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बुधवार, 12 अगस्त 2026

Blessed and Successful Life - 187 - Stewards of Gifts of the Holy Spirit - 3 / आशीषित एवं सफल जीवन – 187 - पवित्र आत्मा के वरदानों के भण्डारी – 3

 

आशीषित एवं सफल जीवन 187

पवित्र आत्मा के वरदानों के भण्डारी – 3

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इस लेख पर चर्चा के लिये नीचे दिये लिंक्स पर क्लिक करें:


वीडियो चर्चा                            ऑडियो चर्चा


“बड़े से बड़े वरदानों की धुन में रहो” को समझना – 1

    हमारे वर्तमान अध्ययन के सन्दर्भ में, और विश्वासियों के परमेश्वर के प्रावधानों के भण्डारी होने के नाते, पिछले लेख में हमने 1 कुरिन्थियों 12:1 से देखा था कि परमेश्वर चाहता है कि सभी मसीही विश्वासी पवित्र आत्मा द्वारा दिए जाने वाले आत्मिक वरदानों के बारे में सीखें और उनके बारे में सही समझ रखें। साथ ही हमने 1 कुरिन्थियों 12:7 से यह भी देखा था कि परमेश्वर द्वारा उन के लिए निर्धारित सेवकाई के अनुसार सभी मसीही विश्वासियों को उपयुक्त आत्मिक वरदान दिए जाते हैं। परमेश्वर की दृष्टि में सभी विश्वासी बिल्कुल समान रीति से उसकी सन्तान हैं, और स्वयं परमेश्वर ही प्रत्येक विश्वासी की सेवकाई और उसके वरदान निर्धारित करता है। इसलिये परमेश्वर की दृष्टि में न तो कोई विश्वासी, और न ही किसी की कोई भी सेवकाई छोटी अथवा बड़ी है, और न ही कोई आत्मिक वरदान बड़ा या प्रमुख, अथवा, छोटा या गौण है। इस प्रकार से स्तर अथवा महत्व में भिन्नता या भेदभाव करना मनुष्य की प्रवृत्ति एवं भावना है, परमेश्वर की नहीं। इस विषय के लिए, 1 कुरिन्थियों 12:31 को बहुधा वरदानों के बड़े या छोटे होने के समर्थन में उपयोग किया जाता है, जो इस पद की सही व्याख्या नहीं है। इसलिए, हमें इस पद को उसके संदर्भ में सही समझना आवश्यक है।

    इस पद को, इस से पहले के पदों 1 कुरिन्थियों 12:12-27, के सन्दर्भ में देखिए। यहाँ पर पौलुस ने शरीर को रूपक के समान प्रयोग करते हुए यह निष्कर्ष दिया कि देह के सभी अंग देह के लिए समान महत्व के और देह की कार्य-क्षमता तथा कुशलता के लिए अपने-अपने स्थान पर समान रीति से आवश्यक हैं। कोई अंग कम अथवा अधिक महत्वपूर्ण, या बड़ा अथवा छोटा नहीं है। उसी प्रकार मण्डली में भी सभी मसीही विश्वासी, अपने भिन्न-भिन्न वरदानों और कार्यों के साथ, प्रभु की मण्डली रूपी देह के लिए समान महत्व रखते हैं। न तो कोई मसीही विश्वासी, न उसकी सेवकाई, न उसके वरदान, औरों की तुलना में बड़े अथवा छोटे, या कम अथवा अधिक महत्वपूर्ण के हैं, सभी समान हैं। फिर इसके बाद पद 28 में पौलुस उस मण्डली रूपी एक ही देह, अर्थात मसीह यीशु की कलीसिया में विभिन्न जिम्मेदारियों, सेवकाइयों, और कार्यों का उल्लेख करता है। इन सेवकाइयों और ज़िम्मेदारियों के साथ ही निहित है कि उनके सही रीति से निर्वाह के लिये, उचित और उपयुक्त आत्मिक वरदान भी साथ ही दिये गये हैं। 

    फिर पद 29-30 में पौलुस आलंकारिक प्रश्नों के पूछने के द्वारा यह दिखाता है कि हर किसी को एक ही ज़िम्मेदारी नहीं दी गई है; और न ही किसी एक को सारी ज़िम्मेदारियाँ दी गई हैं; सभी को उन्हें दी गई अपनी-अपनी ज़िम्मेदारी निभानी है। और तब पद 31 में उसके द्वारा “बड़े से बड़े वरदान” वाक्यांश का प्रयोग किया गया है। इस पद को अन्य पदों के साथ, और उन के संदर्भ में देखने से, क्योंकि परमेश्वर की दृष्टि में सभी सेवकाइयाँ, ज़िम्मेदारियाँ, और उनसे सम्बन्धित आत्मिक वरदान समान स्तर के हैं, इसलिये यह प्रकट हो जाता है कि “बड़े से बड़े” से अभिप्राय, तुलनात्मक रीति से कलीसिया में अधिक से अधिक होते रहने वाले कामों और उन से सम्बन्धित वरदानों के लिए है। अर्थात पौलुस में होकर परमेश्वर पवित्र आत्मा मसीही विश्वासियों को यह बता रहा है कि मसीही मण्डली में सब से अधिक या सबसे ज्यादा काम में आने वाली ज़िम्मेदारी उठाने वाले, यानि कि प्रभु के लिए अधिक से अधिक उपयोग में आने वाले व्यक्ति होने की धुन में रहो या होने की लालसा रखो। आगे जब हम यहाँ उल्लेखित विभिन्न सेवकाइयों के बारे में देखेंगे, तब यह बात और स्पष्ट हो जाएगी।

    यदि इस पद को वरदानों और सेवकाइयों में बड़े-छोटे स्तर और महत्व होने के लिए समझा जाए तो फिर पद 12-27 में दी गई चर्चा व्यर्थ है। फिर तो प्रभु की मण्डली रूपी देह में सभी समान स्तर रखने वाले या समान महत्व के नहीं हैं, और पवित्र आत्मा ने बड़े या छोटे आत्मिक वरदान देने के द्वारा विश्वासियों में भेद-भाव किया है। और यह बात परमेश्वर के स्वरूप और वचन की शिक्षाओं के साथ बिल्कुल मेल नहीं खाती है, इसलिए स्वीकार्य भी नहीं है। 

    हम इस भेद-भाव के निहितार्थों को अगले लेख में कुछ विस्तार से देखेंगे।

    यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। स्वेच्छा से अपने पापों से पश्चाताप करके, प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु, मैं अपने पापों के लिए पश्चातापी हूँ, उनके लिए आप से क्षमा माँगता हूँ। मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मुझे और मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।


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Blessed and Successful Life - 187

Stewards of Gifts of the Holy Spirit - 3

English Translation

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Video Discussion                     Audio Discussion

Understanding “Earnestly Desire the Best Gifts” – 1

 

    In the previous article we had seen from 1 Corinthians 12:1 that as stewards of God’s provisions, and in context of our present study, all God desires that Christian Believers should learn and have a correct understanding about the gifts of the Holy Spirit. We had also seen from 1 Corinthians 12:7 that for help in carrying out their God assigned works and ministry, every Believer is given gifts appropriate to their ministry. In God’s eyes, all Believers are His children equal in all aspects, and God alone decides every Believer’s ministry and the spiritual gift he is to receive. Therefore, in God’s eyes, no ministry is small or big, nor of greater or lesser importance; and no spiritual gift is of greater or lesser importance. Thinking in terms of such categorization and differentiation is man’s tendency, not God’s. A verse that is often misinterpreted and misused to support this concept of gifts being greater or lesser is 1 Corinthians 12:31. Therefore, it is essential to correctly understand this verse in its context.

    Consider this verse in its context, through the preceding verses 1 Corinthians 12:12-27. Here Paul, through using the human body as a metaphor has concluded that in the body all the parts are of equal importance, and their utility, presence, and functioning is equally essential in the location they have been placed. No part of the body is smaller or greater in importance or its utility. Similarly, in the Church - the body of Christ, all Christian Believers, with their different gifts and ministries, are equally important in their respective positions and for works assigned to them. No Christian Believer, and no one’s ministry or gift is greater or lesser in comparison to the others, and their works are also of equal importance, no work is more or less important. Then after this, in verse 28 Paul mentions the various responsibilities, ministries, and works in that one body, i.e., the Church of the Lord Jesus. Implied, along with these ministries and responsibilities are the related spiritual gifts that must have been given to fulfill those ministries and responsibilities.

    After this, in verses 29-30, Paul through his rhetorical questions emphasizes that everybody has not been given the same responsibility, nor has anyone been given all of the responsibilities; everyone has to fulfil their own given responsibility. It is then, in verse 31, that he uses the phrase “the best gifts”. By looking at this verse along with and in context of the other verses, since all ministries and responsibilities and their associated spiritual gifts are equal in the sight of God, therefore, it becomes apparent the implication of “the best gifts” is that they are the gifts and associated ministries and responsibilities that, comparatively, are most often or most commonly used in the Church. In other words, through Paul, the Holy Spirit is telling the Christian Believers that they should desire to be the ones who take the greatest or the most often used responsibilities in the Church - the body of the Lord, i.e., earnestly desire to be the ones in the Church who serve the most. Later, when we see about the various ministries mentioned here, this will become clearer.

    If this verse is taken to understand that it is indicating ministries or gifts being of greater or lesser importance or category, then Paul’s discussion of verse 12-27 is vain. Since then in the body of the Lord - His Church, everybody does not have the same importance and status. It also means that God the Holy Spirit has differentiated between Believers by giving greater or smaller gifts. And this is not at all consistent with the teachings of Word of God, therefore is unacceptable. 

    We will consider the implications of this differentiation in detail in the next article.

    If you have not yet accepted the discipleship of the Lord, make your decision in favor of the Lord Jesus now to ensure your eternal life and heavenly blessings. Where there is obedience to the Lord, where there is respect and obedience to His Word, there is also the blessing and protection of the Lord. Voluntarily repent of your sins and ask the Lord Jesus for forgiveness of your sins, voluntarily and sincerely, surrender yourself to Him - this is the only way to salvation and heavenly life. You only have to say a short but sincere prayer to the Lord Jesus Christ willingly and with a penitent heart, and at the same time completely commit and submit your life to Him. You can also make this prayer and submission in words something like, “Lord Jesus, I am sorry for my sins and repent of them. I thank you for taking my sins upon yourself, paying for them through your life.  Because of them you died on the cross in my place, were buried, and you rose again from the grave on the third day for my salvation, and today you are the living Lord God and have freely provided to me the forgiveness, and redemption from my sins, through faith in you. Please forgive my sins, take me under your care, and make me your disciple. I submit my life into your hands." Your one prayer from a sincere and committed heart will make your present and future life, in this world and in the hereafter, heavenly and blessed for eternity.


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शनिवार, 17 फ़रवरी 2024

Blessed and Successful Life / आशीषित एवं सफल जीवन – 172 – Stewards of The Gifts of the Holy Spirit / पवित्र आत्मा के वरदानों के भण्डारी – 3

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“बड़े से बड़े वरदानों की धुन में रहो” को समझना – 1


    हमारे वर्तमान अध्ययन के सन्दर्भ में, और विश्वासियों के परमेश्वर के प्रावधानों के भण्डारी होने के नाते, पिछले लेख में हमने देखा था कि परमेश्वर चाहता है कि सभी मसीही विश्वासी पवित्र आत्मा द्वारा दिए जाने वाले आत्मिक वरदानों के बारे में सीखें और उनके बारे में सही समझ रखें। साथ ही हमने यह भी देखा था कि परमेश्वर द्वारा उन के लिए निर्धारित सेवकाई के अनुसार सभी मसीही विश्वासियों को उपयुक्त आत्मिक वरदान दिए जाते हैं। परमेश्वर की दृष्टि में न तो कोई सेवकाई छोटी अथवा बड़ी है, और न ही कोई आत्मिक वरदान बड़ा या प्रमुख, अथवा, छोटा या गौण है। इस प्रकार की भिन्नता या भेदभाव करना मनुष्य की प्रवृत्ति एवं भावना है, परमेश्वर की नहीं। इस विषय के लिए, 1 कुरिन्थियों 12:31 को बहुधा वरदानों के बड़े या छोटे होने के समर्थन में उपयोग किया जाता है, जो इस पद की सही व्याख्या नहीं है। इसलिए, हमें इस पद को उसके संदर्भ में सही समझना आवश्यक है।

    इस पद को, इस से पहले के पदों 1 कुरिन्थियों 12:12-27 के सन्दर्भ में देखिए। यहाँ पर पौलुस ने शरीर को रूपक के समान प्रयोग करते हुए यह निष्कर्ष दिया कि जिस प्रकार देह के सभी अंग देह के लिए समान महत्व के और देह की कार्य-क्षमता तथा कुशलता के लिए अपने-अपने स्थान पर समान रीति से आवश्यक हैं, कोई अंग कम अथवा अधिक महत्वपूर्ण, या बड़ा अथवा छोटा नहीं है, उसी प्रकार मण्डली में भी सभी मसीही विश्वासी, अपने भिन्न-भिन्न वरदानों और कार्यों के साथ, प्रभु की मण्डली रूपी देह के लिए समान महत्व रखते हैं, न तो कोई मसीही विश्वासी, न उसकी सेवकाई, न उसके वरदान, औरों की तुलना में बड़े अथवा छोटे, या कम अथवा अधिक महत्वपूर्ण है, सभी समान हैं। फिर इसके बाद पद 28 में पौलुस उस मण्डली रूपी एक ही देह, अर्थात मसीह यीशु की कलीसिया में विभिन्न जिम्मेदारियों, सेवकाइयों, और कार्यों का उल्लेख करता है। फिर पद 29-30 में पौलुस आलंकारिक प्रश्नों के पूछने के द्वारा यह दिखाता है कि हर किसी को एक ही ज़िम्मेदारी नहीं दी गई है; और न ही किसी एक को सारी ज़िम्मेदारियाँ दी गई हैं; सभी को उन्हें दी गई अपनी-अपनी ज़िम्मेदारी निभानी है। और तब पद 31 में उसके द्वारा “बड़े से बड़े वरदान” वाक्यांश का प्रयोग किया गया है। इस पद को अन्य पदों के साथ, उसके संदर्भ में देखने से यह प्रकट हो जाता है कि “बड़े से बड़े” से अभिप्राय कलीसिया में अधिक से अधिक होते रहने वाले काम से सम्बन्धित वरदान के लिए है। अर्थात पौलुस में होकर परमेश्वर पवित्र आत्मा मसीही विश्वासियों को यह बता रहा है कि मसीही मण्डली में सब से अधिक या सबसे ज्यादा काम में आने वाली ज़िम्मेदारी उठाने वाले, यानि कि प्रभु के लिए अधिक से अधिक उपयोग में आने वाले व्यक्ति होने की धुन में रहो या लालसा रखो। आगे जब हम यहाँ उल्लेखित विभिन्न सेवकाइयों के बारे में देखेंगे, तब यह बात और स्पष्ट हो जाएगी।

    यदि इस पद को वरदानों और सेवकाइयों में बड़े-छोटे स्तर और महत्व होने के लिए समझा जाए तो फिर पद 12-27 में दी गई चर्चा व्यर्थ है; फिर तो प्रभु की मण्डली रूपी देह में सभी समान स्तर रखने वाले या समान महत्व के नहीं हैं, और पवित्र आत्मा ने बड़े या छोटे आत्मिक वरदान देने के द्वारा विश्वासियों में भेद-भाव किया है। और यह बात परमेश्वर के स्वरूप और वचन की शिक्षाओं के साथ बिल्कुल मेल नहीं खाती है, इसलिए स्वीकार्य भी नहीं है। हम इस भेद-भाव के निहितार्थों को अगले लेख में कुछ विस्तार से देखेंगे।

    यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु, मैं अपने पापों के लिए पश्चातापी हूँ, उनके लिए आप से क्षमा माँगता हूँ। मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मुझे और मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

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English Translation


Understanding “Earnestly Desire the Best Gifts” – 1

 

    In the previous article we had seen that as stewards of God’s provisions, and in context of our present study, all God desires that Christian Believers should learn and have a correct understanding about the gifts of the Holy Spirit. We had also seen that for help in carrying out their God assigned works and ministry, every Believer is given gifts appropriate to their requirement. In God’s eyes, no ministry is small or big, nor of greater or lesser importance; and no spiritual gift is of greater or lesser importance. Thinking in terms of such differentiation is man’s tendency, not God’s. A verse that is often misinterpreted and misused to support this concept of gifts being greater or lesser is 1 Corinthians 12:31. Therefore, it is essential to understand this verse in its context and properly.

    Consider the context through the preceding verses 1 Corinthians 12:12-27, where Paul through using the human body as a metaphor has concluded that in the body all the parts are of equal importance, and their utility, presence, and functioning is equally essential in the location they have been placed. Similarly, in the Church - the body of Christ, all Christian Believers, with their different gifts and ministries, are equally important in their respective positions and for works assigned to them. No Christian Believer, and no one’s ministry or gift is greater or lesser in comparison to the others, and their works are also of equal importance, no work is more or less important. Then after this, in verse 28 Paul mentions the various responsibilities, ministries, and works in that one body, i.e., the Church of the Lord Jesus. After this, in verses 29-30, Paul through his rhetorical questions emphasizes that everybody has not been given the same responsibility, nor has anyone been given all of the responsibilities; everyone has to fulfil their own given responsibility. It is then, in verse 31, that he uses the phrase “the best gifts”. By looking at this verse along with and in context of the other verses, it becomes apparent the implication of “the best gifts” is gifts with the most often used responsibilities in the Church. In other words, through Paul, the Holy Spirit is telling the Christian Believers that they should desire to be the ones who take the greatest or the most often used responsibilities in the Church - the body of the Lord, i.e., earnestly desire to be the ones in the Church who serve the most. Later, when we see about the various ministries mentioned here, this will become clearer.

    If this verse is taken to understand that it is indicating ministries or gifts being of greater or lesser importance or category, then Paul’s discussion of verse 12-27 is vain; since then in the body of the Lord - His Church, everybody does not have the same importance and status. It also means that God the Holy Spirit has differentiated between Believers by giving greater or smaller gifts. And this is not at all consistent with the teachings of Word of God, therefore is unacceptable. We will consider the implications of this differentiation in detail in the next article.

    If you have not yet accepted the discipleship of the Lord, make your decision in favor of the Lord Jesus now to ensure your eternal life and heavenly blessings. Where there is obedience to the Lord, where there is respect and obedience to His Word, there is also the blessing and protection of the Lord. Repenting of your sins, and asking the Lord Jesus for forgiveness of your sins, voluntarily and sincerely, surrendering yourself to Him - is the only way to salvation and heavenly life. You only have to say a short but sincere prayer to the Lord Jesus Christ willingly and with a penitent heart, and at the same time completely commit and submit your life to Him. You can also make this prayer and submission in words something like, “Lord Jesus, I am sorry for my sins and repent of them. I thank you for taking my sins upon yourself, paying for them through your life.  Because of them you died on the cross in my place, were buried, and you rose again from the grave on the third day for my salvation, and today you are the living Lord God and have freely provided to me the forgiveness, and redemption from my sins, through faith in you. Please forgive my sins, take me under your care, and make me your disciple. I submit my life into your hands." Your one prayer from a sincere and committed heart will make your present and future life, in this world and in the hereafter, heavenly and blessed for eternity.

 

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बुधवार, 7 जुलाई 2021

बड़ा

 

          दक्षिणी अफ्रीका के एक वन संरक्षक ने एक अद्भुत दृश्य का वर्णन किया: दो बड़े बिज्जू छः शेरों के एक दल का सामना कर रहे थे। यद्यपि वे शेर उन दोनों से संख्या और आकार में बहुत बड़े थे लेकिन फिर भी उन दोनों ने हार नहीं मानी, जबकि उन पर आक्रमण करने वाले शेरों को लगा था कि वे सरलता से उनके शिकार बन जाएँगे। लेकिन उनकी इस लड़ाई के वीडियो के अन्त में उन बिज्जुओं को इठलाते हुए जाते देखा जा सकता है।

          परमेश्वर के वचन बाइबल में दाऊद और गोलियत की घटना इस से भी अधिक अचंभित करने वाली है। युवा और अप्रशिक्षित दाऊद ने विशालकाय पलिश्ती शूरवीर सैनिक गोलियत का सामना किया और उसे पराजित भी कर दिया। गोलियत आकार और बल में इस युवक दाऊद से कहीं अधिक बलवान था और उसके पास बड़े घातक हथियार, कवच और भाला थे (1 शमूएल 17:5-6)। जबकि दाऊद जो एक चरवाहा था, उसके पास केवल एक गोफन था, जिसके साथ वह युद्धभूमि में अपने भाइयों के लिए रोटी और पनीर लेकर आया था (पद 17-18)।

          गोलियत इस्राएल के सैनिकों को उससे लड़ने की चुनौती देता था, किन्तु कोई उससे लड़ने के लिए तैयार नहीं होता था। राजा शाऊल और सभी इस्राएली उससे भयभीत थे (पद 11)। इसलिए उन सभी को लगे झटके की कलपना करें, जब दाऊद ने गोलियत की चुनौती को स्वीकार कर के उससे युद्ध करने का निर्णय लिया। उसे यह करने का साहस कहाँ से आया, जबकि इस्राएली सेना के प्रशिक्षित सैनिकों में यह साहस नहीं था?

          इस्राएल के सैनिकों को जहाँ पर विशालकाय गोलियत दिखाए पड़ रहा था, वहाँ पर दाऊद को उससे भी कहीं बड़ा परमेश्वर अपने साथ खड़ा दिखाई दे रहा था; “... आज के दिन यहोवा तुझ को मेरे हाथ में कर देगा, और मैं तुझ को मारूंगा, और तेरा सिर तेरे धड़ से अलग करूंगा” (पद 46)। जबकि अन्य सभी को लगता था कि कहानी का अन्त गोलियत के हाथों में है; दाऊद को विश्वास था कि परमेश्वर जो उससे कहीं अधिक बड़ा है, वही हर बात को अपने अधिकार में रखता है। और अपने इसी विश्वास के सहारे, दाऊद ने अपने गोफन से एक ही पत्थर के प्रहार से गोलियत को धाराशाई कर दिया, और उसकी ही तलवार से उसका सिर काट दिया।

          अनेकों बार हमें भी अपनी परिस्थितियाँ और परेशानियाँ गोलियत के समान विशाल और अपरिहार्य प्रतीत होती हैं। किन्तु हमारा प्रभु परमेश्वर उन सभी से बड़ा है और वही हर बात पर अधिकार रखता है, उसे नियंत्रित करता है। वही हमारे जीवनों की कहानी को निर्देशित करता है। - विन्न कोलियर

 

प्रभु मुझे अपनी दृष्टि परिस्थितियों से ऊपर कर के आप की ओर देखते रहना सिखाएं।


क्योंकि मैं अपने धनुष पर भरोसा न रखूंगा, और न अपनी तलवार के बल से बचूंगा। परन्तु तू ही ने हम को द्रोहियों से बचाया है, और हमारे बैरियों को निराश और लज्जित किया है। - भजन 44:6-7

बाइबल पाठ: 1 शमूएल 17:41-50

1 शमूएल 17:41 और पलिश्ती चलते चलते दाऊद के निकट पहुंचने लगा, और जो जन उसकी बड़ी ढाल लिये था वह उसके आगे आगे चला।

1 शमूएल 17:42 जब पलिश्ती ने दृष्टि कर के दाऊद को देखा, तब उसे तुच्छ जाना; क्योंकि वह लड़का ही था, और उसके मुख पर लाली झलकती थी, और वह सुन्दर था।

1 शमूएल 17:43 तब पलिश्ती ने दाऊद से कहा, क्या मैं कुत्ता हूं, कि तू लाठी ले कर मेरे पास आता है? तब पलिश्ती अपने देवताओं के नाम ले कर दाऊद को कोसने लगा।

1 शमूएल 17:44 फिर पलिश्ती ने दाऊद से कहा, मेरे पास आ, मैं तेरा मांस आकाश के पक्षियों और वन-पशुओं को दे दूंगा।

1 शमूएल 17:45 दाऊद ने पलिश्ती से कहा, तू तो तलवार और भाला और सांग लिये हुए मेरे पास आता है; परन्तु मैं सेनाओं के यहोवा के नाम से तेरे पास आता हूं, जो इस्राएली सेना का परमेश्वर है, और उसी को तू ने ललकारा है।

1 शमूएल 17:46 आज के दिन यहोवा तुझ को मेरे हाथ में कर देगा, और मैं तुझ को मारूंगा, और तेरा सिर तेरे धड़ से अलग करूंगा; और मैं आज के दिन पलिश्ती सेना की लोथें आकाश के पक्षियों और पृथ्वी के जीव जन्तुओं को दे दूंगा; तब समस्त पृथ्वी के लोग जान लेंगे कि इस्राएल में एक परमेश्वर है।

1 शमूएल 17:47 और यह समस्त मण्डली जान लेगी की यहोवा तलवार या भाले के द्वारा जयवन्त नहीं करता, इसलिये कि संग्राम तो यहोवा का है, और वही तुम्हें हमारे हाथ में कर देगा।

1 शमूएल 17:48 जब पलिश्ती उठ कर दाऊद का सामना करने के लिये निकट आया, तब दाऊद सेना की ओर पलिश्ती का सामना करने के लिये फुर्ती से दौड़ा।

1 शमूएल 17:49 फिर दाऊद ने अपनी थैली में हाथ डालकर उस में से एक पत्थर निकाला, और उसे गोफन में रखकर पलिश्ती के माथे पर ऐसा मारा कि पत्थर उसके माथे के भीतर घुस गया, और वह भूमि पर मुंह के बल गिर पड़ा।

1 शमूएल 17:50 यों दाऊद ने पलिश्ती पर गोफन और एक ही पत्थर के द्वारा प्रबल हो कर उसे मार डाला; परन्तु दाऊद के हाथ में तलवार न थी।

 

एक साल में बाइबल: 

  • अय्यूब 34-35
  • प्रेरितों 15:1-21


शनिवार, 24 अप्रैल 2021

महत्वहीन

 

          वीडियो में दिखाया जा रहा था कि एक आदमी व्यस्त सड़कर के किनारे लगी हुई बेकाबू आग के पास घुटनों पर बैठा हुआ अपने हाथों से ताली बजा रहा था, उन्हें फैला कर किसी को उसके पास आने के लिए आग्रह कर रहा था। वह किसे इतनी लालसा से बुला रहा था? क्या उसका पालतू कुत्ता वहाँ फँस गया था? कुछ ही पल में देखा गया कि एक खरगोश फुदकता हुआ उसके पास, उसकी गोदी में आ गया, और वह आदमी उसे लेकर तेज़ी से सुरक्षा की ओर भाग गया। एक इतने छोटे से महत्वहीन जन्तु का बचाया जाना, राष्ट्रीय समाचारों का विषय कैसे बन गया? – इसीलिए तो बन गया! छोटों और महत्वहीनों की सहायता किए जाने में कुछ दिल को छू लेने वाली बात होती है। छोटों और महत्वहीनों की सहायता करने के लिए एक बहुत बड़ा दिल चाहिए होता है।

          परमेश्वर के वचन बाइबल में प्रभु यीशु मसीह ने कहा कि परमेश्वर का राज्य उस मनुष्य के समान है जिसने एक बहुत बड़ा भोज आयोजित किया, और जो भी उसमें आना चाहे उसे आने का अवसर दिया। न केवल उन्हें, जो समाज में स्थान और प्रभाव रखते थे, वरन उन्हें भी जो कंगाल, टुंडे. लंगड़े, और अंधे थे (लूका 14:21)। मैं परमेश्वर का बहुत धन्यवादी हूँ कि वह दुर्बलों और महत्वहीनों पर ध्यान करता है, अन्यथा मुझे तो उसके पास आने का कोई अवसर ही नहीं होता। प्रेरित पौलुस ने लिखा, परन्तु परमेश्वर ने जगत के मूर्खों को चुन लिया है, कि ज्ञान वालों को लज्जित करे; और परमेश्वर ने जगत के निर्बलों को चुन लिया है, कि बलवानों को लज्जित करे। और परमेश्वर ने जगत के नीचों और तुच्‍छों को, वरन जो हैं भी नहीं उन को भी चुन लिया, कि उन्हें जो हैं, व्यर्थ ठहराए। ताकि कोई प्राणी परमेश्वर के सामने घमण्ड  न करने पाए” (1 कुरिन्थियों 1:27-29)।

          मुझ जैसे महत्वहीन व्यक्ति का ध्यान करने और उद्धार करने के लिए परमेश्वर का दिल कितना बड़ा होगा! इसकी प्रतिक्रिया में, क्या मेरा हृदय बड़ा हुआ है? मैं सरलता से इसके विषय बता सकता हूँ, यह दिखाने के द्वारा कि मैं समाज के महत्वपूर्ण लोगों को प्रसन्न करने के प्रयास में रहता हूँ, या, अपने उद्धारकर्ता और प्रभु यीशु के समान उन लोगों की सेवा और ध्यान करना चाहता हूँ जो समाज में उपेक्षित और तुच्छ समझे जाते हैं? – माइक व्हिटमर

 

हे प्रभु, आपके शिष्य होने के नाते हम सभी को आपके दृष्टिकोण से देखें, 

न कि उनके सामाजिक स्तर के अनुसार।


परन्तु तुम में ऐसा न होगा; परन्तु जो कोई तुम में बड़ा होना चाहे, वह तुम्हारा सेवक बने। और जो तुम में प्रधान होना चाहे वह तुम्हारा दास बने। - मत्ती 20:26-27

बाइबल पाठ: लूका 14:15-23

लूका 14:15 उसके साथ भोजन करने वालों में से एक ने ये बातें सुनकर उस से कहा, धन्य है वह, जो परमेश्वर के राज्य में रोटी खाएगा।

लूका 14:16 उसने उस से कहा; किसी मनुष्य ने बड़ी जेवनार की और बहुतों को बुलाया।

लूका 14:17 जब भोजन तैयार हो गया, तो उसने अपने दास के हाथ आमन्त्रित लोगों को कहला भेजा, कि आओ; अब भोजन तैयार है।

लूका 14:18 पर वे सब के सब क्षमा मांगने लगे, पहिले ने उस से कहा, मैं ने खेत मोल लिया है; और अवश्य है कि उसे देखूं: मैं तुझ से बिनती करता हूं, मुझे क्षमा करा दे।

लूका 14:19 दूसरे ने कहा, मैं ने पांच जोड़े बैल मोल लिये हैं: और उन्हें परखने जाता हूं: मैं तुझ से बिनती करता हूं, मुझे क्षमा करा दे।

लूका 14:20 एक और ने कहा; मैं ने ब्याह किया है, इसलिये मैं नहीं आ सकता।

लूका 14:21 उस दास ने आकर अपने स्वामी को ये बातें कह सुनाईं, तब घर के स्वामी ने क्रोध में आकर अपने दास से कहा, नगर के बाजारों और गलियों में तुरन्त जा कर कंगालों, टुण्‍डों, लंगड़ों और अन्‍धों को यहां ले आओ।

लूका 14:22 दास ने फिर कहा; हे स्वामी, जैसे तू ने कहा था, वैसे ही किया गया है; फिर भी जगह है।

लूका 14:23 स्वामी ने दास से कहा, सड़कों पर और बाड़ों की ओर जा कर लोगों को बरबस ले ही आ ताकि मेरा घर भर जाए।

 

एक साल में बाइबल: 

  • 2 शमूएल 19-20
  • लूका 18:1-23

सोमवार, 16 दिसंबर 2019

बड़ा और छोटा



      हम कार चलाते हुए उत्तरी मिशिगन से होकर निकल रहे थे, कि मेरी पत्नि मार्लीन ने आश्चर्यचकित होकर कहा “विशवास नहीं होता है कि हमारा संसार इतना बड़ा है!” उसने या टिप्पणी तब की जब हमने उस संकेत को पार किया जो भूमध्य रेखा और उत्तरी ध्रुव के मध्य की दूरी के बीच में स्थित समानान्तर की रेखा को दिखाता है। हम आपस में बात करते रहे कि हमारा संसार कितना बड़ा है और हम कितने छोटे हैं। फिर भी सृष्टि की तुलना में हमारा छोटा सा गृह धूल के एक कण के समान है।

      यदि हमारा संसार बड़ा है, और जगत उससे भी कहीं अधिक बड़ा है, तो वह कितना बड़ा होगा जिसने अपनी सामर्थ्य से इस सब की सृष्टि की? परमेश्वर का वचन बाइबल हमें बताती है कि “क्योंकि उसी [प्रभु यीशु] में सारी वस्‍तुओं की सृष्‍टि हुई, स्वर्ग की हो अथवा पृथ्वी की, देखी या अनदेखी, क्या सिंहासन, क्या प्रभुतांए, क्या प्रधानताएं, क्या अधिकार, सारी वस्तुएं उसी के द्वारा और उसी के लिये सृजी गई हैं” (कुलुस्सियों 1:16)।

      यह एक अच्छा समाचार है क्योंकि जिस प्रभु यीशु ने इस जगत की सृष्टि की, वही हमें हमारे पापों से सदा कल के लिए छुड़ाने के लिए आया है। अपनी मृत्यु से पहले की रात्रि को प्रभु यीशु ने अपने शिष्यों से कहा, “मैं ने ये बातें तुम से इसलिये कही हैं, कि तुम्हें मुझ में शान्‍ति मिले; संसार में तुम्हें क्‍लेश होता है, परन्तु ढाढ़स बांधो, मैं ने संसार को जीन लिया है” (यूहन्ना 16:33)।

      जब हम मसीही विश्वासी जीवन की छोटी – बड़ी चुनौतियों का सामना करते हैं, तो हम उसे पुकारते हैं जिसने इस सृष्टि की रचना की, तथा जो हमारे लिए मारा गया और फिर तीसरे दिन जी भी उठा, और जिसने इस संसार के पाप के टूटेपन पर विजय प्राप्त की। हमारी हर परिस्थिति में वह अपनी शान्ति हमें देता है। वह बड़ा परमेश्वर हमारी छोटी समस्याओं में भी हमारे साथ होता है। - बिल क्राउडर

परमेश्वर का अनुग्रह असीमित है, उसकी करुणा अपार है, और उसकी शान्ति अवर्णनीय है।

मैं तुम्हें शान्‍ति दिए जाता हूं, अपनी शान्‍ति तुम्हें देता हूं; जैसे संसार देता है, मैं तुम्हें नहीं देता: तुम्हारा मन न घबराए और न डरे। - यूहन्ना 14:27

बाइबल पाठ: कुलुस्सियों 1:12-17
Colossians 1:12 और पिता का धन्यवाद करते रहो, जिसने हमें इस योग्य बनाया कि ज्योति में पवित्र लोगों के साथ मीरास में समभागी हों।
Colossians 1:13 उसी ने हमें अन्धकार के वश से छुड़ाकर अपने प्रिय पुत्र के राज्य में प्रवेश कराया।
Colossians 1:14 जिस में हमें छुटकारा अर्थात पापों की क्षमा प्राप्त होती है।
Colossians 1:15 वह तो अदृश्य परमेश्वर का प्रतिरूप और सारी सृष्‍टि में पहिलौठा है।
Colossians 1:16 क्योंकि उसी में सारी वस्‍तुओं की सृष्‍टि हुई, स्वर्ग की हो अथवा पृथ्वी की, देखी या अनदेखी, क्या सिंहासन, क्या प्रभुतांए, क्या प्रधानताएं, क्या अधिकार, सारी वस्तुएं उसी के द्वारा और उसी के लिये सृजी गई हैं।
Colossians 1:17 और वही सब वस्‍तुओं में प्रथम है, और सब वस्तुएं उसी में स्थिर रहती हैं।

एक साल में बाइबल: 
  • अमोस 4-6
  • प्रकाशितवाक्य 7



बुधवार, 3 मई 2017

सेवक


   मैं खीज कर चिल्ला उठी, "मैं किसी की नौकरानी नहीं हूँ!" उस प्रातः मेरे परिवार की माँगें कुछ अधिक ही लग रही थीं; मैं अपने पति की नीली टाई ढूँढ़ने के साथ-साथ, रो रहे शिशु को दूध पिला रही थी और अपने 2 वर्षीय बच्चे के खोए हुए खिलौने को पलंग के नीचे से निकालने का प्रयास भी कर रही थी।

   उसी दिन, बाद में जब मैं परमेश्वर के वचन बाइबल को पढ़ रही थी तो मेरे सामने यह पद आया: "क्योंकि बड़ा कौन है; वह जो भोजन पर बैठा या वह जो सेवा करता है? क्या वह नहीं जो भोजन पर बैठा है? पर मैं तुम्हारे बीच में सेवक की नाईं हूं" (लूका 22:27)।

   प्रभु यीशु को अपने शिष्यों के पाँव धोने की कोई आवश्यकता नहीं थी, परन्तु उन्होंने यह किया (यूहन्ना 13:5); इस काम को करने के लिए सेवक होते थे, परन्तु प्रभु यीशु ने स्वयं शिष्यों की सेवा करना चुना। आज का समाज इस बात पर ज़ोर देता है कि हमारा कोई उच्च-स्तर हो, हम भी कुछ हों। हमें सबसे अच्छा मेहनताना देने वाली नौकरियाँ, कंपनी में सर्वोच्च स्थान, चर्च में वर्चस्व चाहिए। लेकिन हम चाहे जिस भी पद पर हों, अपने तथा समस्त संसार के उध्दारकर्ता के उदाहरण से सेवा करने की शिक्षा ले सकते हैं।

   हम जीवन में विभिन्न भूमिकाएं निभाते हैं - माता-पिता, सन्तान, मित्र, कार्यकर्ता, अगुवे, या विद्यार्थी। प्रश्न यह है: क्या हम इन भिन्न भूमिकाओं को सेवभाव के साथ निभाते हैं? चाहे मेरी दैनिक दिनचर्या थका देने वाली होती है, मैं धन्यवादी हूँ कि मेरा स्वामी-परमेश्वर मेरे साथ रहता है, मेरी सहायता और मार्गदर्शन करता है, क्योंकि मैं उसका अनुसरण करना चाहती हूँ, स्वेच्छा से लोगों की सेवा करना चाहती हूँ।

  परमेश्वर करे कि हम अपने प्रभु यीशु के समान सेवक बनकर उसके लिए एक सजीव उदाहरण बनें; क्योंकि इसका प्रतिफल महान है (लूका 22:30)। - कीला ओकोआ


प्रभु यीशु के समान होने के लिए हम में 
उसके समान सेवक का सा आचरण होना चाहिए।

यीशु ने उन्हें पास बुलाकर कहा, तुम जानते हो, कि अन्य जातियों के हाकिम उन पर प्रभुता करते हैं; और जो बड़े हैं, वे उन पर अधिकार जताते हैं। परन्तु तुम में ऐसा न होगा; परन्तु जो कोई तुम में बड़ा होना चाहे, वह तुम्हारा सेवक बने। और जो तुम में प्रधान होना चाहे वह तुम्हारा दास बने। जैसे कि मनुष्य का पुत्र, वह इसलिये नहीं आया कि उस की सेवा टहल करी जाए, परन्तु इसलिये आया कि आप सेवा टहल करे और बहुतों की छुडौती के लिये अपने प्राण दे। - मत्ती 20:25-28

बाइबल पाठ: लूका 22:24-30
Luke 22:24 उन में यह वाद-विवाद भी हुआ; कि हम में से कौन बड़ा समझा जाता है 
Luke 22:25 उसने उन से कहा, अन्यजातियों के राजा उन पर प्रभुता करते हैं; और जो उन पर अधिकार रखते हैं, वे उपकारक कहलाते हैं। 
Luke 22:26 परन्तु तुम ऐसे न होना; वरन जो तुम में बड़ा है, वह छोटे की नाईं और जो प्रधान है, वह सेवक की नाईं बने। 
Luke 22:27 क्योंकि बड़ा कौन है; वह जो भोजन पर बैठा या वह जो सेवा करता है? क्या वह नहीं जो भोजन पर बैठा है? पर मैं तुम्हारे बीच में सेवक की नाईं हूं। 
Luke 22:28 परन्तु तुम वह हो, जो मेरी परीक्षाओं में लगातार मेरे साथ रहे। 
Luke 22:29 और जैसे मेरे पिता ने मेरे लिये एक राज्य ठहराया है, 
Luke 22:30 वैसे ही मैं भी तुम्हारे लिये ठहराता हूं, ताकि तुम मेरे राज्य में मेरी मेज पर खाओ-पिओ; वरन सिंहासनों पर बैठकर इस्त्राएल के बारह गोत्रों का न्याय करो।

एक साल में बाइबल: 
  • 1 राजा 14-15
  • लूका 22:21-46