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शनिवार, 27 दिसंबर 2025

The Law & Salvation - 3 - Can Man be Good? / व्यवस्था और उद्धार – 3 - क्या मनुष्य भला हो सकता है?

 

व्यवस्था और उद्धार – 3 - क्या मनुष्य भला हो सकता है?

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भला होना – भाग 2 - क्या मनुष्य भला हो सकता है?

  

  लोगों की यह आम धारणा है कि उनकी अपनी दृष्टि, सोच, और मानकों के अनुसार भला होने, भला रहने, और भले काम करने से हम स्वतः ही परमेश्वर को स्वीकार्य और उसके राज्य प्रवेश करने के योग्य बन सकते हैं। साथ ही सभी की यह भी इच्छा होती है कि उनके साथ भला ही हो, भलाई ही की जाए; चाहे वे स्वयं औरों के साथ भले रहने या उनकी भलाई करने के इच्छुक और प्रयासी न भी हों। इसके अतिरिक्त लोगों की भला या बुरे की परिभाषा, आँकलन के माप-दंड, समझ आदि भी भिन्न होते हैं, और बहुधा आँकलन के ये मानक समय, परिस्थिति, और व्यक्ति के अनुसार बदलते भी रहते हैं। इसी संदर्भ में हमने पिछले लेख में देखा और समझा था कि “भला क्या है?” और इस बात पर आकर अंत किया था कि मसीही विश्वासी और मसीही विश्वास के जीवन के लिए परमेश्वर का वचन, बाइबल ही वह स्थिर और स्थापित माप-दंड है जिससे परमेश्वर के निर्देशों एवं आज्ञाओं के अनुसार भले और बुरे की पहचान की होती है। व्यक्ति के जीवन के फल, अर्थात उसका व्यवहार, उसकी जीवन शैली, आदि बातें दिखा देती हैं कि व्यक्ति परमेश्वर के वचन के अनुसार भला है कि नहीं, क्योंकि प्रभु यीशु ने कहा है कि प्रत्येक पेड़ अपने फल से पहचाना जाता है। 

आज हम देखेंगे कि परमेश्वर के वचन के आँकलन के अनुसार, परमेश्वर की दृष्टि में मनुष्य की स्थिति क्या है? परमेश्वर मनुष्य के अपनी स्वाभाविक दशा में भले होने, तथा अपने प्रयासों और कार्यों के द्वारा, परमेश्वर को स्वीकार्य होने के बारे में क्या कहता है। आइए, इस बात से संबंधित बाइबल के कुछ पदों को देखते हैं:

  • अय्यूब 14:4 अशुद्ध वस्तु से शुद्ध वस्तु को कौन निकाल सकता है? कोई नहीं।

  • अय्यूब 15:14 मनुष्य है क्या कि वह निष्कलंक हो? और जो स्त्री से उत्पन्न हुआ वह है क्या कि निर्दोष हो सके?

  • अय्यूब 25:4 फिर मनुष्य ईश्वर की दृष्टि में धर्मी क्योंकर ठहर सकता है? और जो स्त्री से उत्पन्न हुआ है वह क्योंकर निर्मल हो सकता है?

  • भजन संहिता 51:5 देख, मैं अधर्म के साथ उत्पन्न हुआ, और पाप के साथ अपनी माता के गर्भ में पड़ा

  • उत्पत्ति 6:5 और यहोवा ने देखा, कि मनुष्यों की बुराई पृथ्वी पर बढ़ गई है, और उनके मन के विचार में जो कुछ उत्पन्न होता है सो निरन्तर बुरा ही होता है

  • यशायाह 64:6 हम तो सब के सब अशुद्ध मनुष्य के से हैं, और हमारे धर्म के काम सब के सब मैले चिथड़ों के समान हैं। हम सब के सब पत्ते के समान मुर्झा जाते हैं, और हमारे अधर्म के कामों ने हमें वायु के समान उड़ा दिया है।

  • रोमियों 3:10 जैसा लिखा है, कि कोई धर्मी नहीं, एक भी नहीं

  • रोमियों 8:8-9 और जो शारीरिक दशा में है, वे परमेश्वर को प्रसन्न नहीं कर सकते। परन्तु जब कि परमेश्वर का आत्मा तुम में बसता है, तो तुम शारीरिक दशा में नहीं, परन्तु आत्मिक दशा में हो। यदि किसी में मसीह का आत्मा नहीं तो वह उसका जन नहीं।

 बाइबल में अय्यूब की पुस्तक से लिए गए उपरोक्त तीनों हवालों से स्पष्ट है कि अपनी स्वाभाविक, या शारीरिक दशा में कोई भी मनुष्य, शुद्ध, निष्कलंक और परमेश्वर की दृष्टि में धर्मी होने की स्थिति में जन्म नहीं लेता है। भजन संहिता के पदों से लिए गए दाऊद के शब्द बताते हैं कि मनुष्य माता के गर्भ में ही पाप के साथ (पाप के द्वारा, या पाप के कारण नहीं), अर्थात पाप करने की प्रवृत्ति के साथ आता है, और अधर्म की स्थिति में जन्म लेता है; अर्थात जन्म से ही मनुष्य परमेश्वर के मानकों और माप-दंड के अनुसार उसे अस्वीकार्य स्थिति में होता है। जन्म से मनुष्य की यह पाप की प्रवृत्ति और उसमें विद्यमान अधर्म, जैसा उत्पत्ति से लिए गए हवाले में लिखा है, उसके मन से निरंतर बुरा ही उत्पन्न करवाती रहती है। यशायाह का वचन बताता है कि इस पाप की प्रवृत्ति के साथ संसार के किसी भी और कैसे भी मनुष्य के कोई भी, कैसे भी कार्य, परमेश्वर की दृष्टि में भले नहीं हैं, परमेश्वर को स्वीकार्य नहीं हैं। 

क्योंकि जो स्वाभाविक या शारीरिक दशा में है, वह परमेश्वर को प्रसन्न नहीं कर सकता है, इसी कारण रोमियों के हवाले से हम सीखते हैं कि परमेश्वर की दृष्टि में कोई भी मनुष्य भला नहीं है, एक भी नहीं, और मनुष्य अपने किसी प्रयास से कभी परमेश्वर को प्रसन्न नहीं कर सकते हैं। हमारी इस अशुद्धता और परमेश्वर को अस्वीकार्य दशा का कारण है हम में बसा हुआ पाप, जो हमारे आदि माता-पिता, आदम और हव्वा से वंशागत रीति से हम में चला आ रहा है “इसलिये जैसा एक मनुष्य के द्वारा पाप जगत में आया, और पाप के द्वारा मृत्यु आई, और इस रीति से मृत्यु सब मनुष्यों में फैल गई, इसलिये कि सब ने पाप किया” (रोमियों 5:12), और हमें परमेश्वर से दूर रखता है “परन्तु तुम्हारे अधर्म के कामों ने तुम को तुम्हारे परमेश्वर से अलग कर दिया है, और तुम्हारे पापों के कारण उस का मुँह तुम से ऐसा छिपा है कि वह नहीं सुनता” (यशायाह 59:2)।  

तो अब प्रश्न उठता है कि परमेश्वर के वचन के आधार पर “बाइबल के अनुसार भला कौन है?” ऐसे व्यक्ति के क्या गुण हैं? इसे हम अगले लेख में परमेश्वर के वचन में से देखेंगे। जब हम पापों से पश्चाताप करते हैं, प्रभु यीशु से उन पापों के लिए क्षमा माँगकर अपना जीवन उसे समर्पित करते हैं, उसकी आज्ञाकारिता में चलते रहने का निर्णय लेते हैं, तब, उद्धार या नया जन्म पाते ही परमेश्वर पवित्र आत्मा हम में आकर निवास करने लगता है, हम शारीरिक से आत्मिक दशा में आ जाते हैं, प्रभु के जन बन जाते हैं, परमेश्वर की संतान हो जाते हैं। क्योंकि तब हमारे पाप क्षमा हो जाते हैं, इस कारण हम परमेश्वर को स्वीकार्य हो जाते हैं। किन्तु जब भी हम परमेश्वर की अनाज्ञाकारिता करते हैं, जो कि पाप है, तब हमें उसके लिए पश्चाताप करके, परमेश्वर से क्षमा माँगकर उसका समाधान करना होता है (1 यूहन्ना 1:7-10)।

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। स्वेच्छा से अपने पापों के लिये पश्चाताप करके, प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से ही तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु, मैं अपने पापों के लिए पश्चातापी हूँ, उनके लिए आप से क्षमा माँगता हूँ। मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मुझे और मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।


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The Law & Salvation - 3 - Can Man be Good?

English Translation

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Being Good – Part 2 - Can Man be Good?

 

People very commonly believe that by being good, behaving good, and doing good works, all according to their own thinking, understanding, and standards, automatically also makes us acceptable to God and qualifies us to be able to enter His kingdom. Everyone also nurtures a desire that only good should happen to them, only good should be done to them; whether or not they themselves are good towards others or make efforts to do good to them. Moreover, people's definitions of good or bad, criteria of assessment, understanding of being good etc. also differ; and often these standards of assessment also keep changing according to time, situation, and person. In this context we saw and understood in the previous article “What is good?” We had closed with saying that God's Word, the Bible, is the unchanging and established yardstick for the life of a Christian and for the Christian faith, by which to assess and differentiate good and evil, according to God's instructions and commandments. The fruits of a person's life, i.e., his behavior, his lifestyle, etc., show whether a person is good according to the Word or not, because the Lord Jesus said that every tree is identified by its fruit.

Today we will see the status of man in the eyes of God, as shown by the Word of God. What does God say about man being good and being acceptable to God through his own efforts and actions, while in his natural unregenerate state? Let's look at some Bible verses related to this:

  •  Job 14:4 Who can bring a clean thing out of an unclean? No one!

  • Job 15:14 What is man, that he could be pure? And he who is born of a woman, that he could be righteous?

  • Job 25:4 How then can man be righteous before God? Or how can he be pure who is born of a woman?

  • Psalm 51:5 Behold, I was brought forth in iniquity, And in sin my mother conceived me.

  • Genesis 6:5 Then the Lord saw that the wickedness of man was great in the earth, and that every intent of the thoughts of his heart was only evil continually.

  • Isaiah 64:6 But we are all like an unclean thing, And all our righteousnesses are like filthy rags; We all fade as a leaf, And our iniquities, like the wind, Have taken us away.

  • Romans 3:10 As it is written: There is none righteous, no, not one;

  • Romans 8:8-9 So then, those who are in the flesh cannot please God. But you are not in the flesh but in the Spirit, if indeed the Spirit of God dwells in you. Now if anyone does not have the Spirit of Christ, he is not His.


It is clear from the above three quotes taken from the book of Job in the Bible that man in his natural, or unregenerate physical condition, is never born pure, spotless and righteous in the eyes of God. David's words in the verses from the Psalms states that man comes into the womb of the mother with sin (not through sin, or because of sin), i.e., from the time of conception has a tendency to sin, and is born in a state of unrighteousness; in other words, from birth, by the standards and assessment of God, man is in a state unacceptable to him. This inherent sinful tendency of man from birth, and the unrighteousness present in him, continually causes evil in his mind, as stated in the reference from Genesis. Isaiah's reference tells us that because of this sinful tendency, every person of the world, whosoever he may be and however good he may be, yet none of his actions are good enough in God's eyes, to qualify him as acceptable to God. 

Since the person who is in the natural or unregenerate physical state cannot please God, therefore, we learn from the references from Romans, that no man is good in the eyes of God, not a single one, and that men can never please God by any of their efforts. The cause of our sinful and unacceptable condition to God is the inherited sin in us, which has been passed down to us from our fore-parents, Adam and Eve, “Therefore, just as through one man sin entered the world, and death through sin, and thus death spread to all men, because all sinned" (Romans 5:12), and keeps us away from God "But your iniquities have separated you from your God; And your sins have hidden His face from you, So that He will not hear.” (Isaiah 59:2).

Therefore, now the question arises that on the basis of the Word of God "Who is good according to the Bible?" What are such a person’s qualities? We'll look at this from God's Word in the next article. For now, when we repent of our sins, submit our lives to the Lord Jesus, asking His forgiveness of those sins, decide to walk in obedience to Him, then, God's Holy Spirit comes to dwell in us the moment we are thus saved or Born Again. From that moment onwards we are transformed from the unregenerate physical to the regenerated spiritual state, and we become the people of the Lord, we become the children of God. Since our sins have been forgiven, we become acceptable to God. But whenever we disobey God, which is sin, then we have to repent for it, ask God for forgiveness to rectify it (1 John 1:7-10).

If you have not yet accepted the discipleship of the Lord, make your decision in favor of the Lord Jesus now to ensure your eternal life and heavenly blessings. Where there is obedience to the Lord, where there is respect and obedience to His Word, there is also the blessing and protection of the Lord. Voluntarily repent of your sins, and ask the Lord Jesus for forgiveness of your sins, then of your own will and sincerely, surrender your life to Him - is the only way to salvation and heavenly life. You only have to say a short but sincere prayer to the Lord Jesus Christ willingly and with a penitent heart, and at the same time completely commit and submit your life to Him. You can also make this prayer and submission in words something like, “Lord Jesus, I am sorry for my sins and repent of them. I thank you for taking my sins upon yourself, paying for them through your life.  Because of them you died on the cross in my place, were buried, and you rose again from the grave on the third day for my salvation, and today you are the living Lord God and have freely provided to me the forgiveness, and redemption from my sins, through faith in you. Please forgive my sins, take me under your care, and make me your disciple. I submit my life into your hands." Your one prayer from a sincere and committed heart will make your present and future life, in this world and in the hereafter, heavenly and blessed for eternity.

 


 

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मंगलवार, 25 मई 2021

साहस

 

          1963 की गर्मियों की बात है, सारी रात की बस यात्रा के बाद नागरिक अधिकारों के लिए सक्रिय कार्यकर्ता, फैनी लू हैमर और छः अन्य यात्री भोजन के लिए एक भोजनालय पर रुके। कुछ न्यायिक अधिकारियों द्वारा उन्हें वहाँ से जबरन निकल जाने के लिए बाध्य करने के पश्चात, उन्हें पकड़ कर जेल में डाल दिया गया। किन्तु उनका अपमानित किए जाना इस गैर-कानूनी गिरफ्तारी के साथ ही समाप्त नहीं हुआ। उन सभी को बुरी तरह से पीटा भी गया; किन्तु फैनी को सबसे बुरी मार पड़ी। एक क्रूर आक्रमण के बाद, जिससे वह मृत्यु के निकट आ गई थी, फैनी ने स्तुति का भजन गाना आरंभ कर दिया; गाने वाली वह अकेली ही नहीं थी; अन्य बंदी भी उसके साथ गाने लगे, “पौलुस और सिलास को बांधकर जेल में डाला गया; मेरे लोगों को जा लेने दो!” वे सभी कैदी शरीर से बंधे हुए थे, किन्तु आत्मा से नहीं।

          परमेश्वर के वचन बाइबल में प्रेरितों 16 अध्याय में हम देखते हैं कि पौलुस और सिलास एक बहुत कठिन परिस्थिति में पड़े हुए थे, क्योंकि औरों को प्रभु यीशु के बारे में बताने के कारण उन्हें बाँध कर जेल में डाल दिया गया था। लेकिन उनके क्लेशों ने उन्हें निरुत्साहित नहीं किया;आधी रात के लगभग पौलुस और सीलास प्रार्थना करते हुए परमेश्वर के भजन गा रहे थे, और बन्‍धुए उन की सुन रहे थे” (प्रेरितों 16:25)। उनके इस साहसी स्तुतिगान और आराधना ने उनके लिए अवसर तैयार किया कि वे प्रभु यीशु के बारे में और भी बताते रहें। वे वहाँ के जेलर को भी उद्धार का सुसमाचार सुना सके, और उसने विश्वास किया तथा उद्धार भी पाया (पद 32)।

          हम में से अधिकांश को उन कठोर परिस्थितियों का सामना नहीं करना पड़ेगा, जिनका पौलुस, सिलास और फैनी ने किया; किन्तु हम में से प्रत्येक मसीही विश्वासी को किसी-न-किसी अप्रिय स्थिति का सामना अवश्य करना होगा। जब हमारे साथ ऐसा होगा, तब उस परिस्थिति के लिए हमारी सामर्थ्य हमें हमारे विश्वासयोग्य परमेश्वर से मिलेगी। उन विकट परिस्थितियों में हमारे भी मनों में कोई स्तुति और आराधना का भजन हो, और उन कठिनाइयों में भी हम प्रभु यीशु मसीह के बारे में बोलने का साहस दिखा सकें। - आर्थर जैक्सन

 

कठिन समयों में उसकी स्तुति और आराधना करें, जो हर बात को नियंत्रित करता है।


जब वे तुम्हें पकड़वाएंगे तो यह चिन्ता न करना, कि हम किस रीति से; या क्या कहेंगे: क्योंकि जो कुछ तुम को कहना होगा, वह उसी घड़ी तुम्हें बता दिया जाएगा। - मत्ती 10:19

बाइबल पाठ: प्रेरितों 16:25-34

प्रेरितों के काम 16:25 आधी रात के लगभग पौलुस और सीलास प्रार्थना करते हुए परमेश्वर के भजन गा रहे थे, और बन्‍धुए उन की सुन रहे थे।

प्रेरितों 16:26 कि इतने में एकाएक बड़ा भुई-डोल हुआ, यहां तक कि बन्‍दीगृह की नेव हिल गईं, और तुरन्त सब द्वार खुल गए; और सब के बन्धन खुल पड़े।

प्रेरितों 16:27 और दारोगा जाग उठा, और बन्‍दीगृह के द्वार खुले देखकर समझा कि बन्‍धुए भाग गए, सो उसने तलवार खींचकर अपने आप को मार डालना चाहा।

प्रेरितों 16:28 परन्तु पौलुस ने ऊंचे शब्द से पुकारकर कहा; अपने आप को कुछ हानि न पहुंचा, क्योंकि हम सब यहां हैं।

प्रेरितों 16:29 तब वह दीया मंगवाकर भीतर लपक गया, और कांपता हुआ पौलुस और सीलास के आगे गिरा।

प्रेरितों 16:30 और उन्हें बाहर लाकर कहा, हे साहबों, उद्धार पाने के लिये मैं क्या करूं?

प्रेरितों 16:31 उन्होंने कहा, प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास कर, तो तू और तेरा घराना उद्धार पाएगा।

प्रेरितों 16:32 और उन्होंने उसको, और उसके सारे घर के लोगों को प्रभु का वचन सुनाया।

प्रेरितों 16:33 और रात को उसी घड़ी उसने उन्हें ले जा कर उन के घाव धोए, और उसने अपने सब लोगों समेत तुरन्त बपतिस्मा लिया।

प्रेरितों 16:34 और उसने उन्हें अपने घर में ले जा कर, उन के आगे भोजन रखा और सारे घराने समेत परमेश्वर पर विश्वास कर के आनन्द किया।

 

एक साल में बाइबल: 

  • इतिहास 25-27 
  • यूहन्ना 9:1-30

शनिवार, 27 अगस्त 2016

माध्यम


   चार्ल्स व्हिटिलसे नायकों का नायक था; प्रथम विश्व-युद्ध में "खोई हुई" कहलाई जाने वाली पलटन का वह अगुवा था। उसकी पलटन युद्ध के समय शत्रु की सेना पंक्ति के पीछे फंस गई थी, जहाँ से वह उन्हें निकाल कर ले आया था। इस बहादुरी के लिए उसे वीरता का सम्मान पदक भी दिया गया। जब ’अनजाने सिपाही’ की कब्र का स्थापन और समर्पण किया गया तो चार्ल्स को वहाँ दफनाए जाने वाले पहले सिपाही के कफन को कंधा देने का आदर दिया गया। इसके दो सप्ताह पश्चात समुद्र यात्रा के दौरान, माना जाता है कि, चार्ल्स ने बीच सागर में एक सैलानी समुदी जहाज़ से कूदकर आत्म-हत्या कर ली।

   परमेश्वर के वचन बाइबल में परमेश्वर के एक भविष्यद्वक्ता, एलियाह (1 राजा 19:1-7) के समान ही, चार्ल्स सामाजिक जीवन में तो बहुत मज़बूत, परन्तु समाज की नज़रों से हटने पर, अपने व्यक्तिगत जीवन में निराशा से भरा हुआ था। आज भी लोग अकसर ऐसी परिस्थितियों का सामना करते हैं जो उनके संभाल पाने की क्षमता और योग्यता से बाहर होती हैं। कभी-कभी बहुत थक जाने के कारण आने वाली यह अस्थायी निराशा होती है, जैसा एलियाह के साथ हुआ। एलियाह ने बाल के पुजारियों पर एक बड़ी विजय पाई थी (1 राजा 18:20-40), परन्तु फिर उसे अपने प्राणों का भय हुआ और वह जान बचाने को जंगल में भाग गया (1 राजा 19:1-3)। लेकिन निराशा अकसर अस्थायी नहीं होती, वह जीवन की किसी गहरी या अनकही हताशा से संबंधित होती है। इसलिए यह अनिवार्य है कि जब हम किसी से निराशा के बारे में बातें करें तो यह खुलकर परन्तु सहानुभूतिपूर्वक, तथा समझदारी के साथ हो।

   हमारे जीवनों के सबसे अंधकारपूर्ण पलों में भी परमेश्वर हमारे साथ सदा बनी रहने वाली अपनी उपस्थिति को हमें उपलब्ध करवाता है जिससे हम उसके साथ अपने दिल की बात बाँट सकें, उससे सहायता, मार्गदर्शन और प्रोत्साहन प्राप्त कर सकें; और अपने अनुभवों के आधार पर फिर दूसरों के लिए परमेश्वर से मिलने वाली आशा और प्रोत्साहन का माध्यम बन सकें (2 कुरिन्थियों 1:3-4)। - रैंडी किलगोर


परमेश्वर तथा उसके लोगों से होने वाली सहायता से आशा आती है।

हमारे प्रभु यीशु मसीह के परमेश्वर, और पिता का धन्यवाद हो, जो दया का पिता, और सब प्रकार की शान्‍ति का परमेश्वर है। वह हमारे सब क्‍लेशों में शान्‍ति देता है; ताकि हम उस शान्‍ति के कारण जो परमेश्वर हमें देता है, उन्हें भी शान्‍ति दे सकें, जो किसी प्रकार के क्‍लेश में हों। - 2 कुरिन्थियों 1:3-4

बाइबल पाठ: 1 राजा 19:1-8
1 Kings 19:1 तब अहाब ने ईज़ेबेल को एलिय्याह के सब काम विस्तार से बताए कि उसने सब नबियों को तलवार से किस प्रकार मार डाला। 
1 Kings 19:2 तब ईज़ेबेल ने एलिय्याह के पास एक दूत के द्वारा कहला भेजा, कि यदि मैं कल इसी समय तक तेरा प्राण उनका सा न कर डालूं तो देवता मेरे साथ वैसा ही वरन उस से भी अधिक करें। 
1 Kings 19:3 यह देख एलिय्याह अपना प्राण ले कर भागा, और यहूदा के बेर्शेबा को पहुंच कर अपने सेवक को वहीं छोड़ दिया। 
1 Kings 19:4 और आप जंगल में एक दिन के मार्ग पर जा कर एक झाऊ के पेड़ के तले बैठ गया, वहां उसने यह कह कर अपनी मृत्यु मांगी कि हे यहोवा बस है, अब मेरा प्राण ले ले, क्योंकि मैं अपने पुरखाओं से अच्छा नहीं हूँ। 
1 Kings 19:5 वह झाऊ के पेड़ तले लेटकर सो गया और देखो एक दूत ने उसे छूकर कहा, उठ कर खा। 
1 Kings 19:6 उसने दृष्टि कर के क्या देखा कि मेरे सिरहाने पत्थरों पर पकी हुई एक रोटी, और एक सुराही पानी धरा है; तब उसने खाया और पिया और फिर लेट गया। 
1 Kings 19:7 दूसरी बार यहोवा का दूत आया और उसे छूकर कहा, उठ कर खा, क्योंकि तुझे बहुत भारी यात्रा करनी है। 
1 Kings 19:8 तब उसने उठ कर खाया पिया; और उसी भोजन से बल पाकर चालीस दिन रात चलते चलते परमेश्वर के पर्वत होरेब को पहुंचा।

एक साल में बाइबल: 
  • भजन 120-122
  • 1 कुरिन्थियों 9


शुक्रवार, 26 अगस्त 2016

मार्गनिर्देशन


   दावा सोबेल की पुरुस्कृत पुस्तक Longitude, पुराने समयों में नाविकों के सामने रहने वाले घोर असमंजस का वर्णन करती है। वे नाविक दिन के समय और सूरज की ऊँचाई के आधार पर भूमध्य रेखा से अपने उत्तर या दक्षिण की स्थिति, अर्थात लैटिट्यूड तो आसानी से जान लेते थे; लेकिन पूर्व-पश्चिम दिशा के आधार पर अपनी स्थिति का आँकलन करना, अर्थात अपनी स्थिति के लौंगीट्यूड को जानना उनके लिए बड़ा जटिल और गैरभरोसेमन्द था, जब तक कि अंग्रेज़ी घड़ी-साज़ जौन हैरिसन ने समुद्री समय-मापक (marine chronometer) का अविषकार नहीं कर लिया। यह समय-मापक एक ऐसी घड़ी था जो उनके मूल बन्दरगाह से दूरी के सही समय को दिखाती थी, वे चाहे समुद्र में कितनी भी दूर, कहीं भी क्यों ना चले जाएं; इससे अब वे नाविक अपना लौंगीट्यूड भी सरलता से जान लेते थे।

   जीवन के समुद्र की हमारी यात्रा के लिए भी हमें एक विश्वासयोग्य मार्गदर्शिका चाहिए, जो सदा हमें हमारी सही स्थिति तथा हमारे लिए सही दिशा बताती रहे। परमेश्वर ने यह हमारे लिए उपलब्ध करवाया है - अपना जीवता वचन, बाइबल। भजनकार ने इस जीवते वचन के लिए लिखा है, "अहा! मैं तेरी व्यवस्था में कैसी प्रीति रखता हूं! दिन भर मेरा ध्यान उसी पर लगा रहता है" (भजन 119:97)। परमेश्वर के वचन पर कभी-कभी नज़र दौड़ा लेने की बजाए, भजनकार ने दिन भर सभी बातों के लिए वचन से निर्देशन पाने के संबंध में लिखा, "मैं अपने सब शिक्षकों से भी अधिक समझ रखता हूं, क्योंकि मेरा ध्यान तेरी चितौनियों पर लगा है" (भजन 119:99); और इसके साथ ही इस वचन की आज्ञाकारिता के अपने प्रण को भी दोहराया: "मैं ने शपथ खाई, और ठाना भी है कि मैं तेरे धर्ममय नियमों के अनुसार चलूंगा" (भजन 119:106)।

   पुराने समय के उन नाविकों के समान, सही दिशा में चलने के लिए हमें भी सदा हमारा सही मार्गनिर्देशन करने वाला एक विश्वास्योग्य साधन चाहिए। यदि हम दिन-प्रतिदिन खुले दिल और आज्ञाकारी मन से परमेश्वर के सामने आते हैं, और उसके वचन का मार्गदर्शन स्वीकार करते हैं, तो वह मार्गदर्शन उस जीवते वचन से हमें प्राप्त होता है: "तेरा वचन मेरे पांव के लिये दीपक, और मेरे मार्ग के लिये उजियाला है" (भजन 119:105)। - डेविड मैक्कैसलैंड


यदि परमेश्वर आपका मार्गदर्शक है तो आप सही दिशा में अग्रसर रहेंगे।

आज्ञा तो दीपक है और शिक्षा ज्योति, और सिखाने वाले की डांट जीवन का मार्ग है - नीतिवचन 6:23

बाइबल पाठ: भजन 119:97-106
Psalms 119:97 अहा! मैं तेरी व्यवस्था से कैसी प्रीति रखता हूं! दिन भर मेरा ध्यान उसी पर लगा रहता है। 
Psalms 119:98 तू अपनी आज्ञाओं के द्वारा मुझे अपने शत्रुओं से अधिक बुद्धिमान करता है, क्योंकि वे सदा मेरे मन में रहती हैं। 
Psalms 119:99 मैं अपने सब शिक्षकों से भी अधिक समझ रखता हूं, क्योंकि मेरा ध्यान तेरी चितौनियों पर लगा है। 
Psalms 119:100 मैं पुरनियों से भी समझदार हूं, क्योंकि मैं तेरे उपदेशों को पकड़े हुए हूं। 
Psalms 119:101 मैं ने अपने पांवों को हर एक बुरे रास्ते से रोक रखा है, जिस से मैं तेरे वचन के अनुसार चलूं। 
Psalms 119:102 मैं तेरे नियमों से नहीं हटा, क्योंकि तू ही ने मुझे शिक्षा दी है। 
Psalms 119:103 तेरे वचन मुझ को कैसे मीठे लगते हैं, वे मेरे मुंह में मधु से भी मीठे हैं! 
Psalms 119:104 तेरे उपदेशों के कारण मैं समझदार हो जाता हूं, इसलिये मैं सब मिथ्या मार्गों से बैर रखता हूं।
Psalms 119:105 तेरा वचन मेरे पांव के लिये दीपक, और मेरे मार्ग के लिये उजियाला है। 
Psalms 119:106 मैं ने शपथ खाई, और ठाना भी है कि मैं तेरे धर्ममय नियमों के अनुसार चलूंगा।

एक साल में बाइबल: 
  • भजन 119:89-176
  • 1 कुरिन्थियों 8