भजन 119:10 मैं पूरे मन से तेरी खोज में लगा हूं; मुझे तेरी आज्ञाओं की बाट से भटकने न दे!

भजन 119:11 मैं ने तेरे वचन को अपने हृदय में रख छोड़ा है, कि तेरे विरुद्ध पाप न करूं।

भजन 119:12 हे यहोवा, तू धन्य है; मुझे अपनी विधियां सिखा!

भजन 119:13 तेरे सब कहे हुए नियमों का वर्णन, मैं ने अपने मुंह से किया है।

भजन 119:14 मैं तेरी चितौनियों के मार्ग से, मानो सब प्रकार के धन से हर्षित हुआ हूं।

भजन 119:15 मैं तेरे उपदेशों पर ध्यान करूंगा, और तेरे मार्गों की ओर दृष्टि रखूंगा।

भजन 119:16 मैं तेरी विधियों से सुख पाऊंगा; और तेरे वचन को न भूलूंगा।

भजन 119:97 अहा! मैं तेरी व्यवस्था से कैसी प्रीति रखता हूं! दिन भर मेरा ध्यान उसी पर लगा रहता है।

भजन 119:98 तू अपनी आज्ञाओं के द्वारा मुझे अपने शत्रुओं से अधिक बुद्धिमान करता है, क्योंकि वे सदा मेरे मन में रहती हैं।

भजन 119:99 मैं अपने सब शिक्षकों से भी अधिक समझ रखता हूं, क्योंकि मेरा ध्यान तेरी चितौनियों पर लगा है।

भजन 119:100 मैं पुरनियों से भी समझदार हूं, क्योंकि मैं तेरे उपदेशों को पकड़े हुए हूं।

भजन 119:101 मैं ने अपने पांवों को हर एक बुरे रास्ते से रोक रखा है, जिस से मैं तेरे वचन के अनुसार चलूं।

भजन 119:102 मैं तेरे नियमों से नहीं हटा, क्योंकि तू ही ने मुझे शिक्षा दी है।

भजन 119:103 तेरे वचन मुझ को कैसे मीठे लगते हैं, वे मेरे मुंह में मधु से भी मीठे हैं!

भजन 119:104 तेरे उपदेशों के कारण मैं समझदार हो जाता हूं, इसलिये मैं सब मिथ्या मार्गों से बैर रखता हूं।

भजन 119:105 तेरा वचन मेरे पांव के लिये दीपक, और मेरे मार्ग के लिये उजियाला है।

 

एक साल में बाइबल: 

  • लैव्यव्यवस्था 8-10 
  • मत्ती 25:31-46

शनिवार, 8 अगस्त 2020

प्रेम


    नबील कुरेशी ने अपना पारिवारिक धर्म छोड़कर प्रभु यीशु में विश्वास किया, और पुस्तकें लिखीं जिससे उसके पाठक उन लोगों के बारे में समझ सकें जो उस धर्म को मानते हैं, जिसे छोड़कर वह प्रभु यीशु के पास आया है। नबील के लिखने का भाव सदा सम्मानजनक रहा है और वह अपने लोगों के प्रति प्रेम को व्यक्त करता है। नबील ने अपनी एक पुस्तक अपनी बहन को समर्पित की है, जो अभी तक मसीह यीशु में विश्वास नहीं ला सकी है। उसके इस समर्पण के शब्द थोड़े किन्तु प्रबल हैं; उसने लिखा, “मैं परमेश्वर से उस दिन के लिए प्रार्थना कर रहा हूँ जब हम साथ मिलकर उसकी आराधना कर सकेंगे।”

    हम परमेश्वर के वचन बाइबल में पौलुस द्वारा रोम में स्थित मसीही विश्वासियों को लिखे गए उसके पत्र में ऐसे ही प्रेम का आभास पाते हैं। पौलुस ने लिखा, कि मुझे बड़ा शोक है, और मेरा मन सदा दुखता रहता है, क्योंकि मैं यहाँ तक चाहता था कि अपने भाइयों के लिये जो शरीर के भाव से मेरे कुटुम्बी हैं, स्वयं ही मसीह से शापित हो जाता” (रोमियों 9:2-3)।

    पौलुस को अपने यहूदी लोगों से इतना प्रेम था कि यदि उसके परमेश्वर से दूर जाने से वे परमेश्वर के निकट आते और मसीह यीशु को स्वीकार कर लेते तो वह यह करने के लिए भी तैयार था। वह इस गंभीरता को समझता था कि प्रभु यीशु का तिरस्कार करने के द्वारा, उसके लोग उस एकमात्र सच्चे परमेश्वर का तिरस्कार कर रहे थे। यही उसकी वह प्रेरणा थी जिसके अंतर्गत उसने अपने पाठकों से यीशु के सुसमाचार को सभी के साथ बाँटने का आग्रह किया (10:14-15)।

    आज हम भी अपने आप को प्रार्थना पूर्वक ऐसे प्रेम व्यवहार को समर्पित करें जो हमारे निकट जनों के उद्धार के लिए चिंतित रहता है। - टिम गुस्ताफासन

 

हमें उनसे प्रेम करना है जिनके लिए मसीह मरा, और उनसे भी जिनमें वह जीवित है।

हे भाइयो, मेरे मन की अभिलाषा और उनके लिये परमेश्‍वर से मेरी प्रार्थना है कि वे उद्धार पाएँ। - रोमियों 10:1

बाइबल पाठ: रोमियों 9:1-5

रोमियों 9:1 मैं मसीह में सच कहता हूँ, मैं झूठ नहीं बोल रहा और मेरा विवेक भी पवित्र आत्मा में गवाही देता है

रोमियों 9:2 कि मुझे बड़ा शोक है, और मेरा मन सदा दुखता रहता है,

रोमियों 9:3 क्योंकि मैं यहाँ तक चाहता था कि अपने भाइयों के लिये जो शरीर के भाव से मेरे कुटुम्बी हैं, स्वयं ही मसीह से शापित हो जाता।

रोमियों 9:4 वे इस्राएली हैं, और लेपालकपन का अधिकार और महिमा और वाचाएँ और व्यवस्था और उपासना और प्रतिज्ञाएँ उन्हीं की हैं। 

रोमियों 9:5 पुरखे भी उन्हीं के हैं, और मसीह भी शरीर के भाव से उन्हीं में से हुआ जो सब के ऊपर परम परमेश्‍वर, युगानुयुग धन्य है। आमीन।

 

एक साल में बाइबल: 

  • भजन 74-76
  • रोमियों 9:16-33


बुधवार, 7 अगस्त 2019

सेवा



      मैं अपनी बहन के यहाँ उन लोगों से मिलने गई थी; वहाँ मेरे भानजों ने मुझे अपना नया “कार्य-आँकलन” करने का इलेक्ट्रौनिक यंत्र – ‘कोरोपोली’ बोर्ड्स (तख्तियाँ) दिखाया। वे रंगीन बोर्ड्स थे जिनकी सहायता से उनके दवा किए गए कार्यों का हिसाब रखा जाता था। यदि कोई कार्य समय से या भली-भांति कर दिया जाता तो वे बच्चे हरे बटन को दबा कर अपने “जेब-खर्च” में अंक जोड़ सकते थे। किन्तु यदि कोई गलती करते, जैसे कि घर के पीछे का दरवाज़ा खुला छोड़ देना, तो उनके “जेब-खर्च” में से कुछ अंक कम हो जाते थे। जितने अधिक अंक एकत्रित होते थे, उतना ही अच्छा प्रतिफल, जैसे कि कंप्यूटर पर समय बिताना, उनको मिलता था। इससे अब मेरे वे भांजे अपने कार्यों को भली-भांति करने तथा दरवाज़े को बन्द रखने के लिए बहुत प्रेरित रहते हैं।

      उनकी इस प्रणाली को देखकर मैंने मजाक में कहा कि काश मेरे पास भी ऐसा उत्साहित करने वाली कोई प्रणाली होती। परन्तु परमेश्वर ने हमें उत्साहित और प्रेरित करने के लिए कुछ दिया है। हमें बस आज्ञाकारिता का जीवन जीने का आदेश मात्र देने के स्थान पर प्रभु यीशु ने हमें प्रतिज्ञा दी है कि उसका अनुसरण करने वालों को बहुतायत का जीवन मिलेगा (यूहन्ना 10:10), चाहे उसका अनुसरण करना लगन और सच्चा समर्पण माँगता है। उसके राज्य में जीवन जीने का प्रतिफल कीमत से “सौ गुना” प्राप्त करना है (मरकुस 10:29-30)।

      हम आनन्दित हो सकते हैं कि हमारा परमेश्वर एक उदार परमेश्वर पिता है, जो हमें वह प्रतिफल नहीं देता जिसके हम योग्य हैं। वह हमारे सबसे दुर्बल प्रयासों को भी स्वीकार करता है, अपने राज्य में देर से आने वालों का भी वैसी ही स्वागत करता है जैसे के उसने पहले आने वालों का किया था (मत्ती 20:1-16)। यह हमें आनन्द के साथ उसकी सेवा करने के लिए प्रेरित करता है। - मोनिका ब्रैंड्स


प्रभु यीशु का अनुसरण करना समृद्ध एवं संतोषजनक जीवन का मार्ग है।

यहोवा सभों के लिये भला है, और उसकी दया उसकी सारी सृष्टि पर है। भजन 145:9

बाइबल पाठ: मरकुस 10:28-31; यूहन्ना 10:9-10
Mark 10:28 पतरस उस से कहने लगा, कि देख, हम तो सब कुछ छोड़कर तेरे पीछे हो लिये हैं।
Mark 10:29 यीशु ने कहा, मैं तुम से सच कहता हूं, कि ऐसा कोई नहीं, जिसने मेरे और सुसमाचार के लिये घर या भाइयों या बहिनों या माता या पिता या लड़के-बालों या खेतों को छोड़ दिया हो।
Mark 10:30 और अब इस समय सौ गुणा न पाए, घरों और भाइयों और बहिनों और माताओं और लड़के-बालों और खेतों को पर उपद्रव के साथ और परलोक में अनन्त जीवन।
Mark 10:31 पर बहुतेरे जो पहिले हैं, पिछले होंगे; और जो पिछले हैं, वे पहिले होंगे।
John 10:9 द्वार मैं हूं: यदि कोई मेरे द्वारा भीतर प्रवेश करे तो उद्धार पाएगा और भीतर बाहर आया जाया करेगा और चारा पाएगा।
John 10:10 चोर किसी और काम के लिये नहीं परन्तु केवल चोरी करने और घात करने और नष्‍ट करने को आता है। मैं इसलिये आया कि वे जीवन पाएं, और बहुतायत से पाएं।

एक साल में बाइबल: 
  • भजन 72-73
  • रोमियों 9:1-15



गुरुवार, 20 जून 2019

प्रोत्साहन



      कार्य-स्थल में प्रोत्साहित करने वाले शब्दों का महत्व होता है। कार्यकर्ता जिस प्रकार से एक-दूसरे के साथ बातचीत करते हैं, उसका प्रभाव ग्राहकों की संतुष्टि, कंपनी के लाभांश, और कर्मचारियों द्वारा सह-कर्मियों के मूल्यान्कन और सराहना करने पर पड़ता है। अध्ययनों ने दिखाया है कि सबसे प्रभावी कार्य करने वाले समूहों के सदस्य एक-दूसरे को अस्वीकृति, असहमति, आलोचना देने के स्थान पर छः गुना अधिक समर्थन और पुष्टि प्रदान करते हैं।

      परमेश्वर के वचन बाइबल के एक प्रमुख पात्र, प्रेरित पौलुस ने अपने अनुभव द्वारा सीखा कि संबंधों और परिणामों को निर्धारित करने और आकार देने में शब्दों का कितना महत्व है। दमिश्क के मार्ग पर मसीह यीशु से उसकी भेंट होने से पहले, पौलुस के शब्द और व्यवहार प्रभु यीशु के अनुयायियों को आतंकित करते थे। परन्तु प्रभु यीशु मसीह से भेंट हो जाने के पश्चात, पौलुस का जीवन परिवर्तित हो गया, और उसके द्वारा थिस्सुलुनिकिया के मसीही विश्वासियों को पत्र लिखने का समय आने तक, उसके हृदय में हुए परमेश्वर के कार्य के कारण वह सभी का प्रोत्साहन करने वाला बन चुका था। अब स्वयँ अपने उदाहरण के द्वारा वह अपने पाठकों को आग्रह कर रहा था कि वे भी एक दूसरे को प्रोत्साहित करने वाले बनें। उसने चापलूसी करने से सावधानीपूर्वक बचकर रहते हुए यह दिखाया कि हम मसीही विश्वासी कैसे एक-दूसरे को और अधिक समर्थन एवँ पुष्टि प्रदान कर सकते हैं, और प्रभु की आत्मा को प्रतिबिंबित कर सकते हैं।

      ऐसा करते हुए पौलुस ने अपने पाठकों को इसका भी ध्यान करवाया कि प्रोत्साहन का स्त्रोत क्या है। पौलुस ने जाना और समझा कि अपने आप को उस प्रभु परमेश्वर के हाथों में छोड़ देने से, जिसने हम से इतना प्रेम किया कि हमारे लिए अपने प्राण दे दिए, हमें एक-दूसरे को सांत्वना देने, क्षमा करने, प्रेरणा प्रदान करने, और सप्रेम एक-दूसरे को और भी उभरने की चुनौती देने के कारण मिलते हैं (1 थिस्सलुनीकियों 5:10-11)।

      पौलुस हमें दिखाता है कि एक-दूसरे का प्रोत्साहन करना भी एक तरीका है परमेश्वर के प्रेम, भलाई, और धैर्य के स्वाद को चखने का। - मार्ट डीहान


परस्पर एक-दूसरे द्वारा मसीही विश्वास की सर्वोत्तम अभिव्यक्ति करने 
की प्रेरणा देने से बढ़कर भला कार्य और क्या होगा?

इसलिये हम उन बातों का प्रयत्न करें जिनसे मेल मिलाप और एक दूसरे का सुधार हो। - रोमियों 14:19

बाइबल पाठ: 1 थिस्सलुनीकियों 5:9-23
1 Thessalonians 5:9 क्योंकि परमेश्वर ने हमें क्रोध के लिये नहीं, परन्तु इसलिये ठहराया कि हम अपने प्रभु यीशु मसीह के द्वारा उद्धार प्राप्त करें।
1 Thessalonians 5:10 वह हमारे लिये इस कारण मरा, कि हम चाहे जागते हों, चाहे सोते हों: सब मिलकर उसी के साथ जीएं।
1 Thessalonians 5:11 इस कारण एक दूसरे को शान्‍ति दो, और एक दूसरे की उन्नति के कारण बनो, निदान, तुम ऐसा करते भी हो।
1 Thessalonians 5:12 और हे भाइयों, हम तुम से बिनती करते हैं, कि जो तुम में परिश्रम करते हैं, और प्रभु में तुम्हारे अगुवे हैं, और तुम्हें शिक्षा देते हैं, उन्हें मानो।
1 Thessalonians 5:13 और उन के काम के कारण प्रेम के साथ उन को बहुत ही आदर के योग्य समझो: आपस में मेल-मिलाप से रहो।
1 Thessalonians 5:14 और हे भाइयों, हम तुम्हें समझाते हैं, कि जो ठीक चाल नहीं चलते, उन को समझाओ, कायरों को ढाढ़स दो, निर्बलों को संभालो, सब की ओर सहनशीलता दिखाओ।
1 Thessalonians 5:15 सावधान! कोई किसी से बुराई के बदले बुराई न करे; पर सदा भलाई करने पर तत्‍पर रहो आपस में और सब से भी भलाई ही की चेष्‍टा करो।
1 Thessalonians 5:16 सदा आनन्‍दित रहो।
1 Thessalonians 5:17 निरन्‍तर प्रार्थना मे लगे रहो।
1 Thessalonians 5:18 हर बात में धन्यवाद करो: क्योंकि तुम्हारे लिये मसीह यीशु में परमेश्वर की यही इच्छा है।
1 Thessalonians 5:19 आत्मा को न बुझाओ।
1 Thessalonians 5:20 भविष्यद्वाणियों को तुच्‍छ न जानो।
1 Thessalonians 5:21 सब बातों को परखो: जो अच्छी है उसे पकड़े रहो।
1 Thessalonians 5:22 सब प्रकार की बुराई से बचे रहो।
1 Thessalonians 5:23 शान्‍ति का परमेश्वर आप ही तुम्हें पूरी रीति से पवित्र करे; और तुम्हारी आत्मा और प्राण और देह हमारे प्रभु यीशु मसीह के आने तक पूरे पूरे और निर्दोष सुरक्षित रहें।

एक साल में बाइबल: 
  • एस्तेर 1-2
  • प्रेरितों 5:1-21



शुक्रवार, 17 मई 2019

विश्वासयोग्य



      मैं शिकागो के एक संग्रहालय में गई, वहाँ मैंने बेबीलोन के विशाल शेरों में से एक का मूल चित्र देखा। वह दीवार पर बना हुआ एक विशाल चित्र था, जिसमें पंखों वाले शेर को दिखाया गया था, जिसके चेहरे पर भयावह भाव दिखाए गए थे। ये शेर बेबीलोन की प्रेम और युद्ध की देवी ‘इश्तार’ के प्रतीक थे। वह शेर उन 120 शेरों में से एक का उदाहरण था जो वर्ष 604-562 ईसा पूर्व में बेबीलोन के प्रमुख मार्ग पर लगाए थे।

      इतिहासकार हमें बताते हैं कि जब बेबीलोन के लोगों ने इस्राएलियों को पराजित किया और बन्दी बनाकर बेबीलोन लेकर आए, तो नबूकदनेस्सर राजा के समय में उन इस्राएलियों ने उन शेरों को देखा होगा। इतिहासकार यह भी कहते हैं कि संभव है कि उन शेरों को देखकर कुछ इस्राएलियों को यह लगा हो कि इश्तार ने इस्राएल के परमेश्वर को पराजित कर दिया है।

      दानिय्येल उन इब्रानी बंदियों में से एक था, किन्तु उसके मन में परमेश्वर को लेकर ऐसा कोई संदेह या भाव नहीं था। परमेश्वर के प्रति उसका दृष्टिकोण और विश्वास अस्थिर नहीं हुआ। वह, अपनी रीति के अनुसार, अपने कमरे की खिड़की को यरूशलेम की ओर खोलकर दिन में तीन बार तब भी प्रार्थना करता रहा, जब उसे यह ज्ञात था के ऐसा करने से उसे शेरों की मांद में डाला जा सकता है; और उसे डाल भी दिया गया। भूखे शेरों की मांद से परमेश्वर द्वारा बचाए जाने और जीवित बाहर निकाले जाने के पश्चात, दारा राजा ने स्वीकार किया कि दानिय्येल का परमेश्वर ही जीवता परमेश्वर है, जो सदा काल का है और अपने लोगों को बचाता तथा छुड़ाता है (दानिय्येल 6:26-27)। दानिय्येल की विश्वासयोग्यता के कारण वह बेबीलोन के अधिकारियों को प्रभावित कर सका।

      दबाव, निराशा और तनाव के बावजूद परमेश्वर के प्रति विश्वासयोग्य बने रहने से हम औरों को प्रोत्साहित कर सकते हैं कि वे परमेश्वर को महिमा दें। - जेनिफर बेन्सन शुल्ट


परमेश्वर के प्रति विश्वासयोग्यता औरों को प्रोत्साहित करती है।

अन्यजातियों में तुम्हारा चालचलन भला हो; इसलिये कि जिन जिन बातों में वे तुम्हें कुकर्मी जान कर बदनाम करते हैं, वे तुम्हारे भले कामों को देख कर; उन्‍हीं के कारण कृपा दृष्टि के दिन परमेश्वर की महिमा करें। - 1 पतरस 2:12

बाइबल पाठ: दानिय्येल 6:18-28
Daniel 6:18 तब राजा अपने महल में चला गया, और उस रात को बिना भोजन पड़ा रहा; और उसके पास सुख विलास की कोई वस्तु नहीं पहुंचाई गई, और उसे नींद भी नहीं आई।
Daniel 6:19 भोर को पौ फटते ही राजा उठा, और सिंहों के गड़हे की ओर फुर्ती से चला गया।
Daniel 6:20 जब राजा गड़हे के निकट आया, तब शोक भरी वाणी से चिल्लाने लगा और दानिय्येल से कहा, हे दानिय्येल, हे जीवते परमेश्वर के दास, क्या तेरा परमेश्वर जिसकी तू नित्य उपासना करता है, तुझे सिंहों से बचा सका है?
Daniel 6:21 तब दानिय्येल ने राजा से कहा, हे राजा, तू युगयुग जीवित रहे!
Daniel 6:22 मेरे परमेश्वर ने अपना दूत भेज कर सिंहों के मुंह को ऐसा बन्द कर रखा कि उन्होंने मेरी कुछ भी हानि नहीं की; इसका कारण यह है, कि मैं उसके साम्हने निर्दोष पाया गया; और हे राजा, तेरे सम्मुख भी मैं ने कोई भूल नहीं की।
Daniel 6:23 तब राजा ने बहुत आनन्दित हो कर, दानिय्येल को गड़हे में से निकालने की आज्ञा दी। सो दानिय्येल गड़हे में से निकाला गया, और उस पर हानि का कोई चिन्ह न पाया गया, क्योंकि वह अपने परमेश्वर पर विश्वास रखता था।
Daniel 6:24 और राजा ने आज्ञा दी कि जिन पुरूषों ने दानिय्येल की चुगली खाई थी, वे अपने अपने लड़के-बालों और स्त्रियों समेत लाकर सिंहों के गड़हे में डाल दिए जाएं; और वे गड़हे की पेंदी तक भी न पहुंचे कि सिंहों ने उन पर झपट कर सब हड्डियों समेत उन को चबा डाला।
Daniel 6:25 तब दारा राजा ने सारी पृथ्वी के रहने वाले देश-देश और जाति-जाति के सब लोगों, और भिन्न-भिन्न भाषा बोलने वालों के पास यह लिखा, तुम्हारा बहुत कुशल हो।
Daniel 6:26 मैं यह आज्ञा देता हूं कि जहां जहां मेरे राज्य का अधिकार है, वहां के लोग दानिय्येल के परमेश्वर के सम्मुख कांपते और थरथराते रहें, क्योंकि जीवता और युगानयुग तक रहने वाला परमेश्वर वही है; उसका राज्य अविनाशी और उसकी प्रभुता सदा स्थिर रहेगी।
Daniel 6:27 जिसने दानिय्येल को सिंहों से बचाया है, वही बचाने और छुड़ाने वाला है; और स्वर्ग में और पृथ्वी पर चिन्हों और चमत्कारों का प्रगट करने वाला है।
Daniel 6:28 और दानिय्येल, दारा और कुस्रू फारसी, दोनों के राज्य के दिनों में भाग्यवान रहा।

एक साल में बाइबल:  
  • 1 इतिहास 1-3
  • यूहन्ना 5:25-47



गुरुवार, 2 अगस्त 2018

दौड़



      जूप ज़ोटेमेल्क को नेदरलैंड का सबसे सफल साईकिल चालाक माना जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि उन्होंने कभी हार नहीं मानी। उन्होंने साईकिल चलाने की कठिन अंतरराष्ट्रीय स्पर्धा टूर डे फ्रांस में 16 बार भाग लिया और हर बार उसे पूरा किया – वे उसमें पाँच बार द्वितीय स्थान पर रहे, और अन्ततः 1980 में उसमें विजयी भी रहे। यह दृढ़ता से धीरज बनाए रखने का उत्कृष्ट उदाहरण है।

      ऐसे अनेकों विजेता हुए हैं जिन्होंने कभी हार न मानने के अपने दृढ़ निश्चय के कारण सफलता को पाया है। परन्तु साथ  ही ऐसे भी बहुतेरे रहे हैं जिन्होंने सफलता के अवसर को गँवा दिया क्योंकि उन्होंने संघर्ष में बहुत शीघ्र हार मान ली। ऐसा जीवन के किसी भी क्षेत्र में हो सकता है, वह चाहे परिवार, शिक्षा, मित्रगण, कार्य, सेवा, या अन्य कोई भी क्षेत्र हो। प्रत्येक क्षेत्र में दृढ़ता से धीरज बनाए रखना ही सफलता की कुंजी है।

      परमेश्वर के वचन बाइबल में हम देखते हैं कि प्रेरित पौलुस अनेकों सताव और दुखों के बावजूद अपनी मसीही सेवकाई में डटा रहा (2 तिमुथियुस 3:10-11)। उसने जीवन को उसकी सच्चाई में देखा और स्वीकार किया; उसे यह एहसास था कि मसीही विश्वासी सताव से होकर अवश्य ही निकालेंगे (पद 12-13)। इसलिए उसने तिमुथियुस को निर्देश दिया कि वह अपना विश्वास परमेश्वर में बनाए रखे, और पवित्र-शास्त्र से प्रोत्साहन और प्रेरणा प्राप्त करे (पद 14-15)। ऐसे करने से उसे निराशा का सामना करने का बल और आशा के साथ धीरज धरने की सामर्थ्य मिलेगी। अपने जीवन के अन्त की ओर, पौलुस कह सका, “मैं अच्छी कुश्‍ती लड़ चुका हूं मैं ने अपनी दौड़ पूरी कर ली है, मैं ने विश्वास की रखवाली की है” (2 तिमुथियुस 4:7)।

      आज हम भी परमेश्वर के वचन बाइबल के द्वारा हमारे लिए निर्धारित की गई जीवन की दौड़ में डटे रहने की प्रेरणा प्राप्त कर सकते हैं, क्योंकि हमारा परमेश्वर न केवल हम से वायदे करता है, वरन उन्हें निभाता भी है। जितने अपनी दौड़ सफलतापूर्वक पूरी करते हैं, उन्हें परमेश्वर से उचित प्रतिफल भी मिलेगा। - जेमी फर्नेनडेज़ गारिडो


विश्वास हमारी दुर्बलता को परमेश्वर की सामर्थ्य से जोड़ देता है।

तुम किसी ऐसी परीक्षा में नहीं पड़े, जो मनुष्य के सहने से बाहर है: और परमेश्वर सच्चा है: वह तुम्हें सामर्थ्य से बाहर परीक्षा में न पड़ने देगा, वरन परीक्षा के साथ निकास भी करेगा; कि तुम सह सको। - 1 कुरिन्थियों 10:13

बाइबल पाठ: 2 तिमुथियुस 3:10-17
2 Timothy 3:10 पर तू ने उपदेश, चाल चलन, मनसा, विश्वास, सहनशीलता, प्रेम, धीरज, और सताए जाने, और दुख उठाने में मेरा साथ दिया।
2 Timothy 3:11 और ऐसे दुखों में भी जो अन्‍ताकिया और इकुनियुम और लुस्‍त्रा में मुझ पर पड़े थे और और दुखों में भी, जो मैं ने उठाए हैं; परन्तु प्रभु ने मुझे उन सब से छुड़ा लिया।
2 Timothy 3:12 पर जितने मसीह यीशु में भक्ति के साथ जीवन बिताना चाहते हैं वे सब सताए जाएंगे।
2 Timothy 3:13 और दुष्‍ट, और बहकाने वाले धोखा देते हुए, और धोखा खाते हुए, बिगड़ते चले जाएंगे।
2 Timothy 3:14 पर तू इन बातों पर जो तू ने सीखीं हैं और प्रतीति की थी, यह जानकर दृढ़ बना रह; कि तू ने उन्हें किन लोगों से सीखा था
2 Timothy 3:15 और बालकपन से पवित्र शास्त्र तेरा जाना हुआ है, जो तुझे मसीह पर विश्वास करने से उद्धार प्राप्त करने के लिये बुद्धिमान बना सकता है।
2 Timothy 3:16 हर एक पवित्रशास्‍त्र परमेश्वर की प्रेरणा से रचा गया है और उपदेश, और समझाने, और सुधारने, और धर्म की शिक्षा के लिये लाभदायक है।
2 Timothy 3:17 ताकि परमेश्वर का जन सिद्ध बने, और हर एक भले काम के लिये तत्‍पर हो जाए।


एक साल में बाइबल: 
  • भजन 60-62
  • रोमियों 5