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बुधवार, 11 फ़रवरी 2026

Blessed and Successful Life - 6 - Be a Man - 3 / आशीषित एवं सफल जीवन – 6 - पुरुषार्थ कर - 3

 

आशीषित एवं सफल जीवन – 6 - पुरुषार्थ कर - 3

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 पुरुषार्थ कर - 3

 

पुनःअवलोकन: पिछले लेख में हमने देखा था कि समस्याएं और विपरीत परिस्थितियाँ मसीही विश्वासी के जीवन का अभिन्न अंग हैं, और उन से बचने का कोई तरीका नहीं है। हमने लेख का अन्त यह कहने के साथ किया था कि शैतान हमेशा ही मसीहियों पर मुसीबतें और समस्याएँ लाता ही रहता है। ऐसा वह न केवल उनके लिए जीवन को कठिन बनाने के लिए करता है, वरन इसलिए भी कि उन्हें उनकी आशीषों और प्रतिफलों में कुछ हानि हो, तथा साथ ही उनकी गवाही को भी बिगाड़ सके जिससे कि लोग उनका अनुसरण न करें, मसीह में विश्वास नहीं करें, और उद्धार प्राप्त न कर सकें। इसलिए, मसीही विश्वासियों को निरन्तर प्रयास में लगे रहना चाहिए कि विश्वास के अपने जीवन को जी कर दिखाएँ, इसके लिए पुरुषार्थ करें, तथा परमेश्वर की सहायता से आशीषित और सफल हों, तथा उनके जीवनों से परमेश्वर को महिमा मिले। साथ ही हमने यह भी देखा था कि शैतान के इन हमलों, विपरीत परिस्थितियों का सामना करने के लिये, परमेश्वर ने सभी वास्तव में नया जन्म पाए हुए सभी मसीही विश्वासियों को उपयुक्त संसाधन भी दिये हैं। ये संसाधन हैं: उनके शिक्षक और सहायक के रूप में परमेश्वर पवित्र आत्मा (यूहन्ना 14:16, 26), उनका मार्गदर्शन करने के लिए अपना जीवता वचन (भजन 119:105), और उनके द्वारा सभी परिस्थितियों में धैर्य और संयम बनाए रखने के लिये, क्लेशों में ढाढ़स देने के लिये अपनी शान्ति (यूहन्ना 14:27; यूहन्ना 16:33)।


लेकिन, बहुधा यह प्रश्न उठाया जाता है, खास कर तब जब परिस्थितियाँ विकट हों, कि परमेश्वर मसीही विश्वासी के जीवन में इन समस्याओं और विपरीत परिस्थितियों को आने ही क्यों देता है? क्यों परमेश्वर शैतान की इन युक्तियों और हमलों को हम से दूर नहीं रखता है? जब भी हम इस प्रश्न का सामना करें, तो हमें हमेशा यह याद रखना चाहिए कि परमेश्वर की संतान के जीवन में बिना प्रभु परमेश्वर की इच्छा और अनुमति के कुछ नहीं हो सकता है; और उतना ही हो सकता है, जितने की परमेश्वर अनुमति देता है (1 कुरिन्थियों 10:13); और अन्ततः, सभी बातों के द्वारा, परमेश्वर ने कुछ भले ही की योजना बनाई है जो उसकी संतान के लाभ ही के लिए है (रोमियों 8:28)।


जब भी हम अपने जीवन और सम्बन्धित समस्याओं को लेकर परेशान हों, तब हमें हमेशा ध्यान करना चाहिए कि:

  • हमारा सृष्टिकर्ता परमेश्वर हम से बेहतर जानता है कि हमारी योग्यताएँ तथा क्षमताएँ क्या हैं; हम किस सीमा तक बर्दाश्त कर सकते हैं, सामना कर सकते हैं। परमेश्वर हमारे जीवनों में उतनी ही सीमा तक संघर्षों और समस्याओं को आने देता है, जिस सीमा तक हम व्यक्तिगत रीति से उनका सामना कर सकते हैं।

  • हम जब भी किसी भी परिस्थिति का सामना करें, तो यह ध्यान रखें कि सफलता पूर्वक उनमें से होकर हमें निकालने के लिए परमेश्वर हमेशा हमारे साथ रहता है (निर्गमन 4:12; मत्ती 10:19-20)।

  • परमेश्वर ने अपने लोगों के चारों और एक बाड़ा बाँधा है और शैतान उसे न तो तोड़ सकता है और न उसके अन्दर जा सकता है; वह तब ही हमारी हानि कर सकता है, जब हम बाड़े से बाहर आएँ (सभोपदेशक 10:8), और तब भी उतनी ही सीमा तक जितना परमेश्वर अनुमति देता है (अय्यूब 1:10; 2:6)।

  •  परमेश्वर कभी भी शैतान को हम पर ऐसी कोई बात नहीं लाने देगा, जिसका सफलता पूर्वक सामना करने के लिए परमेश्वर ने हमें पहले से ही योग्य नहीं बना रखा है, और जिसके लिए उचित और उपयुक्त सामर्थ्य, योग्यता, और बुद्धिमानी प्रदान नहीं कर रखी है (दानिय्येल 3:17; 2 तिमुथियुस 4:18; 2 पतरस 2:9)।

  • अन्ततः, ये संघर्ष विभिन्न प्रकार से हमारा अभ्यास करवाने के द्वारा, हमारे लिए भलाई और आशीष ही उत्पन्न करते हैं (यिर्मयाह 29:11; 2 कुरिन्थियों 4:17; रोमियों 5:3-5; रोमियों 8:28), तथा औरों के सामने परमेश्वर की देखभाल तथा सुरक्षा का उदाहरण बनते हैं।

 

इसलिए हमें समस्याओं और परिस्थितियों को सही रवैये के साथ स्वीकार करना सीखना चाहिए। जो भी परमेश्वर ने हमारे जीवनों में आ लेने या हो लेने दिया है, जो भी वह हम से करने के लिए कह रहा है, उसमें हमें हमेशा ही परमेश्वर पर भरोसा बनाए रखना चाहिए, कि उसने हमें पहले से ही उसका सामना करने के लिए उचित एवं उपयुक्त सामर्थ्य तथा आवश्यक संसाधन दे रखे हैं। ये समस्याएं और परिस्थितियाँ परमेश्वर से हमें मिलने वाले प्रतिफलों एवं महिमा तक पहुँचने के लिए हमारी सीढ़ियाँ हैं। और इन में होकर परमेश्वर न केवल हमें आशीष प्रदान करेगा, बल्कि मसीही जीवन में उन्नति करने में भी हमारी सहायता करेगा (2 कुरिन्थियों 4:16-17)।


परमेश्वर की विश्वासयोग्यता के पाठ परेशानियों में ही सबसे अच्छे से सीखे जाते हैं। हम मत्ती 14:24-31 में देखते हैं कि पतरस को पानी पर चलने के लिए अनुमति देने से पहले परमेश्वर ने तूफ़ान और लहरों को शांत नहीं किया; और न ही पतरस से यह बाद में कभी, जब तूफान और लहरें न हों, तब प्रयास करने के लिये कहा। बल्कि, उसी तूफान में ही पतरस को पानी पर चलने के लिए कहा – उसी कठिन समय में ही एक असंभव प्रतीत होने वाले कार्य को करने के लिए कहा। और जब तक पतरस प्रभु को देखता रहा, उस तूफ़ान में भी पानी पर चलता रहा; वह तब ही डूबने लगा जब उसने अपनी आँखें प्रभु से हटा कर तूफ़ान पर लगाईं। लूका 19 अध्याय में, अपनी व्यक्तिगत सीमाओं के बावजूद, ज़क्कई ने ठान लिया था कि वह कैसे भी हो, प्रभु यीशु को अवश्य ही देखेगा। उसने पुरुषार्थ दिखाया, परिश्रम किया, और न केवल सफल रहा, बल्कि प्रभु द्वारा आशीष भी प्राप्त की, उसका जीवन बदल गया, और आज भी वह औरों को प्रभु की और आकर्षित करता है।


हमें इस बात का एहसास करना चाहिए और उसे सीखना चाहिए कि परमेश्वर हमारे लिए परिस्थितियों को बदल कर उन्हें आसान और सहने योग्य नहीं कर देता है; बल्कि वह हमें बदलता है, वह हमें परिस्थितियों का सामना करने और उन पर जयवंत होने के योग्य बना देता है। यह करने के द्वारा वह हमें दिखाता है कि हम क्या कुछ करने की क्षमता रखते हैं, परमेश्वर की सहायता और मार्गदर्शन से हम कितने महान काम कर सकते हैं। बस हमें पुरुषार्थ करने और अपने मसीही विश्वास के जीवनों में जयवन्त होने के लिए परिश्रम करने वाला होना चाहिए।


यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। स्वेच्छा से अपने पापों के लिये पश्चाताप करके, प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु, मैं अपने पापों के लिए पश्चातापी हूँ, उनके लिए आप से क्षमा माँगता हूँ। मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मुझे और मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।



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Blessed and Successful Life - 6 - Be a Man - 3

English Translation

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Be a Man - 3 


Review: In the previous article we had seen that problems and adverse situations are a part of life for the Christian Believer, and there is no escaping from them for him. We had closed the article by saying that Satan always keeps bringing trouble and problems upon Christians, not only to make life difficult for them, but to also try and cause harm to their rewards, as well as to spoil their testimony so that others may be prevented from emulating them in coming to faith in Christ Jesus and being saved. Therefore, the Christian Believers need to constantly be striving to live out their life of Faith and be manly for this, be blessed and successful from God, and glorify God through our lives. We had also seen that to be able to face these satanic attacks and all adverse circumstances, God has given to all truly Born-Again Christian Believers the required provisions. These provisions are: His Holy Spirit to help and teach us (John 14:16, 26), His Living Word to guide us (Psalm 119:105), and to help us maintain a calm composure in all circumstances, and comfort us in our tribulations, He has given us His peace (John 14:27; John 16:33).

But then, one is often tempted to ask, more so when in daunting situations and adverse circumstances, why does God allow these problems and adverse situations to come in a Christian Believer’s life? Why does God not keep these satanic ploys and attacks away from us? Whenever we face this question, we should always keep in mind that nothing happens in the life of a child of God without the permission and outside the will of the Lord, and then, only to the extent He allows (1 Corinthians 10:13), and eventually through them all, God has planned something good and beneficial for His child (Romans 8:28).

When perplexed about our life and problems, we should always keep in mind that:

  • Our creator God knows better than us what our own abilities and capabilities are; how much we can face and handle. God allows these struggles and problems in our lives, only to the extent that we as individuals can handle them.

  • When we are facing any situations, God is always there to help us go through them (Exodus 4:12; Matthew 10:19-20).

  • God has put a hedge around His people and Satan cannot breach or cross it; he can only do harm if we come out of that hedge (Ecclesiastes 10:8), and to the extent that God permits him to do (Job 1:10; 2:6).

  • God will never permit Satan to bring upon us anything that God has not already made us capable of handling, and has not already given us the strength, ability, and wisdom to manage (Daniel 3:17; 2 Timothy 4:18; 2 Peter 2:9).

  • Eventually, these struggles, by exercising us in various ways, serve to work for our benefit and blessings (Jeremiah 29:11; 2 Corinthians 4:17; Romans 5:3-5; Romans 8:28), and also serve as examples for others, of God’s care and security.

Therefore, we must learn to accept and take the problems and situations with the right attitude. We must keep trusting that whatever God has allowed to come or happen in our lives, whatever He is asking us to do, He already has made us capable of managing that situation and has provided the required resources as well. These problems and situations are our stepping stones to glory and rewards from God. And through them not only will God bless us, but will also help us grow in our Christian life (2 Corinthians 4:16-17).

Lessons of God's faithfulness are learnt best when facing adversities. We see in Matthew 14:24-31, Lord Jesus did not calm the storm and waves before permitting Peter to walk on water; nor did He ask Peter to attempt doing so, some other time, when there were no storms and waves. Rather, He asked Peter to walk on the water, in that storm itself - do the seemingly impossible at that very difficult time. And Peter, so long as he was looking at the Lord, walked on the water, in the storm; it was only when Peter started looking at the storm instead of the Lord Jesus, that he started to sink. In Luke 19 Zacchaeus, despite his personal limitations, decided to see Jesus any which way he could. He chose to be a man, and strove to do it; and he was not only successful, but was also blessed by the Lord, his life was changed, and even today he is attracting people to the Lord.

We must realize and learn that the Lord God does not change the situations for us to make them easy and tolerable for us; instead, He changes us, He makes us capable of facing and overcoming the situations. Through this, He shows us what all we are actually capable of doing, and how great things we can accomplish through the help and guidance of God, if we are willing to be a man and strive to be victorious in our Christian lives.


If you have not yet accepted the discipleship of the Lord, make your decision in favor of the Lord Jesus now to ensure your eternal life and heavenly blessings. Where there is obedience to the Lord, where there is respect and obedience to His Word, there is also the blessing and protection of the Lord. Repenting of your sins, and asking the Lord Jesus for forgiveness of your sins, voluntarily and sincerely, surrendering yourself to Him - is the only way to salvation and heavenly life. You only have to say a short but sincere prayer to the Lord Jesus Christ willingly and with a penitent heart, and at the same time completely commit and submit your life to Him. You can also make this prayer and submission in words something like, “Lord Jesus, I am sorry for my sins and repent of them. I thank you for taking my sins upon yourself, paying for them through your life.  Because of them you died on the cross in my place, were buried, and you rose again from the grave on the third day for my salvation, and today you are the living Lord God and have freely provided to me the forgiveness, and redemption from my sins, through faith in you. Please forgive my sins, take me under your care, and make me your disciple. I submit my life into your hands." Your one prayer from a sincere and committed heart will make your present and future life, in this world and in the hereafter, heavenly and blessed for eternity.


 

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गुरुवार, 31 अगस्त 2023

Blessed and Successful Life / आशीषित एवं सफल जीवन – 6 – Be a man / पुरुषार्थ कर – 3

पुरुषार्थ करना – 3

 

    पिछले लेख में हमने देखा था कि समस्याएं और विपरीत परिस्थितियाँ मसीही विश्वासी के जीवन का अभिन्न अंग हैं, और उन से बचने का कोई तरीका नहीं है। हमने लेख का अन्त यह कहने के साथ किया था कि शैतान हमेशा ही मसीहियों पर मुसीबतें और समस्याएँ लाता ही रहता है। ऐसा वह न केवल उनके लिए जीवन को कठिन बनाने के लिए करता है, वरन इसलिए भी कि उन्हें उनकी आशीषों और प्रतिफलों में कुछ हानि हो, तथा साथ ही उनकी गवाही को भी बिगाड़ सके जिससे कि लोग उनका अनुसरण न करें, मसीह में विश्वास नहीं करें और उद्धार प्राप्त न कर सकें। इसलिए, मसीही विश्वासियों को निरन्तर प्रयास में लगे रहना चाहिए कि विश्वास के अपने जीवन को जी कर दिखाएँ, इसके लिए पुरुषार्थ करें, तथा परमेश्वर की सहायता से आशीषित और सफल हों, तथा उनके जीवनों से परमेश्वर को महिमा मिले।

    लेकिन, बहुधा यह प्रश्न उठाया जाता है, खास कर तब जब परिस्थितियाँ विकट हों, कि परमेश्वर मसीही विश्वासी के जीवन में इन समस्याओं और विपरीत परिस्थितियों को आने ही क्यों देता है? क्यों परमेश्वर शैतान की इन युक्तियों और हमलों को हम से दूर नहीं रखता है? जब भी हम इस प्रश्न का सामना करें, तो हमें हमेशा यह याद रखना चाहिए कि परमेश्वर की संतान के जीवन में बिना प्रभु परमेश्वर की इच्छा और अनुमति के कुछ नहीं हो सकता है; और उतना ही हो सकता है, जितने की परमेश्वर अनुमति देता है (1 कुरिन्थियों 10:13); और अन्ततः, सभी बातों के द्वारा, परमेश्वर ने कुछ भले ही की योजना बनाई है जो उसकी संतान के लाभ ही के लिए है (रोमियों 8:28)।

जब भी हम अपने जीवन और सम्बन्धित समस्याओं को लेकर परेशान हों, तो हमें हमेशा ध्यान करना चाहिए कि:

·        हमारा सृष्टिकर्ता परमेश्वर हम से बेहतर जानता है कि हमारी योग्यताएँ तथा क्षमताएँ क्या हैं; हम किसे सीमा तक बर्दाश्त कर सकते हैं, सामना कर सकते हैं। परमेश्वर हमारे जीवनों में उतनी ही सीमा तक संघर्षों और समस्याओं को आने देता है, जिस सीमा तक हम व्यक्तिगत रीति से उनका सामना कर सकते हैं।

·        हम जब भी किसी भी परिस्थिति का सामना करें, तो यह ध्यान रखें कि सफलता पूर्वक उनमें से होकर हमें निकालने के लिए परमेश्वर हमेशा हमारे साथ रहता है (निर्गमन 4:12; मत्ती 10:19-20)।

·        परमेश्वर ने अपने लोगों के चारों और एक बाड़ा बाँधा है और शैतान उसे न तो तोड़ सकता है और न उसके अन्दर जा सकता है; वह तब ही हमारी हानि कर सकता है, जब हम बाड़े से बाहर आएँ, और तब भी उतनी ही सीमा तक जितना परमेश्वर अनुमति देता है (अय्यूब 1:10; 2:6)।

·        परमेश्वर कभी भी शैतान को हम पर ऐसी कोई बात नहीं लाने देगा, जिसका सफलता पूर्वक सामना करने के लिए परमेश्वर ने हमें पहले से ही योग्य नहीं बना रखा है, और जिसके लिए उचित और उपयुक्त सामर्थ्य, योग्यता, और बुद्धिमानी प्रदान नहीं कर रखी है (दानिय्येल 3:17; 2 तिमुथियुस 4:18; 2 पतरस 2:9)।

·        अन्ततः, ये संघर्ष विभिन्न प्रकार से हमारा अभ्यास करवाने के द्वारा, हमारे लिए भलाई और आशीष ही उत्पन्न करते हैं (यिर्मयाह 29:11; 2 कुरिन्थियों 4:17; रोमियों 5:3-5; रोमियों 8:28), तथा औरों के सामने परमेश्वर की देखभाल तथा सुरक्षा का उदाहरण बनते हैं।

 

    इसलिए हमें समस्याओं और परिस्थितियों को सही रवैये के साथ स्वीकार करना सीखना चाहिए। जो भी परमेश्वर ने हमारे जीवनों में आ लेने दिया है, जो भी वह हम से करने के लिए कह रहा है, उसमें हमें हमेशा ही परमेश्वर पर भरोसा बनाए रखना चाहिए; यह जानते हुए कि उसने हमें पहले से ही उसका सामना करने के लिए उचित एवं उपयुक्त सामर्थ्य तथा आवश्यक संसाधन दे रखे हैं। ये समस्याएं और परिस्थितियाँ परमेश्वर से हमें मिलने वाले प्रतिफलों एवं महिमा तक पहुँचने के लिए हमारी सीढ़ियाँ हैं। और इन में होकर परमेश्वर न केवल हमें आशीष प्रदान करेगा, बल्कि मसीही जीवन में उन्नति करने में भी हमारी सहायता करेगा।


    परमेश्वर की विश्वासयोग्यता के पाठ परेशानियों में ही सबसे अच्छे से सीखे जाते हैं। हम मत्ती 14:24-31 में देखते हैं कि पतरस को पानी पर चलने के लिए अनुमति देने से पहले परमेश्वर ने तूफ़ान और लहरों को शांत नहीं किया। बल्कि, उसी तूफान में ही पतरस को पानी पर चलने के लिए कहा – एक असंभव प्रतीत होने वाले कार्य को करने के लिए कहा। और जब तक पतरस प्रभु को देखता रहा, उस तूफ़ान में भी पानी पर चलता रहा; वह तब ही डूबने लगा जब उसने अपनी आँखें प्रभु से हटा कर तूफ़ान पर लगाईं। लूका 19 अध्याय में, अपनी व्यक्तिगत सीमाओं के बावजूद, ज़क्कई ने ठान लिया था कि वह कैसे भी हो, प्रभु यीशु को अवश्य ही देखेगा। उसने पुरुषार्थ दिखाया, परिश्रम किया, और न केवल सफल रहा, बल्कि प्रभु द्वारा आशीष भी प्राप्त की, उसका जीवन बदल गया, और आज भी वह औरों को प्रभु की और आकर्षित करता है।


    हमें इस बात का एहसास करना चाहिए और उसे सीखना चाहिए कि परमेश्वर हमारे लिए परिस्थितियों को बदल कर उन्हें आसान और सहने योग्य नहीं कर देता है; बल्कि वह हमें बदलता है, वह हमें परिस्थितियों का सामना करने और उन पर जयवंत होने के योग्य बना देता है। यह करने के द्वारा वह हमें दिखाता है कि हम क्या कुछ करने की क्षमता रखते हैं, परमेश्वर की सहायता और मार्गदर्शन से हम कितने महान काम कर सकते हैं। बस हमें पुरुषार्थ करने और अपने मसीही विश्वास के जीवनों में जयवन्त होने के लिए परिश्रम करने वाला होना चाहिए।


    यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु, मैं अपने पापों के लिए पश्चातापी हूँ, उनके लिए आप से क्षमा माँगता हूँ। मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मुझे और मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

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Being a Man - 3

 

    In the previous article we had seen that problems and adverse situations are a part of life for the Christian Believer, and there is no escaping from them for him. We had closed the article by saying that Satan always keeps bringing trouble and problems upon Christians, not only to make life difficult for them, but to also try and cause harm to their rewards, as well as to spoil their testimony so that others may be prevented from emulating them in coming to faith in Christ Jesus and being saved. Therefore, the Christian Believers need to constantly be striving to live out their life of Faith and be manly for doing this, and to be blessed and successful from God, and to glorify God through our lives.

    But then, one is often tempted to ask, more so when in daunting circumstances, why does God allow these problems and adverse situations in a Christian Believer’s life? Why does God not keep these satanic ploys and attacks away from us? When faced with this question, we should keep in mind that nothing happens in the life of a child of God without the permission and outside the will of the Lord, and then, only to the extent He allows (1 Corinthians 10:13), and eventually through them all, God has planned something good and beneficial for His child (Romans 8:28).

    When perplexed about our life and problems, we should always keep in mind that:

  • Our creator God knows better than us what our abilities and capabilities are; how much we can face and handle. God allows these struggles and problems in our lives, only to the extent that we as individuals can handle them.

  • When we are facing any situations, God is always there to help us go through them (Exodus 4:12; Matthew 10:19-20).

  • God has put a hedge around His people and Satan cannot breach or cross it; he can only do harm if we come out of that hedge, and to the extent that God permits him to do (Job 1:10; 2:6).

  • God will never permit Satan to bring upon us anything that God has not already made us capable of tackling, and has not already given us the strength, ability, and wisdom to handle (Daniel 3:17; 2 Timothy 4:18; 2 Peter 2:9).

  • Eventually, these struggles, by exercising us in various ways, serve to work for our benefit and blessings (Jeremiah 29:11; 2 Corinthians 4:17; Romans 5:3-5; Romans 8:28), and as examples of God’s care and security for others.

    Therefore, we must learn to accept and take the problems and situations with the right attitude. We must keep trusting that what God has allowed in our lives, whatever He is asking us to do, He already has made us capable of managing that situation and has provided the required resources as well. These problems and situations are our stepping stones to glory and rewards from God. And through them not only will God bless us, but will also help us grow in our Christian life.

    Lessons of God's faithfulness are learnt best when facing adversities. In Matthew 14:24-31, Lord Jesus did not calm the storm and waves before asking Peter to walk on water. Rather, He asked Peter to walk on the water - do the seemingly impossible, in that storm. And Peter, so long as he was looking at the Lord, walked on the water, in the storm; it was only when Peter started looking at the storm instead of the Lord Jesus, that he started to sink. In Luke 19 Zacchaeus despite his personal limitations decided to see Jesus any which way he could. He strove to do it like a man, and was not only successful, but was also blessed by the Lord, his life was changed, and even today he is attracting people to the Lord.

    We must realize and learn that the Lord God does not change the situations for us to make them easy and tolerable for us; instead, He changes us, He makes us capable of facing and overcoming the situations. Through this, He shows us what all we are actually capable of doing, and how great things we can accomplish through the help and guidance of God, if we are willing to be a man and strive to be victorious in our Christian lives.


    If you have not yet accepted the discipleship of the Lord, make your decision in favor of the Lord Jesus now to ensure your eternal life and heavenly blessings. Where there is obedience to the Lord, where there is respect and obedience to His Word, there is also the blessing and protection of the Lord. Repenting of your sins, and asking the Lord Jesus for forgiveness of your sins, voluntarily and sincerely, surrendering yourself to Him - is the only way to salvation and heavenly life. You only have to say a short but sincere prayer to the Lord Jesus Christ willingly and with a penitent heart, and at the same time completely commit and submit your life to Him. You can also make this prayer and submission in words something like, “Lord Jesus, I am sorry for my sins and repent of them. I thank you for taking my sins upon yourself, paying for them through your life.  Because of them you died on the cross in my place, were buried, and you rose again from the grave on the third day for my salvation, and today you are the living Lord God and have freely provided to me the forgiveness, and redemption from my sins, through faith in you. Please forgive my sins, take me under your care, and make me your disciple. I submit my life into your hands." Your one prayer from a sincere and committed heart will make your present and future life, in this world and in the hereafter, heavenly and blessed for eternity.

 

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गुरुवार, 27 अगस्त 2020

सेवा

 

         शिक्षा मनोवैज्ञानिक बेंजामिन ब्लूम ने जवान लोगों में प्रतिभा को विकसित करने पर शोध किया, और 120 उत्कृष्ट लोगों, जिनमें खिलाड़ी, कलाकार, विद्वान सम्मिलित थे, के बचपन का अध्ययन किया तो उसने पाया कि उन सभी में एक बात पाई जाती थी – उन्होंने अपने कार्य के लिए लम्बे समय तक कड़ा अभ्यास किया था।

         ब्लूम के शोध से यह संकेत मिलता है कि हमारे जीवन के किसी भी क्षेत्र में उन्नति करने के लिए हमें अनुशासित होना पड़ता है। परमेश्वर के साथ हमारे संबंध में भी एक आत्मिक अनुशासन की आवश्यकता होती है, और उसके साथ नियमित समय बिताना, उसके वचन के अध्ययन और प्रार्थना में, उसमें हमारे विश्वास को बनाए रखने का एक तरीका है।

         परमेश्वर के वचन बाइबल में दानिय्येल एक उत्तम उदाहरण है परमेश्वर के साथ अनुशासित संबंध को बनाए रखने वाले व्यक्ति का। अपने लड़कपन में ही दानिय्येल ने सोच-समझ कर और बुद्धिमानी के साथ निर्णय लेने आरंभ कर दिया था (1:8)। वह नियमित प्रार्थना करने वाला, और परमेश्वर को धन्यवाद करने वाला व्यक्ति भी था (6:10)। उसके बारंबार हर बात के लिए परमेश्वर और उसकी इच्छा का खोजी होने के द्वारा उसका जीवन ऐसा हो गया था कि उसके आस-पास के लोग परमेश्वर में उसके विश्वास को स्पष्ट देख सकते थे। दारा राजा ने तो उसे “जीवित परमेश्वर का दास” (पद 20) और दो बार “निरंतर” परमेश्वर की सेवा करने वाला कहा था (पद 16, 20)।

         दानिय्येल के समान हमें भी परमेश्वर को भली-भांति जानना बहुत आवश्यक है। यह कितनी दिलासा देने वाली बात है कि परमेश्वर हम में ऐसे कार्य करता है जिससे हम में उसके साथ समय बिताने की लालसा उत्पन्न हो सके (फिलिप्पियों 2:13)। इसलिए हम परमेश्वर के पास अनुशासित होकर नियमित आया करें, इस बात पर भरोसा रखते हुए कि उसके साथ बिताए गए समय के द्वारा हम में उसके प्रति प्रेम बढ़ता जाएगा, और हम अपने उद्धारकर्ता के ज्ञान और समझ में बढ़ते जाएँगे, जो फिर परमेश्वर के लिए हमारी सेवा को भी और उन्नत करता जाएगा। - कीला ओकोआ

 

परमेश्वर के साथ बिताया गया समय हमें बदल देता है।


क्योंकि परमेश्वर ही है, जिस न अपनी सुइच्‍छा निमित्त तुम्हारे मन में इच्छा और काम, दोनों बातों के करने का प्रभाव डाला है। - फिलिप्पियों 2:13

बाइबल पाठ: दानिय्येल 6:10-22

दानिय्येल 6:10 जब दानिय्येल को मालूम हुआ कि उस पत्र पर हस्ताक्षर किया गया है, तब वह अपने घर में गया जिसकी उपरौठी कोठरी की खिड़कियां यरूशलेम के सामने खुली रहती थीं, और अपनी रीति के अनुसार जैसा वह दिन में तीन बार अपने परमेश्वर के सामने घुटने टेक कर प्रार्थना और धन्यवाद करता था, वैसा ही तब भी करता रहा।

दानिय्येल 6:11 तब उन पुरुषों ने उतावली से आकर दानिय्येल को अपने परमेश्वर के सामने बिनती करते और गिड़गिड़ाते हुए पाया।

दानिय्येल 6:12 सो वे राजा के पास जा कर, उसकी राज-आज्ञा के विषय में उस से कहने लगे, हे राजा, क्या तू ने ऐसे आज्ञापत्र पर हस्ताक्षर नहीं किया कि तीस दिन तक जो कोई तुझे छोड़ किसी मनुष्य या देवता से बिनती करेगा, वह सिंहों की माँद में डाल दिया जाएगा? राजा ने उत्तर दिया, हां, मादियों और फारसियों की अटल व्यवस्था के अनुसार यह बात स्थिर है।

दानिय्येल 6:13 तब उन्होंने राजा से कहा, यहूदी बंधुओं में से जो दानिय्येल है, उसने, हे राजा, न तो तेरी ओर कुछ ध्यान दिया, और न तेरे हस्ताक्षर किए हुए आज्ञापत्र की ओर; वह दिन में तीन बार बिनती किया करता है।

दानिय्येल 6:14 यह वचन सुनकर, राजा बहुत उदास हुआ, और दानिय्येल के बचाने के उपाय सोचने लगा; और सूर्य के अस्त होने तक उसके बचाने का यत्न करता रहा।

दानिय्येल 6:15 तब वे पुरुष राजा के पास उतावली से आकर कहने लगे, हे राजा, यह जान रख, कि मादियों और फारसियों में यह व्यवस्था है कि जो जो मनाही या आज्ञा राजा ठहराए, वह नहीं बदल सकती।

दानिय्येल 6:16 तब राजा ने आज्ञा दी, और दानिय्येल लाकर सिंहों की माँद में डाल दिया गया। उस समय राजा ने दानिय्येल से कहा, तेरा परमेश्वर जिसकी तू नित्य उपासना करता है, वही तुझे बचाए!

दानिय्येल 6:17 तब एक पत्थर लाकर उस गड़हे के मुंह पर रखा गया, और राजा ने उस पर अपनी अंगूठी से, और अपने प्रधानों की अंगूठियों से मुहर लगा दी कि दानिय्येल के विषय में कुछ बदलने ने पाए।

दानिय्येल 6:18 तब राजा अपने महल में चला गया, और उस रात को बिना भोजन पड़ा रहा; और उसके पास सुख विलास की कोई वस्तु नहीं पहुंचाई गई, और उसे नींद भी नहीं आई।

दानिय्येल 6:19 भोर को पौ फटते ही राजा उठा, और सिंहों के गड़हे की ओर फुर्ती से चला गया।

दानिय्येल 6:20 जब राजा गड़हे के निकट आया, तब शोक भरी वाणी से चिल्लाने लगा और दानिय्येल से कहा, हे दानिय्येल, हे जीवते परमेश्वर के दास, क्या तेरा परमेश्वर जिसकी तू नित्य उपासना करता है, तुझे सिंहों से बचा सका है?

दानिय्येल 6:21 तब दानिय्येल ने राजा से कहा, हे राजा, तू युग-युग जीवित रहे!

दानिय्येल 6:22 मेरे परमेश्वर ने अपना दूत भेज कर सिंहों के मुंह को ऐसा बन्द कर रखा कि उन्होंने मेरी कुछ भी हानि नहीं की; इसका कारण यह है, कि मैं उसके सामने निर्दोष पाया गया; और हे राजा, तेरे सम्मुख भी मैं ने कोई भूल नहीं की।

 

एक साल में बाइबल: 

  • भजन 120-122
  • 1 कुरिन्थियों 9

शनिवार, 4 जनवरी 2014

अभ्यास


   नव वर्ष का आरंभ अकसर वह समय होता है जब हम अपने लिए कुछ निर्णय लेते हैं कि हम अपनी देखभाल भली भांति करेंगे, व्यायाम करेंगे, सही भोजन सही मात्रा में खाएंगे और बीते समय में जमा किए हुए वज़न को कम करेंगे। इसलिए मैं भी प्रयास करता हूँ की यथासंभव स्वस्थ बना रह सकूँ - मैं सही भोजन खाने का प्रयास करता हूँ - कभी कभी कुछ इधर उधर का हो जाता है, लेकिन प्रयास सही भोजन का ही रहता है; मैं व्यायाम करता हूँ, सैर पर जाता हूँ। परमेश्वर के वचन बाइबल में प्रेरित पौलुस ने कहा है: "क्योंकि देह की साधना से कम लाभ होता है, पर भक्ति सब बातों के लिये लाभदायक है, क्योंकि इस समय के और आने वाले जीवन की भी प्रतिज्ञा इसी के लिये है" (1 तिमुथियुस 4:8); और मैं जानता हूँ कि मेरा शरीर इस संसार में बहुत लम्बे समय तक कायम नहीं रहेगा, उसकी सामर्थ और क्षमता क्षीण होती जा रही है। इसलिए मेरे लिए यह बेहतर है कि मैं अपने शरीर की अपेक्षा उस भक्ति पर अधिक ध्यान दूँ जो परमेश्वर के वचन बाइबल के निर्देश के अनुसार है और जो मेरे ना केवल इस संसार के वरन इस संसार के बाद के जीवन के लिए भी लाभदायक होगी। यह तो निश्चित है कि इस संसार से हम कुछ तो लेकर जाएंगे, यहाँ की धन दौलत शोहरत इत्यादि ना सही परन्तु यहाँ इस संसार में रहते हुए कमाए गए और उस आते जीवन में मिलने वाले हमारे प्रतिफल तो हमारे साथ ही जाएंगे।

   हो सकता है कि यह ईश्वरीय भक्ति नीरस, भयावह और हमें अपनी पहुँच से बाहर प्रतीत हो, लेकिन उस ईश्वरीय भक्ति का सार केवल आत्म-त्याग वाला प्रेम है - अपने आप से अधिक दूसरों की चिन्ता करना। इस प्रकार का प्रेम मिलना दुर्लभ है; केवल प्रभु यीशु का प्रेम ही ऐसा प्रेम है, और प्रभु यीशु अपने प्रत्येक अनुयायी को यही प्रेम कर सकने की सामर्थ अपने पवित्र आत्मा की शक्ति से प्रदान करता है। हम मसीही विश्वासियों को प्रभु यीशु पर विश्वास रखते हुए उसकी आज्ञाकारिता के द्वारा इस प्रेम को प्रगट और प्रदर्शित करते रहना है। जितना हम प्रभु यीशु के चरणों पर बैठकर उसकी बात सुनेंगे, उससे वार्तालाप करेंगे, अपने मनों की बातें उसके साथ बाँटेंगे, उतना अधिक हम उसकी समानता में ढलते जाएंगे और उसके इस निस्वार्थ प्रेम को अपने जीवनों से प्रगट करने वाले बनते जाएंगे।

   मुझे लगता है कि जीवन, प्रेम में बढ़ते जाने की एक यात्रा है और मैं जानता तथा मानता हूँ कि इसके लिए प्रभु यीशु के प्रेम के समान और कोई प्रेम नहीं है। शारीरिक व्यायाम और अभ्यास से निःसन्देह कुछ लाभ अवश्य होगा, लेकिन इससे भी बढ़कर कुछ और है, एक और अभ्यास है - प्रभु यीशु का प्रेम, उसमें बने रहने, दूसरों को उसके बारे में बताते रहने और उस प्रेम में बढ़ते जाने का अभ्यास। इस नव वर्ष के अपनी उन्नति के निर्णयों में इस अभ्यास को भी सम्मिलित कर लीजिए। - डेविड रोपर


ईश्वरीय भक्ति का प्रगट रूप ही प्रेम है।

इसलिये पहिले तुम उसे राज्य और धर्म की खोज करो तो ये सब वस्तुएं भी तुम्हें मिल जाएंगी। - मत्ती 6:33

बाइबल पाठ: 1 तिमुथियुस 4:6-11
1 Timothy 4:6 यदि तू भाइयों को इन बातों की सुधि दिलाता रहेगा, तो मसीह यीशु का अच्छा सेवक ठहरेगा: और विश्वास और उस अच्‍छे उपदेश की बातों से, जा तू मानता आया है, तेरा पालन-पोषण होता रहेगा। 
1 Timothy 4:7 पर अशुद्ध और बूढिय़ों की सी कहानियों से अलग रह; और भक्ति के लिये अपना साधन कर। 
1 Timothy 4:8 क्योंकि देह की साधना से कम लाभ होता है, पर भक्ति सब बातों के लिये लाभदायक है, क्योंकि इस समय के और आने वाले जीवन की भी प्रतिज्ञा इसी के लिये है। 
1 Timothy 4:9 और यह बात सच और हर प्रकार से मानने के योग्य है। 
1 Timothy 4:10 क्योंकि हम परिश्रम और यत्‍न इसी लिये करते हैं, कि हमारी आशा उस जीवते परमेश्वर पर है; जो सब मनुष्यों का, और निज कर के विश्वासियों का उद्धारकर्ता है। 
1 Timothy 4:11 इन बातों की आज्ञा कर, और सिखाता रह।

एक साल में बाइबल: 
  • उत्पत्ति 10-11


गुरुवार, 17 अक्टूबर 2013

सदगुण

   न्यूयॉर्क के ब्रौंक्स इलाके के एक कॉलेज फुटबॉल प्रशिक्षक, क्लेटन हैन्ड्रिक-होम्स, ने मैरिटाईम कॉलेज की टीम को चरित्र के सदगुणों के साथ प्रशिक्षित किया। उन्होंने खिलाड़ियों की कमीज़ पर खिलाड़ियों के नाम के स्थान पर कुछ शब्द लिखवाए, जैसे परिवार, आदर, जवाबदेही, चरित्र आदि। प्रत्येक खेल से पहले क्लेटन अपनी टीम से कहते कि उन शब्दों से संबंधित सदगुण के सिद्धांतों के अनुसार खेल खेलें।

   परमेश्वर के वचन बाइबल में भी प्रेरित पतरस ने कुछ मसीही सदगुणों की सूची दी (2 पतरस 1:5-7), जिसे मसीही विश्वासियों को अपने विश्वास के साथ जोड़ लेना चाहिए। सुची के सदगुण इस प्रकार हैं:
  • सदगुण - नेक आचरण से परिपूर्ण जीवन के साथ परमेश्वर के उद्देश्य पूरे करने के लिए।
  • समझ - परमेश्वर के वचन के अध्ययन द्वारा झूठी शिक्षाओं से बचे रहने की सूझ-बूझ।
  • संयम - परमेश्वर को अपने जीवन में इतना आदर देना कि हर प्रत्युत्तर परमेश्वर कि महिमा के लिए हो।
  • धीरज - परमेश्वर पर ऐसा भरोसा बनाए रखना कि प्रत्येक परिस्थिति में अन्ततः भलाई ही होने के आशावान बने रहें।
  • भक्ति - जीवन के प्रत्येक संबंध में परमेश्वर को आदर देना।
  • भाईचारा - मसीही सहविश्वासियों के प्रति स्नेहपूर्ण व्यवहार बनाए रखना।
  • प्रेम - दूसरों की भलाई के लिए त्याग का भाव रखना।


हम मसीही विश्वासियों को चाहिए कि इन सदगुणों को अपने जीवन में ना केवल बनाए रखें वरन उन्हें बढ़ाते रहें और अपने जीवन का अभिन्न अंग बनाए रखें। - ऐनी सेटास


सदगुणपूर्ण आचरण की कुँजी ईश्वरीय सदगुणों का सतत अभ्यास है।

क्योंकि उसके ईश्वरीय सामर्थ ने सब कुछ जो जीवन और भक्ति से सम्बन्‍ध रखता है, हमें उसी की पहचान के द्वारा दिया है, जिसने हमें अपनी ही महिमा और सद्गुण के अनुसार बुलाया है। - 2 पतरस 1:3

बाइबल पाठ: 2 पतरस 1:1-11
2 Peter 1:1 शमौन पतरस की और से जो यीशु मसीह का दास और प्रेरित है, उन लोगों के नाम जिन्होंने हमारे परमेश्वर और उद्धारकर्ता यीशु मसीह की धामिर्कता से हमारा सा बहुमूल्य विश्वास प्राप्त किया है। 
2 Peter 1:2 परमेश्वर के और हमारे प्रभु यीशु की पहचान के द्वारा अनुग्रह और शान्‍ति तुम में बहुतायत से बढ़ती जाए। 
2 Peter 1:3 क्योंकि उसके ईश्वरीय सामर्थ ने सब कुछ जो जीवन और भक्ति से सम्बन्‍ध रखता है, हमें उसी की पहचान के द्वारा दिया है, जिसने हमें अपनी ही महिमा और सद्गुण के अनुसार बुलाया है। 
2 Peter 1:4 जिन के द्वारा उसने हमें बहुमूल्य और बहुत ही बड़ी प्रतिज्ञाएं दी हैं: ताकि इन के द्वारा तुम उस सड़ाहट से छूट कर जो संसार में बुरी अभिलाषाओं से होती है, ईश्वरीय स्‍वभाव के समभागी हो जाओ। 
2 Peter 1:5 और इसी कारण तुम सब प्रकार का यत्‍न कर के, अपने विश्वास पर सद्गुण, और सद्गुण पर समझ। 
2 Peter 1:6 और समझ पर संयम, और संयम पर धीरज, और धीरज पर भक्ति। 
2 Peter 1:7 और भक्ति पर भाईचारे की प्रीति, और भाईचारे की प्रीति पर प्रेम बढ़ाते जाओ। 
2 Peter 1:8 क्योंकि यदि ये बातें तुम में वर्तमान रहें, और बढ़ती जाएं, तो तुम्हें हमारे प्रभु यीशु मसीह के पहचानने में निकम्मे और निष्‍फल न होने देंगी। 
2 Peter 1:9 और जिस में ये बातें नहीं, वह अन्‍धा है, और धुन्‍धला देखता है, और अपने पूर्वकाली पापों से धुल कर शुद्ध होने को भूल बैठा है। 
2 Peter 1:10 इस कारण हे भाइयों, अपने बुलाए जाने, और चुन लिये जाने को सिद्ध करने का भली भांति यत्‍न करते जाओ, क्योंकि यदि ऐसा करोगे, तो कभी भी ठोकर न खाओगे। 
2 Peter 1:11 वरन इस रीति से तुम हमारे प्रभु और उद्धारकर्ता यीशु मसीह के अनन्त राज्य में बड़े आदर के साथ प्रवेश करने पाओगे।

एक साल में बाइबल: 
  • यशायाह 50-52 
  • 1 थिस्सुलुनीकियों 5


गुरुवार, 30 दिसंबर 2010

सही उद्देश्य

वह खिलाड़ी अपने अभ्यास और व्यायाम को काफी समय से छोड़ चुका था। अब उसने फिर से अभ्यास आरंभ करने की ठानी, इसलिये उसने अपने लिये व्यायाम का क्रम निर्धारित किया। पहले दिन उसने कई डंड बैठकें और हलकी दौड़ लगाई। अगले दिन, कुछ और अधिक डंड बैठकें, कुछ और लम्बी दौड़। तीसरे दिन फिर कुछ अधिक व्यायाम और कुछ और लम्बी दौड़। चौथे दिन जब हमारा यह खिलाड़ी सुबह उठा तो उसका गला बैठा हुआ था और तबियत खराब थी।

अब उसने अपनी स्थिति पर विचार किया और इस निष्कर्श पर पहुंचा कि यदि व्यायाम द्वारा इतना हांफने और तेज़ सांस लेने का यही नतीजा निकला तो वह व्यायाम नहीं करेगा, वह जैसा है वैसा ही भला!

अब एक दूसरा दृश्य देखते हैं, खिलाड़ी की जगह मसीही विश्वासी को रख देते हैं। इस विश्वासी को एहसास होता है कि उसने बहुत समय से परमेश्वर के साथ अपने संबंध को नज़रंदाज़ किया हुआ है, और इसे ठीक करने के लिये वह अपने आत्मिक व्यायाम - बाइबल पढ़ने और प्रार्थना करने का नया क्रम आरंभ करता है। यह आरंभ करने के कुछ दिनों पश्चात ही उसके जीवन में कुछ समस्याएं आ जातीं हैं। अब उसे किस निष्कर्श पर पहुंचना चाहिये? क्या उस खिलाड़ी के समान उसे सोच लेना चाहिये कि उसकी आत्मिक प्रगति का व्यायाम एक व्यर्थ प्रयास है जिससे उसे कुछ लाभ नहीं हुआ? कदापि नहीं!

हमें यह बात स्पष्ट रूप से समझ लेनी चाहिये कि हमारा बाइबल पढ़ना, प्रार्थना करना, परमेश्वर के लोगों की संगति करना आदि का उद्देश्य यह नहीं है कि हमें कष्ट और परेशानी से रहित जीवन मिल जाए। हम यह इसलिये करते हैं ताकि हम उस सिद्ध परमेश्वर के और निकट आ सकें, उसे और भली भांति जान सकें और उसकी इच्छाओं को पूरा कर सकें। प्रभु यीशु ने कभी अपने अनुयायीयों को यह आश्वासन नहीं दिया कि उन्हें संसार में कष्ट रहित जीवन और संसार के सब सुख मिलेंगे। प्रभु ने कहा "ये बातें मैं ने तुम से इसलिये कहीं कि तुम ठोकर न खाओ। वे तुम्हें आराधनालयों में से निकाल देंगे, वरन वह समय आता है, कि जो कोई तुम्हें मार डालेगा यह समझेगा कि मैं परमेश्वर की सेवा करता हूं। और यह वे इसलिये करेंगे कि उन्‍होंने न पिता को जाना है और न मुझे जानते हैं। परन्‍तु ये बातें मैं ने इसलिये तुम से कहीं, कि जब उन का समय आए तो तुम्हें स्मरण आ जाए, कि मैं ने तुम से पहिले ही कह दिया था:" (यूहन्ना १६:१-४) "मैं ने तेरा वचन उन्‍हें पहुंचा दिया है, और संसार ने उन से बैर किया, क्‍योंकि जैसा मैं संसार का नहीं, वैसे ही वे भी संसार के नहीं।" (यूहन्ना १७:१४) पौलुस ने लिखा "पर जितने मसीह यीशु में भक्ति के साथ जीवन बिताना चाहते हैं वे सब सताए जाएंगे" (२ तिमुथियुस ३:१२)।

मसीही विश्वासी के लिये परमेश्वर भक्ति का उद्देश्य सांसारिक उप्लब्धियां नहीं हैं "यदि हम केवल इसी जीवन में मसीह से आशा रखते हैं तो हम सब मनुष्यों से अधिक अभागे हैं" (१ कुरिन्थियों १५:१९)। परमेश्वर इस संसार में भी हमें बहुत कुछ दे सकता है और देता है, परन्तु हमारी आशा और प्रतिफल उस स्वर्ग के अनन्त जीवन के हैं जहां अन्ततः हमने जाना है। इसलिये "तो आओ, हम सच्‍चे मन, और पूरे विश्वास के साथ, और विवेक का दोष दूर करने के लिये हृदय पर छिड़काव लेकर, और देह को शुद्ध जल से धुलवाकर परमेश्वर के समीप जाएं। और अपनी आशा के अंगीकार को दृढ़ता से थामें रहें; क्‍योंकि जिस ने प्रतिज्ञा किया है, वह सच्‍चा है।" (इब्रानियों १०:२२, २३) - डेव ब्रैनन


परमेश्वर के वचन और प्रार्थना में विश्वासी जीवन की जड़ें धंसाने से ही जीवन में स्थिरता और शांति आती है।

तो आओ, हम सच्‍चे मन, और पूरे विश्वास के साथ, और विवेक का दोष दूर करने के लिये हृदय पर छिड़काव लेकर, और देह को शुद्ध जल से धुलवाकर परमेश्वर के समीप जाएं। - इब्रानियों १०:२२


बाइबल पाठ: इब्रानियों १०:२२-३९

तो आओ, हम सच्‍चे मन, और पूरे विश्वास के साथ, और विवेक का दोष दूर करने के लिये हृदय पर छिड़काव लेकर, और देह को शुद्ध जल से धुलवाकर परमेश्वर के समीप जाएं।
और अपनी आशा के अंगीकार को दृढ़ता से थामें रहें; क्‍योंकि जिस ने प्रतिज्ञा किया है, वह सच्‍चा है।
और प्रेम, और भले कामों में उकसाने के लिये एक दूसरे की चिन्‍ता किया करें।
और एक दूसरे के साथ इकट्ठा होना ने छोड़ें, जैसे कि कितनों की रीति है, पर एक दूसरे को समझाते रहें, और ज्यों ज्यों उस दिन को निकट आते देखो, त्यों त्यों और भी अधिक यह किया करो।
क्‍योंकि सच्‍चाई की पहिचान प्राप्‍त करने के बाद यदि हम जान बूझकर पाप करते रहें, तो पापों के लिये फिर कोई बलिदान बाकी नहीं।
हां, दण्‍ड का एक भयानक बाट जोहना और आग का ज्‍वलन बाकी है जो विरोधियों को भस्म कर देगा।
जब कि मूसा की व्यवस्था का न मानने वाला दो या तीन जनों की गवाही पर, बिना दया के मार डाला जाता है।
तो सोच लो कि वह कितने और भी भारी दण्‍ड के योग्य ठहरेगा, जिस ने परमेश्वर के पुत्र को पांवों से रौंदा, और वाचा के लोहू को जिस के द्वारा वह पवित्र ठहराया गया था, अपवित्र जाना है, और अनुग्रह की आत्मा का अपमान किया।
क्‍योंकि हम उसे जानते हैं, जिस ने कहा, कि पलटा लेना मेरा काम है, मैं ही बदला दूंगा: और फिर यह, कि प्रभु अपने लोगों का न्याय करेगा।
जीवते परमेश्वर के हाथों में पड़ना भयानक बात है।
परन्‍तु उन पहिले दिनों को स्मरण करो, जिन में तुम ज्योति पाकर दुखों के बड़े झमेले में स्थिर रहे।
कुछ तो यों, कि तुम निन्‍दा, और क्‍लेश सहते हुए तमाशा बने, और कुछ यों, कि तुम उन के साझी हुए जिन की र्दुदशा की जाती थी।
क्‍योंकि तुम कैदियों के दुख में भी दुखी हुए, और अपनी संपत्ति भी आनन्‍द से लुटने दी; यह जानकर, कि तुम्हारे पास एक और भी उत्तम और सर्वदा ठहरने वाली संपत्ति है।
सो अपना हियाव न छोड़ो क्‍योंकि उसका प्रतिफल बड़ा है।
क्‍योंकि तुम्हें धीरज धरना अवश्य है, ताकि परमेश्वर की इच्‍छा को पूरी करके तुम प्रतिज्ञा का फल पाओ।
क्‍योंकि अब बहुत ही थोड़ा समय रह गया है जब कि आने वाला आएगा, और देर न करेगा।
और मेरा धर्मी जन विश्वास से जीवित रहेगा, और यदि वह पीछे हट जाए तो मेरा मन उस से प्रसन्न न होगा।
पर हम हटने वाले नहीं, कि नाश हो जाएं पर विश्वास करने वाले हैं, कि प्राणों को बचाएं।

एक साल में बाइबल:
  • ज़क्कर्याह १३-१४
  • प्रकाशितवाक्य २१

रविवार, 7 नवंबर 2010

अनाज्ञाकरिता के बहाने

स्कूल में संगीत आयोजनों का समय था और संगीत के विद्यार्थियों ने आती सभाओं के लिये अभ्यास की तैयारी आरंभ कर दी थी। संगीत शिक्षिका ने इस विष्य में विद्यार्थियों और उनके अभिभावकों को दो बार, अलग अलग समय पर स्पष्ट सूचना और संबंधित निर्देश दे दिये थे, जिनमें अभ्यास का अनिवार्य होना और अभ्यास का समय भी साफ साफ बता दिया गया था।

फिर भी अभ्यास के दिन एक बच्चे की घबराई हुई माँ ने फोन करके जानना चाहा कि अभ्यास कब होना है और उसके बच्चे को कब पहुंचना है? एक और मां ने फोन करके कहा कि "हम बच्चे को उसके दादी के पास ले जा रहे हैं, इसलिये यदि वह अभ्यास में ना आ सका तो कोई फरक तो नहीं पड़ेगा?" शिक्षिका ने उन्हें याद दिलाया कि अभ्यास अनिवार्य है और आरंभ हो चुका है, बच्चों का अभ्यास में होना आवश्यक है। उसे उत्तर मिला "किसी ने मुझे इसके बारे में पहले क्यों नहीं बताया? मुझे यह सब अपने आप कैसे पता चलता?"

जैसे अपने स्पष्ट और समय से दिये गए निर्देशों और सूचनाओं के नज़रंदाज़ किये जाने से वह शिक्षिका दुःखी और परेशान हुई, क्या परमेश्वर भी उसकी स्पष्ट आज्ञाओं को नज़रंदाज़ करने वाले हमारे रवैये से दुःखी होता है?

१ थिस्सलुनिकियों में पौलुस हमें याद दिलाता है कि परमेश्वर की ओर से उसे मिला सन्देश हमें सिखाने के लिये है कि परमेश्वर को प्रसन्न करने वाला जीवन कैसे जीएं और उसके इन सन्देशों पर प्रभु यीशु की मुहर है (१ थिस्सलुनिकियों १:१, २)। अन्य पत्री में पौलुस समझता है कि हमारी अनआज्ञाकारिता और मनमाने रवैये से परमेश्वर दुःखी होता है (इफिसियों ४:३० - ५:२)।

हम यह ठान लें कि हम परमेश्वर के वचन को ध्यान से पढ़ेंगे और उसका पालन करेंगे - बिना कोई बहाना बनाए। - डेव ब्रैनन


हमारा, परमेश्वर और उसके वचन की उपेक्षा करने को समझा सकने के लिये, कोई उचित बहना है ही नहीं।

और परमेश्वर के पवित्र आत्मा को शोकित मत करो, जिस से तुम पर छुटकारे के दिन के लिये छाप दी गई है। - इफिसियों ४:३०


बाइबल पाठ: १ थिस्सलुनिकियों ४:१-१२

निदान, हे भाइयों, हम तुम से बिनती करते हैं, और तुम्हें प्रभु यीशु में समझाते हैं, कि जैसे तुम ने हम से योग्य चाल चलना, और परमेश्वर को प्रसन्न करना सीखा है, और जैसा तुम चलते भी हो, वैसे ही और भी बढ़ते जाओ।
क्‍योंकि तुम जानते हो, कि हम ने प्रभु यीशु की ओर से तुम्हें कौन कौन सी आज्ञा पहुंचाई।
क्‍योंकि परमेश्वर की इच्‍छा यह है, कि तुम पवित्र बनो: अर्थात व्यभिचार से बचे रहो।
और तुम में से हर एक पवित्रता और आदर के साथ अपने पात्र को प्राप्‍त करना जाने।
और यह काम अभिलाषा से नहीं, और न उन जातियों की नाईं, जो परमेश्वर को नहीं जानतीं।
कि इस बात में कोई अपने भाई को न ठगे, और न उस पर दांव चलाए, क्‍योंकि प्रभु इन सब बातों का पलटा लेने वाला है; जैसा कि हम ने पहिले तुम से कहा, और चिताया भी था।
क्‍योंकि परमेश्वर ने हमें अशुद्ध होने के लिये नहीं, परन्‍तु पवित्र होने के लिये बुलाया है।
इस कारण जो तुच्‍छ जानता है, वह मनुष्य को नहीं, परन्‍तु परमेश्वर को तुच्‍छ जानता है, जो अपना पवित्र आत्मा तुम्हें देता है।
किन्‍तु भाईचारे की प्रीति के विषय में यह अवश्य नहीं, कि मैं तुम्हारे पास कुछ लिखूं, क्‍योंकि आपस में प्रेम रखना तुम ने आप ही परमेश्वर से सीखा है।
और सारे मकिदुनिया के सब भाइयों के साथ ऐसा करते भी हो, पर हे भाइयों, हम तुम्हें समझाते हैं, कि और भी बढ़ते जाओ।
और जैसी हम ने तुम्हें आज्ञा दी, वैसे ही चुपचाप रहने और अपना अपना काम काज करने, और अपने अपने हाथों से कमाने का प्रयत्‍न करो।
कि बाहर वालों के साथ सभ्यता से बर्ताव करो, और तुम्हें किसी वस्‍तु की घटी न हो।

एक साल में बाइबल:
  • यर्मियाह ४०-४२
  • इब्रानियों ४

बुधवार, 3 नवंबर 2010

भय से सहायता

विभिन्न लोगों के लिये, भय विभिन्न अर्थ रखता है। पेशावर गोल्फ खिलाड़ी पैडरैग हैरिंगटन के लिये, भय प्रेरणा का कारण है जो उसे अपना सर्वोतम प्रदर्शन करने को उकसाता है। सन २००८ में, जब हैरिंगटन ने दो बड़ी प्रतियोगिताएं जीतीं, British Open और PGA Championship, तब उसने बताया " हां, भय मेरे जीवन का एक मुख्य भाग है। यद्यपि मैं कहना चाहुंगा कि मेरे पास विश्वास और धैर्य है तथा मैं शांत रहता हूँ, लेकिन वास्तविकता यह नहीं है। भय ही है जो मुझे आगे धकेलता है, भय ही है जो मुझे व्ययाम करने और अभ्यास करने को उकसाता है। मैं भय का उपयोग करके ही आगे बढ़ पाता हूँ।"

हो सकता है कि हैरिंगटन का यह भय असफलता का भय हो , या फिर अपने वर्चस्व को खोने का। उस भय का आधार जो भी हो, हैरिंगटन ने उसे अपने व्यवसायिक जीवन के लिये फायदेमन्द बना लिया है।

मसीही विश्वासी भी भय द्वारा सहायता पा सकते हैं। परमेश्वर का वचन बाइबल हमें चिताती है कि हम परमेश्वर के प्रति श्रद्धापूर्ण भय में जीवन व्यतीत करें। यह भय वह भय है जो सब प्रकार के भय से शेष्ट है। परमेश्वर का भय हमें उसके अनाज्ञाकारी होने या उसके मार्गों के विरोध में चलने के प्रति सचेत करता है। इस भय का अर्थ है हमारे महान परमेश्वर के प्रति आदर और श्रद्धा रखना, उसकी सिद्ध इच्छा की पूर्ति को समर्पित रहना और उसके ज्ञान और समझ के खोजी रहना और उनके अनुसार अपना जीवन चलाना। इसी कारण नीतिवचन ९:१० में लिखा है "यहोवा का भय मानना बुद्धि का आरम्भ है, और परमपवित्र ईश्वर को जानना ही समझ है।"

परमेश्वर के सही भय में रहकर हम इस अनिश्चित संसार में बुद्धिमानी से रह सकते हैं। - बिल क्राउडर


यदि परमेश्वर के भय में रहोगे तो फिर किसी अन्य भय से कभी भयभीत नहीं रहोगे।

यहोवा का भय मानना बुद्धि का आरम्भ है, और परमपवित्र ईश्वर को जानना ही समझ है। - नीतिवचन ९:१०


बाइबल पाठ: नीतिवचन ९:१-१२

बुद्धि ने अपना घर बनाया और उसके सातों खंभे गढ़े हुए हैं।
उस ने अपने पशु वध करके, अपने दाखमधु में मसाला मिलाया है, और अपनी मेज़ लगाई है।
उस ने अपनी सहेलियां, सब को बुलाने के लिये भेजी हैं; वह नगर के ऊंचे स्थानों की चोटी पर पुकारती है,
जो कोई भोला है वह मुड़कर यहीं आए! और जो निर्बुद्धि है, उस से वह कहती है,
आओ, मेरी रोटी खाओ, और मेरे मसाला मिलाए हुए दाखमधु को पीओ।
भोलों का संग छोड़ो, और जीवित रहो, समझ के मार्ग में सीधे चलो।
जो ठट्ठा करने वाले को शिक्षा देता है, सो अपमानित होता है, और जो दुष्ट जन को डांटता है वह कलंकित होता है।
ठट्ठा करने वाले को न डांट ऐसा न हो कि वह तुझ से बैर रखे, बुद्धिमान को डांट, वह तो तुझ से प्रेम रखेगा।
बुद्धिमान को शिक्षा दे, वह अधिक बुद्धिमान होगा; धर्मी को चिता दे, वह अपनी विद्या बढ़ाएगा।
यहोवा का भय मानना बुद्धि का आरम्भ है, और परमपवित्र ईश्वर को जानना ही समझ है।
मेरे द्वारा तो तेरी आयु बढ़ेगी, और तेरे जीवन के वर्ष अधिक होंगे।
यदि तू बुद्धिमान हो, तो बुद्धि का फल तू ही भोगेगा, और यदि तू ठट्ठा करे, तो दण्ड केवल तू ही भोगेगा।

एक साल में बाइबल:
  • यर्मियाह ३०, ३१
  • फिलेमौन