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शुक्रवार, 31 जुलाई 2026

Blessed and Successful Life - 175 - Church Stewardship - Role of Elders / आशीषित एवं सफल जीवन – 175 - कलीसियाई भण्डारीपन - अगुवों की भूमिका

 

आशीषित एवं सफल जीवन 175

कलीसिया के भण्डारी – 42

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कलीसियाई भण्डारीपन - अगुवों की भूमिका 

    आशीषित एवं सफल जीवन जीने की इस ज़ारी श्रृंखला में, हम वास्तव में नया जन्म पाए हुए मसीही विश्वासियों को, उद्धार के साथ ही परमेश्वर द्वारा दिये गये प्रावधानों और विशेष अधिकारों के बारे में सीखते आ रहे हैं। इन प्रावधानों और विशेष अधिकारों में से एक है, सच्चे विश्वासी का कलीसिया तथा अन्य विश्वासियों के साथ संगति में रहने का भण्डारी होना। पिछले लेखों में हमने जो सीखा है, उसके निहितार्थों को देखते समय, हमने देखा था कैसे, यद्यपि परमेश्वर द्वारा उन्हें सौंपी गई उनकी सेवाकाइयाँ और ज़िम्मेदारियाँ अलग-अलग हैं, लेकिन विश्वासी न तो एक-दूसरे से और न ही कलीसिया से अलग हैं। बल्कि जिनके साथ वे संगति रखते हैं, वे उनको, अर्थात, कलीसिया को भी, तथा एक-दूसरे को भी जवाबदेह हैं। आज हम कलीसिया में अगुवों की भूमिका से संबंधित कुछ बातों को देखेंगे, अर्थात, कलीसिया और विश्वासियों के मध्य अगुवों के भण्डारी होने के बारे में।

    परमेश्वर का वचन बाइबल हमें सिखाती है कि स्थानीय कलीसियाओं और उनके सदस्यों को अगुवों की अधीनता में कार्य करना है, जिन्हें उस कलीसिया के संचालन और देख-भाल की ज़िम्मेदारी सौंपी गई है। कलीसिया में विभिन्न प्रकार के अगुवों की नियुक्तियाँ, उनकी भूमिकाएं, कार्य, अधिकार, आदि, एक बड़ा विषय है, और हम उसे यहाँ पर नहीं लेंगे। हम यह देख चुके हैं कि परमेश्वर ने अपनी कलीसिया में प्रत्येक विश्वासी को कुछ ज़िम्मेदारी दी है और करने के लिए कोई न कोई कार्य सौंपा है (इफिसियों 2:10)। विश्वासियों को इन जिम्मेदारियों का निर्वाह करने में सहायता के लिए उन्हें पवित्र आत्मा और उसके वरदान दिए गए हैं, जिनका वे पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन और सहायता से उचित उपयोग कर सकते हैं। यद्यपि ये कार्य और ज़िम्मेदारियाँ उस स्थानीय कलीसिया के अगुवों की देख-भाल और निरीक्षण में किए जाने हैं, किन्तु अगुवों को हमेशा यह ध्यान रखना चाहिए कि कलीसिया का स्वामी परमेश्वर ही है। और क्योंकि उन अगुवों को कलीसिया के सदस्यों के ऊपर परमेश्वर द्वारा उनकी देखभाल करने के लिये नियुक्त किया गया है, इसलिए, उन्हें उन के लिए परमेश्वर को हिसाब भी देना होगा (इब्रानियों 13:17)। साथ ही अगुवों को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि उनकी अधीनता में रखे गए विश्वासी उनके मूक सेवक या दास नहीं हैं। उनके साथ ऐसे व्यवहार नहीं किया जाना है कि मानों उन्हें कुछ कहने या पूछने का कोई अधिकार नहीं है; वे अगुवे से किसी बात के लिए कोई प्रश्न नहीं कर सकते हैं, और न ही अगुवे के प्रति कोई असहमति दिखा सकते हैं। अगुवों को यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि वे भी मात्र मनुष्य ही हैं, तथा अन्य मनुष्यों के समान वे भी गलतियाँ कर सकते हैं, शैतान द्वारा बहकाए और भरमाए जा सकते हैं, तथा शैतान के प्रभाव में स्वयं भी औरों को बहका या भरमा सकते हैं – जानते-बूझते हुए अथवा अनजाने में। परमेश्वर की कलीसिया में, अंतिम अधिकार परमेश्वर का ही है; और उसकी सन्तानों के मध्य में हर बात उसी की इच्छा के अनुसार की जानी है, जैसे वह चाहता है, वैसे की जानी है। इसके लिए सभी आवश्यक निर्देश परमेश्वर ने अपने वचन में पहले से दे दिए हैं। क्योंकि वह कभी भी जो उसने अपने वचन में बता और सिखा दिया है, उससे हटकर, या उसके विपरीत कुछ नहीं कहेगा या करेगा; इसलिए अगुवों को कलीसिया की देखभाल उसी तरह से करनी है जैसे परमेश्वर ने अपने वचन में निर्देश दिए हैं।

    कलीसिया के अगुवों तथा कलीसिया के सदस्यों, दोनों के लिए इस ज़िम्मेदारी के बारे में सीखने और उसका निर्वाह करने को समझने के लिए, एक बहुत सहायक खण्ड 1 पतरस 5:1-5 है। इस खण्ड में, पतरस अगुवों से आग्रह करता, उन्हें समझाता है कि वे एक चरवाहे या रखवाले के समान होकर यह कार्य करें; अर्थात, धैर्य, नम्रता, और मन लगाकर। उनको हमेशा यह याद रखना चाहिये कि वह उनका नहीं बल्कि परमेश्वर का ‘झुण्ड’ है जिसकी वे रखवाली कर रहे हैं; और उसके लिए उन्हें परमेश्वर को जवाब देना है। उन्हें परमेश्वर के झुण्ड की देखभाल नीच-कमाई के लिए नहीं करनी है, न ही उन का उपयोग किसी व्यक्तिगत या भौतिक लाभ के लिए करना है। इसके संदर्भ में एक उत्तम मार्गदर्शिका 1 कुरिन्थियों 9 अध्याय में पौलुस द्वारा लिखी गई बातें हैं, जहाँ पर पौलुस अपनी जिम्मेदारियों, अधिकारों, अधिकार, मेहनताना, और वह किस तरह से परमेश्वर के सेवक होकर कार्य करता है, बताता है। 

    पतरस आगे, पद 3 में, कहता है कि अगुवों को अपने झुण्ड के लिए एक आदर्श बनना चाहिए, न कि उनके ऊपर अधिकार जताना चाहिए, अर्थात उन्हें उदाहरण बनकर अगुवाई करनी चाहिए न कि बल से अथवा मजबूर कर के, और यही हम पौलुस के जीवन में भी देखते हैं। फिर, पद 4 में, पतरस अगुवों को समझाता है कि वे “प्रधान रखवाले” के आने और उन्हें उनके कभी न मुरझाने वाले अनन्तकालीन प्रतिफलों को देने की प्रतीक्षा करनी है; अर्थात वह एक बार फिर यही निहितार्थ व्यक्त करता है कि उन्हें परमेश्वर के झुण्ड से, जो उन्हें सौंपा गया है, भौतिक या सांसारिक लाभ अर्जित करने की न तो लालसा रखनी है, और न ही लाभ अर्जित करने हैं। फिर, पद 5 में, पतरस कलीसिया के लोगों को भी उनकी ज़िम्मेदारी के बारे में बताता है – उन्हें अगुवों के, तथा परस्पर एक-दूसरे के, अधीन होकर रहना चाहिए, तथा सभी बातों में नम्र रहना चाहिए, परमेश्वर द्वारा उन्हें उचित समय पर ऊँचा उठाए जाने की प्रतीक्षा करनी चाहिए (पद 6)। इसलिए, कलीसिया के, तथा सदस्यों के, दोनों के लाभ के लिए, दोनों को ही साथ मिलकर कार्य करना है, एक-दूसरे की सहायता करनी है और एक-दूसरे का पूरक बनना है। क्योंकि कोई एक भी, दूसरे के बिना कार्य नहीं कर सकता है; दोनों को ही अपनी-अपनी ज़िम्मेदारियाँ साथ मिलकर निभानी हैं।

    लूका 12:45-46 में प्रभु ने ऐसे सेवक के बारे में बताया है जिसने स्वामी द्वारा उसे दिए गए अधिकार का दुरुपयोग किया, जो एक बुरा भण्डारी होने का चिह्न है, और जिसका परिणाम घोर ताड़ना है (साथ ही, इसी संदर्भ में यहेजकेल 34 अध्याय भी देखें)। 

    अगले लेख से हम कलीसिया में अनुशासन बनाए रखने के बारे में देखना आरंभ करेंगे।

    यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। स्वेच्छा से अपने पापों के लिये पश्चाताप करके, प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु, मैं अपने पापों के लिए पश्चातापी हूँ, उनके लिए आप से क्षमा माँगता हूँ। मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मुझे और मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।


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Blessed and Successful Life - 175

Understanding the Church – 42

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Church Stewardship - Role of Elders

 

    In this ongoing series of living a 'Blessed and Successful Life', we have been learning about the provisions and privileges given by God to the truly Born-Again Christian Believers along with their salvation. One of these provisions and privileges is the true Believer being a steward of the Church and of the fellowship with other believers. While looking at the implications of what we have learnt in the previous articles, we have seen how, even though the ministries and responsibilities entrusted to them by God are different, the Believers are neither separate from one another nor from the Church. Rather, they are accountable to those with whom they fellowship, i.e., to the Church as well as to one another. Today we will look at some things related to the role of the Church Elders, that is, regarding the stewardship of the Elders in the Church and among the believers.

    God’s Word, the Bible teaches us that the local Churches and their members, are to function under the care of certain Elders that have been given the responsibility of looking after and managing the Church. The appointment, role, function, and authority, etc., of various kinds of Church Elders is a vast subject, and we will not be considering it here. We have seen that God has given responsibilities and assigned works to be done for every Believer (Ephesians 2:10) in His Church. The Believers have been given the Holy Spirit and the gifts of the Holy Spirit to fulfill their responsibilities with the help of and under the guidance of the Holy Spirit. Though these works and responsibilities have to be carried out under the supervision and care of Elders of that local Church, but the Elders should always keep in mind that God is still the owner of His Church. And since they, the Elders have been placed over the members by God, to look after them, therefore, they will have to give an account to God for them (Hebrews 13:17). Moreover, the Elders should keep in mind that the Believers placed under them are not their dumb servants, or slaves. They are not to be treated as those who cannot say anything to the Elder, or ask any questions from the Elders, or show any disagreement with the Elders. The Elders should never forget that even they are mere human-beings, and like other human-beings, they too can make mistakes, can be led astray and deceived by Satan, and under the influence of Satan they too can lead others astray as well as deceive them – knowingly or unknowingly. In God’s Church, God is still the final authority; and amongst His children, things have to be done as per His will, the way He wants them done. God has already given all the necessary instructions in His Word for doing this. Since God will never go contrary to His will that He has already expressed in His Word; therefore, the Elders have to take care of the congregation, just as God has instructed in His Word.

    One passage that is of great help in learning about and carrying out this responsibility, by the Elders as well as the congregation in the prescribed manner is 1 Peter 5:1-5. In this passage, Peter exhorts the Elders to function as a shepherd, i.e., patiently, gently, and with perseverance. They must always remember that it is not their own, but God’s flock that they are looking after; so they will have to give an account for them to God. They should not tend God’s flock for dishonest gain, nor try to use it for personal benefit and temporal gains. A good guide for this is Paul’s example in 1 Corinthians chapter 9, where he explains his responsibilities, rights, authority, remuneration and how he functioned as a minister of God. 

    Peter goes on to say in verse 3 that the Elders should set themselves up as examples to God’s flock, and not behave as lords over them; i.e., they should lead by example not force or coercion, as we see from the life of Paul too. Then, in verse 4, Peter urges the Elders to wait for their “Chief Shepherd” to come and give them their eternal, unfading rewards; once again implying that they should not seek and desire getting temporal worldly gains from God’s flock entrusted to them, nor acquire any such benefits. Then, in verse 5, Peter also instructs the congregation about their responsibility – they should submit themselves to the Elders, as well as to each other, and remain humble in all things, waiting for God to exalt them in due time (verse 6). So, for the benefit of the Church and of the congregation, the Elders and the congregation, both have to work hand-in-hand, helping and supplementing each other. One cannot function properly without the other, both have to fulfill their respective responsibilities. 

    In Luke 12:45-46, usurping and misusing the authority given by the Master to His servant, is a sign of bad stewardship, and will invite severe retribution (also see Ezekiel chapter 34 in this context). 

    From the next article we will start considering maintaining discipline in the Church.

    If you have not yet accepted the discipleship of the Lord, make your decision in favor of the Lord Jesus now to ensure your eternal life and heavenly blessings. Where there is obedience to the Lord, where there is respect and obedience to His Word, there is also the blessing and protection of the Lord. Voluntarily repent of your sins, and ask the Lord Jesus for forgiveness of your sins; voluntarily and sincerely, surrender yourself to Him - this is the only way to salvation and heavenly life. You only have to say a short but sincere prayer to the Lord Jesus Christ willingly and with a penitent heart, and at the same time completely commit and submit your life to Him. You can also make this prayer and submission in words something like, “Lord Jesus, I am sorry for my sins and repent of them. I thank you for taking my sins upon yourself, paying for them through your life.  Because of them you died on the cross in my place, were buried, and you rose again from the grave on the third day for my salvation, and today you are the living Lord God and have freely provided to me the forgiveness, and redemption from my sins, through faith in you. Please forgive my sins, take me under your care, and make me your disciple. I submit my life into your hands." Your one prayer from a sincere and committed heart will make your present and future life, in this world and in the hereafter, heavenly and blessed for eternity.


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सोमवार, 5 फ़रवरी 2024

Blessed and Successful Life / आशीषित एवं सफल जीवन – 160 – Stewards of The Church / कलीसिया के भण्डारी – 42

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अगुवों की भूमिका

 

    पिछले लेखों से हम नया-जन्म पाए हुए मसीही विश्वासियों के, उनका नया-जन्म पाने के पल से ही परमेश्वर की कलीसिया का अंग बनाए जानें और कलीसिया में तथा परमेश्वर की अन्य सन्तानों की सहभागिता में रखे जाने, के बारे में सीखते आ रहे हैं। हमने जो सीखा था, उसके निहितार्थों को देखते समय, हमने 26 जनवरी के लेख में देखा था कैसे, यद्यपि उनकी परमेश्वर द्वारा उन्हें सौंपी गई सेवाकाइयाँ और ज़िम्मेदारियाँ अलग-अलग हैं, लेकिन विश्वासी न तो एक-दूसरे से और न ही कलीसिया से अलग हैं, बल्कि जिनके साथ वे संगति रखते हैं, वे उनको, अर्थात, कलीसिया को भी तथा एक-दूसरे को भी जवाबदेह हैं। आज हम कलीसिया में अगुवों की भूमिका से संबंधित कुछ बातों को देखेंगे, अर्थात, कलीसिया और विश्वासियों के मध्य अगुवों के भण्डारी होने के बारे में।

    परमेश्वर का वचन बाइबल हमें सिखाती है कि स्थानीय कलीसियाओं और उनके सदस्यों को अगुवों की अधीनता में कार्य करना है, जिन्हें उस कलीसिया के संचालन और देख-भाल की ज़िम्मेदारी सौंपी गई है। कलीसिया में विभिन्न प्रकार के अगुवों की नियुक्तियाँ, उनकी भूमिकाएं, कार्य, अधिकार, आदि, एक बड़ा विषय है, और हम उसे यहाँ पर नहीं लेंगे। हम यह देख चुके हैं कि परमेश्वर ने अपनी कलीसिया में प्रत्येक विश्वासी को कुछ ज़िम्मेदारी दी है और करने के लिए कोई कार्य सौंपा है (इफिसियों 2:10)। विश्वासियों को इन जिम्मेदारियों का निर्वाह करने में सहायता के लिए उन्हें पवित्र आत्मा और उसके वरदान दिए गए हैं, जिनका वे पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन और सहायता से उचित उपयोग कर सकते हैं। यद्यपि ये कार्य और ज़िम्मेदारियाँ उस स्थानीय कलीसिया के अगुवों की देख-भाल और निरीक्षण में किए जाने हैं, किन्तु अगुवों को हमेशा यह ध्यान रखना चाहिए कि कलीसिया का स्वामी परमेश्वर ही है; और क्योंकि उन अगुवों को कलीसिया के सदस्यों के ऊपर परमेश्वर द्वारा नियुक्त किया गया है, इसलिए, उन्हें उन के लिए परमेश्वर को हिसाब भी देना होगा (इब्रानियों 13:17)। साथ ही अगुवों को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि उनकी अधीनता में रखे गए विश्वासी उनके मूक सेवक या दास नहीं हैं; उनके साथ ऐसे व्यवहार नहीं किया जाना है कि मानों उन्हें कुछ कहने का कोई अधिकार नहीं है, वे अगुवे से किसी बात के लिए कोई प्रश्न नहीं कर सकते हैं, और न ही अगुवे के प्रति कोई असहमति दिखा सकते हैं। अगुवों को यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि वे भी मात्र मनुष्य ही हैं, तथा अन्य मनुष्यों के समान वे भी गलतियाँ कर सकते हैं, शैतान द्वारा बहकाए और भरमाए जा सकते हैं, तथा शैतान के प्रभाव में स्वयं भी औरों को बहका या भरमा सकते हैं – जानते-बूझते हुए अथवा अनजाने में। परमेश्वर की कलीसिया में, अंतिम अधिकार परमेश्वर का ही है, और उसकी सन्तानों के मध्य में हर बात उसी की इच्छा के अनुसार की जानी है, जैसे वह चाहता है, वैसे की जानी है। इसके लिए सभी आवश्यक निर्देश परमेश्वर ने अपने वचन में पहले से दे दिए हैं; क्योंकि वह कभी भी जो उसने अपने वचन में बता और सिखा दिया है, उससे हटकर, या उसके विपरीत कुछ नहीं कहेगा या करेगा; इसलिए अगुवों को कलीसिया की देखभाल उसी तरह से करनी है जैसे परमेश्वर ने अपने वचन में निर्देश दिए हैं।

    कलीसिया के अगुवों तथा कलीसिया के सदस्यों, दोनों के लिए इस ज़िम्मेदारी के बारे में सीखने और उसका निर्वाह करने को समझने के लिए, एक बहुत सहायक खण्ड 1 पतरस 5:1-5 है। इस खण्ड में, पतरस अगुवों से आग्रह करता, उन्हें समझाता है कि वे एक चरवाहे या रखवाले के समान होकर यह कार्य करें; अर्थात, धैर्य, नम्रता, और मन लगाकर, हमेशा यह याद रखते हुए कि वह उनका नहीं बल्कि परमेश्वर का ‘झुण्ड’ है जिसकी वे रखवाली कर रहे हैं, और उसके लिए उन्हें परमेश्वर को जवाब देना है। उन्हें परमेश्वर के झुण्ड की देखभाल नीच-कमाई के लिए नहीं करनी है, न ही उन का उपयोग किसी व्यक्तिगत या भौतिक लाभ के लिए करना है – इसके संदर्भ में एक उत्तम मार्गदर्शिका 1 कुरिन्थियों 9 अध्याय में पौलुस द्वारा लिखी गई बातें हैं, जहाँ पर पौलुस अपनी जिम्मेदारियों, अधिकारों, अधिकार, मेहनताना, और वह किस तरह से परमेश्वर के सेवक होकर कार्य करता है, बताया गया है। पतरस आगे, पद 3 में, कहता है कि अगुवों को अपने झुण्ड के लिए एक आदर्श बनना चाहिए, न कि उनके ऊपर अधिकार जताना चाहिए, अर्थात उन्हें उदाहरण बनकर अगुवाई करनी चाहिए न कि बल से अथवा मजबूर कर के, और यही हम पौलुस के जीवन में भी देखते हैं। फिर, पद 4 में, पतरस अगुवों को समझाता है कि वे “प्रधान रखवाले” के आने और उन्हें उनके कभी न मुरझाने वाले अनन्तकालीन प्रतिफलों को देने की प्रतीक्षा करनी है; अर्थात वह एक बार फिर यही निहितार्थ व्यक्त करता है कि उन्हें परमेश्वर के झुण्ड से जो उन्हें सौंपा गया है भौतिक लाभ अर्जित करने की न तो लालसा रखनी है, और न ही अर्जित करने हैं। फिर, पद 5 में, पतरस कलीसिया के लोगों को भी उनकी ज़िम्मेदारी के बारे में बताता है – उन्हें अगुवों के, तथा परस्पर एक-दूसरे के, अधीन होकर रहना चाहिए, तथा सभी बातों में नम्र रहना चाहिए, परमेश्वर द्वारा उन्हें उचित समय पर ऊँचा उठाए जाने की प्रतीक्षा करनी चाहिए (पद 6)। इसलिए, कलीसिया के, तथा सदस्यों के, दोनों के लाभ के लिए, दोनों को ही साथ मिलकर कार्य करना है, एक-दूसरे की सहायता करनी है और एक-दूसरे का पूरक बनना है; क्योंकि कोई एक भी, दूसरे के बिना कार्य नहीं कर सकता है; दोनों को ही अपनी-अपनी ज़िम्मेदारियाँ साथ मिलकर निभानी हैं।

    लूका 12:45-46 में प्रभु ने ऐसे सेवक के बारे में बताया है जिसने स्वामी द्वारा उसे दिए गए अधिकार का दुरुपयोग किया, जो एक बुरा भण्डारी होने का चिह्न है, और जिसका परिणाम घोर ताड़ना है (साथ ही, इसी संदर्भ में यहेजकेल 34 अध्याय भी देखें)। अगले लेख से हम कलीसिया में अनुशासन बनाए रखने के बारे में देखना आरंभ करेंगे।

    यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु, मैं अपने पापों के लिए पश्चातापी हूँ, उनके लिए आप से क्षमा माँगता हूँ। मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मुझे और मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

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English Translation


Role of Elders

 

    In the preceding articles we have been studying about the Born-Again Christian Believers being placed in and being made stewards of God’s Church and of fellowship with God’s other children from the moment they are Born-Again. While considering the implications of what we learnt, in the article of 26th January on the implications, we had seen how, despite their different God given ministries and responsibilities, the Believers are not independent of each other and the Church, but are accountable to the Church and also to the other Believers that they are in fellowship with. Today, we will look at some things related to the role of the Elders in the Church, i.e., the stewardship of the Elders towards the Church and the Believers.

    God’s Word, the Bible teaches us that the local Churches and their members, are to function under the care of certain Elders that have been given the responsibility of looking after and managing the Church. The appointment, role, function, and authority, etc., of various kinds of Church Elders is a vast subject, and we will not be considering it here. We have seen that God has given responsibilities and assigned works to be done for every Believer (Ephesians 2:10) in His Church. The Believers have been given the Holy Spirit and the gifts of the Holy Spirit to fulfill their responsibilities with the help of and under the guidance of the Holy Spirit. Though these works and responsibilities have to be carried out under the supervision and care of Elders of that local Church, but the Elders should always keep in mind that God is still the owner of His Church; and since they, the Elders have been placed over the members by God, to look after them, therefore, they will have to give an account to God for them (Hebrews 13:17). Moreover, the Elders should bear in mind that the Believers placed under them are not their voiceless servants, or slaves; they are not to be treated as those who cannot say anything to the Elder, or ask any questions to the Elders, or show any disagreement towards the Elders. The Elders should never forget that even they are mere human-beings, and like other human-beings, they too can make mistakes, can be led astray and deceived by Satan, and under the influence of Satan they too can lead others astray as well as deceive them – knowingly or unknowingly. In God’s Church, God is still the final authority, and amongst His children, things have to be done as per His will, the way He wants them done. God has given all the necessary instructions in His Word; since He will never go contrary to His will that He has already expressed in His Word; therefore, the Elders have to take care of the congregation, as God has instructed in His Word.

    One passage that is of great help in learning about and carrying out this responsibility, by both, Elders and congregation in the prescribed manner is 1 Peter 5:1-5. In this passage, Peter exhorts the Elders to function as a shepherd, i.e., patiently, gently, and with perseverance, always remembering that it is not their own but God’s flock that they are looking after, so they will have to give an account for them to God. They should not tend God’s flock for dishonest gain, nor try to use it for personal benefit and temporal gains – a good guide for this is Paul’s example in 1 Corinthians chapter 9, where he explains his responsibilities, rights, authority, remuneration and how he functioned as a minister of God. Peter goes on to say in verse 3 that the Elders should set themselves up as examples to God’s flock, and not behave as lords over them; i.e., they should lead by example not force or coercion, as we see from the life of Paul too. Then, in verse 4, Peter urges the Elders to wait for their “Chief Shepherd” to come and give them their eternal, unfading rewards; once again implying that they should not seek and desire getting temporal gains from God’s flock entrusted to them. Then, in verse 5, Peter also instructs the congregation about their responsibility – they should submit themselves to the Elders, as well as to each other, and remain humble in all things, waiting for God to exalt them in due time (verse 6). So, for the benefit of the Church and of the congregation, the Elders and the congregation, both have to work hand-in-hand, helping and supplementing each other; one cannot function properly without the other, both have to fulfil their respective responsibilities. 

    In Luke 12:45-46, usurping and misusing the authority given by the Master to His servant, is a sign of bad stewardship, and will invite severe retribution (also see Ezekiel chapter 34 in this context). From the next article we will start considering about maintaining discipline in the Church.

    If you have not yet accepted the discipleship of the Lord, make your decision in favor of the Lord Jesus now to ensure your eternal life and heavenly blessings. Where there is obedience to the Lord, where there is respect and obedience to His Word, there is also the blessing and protection of the Lord. Repenting of your sins, and asking the Lord Jesus for forgiveness of your sins, voluntarily and sincerely, surrendering yourself to Him - is the only way to salvation and heavenly life. You only have to say a short but sincere prayer to the Lord Jesus Christ willingly and with a penitent heart, and at the same time completely commit and submit your life to Him. You can also make this prayer and submission in words something like, “Lord Jesus, I am sorry for my sins and repent of them. I thank you for taking my sins upon yourself, paying for them through your life.  Because of them you died on the cross in my place, were buried, and you rose again from the grave on the third day for my salvation, and today you are the living Lord God and have freely provided to me the forgiveness, and redemption from my sins, through faith in you. Please forgive my sins, take me under your care, and make me your disciple. I submit my life into your hands." Your one prayer from a sincere and committed heart will make your present and future life, in this world and in the hereafter, heavenly and blessed for eternity.

 

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शुक्रवार, 7 मई 2021

आदर्श

 

          यदि आप से पूछा जाए कि आपका परामर्शदाता कौन है, तो आपके सामने किसका नाम आएगा? मेरे लिए वह नाम पास्टर रिच है। उन्होंने मुझे में संभावनाओं को देखा, और तब भी मुझ पर भरोसा रखा जब मैं स्वयं अपने आप पर भरोसा नहीं रखती थी। उन्होंने स्वयं नम्रता और प्रेम के साथ सेवकाई करने का एक आदर्श बनकर मुझे सिखाया; और परिणामस्वरूप आज मैं परमेश्वर की सेवा औरों को सिखाने तथा औरों के लिए आदर्श बनकर कार्य करने के द्वारा करने पा रही हूँ।

          परमेश्वर के वचन बाइबल में हम देखते हैं कि एलिशा के एक अगुवे के रूप में विकसित होने में एलिय्याह की बहुत प्रमुख भूमिका थी। एलिय्याह ने एलिशा को हल जोतते हुए देखा और उसे अपने पीछे हो लेने के लिए कहा, क्योंकि परमेश्वर ने एलिय्याह से कहा था कि वह एलिशा को अपना उत्तराधिकारी अभिषेक करे (1 राजाओं 9:16, 19)। युवा एलिशा ने अपने परामर्शदाता को अद्भुत आश्चर्यकर्म करते हुए देखा, और साथ ही यह भी सीखा कि चाहे कुछ भी हो जाए, केवल परमेश्वर ही की आज्ञाकारिता का जीवन जीना है। एलिय्याह ने अपने के जीवन के अन्त का समय निकट आने पर, एलिशा को तीन बार अवसर दिया कि वह वापस चला जाए, किन्तु हर बार एलिशा ने इसके लिए मना कर दिया, और कहा “...यहोवा के और तेरे जीवन की शपथ मैं तुझे नहीं छोड़ने का” (2 राजा 2:2, 4, 6)। एलिशा की इस विश्वासयोग्यता के कारण उसे भी परमेश्वर ने अद्भुत रीति से अपने कार्यों के लिए उपयोग किया।

          हम सभी को कोई न कोई ऐसा आदर्श चाहिए होता है जिससे हम प्रभु यीशु का अनुसरण करने के अर्थ को सीखें और समझें, और फिर उसका पालन करें। प्रभु परमेश्वर हमारे मध्य में ऐसे भक्त लोगों को खड़ा करे जो हमारी आत्मिक उन्नति में हमारे मार्गदर्शक और आदर्श बनें, और हमें सही मसीही जीवन जीने में सहायक हों। साथ ही, प्रभु परमेश्वर के अनुग्रह और उसके आत्मा की सामर्थ्य से हम भी औरों के लिए परामर्शदाता, मार्गदर्शक, और आदर्श बन सकें। - एस्तेरा पिरोसका एस्कोबार

 

परमेश्वर पिता हमारे जीवनों में हमें चुनौतियां देने और 

प्रोत्साहित करने वाले मार्गदर्शक लोगों के लिए आपका धन्यवाद


तुम मेरी सी चाल चलो जैसा मैं मसीह की सी चाल चलता हूं। - 1 कुरिन्थियों 11:1

बाइबल पाठ: 2 राजाओं 2:1-6

2 राजा 2:1 जब यहोवा एलिय्याह को बवंडर के द्वारा स्वर्ग में उठा लेने को था, तब एलिय्याह और एलिशा दोनों संग संग गिलगाल से चले।

2 राजा 2:2 एलिय्याह ने एलिशा से कहा, यहोवा मुझे बेतेल तक भेजता है इसलिये तू यहीं ठहरा रह। एलिशा ने कहा, यहोवा के और तेरे जीवन की शपथ मैं तुझे नहीं छोड़ने का; इसलिये वे बेतेल को चले गए।

2 राजा 2:3 और बेतेल-वासी भविष्यद्वक्ताओं के चेले एलिशा के पास आकर कहने लगे, क्या तुझे मालूम है कि आज यहोवा तेरे स्वामी को तेरे ऊपर से उठा लेने पर है? उसने कहा, हां, मुझे भी यह मालूम है, तुम चुप रहो।

2 राजा 2:4 और एलिय्याह ने उस से कहा, हे एलिशा, यहोवा मुझे यरीहो को भेजता है; इसलिये तू यहीं ठहरा रह: उसने कहा, यहोवा के और तेरे जीवन की शपथ मैं तुझे नहीं छोड़ने का; सो वे यरीहो को आए।

2 राजा 2:5 और यरीहो-वासी भविष्यद्वक्ताओं के चेले एलिशा के पास आकर कहने लगे, क्या तुझे मालूम है कि आज यहोवा तेरे स्वामी को तेरे ऊपर से उठा लेने पर है? उसने उत्तर दिया, हां मुझे भी मालूम है, तुम चुप रहो।

2 राजा 2:6 फिर एलिय्याह ने उस से कहा, यहोवा मुझे यरदन तक भेजता है, सो तू यहीं ठहरा रह; उसने कहा, यहोवा के और तेरे जीवन की शपथ मैं तुझे नहीं छोड़ने का; सो वे दोनों आगे चले।

 

एक साल में बाइबल: 

  • 2 राजाओं 1-3
  • लूका 24:1-35

शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2019

सिद्ध



      मुझे प्रभु यीशु द्वारा दी गई शिक्षाओं में परमेश्वर के सिद्ध आदर्शों और परमेश्वर के सिद्ध अनुग्रह में विरोधाभास प्रतीत होता था। परमेश्वर के वचन बाइबल में हम देखते हैं कि प्रभु यीशु ने कभी परमेश्वर के आदर्शों के स्तर को कम नहीं किया। प्रभु ने अपने शिष्यों से कहा, “इसलिये चाहिये कि तुम सिद्ध बनो, जैसा तुम्हारा स्‍वर्गीय पिता सिद्ध है” (मत्ती 5:48)। उन्होंने व्यवस्था में सबसे बड़ी आज्ञा के विषय पूछने वाले व्यवस्थापक से कहा “उसने उस से कहा, तू परमेश्वर अपने प्रभु से अपने सारे मन और अपने सारे प्राण और अपनी सारी बुद्धि के साथ प्रेम रख” (मत्ती 22:37)। प्रभु परमेश्वर की इन आज्ञाओं को कोई भी कभी भी पूर्णतः नहीं निभाने पाया है।

      किन्तु यही प्रभु यीशु बड़ी कोमलता से सँसार के सभी लोगों को अपना अनुग्रह प्रदान करता है। उन्होंने व्यभिचार में पकड़ी गई स्त्री को, क्रूस पर उनके साथ चढ़ाए गए और पश्चाताप करने वाले एक डाकू को, अपने उस शिष्य को भी जिसने उनका तीन बार इन्कार किया था, शाऊल (पौलुस) को जो कि मसीही विश्वासियों को सताने के लिए जाना जाता था, अपने अनुग्रह में क्षमा किया। प्रभु का अनुग्रह सिद्ध है, सभी के लिए उनके सभी पापों के लिए है, उनके लिए भी जिन्होंने प्रभु को क्रूस पर ठोका था, “हे पिता, इन्हें क्षमा कर, क्योंकि ये नहीं जानते कि क्या कर रहें हैं” (लूका 23:34)।

      वर्षों तक मैं प्रभु के सिद्ध आदर्शों के समक्ष, अपने आप को प्रभु के सर्वथा अयोग्य समझता था; मैंने प्रभु के सिद्ध अनुग्रह पर कभी विचार ही नहीं किया था। एक बार जब मैंने इस दोहरी सिद्धता के सन्देश को समझ लिया, तो मैंने प्रभु यीशु के जीवन और शिक्षाओं का पुनरवलोकन करने पर पाया कि उनके अनुग्रह का सन्देश उनके संपूर्ण जीवन और शिक्षाओं में विद्यमान है।

      प्रभु यीशु का यह सिद्ध अनुग्रह सँसार के उस प्रत्येक आशाहीन, ज़रूरतमंद, टूटे हुए व्यक्ति के लिए जो अपने आप से पाप पर विजयी होने में असमर्थ होना स्वीकार करता है, और सहायता के लिए प्रभु की ओर हाथ बढ़ाता है, उन्हें अपना हाथ थमा देता है, सदा उपलब्ध है।

      प्रभु का सिद्ध अनुग्रह हम सभी के लिए उपलब्ध है। - फिलिप येन्सी


प्रभु यीशु ने व्यवस्था की सिद्ध अनिवार्यताओं को पूरा कर दिया, 
जिससे हम उसके अनुग्रह की सिद्ध शान्ति का आनन्द ले सकें।

क्योंकि विश्वास के द्वारा अनुग्रह ही से तुम्हारा उद्धार हुआ है, और यह तुम्हारी ओर से नहीं, वरन परमेश्वर का दान है। और न कर्मों के कारण, ऐसा न हो कि कोई घमण्‍ड करे। - इफिसियों 2:8-9

बाइबल पाठ: मत्ती 5:43-48; यूहन्ना 8:9-11
Matthew 5:43 तुम सुन चुके हो, कि कहा गया था; कि अपने पड़ोसी से प्रेम रखना, और अपने बैरी से बैर।
Matthew 5:44 परन्तु मैं तुम से यह कहता हूं, कि अपने बैरियों से प्रेम रखो और अपने सताने वालों के लिये प्रार्थना करो।
Matthew 5:45 जिस से तुम अपने स्‍वर्गीय पिता की सन्तान ठहरोगे क्योंकि वह भलों और बुरों दोनों पर अपना सूर्य उदय करता है, और धर्मियों और अधर्मियों दोनों पर मेंह बरसाता है।
Matthew 5:46 क्योंकि यदि तुम अपने प्रेम रखने वालों ही से प्रेम रखो, तो तुम्हारे लिये क्या फल होगा? क्या महसूल लेने वाले भी ऐसा ही नहीं करते?
Matthew 5:47 और यदि तुम केवल अपने भाइयों ही को नमस्‍कार करो, तो कौन सा बड़ा काम करते हो? क्या अन्यजाति भी ऐसा नहीं करते?
Matthew 5:48 इसलिये चाहिये कि तुम सिद्ध बनो, जैसा तुम्हारा स्‍वर्गीय पिता सिद्ध है।

John 8:9 परन्तु वे यह सुनकर बड़ों से ले कर छोटों तक एक एक कर के निकल गए, और यीशु अकेला रह गया, और स्त्री वहीं बीच में खड़ी रह गई।
John 8:10 यीशु ने सीधे हो कर उस से कहा, हे नारी, वे कहां गए? क्या किसी ने तुझ पर दंड की आज्ञा न दी।
John 8:11 उसने कहा, हे प्रभु, किसी ने नहीं: यीशु ने कहा, मैं भी तुझ पर दंड की आज्ञा नहीं देता; जा, और फिर पाप न करना।

एक साल में बाइबल: 
  • गिनती 4-6
  • मरकुस 4:1-20



मंगलवार, 4 जून 2013

प्रभावी


   पिछले कुछ वर्षों में मुझे आठ बार किशोरों के साथ मिशनरी यात्रा करने का सौभाग्य मिला। अपने उन अनुभवों से मैंने सीखा है कि किशोर मसीह यीशु के लिए प्रभावी होने में किसी से कम नहीं होते - उन्होंने मेरे अपने जीवन और दूसरों के जीवन पर भी बहुत प्रभाव डाला है। साथ ही मैंने यह भी देखा है कि वे किशोर जो सबसे अधिक प्रभावकारी हुए, उनके जीवन उन गुणों से भरे हुए थे जिनके विषय में प्रेरित पौलुस ने तिमुथियुस को लिखा था। तिमुथियुस को लिखी अपनी पहली पत्री में पौलुस ने उसे समझाया कि जवान होने अर्थात अन्य लोगों की अपेक्षा अपने उम्र में कम होने के कारण उसे मसीही सेवकाई के लिए अपने आप को कमज़ोर या अयोग्य नहीं समझना चाहिए। पौलुस ने उससे कहा कि वह स्वयं अन्य विश्वासियों के लिए एक आदर्श बने, और कुछ गुण बताए जिनमें उसे यह उदाहरण प्रस्तुत करना है। 
   
   मैंने देखा है कि वे जवान जो मसीह यीशु के लिए प्रभावी होते हैं उनमें पौलुस द्वारा तिमुथियुस को बताए गए ये गुण बहुतायत से कार्यकारी दिखाई देते हैं। जिन गुणों में आदर्श होने के लिए पौलुस ने तिमुथियुस से कहा, और जो मसीह यीशु के लिए प्रभावी लोगों वे हैं:
  • वचन - वे अपने वचनों और बातों पर नियंत्रण रखते हैं, गलत या ओछी बातें नहीं करते और उनके वचन परमेश्वर को महिमा देने वाले होते हैं।
  • आचरण - वे आचरण और व्यवहार में विवेक और बुद्धिमानी प्रदर्शित करते हैं और उनका आचरण संसार के सामने मसीही विश्वास की एक सजीव गवाही होता है।
  • प्रेम - वे परमेश्वर और मनुष्यों दोनों से प्रेम करने की प्रभु यीशु मसीह की शिक्षा (मत्ती 22:37-39) का पालन करते हैं और अपने प्रेमपूर्ण व्यवहार से दिलों को जीत लेते हैं।
  • विश्वास - वे मसीह यीशु में अपने विश्वास को अपने जीवन में जी कर दिखाते हैं।
  • पवित्रता - वे नैतिक और सैद्धांतिक दोनो ही रूपों में पवित्रता का जीवन जीते हैं; उनके चरित्र भी शुद्ध होते हैं और मसीही जीवन जीने के उन के सिद्धांत भी परमेश्वर के वचन के अनुरूप ही होते हैं।


   ऐसा जीवन जीने वाले जवान हम सभी के लिए जीवन जीने के स्तर का अद्भुत मापदण्ड स्थापित करते हैं। पौलुस के ये निर्देश केवल जवानों या किशोरों के लिए नहीं हैं। 

   हम सभी मसीही विश्वासीयों को अपने अपने स्थानों में वचन, आचरण, प्रेम, विश्वास और पवित्रता में एक आदर्श होना चाहिए। तभी हम अपने और संसार के उद्धारकर्ता प्रभु यीशु के लिए एक प्रभावी जीवन व्यतीत करने पाएंगे। - डेव ब्रैनन


परमेश्वर के वचन बाइबल पर सबसे अर्थपूर्ण टीका बाइबल की शिक्षानुसार व्यतीत होने वाला जीवन है।

कोई तेरी जवानी को तुच्‍छ न समझने पाए; पर वचन, और चाल चलन, और प्रेम, और विश्वास, और पवित्रता में विश्वासियों के लिये आदर्श बन जा। - 1 तिमुथियुस 4:12 

बाइबल पाठ: 1 तिमुथियुस 4:6-16
1 Timothy 4:6 यदि तू भाइयों को इन बातों की सुधि दिलाता रहेगा, तो मसीह यीशु का अच्छा सेवक ठहरेगा: और विश्वास और उस अच्‍छे उपदेश की बातों से, जा तू मानता आया है, तेरा पालन-पोषण होता रहेगा।
1 Timothy 4:7 पर अशुद्ध और बूढिय़ों की सी कहानियों से अलग रह; और भक्ति के लिये अपना साधन कर।
1 Timothy 4:8 क्योंकि देह की साधना से कम लाभ होता है, पर भक्ति सब बातों के लिये लाभदायक है, क्योंकि इस समय के और आने वाले जीवन की भी प्रतिज्ञा इसी के लिये है।
1 Timothy 4:9 और यह बात सच और हर प्रकार से मानने के योग्य है।
1 Timothy 4:10 क्योंकि हम परिश्रम और यत्‍न इसी लिये करते हैं, कि हमारी आशा उस जीवते परमेश्वर पर है; जो सब मनुष्यों का, और निज कर के विश्वासियों का उद्धारकर्ता है।
1 Timothy 4:11 इन बातों की आज्ञा कर, और सिखाता रह।
1 Timothy 4:12 कोई तेरी जवानी को तुच्‍छ न समझने पाए; पर वचन, और चाल चलन, और प्रेम, और विश्वास, और पवित्रता में विश्वासियों के लिये आदर्श बन जा।
1 Timothy 4:13 जब तक मैं न आऊं, तब तक पढ़ने और उपदेश और सिखाने में लौलीन रह।
1 Timothy 4:14 उस वरदान से जो तुझ में है, और भविष्यद्वाणी के द्वारा प्राचीनों के हाथ रखते समय तुझे मिला था, निश्‍चिन्‍त न रह।
1 Timothy 4:15 उन बातों को सोचता रह, और इन्हीं में अपना ध्यान लगाए रह ताकि तेरी उन्नति सब पर प्रगट हो। अपनी और अपने उपदेश की चौकसी रख।
1 Timothy 4:16 इन बातों पर स्थिर रह, क्योंकि यदि ऐसा करता रहेगा, तो तू अपने, और अपने सुनने वालों के लिये भी उद्धार का कारण होगा।

एक साल में बाइबल: 
  • 2 इतिहास 21-22 
  • यूहन्ना 14