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सोमवार, 7 अप्रैल 2014

सहायता


   क्या ऐसा हो सकता है कि हमारा मददगार होना मदद पाने वालों के लिए परेशानी का कारण बन जाए? क्या हमारी सहायता दूसरों के जीवन को और भी कठिन बना सकती है? जी हाँ, ऐसा संभव है; तब, जब हम सहायता करने के प्रयास में दूसरों के जीवनों में द्खलंदाज़ी करने लगते हैं, उन्हें नियंत्रित करने के प्रयास करने लगते हैं, उनकी स्वतंत्रता में बाधा बनने लगते हैं, उन्हें सीखने और पनपने के अवसर देने की बजाए उन्हें दबाए रखने लगते हैं। यदि जो सहयाता हम देने का प्रयास कर रहे हैं वह केवल हमारी चिन्ता से प्रेरित होकर है, तो हम अपने स्वार्थ के कारण दूसरों के लिए कठिनाई पैदा करने वाले बन जाते हैं।

   तो फिर हम कैसे पहचान सकते हैं कि जो सहायता हम करना चाह रहे हैं और हमारे मन के भाव वास्तव में परमेश्वर के निस्वार्थ प्रेम से प्रेरित हैं? परमेश्वर का वचन बाइबल हमें बताती है कि हम शुद्ध और निस्वार्थ मन से प्रेम कैसे कर सकते हैं - अपने मनों और विचारों को परमेश्वर को समर्पित रखने तथा उससे मार्गदर्शन पाने के द्वारा: "हे ईश्वर, मुझे जांच कर जान ले! मुझे परख कर मेरी चिन्ताओं को जान ले! और देख कि मुझ में कोई बुरी चाल है कि नहीं, और अनन्त के मार्ग में मेरी अगुवाई कर! " (भजन 139:23-24)।

   हम प्रार्थना में अपने परमेश्वर पिता से माँग सकते हैं कि वह हमें दिखाए और बताए कि कहीं अनजाने में ही हम दूसरों के मार्गों की बाधा और उनके लिए कष्ट का कारण तो नहीं बन रहे हैं। हम प्रार्थना में यह भी कह सकते हैं कि परमेश्वर पिता हमें वह प्रेम करना और दिखाना सिखाए जो उसके वचन और स्वभाव के अनुरूप है: "प्रेम धीरजवन्‍त है, और कृपाल है; प्रेम डाह नहीं करता; प्रेम अपनी बड़ाई नहीं करता, और फूलता नहीं। वह अनरीति नहीं चलता, वह अपनी भलाई नहीं चाहता, झुंझलाता नहीं, बुरा नहीं मानता" (1 कुरिन्थियों 13:4-5)।

   दूसरों, विशेषकर जिनसे हम प्रेम करते हैं, की सहायता करने के हमारे प्रयास कभी भी चिन्ता से पूर्णतः मुक्त तो नहीं हो सकेंगे, लेकिन परमेश्वर पिता की सहायता और उसके वचन की आज्ञाकारिता से हम वैसा ही निस्वार्थ प्रेम दिखाना सीख सकते हैं जैसा परमेश्वर पिता ने स्वयं हम से किया है तथा सही रीति से सहायता करने वाले बन सकते हैं। और इस प्रेम तथा सहायता के निस्वार्थ होने की पहचान है होगी कि हम लोगों से उस प्रेम के प्रतिफल पाने की या प्रशंसा की कोई इच्छा नहीं रखेंगे। पिता परमेश्वर हमें यह सामर्थ दे कि हम शुद्ध मन और उद्देश्यों से दूसरों की भलाई के लिए प्रेम करें, सहायता करें और बदले में उनसे कुछ पाने की कोई उम्मीद नहीं रखें। - डेविड रोपर


शुद्ध मन और उद्देश्यों से दूसरों की सहायता करने के लिए निस्वार्थ प्रेम करना भी आवश्यक है।

हम अपने चालचलन को ध्यान से परखें, और यहोवा की ओर फिरें! - विलापगीत 3:40

बाइबल पाठ: 1 कुरिन्थियों 13:1-8
1 Corinthians 13:1 यदि मैं मनुष्यों, और सवर्गदूतों की बोलियां बोलूं, और प्रेम न रखूं, तो मैं ठनठनाता हुआ पीतल, और झंझनाती हुई झांझ हूं। 
1 Corinthians 13:2 और यदि मैं भविष्यद्वाणी कर सकूं, और सब भेदों और सब प्रकार के ज्ञान को समझूं, और मुझे यहां तक पूरा विश्वास हो, कि मैं पहाड़ों को हटा दूं, परन्तु प्रेम न रखूं, तो मैं कुछ भी नहीं। 
1 Corinthians 13:3 और यदि मैं अपनी सम्पूर्ण संपत्ति कंगालों को खिला दूं, या अपनी देह जलाने के लिये दे दूं, और प्रेम न रखूं, तो मुझे कुछ भी लाभ नहीं। 
1 Corinthians 13:4 प्रेम धीरजवन्‍त है, और कृपाल है; प्रेम डाह नहीं करता; प्रेम अपनी बड़ाई नहीं करता, और फूलता नहीं। 
1 Corinthians 13:5 वह अनरीति नहीं चलता, वह अपनी भलाई नहीं चाहता, झुंझलाता नहीं, बुरा नहीं मानता। 
1 Corinthians 13:6 कुकर्म से आनन्‍दित नहीं होता, परन्तु सत्य से आनन्‍दित होता है। 
1 Corinthians 13:7 वह सब बातें सह लेता है, सब बातों की प्रतीति करता है, सब बातों की आशा रखता है, सब बातों में धीरज धरता है। 
1 Corinthians 13:8 प्रेम कभी टलता नहीं; भविष्यद्वाणियां हों, तो समाप्‍त हो जाएंगी, भाषाएं हो तो जाती रहेंगी; ज्ञान हो, तो मिट जाएगा।

एक साल में बाइबल: 
  • 2 राजा 4-6


मंगलवार, 7 अगस्त 2012

स्वार्थ या निस्वार्थ


   हाल ही में एक भीड़ भरी दुकान में मैंने एक महिला को देखा जो अपने पसन्द की चीज़ें लेने के लिए लोगों को धकेलते हुए दुकान में बढ़ रही थी। उसके व्यवहार के साथ साथ उसकी टी. शर्ट पर बड़े प्रमुख शब्दों में लिखे वाक्य, "सब कुछ मेरे लिए है" ने मेरा ध्यान उसकी ओर खींचा। उसका व्यवहार निश्चय ही उसकी शर्ट के वाक्य को प्रदर्शित कर रहा था।

   दुख की बात यह है कि वह महिला अकेली ऐसी नहीं है। यह वाक्य और ऐसा स्वार्थी व्यवहार संसार के कितने ही लोगों द्वारा प्रतिदिन प्रतिपल प्रदर्शित होता रहता है; ऐसा प्रतीत होता है कि यह आज के समय का आदर्श वाक्य बन गया है। किंतु यह ठीक नहीं है, मसीही विश्वासियों के लिए तो बिलकुल भी नहीं। मसीही विश्वासियों के लिए सब कुछ उनके लिए नहीं वरन उनके उद्धारकर्ता प्रभु यीशु और संसार के अन्य लोगों के लिए है जिनके लिए उनका प्रभु इस संसार में आया और बलिदान हुआ।

   प्रेरित पौलुस का तो निश्चय ही यह मानना था। पौलुस के संगी इस्त्राएली भी प्रभु यीशु को उद्धारकर्ता करके जाने, यह उसकी गहन इच्छा थी; पौलुस ने कहा : "क्‍योंकि मैं यहां तक चाहता था, कि अपने भाईयों, के लिये जो शरीर के भाव से मेरे कुटुम्बी हैं, आप ही मसीह से श्रापित हो जाता" (रोमियों ९:३)। यह एक अद्भुत वाक्य है! अपने स्वार्थ और भले की सोचने की बजाए, पौलुस ने चाहा कि अपने लोगों की भलाई के लिए यदि संभव हो तो वह अपनी अनन्त काल की भलाई उन्हें देकर उनके श्राप को अपने ऊपर ले ले। उनके भले के लिए वह अपनी भलाई का बलिदान देने को तैयार था।

   पौलुस द्वारा परमेश्वर के वचन बाइबल में दी गई यह शिक्षा इस स्वार्थ से भरे संसार में निस्वार्थ जीवन जीने के लिए एक चुनौती है। हम मसीही विश्वासियों को अपने आप से यह प्रश्न पूछते रहना चाहिए कि हमारा जीवन किस के लिए है - अपने लिए या हमारे उद्धारकर्ता प्रभु यीशु और अन्य लोगों के लिए, जिनके लिए मसीह यीशु संसार में आया?

   ज़रा विचार कीजिए - आपके जीवन में सब कुछ किसके लिए है? - बिल क्राउडर


मसीही विश्वासियों के जीवन मसीह और अन्य लोगों के प्रति प्रेम द्वारा पहचाने जाने चाहिएं, ना कि स्वार्थ द्वारा।

क्‍योंकि मैं यहां तक चाहता था, कि अपने भाईयों, के लिये जो शरीर के भाव से मेरे कुटुम्बी हैं, आप ही मसीह से श्रापित हो जाता। - रोमियों ९:३

बाइबल पाठ: फिलिप्पियों २:१-११
Php 2:1  सो यदि मसीह में कुछ शान्‍ति और प्रेम से ढाढ़स और आत्मा की सहभागिता, और कुछ करूणा और दया है। 
Php 2:2  तो मेरा यह आनन्‍द पूरा करो कि एक मन रहो और एक ही प्रेम, एक ही चित्त, और एक ही मनसा रखो। 
Php 2:3  विरोध या झूठी बड़ाई के लिये कुछ न करो पर दीनता से एक दूसरे को अपने से अच्‍छा समझो। 
Php 2:4  हर एक अपनी ही हित की नहीं, वरन दूसरों की हित की भी चिन्‍ता करे। 
Php 2:5  जैसा मसीह यीशु का स्‍वभाव था वैसा ही तुम्हारा भी स्‍वभाव हो। 
Php 2:6  जिस ने परमेश्वर के स्‍वरूप में होकर भी परमेश्वर के तुल्य होने को अपने वश में रखने की वस्‍तु न समझा। 
Php 2:7  वरन अपने आप को ऐसा शून्य कर दिया, और दास का स्‍वरूप धारण किया, और मनुष्य की समानता में हो गया। 
Php 2:8   और मनुष्य के रूप में प्रगट होकर अपने आप को दीन किया, और यहां तक आज्ञाकारी रहा, कि मृत्यु, हां, क्रूस की मृत्यु भी सह ली। 
Php 2:9  इस कारण परमेश्वर ने उसको अति महान भी किया, और उसको वह नाम दिया जो सब नामों में श्रेष्‍ठ है। 
Php 2:10  कि जो स्‍वर्ग में और पृथ्वी पर और जो पृथ्वी के नीचे हैं वे सब यीशु के नाम पर घुटना टेकें। 
Php 2:11  और परमेश्वर पिता की महिमा के लिये हर एक जीभ अंगीकार कर ले कि यीशु मसीह ही प्रभु है।

एक साल में बाइबल: 
  • भजन ७२-७३ 
  • रोमियों ९:१-१५

शनिवार, 20 नवंबर 2010

उभारने को हाथ बढ़ाएं

सारा टयुकोल्स्की ने Soft Ball खेल के महत्वपूर्ण मुकाबले में अपने जीवन में पहली बार गेंद को 'Home Run' के लायक मारा, अर्थात उसने गेंद को पहली बार इतनी दूर मारा कि वह भागकर पूरा रन बनाने के लिये चारों बेसों को छूने की स्थिति में थी। वह इतनी उतेजित हुई कि भागते हुए पहले बेस को छूने से रह गई। अपनी गलती को ठीक करने के लिये वह जैसे ही तेज़ी से पलटी, उसके घुटने में चोट आ गई और वह रोती हुई पहले बेस की ओर रेंगकर आगे बढ़ने लगी। नियम के अनुसार उसे चारों बेसों को अपने आप छूना था तभी वह रन पूरा माना जाता और गिना जाता। उसकी टीम के खिलाड़ी इसमें उसकी कोई सहायता नहीं कर सकते थे।

ऐसे में पहले बेस पर खड़े प्रतिद्वन्दी टीम के खिलाड़ी मैलोरी ने अम्पायर से पूछा, "यदि हम उसे उठा कर चारों बेस पर बारी बारी ले जाएं तो क्या यह रन माना जाएगा?" अम्पायरों ने आपस में मंत्रणा करके अपनी सहमति जताई। तब सारा की प्रतिद्वन्दी टीम के खिलाड़ी मैलोरी और उसके एक और साथी ने अपने हाथ आपस में जोड़ कर सारा के बैठने के लिये ’कुर्सी’ बनाई और उसे उठा कर चारों बेसों पर ले गए जिससे सारा उन्हें छू कर अपना रन पूरा कर सकी और वह रन उसके नाम से गिना गया। इस प्रक्रिया को पूरा होते होते, प्रतिद्वन्दी टीम के इस निस्वार्थ करुणा के कार्य को देख कर बहुत से लोगों की आंखें भर आईं।

इस घटना से मिलने वाली शिक्षा स्पष्ट है। जब हमारे साथ के लोग या हमारे सहविश्वासी किसी बात में ठोकर खाकर गिरते हैं तो हमें इन खिलाड़ीयों के समान, सहायता और उन्हें उभारने के लिये अपने हाथ बढ़ाने चाहियें - " हे भाइयों, यदि कोई मनुष्य किसी अपराध में पकड़ा जाए, तो तुम जो आत्मिक हो, नम्रता के साथ ऐसे को संभालो, और अपनी भी चौकसी रखो, कि तुम भी परीक्षा में न पड़ो। तुम एक दूसरे के भार उठाओ, और इस प्रकार मसीह की व्यवस्था को पूरी करो। (गलतियों ६:१, २)

जब किसी को गिरा हुआ देखें तो अपने हाथ उसे और दबाने या उस पर उंगली उठाने के लिये नहीं वरन उसे उभारने और खड़ा करने के लिये सहायतार्थ बढ़ाएं; " एक दूसरे पर कृपाल, और करूणामय हो, और जैसे परमेश्वर ने मसीह में तुम्हारे अपराध क्षमा किए, वैसे ही तुम भी एक दूसरे के अपराध क्षमा करो" (इफिसियों ४:३२)। यह एक अद्भुत अवसर होता है कि "जिस को जो वरदान मिला है, वह उसे परमेश्वर के नाना प्रकार के अनुग्रह के भले भण्‍डारियों की नाईं एक दूसरे की सेवा में लगाए" (१ पतरस ४:१०)। - डेव एगनर


जो इस संसार में दूसरों के बोझों को हलका करने के लिये हाथ बढ़ाते हैं उनके ये प्रयास कभी व्यर्थ नहीं कहलाते।

जिस को जो वरदान मिला है, वह उसे परमेश्वर के नाना प्रकार के अनुग्रह के भले भण्‍डारियों की नाई एक दूसरे की सेवा में लगाए। - १ पतरस ४:१०


बाइबल पाठ: १ पतरस ४:७-११

सब बातों का अन्‍त तुरन्‍त होने वाला है, इसलिये संयमी होकर प्रार्थना के लिये सचेत रहो।
और सब में श्रेष्ठ बात यह है कि एक दूसरे से अधिक प्रेम रखो, क्‍योंकि प्रेम अनेक पापों को ढ़ांप देता है।
बिना कुड़कुड़ाए एक दूसरे की पहुनाई करो।
जिस को जो वरदान मिला है, वह उसे परमेश्वर के नाना प्रकार के अनुग्रह के भले भण्‍डारियों की नाईं एक दूसरे की सेवा में लगाए।
यदि कोई बोले, तो ऐसा बोले, मानों परमेश्वर का वचन है; यदि कोई सेवा करे तो उस शक्ति से करे जो परमेश्वर देता है; जिस से सब बातों मे यीशु मसीह के द्वारा, परमेश्वर की महिमा प्रगट हो: महिमा और साम्राज्य युगानुयुग उसी की है। आमीन।

एक साल में बाइबल:
  • यहेजेकेल १४-१५
  • याकूब २