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सोमवार, 3 नवंबर 2025

Worship - 29 - Being Transformed To Worship (3) / आराधना – 29 - आराधना के लिए परिवर्तित (3)

 

आराधना – 29

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आराधना के लिए परिवर्तित (3)


परमेश्वर की आराधना विषय पर अपने इस बाइबल अध्ययन में हम देख चुके हैं कि परमेश्वर की आराधना करना नया-जन्म पाए हुए मसीही विश्वासी के जीवन में अनिवार्य है। यह परमेश्वर की ओर से उसके लिये ठहराई गई एक बहुत आशीष पूर्ण और फलदायी गतिविधि है; तभी, यदि उसे उस प्रकार से किया जाए, जैसे कि परमेश्वर चाहता है - आत्मा और सच्चाई से (यूहन्ना 4:23-24)। लेकिन फिर भी कलीसियाओं और मण्डलियों में इस बहुत महत्वपूर्ण विषय के बारे में बहुत ही कम कोई शिक्षा दी जाती है। साथ ही हमने यह भी देखा है कि परमेश्वर के लोग, परमेश्वर की उस तरह से आराधना करने के बारे में, जैसी वह चाहता है, इसलिये भी नहीं समझते और जानते हैं, क्योंकि वे बाइबल में दिये गये परमेश्वर के लोगों के उदाहरणों का अध्ययन और पालन नहीं करते हैं। वे केवल अपनी कलीसिया, उसके अगुवों, और अन्य लोगों की बातों और तरीकों को ही दोहराते रहते हैं। यद्यपि परमेश्वर ने उन्हें इस प्रकार मनुष्यों के पीछे भटकने, अपनी इच्छानुसार इधर-उधर हाथ पैर मारने, और जैसा भी उन्हें अच्छा लगा, जैसी उनकी इच्छा हो, उस प्रकार से करने के लिए न तो अनुमति दी है और न ही असहाय छोड़ा है।

परमेश्वर मनुष्य के साथ संपर्क और संगति रखना चाहता है, लेकिन ऐसे जिससे उसका आदर कम न होने पाए। इसीलिए, अपने वचन में, परमेश्वर ने पर्याप्त उदाहरण और निर्देश दिए हैं, जिनके द्वारा लोग देख तथा सीख सकें कि वे परमेश्वर के पास कैसे आएँ, उसकी आराधना किस प्रकार से करें। क्योंकि उसे अच्छे से पता है कि अधिकांश लोग अपने आप से वैसे आराधक नहीं बनने पाएँगे, जैसे वह चाहता है, इसलिए परमेश्वर ने अपने वचन में इस बात के भी निर्देश दिए हैं कि लोग उसके सच्चे आराधक कैसे बन सकते हैं। परिवर्तन की इस प्रक्रिया को देखने और समझने के लिए, जो चार कदमों से होकर पूरी होती है, हमने 2 इतिहास 29 अध्याय में दिए गए राजा हिजकिय्याह के उदाहरण को लिया है। पहला कदम है कि प्रभु का शिष्य बनकर उसके पीछे चलने का आरंभिक निर्णय लेने के बावजूद, यदि विश्वासी खराई और पूर्ण प्रतिबद्धता के साथ अपने इस निर्णय का निर्वाह नहीं कर रहा है, तो उसे सबसे पहले प्रभु परमेश्वर के पीछे पूरे समर्पण और प्रतिबद्धता के साथ चलने का दृढ़ निर्णय लेना चाहिए, और अपने व्यवहारिक जीवन के द्वारा उसके पालन को दिखाना भी चाहिए। दूसरा कदम, जिसे हमने पिछले लेख में देखा था, है कि विश्वासी को पवित्र आत्मा के मंदिर की देखभाल में लग जाना चाहिए, अर्थात अपने हृदय की आत्मिक दशा की देखभाल करने में; विश्वासी के मन में क्या जाता है और उससे क्या बाहर आता है उसे इस पर नियंत्रण रखना चाहिए, और उसे अपने आप को पवित्र आत्मा के आधीन कर देना चाहिए। आज हम इस प्रक्रिया के तीसरे कदम को देखेंगे।


तीसरा कदम: 2 इतिहास 29:4-19 – अपने हृदय में परमेश्वर की बातों को स्वच्छ करके सही स्थान पर बहाल करना

इन पदों में हम देखते हैं कि परमेश्वर के घर के द्वार खोलने और उनकी मरम्मत करने के बाद, अगला कार्य जो हिजकिय्याह करता है, वे कुछ महत्वपूर्ण बातें हैं जिन्हें वह एक विशेष क्रम में करता है:

  • पद 4 - लेवियों और याजकों को एकत्रित करके एक स्थान पर लाता है।

  • पद 5 – पहले, उनसे अपने आप को पवित्र करने को कहता है, और उसके बाद परमेश्वर के घर को साफ करके, उसके अन्दर के कूड़े को बाहर निकालने को कहता है। ध्यान कीजिए कि हिजकिय्याह ने उन्हें जो लेवी या याजक नहीं थे, परमेश्वर के घर को साफ और तैयार करने के लिए नहीं कहा। परमेश्वर के भवन की देखभाल करना, उसे व्यवस्थित रखना याजकों और लेवियों का कार्य था, और केवल उन्हें ही इसे करना था (पद 11)। साथ ही यह भी ध्यान कीजिए कि यहाँ प्रयोग किये गए शब्द “पवित्र” का अभिप्राय है शुद्ध और समर्पित करके परमेश्वर के कार्य के लिए पृथक कर देना।

  • पद 6-9 - हिजकिय्याह अपने लोगों के पापों का अंगीकार करता है; परमेश्वर द्वारा उनके साथ किये गए व्यवहार को स्वीकार करता है कि वह सही था, और उन पर आया हुआ परमेश्वर का प्रकोप सर्वथा उपयुक्त था।

  • पद 10-11 - हिजकिय्याह इस स्थिति के समाधान और निवारण की बात कहता है, किस प्रकार से परमेश्वर के प्रकोप से बाहर आया जाए।

  • पद 18-19 - लेवियों के नामों की सूची, याजकों द्वारा भवन की सफाई करने के पश्चात, फिर पद 18-19 में लिखा है कि लेवियों और याजकों ने हिजकिय्याह को बताया कि परमेश्वर का भवन स्वच्छ कर दिया गया है, और उसका सामन भी साफ करके पवित्र उपयोग के लिए उन के स्थानों पर रख दिया गया है।

    यह सब हो जाने के बाद ही फिर, 20 पद से आगे, मन्दिर में आराधना बहाल होती है; जिसके बारे में हम आने वाले लेखों में देखेंगे।

लेकिन हमारे आज के लिए इस से क्या शिक्षाएँ हैं, विशेषकर हमारे परमेश्वर को भावता हुआ आराधक होने और वैसी आराधना चढ़ाने के सन्दर्भ में, जैसी परमेश्वर चाहता है? इस बात को हम विस्तार से अपने अगले लेख में देखेंगे। किन्तु उपरोक्त पदों में ध्यान कीजिये कि परमेश्वर के भवन से संबंधित सभी कार्य और आराधना की पूरी तैयारी, केवल याजकों और लेवियों ने ही की। न तो राजा, न राजसी अधिकारी, और न किसी अन्य व्यक्ति को इसकी अनुमति थी। आज, प्रत्येक नया-जन्म पाया हुआ मसीही विश्वासी न केवल परमेश्वर का याजक है (1 पतरस 2:9; प्रकाशितवाक्य 1:6), बल्कि प्रत्येक विश्वासी परमेश्वर पवित्र आत्मा का निवास-स्थान भी है (1 कुरिन्थियों 3:16; 6:19)। अर्थात्, सच्चे परमेश्वर की सच्ची आराधना के लिये, व्यक्ति को पहले सच्चा मसीही विश्वासी, अर्थात् स्वेच्छा से प्रभु यीशु का सच्चा, समर्पित, आज्ञाकारी, प्रतिबद्ध शिष्य बनना होगा। इसके लिये उसे स्वेच्छा से अपने पापों के लिये पश्चाताप करके, प्रभु यीशु से उनके लिये क्षमा माँगकर, प्रभु यीशु का अनुयायी बनने का निर्णय लेना होगा।

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए – उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।


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 Worship - 29

English Translation

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Being Transformed To Worship (3)


In our Bible study on the topic of worshiping God, we have seen that worshiping God is mandatory for the Born-Again Christian Believers. It has been ordained by God for them, and is a very blessed, and fruitful activity in the life of a Born-Again Christian Believer; provided, it is done in the way God desires – in spirit and in truth (John 4:23-24). Yet there is hardly any teaching given on this important subject in the Churches or Assemblies. We have also seen that God’s people do not know or understand how to worship God in the manner He wants it done, since they neither study nor follow the examples of the people of God given in the Bible. They only keep repeating the ways practiced in their Church, by their Elders, and other people. Although, God has neither left them alone to flounder around following after men, helplessly grope around and do things any which way they please, or suits their fancy, nor permitted them to do whatever is right in their own eyes.

God wants to communicate and fellowship with man, but in a manner that would not in any way belittle Him. Therefore, in His Word, God has given ample examples and instructions, to show and teach people how they should approach and communicate with Him, worship Him. Since He well knows that most people, on their own, will not be able to become the kind of worshipers He is looking for, therefore God has also placed instructions in His Word about how people can become His true worshipers. We have taken the example of King Hezekiah, as given in 2 Chronicles 29, for our study of this transformation which takes place through four steps. The first step is that despite his initial decision to follow the Lord, if he has not been sincerely, with full commitment doing so, the Believer should firmly resolve to become a true and committed follower of God, and practically demonstrate it in his life. The second step that we saw in the last article was for the Believer to get involved in looking after the Temple of the Holy Spirit, i.e., becoming concerned about the spiritual well-being of his heart, to regulate what goes in and comes out of the Believer’s heart, and to allow the Holy Spirit to take charge of him. Today we will look at the third step in this process.

Third Step. 2 Chronicles 29:4-19 – Cleanse and Restore the things of God to their proper place in our hearts

We see in these verses that having opened the House of God, and repaired its doors, the next thing that Hezekiah does are some important things, done in a particular order:

  • Verse 4 – Collects and brings in the priests and Levites, and gathers them together.

  • Verse 5 – First, he asks them to sanctify themselves, and then to sanctify the house of God, cleanse it, and carry out the rubbish from inside. Take note, Hezekiah did not ask the non-Levites and those who were not priests to clean and make ready the house of God. Looking after and maintaining the things of the House of God was the job of the priests and the Levites, and only they were to do it (verse 11). Also take note that the word ‘sanctify’ used here, means to cleanse and set apart for a holy purpose.

  • Verses 6-9 – Hezekiah confesses the sins of his people; he acknowledges that God’s dealings with them were righteous, and God’s wrath upon them is deserved.

  • Verses 10-11 – Hezekiah speaks of the remedy, the way to come out of being under God’s wrath.

  • Verse 18-19 – After giving the names of the Levites, mentioning the work of the priests to cleanse the House, finally in verses 18-19, the Levites and the priests reported to Hezekiah that the House of God had been cleansed and all its furnishings had been sanctified and restored to their respective places.

    It is after all of this has been done, that finally worship in the Temple is restored, from verse 20 onward; which we will see about in the coming articles.

    But what are the lessons for us today, especially in the context of becoming a God pleasing worshiper, and offering worship that God wants? We will see the details in the next article. But take note from the above verses, it was only the Levites and Priests of God who did every work related to the House of God and preparing for worship. Neither the King, nor the royal officials, nor anyone else was permitted to do any of it. Today, every truly Born-Again Christian Believer is not only the Priest of God (1 Peter 2:9; Revelation 1:6), but is also the dwelling place of God the Holy Spirit (1 Corinthians 3:16; 6:19). In other words, to truly worship the one true God, every person must first become a true Christian Believer, i.e., voluntarily become a truly surrendered, obedient, committed disciple of the Lord Jesus. For this, he must voluntarily repent of his sins, ask the Lord Jesus to forgive them, and decide to become a follower of the Lord Jesus.

If you have not yet accepted the discipleship of the Lord Jesus, then to ensure your eternal life and heavenly rewards, take a decision in favor of the Lord Jesus now. Wherever there is surrender and obedience towards the Lord Jesus, the Lord’s blessings and safety are also there. If you are still not Born Again, have not obtained salvation, or have not asked the Lord Jesus for forgiveness for your sins, then you have the opportunity to do so right now. A short prayer said voluntarily with a sincere heart, with heartfelt repentance for your sins, and a fully submissive attitude, “Lord Jesus, I confess that I have disobeyed You, and have knowingly or unknowingly, in mind, in thought, in attitude, and in deeds, committed sins. I believe that you have fully borne the punishment of my sins by your sacrifice on the cross, and have paid the full price of those sins for all eternity. Please forgive my sins, change my heart and mind towards you, and make me your disciple, take me with you." God longs for your company and wants to see you blessed, but to make this possible, is your personal decision. Will you not say this prayer now, while you have the time and opportunity to do so – the decision is yours.


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शुक्रवार, 22 अगस्त 2025

The Holy Communion – 72 - Being Worthy to Participate (2) / प्रभु भोज – 72 - भाग लेने योग्य बनना (2)

 

प्रभु भोज – 72

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प्रभु की मेज़ - भाग लेने योग्य बनना (2)

 

पिछले लेख में हमने प्रभु के शिष्यों, नया जन्म पाए हुए विश्वासियों के द्वारा, भोज में भाग लेने से पहले, स्वयं को जाँचने, अपनी गलतियों और पापों का अंगीकार करके प्रभु से क्षमा माँगने, और उस के द्वारा शुद्ध किए जाने के महत्व और अनिवार्यता के बारे देखा था। आज हम प्रभु के द्वारा शुद्ध किए जाने से सम्बन्धित कुछ और बातों को देखेंगे।

सीधी सी बात यही है कि अपनी स्वाभाविक या सामान्य स्थिति में कोई भी प्रभु की मेज़ में भाग लेने के योग्य कभी नहीं होता है, जैसा कि हम 1 यूहन्ना 1:8, 10 से देखते हैं; हर एक जन पाप करता है, मसीही विश्वासी और प्रभु के शिष्य भी; और जो कोई यह कहता है कि उसमें कोई पाप नहीं है, वह परमेश्वर को झूठा ठहराता है - जो होना संभव नहीं है, और यह असंभवता स्वतः ही उनके निष्पाप होने के दावे को तुरन्त ही झूठा साबित कर देती है। इस बात को प्रभु यीशु ने शिष्यों के पाँव धोने के द्वारा बहुत अच्छी तरह से कहा और समझाया है (यूहन्ना 13:4-15)। जब प्रभु यह कार्य कर रहा था, और वह पतरस के पास पहुँचा, तब पतरस सहमत नहीं था कि प्रभु उसके पाँव धोए। उस समय प्रभु यीशु ने कुछ बहुत महत्वपूर्ण कहा था जिसका हमारे संदर्भ में बहुत महत्व है। प्रभु यीशु ने पतरस से कहा कि यद्यपि वह “नहा चुका है,” साफ है, किन्तु फिर भी उसे समय-समय पर पाँव धुलवाने की आवश्यकता है। संसार में चलते समय, अर्थात संसार के साथ संपर्क में आने के कारण, पतरस तथा अन्य सभी के पाँवों पर, उनके संसार से संपर्क के स्थान पर, सांसारिकता की धूल लग जाती है। उन्हें उस सांसारिकता की धूल से साफ होने के लिए आवश्यक है कि वे समय-समय पर प्रभु यीशु को उन्हें साफ करने दें “...यदि मैं तुझे न धोऊं, तो मेरे साथ तेरा कुछ भी साझा नहीं।”

ठीक से उनकी सफाई किए जाने के लिए यह आवश्यक था कि वे बारंबार प्रभु यीशु के पास इसके लिए आते रहें। प्रभु उनकी सफाई करने का अनिच्छुक नहीं था, वरन वह तो इच्छुक है, प्रतीक्षा में है और चाहता है कि उसके लोग उसके पास आएं, उनमें विद्यमान सांसारिकता की धूल, पाप का अंगीकार करें, और प्रभु को उन्हें साफ कर लेने तथा योग्य बना लेने दें। इसीलिए, जब तक कि प्रभु की मेज में भाग लेने वाला हमेशा ही भाग लेने से पहले अपने को जाँचते हुए, पापों को मानते और उनके लिए पश्चाताप करके परमेश्वर से उनके लिए क्षमा प्राप्त नहीं कर लेता है, तब तक वह कभी भी योग्य रीत से प्रभु की मेज़ में भाग नहीं लेने पाएगा। भाग लेने से पहले सभी को यह करना है, क्योंकि सभी के जीवनों में कोई न कोई पाप अवश्य होता है, जो उन्हें अयोग्य बनाता है। लेकिन प्रभु यीशु द्वारा दिए गए इस तरीके के द्वारा, प्रत्येक नया जन्म पाया हुआ मसीही विश्वासी, हमेशा प्रभु भोज में भाग लेता रह सकता है, यदि उसके अन्दर भाग लेने की एक सच्ची और खरी लालसा है, कि वह उसकी आज्ञाकारिता के द्वारा, प्रभु यीशु को आदर दे, प्रभु द्वारा उसके प्रतिबद्ध शिष्यों को दिए गए निर्देशों का पालन करे।

अगले लेख में हम इस पद से और आगे सीखेंगे, और देखेंगे कि प्रभु की मेज़ में भाग लेना क्यों वैकल्पिक नहीं है, शिष्यों की अपनी इच्छा के अनुसार नहीं, वरन उनके लिए अनिवार्य है। यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं, और प्रभु की मेज़ में भाग लेते रहे हैं, तो कृपया अपने जीवन को जाँच कर देख लें कि आप वास्तव में पापों से छुड़ाए गए हैं तथा आप ने अपना जीवन प्रभु की आज्ञाकारिता में जीने के लिए उस को समर्पित किया है। आपके लिए यह अनिवार्य है कि आप परमेश्वर के वचन की सही शिक्षाओं को जानने के द्वारा एक परिपक्व विश्वासी बनें, तथा सभी शिक्षाओं को वचन की कसौटी पर परखने, और बेरिया के विश्वासियों के समान, लोगों की बातों को पहले वचन से जाँचने और उनकी सत्यता को निश्चित करने के बाद ही उनको स्वीकार करने और मानने वाले बनें (प्रेरितों 17:11; 1 थिस्सलुनीकियों 5:21)। अन्यथा शैतान द्वारा छोड़े हुए झूठे प्रेरित और भविष्यद्वक्ता मसीह के सेवक बन कर (2 कुरिन्थियों 11:13-15) अपनी ठग विद्या और चतुराई से आपको प्रभु के लिए अप्रभावी कर देंगे और आप के मसीही जीवन एवं आशीषों का नाश कर देंगे।

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।


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The Holy Communion – 72

English Translation

The Lord’s Table - Being Worthy to Participate (2)

 

In the previous article, we had seen about the importance and necessity of the disciples of the Lord Jesus, the Born-Again Believers, to examine themselves, confess their sins and short-comings, ask the Lord’s forgiveness for them, and then participate in the Lord’s Table. Today, we will see a couple of things about the cleansing by the Lord.

The simple fact of the matter is, that in his normal or usual state, no one is ever worthy of participating in the Lord’s Table, since as we see from 1 John 1:8, 10, everybody sins, including the Christian Believers and Lord’s disciples; and anyone claiming to have no sin, makes God a liar - an impossibility that by itself immediately nullifies their claim of being without sin. This was stated and well-illustrated by the Lord Jesus in His washing the feet of the disciples (John 13:4-15). As the Lord was doing this, when He came to Peter, Peter was not willing to have the Lord wash His feet. At that time the Lord said something very important in John 13:8 and 10, which is of great significance and relevance here. Lord Jesus said to Peter that although he was “bathed and clean”, but he still needed to have his feet washed from time to time. While walking in the world, i.e., interacting with the world, Peter as well as everyone else would get the “dust” of the worldliness on their feet, i.e., their point of contact with the world. To cleanse them from the “dust of the world”, it was necessary for them to let the Lord Jesus Himself, wash and cleanse them from time to time, "If I do not wash you, you have no part with Me".

To have proper cleansing done, it was essential that time and again they had to keep coming to the Lord, for Him to cleanse them. The Lord is not averse to doing so, rather is willingly waiting and desirous that His people would come to Him, acknowledging the presence of their “dust”, i.e., their worldliness and sin, and allow Him to cleanse them from it, make them clean and worthy once again. Therefore, without the participant always examining, acknowledging, confessing, and seeking God’s forgiveness, no one can ever participate in the Holy Communion, because some sin or the other is always in everyone’s life, always rendering them unworthy of participation. But through this method given by the Lord Jesus, every Born-Again Christian Believer can always participate, provided he has a sincere and honest desire to honor the Lord by being obedient to the Lord’s instructions, given to His committed disciples.

In the next article we will learn further from this verse, and see why participating in the Communion cannot be optional and at the discretion of the Lord’s disciples. If you are a Christian Believer and have been participating in the Lord’s Table, then please examine your life and make sure that you are actually a disciple of the Lord, i.e., are redeemed from your sins, have submitted and surrendered your life to the Lord Jesus to live in obedience to Him and His Word. You should also always, like the Berean Believers, first check and test all teachings that you receive from the Word of God, and only after ascertaining the truth and veracity of the teachings brought to you by men, should you accept and obey them (Acts 17:11; 1 Thessalonians 5:21). If you do not do this, the false apostles and prophets sent by Satan as ministers of Christ (2 Corinthians 11:13-15), will by their trickery, cunningness, and craftiness render you ineffective for the Lord and cause severe damage to your Christian life and your rewards.

If you have not yet accepted the discipleship of the Lord Jesus, then to ensure your eternal life and heavenly rewards, take a decision in favor of the Lord Jesus now. Wherever there is surrender and obedience towards the Lord Jesus, the Lord’s blessings and safety are also there. If you are still not Born Again, have not obtained salvation, or have not asked the Lord Jesus for forgiveness for your sins, then you have the opportunity to do so right now. A short prayer said voluntarily with a sincere heart, with heartfelt repentance for your sins, and a fully submissive attitude, “Lord Jesus, I confess that I have disobeyed You, and have knowingly or unknowingly, in mind, in thought, in attitude, and in deeds, committed sins. I believe that you have fully borne the punishment of my sins by your sacrifice on the cross, and have paid the full price of those sins for all eternity. Please forgive my sins, change my heart and mind towards you, and make me your disciple, take me with you." God longs for your company and wants to see you blessed, but to make this possible, is your personal decision. Will you not say this prayer now, while you have the time and opportunity to do so - the decision is yours.


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शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2020

आग से निकाले

 

         घबराई हुई नौकरानी ने सबसे छोटे बच्चों को अपने हाथों में उठाया और तेज़ी से जलाते हुए घर में से बाहर की ओर भागी; भागते हुए वह पाँच वर्षीय जैकी को पुकार कर बाहर आने के लिए कह रही था। लेकिन जैकी उसके पीछे बाहर की ओर नहीं आया, वह घबराया हुआ वहीं पहली मंजिल की खिड़की के पास ही खड़ा रहा। तुरंत ही वहाँ खड़े एक आदमी ने कार्यवाही की, एक दूसरे आदमी के कंधों पर खड़े होकर उसने जैकी को खिड़की में से बाहर सुरक्षित खींच लिया – और तभी घर की छत गिर पड़ी। छोटे जैकी की माता सुसाना  ने कहा, “यह आग से निकाले हुई लकुटी है”; वह बालक जैकी आगे चलकर सुप्रसिद्ध घूमते फिरते मसीही प्रचारक जॉन वेस्ली (1703-1791) के नाम से विख्यात हुआ।

         सुसाना वेस्ली ने जो उस समय अपने बेटे के लिए कहा था, वह परमेश्वर के वचन बाइबल में से ज़कर्याह नबी की पुस्तक में से लिया गया एक वाक्य था। ज़कर्याह नबी के द्वारा हम परमेश्वर के चरित्र के बारे में मूल्यवान अंतदृष्टि प्राप्त करते हैं। ज़कर्याह अपने एक दर्शन में एक न्याय कक्ष के दृश्य में ले चलता है,जहाँ शैतान यहोशू महायाजक के निकट खड़ा है और उस पर दोष लगा रहा है (ज़कर्याह 3:1)। परन्तु प्रभु परमेश्वर शैतान को डांट लगाता है और यहोशू के लिए कहता है फिर प्रभु यहोशू से कहता है, “हे शैतान यहोवा तुझ को घुड़के! यहोवा जो यरूशलेम को अपना लेता है, वही तुझे घुड़के! क्या यह आग से निकाली हुई लुकटी सा नहीं है?” (ज़कर्याह 3:2)।

         इसके बाद प्रभु यहोशू को यह चुनौती – वास्तविकता में एक अवसर, देता है: “... देख, मैं ने तेरा अधर्म दूर किया है, और मैं तुझे सुन्दर वस्त्र पहना देता हूं” (ज़कर्याह 3:4)।

         यह हमें प्रभु यीशु में लाए गए विश्वास के कारण परमेश्वर से मिलने वाले वरदान का एक सुन्दर चित्रण है! प्रभु परमेश्वर हमें नरक की आगे से खींच कर निकालता है, हमें साफ करता है, और जैसे-जैसे हम पवित्र आत्मा की अगुवाई में चलते हैं, वह हम में कार्य करता रहता है, अपने लिए उपयोगी बनाता चला जाता है। हम भी परमेश्वर के लिए आग से निकाले हुए हैं। - टिम गुस्ताफ्सन

 

क्योंकि परमेश्वर हम से प्रेम करता है, इसलिए हमें बचाता है; 

फिर वह हमें उसके प्रेम को औरों के साथ बांटने के लिए सक्षम करता है।


यदि कोई अपने आप को इन से शुद्ध करेगा, तो वह आदर का बरतन, और पवित्र ठहरेगा; और स्वामी के काम आएगा, और हर भले काम के लिये तैयार होगा। - 2 तीमुथियुस 2:21

बाइबल पाठ:  ज़कर्याह 3:1-7

ज़कर्याह 3:1 फिर उसने यहोशू महायाजक को यहोवा के दूत के सामने खड़ा हुआ मुझे दिखाया, और शैतान उसकी दाहिनी ओर उसका विरोध करने को खड़ा था।

ज़कर्याह 3:2 तब यहोवा ने शैतान से कहा, हे शैतान यहोवा तुझ को घुड़के! यहोवा जो यरूशलेम को अपना लेता है, वही तुझे घुड़के! क्या यह आग से निकाली हुई लुकटी सी नहीं है?

ज़कर्याह 3:3 उस समय यहोशू तो दूत के सामने मैला वस्त्र पहने हुए खड़ा था।

ज़कर्याह 3:4 तब दूत ने उन से जो सामने खड़े थे कहा, इसके ये मैले वस्त्र उतारो। फिर उसने उस से कहा, देख, मैं ने तेरा अधर्म दूर किया है, और मैं तुझे सुन्दर वस्त्र पहना देता हूं।

ज़कर्याह 3:5 तब मैं ने कहा, इसके सिर पर एक शुद्ध पगड़ी रखी जाए। और उन्होंने उसके सिर पर याजक के योग्य शुद्ध पगड़ी रखी, और उसको वस्त्र पहनाए; उस समय यहोवा का दूत पास खड़ा रहा।

ज़कर्याह 3:6 तब यहोवा के दूत ने यहोशू को चिता कर कहा,

ज़कर्याह 3:7 सेनाओं का यहोवा तुझ से यों कहता है: यदि तू मेरे मार्गों पर चले, और जो कुछ मैं ने तुझे सौंप दिया है उसकी रक्षा करे, तो तू मेरे भवन का न्यायी, और मेरे आंगनों का रक्षक होगा; और मैं तुझ को इनके बीच में आने जाने दूंगा जो पास खड़े हैं।

 

एक साल में बाइबल: 

  • यशायाह 14-16
  • इफिसियों 5:1-16


रविवार, 23 अक्टूबर 2016

साफ-सुथरा


   मुझे आज भी अपने बचपन के समय में माँ द्वारा बहुदा कहे गए शब्द याद हैं, कि मैं जाकर अपने कमरे को साफ-सुथरा करूँ। माँ की बात सुनकर मैं निष्ठापूर्वक जाकर कमरे की सफाई करने तो लगता, लेकिन किसी कॉमिक के मिल जाने पर मैं उसे उसके स्थान पर रखने की बजाए उसे पढ़ने लग जाता, और समय ऐसे ही व्यर्थ निकलने लगता। तभी माँ की आवाज़ फिर से आती के वे पाँच मिनिट में कमरे की सफाई के हाल देखने आ रही हैं। इतने कम समय में ठीक से सफाई ना कर पाने के कारण, मैं सारा अस्त-व्यस्त सामान उठाकर अपनी आलमारी में भर कर आलमारी बन्द कर देता, और माँ के निरीक्षण करने आने की बाट जोहने लगता, इस आशा के साथ कि वे आकर मेरी आलमारी खोलकर नहीं देखेंगी।

   बचपन की यह हरकत आज मुझे वह स्मरण कराती है जो हम अकसर अपने जीवनों के साथ करते हैं। हम लोगों को दिखाने के लिए अपने जीवनों को बाहर से तो साफ कर देते हैं, लेकिन साथ ही यह भी आशा रखते हैं कि कोई भी हमारे जीवन की "आलमारी" खोलकर अन्दर की वास्तविकता को नहीं देखेगा, जहाँ हमने अपने तर्क, बहानों और दूसरों को दोषी ठहराने के द्वारा अपने पाप, बुराईयों और चरित्र की कमज़ोरियों को छुपा रखा है; क्योंकि हम भली-भांति जानते हैं कि चाहे हम बाहर से कितने भी भले प्रतीत क्यों ना हों, वास्तव में हमारे अन्दर वह सच्ची भलाई और सफाई नहीं है जो होनी चाहिए। स्वयं की यह सच्ची सफाई हम अपने आप कदापि नहीं कर सकते हैं; लेकिन परमेश्वर की सहायता और मार्ग-दर्शन से यह संभव है।

   परमेश्वर हम सभी को साफ-सुथरा करना चाहता है, यदि हम उसे करने दें तो। इसीलिए परमेश्वर के वचन बाइबल में भजनकार हमें प्रोत्साहित करता है कि उसके समान हम भी अपने आप को परमेश्वर के निरीक्षण में ले आएं जिससे हम साफ-सुथरा हों: "हे ईश्वर, मुझे जांच कर जान ले! मुझे परख कर मेरी चिन्ताओं को जान ले! और देख कि मुझ में कोई बुरी चाल है कि नहीं, और अनन्त के मार्ग में मेरी अगुवाई कर" (भजन 139:23-24)। - जो स्टोवैल


क्योंकि परमेश्वर से हमारी कोई भी बात छिपी नहीं है, 
इसलिए उसके सामने अपनी सभी बातों को मान लेने में संकोच करना व्यर्थ है।

यदि हम अपने पापों को मान लें, तो वह हमारे पापों को क्षमा करने, और हमें सब अधर्म से शुद्ध करने में विश्वासयोग्य और धर्मी है। - 1 यूहन्ना 1:9

बाइबल पाठ: भजन 139:13-24
Psalms 139:13 मेरे मन का स्वामी तो तू है; तू ने मुझे माता के गर्भ में रचा। 
Psalms 139:14 मैं तेरा धन्यवाद करूंगा, इसलिये कि मैं भयानक और अद्भुत रीति से रचा गया हूं। तेरे काम तो आश्चर्य के हैं, और मैं इसे भली भांति जानता हूं। 
Psalms 139:15 जब मैं गुप्त में बनाया जाता, और पृथ्वी के नीचे स्थानों में रचा जाता था, तब मेरी हडि्डयां तुझ से छिपी न थीं। 
Psalms 139:16 तेरी आंखों ने मेरे बेडौल तत्व को देखा; और मेरे सब अंग जो दिन दिन बनते जाते थे वे रचे जाने से पहिले तेरी पुस्तक में लिखे हुए थे। 
Psalms 139:17 और मेरे लिये तो हे ईश्वर, तेरे विचार क्या ही बहुमूल्य हैं! उनकी संख्या का जोड़ कैसा बड़ा है।
Psalms 139:18 यदि मैं उन को गिनता तो वे बालू के किनकों से भी अधिक ठहरते। जब मैं जाग उठता हूं, तब भी तेरे संग रहता हूं।
Psalms 139:19 हे ईश्वर निश्चय तू दुष्ट को घात करेगा! हे हत्यारों, मुझ से दूर हो जाओ। 
Psalms 139:20 क्योंकि वे तेरी चर्चा चतुराई से करते हैं; तेरे द्रोही तेरा नाम झूठी बात पर लेते हैं। 
Psalms 139:21 हे यहोवा, क्या मैं तेरे बैरियों से बैर न रखूं, और तेरे विरोधियों से रूठ न जाऊं? 
Psalms 139:22 हां, मैं उन से पूर्ण बैर रखता हूं; मैं उन को अपना शत्रु समझता हूं। 
Psalms 139:23 हे ईश्वर, मुझे जांच कर जान ले! मुझे परख कर मेरी चिन्ताओं को जान ले! 
Psalms 139:24 और देख कि मुझ में कोई बुरी चाल है कि नहीं, और अनन्त के मार्ग में मेरी अगुवाई कर!

एक साल में बाइबल: 
  • यिर्मयाह 1-2
  • 1 तिमुथियुस 3


शुक्रवार, 14 नवंबर 2014

नई शुरूआत


   मुझे एक गन्ध आई, जो किसी चीज़ के जलने की गन्ध के समान थी। मैं तुरंत दौड़कर रसोईघर में गई, लेकिन वहाँ तो कुछ भी नहीं पक रहा था, स्टोव और तंदूर दोनो बन्द थे। मैं उस गन्ध को सूँघते-सूँघते सारे घर में घूम ली, हर कमरे में गई, और अन्ततः मुझे मेरी नाक मेरे दफतर की ओर ले गई, और फिर मेरे काम करने की मेज़ पर, जिसके नीचे हमारी पालतु कुतिया मैगी बड़ी-बड़ी आँखों से मेरी ओर देख रही थी; वह गन्ध उससे ही आ रही थी और वह उस गन्ध से बचाने का मानो मुझ से आग्रह कर रही थी। जिसे मैं पहले जलने की गन्ध समझ बैठी थी वह वास्तव में स्कंक की गन्ध थी, जो हमारे इलाके में पाया जाने वाला एक छोटा जानवर होता है, और जब उस पर कोई हमला करता है तो वह हमलावर से बचने के लिए तेज़ बदबू छोड़ता है। मैगी ने बाहर किसी स्कंक पर हमला किया होगा और उस स्कंक की वह गन्ध अब मैगी पर आ गई थी, जिससे बचने के लिए वह सारे घर में घूमकर अब मेरे दफतर में मेरी मेज़ के नीचे आकर बैठ गई थी। उस दुर्गन्ध से बचने के लिए मैगी ने जो कुछ उससे बन सकता था किया, घर के हर स्थान पर गई, लेकिन वह यह नहीं समझ पा रही थी कि परेशान करने वाली वह दुर्गन्ध कहीं और से नहीं, स्वयं उसी में से आ रही थी, और वह चाहे जहाँ छुपने का प्रयास कर ले, दुर्गन्ध उसके साथ ही रहेगी। उस दुर्गन्ध को मैगी और घर से दूर करने के लिए मुझे मैगी को साफ करना पड़ा, तब ही उस समस्या का निवारण हो सका।

   मैगी की इस दुविधा ने मुझे मेरे प्रयासों के बारे में स्मरण कराया; अनेक बार मैं कष्टदायी परिस्थितियों से भागने का असफल प्रयास करती हूँ, परन्तु फिर मालुम पड़ता है कि समस्या परिस्थिति में नहीं स्वयं मुझे में ही है। समस्याओं के लिए दूसरों को दोषी ठहराने या उनसे छिपने का प्रयास करने की हमारी यह प्रवृत्ति हमारे आदि माता-पिता, आदम और हव्वा से हमें मिली है, जिन्होंने पाप करके पहले परमेश्वर से छुपने का फिर दूसरों पर दोषारोपण का प्रयास किया। लेकिन जैसे तब, वैसे ही अब भी, समस्या से भागने से उसके दुषपरिणामों से बचा नहीं जा सकता, क्योंकि समस्या भी हमारे ही साथ है और उसके दुषपरिणाम भी हमारे ही साथ होंगे।

   जैसे मैगी को, वैसे ही हमें भी अपनी सफाई के लिए समस्या से भागने या छिपने का प्रयास करने की नहीं वरन साफ कर सकने वाले एक सहायक की आवश्यकता होती है। हमारा प्रभु यीशु ही वह सहायक है जिसका कलवरी के क्रूस पर बहाया गया लोहू संसार के हर व्यक्ति के हर पाप को धोकर उसे शुद्ध और साफ करने की क्षमता रखता है। मैं परमेश्वर की बहुत धन्यवादी हूँ कि जब कभी मैं किसी पाप में पड़ती हूँ, और पश्चाताप के साथ उसे उसके सामने मान लेती हूँ तो वह अपने वायदे: "यदि हम अपने पापों को मान लें, तो वह हमारे पापों को क्षमा करने, और हमें सब अधर्म से शुद्ध करने में विश्वासयोग्य और धर्मी है" (1 यूहन्ना 1:9) के अनुसार मुझे क्षमा करता है और साफ भी करता है, तथा मुझे एक नई शुरूआत प्रदान करता है; और यही नई शुरूआत हर उस व्यक्ति के लिए सेंत-मेंत उपलब्ध है जो प्रभु यीशु के पास पापों की क्षमा तथा उद्धार पाने के लिए आता है। - जूली ऐकैरमैन लिंक


पाप के दाग़ मसीह यीशु के लोहू ही से धुल सकते हैं।

पर यदि जैसा वह ज्योति में है, वैसे ही हम भी ज्योति में चलें, तो एक दूसरे से सहभागिता रखते हैं; और उसके पुत्र यीशु का लोहू हमें सब पापों से शुद्ध करता है। - 1 यूहन्ना 1:7

बाइबल पाठ: उत्पत्ति 3:6-24
Genesis 3:6 सो जब स्त्री ने देखा कि उस वृक्ष का फल खाने में अच्छा, और देखने में मनभाऊ, और बुद्धि देने के लिये चाहने योग्य भी है, तब उसने उस में से तोड़कर खाया; और अपने पति को भी दिया, और उसने भी खाया। 
Genesis 3:7 तब उन दोनों की आंखे खुल गई, और उन को मालूम हुआ कि वे नंगे है; सो उन्होंने अंजीर के पत्ते जोड़ जोड़ कर लंगोट बना लिये। 
Genesis 3:8 तब यहोवा परमेश्वर जो दिन के ठंडे समय बाटिका में फिरता था उसका शब्द उन को सुनाई दिया। तब आदम और उसकी पत्नी बाटिका के वृक्षों के बीच यहोवा परमेश्वर से छिप गए। 
Genesis 3:9 तब यहोवा परमेश्वर ने पुकार कर आदम से पूछा, तू कहां है? 
Genesis 3:10 उसने कहा, मैं तेरा शब्द बारी में सुन कर डर गया क्योंकि मैं नंगा था; इसलिये छिप गया। 
Genesis 3:11 उसने कहा, किस ने तुझे चिताया कि तू नंगा है? जिस वृक्ष का फल खाने को मैं ने तुझे बर्जा था, क्या तू ने उसका फल खाया है? 
Genesis 3:12 आदम ने कहा जिस स्त्री को तू ने मेरे संग रहने को दिया है उसी ने उस वृक्ष का फल मुझे दिया, और मैं ने खाया। 
Genesis 3:13 तब यहोवा परमेश्वर ने स्त्री से कहा, तू ने यह क्या किया है? स्त्री ने कहा, सर्प ने मुझे बहका दिया तब मैं ने खाया। 
Genesis 3:14 तब यहोवा परमेश्वर ने सर्प से कहा, तू ने जो यह किया है इसलिये तू सब घरेलू पशुओं, और सब बनैले पशुओं से अधिक शापित है; तू पेट के बल चला करेगा, और जीवन भर मिट्टी चाटता रहेगा: 
Genesis 3:15 और मैं तेरे और इस स्त्री के बीच में, और तेरे वंश और इसके वंश के बीच में बैर उत्पन्न करुंगा, वह तेरे सिर को कुचल डालेगा, और तू उसकी एड़ी को डसेगा। 
Genesis 3:16 फिर स्त्री से उसने कहा, मैं तेरी पीड़ा और तेरे गर्भवती होने के दु:ख को बहुत बढ़ाऊंगा; तू पीड़ित हो कर बालक उत्पन्न करेगी; और तेरी लालसा तेरे पति की ओर होगी, और वह तुझ पर प्रभुता करेगा। 
Genesis 3:17 और आदम से उसने कहा, तू ने जो अपनी पत्नी की बात सुनी, और जिस वृक्ष के फल के विषय मैं ने तुझे आज्ञा दी थी कि तू उसे न खाना उसको तू ने खाया है, इसलिये भूमि तेरे कारण शापित है: तू उसकी उपज जीवन भर दु:ख के साथ खाया करेगा: 
Genesis 3:18 और वह तेरे लिये कांटे और ऊंटकटारे उगाएगी, और तू खेत की उपज खाएगा ; 
Genesis 3:19 और अपने माथे के पसीने की रोटी खाया करेगा, और अन्त में मिट्टी में मिल जाएगा; क्योंकि तू उसी में से निकाला गया है, तू मिट्टी तो है और मिट्टी ही में फिर मिल जाएगा। 
Genesis 3:20 और आदम ने अपनी पत्नी का नाम हव्वा रखा; क्योंकि जितने मनुष्य जीवित हैं उन सब की आदिमाता वही हुई। 
Genesis 3:21 और यहोवा परमेश्वर ने आदम और उसकी पत्नी के लिये चमड़े के अंगरखे बना कर उन को पहिना दिए। 
Genesis 3:22 फिर यहोवा परमेश्वर ने कहा, मनुष्य भले बुरे का ज्ञान पाकर हम में से एक के समान हो गया है: इसलिये अब ऐसा न हो, कि वह हाथ बढ़ा कर जीवन के वृक्ष का फल भी तोड़ के खा ले और सदा जीवित रहे। 
Genesis 3:23 तब यहोवा परमेश्वर ने उसको अदन की बाटिका में से निकाल दिया कि वह उस भूमि पर खेती करे जिस में से वह बनाया गया था। 
Genesis 3:24 इसलिये आदम को उसने निकाल दिया और जीवन के वृक्ष के मार्ग का पहरा देने के लिये अदन की बाटिका के पूर्व की ओर करुबों को, और चारों ओर घूमने वाली ज्वालामय तलवार को भी नियुक्त कर दिया।

एक साल में बाइबल: 
  • प्रेरितों 17-18