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रविवार, 28 अप्रैल 2024

Growth through God’s Word / परमेश्वर के वचन से बढ़ोतरी – 53

 

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आरम्भिक बातें – 14

परमेश्वर पर विश्वास करना – 1

 

    परमेश्वर के वचन से बढ़ोतरी की इस श्रृंखला में हम सीख रहे हैं कि कैसे परमेश्वर के सम्पूर्ण वचन का अध्ययन करने, उसे सीखने, और अपने जीवन में उसे लागू करने के द्वारा प्रत्येक मसीही विश्वासी आत्मिक जीवन में बढ़ोतरी और परिपक्वता प्राप्त कर सकता है। तीन प्रकार की मौलिक शिक्षाएँ हैं जिन्हें प्रत्येक मसीही विश्वासी को सीखना चाहिए, क्योंकि वे शिक्षाएँ उसके विश्वास में स्थिर खड़े रहने और मसीही जीवन में उन्नति करने के लिए एक नींव का काम करेंगी। इन तीन में से एक, सुसमाचार से सम्बन्धित शिक्षाओं को हम देख चुके हैं; और वर्तमान में दूसरी प्रकार की शिक्षाओं – इब्रानियों 6:1-2 में दी गई छः आरम्भिक बातों के बारे में सीख रहे हैं। पिछले लेख तक हमने इन छः में से पहली, अर्थात मरे हुए कामों से मन फिराने के बारे में सीखा है। आज हम इन छः में से दूसरी आरम्भिक बात – “परमेश्वर पर विश्वास करना” पर विचार करना आरम्भ करेंगे।

    यह वाक्याँश इस बात का संकेत करता है कि विश्वासी परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास रखता है और जो भी सीखना है वह परमेश्वर के प्रति विश्वास रखने के बारे में सीखना है। क्योंकि यह पत्री उन्हें लिखी गई है जो यहूदियों में से मसीही विश्वास में आए थे, अर्थात पहली यहूदी थे, इसलिए इसका अर्थ है कि इस पत्री के पाठक न केवल परमेश्वर में विश्वास करते थे, वरन प्रभु परमेश्वर यहोवा में विश्वास करते थे, जिसके बारे में तब के पवित्र शास्त्र, अर्थात हमारा पुराना नियम बताता और सिखाता है, तथा एक ही ईश्वर के मानने वाले थे। वर्तमान के मसीही विश्वासी भी उसी परमेश्वर में विश्वास रखते हैं; और साथ ही, क्योंकि इस पत्री के पाठक मसीही विश्वासी थे, इसका तात्पर्य है कि वे लोग प्रभु यीशु में विश्वास रखते थे। इसलिए यह प्रश्न सामने आता है कि परमेश्वर और प्रभु यीशु पर विश्वास रखने से सम्बन्धित इस सारी पृष्ठभूमि के बावजूद, उनके लिए “परमेश्वर पर विश्वास करना” एक ऐसा आरम्भिक सिद्धान्त कैसे हो गया, जिसे इस पत्री के पाठकों को फिर से सीखने की आवश्यकता पड़ गई?

    इस प्रश्न के उत्तर के लिए इस तथ्य पर ध्यान कीजिए कि न केवल पुराना नियम इस्राएल में तथा इस्राएल के चारों और अनेकों देवी-देवताओं के माने जाने का उल्लेख करता है, वरन यह भी बताता है कि परमेश्वर के निर्देशों और शिक्षाओं के बावजूद, यहूदी बहुधा उन देवी-देवताओं की उपासना में, मूर्ति-पूजा में, गिर जाते थे। साथ ही, प्रभु यीशु मसीह की पृथ्वी की सेवकाई तथा प्रथम कलीसिया के समय में, जब इस्राएल रोमी शासन के आधीन था, रोमी सम्राट के देवता के समान पूजे जाने की भी प्रथा थी। फिर, हम प्रेरितों 17:16-17 से देखते हैं कि अथेने नगर मूर्तिपूजा से भरा हुआ था। इसी प्रकार से प्रेरितों 19:26-29 से हम देखते हैं कि इफिसुस नगर, एक ऐसा स्थान जहाँ पर पौलुस ने सेवकाई की थी, देवी डायना का नगर था। दूसरे शब्दों में, अनेकों नगर अन्यजातियों के देवी-देवताओं के नगर थे, और उन देवी-देवताओं के उपासक वहां पर आया करते थे। इसलिए उस समय की व्याप्त अन्यजाति संस्कृति में, विशेषकर उनके लिए जो गैर-यहूदी थे और जो इस्राएल राज्य की सीमाओं के बाहर से थे, ‘परमेश्वर’ का अर्थ कोई भी, और कुछ भी हो सकता था।

    पहले आरम्भिक सिद्धान्त, अर्थात मरे हुए कामों से मन फिराने के हमारे अध्ययन में इस बात पर बल दिया गया था कि जब भी परमेश्वर के लोगों ने परमेश्वर के वचन को अध्ययन करना, सीखना, और पालन करना बँद किया, वे हमेशा ही समस्याओं में पड़े, और उन समस्याओं से निकलने का एक ही मार्ग रहा कि वे फिर से परमेश्वर के वचन को अध्ययन करने, सीखने, और पालन करने वाले बन जाएँ। अब, इब्रानियों 6:1-2 से सम्बन्धित हमारे इस अध्ययन के इब्रानियों 5:11-14 से परिचय का ध्यान कीजिए। उन परिचय की बातों में हमने देखा था कि ये इब्रानी विश्वासी अपने विश्वास में पीछे हो गए थे, अपने विश्वास में कमजोर पड़ गए थे, और लेखक उन्हें जो गूढ़ बातें सिखाना चाहता था, उन्हें समझ पाने के अयोग्य हो गए थे। हमने इस पर विचार करते हुए देखा था कि ऐसा संभवतः इसलिए हुआ था क्योंकि ये लोग अब वचन के अध्ययन, सीखने, और पालन करने में ढीले पड़ गए थे। इस दूसरी आरम्भिक बात, “परमेश्वर पर विश्वास करना” का लिखा जाना, उनके परमेश्वर से दूर हो जाने के एक अन्य पक्ष की ओर संकेत करता है - किसी कारणवश परमेश्वर पर उनका विश्वास भी कमज़ोर पड़ गया था। यद्यपि इस पत्री का लेखक यह तो नहीं कहता है कि वे मूर्तिपूजा में पड़ गए थे, किन्तु संभव है कि उस समय की अन्यजाति मूर्तिपूजा की संस्कृति ने उन पर कुछ प्रभाव डाला हो, और वे यहोवा को कई देवताओं में से एक समझने लगे हों, बजाए उसे एकमात्र परमेश्वर मानने के। यह कोई अनजानी समस्या नहीं है; आज भी बहुत से ईसाई या मसीही यह मानते हैं कि यीशु या यहोवा कई ईश्वरों में से एक ईश्वर है, कुछ यह भी मानते हैं कि स्वर्ग पहुँचने के कई मार्ग हैं, और यीशु में विश्वास करना, उनमें से एक मार्ग है। इसलिए, मसीही विश्वास की आरंभिक बातों में से एक के रूप में, बाइबल की इस शिक्षा को सीखना और मानना अनिवार्य है कि केवल एक ही परमेश्वर है, और उसके अतिरिक्त और कोई नहीं है (यशायाह 44:8; 45:21-22)।

    अगले लेख में हम यहाँ से आगे बढ़ेंगे, और परमेश्वर के प्रति विश्वास के बारे में सीखेंगे।

    यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु, मैं अपने पापों के लिए पश्चातापी हूँ, उनके लिए आप से क्षमा माँगता हूँ। मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मुझे और मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

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English Translation


The Elementary Principles – 14

Faith Towards God - 1

 

    In this series on Growth through God’s Word, we are learning how every Christian Believer can grow and mature spiritually through studying, learning, and applying in life, the whole of God’s Word. There are three fundamental kinds of teachings that every Christian Believer must know, since those teachings will serve as a foundation for him to stand firm in his faith and grow in his Christian life. Of these three, we have completed studying one kind of teachings – related to the gospel; and presently are learning the second kind of teachings – related to the six elementary principles, as given in Hebrews 6:1-2. Of these six, till the last article, we have learnt about the first elementary principle – repentance from dead works. Today we will begin considering the second of these six principles – “Faith Towards God.”

    While most translations have used the phrase “Faith Towards God” some, e.g., the NIV, have used the phrase “Faith in God” – in either case it presupposes or takes for granted that the Believer already believes in the existence of God, and what has to be learned has to about faith towards God. Since this letter was written to those who had come into the Christian faith from Judaism, i.e., had been Hebrews, therefore, it means that the then readers of this letter not only believed in God, but believed in the Lord God Jehovah, that the Scriptures of that time, i.e., our Old Testament talks and teaches about, and were also mono-theistic, i.e., believed in only one God. The present-day Christian Believers too believe in the same God; moreover, since the readers of this letter were Christian Believers, that means, the readers of this letter believed in the Lord Jesus. Therefore, the question arises, despite all this background related to their believing in God and in the Lord Jesus, why would “Faith Towards God” be considered an ‘elementary principle’ for them, one that had to be re-learned by the readers of this letter?

    To answer the question, consider the fact that not only does the Old Testament speak of many gods and goddesses that the pagans in and around Israel believed in and worshipped, but that despite God’s teachings and commands to the contrary, the Jews often fell into worshipping those pagan gods and goddesses as well, i.e., fell into idolatry. Also, during the time of the earthly ministry of the Lord Jesus, and the time of the first Church, when the nation of Israel was under Roman rule, there was even the practice of worshipping the Roman emperor as a deity. Then, we see from Acts 17:16-17 that the city of Athens was given over to idols, similarly Acts 19:26-29 shows us that Ephesus, another place where Paul ministered, was the city of the goddess Diana. In other words, many cities were designated places of pagan deities, and the worshippers of those deities would come there to worship them. So, in the prevailing gentile culture of that time, especially for the non-Jews and those outside of the land of Israel, ‘god’ could mean anything or anyone.

    In our considerations of the first elementary principle i.e., of ‘repentance from dead works’ it has been emphasized that whenever God’s people have stopped learning, studying, and obeying God’s Word, they have always fallen into problems; and the way out of those problems has been their reverting to studying, learning, and obeying God’s Word. Now, also recall the introduction about Hebrews 6:1-2, from Hebrews 5:11-14. In those preliminary considerations we had seen that these Hebrew Believers had fallen back, become weak in their faith, and were unable to grasp the deeper things that the author of this letter wanted to teach them. We had seen in those considerations that this was probably because they were no longer seriously and diligently studying, learning, and obeying God’s Word. The mention of this second elementary principle, “Faith Towards God” indicates another aspect of their slipping away from God – for some reason their faith in God had also come down. Though the author of this letter does not say that they had fallen into idolatry, but the pagan culture of idolatry may have had an influence, and they might have started to think of Jehovah as one of the ‘gods’ or one amongst many gods, instead of seeing Him as the one and only God. This is not an unknown problem; even today many Christians have the view that Jesus or Jehovah is one of the gods, and some even believe that there are many ways to heaven, and believing in Jesus is just one of them. Therefore, as one of the elementary principles of the Christian Faith, it is imperative to learn and follow the Biblical teaching that there is but one God (Isaiah 44:8; 45:21-22), and none other.

    In the next article we will carry on from here and learn about having faith towards God.

If you have not yet accepted the discipleship of the Lord, make your decision in favor of the Lord Jesus now to ensure your eternal life and heavenly blessings. Where there is obedience to the Lord, where there is respect and obedience to His Word, there is also the blessing and protection of the Lord. Repenting of your sins, and asking the Lord Jesus for forgiveness of your sins, voluntarily and sincerely, surrendering yourself to Him - is the only way to salvation and heavenly life. You only have to say a short but sincere prayer to the Lord Jesus Christ willingly and with a penitent heart, and at the same time completely commit and submit your life to Him. You can also make this prayer and submission in words something like, “Lord Jesus, I am sorry for my sins and repent of them. I thank you for taking my sins upon yourself, paying for them through your life.  Because of them you died on the cross in my place, were buried, and you rose again from the grave on the third day for my salvation, and today you are the living Lord God and have freely provided to me the forgiveness, and redemption from my sins, through faith in you. Please forgive my sins, take me under your care, and make me your disciple. I submit my life into your hands." Your one prayer from a sincere and committed heart will make your present and future life, in this world and in the hereafter, heavenly and blessed for eternity.

 

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गुरुवार, 10 दिसंबर 2020

यहोवा का

 

         यह बहुत प्रकट बात है कि आजकल लोगों को अपन शरीरों पर टैटू बनवाना बहुत पसंद है। कुछ टैटू इतने छोटे होते हैं कि उन्हें साफ़ देखा भी न जा सके, और कुछ अन्य होते हैं जो अलग-अलग रंगों, शब्दों और डिजाईनों में, खिलाड़ियों, अभिनेताओं, या सामान्य लोगों के शरीर के अधिकांश भागों पर बने होते हैं। लगता है कि यह प्रवृत्ति स्थाई है, और अनुमान है कि सन 2014 में लोगों ने टैटू बनवाने के लिए 3 अरब डॉलर खर्च किए, तथा उन्हें हटवाने के लिए 66 करोड़ खर्च किए।

         आप चाहे टैटू के बारे में जो भी विचार रखते हों, परमेश्वर के वचन बाइबल में यशायाह 44 अध्याय आलंकारिक रूप में लोगों द्वारा अपने हाथों पर “यहोवा का” (पद 5) लेने के बारे में बताता है। लोगों द्वारा यह लिखवा लेना, उस पूरे अनुच्छेद का चरम बिंदु है, जो परमेश्वर द्वारा उनकी देखभाल करने के विषय बताता है जो उसके चुनें हुए हैं (पद 1)। वे लोग परमेश्वर की सहायता पर भरोसा कर सकते थे (पद 2); तथा उनका देश और वंश आशीषों के लिए नियुक्त किया गया था (पद 3)। दो साधारण, शक्तिशाली शब्द, “यहोवा का” इस बात की पुष्टि करते थे कि यहोवा के लोग जानते थे कि वे उसकी संपत्ति हैं, और वह उनकी देखभाल करेगा।

         जो भी प्रभु यीशु मसीह में लाए गए विश्वास के द्वारा परमेश्वर के निकट आता है, वह अपने विषय दृढ़ निश्चय के साथ कह सकता है कि वह “यहोवा का” है। हम उसके लोग, उसके चरागाह की उसकी भेड़ें, उसकी संतान, उसकी मीरास, उसका निवासस्थान हैं। जीवन के विभिन्न समयों में हम इन बातों को थामे रहते हैं। चाहे बाहर से दिखने वाला कोई भी टैटू हम पर बना हुआ न हो, हम इस बात से आश्वस्त रह सकते हैं कि हम पर परमेश्वर पवित्र आत्मा की छाप लगी है, और हम अनन्तकाल के लिए परमेश्वर यहोवा के हैं (देखें रोमियों 8:16-17)। आर्थर जैक्सन

 

अपने जीवन से दिखाएँ कि आप परमेश्वर यहोवा के हैं।


और उसी में तुम पर भी जब तुम ने सत्य का वचन सुना, जो तुम्हारे उद्धार का सुसमाचार है, और जिस पर तुम ने विश्वास किया, प्रतिज्ञा किए हुए पवित्र आत्मा की छाप लगी। - इफिसियों 1:13

बाइबल पाठ: यशायाह 44:1-5

यशायाह 44:1 परन्तु अब हे मेरे दास याकूब, हे मेरे चुने हुए इस्राएल, सुन ले!

यशायाह 44:2 तेरा कर्ता यहोवा, जो तुझे गर्भ ही से बनाता आया और तेरी सहायता करेगा, यों कहता है, हे मेरे दास याकूब, हे मेरे चुने हुए यशूरून, मत डर!

यशायाह 44:3 क्योंकि मैं प्यासी भूमि पर जल और सूखी भूमि पर धाराएं बहाऊंगा; मैं तेरे वंश पर अपनी आत्मा और तेरी सन्तान पर अपनी आशीष उण्डेलूंगा।

यशायाह 44:4 वे उन मजनुओं के समान बढ़ेंगे जो धाराओं के पास घास के बीच में होते हैं।

यशायाह 44:5 कोई कहेगा, मैं यहोवा का हूं, कोई अपना नाम याकूब रखेगा, कोई अपने हाथ पर लिखेगा, मैं यहोवा का हूं, और अपना कुलनाम इस्राएली बताएगा।

 

एक साल में बाइबल: 

  • होशे 1-4
  • प्रकाशितवाक्य 1

बुधवार, 2 फ़रवरी 2011

कुछ भी असंभव नहीं

परमेश्वर हमारी प्रत्येक आवश्यक्ता को पूरी कर सकता है। उसके लिये कुछ भी असंभव नहीं है। सारा को यह सत्य सीखना था।

परमेश्वर द्वारा इब्राहीम से उसकी सन्तान के लिये किया गया वायदा उत्पत्ति १७:२१ में लिखा है। इससे अगले अध्याय में, यही वायदा उससे फिर से दोहराया गया जब इब्राहीम अपने डेरे के बाहर परमेश्वर के तीन दूतों से बात कर रहा था। उस समय सारा डेरे के अन्दर इस वार्तालाप को सुन रही थी। उसे अपने बुढ़ापे की अवस्था में पुत्र होने की बात असंभव लगी, "सो सारा मन में हंस कर कहने लगी, मैं तो बूढ़ी हूं, और मेरा पति भी बूढ़ा है, तो क्या मुझे यह सुख होगा? तब यहोवा ने इब्राहीम से कहा, सारा यह कह कर क्यों हंसी, कि क्या मेरे, जो ऐसी बुढिय़ा हो गई हूं, सचमुच एक पुत्र उत्पन्न होगा? क्या यहोवा के लिये कोई काम कठिन है? नियत समय में, अर्थात वसन्त ऋतु में, मैं तेरे पास फिर आऊंगा, और सारा के पुत्र उत्पन्न होगा। " (उत्पत्ति १८:१२-१४)

मसीही विश्वासी होने के नाते हमें भी परमेश्वर की ओर से यही आश्वासन है - "क्या यहोवा के लिये कोई काम कठिन है?" इब्राहिम का परमेश्वर हमारा भी परमेश्वर है और वह सर्वशक्तिमान है। वह सृष्टि का सृष्टिकर्ता है, उसकी सामर्थ से बढ़कर कोई और सामर्थ नहीं है। कोई समस्या उसे विसमित नहीं कर सकती, कोई अवरोध उसे रोक नहीं सकता। हमारा स्वर्गीय पिता प्रत्येक परिस्थिति को नियंत्रित करता है। इस सत्य से हमें कैसा अद्भुत विश्वास और कैसी अद्भुत दिलासा मिलती है।

हमारा सर्वज्ञानी, सर्वव्यापी और सर्वशक्तिमान सृष्टिकर्ता परमेश्वर सार्वभौमिक है और सब कुछ कर सकता है। जब हम अपनी आवश्यक्ताएं, प्रार्थना में अपने स्वर्गीय पिता के सामने रखते हैं, यह सुनिश्चित करते हुए कि वे उसकी इच्छा के अनुरूप हैं, तो उसका आश्वासन हमारे साथ है कि उसका हमारे लिये कुछ भी करना असंभव नहीं है। - रिचर्ड डी हॉन


असंभव के लिये भी परमेश्वर पर भरोसा रखकर ही हम परमेश्वर की सामर्थ को आंक सकते हैं।

क्या यहोवा के लिये कोई काम कठिन है? - उत्पत्ति १८:१४


बाइबल पाठ: उत्पत्ति १८:१-१४

इब्राहीम मम्रे के बांजो के बीच कड़ी धूप के समय तम्बू के द्वार पर बैठा हुआ था, तब यहोवा ने उसे दर्शन दिया:
और उस ने आंख उठाकर दृष्टि की तो क्या देखा, कि तीन पुरूष उसके साम्हने खड़े हैं: जब उस ने उन्हें देखा तब वह उन से भेंट करने के लिये तम्बू के द्वार से दौड़ा, और भूमि पर गिर कर दण्डवत की और कहने लगा,
हे प्रभु, यदि मुझ पर तेरी अनुग्रह की दृष्टि है तो मैं बिनती करता हूं, कि अपने दास के पास से चले न जाना।
मैं थोड़ा सा जल लाता हूं और आप अपने पांव धोकर इस वृक्ष के तले विश्राम करें।
फिर मैं एक टुकड़ा रोटी ले आऊं और उस से आप अपने जीव को तृप्त करें, तब उसके पश्चात्‌ आगे बढें: क्योंकि आप अपने दास के पास इसी लिये पधारे हैं। उन्होंने कहा, जैसा तू कहता है वैसा ही कर।
सो इब्राहीम ने तम्बू में सारा के पास फुर्ती से जाकर कहा, तीन सआ मैदा फुर्ती से गून्ध, और फुलके बना।
फिर इब्राहीम गाय बैल के झुण्ड में दौड़ा, और एक कोमल और अच्छा बछड़ा लेकर अपने सेवक को दिया, और उसने फुर्ती से उसको पकाया।
तब उस ने मक्खन, और दूध, और वह बछड़ा, जो उस ने पकवाया था, लेकर उनके आगे परोस दिया, और आप वृझ के तले उनके पास खड़ा रहा, और वे खाने लगे।
उन्होंने उस से पूछा, तेरी पत्नी सारा कहां है? उस ने कहा, वह तो तम्बू में है।
उस ने कहा मैं वसन्त ऋतु में निश्चय तेरे पास फिर आऊंगा, और तब तेरी पत्नी सारा के एक पुत्र उत्पन्न होगा। और सारा तम्बू के द्वार पर जो इब्राहीम के पीछे था सुन रही थी।
इब्राहीम और सारा दोनो बहुत बूढ़े थे, और सारा का स्त्रीधर्म बन्द हो गया था;
सो सारा मन में हंस कर कहने लगी, मैं तो बूढ़ी हूं, और मेरा पति भी बूढ़ा है, तो क्या मुझे यह सुख होगा?
तब यहोवा ने इब्राहीम से कहा, सारा यह कह कर क्यों हंसी, कि क्या मेरे, जो ऐसी बुढिय़ा हो गई हूं, सचमुच एक पुत्र उत्पन्न होगा?
क्या यहोवा के लिये कोई काम कठिन है? नियत समय में, अर्थात वसन्त ऋतु में, मैं तेरे पास फिर आऊंगा, और सारा के पुत्र उत्पन्न होगा।

एक साल में बाइबल:
  • निर्गमन २९-३०
  • मत्ती २१:२३-४६

मंगलवार, 4 जनवरी 2011

तरबूज़ की गवाही

विलियम जैनिंग ब्रायन्स को यह जानकर अचंभा हुआ कि १ पौंड (आधा किलो से कुछ कम) वज़न पूरा करने के लिये तरबूज़ के लगभग ५००० बीज चाहिये होते हैं। उसने लिखा, "हाल ही में किसी ने तरबूज़ का एक छोटा बीज बो दिया। पानी और धूप के प्रभाव से, उस बीज ने अपना बाहरी छिलका उतार दिया और अपना काम करना आरंभ कर दिया। उसने अपने वज़न से २००,००० गुणा वज़न का सामान धरती और आकाश से जमा किया, उसे पतले से तने और डालियों में प्रवाहित किया और फिर उस बेल की डालियों में नये तरबूज़ बना दिये। हर तरबूज़ का हरे रंग का सख्त बाहरी खोल था, उसके अन्दर सफेद रंग की मोटी और कुछ कम सख्त रक्षा देने वाली परन्तु स्वाद में फीकी परत थी और फिर उसके अन्दर लाल रंग का नरम, मीठे रस से भरा गूदा था जिसमें ढेर सारे बीज जगह जगह रखे हुए थे, और हर बीज इसी प्रक्रिया को दोहराने की क्षमता रखता था। किस योजनाकार ने यह सब सिसिलेवार इतनी निपुणता से करने की योजना बनाई? उस छोटे से बीज में इतनी सामर्थ कैसे आई? उसे कैसे पता चला कि भिन्न रंग, सखती और स्वाद देने के लिये किस चीज़ को कितनी मात्रा में, कहां से लेकर, कब और कैसे औरों के साथ मिश्र्ति करना है कि हर तरबूज़ में यही नतीजा निकले, तथा हर तरबूज़ लगभग एक सी आकृति और आकार का ही हो?"

ब्रायन्स ने कहा कि यदि हम एक तरबूज़ की रचना को नहीं समझ और समझा पाते तो हम परमेश्वर को और उसकी असीम सामर्थ और कार्यविधी को कैसे समझ पाएंगे! इस तरह के अनेक और अद्भुत उदाहरण सृष्टि के प्रत्येक पहलू में रखकर परमेश्वर ने अपनी असीम सामर्थ और ज्ञान का उदाहरण दिया है जिसे हम अपने सीमित बुद्धि से कभी समझ नहीं सकते।

एक तरबूज़ की रचना में विदित परमेश्वर की अद्भुत सृष्टि हमें अचंभित कर सकती है। उसके अवर्णनीय आश्चर्यकर्मों को देखकर हम भजनकार के साथ नम्रता और विस्मय सहित उसके सन्मुख झुककर इतना ही कह सकते हैं "हे यहोवा तेरे काम अनगिनित हैं! इन सब वस्तुओं को तू ने बुद्धि से बनाया है; पृथ्वी तेरी सम्पत्ति से परिपूर्ण है।" - भजन १०४:२४ - हेनरी बौश


परमेश्वर की सृष्टि पर उसके हस्ताक्षर उसकी महिमा की घोषणा करते हैं।

हे यहोवा तेरे काम अनगिनित हैं! इन सब वस्तुओं को तू ने बुद्धि से बनाया है? पृथ्वी तेरी सम्पत्ति से परिपूर्ण है। - भजन १०४:२४


बाइबल पाठ: उत्पत्ति १:९-१३

फिर परमेश्वर ने कहा, आकाश के नीचे का जल एक स्थान में इकट्ठा हो जाए और सूखी भूमि दिखाई दे, और वैसा ही हो गया।
और परमेश्वर ने सूखी भूमि को पृथ्वी कहा, तथा जो जल इकट्ठा हुआ उसको उस ने समुद्र कहा: और परमेश्वर ने देखा कि अच्छा है।
फिर परमेश्वर ने कहा, पृथ्वी से हरी घास, तथा बीज वाले छोटे छोटे पेड़, और फलदाई वृक्ष भी जिनके बीज उन्ही में एक एक की जाति के अनुसार होते हैं पृथ्वी पर उगें, और वैसा ही हो गया।
तो पृथ्वी से हरी घास, और छोटे छोटे पेड़ जिन में अपनी अपनी जाति के अनुसार बीज होता है, और फलदाई वृक्ष जिनके बीज एक एक की जाति के अनुसार उन्ही में होते हैं उगे और परमेश्वर ने देखा कि अच्छा है।
तथा सांझ हुई फिर भोर हुआ। इस प्रकार तीसरा दिन हो गया।

एक साल में बाइबल:
  • उत्पत्ति १०-१२
  • मत्ती ४