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मंगलवार, 7 जुलाई 2026

Blessed and Successful Life - 152 - Building the Church – 7 – On Peter? – 7 / आशीषित एवं सफल जीवन – 152 - कलीसिया का निर्माण – 7 – पतरस पर? – 7

 

आशीषित एवं सफल जीवन – 152

कलीसिया के भण्डारी – 18

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कलीसिया का निर्माण – 7 – पतरस पर? – 7

 

नया-जन्म पाए हुए मसीही विश्वासी होने के नाते, हम प्रभु की कलीसिया के, उसके परिवार का एक भाग हैं। परमेश्वर की कलीसिया के तथा परमेश्वर की अन्य सन्तानों के साथ सहभागिता रखने योग्य भण्डारी होने के लिए, हम परमेश्वर की सन्तानों के साथ सहभागिता रखने के बारे में सीख रहे हैं। प्रभु ने मत्ती 16:18 में कहा कि वह ही अपनी कलीसिया बनाएगा। किन्तु शैतान इस पद का दुरुपयोग करके, एक गलत शिक्षा ले आया है, कि प्रभु ने अपनी कलीसिया पतरस पर बनाई है, जो दुर्भाग्यवश, ईसाई या मसीही समाज में काफी मान्य और प्रचलित भी हो गई है। हमने इस पद के विश्लेषण के द्वारा, तथा पवित्र शास्त्र के कई अन्य भागों से इस बात को देखा है कि यह एक अस्वीकार्य और गलत धारणा है। अभी हम बाइबल से पतरस के चरित्र के कुछ गुणों को देख रहे हैं जो यह दिखाते हैं कि क्यों वह कलीसिया का आधार कभी नहीं हो सकता था। पिछले दो लेखों में हमने उसके कुछ गुण देखे हैं, और कुछ अन्य को आज देख कर इस भाग का समापन करेंगे।

  • पतरस में प्रभु की विश्वव्यापी कलीसिया की स्थापना का दर्शन नहीं था; उन आरम्भिक दिनों में इसी आत्मिक अपरिपक्वता और दर्शनों की नासमझी के कारण, वह यह नहीं समझ सका था कि प्रभु अन्यजातियों से भी उतना ही प्रेम करता है जितना यहूदियों से करता है। जैसा कि प्रभु ने प्रेरितों 1:8 में शिष्यों तथा पतरस से सामरिया और संसार के छोर तक जाकर प्रचार करने के दायित्व देने के द्वारा प्रकट किया था। प्रेरितों 10 अध्याय में वह कुरनेलियुस के घर जाकर अपनी इसी अपरिपक्वता और नासमझी को प्रकट करता है। कुरनेलियुस के घर पहुँचने के बाद भी, पतरस वहाँ पर, यहूदी होने के कारण अपने आप को ‘उच्च’ दिखाने का प्रयास करता है, बजाए इसके कि जिसके यहाँ प्रभु ने उसे भेजा है, उसके साथ आदर से बात करे (प्रेरितों 10:28-29)। जो व्यक्ति प्रभु के सुसमाचार के विश्वव्यापी उद्देश्य को नहीं समझता था, वह प्रभु की विश्वव्यापी कलीसिया के दर्शन को क्या जानेगा, और उस विश्वव्यापी कलीसिया का आधार कैसे होगा?

  • प्रभु के द्वारा प्रेरितों में से एक होने के लिये चुने जाने के लगभग दो दशक बाद भी, पतरस लोगों को दिखाने के लिए अपने मसीही व्यवहार को बदलने और कपट करने वाला व्यक्ति था। वह ऐसा लोगों की दृष्टि में सही दिखने और लोगों को प्रसन्न रखने के लिये करता था। और उसके इस व्यवहार के कारण उसके साथ रहने वाले और भी लोग बहक जाते थे। गलातियों 2:11-21 में, घटना लिखी गई है जब पौलुस के मसीही हो जाने के चौदह वर्षों (गलातियों 2:1) से भी अधिक के बाद, अर्थात पतरस के लगभग दो दशकों तक प्रभु की संगति और कलीसिया में कार्य करते रहने के बाद भी, उसने लोगों को दिखाने के लिए, तथा अपने आप को यहूदियों को स्वीकार्य दिखाने के लिये पाखण्ड किया था। और उसके साथ बरनबास जैसे विश्वासी लोग भी इस बात में गिर गए। यह इतनी गंभीर गलती थी, कि पतरस के इस व्यवहार और उसकी भर्त्सना के लिए पवित्र आत्मा ने पौलुस के द्वारा इस व्यवहार और उससे संबंधित बातों के लिए “कपट” (पद 13 ), “सुसमाचार की सच्चाई पर सीधी चाल नहीं चलना” (पद 14), “विश्वास की नहीं वरन कर्मों की धार्मिकता को दिखाने वाला” (पद 16), “पापी” (पद 17), “अपराधी” (पद 18), “परमेश्वर के अनुग्रह को व्यर्थ ठहराने वाला” (पद 21) जैसे कठोर और कटु शब्दों का सब के सामने, सार्वजनिक रीति से उपयोग किया। और इस घटना को तथा उससे संबंधित भर्त्सना के उन शब्दों को, अनन्तकाल के लिए अपने वचन में लिखवा भी दिया, जिससे आज हम पतरस के समान ही मनुष्यों को प्रसन्न करने के लिए परमेश्वर की शिक्षाओं से विमुख होने की इस गलती में न पड़ जाएं।

    अब विचार कीजिए, क्या प्रभु जो आदि से लेकर अन्त तक की हर बात को जानता है, जिससे कोई बात छुपी नहीं है, जिसके लिए भविष्य भी वर्तमान के समान ही है, क्या वह ऐसे अस्थिर और डांवांडोल व्यवहार और प्रवृत्ति रखने वाले मनुष्य पर कलीसिया स्थापित करेगा? उसपर जो अपने पाखण्ड, उतावलेपन, और अधीरता के कारण औरों को भी अपने समान पाखण्ड में गिरा सकता था? और जो अपनी ही गढ़ी हुई धार्मिकता के कारण परमेश्वर की बात मानने से भी इनकार कर सकता था, जैसा कि हमने पिछले लेख में देखा था? अब विचार कीजिये कि क्या प्रभु अपनी स्वयं की शिक्षा (मत्ती 7:24-27) के विरुद्ध जाकर, ऐसे व्यक्ति पर अपनी कलीसिया बना सकता है?

    यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं, तो परमेश्वर पवित्र आत्मा की आज्ञाकारिता एवं अधीनता में वचन की सच्चाइयों को उससे समझें। किसी के भी द्वारा कही गई कोई भी बात को तुरंत ही पूर्ण सत्य के रूप में स्वीकार न करें, विशेषकर तब, जब वह बात बाइबल की अन्य बातों के साथ ठीक मेल नहीं रखती हो। सदा इस बात का ध्यान रखें कि वचन के हर शब्द, हर बात को न केवल उसके तात्कालिक संदर्भ में देखें, समझें, तथा व्याख्या करें, वरन यह भी सुनिश्चित करें कि आपकी वह समझ और व्याख्या वचन में अन्य स्थानों पर दी गई संबंधित बातों एवं शिक्षाओं के अनुरूप भी है, उनके साथ किसी प्रकार का कोई विरोधाभास नहीं है। कभी भी किसी भी गलत शिक्षा को न तो स्वीकार करें और न ही उसका प्रचार और प्रसार करें; परमेश्वर अपने वचन की सच्चाइयों की अवहेलना करने वालों को फिर उन्हीं की मनसा के अनुसार भयानक भ्रम और विनाश में डाल देता है (यहेजकेल 14:7-8; 2 थिस्सलुनीकियों 2:10-12)।

    यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। स्वेच्छा से अपने पापों के लिये पश्चाताप करके, प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु, मैं अपने पापों के लिए पश्चातापी हूँ, उनके लिए आप से क्षमा माँगता हूँ। मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मुझे और मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।


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Blessed and Successful Life - 152

Understanding the Church – 18

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Building the Church – 7 – On Peter? – 7

 

As Born-Again Christian Believers, we are members of the Lord’s Church, His family. To be worthy stewards of God’s Church and of fellowshipping with God’s other children, we need to learn about the Church of the Lord and about the fellowshipping with God’s children. The Lord said in Matthew 16:18, that He will build His Church. But Satan has manipulated the Lord’s Word, and brought in a false teaching, that the Lord has built His Church on Peter; that unfortunately has been commonly accepted and believed upon in Christendom. We have seen from the analysis of this verse, as well as many other portions of the Scriptures, that this is an untenable false notion. We are now considering some of Peter’s character traits from the Bible, that show why he could never be the foundation of the Church. We have already seen some of these traits in the previous two articles, and will see some more today, and conclude this part.

  • Peter did not have the vision of the world-wide Church of the Lord that included the gentiles; in those initial days, because of this lack of spiritual maturity and his inability to understand the visions from the Lord, he did not understand that the Lord loved the gentiles just as much as he loved the Jews. As the Lord had expressed when He had asked the disciples, including Peter, to go to Samaria and the ends of the world with the gospel (Acts 1:8). In Acts chapter 10, Peter exposed this lack of spiritual maturity and lack of understanding on reaching the house of Cornelius. After reaching the house of Cornelius, Peter tries to show off his ‘superiority’ as a Jew, instead of treating the one to whom the Lord has sent him, respectfully (Acts 10:28-29). The person who does not understand the world-wide application of the gospel, how can he be expected to have an understanding about the world-wide Church of the Lord Jesus? How then can he ever be the foundation for building that world-wide Church?

  • About two decades after being chosen by the Lord to be one of the Apostles, Peter was prone to change his Christian behavior and be hypocritical about it. He did this to please people and be seen to be right in their eyes. And because of this, others with him too would fall into the same error. In Galatians 2:11-21, an incident is given, when more than 14 years after the conversion of Paul (Galatians 2:1), i.e., after Peter’s nearly two-decades of being with the Lord and working in and for the Church of the Lord, he tried to make himself pleasing to men and not offend them by acting hypocritically. And even Believers like Barnabas fell into the same hypocrisy because of him, along with him. This was such a serious wrong that the Holy Spirit through Paul rebuked him severely, called his behavior by various unpleasant, very strong and deprecating expressions, e.g., “hypocrisy” (v. 13), “that they were not straightforward about the truth of the gospel” (v. 14), showing himself as justified by works and not by faith (v. 16), “sinners” and “minister of sin” (v. 17), a “transgressor” (v. 18), and one who “set aside the grace of God” (v. 21). Not only did the God the Holy Spirit say all this to Peter and the others through Paul openly and publicly, but He also had it recorded for eternity in God’s eternal unalterable Word, so that today, we may not fall into the same grave mistake of going against the teachings of the Lord for the sake of pleasing men.

 

    Now think for yourself, can the Lord God who knows everything about everything and everyone, from the beginning to the end; from whom nothing is hidden; for whom past-present-future are all alike, without any differentiation, would He establish His Church on such a shaky and vacillating man? On one who because of his hypocrisy, rashness, and impatience, could make others fall into similar hypocrisy? And one who for the sake of his own contrived righteousness, could refuse to obey God, as we saw in the previous article? Will the Lord go against His own teachings of Matthew 7:24-27 for such a man?

    If you are a Christian Believer, then you should learn to discern and understand the truths of God’s Word under the guidance and teaching of the Holy Spirit. Do not accept anything and everything as the truth unless and until you have cross-checked and verified it from the Bible with the help of the Holy Spirit; more so when that thing does not seem to be consistent with the other related things of the Bible. Those who knowingly and willingly choose to go against the truths and facts of God’s Word, choose to believe and do according to their thinking and mentality, God sends them into a terrible deception and destruction (Ezekiel 14:7-8; 2 Thessalonians 2:10-12).

    If you have not yet accepted the discipleship of the Lord, make your decision in favor of the Lord Jesus now to ensure your eternal life and heavenly blessings. Where there is obedience to the Lord, where there is respect and obedience to His Word, there is also the blessing and protection of the Lord. Repenting of your sins, and asking the Lord Jesus for forgiveness of your sins, voluntarily and sincerely, surrendering yourself to Him - is the only way to salvation and heavenly life. You only have to say a short but sincere prayer to the Lord Jesus Christ willingly and with a penitent heart, and at the same time completely commit and submit your life to Him. You can also make this prayer and submission in words something like, “Lord Jesus, I am sorry for my sins and repent of them. I thank you for taking my sins upon yourself, paying for them through your life.  Because of them you died on the cross in my place, were buried, and you rose again from the grave on the third day for my salvation, and today you are the living Lord God and have freely provided to me the forgiveness, and redemption from my sins, through faith in you. Please forgive my sins, take me under your care, and make me your disciple. I submit my life into your hands." Your one prayer from a sincere and committed heart will make your present and future life, in this world and in the hereafter, heavenly and blessed for eternity.


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रविवार, 21 अप्रैल 2024

Growth through God’s Word / परमेश्वर के वचन से बढ़ोतरी – 46

 

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आरम्भिक बातें – 7

मरे हुए कामों से मन फिराना – 3

 

    हम इब्रानियों 6:1-2 में दी गई आरंभिक बातों को सीख रहे हैं, और वर्तमान में हम उन छः में से पहली बात, अर्थात, मरे हुए कामों से मन फिराने के बारे में विचार कर रहे हैं। हमने देखा है कि “मरे हुए काम” क्या हैं, वे काम जो चाहे धार्मिक और भले प्रतीत हों, किन्तु उनके द्वारा करने वालों में कोई आत्मिक बढ़ोतरी या परिपक्वता नहीं होती है। पिछले लेख में हमने मत्ती 7:21-23 से एक प्रकार के “मरे हुए कामों” के बारे में देखा था – स्वयं के द्वारा निर्धारित की गई सेवकाइयाँ, जो यद्यपि प्रभु के नाम में की जाती हैं, किन्तु या तो परमेश्वर की इच्छा में नहीं होती हैं, अथवा परमेश्वर द्वारा दिए गए तरीके से नहीं की जाती हैं। हमने देखा था कि अन्ततः वे सभी प्रभु द्वारा पूर्णतः तिरस्कार कर दी जाएँगी; प्रभु उन्हें “कुकर्म” कह चुका है। आज हम एक अन्य प्रकार के “मरे हुए कामों” के बारे में देखेंगे, आज अधिकाँश मसीहियों को जिन्होंने जकड़ रखा है – मनुष्यों द्वारा बनाए गए सिद्धान्तों और परमेश्वर के बिगाड़े हुए, भ्रष्ट किए हुए वचन के आधार पर परमेश्वर की सेवकाई करना, और यह मान लेना कि ऐसा करना ठीक है।

    प्रभु ने मत्ती 15:3-9 में शास्त्रियों और फरीसियों, जो यहूदियों के धार्मिक अगुवे और प्राचीन थे, और प्रभु पर दोष लगा रहे थे कि वह पुरनियों की रीतियों का पालन नहीं करता है (मत्ती 15:1-2), की खिंचाई की; यहाँ पर कम से कम उन्होंने यह तो सच कहा कि वे रीतियाँ पुरनियों की थीं, उन्हें परमेश्वर द्वारा दी गई नहीं कहा। प्रभु ने, पद 3 में उन्हें उत्तर देते हुए ध्यान दिलाया कि यहूदियों के धार्मिक अगुवे होते हुए भी, वे लोग अपनी रीतियों के पालन करने से बंधे होने के द्वारा परमेश्वर की आज्ञाओं को टाल रहे थे। इसके बाद, पद 4 से 6 तक प्रभु उन पर लगाए गए इस दोष का प्रमाण उन शास्त्रियों और फरीसियों के द्वारा किए जाने वाले कार्यों से देता है। उसके बाद, यशायाह 29:13 का हवाला देते हुए, जो वे कर रहे थे (पद 7-8) उसके लिए प्रभु उन्हें कपटी कहता है, उनकी आराधना को व्यर्थ आराधना कहता है, और उन पर मनुष्यों की बनाई हुए विधियों को परमेश्वर की आज्ञाएँ बताकर सिखाने का दोष लगाता है। ध्यान कीजिए कि प्रभु न तो उन्हें अधर्मी कहता है, न ही उन पर प्रभु परमेश्वर यहोवा को छोड़ कर किसी अन्य देवी-देवता के पीछे चलने का दोष लगाता है, और न ही उन्हें किसी अन्य धर्म शास्त्र का पालन करने वाला बताता है।

    प्रभु द्वारा उन धर्म के अगुवों और प्राचीनों के विरुद्ध कही गई इन बातों का आधार था उनके द्वारा परमेश्वर के वचन में फेर-बदल करना और यह करके उसे बिगड़ देना, भ्रष्ट कर देना। उन्होंने वचन में अपने ही विचार और व्याख्याएँ मिला दी थीं, अपनी ही आज्ञाएँ बना ली थीं, और वे लोगों को इन बातों को परमेश्वर के द्वारा दिए गए सिद्धान्त कह कर सिखा रहे थे, पालन करवा रहे थे। प्रभु यीशु उन्हें परमेश्वर के वचन में परिवर्तन करने और इस प्रकार से वचन को भ्रष्ट करने, उन्हें परमेश्वर द्वारा दी गई आज्ञाओं का नहीं बल्कि अपने द्वारा, मनुष्यों की बनाई हुई आज्ञाओं का पालन करने का दोषी ठहराता है, उन्हें बजाए सच्चे मन से और खराई से परमेश्वर की आराधना करने के, मात्र औपचारिकता निभाने के लिए धार्मिक रीति-रिवाज़ों का पालन करने वाले कहता है। इन बातों के कारण, प्रभु यीशु के नजरिए से, जैसा कि उसने इस खण्ड में कहा है, वे कपटी थे, और परमेश्वर की उनकी आराधना व्यर्थ थी। एक और बात पर ध्यान कीजिए, यद्यपि इन धार्मिक अगुवों ने प्रभु की बात से ठोकर खाई (मत्ती 15:12), अर्थात वे बातें उन्हें बुरी लगीं, लेकिन वे प्रभु पर कुछ भी झूठ कहने का दोष नहीं लगा सके; और एक तरह से अप्रत्यक्ष रीति से यह मान लिया कि प्रभु ने उनके बारे में जो कुछ कहा था, वह सच था। प्रभु इससे आगे मत्ती 15:13-14 में कहता है कि जो भी परमेश्वर की ओर से नहीं हैं, वे सब उखाड़े जाएँगे, वे अपने अनुयायियों के साथ गढ़े में जा गिरेंगे, अर्थात उनका अन्त बहुत दुखदायी होगा।

    ये धार्मिक अगुवे यहोवा को छोड़ अन्य किसी की उपासना नहीं कर रहे थे, किन्तु वे उस रीति से उपासना नहीं कर रहे थे, जैसी प्रभु परमेश्वर ने पवित्र शास्त्र में आज्ञा दी थी कि परमेश्वर की उपासना की जाए। उन्होंने अपनी ही समझ के अनुसार उन्हें दिए गए परमेश्वर के वचन की व्याख्याएँ कर ली थीं, और उनके अनुसार वचन में परिवर्तन कर लिए थे। इन परिवर्तनों का उद्देश्य उन्हें भौतिक समृद्धि देना और परमेश्वर की ओर से धार्मिक कार्यों को करने वाले कार्यकर्ता होने के नाते जन-साधारण पर अपनी पकड़ बनाए रखना था। अब वे परमेश्वर द्वारा दिए गए पवित्र शस्त्र को नहीं, वरन उस में किए गए उनके परिवर्तनों वाले वचन को सिखाते थे, और उसे ही परमेश्वर का वास्तविक वचन स्वीकार करवा के, उसी का पालन करवाते थे। हम इसे पहाड़ी उपदेश में देखते हैं, जहाँ पर प्रभु ने कई बार वाक्यांश “तुम सुन चुके हो” या इसी के समान, जैसे कि मत्ती 5:21, 27 में; और फिर उसके बाद प्रभु कहता है “परन्तु मैं तुम से कहता हूँ” या उसी के समान कुछ, जैसे कि मत्ती 5:22, 28 में लिखा है। यहाँ पर “तुम सुन चुके हो” उस बात को बताता है जो धार्मिक अगुवों और प्राचीनों के द्वारा लोगों को बताई और सिखाई जाती थी, अर्थात भ्रष्ट किया हुआ वचन; और “परन्तु मैं तुम से कहता हूँ” उस बात का सही रूप है, परमेश्वर का वास्तविक वचन, जो लोगों को बताया और सिखाया जाना तथा पालन करवाना चाहिए था।

    अगले लेख में हम इन बातों का वर्तमान की स्थिति में महत्व एवं लागू किया जाना देखेंगे।

    यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु, मैं अपने पापों के लिए पश्चातापी हूँ, उनके लिए आप से क्षमा माँगता हूँ। मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मुझे और मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

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English Translation


The Elementary Principles – 7

Repentance From Dead Works - 3

 

    We are learning about the elementary principles mentioned in Hebrews 6:1-2, and are presently considering the first of these six, i.e., repentance from dead works. We have seen what “dead works” are, works that seem to be religious and good works, but do not result in any spiritual growth or maturity for those carrying them out. In the last article we saw from Matthew 7:21-23 one kind of “dead works” – self-determined ministries though carried out in the name of the Lord, but either not in the will of God, or, not according to how God wants things done. We saw that eventually they will be totally rejected by the Lord; He has called them “lawlessness” or “iniquity.” Today we will consider another kind of “dead works” that these days has a very strong hold on most Christians – serving God through man-made doctrines and the corrupted Word of God, and trusting it to be okay.

    In Matthew 15:3-9, The Lord Jesus pulls up the Scribes and the Pharisees, the religious leaders and elders of the Jews, who were accusing Him of transgressing the traditions of the elders (Matthew 15:1-2) – here, at least they were honest in saying that it were the elder’s traditions, and did not call them as God given traditions. The Lord, in verse 3 answers them by pointing out to them, that as the religious leaders of the Jews, they were transgressing the commandment of God because of adhering to their traditions. The Lord then, from verses 4 to 6, goes on to illustrate His accusation through specific examples of what the Scribes and Pharisees used to do. Then, quoting Isaiah 29:13, He calls them hypocrites for what they were practising (verses 7-8), calls their worship of God as vain, and accuses them of teaching man-made commandments as the doctrines of God. Notice, the Lord neither calls them irreligious, nor of believing in and worshipping some god other than the Lord God Jehovah, nor of following some other Scriptures.

    The Lord’s basis of making these statements against these religious elders and leaders was that they had altered and corrupted God’s Word, by bringing into it their own ideas and interpretations, made up their own commandments, which they were teaching the people as God given doctrines, and making them follow them. The Lord Jesus holds them guilty of altering and thereby corrupting God’s Word, of making the people obey their man-made commandments instead of what God had commanded, of perfunctory ritualistic observances and practises instead of a heart-felt and sincere worship of God. Because of these things from the Lord’s perspective, as He says in this passage, they were hypocrites, and their worship of God was vain. Notice another thing, though these religious leaders were offended at what the Lord had pointed out about them (Matthew 15:12), but they could not accuse the Lord of saying anything false; thereby indirectly acknowledging to be true all that the Lord had to say. The Lord goes on to say in Matthew 15:13-14, that all who were not from God will be uprooted, will fall into a ditch along with their followers, i.e., will have a sorry ending.

    These religious leaders were not worshipping anyone other than Jehovah, but they were not worshipping Him as the Lord God had commanded it to be done in the Scriptures. They had made their own modifications in God’s commandments through their own interpretations of God’s Word given to them. These modifications had been done to benefit them physically, materially, and give them greater power over the common people, presenting themselves as religious functionaries on behalf of God. Now, instead of the actual Scriptures given by God, they were preaching and teaching their own modifications of God’s Word, and were compelling the people to accept whatever they taught, as the authentic Word of God, and obey it. We see this in the Sermon on the Mount, where the Lord often uses the phrase “you have heard” (e.g. Matthew 5:21, 27), or something like it, and the Lord follows it with the phrase “but I say to you” (e.g. Matthew 5:22, 28). The “you have heard” refers to what the people were being taught and asked to do by the religious leaders and elders, i.e., the altered and corrupted word; and the “but I say to you” is the corrected version, the true Word of God, that the people should have been taught and asked to follow.

    In the next article we will see the importance and application of these things in our current context.

    If you have not yet accepted the discipleship of the Lord, make your decision in favor of the Lord Jesus now to ensure your eternal life and heavenly blessings. Where there is obedience to the Lord, where there is respect and obedience to His Word, there is also the blessing and protection of the Lord. Repenting of your sins, and asking the Lord Jesus for forgiveness of your sins, voluntarily and sincerely, surrendering yourself to Him - is the only way to salvation and heavenly life. You only have to say a short but sincere prayer to the Lord Jesus Christ willingly and with a penitent heart, and at the same time completely commit and submit your life to Him. You can also make this prayer and submission in words something like, “Lord Jesus, I am sorry for my sins and repent of them. I thank you for taking my sins upon yourself, paying for them through your life.  Because of them you died on the cross in my place, were buried, and you rose again from the grave on the third day for my salvation, and today you are the living Lord God and have freely provided to me the forgiveness, and redemption from my sins, through faith in you. Please forgive my sins, take me under your care, and make me your disciple. I submit my life into your hands." Your one prayer from a sincere and committed heart will make your present and future life, in this world and in the hereafter, heavenly and blessed for eternity.

 

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रविवार, 14 जनवरी 2024

Blessed and Successful Life / आशीषित एवं सफल जीवन – 140 – Stewards of The Church / कलीसिया के भण्डारी – 16

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कलीसिया का निर्माण – 7 – पतरस पर? – 7

 

परमेश्वर की कलीसिया के तथा उस की अन्य सन्तानों के साथ सहभागिता रखने योग्य भण्डारी होने के लिए, नया-जन्म पाए हुए मसीही विश्वासी होने के नाते, हम प्रभु की कलीसिया, तथा परमेश्वर की सन्तानों के साथ सहभागिता रखने के बारे में सीख रहे हैं। प्रभु ने मत्ती 16:18 में कहा कि वह ही अपनी कलीसिया बनाएगा। किन्तु शैतान इस पद का दुरुपयोग करके, एक गलत शिक्षा ले आया है, जो दुर्भाग्यवश, ईसाई या मसीही समाज में काफी मान्य और प्रचलित भी हो गई है, कि प्रभु ने अपनी कलीसिया पतरस पर बनाई है। हमने इस पद के विश्लेषण के द्वारा, तथा पवित्र शास्त्र के अन्य भागों से इस बात को देखा है कि यह एक अस्वीकार्य और गलत धारणा है। अभी हम बाइबल से पतरस के चरित्र के कुछ गुणों को देख रहे हैं जो यह दिखाते हैं कि क्यों वह कलीसिया का आधार कभी नहीं हो सकता था। पिछले दो लेखों में हमने कुछ गुण देखे हैं, और कुछ अन्य को आज देख कर इस भाग का समापन करेंगे।

  • पतरस में प्रभु की विश्वव्यापी कलीसिया की स्थापना का दर्शन नहीं था; इसी अपरिपक्वता और दर्शनों की नासमझी के कारण, वह यह नहीं समझ सका था कि प्रभु अन्यजातियों से भी उतना ही प्रेम करता है जितना यहूदियों से, जैसा उसने प्रेरितों 1:8 में शिष्यों तथा पतरस से सामरिया और संसार के छोर तक जाकर प्रचार करने के दायित्व देने के द्वारा प्रकट किया था। वह कुरनेलियुस के घर जाकर अपनी इसी अपरिपक्वता और नासमझी को प्रकट करता है,  कुरनेलियुस के घर पहुँचने के बाद भी, पतरस वहाँ पर, यहूदी होने के कारण अपने आप को ‘उच्च’ दिखाने का प्रयास करता है, बजाए इसके कि जिसके यहाँ प्रभु ने उसे भेजा है, उसके साथ आदर से बात करे (प्रेरितों 10:28-29)। जो व्यक्ति प्रभु के सुसमाचार के विश्वव्यापी उद्देश्य को नहीं समझता था, वह प्रभु की विश्वव्यापी कलीसिया के दर्शन को क्या जानेगा, और उसका आधार कैसे होगा?

  • पतरस लोगों को दिखाने के लिए अपने मसीही व्यवहार को बदलने और कपट करने वाला व्यक्ति था, और उसके इस व्यवहार के कारण उसके साथ रहने वाले और भी लोग बहक जाते थे। गलातियों 2:11-21 में, घटना लिखी गई है जब पौलुस के मसीही हो जाने के चौदह वर्षों (गलातियों 2:1) से भी अधिक के बाद, अर्थात पतरस ने लगभग दो दशकों तक कलीसिया में कार्य करते रहने के बाद भी, लोगों को दिखाने के लिए अपने आप को यहूदियों को स्वीकार्य दिखाने का प्रयास किया था, और उसके साथ बरनबास जैसे विश्वासी लोग भी इस बात में गिर गए। यह इतनी गंभीर गलती थी, कि पतरस के इस व्यवहार और उसकी भर्त्सना के लिए पवित्र आत्मा ने पौलुस के द्वारा इस व्यवहार और उससे संबंधित बातों के लिए “कपट” (पद 13 ), “सुसमाचार की सच्चाई पर सीधी चाल नहीं चलना” (पद 14), “विश्वास की नहीं वरन कर्मों की धार्मिकता को दिखाने वाला” (पद 16), “पापी” (पद 17), “अपराधी” (पद 18), “परमेश्वर के अनुग्रह को व्यर्थ ठहराने वाला” (पद 21) जैसे कठोर और कटु शब्दों का सब के सामने, सार्वजनिक रीति से उपयोग किया, और इस घटना को तथा उससे संबंधित भर्त्सना के उन शब्दों को अनन्तकाल के लिए अपने वचन में लिखवा भी दिया, जिससे आज हम पतरस के समान ही मनुष्यों को प्रसन्न करने के लिए परमेश्वर की शिक्षाओं से विमुख होने की इस गलती में न पड़ जाएं।

    अब विचार कीजिए, क्या प्रभु जो आदि से लेकर अन्त तक की हर बात को जानता है, जिससे कोई बात छुपी नहीं है, जिसके लिए भविष्य भी वर्तमान के समान ही है, क्या वह ऐसे अस्थिर और डांवांडोल व्यवहार और प्रवृत्ति रखने वाले मनुष्य पर कलीसिया स्थापित करेगा? वह भी अपनी स्वयं की शिक्षा (मत्ती 7:24-27) के विरुद्ध?

    यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं, तो परमेश्वर पवित्र आत्मा की आज्ञाकारिता एवं अधीनता में वचन की सच्चाइयों को उससे समझें। किसी के भी द्वारा कही गई कोई भी बात को तुरंत ही पूर्ण सत्य के रूप में स्वीकार न करें, विशेषकर तब, जब वह बात बाइबल की अन्य बातों के साथ ठीक मेल नहीं रखती हो। सदा इस बात का ध्यान रखें कि वचन के हर शब्द, हर बात को न केवल उसके तात्कालिक संदर्भ में देखें, समझें, तथा व्याख्या करें, वरन यह भी सुनिश्चित करें कि आपकी वह समझ और व्याख्या वचन में अन्य स्थानों पर दी गई संबंधित बातों एवं शिक्षाओं के अनुरूप भी है, उनके साथ किसी प्रकार का कोई विरोधाभास नहीं है। कभी भी किसी भी गलत शिक्षा को न तो स्वीकार करें और न ही उसका प्रचार और प्रसार करें; परमेश्वर अपने वचन की सच्चाइयों की अवहेलना करने वालों को फिर उन्हीं की मनसा के अनुसार भयानक भ्रम और विनाश में डाल देता है (यहेजकेल 14:7-8; 2 थिस्सलुनीकियों 2:10-12)।

    यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु, मैं अपने पापों के लिए पश्चातापी हूँ, उनके लिए आप से क्षमा माँगता हूँ। मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मुझे और मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

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English Translation


Building the Church – 7 – On Peter? – 7

 

To be worthy stewards of God’s Church and of fellowshipping with God’s other children, as Born-Again Christian Believers, we are learning about the Church of the Lord and about the fellowshipping with God’s children. The Lord said in Matthew 16:18, that He will build His Church. But Satan has manipulated the Lord’s Word, and brought in a false teaching, that unfortunately has been commonly accepted and believed upon in Christendom, that the Lord has built His Church on Peter. We have seen from the analysis of this verse, as well as other portions of the Scriptures that this is an untenable false notion. We are now considering some of Peter’s character traits from the Bible, that show why he could never be the foundation of the Church. We have already seen some of these in the previous two articles, and will see some more today, and conclude this part.

  • Peter did not have the vision of the world-wide Church of the Lord that included the gentiles; because of this lack of spiritual maturity and his inability to understand the visions from the Lord, he did not understand that the Lord loved the gentiles just as much as he loved the Jews, as the Lord had expressed when He had asked the disciples, including Peter, to go to Samaria and the ends of the world with the gospel (Acts 1:8). Peter exposed this lack of spiritual maturity and lack of understanding on reaching the house of Cornelius, after reaching the house of Cornelius, Peter tries to show off his ‘superiority’ as a Jew, instead of treating the one to whom the Lord has sent him, respectfully (Acts 10:28-29). The person who does not understand the world-wide application of the gospel, how can he be expected to have an understanding about the world-wide Church of the Lord Jesus? How then can he ever be the foundation for building that world-wide Church?

  • Peter was prone to change his Christian behavior and be hypocritical about it, to please people and be seen to be right in their eyes, and because of this, others with him too would fall into the same wrong. In Galatians 2:11-21, an incident is given, when more than 14 years after the conversion of Paul (Galatians 2:1), i.e., after Peter,s nearly two-decades of working in and for the Church of the Lord, he tried to make himself pleasing to men and not offend them by acting hypocritically, and even Believer’s like Barnabas fell into the same hypocrisy because of him, with him. This was such a serious wrong that the Holy Spirit through Paul rebuked him severely, called his behavior by various unpleasant, very strong and deprecating expressions, e.g., “hypocrisy” (v. 13), “that they were not straightforward about the truth of the gospel” (v. 14), showing himself as justified by works and not by faith (v. 16), “sinners” and “minister of sin” (v. 17), a “transgressor” (v. 18), and one who “set aside the grace of God” (v. 21). Not only did the God the Holy Spirit say all this to Peter and the others through Paul openly and publicly, but also had it recorded for eternity in God’s eternal unalterable Word, so that today, we may not fall into the same grave mistake of going against the teachings of the Lord for the sake of pleasing men.

 

    Now think for yourself, can the Lord God who knows everything about everything and everyone, from the beginning to the end; from whom nothing is hidden; for whom past-present-future are all alike, without any differentiation, would He establish His Church on such a shaky and vacillating man; one who could make others fall because of his hypocrisy, rashness, and impatience, and refuse to obey God for the sake of his own contrived righteousness? Will the Lord go against His own teachings of Matthew 7:24-27 for such a man?

    If you are a Christian Believer, then you should learn to discern and understand the truths of God’s Word under the guidance and teaching of the Holy Spirit. Do not accept anything and everything as the truth unless and until you have cross-checked and verified it from the Bible with the help of the Holy Spirit; more so when that thing does not seem to be consistent with the other related things of the Bible. Those who knowingly and willingly choose to go against the truths and facts of God’s Word, choose to believe and do according to their thinking and mentality, God sends them into a terrible deception and destruction (Ezekiel 14:7-8; 2 Thessalonians 2:10-12).

    If you have not yet accepted the discipleship of the Lord, make your decision in favor of the Lord Jesus now to ensure your eternal life and heavenly blessings. Where there is obedience to the Lord, where there is respect and obedience to His Word, there is also the blessing and protection of the Lord. Repenting of your sins, and asking the Lord Jesus for forgiveness of your sins, voluntarily and sincerely, surrendering yourself to Him - is the only way to salvation and heavenly life. You only have to say a short but sincere prayer to the Lord Jesus Christ willingly and with a penitent heart, and at the same time completely commit and submit your life to Him. You can also make this prayer and submission in words something like, “Lord Jesus, I am sorry for my sins and repent of them. I thank you for taking my sins upon yourself, paying for them through your life.  Because of them you died on the cross in my place, were buried, and you rose again from the grave on the third day for my salvation, and today you are the living Lord God and have freely provided to me the forgiveness, and redemption from my sins, through faith in you. Please forgive my sins, take me under your care, and make me your disciple. I submit my life into your hands." Your one prayer from a sincere and committed heart will make your present and future life, in this world and in the hereafter, heavenly and blessed for eternity.

 

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मंगलवार, 17 मार्च 2015

होंठों का स्वामी?


   प्रशंसा एवं चापलूसी की बातों में केवल उद्देश्य का ही अन्तर होता है। प्रशंसा किसी दूसरे व्यक्ति में विद्यमान किसी गुण या उसके द्वारा करे गए किसी कार्य के वास्तविक सम्मान के लिए होती है; जबकि चापलूसी किसी दूसरे व्यक्ति की कृपादृष्टि प्राप्त करके अपनी स्वार्थसिद्धी करने के लिए होती है। प्रशंसा दूसरों को उत्साहित करने, उन्हें आगे बढ़ाने के लिए होती है; चापलूसी दूसरों को अपने लिए प्रयोग करने के लिए होती है।

   परमेश्वर के वचन बाइबल में भजन 12 में दाऊद अपने समय के समाज को लेकर विलाप करता है, जहाँ भक्त तथा विश्वासयोग्य लोग जाते रहे थे और उनके स्थान पर छल-कपट करने वाले खड़े हो गए थे; दाऊद ने उनके बारे में लिखा: "उन में से प्रत्येक अपने पड़ोसी से झूठी बातें कहता है; वे चापलूसी के ओठों से दो रंगी बातें करते हैं" (भजन 12:2) क्योंकि "वे कहते हैं कि हम अपनी जीभ ही से जीतेंगे, हमारे ओंठ हमारे ही वश में हैं; हमारा प्रभु कौन है?" (भजन 12:4)

   जब हम मसीही विश्वासी अपनी स्वार्थसिद्धी के लिए किसी की झूठी प्रशंसा करने की इच्छा में पड़ें तो एक प्रश्न है जो हमें अपने-आप से अवश्य ही पूछ लेना चाहिए - "मेरे होंठों का स्वामी कौन है?" यदि मेरे होंठ मेरे अपने हैं, तो फिर मैं उनसे जो चाहूँ वह कह सकता हूँ; लेकिन यदि प्रभु यीशु मेरे होंठों का स्वामी है, तो फिर मेरे होंठों से निकलने वाले शब्द उसके चरित्र के अनुसार हों; ऐसे शब्द जिनके विषय में दाऊद ने लिखा "परमेश्वर का वचन पवित्र है, उस चान्दी के समान जो भट्टी में मिट्टी पर ताई गई, और सात बार निर्मल की गई हो" (भजन 12:6)।

   इस बात को निर्धारित रखने के लिए कि कौन मेरे होंठों का स्वामी है, एक अच्छा तरीका होगा दाऊद द्वारा लिखे गए एक अन्य भजन के एक पद के साथ अपने दिन को आरंभ करना तथा उस पद पर मनन करते रहना - "मेरे मुंह के वचन और मेरे हृदय का ध्यान तेरे सम्मुख ग्रहण योग्य हों, हे यहोवा परमेश्वर, मेरी चट्टान और मेरे उद्धार करने वाले!" (भजन 19:14)। - डेविड मैक्कैसलैंड


जो अपने मुंह की चौकसी करता है, वह अपने प्राण की रक्षा करता है, परन्तु जो गाल बजाता है उसका विनाश जो जाता है। - नीतिवचन 13:3

हे यहोवा, मेरे वचनों पर कान लगा; मेरे ध्यान करने की ओर मन लगा। हे मेरे राजा, हे मेरे परमेश्वर, मेरी दोहाई पर ध्यान दे, क्योंकि मैं तुझी से प्रार्थना करता हूं। -  भजन 5:1-2

बाइबल पाठ: भजन 12
Psalms 12:1 हे परमेश्वर बचा ले, क्योंकि एक भी भक्त नहीं रहा; मनुष्यों में से विश्वास योग्य लोग मर मिटे हैं।
Psalms 12:2 उन में से प्रत्येक अपने पड़ोसी से झूठी बातें कहता है; वे चापलूसी के ओठों से दो रंगी बातें करते हैं।
Psalms 12:3 प्रभु सब चापलूस ओठों को और उस जीभ को जिस से बड़ा बोल निकलता है काट डालेगा।
Psalms 12:4 वे कहते हैं कि हम अपनी जीभ ही से जीतेंगे, हमारे ओंठ हमारे ही वश में हैं; हमारा प्रभु कौन है?
Psalms 12:5 दीन लोगों के लुट जाने, और दरिद्रों के कराहने के कारण, परमेश्वर कहता है, अब मैं उठूंगा, जिस पर वे फुंकारते हैं उसे मैं चैन विश्राम दूंगा।
Psalms 12:6 परमेश्वर का वचन पवित्र है, उस चान्दी के समान जो भट्टी में मिट्टी पर ताई गई, और सात बार निर्मल की गई हो।
Psalms 12:7 तू ही हे परमेश्वर उनकी रक्षा करेगा, उन को इस काल के लोगों से सर्वदा के लिये बचाए रखेगा।
Psalms 12:8 जब मनुष्यों में नीचपन का आदर होता है, तब दुष्ट लोग चारों ओर अकड़ते फिरते हैं।

एक साल में बाइबल: 

  • व्यवस्थाविवरण 30-31
  • मरकुस 15:1-25



शनिवार, 1 मार्च 2014

भरोसा


   झूठ पकड़ने वाले विशेषज्ञों के अनुसार, हमारी स्वाभाविक प्रवृति लोगों पर विश्वास करना है। लेकिन हर कोई हर समय भरोसे के योग्य नहीं होता। छल करने अथवा झूठ बोलने वालों के कुछ हाव-भाव होते हैं; वे बेचैन प्रतीत होते हैं, आँख से आँख मिलाकर बात नहीं करते, बातचीत करते समय हिचकिचाते हैं या अटकते हैं। इन सुरागों के बावजूद, विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि धोखेबाज़ों को विश्वासयोग्य लोगों से अलग पहचान पाना सरल नहीं है।

   परमेश्वर के वचन बाइबल में एक घटना का उल्लेख है जहाँ ऐसे ही धोखे से कुछ लोगों ने इस्त्राएलियों को ठग लिया। यहोशु के पास, जिसे परमेश्वर ने इस्त्राएल को कनान देश में बसाने और उनके गोत्रों की सीमाएं निर्धारित करने की ज़िम्मेदारी दी थी, कनान देश के कुछ निवासी जो गिब्बोनी कहलाते थे और पास ही के इलाके से थे, इसलिए आए कि वे इस्त्राएलियों के साथ संधि कर लें जिससे इस्त्राएली उन्हें उनके इलाके से ना निकालने पाएं। उन्होंने यहोशु पर यह जताया कि वे बहुत दूर स्थान से आए हैं और प्रमाण के लिए अपने पुराने और फटे वस्त्र, पुरानी जूतियाँ आदि दिखाईं। इस्त्राएलियों को सन्देह तो हुआ, लेकिन उन्होंने परमेश्वर से इस सम्बंध में सलाह नहीं ली, गिब्बोनियों की बातों में आकर उन से ’शांति संधि’ कर ली। कुछ समय पश्चात इस्त्राएलियों को मालुम पड़ा कि वे गिब्बोनी किसी दूरस्त इलाके के नहीं वरन पास ही के इलाके के थे, लेकिन अब संधि हो चुकी थी।

   बहुत से लोग अपने लाभ के लिए हमारा भरोसा जीतना चाहते हैं, जैसे सामान विक्रेता, आर्थिक निवेश सलाहकार, विरक्त हो रखे परिजन आदि। स्वाभाविक है कि तब मन में प्रश्न उठता है, "क्या मैं इन पर भरोसा कर सकता हूँ?" ऐसे में हमें जल्दबाज़ी में, केवल प्रत्यक्ष दिखाई देने वाली बातों ही के आधार पर कोई निर्णय नहीं करना चाहिए। भला होता है परामर्श लेना, और उत्तम परामर्श हमें परमेश्वर के लोगों से (नीतिवचन 11:14); परमेश्वर के वचन बाइबल से - भजनकार ने परमेश्वर के वचन को पथ का दीपक और मार्ग का उजियाला कहा है (भजन 119:105); और स्वयं परमेश्वर से मिलता है, जिसने हमें माँगने पर बिना उलाहना दिए बुद्धि देने का वायदा किया है (याकूब 1:5)।

   यही वह परमर्श है जिसपर हम भरोसा कर सकते हैं, जिसके द्वारा हम सही चुनाव कर सकते हैं, क्योंकि मनुष्य तो झूठ बोल सकता है और धोखा दे सकता है परन्तु परमेश्वर कभी झूठ नहीं बोलता, कभी धोखा नहीं देता। - जेनिफर बेन्सन शुल्ट


भला विवेक पाने की लालसा परमेश्वर से प्रार्थना के लिए बुलाहट है।

...क्योंकि यहोवा मन को जांचता और विचार में जो कुछ उत्पन्न होता है उसे समझता है। यदि तू उसकी खोज में रहे, तो वह तुझ को मिलेगा; परन्तु यदि तू उसको त्याग दे तो वह सदा के लिये तुझ को छोड़ देगा। - 1 इतिहास 28:9

बाइबल पाठ: यहोशु 9:1-16
Joshua 9:1 यह सुनकर हित्ती, एमोरी, कनानी, परिज्जी, हिव्वी, और यबूसी, जितने राजा यरदन के इस पार पहाड़ी देश में और नीचे के देश में, और लबानोन के साम्हने के महानगर के तट पर रहते थे, 
Joshua 9:2 वे एक मन हो कर यहोशू और इस्राएलियों से लड़ने को इकट्ठे हुए।
Joshua 9:3 जब गिबोन के निवासियों ने सुना कि यहोशू ने यरीहो और ऐ से क्या क्या किया है, 
Joshua 9:4 तब उन्होंने छल किया, और राजदूतों का भेष बनाकर अपने गदहों पर पुराने बोरे, और पुराने फटे, और जोड़े हुए मदिरा के कुप्पे लादकर 
Joshua 9:5 अपने पांवों में पुरानी गांठी हुई जूतियां, और तन पर पुराने वस्त्र पहिने, और अपने भोजन के लिये सूखी और फफूंदी लगी हुई रोटी ले ली। 
Joshua 9:6 तब वे गिलगाल की छावनी में यहोशू के पास जा कर उस से और इस्राएली पुरूषों से कहने लगे, हम दूर देश सें आए हैं; इसलिये अब तुम हम से वाचा बान्धो। 
Joshua 9:7 इस्राएली पुरूषों ने उन हिव्वियों से कहा, क्या जाने तुम हमारे मध्य में ही रहते हो; फिर हम तुम से वाचा कैसे बान्धे? 
Joshua 9:8 उन्होंने यहोशू से कहा, हम तेरे दास हैं। तब यहोशू ने उन से कहा, तुम कौन हो? और कहां से आए हो? 
Joshua 9:9 उन्होंने उस से कहा, तेरे दास बहुत दूर के देश से तेरे परमेश्वर यहोवा का नाम सुनकर आए हैं; क्योंकि हम ने यह सब सुना है, अर्थात उसकी कीर्ति और जो कुछ उसने मिस्र में किया, 
Joshua 9:10 और जो कुछ उसने एमोरियों के दोनों राजाओं से किया जो यरदन के उस पार रहते थे, अर्थात हेश्बोन के राजा सीहोन से, और बाशान के राजा ओग से जो अश्तारोत में था। 
Joshua 9:11 इसलिये हमारे यहां के वृद्धलोगों ने और हमारे देश के सब निवासियों ने हम से कहा, कि मार्ग के लिये अपने साथ भोजनवस्तु ले कर उन से मिलने को जाओ, और उन से कहना, कि हम तुम्हारे दास हैं; इसलिये अब तुम हम से वाचा बान्धो। 
Joshua 9:12 जिस दिन हम तुम्हारे पास चलने को निकले उस दिन तो हम ने अपने अपने घर से यह रोटी गरम और ताजी ली थी; परन्तु अब देखो, यह सूख गई है और इस में फफूंदी लग गई है। 
Joshua 9:13 फिर ये जो मदिरा के कुप्पे हम ने भर लिये थे, तब तो नये थे, परन्तु देखो अब ये फट गए हैं; और हमारे ये वस्त्र और जूतियां बड़ी लम्बी यात्रा के कारण पुरानी हो गई हैं। 
Joshua 9:14 तब उन पुरूषों ने यहोवा से बिना सलाह लिये उनके भोजन में से कुछ ग्रहण किया। 
Joshua 9:15 तब यहोशू ने उन से मेल कर के उन से यह वाचा बान्धी, कि तुम को जीवित छोड़ेंगे; और मण्डली के प्रधानों ने उन से शपथ खाई। 
Joshua 9:16 और उनके साथ वाचा बान्धने के तीन दिन के बाद उन को यह समाचार मिला; कि वे हमारे पड़ोस के रहने वाले लोग हैं, और हमारे ही मध्य में बसे हैं।

एक साल में बाइबल: 
  • यहोशु 7-9


शुक्रवार, 1 फ़रवरी 2013

धोखा और अनुग्रह


   धोखे और छल-कपट की सच्ची घटनाएं कहानीयों से भी अधिक विस्मयकारी हो सकती हैं। एक समाचार पत्र में छपे समाचार के अनुसार एक महिला ने खरीददारी के बाद दुकानदार को १५०० डॉलर चुकाने के लिए १०लाख डॉलर का नकली नोट थमाया। पुलिस द्वारा पकड़े जाने और पूछ-ताछ करने पर उस महिला ने कहा कि वह अपने पूर्व-पति के द्वारा बहकायी गई, जो कि स्थान स्थान के सिक्के और नोट जमा करने का शौक रखता था और उसी ने उसे वह १०लाख डॉलर का नोट दिया था। यह भी उस महिला का एक बहाना ही था, क्योंकि यह मानना असंभव है कि जब सरकार ने इतनी बड़ी रकम का कोई नोट कभी ज़ारी ही नहीं किया तो उस महिला ने उस नोट को असली कैसे मान लिया, और १५०० की खरीददारी के लिए इतनी बड़ी रकम का नोट क्यों दिया?

   यह एक अच्छा उदाहरण है कि लोग कैसे अपने अन्दर झूठ और धोखे को छुपाए रहते हैं और मौका पड़ने पर दूसरों को भी उसका शिकार बनाना चाहते हैं। परमेश्वर ने अपने वचन बाइबल में यर्मियाह भविष्यद्वक्ता के द्वारा लोगों को चिताया: "मन तो सब वस्तुओं से अधिक धोखा देने वाला होता है, उस में असाध्य रोग लगा है; उसका भेद कौन समझ सकता है?" (यर्मियाह १७:९)। यह चेतावनी कुछ लोगों के लिए नहीं थी, मानो केवल कुछ को ही धोखेबाज़ी की आदत हो; यह बात सभी के लिए थी - हर एक का मन इस असाध्य रोग से ग्रसित है और अपने अपने वक्त तथा अवसर के अनुसार सब के मन का यह रोग प्रकट होता रहता है। इसीलिए यर्मियाह आगे कहता है कि परमेश्वर लोगों के बाहरी स्वरूप एवं व्यवहार को नहीं वरन हर एक के मन को परखता और जांचता है और मन की दशा के अनुसार प्रतिफल देता है।

   परमेश्वर का प्रेम और अनुग्रह इसी में है कि वह हमारे प्रति धैर्य रखता है, सहिषुण रहता है और हमारे मन की दशा के अनुसार यह प्रतिफल वह हमें तुरंत नहीं दे देता वरन हमें पश्चाताप करने और क्षमा मांगने का अवसर देता रहता है, क्योंकि समस्त संसार के लिए पापों की क्षमा और उद्धार का मार्ग उसने अपने पुत्र प्रभु यीशु के क्रूस पर बलिदान के द्वारा दे दिया है। वह संसार के हर एक जन के सामने किसी न किसी रूप में बार बार यह पश्चाताप और क्षमा का अवसर रखता है जिससे वे अपने पापों में बने रहकर उसके न्याय का सामना ना करने पाएं वरन उसके अनुग्रह का लाभ उठाकर अनन्त आशीष के जीवन को पा लें। उसके इस अनुग्रह को स्वीकार करना या अन्देखा करना, यह प्रत्येक व्यक्ति का अपना निर्णय है।

   अपने मन पर नहीं परमेश्वर के अनुग्रह पर विश्वास करें; मन तो धोखेबाज़ है, केवल परमेश्वर ही भला और विश्वासयोग्य है, वह कभी आपको हानि में नहीं पड़ने देगा। - मार्ट डी हॉन


धोखे और विनाशकारी प्रवृतियों से भरे संसार में केवल भले और विश्वासयोग्य परमेश्वर पर विश्वास और उसकी आज्ञाकारिता ही सुरक्षित रहने का एकमात्र मार्ग है।

मन तो सब वस्तुओं से अधिक धोखा देने वाला होता है, उस में असाध्य रोग लगा है; उसका भेद कौन समझ सकता है? - यर्मियाह १७:९

बाइबल पाठ: यर्मियाह १७:५-११
Jeremiah17:5 यहोवा यों कहता है, श्रापित है वह पुरुष जो मनुष्य पर भरोसा रखता है, और उसका सहारा लेता है, जिसका मन यहोवा से भटक जाता है।
Jeremiah17:6 वह निर्जल देश के अधमूए पेड़ के समान होगा और कभी भलाई न देखेगा। वह निर्जल और निर्जन तथा लोनछाई भूमि पर बसेगा।
Jeremiah17:7 धन्य है वह पुरुष जो यहोवा पर भरोसा रखता है, जिसने परमेश्वर को अपना आधार माना हो।
Jeremiah17:8 वह उस वृक्ष के समान होगा जो नदी के तीर पर लगा हो और उसकी जड़ जल के पास फैली हो; जब घाम होगा तब उसको न लगेगा, उसके पत्ते हरे रहेंगे, और सूखे वर्ष में भी उनके विषय में कुछ चिन्ता न होगी, क्योंकि वह तब भी फलता रहेगा।
Jeremiah17:9 मन तो सब वस्तुओं से अधिक धोखा देने वाला होता है, उस में असाध्य रोग लगा है; उसका भेद कौन समझ सकता है?
Jeremiah17:10 मैं यहोवा मन की खोजता और हृदय को जांचता हूँ ताकि प्रत्येक जन को उसकी चाल-चलन के अनुसार अर्थात उसके कामों का फल दूं।
Jeremiah17:11 जो अन्याय से धन बटोरता है वह उस तीतर के समान होता है जो दूसरी चिडिय़ा के दिए हुए अंडों को सेती है, उसकी आधी आयु में ही वह उस धन को छोड़ जाता है, और अन्त में वह मूढ़ ही ठहरता है।

एक साल में बाइबल: 
  • निर्गमन २७-२८ 
  • मत्ती २१:१-२२

शुक्रवार, 29 जुलाई 2011

मुखौटे

हमारा समाज छल और दोगलेपन को प्रोत्साहन देता है। इससे पहले कि हमारे बच्चे स्कूल जाने लायक हों, वे छलावे और दिखावे के व्यवहार की आरंभिक शिक्षा प्राप्त कर चुके होते हैं, तथा कुछ समय और व्यतीत होते होते वे भी इस कला में अपने व्यसक जोड़ीदारों तथा अभिभावकों के समान ही निपुण भी हो जाते हैं।

समाज में इस बात का प्रचलन तो बुरा है ही, लेकिन इससे भी बुरा है जब यह बात और व्यवहार हमारे विश्वास के जीवन में भी दिखाई देने लगती है। जब इतवार को हमें चर्च में होते हैं, तो बड़ी कुशलता से वहाँ हम अपने आचरण को, दूसरे लोगों की अपेक्षा के अनुरूप, ’भले मसीही’ जैसा बना लेते हैं। अपने इस ’रविवारीय व्यवहार’ को बड़ी स्वभाविकता के साथ निभाते हुए हम सबसे अपने अन्दर के स्वार्थी, कंजूस और क्षमाविहीन व्यक्तित्व को सफलता पूर्वक छुपा लेते हैं और लोगों के सामने बड़े धर्मपरायण प्रतीत होते हैं।

प्रसिद्ध मसीही लेखक चार्लस स्विन्डौल ने अपनी एक पुस्तक Improving Your Serve में अपने एक अनुभव का उल्लेख किया। वे एक स्थान पर प्रचारक के रूप में आमंत्रित थे, और वे अपने साथ अपने बच्चों द्वारा उन्हें भेंट में कभी दिया गया रबर से बना एक मुखौटा ले गए। एक शाम जब उनके प्रचार का विष्य था वास्तविकता तथा विश्वसनियता, तो वह उस मुखौटे को लगाकर प्रचार करने लगे। जैसी कि उनकी उम्मीद थी, उपस्थित समूह उनके व्यवहार और प्रचार के विष्य के प्रतिकूल होने के कारण ज़ोर ज़ोर से हंसने लगे। फिर अपने मुखौटे को उतार कर उन्होंने टिप्पणी करी, "कितना विचित्र है कि लोग चेहरे पर लगे वास्तविक मुखौटों की असलियत को तुरंत पहचान लेते हैं, कोई उनसे छला नहीं जा सकता। लेकिन कितना आसान है चेहरों पर नकली तथा अदृश्य मुखौटे लगाए रखना, और लोग उन मुखौटों की वास्तविकता को नहीं पहचान पाते। मसीह के सेवक जिनके हृदय खरे हैं, उन्होंने अपने मुखौटे उतार फेंके हैं और समाज के सामने, अपने उद्धारकर्ता परमेश्वर के समान, अपनी वास्तविकता में जीवन व्यतीत करते हैं। ऐसे सेवकों पर परमेश्वर की विशेष आशीशें बनी रहती हैं।"

हम सब को अपने जीवनों में ढोंग तथा दोगलेपन के साथ संघर्ष करना पड़ता है। अदृश्य मुखौटे लगा कर हम संसार को छल सकते हैं, हृदयों को देखने तथा जाँचने वाले परमेश्वर को नहीं। लेकिन यदि हमारे हृदय खरे होंगे तो हमें अपने चेहरे मुखौटों के पीछे नहीं छुपाने की कोई आवश्यक्ता नहीं होगी। - डेव एग्नर


ढोंगी वह है जिसका ’रविवारीय व्यवहार’ उसके प्रतिदिन के वास्तविक व्यवहार से भिन्न होता है।

इसी रीति से तुम भी ऊपर से मनुष्यों को धर्मी दिखाई देते हो, परन्‍तु भीतर कपट और अधर्म से भरे हुए हो। - मत्ती २३:२८


बाइबल पाठ: मत्ती २३:२५-३३

Mat 23:25 हे कपटी शास्‍त्रियों, और फरीसियों, तुम पर हाय, तुम कटोरे और थाली को ऊपर ऊपर से तो मांजते हो परन्‍तु वे भीतर अन्‍धेर असंयम से भरे हुए हैं।
Mat 23:26 हे अन्‍धे फरीसी, पहिले कटोरे और थाली को भीतर से मांज कि वे बाहर से भी स्‍वच्‍छ हों।
Mat 23:27 हे कपटी शास्‍त्रियों, और फरीसियों, तुम पर हाय; तुम चूना फिरी हुई कब्रों के समान हो जो ऊपर से तो सुन्‍दर दिखाई देती हैं, परन्‍तु भीतर मुर्दों की हड्डियों और सब प्रकार की मलिनता से भरी हैं।
Mat 23:28 इसी रीति से तुम भी ऊपर से मनुष्यों को धर्मी दिखाई देते हो, परन्‍तु भीतर कपट और अधर्म से भरे हुए हो।
Mat 23:29 हे कपटी शास्‍त्रियों, और फरीसियों, तुम पर हाय; तुम भविष्यद्वक्ताओं की कब्रें संवारते और धमिर्यों की कब्रें बनाते हो।
Mat 23:30 और कहते हो, कि यदि हम अपके बाप-दादों के दिनों में होते तो भविष्यद्वक्ताओं की हत्या में उन के साझी न होते।
Mat 23:31 इस से तो तुम अपने पर आप ही गवाही देते हो, कि तुम भविष्यद्वक्ताओं के घातकों की सन्‍तान हो।
Mat 23:32 सो तुम अपने बाप-दादों के पाप का घड़ा भर दो।
Mat 23:33 हे सांपो, हे करैतों के बच्‍चो, तुम नरक के दण्‍ड से क्‍योंकर बचोगे?

एक साल में बाइबल:
  • भजन ४९-५०
  • रोमियों १

गुरुवार, 28 जुलाई 2011

धोखे का मार्ग

आजकल हर कोई अपनी इच्छापूर्ति के लिए अभिनय करने में कुशल है और कई बार सही व्यक्ति और छलावा करने वाले में फर्क बता पाना असंभव हो जाता है। मसीह की मण्डली में भी कई लोग ऐसे होते हैं जो बहुत भक्त और भले होने का व्यवहार करते हैं, इस धारणा में कि वे अपने इस व्यवहार से परमेश्वर को प्रसन्न कर लेंगे।

ऐसी धारणा रखने वाले, एक दन्तकथा वाले उस बकरे के समान हैं जिसे शेर होने का शौक चर्राया और अपनी इस इच्छा की पूर्ति के लिए उस ने अकड़ कर शेर के समान चलना, अपनी छोटी सी पूँछ को बड़ी अदा से हवा में लहराना आदि आरंभ कर दिया। अपनी मिमियाने की आवाज़ को भी उसने शेर की दहाड़ के समान करने का प्रयास किया। अब उसे लगने लगा कि वह भी शेर ही है। एक दिन अपनी इसी अकड़ में जंगल में घूमते हुए उसका सामना असली शेर से हो गया - आगे आप समझदार हैं।

अकसर वे लोग जिन्होंने मसीही विश्वासीयों के समान ही बोलना और व्यवहार करना सीख लिया है, यह मान लेते हैं कि वे भी मसीही विश्वासी हो गए हैं। लेकिन यदि उन्होंने कभी अपना व्यक्तिगत विश्वास मसीह यीशु में नहीं रखा, कभी अपने पापों का अंगीकार और उन से मसीह के नाम में पश्चाताप नहीं किया, कभी अपना जीवन मसीह यीशु को समर्पित नहीं किया, तो उनका विश्वासियों का सा व्यवहार अभिनय मात्र ही है, यथार्त नहीं। वे अभी उस ’निष्कपट विश्वास’ (२ तिमुथियुस १:५) से कोसों दूर हैं केवल जिसके द्वारा ही उद्धार संभव है।

यदि आप अपनी स्वयं निर्धारित धार्मिकता, अपने चर्च में हाज़िरी देने, भक्ति के हाव-भाव और बोलचाल, बाइबल की जानकारी, भले कार्यों आदि पर भरोसा रखकर परमेश्वर को प्रसन्न करने का अपना निश्चय बनाए हुए हैं, तो आप धोखे मे हैं। जैसे वास्तविक शेर का सामना होने पर ही बकरे ने अपनी सच्चाई को पहिचाना, लेकिन तब तक उसके लिए बहुत देर हो चुकी थी, वैसे ही बहुतेरे लोग जब मसीह के न्याय सिंहासन के सामने अपने आप को खड़ा पाएंगे तब ही उन्हें अपनी वास्तविकता का पता चलेगा, लेकिन उनके लिए भी तब बहुत देर हो चुकी होगी।

परमेश्वर के वचन बाइबल की स्पष्ट शिक्षा है कि केवल पापों के अंगीकार और मसीह के नाम में पापों से पश्चाताप और मसीह यीशु में विश्वास तथा समर्पण द्वारा ही हम उसके साथ स्वर्ग में होने के हकदार हो सकते हैं। - डेव एग्नर


अपनी वास्तविक्ता छुपाने के प्रयास में लगे रहने की बजाए, अपनी वास्तविक्ता को मान लेने और उद्धार के लिए परमेश्वर के मार्ग को स्वीकार कर लेने में ही बुद्धिमानी है।

अपने आप को परखो, कि विश्वास में हो कि नहीं; अपने आप को जांचो, क्‍या तुम अपने विषय में यह नहीं जानते, कि यीशु मसीह तुम में है? नहीं तो तुम निकम्मे निकले हो। पर मेरी आशा है, कि तुम जान लोगे, कि हम निकम्मे नहीं। - २ कुरिन्थियों १३:५, ६


बाइबल पाठ: २ कुरिन्थियों १३:१-१०

2Co 13:1 अब तीसरी बार तुम्हारे पास आता हूं: दो या तीन गवाहों के मुंह से हर एक बात ठहराई जाएगी।
2Co 13:2 जैसे मैं जब दूसरी बार तुम्हारे साथ था, सो वैसे ही अब दूर रहते हुए उन लोगों से जिन्‍होंने पहिले पाप किया, और और सब लोगों से अब पहिले से कहे देता हूं, कि यदि मैं फिर आऊंगा, तो नहीं छोडूंगा।
2Co 13:3 तुम तो इस का प्रमाण चाहते हो, कि मसीह मुझ में बोलता है, जो तुम्हारे लिये निर्बल नहीं परन्‍तु तुम में सामर्थी है।
2Co 13:4 वह निर्बलता के कारण क्रूस पर चढ़ाया तो गया, तौभी परमेश्वर की सामर्थ से जीवित है, हम भी तो उस में निर्बल हैं; परन्‍तु परमेश्वर की सामर्थ से जो तुम्हारे लिये है, उसके साथ जीएंगे।
2Co 13:5 अपने आप को परखो, कि विश्वास में हो कि नहीं; अपने आप को जांचो, क्‍या तुम अपने विषय में यह नहीं जानते, कि यीशु मसीह तुम में है? नहीं तो तुम निकम्मे निकले हो।
2Co 13:6 पर मेरी आशा है, कि तुम जान लोगे, कि हम निकम्मे नहीं।
2Co 13:7 और हम अपने परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं, कि तुम कोई बुराई न करो; इसलिये नहीं, कि हम खरे देख पड़ें, पर इसलिये कि तुम भलाई करो, चाहे हम निकम्मे ही ठहरें।
2Co 13:8 क्‍योंकि हम सत्य के विरोध में कुछ नहीं कर सकते, पर सत्य के लिये कर सकते हैं।
2Co 13:9 जब हम निर्बल हैं, और तुम बलवन्‍त हो, तो हम आनन्‍दित होते हैं, और यह प्रार्थना भी करते हैं, कि तुम सिद्ध हो जाओ।
2Co 13:10 इस कारण मैं तुम्हारे पीठ पीछे ये बातें लिखता हूं, कि उपस्थित होकर मुझे उस अधिकार के अनुसार जिसे प्रभु ने बिगाड़ने के लिये नहीं पर बनाने के लिये मुझे दिया है, कड़ाई से कुछ करना न पड़े।

एक साल में बाइबल:
  • भजन ४६-४८
  • प्रेरितों २८

बुधवार, 27 जुलाई 2011

पहले जांचो-परखो, फिर मानो

नीचे दिया गया आज का बाइबल पद प्रभु यीशु के चेले और प्रेरित पतरस के जीवन से संबंधित एक प्रसंग से लिया गया है। पतरस दृढ़ भक्ति से प्रभु यीशु का अनुसरण करने वाला चेला था और गैर यहूदियों में भी प्रभु यीशु के नाम से सेवकाई करता था। उन दिनों में यहूदी समाज के लोग गैर यहूदियों तुच्छ जानते थे और उनसे कोई संबंध अथवा संपर्क नहीं रखते थे। एक समय जब कुछ यहूदी विश्वासी यरुशलेम से पतरस के पास आए तो अपने कुछ संकीर्ण मानसिकता वाले साथियों के कहने में आ कर वह अपने गैर यहूदी मित्रों से अलग हो गया, यह दिखाने को कि अन्य यहूदियों के समान वह भी गौर यहूदियों से कोई मेल-जोल नहीं रखता है। उन दिनों पौलुस प्रेरित भी वहीं पर था, उसे जब इस बात का पता चला तो उसने पतरस को उसके इस दोगलेपन के लिए आड़े हाथों लिया, क्योंकि पौलुस जानता था कि एक खरा और निष्कपट विश्वासी भी गलती कर सकता है और अपनी गलती से मसीह की सेवकाई को बहुत हानि पहुँचा सकता है, जिसे आरंभ में ही सुधारा जाना अनिवार्य है।

ऐसी गलती प्रत्येक मसीही विश्वासी के साथ घटित हो सकती है। आज भी कई मसीह के खरे और निष्कपट सेवक, अपनी कुछ अनुचित धारणाओं के कारण ऐसी ही गलती कर लेते हैं और उनकी इस असावधानी से मसीह के नाम के प्रसार में बाधा भी आ जाती है तथा लोगों का व्यक्तिगत नुकसान भी हो जाता है।

होबार्ट फ्रीमैन भी एक ऐसे ही बड़े समर्पित और खरे प्रचारक थे और उनकी सेवकाई द्वारा कई लोगों ने मसीह यीशु को अपना व्यक्तिगत उद्धारकर्ता ग्रहण किया। परमेश्वर और मसीह के प्रति उनके समर्पण तथा सेवाभाव में कोई कमी या कपट नहीं था और ना ही उनके जीवन मे कोई खोट थी। लेकिन उनकी एक गलत धारणा कई लोगों के लिए बहुत कष्ट का कारण भी बनी। वे चिकित्सकों को नापसन्द करते थे, उन्हें ’डाक्टरी देवता’ कहते थे और अपने अनुयायियों से डाक्टरों से चिकित्सा सेवा न ग्रहण करने के लिए कहते थे, जिस कारण उनके कई अनुयायियों को बहुत कष्टों का सामना भी करना पड़ा। उनकी इस धारणा के लिए बाइबल में कोई आधार नहीं है और ना ही ऐसी कोई शिक्षा मसीह यीशु या उनके चेलों ने कभी कहीं दी। यह केवल होबार्ट फ्रीमैन की अपनी धारणा थी जिसे वह अपने साथ जुड़े लोगों पर थोपते थे। कमी न उनके विश्वास में थी न उनके मसीही सेवकाई के प्रति समर्पण में, कमी थी तो एक विशेष बात को लेकर उनके परमेश्वर के वचन की समझ और व्याख्या में।

लोगों के खरे और भले जीवनों से प्रभावित होकर हम हर बात में उन्हें पूर्णतः विश्वास योग्य मान सकते हैं, लेकिन परमेश्वर का वचन बाइबल कभी हमें किसी भी बात के लिए अन्ध विश्वास करने के लिए नहीं कहती। बाइबल की स्पष्ट और खुली शिक्षा है कि, "सब बातों को परखो: जो अच्‍छी है उसे पकड़े रहो" (१ थिस्सुलिनीकियों ५:२१)। यद्यपि लोग बड़े भक्त, खरे और ईमानदार प्रतीत हो सकते हैं और हमें उनके जीवनों में कोई खोट नहीं दिखाई देता हो, लेकिन यह हमारा कर्तव्य है कि उनकी हर शिक्षा को हम पहले परमेश्वर के वचन से जाँचें (प्रेरितों १७:११) और वचनानुसार यदि खरी पाई जाएं तब ही मानें।

खरे लोग भी गलत हो सकते हैं। - हर्ब वैण्डर लुग्ट


गलती अकसर सच्चई के भेस में प्रस्तुत होती है।

पर जब कैफा अन्‍ताकिया में आया तो मैं ने उसके मुंह पर उसका साम्हना किया, क्‍योंकि वह दोषी ठहरा था। - गलतियों २:११


बाइबल पाठ: गलतियों २:११-२१
Gal 2:11 पर जब कैफा अन्‍ताकिया में आया तो मैं ने उसके मुंह पर उसका साम्हना किया, क्‍योंकि वह दोषी ठहरा था।
Gal 2:12 इसलिये कि याकूब की ओर से कितने लोगों के आने से पहिले वह अन्यजातियों के साय खाया करता था, परन्‍तु जब वे आए, तो खतना किए हुए लोगों के डर के मारे उन से हट गया और किनारा करने लगा।
Gal 2:13 और उसके साथ शेष यहूदियों ने भी कपट किया, यहां तक कि बरनबास भी उन के कपट में पड़ गया।
Gal 2:14 पर जब मैं ने देखा, कि वे सुसमाचार की सच्‍चाई पर सीधी चाल नहीं चलते, तो मैं ने सब के साम्हने कैफा से कहा, कि जब तू यहूदी होकर अन्यजातियों की नाईं चलता है, और यहूदियों की नाईं नहीं तो तू अन्यजातियों को यहूदियों की नाईं चलने को क्‍यों कहता है?
Gal 2:15 हम जो जन्म के यहूदी हैं, और पापी अन्यजातियों में से नहीं।
Gal 2:16 तौभी यह जानकर कि मनुष्य व्यवस्था के कामों से नहीं, पर केवल यीशु मसीह पर विश्वास करने के द्वारा धर्मी ठहरता है, हम ने आप भी मसीह यीशु पर विश्वास किया, कि हम व्यवस्था के कामों से नहीं पर मसीह पर विश्वास करने से धर्मी ठहरें; इसलिये कि व्यवस्था के कामों से कोई प्राणी धर्मी न ठहरेगा।
Gal 2:17 हम जो मसीह में धर्मी ठहरना चाहते हैं, यदि आप ही पापी निकलें, तो क्‍या मसीह पाप का सेवक है कदापि नहीं।
Gal 2:18 क्‍योंकि जो कुछ मैं ने गिरा दिया, यदि उसी को फिर बनाता हूं, तो अपने आप को अपराधी ठहराता हूं।
Gal 2:19 मैं जो व्यवस्था के द्वारा व्यवस्था के लिये मर गया, कि परमेश्वर के लिये जीऊं।
Gal 2:20 मैं मसीह के साथ क्रूस पर चढ़ाया गया हूं, और अब मैं जीवित न रहा, पर मसीह मुझ में जीवित है: और मैं शरीर में अब जो जीवित हूं तो केवल उस विश्वास से जीवित हूं, जो परमेश्वर के पुत्र पर है, जिस ने मुझ से प्रेम किया, और मेरे लिये अपने आप को दे दिया।
Gal 2:21 मैं परमेश्वर के अनुग्रह को व्यर्थ नहीं ठहराता, क्‍योंकि यदि व्यवस्था के द्वारा धामिर्कता होती, तो मसीह का मरना व्यर्थ होता।

एक साल में बाइबल:
  • भजन ४३-४५
  • प्रेरितों २७:२७-४४

सोमवार, 25 जुलाई 2011

प्रदर्शित ढोंग

लण्डन शहर के एक प्रसिद्ध पनीर विक्रेता की दुकान पर बहुत से लोग पंक्ति में खड़े थे। विख्यात प्रचारक स्पर्जन भी वहाँ पनीर खरीदने के इरादे से आए। दुकान की खिड़की में एक बहुत अच्छे प्रतीत होने वाले पनीर के पिण्ड को देख कर स्पर्जन उसकी और आकर्षित हुए और उसे टटोलने लगे। उन्होंने अपनी छड़ी से उसपर हलके से थपकी दी, और आश्चर्यजनक रूप से उस पनीर का पिण्ड में से धातु के बने खोखले बर्तन की खनखनाहट सुनाई दी - वह केवल दिखाने मात्र को खिड़की में रखा धातु से बना पनीर के पिण्ड का नमूना था, वास्तविक पनीर का पिण्ड नहीं। स्पर्जन ने बाद में इस घटना का उल्लेख करते हुए कहा, "मेरा निष्कर्ष था कि मैंने एक बहुत आकर्षक और असली दिखने वाले ढोंगी से मुलाकात करी।"

लोग ऐसे ही हो सकते हैं - जैसे वे प्रतीत होते हैं वैसे वे होते नहीं हैं। बहुत से अपने आप को मसीही विश्वासी तो कहते हैं और रविवार की प्रातः सभाओं में वे बहुत आकर्षक भी दिखते हैं, लेकिन परखे जाने पर उन में से खोखलेपन की ध्वनि आती है। कोई व्यक्ति असली विश्वास से बिलकुल परे होकर भी संसार के सामने मसीही विश्वासी होने का ढोंग तो कर सकता है, लेकिन जैसे ही प्रलोभन अथवा आत्मिक ज़िम्मेदारी से आप उसे परखेंगे, उस के विश्वास का खोखलपन और जीवन का ढोंग प्रकट हो जाएगा। जो आत्मिकता उसमें प्रतीत होती थी वह केवल दिखाने की थी निभाने की नहीं।

लेकिन ऐसा तिमुथियुस के साथ नहीं था। उसका विश्वास खरा और वास्तविक था - इतना असली कि उसके बारे में सोचने भर से ही पौलुस आनन्द से भर गया। तिमुथियुस का हृदय भी अपने लिए लिखी गई पौलुस की पत्री को पढ़ कर संतुष्टि तथा आनन्द से भर गया होगा।

हमें भी अपने विश्वास की खराई को लगातार जाँचते रहना चाहिए कि कहीं उसमें संसार की बातों की मिलावट तो नहीं होती जा रही? क्या जिस विश्वास का हम दावा करते हैं, वह परमेश्वर के जाँचे जाने पर उसके सामने खरा निकलेगा? - पौल वैन गोर्डर


बहुत से लोग मसीह को केवल अपना स्वरूप देते हैं, मन नहीं।

मुझे तेरे उस निष्‍कपट विश्वास की सुधि आती है, जो पहिले तेरी नानी लोइस, और तेरी माता यूनीके में था, और मुझे निश्‍चय हुआ है, कि तुझ में भी है। - २ तिमुथियुस १:५


बाइबल पाठ: २ तिमुथियुस १:१-५

2Ti 1:1 पौलुस की ओर से जो उस जीवन की प्रतिज्ञा के अनुसार जो मसीह यीशु में है, परमेश्वर की इच्‍छा से मसीह यीशु का प्रेरित है।
2Ti 1:2 प्रिय पुत्र तीमुथियुस के नाम। परमेश्वर पिता और हमारे प्रभु मसीह यीशु की ओर से तुझे अनुग्रह और दया और शान्‍ति मिलती रहे।
2Ti 1:3 जिस परमेश्वर की सेवा मैं अपने बापदादों की रीति पर शुद्ध विवेक से करता हूं, उसका धन्यवाद हो कि अपनी प्रार्थनाओं में तुझे लगातार स्मरण करता हूं।
2Ti 1:4 और तेरे आंसुओं की सुधि कर करके रात दिन तुझ से भेंट करने की लालसा रखता हूं कि आनन्‍द से भर जाऊं।
2Ti 1:5 और मुझे तेरे उस निष्‍कपट विश्वास की सुधि आती है, जो पहिले तेरी नानी लोइस, और तेरी माता यूनीके में था, और मुझे निश्‍चय हुआ है, कि तुझ में भी है।

एक साल में बाइबल:
  • भजन ३७-३९
  • प्रेरितों २६

रविवार, 24 जुलाई 2011

भिन्न मापदण्ड

लोगों को नापने के मापदण्ड में परमेश्वर और संसार में बहुत फर्क है। संसार लोगों को उनकी दौलत, शोहरत और रुतबे के अनुसार नापता है, चाहे उन का नैतिक और आत्मिक स्तर कैसा भी हो। इसकी तुलना में परमेश्वर मनुष्य में दीनता, नम्रता, खराई, निस्वार्थ होना आदि गुण देखता है।

कई बार हम लोगों को गलत समझते हैं क्योंकि हम उनके हृदयों की दशा से अनभिज्ञ होते हैं। यहूदी लोग, अपने समाज में शास्त्रियों को बड़े आदर का स्थान देते थे क्योंकि वे शास्त्री बिना कोई मेहनताना लिए, अपने हाथों से, परमेश्वर के वचन की प्रतिलिपियाँ बनाया करते थे। इस कार्य को करने के कारण लोग उन्हें बड़ा धार्मिक मानते थे। लेकिन प्रभु यीशु उनके मन की वास्तविकता पहचानते थे। उन्हें पता था कि ये शास्त्री समाज में हर जगह अपने आदर्णीय पद का अनुचित लाभ उठाकर अपने स्वार्थसिद्धी के प्रयत्न में रत रहते थे। प्रभु ने मन्दिर में आने वाली एक कंगाल विध्वा के मन की खराई भी देखी, जिसने दो दमड़ी - जो उसका सर्वस्व था, मन्दिर के भंडार में डाल दी, लेकिन किसी मनुष्य ने उसके इस महान त्याग को नहीं पहचाना।

जब हम अपने नापने के स्तर बनाएं और लोगों को उनके अनुसार नापना आरंभ करें तो ध्यान रखें कि परमेश्वर बाहरी स्वरूप को नहीं हृदयों को देखता है। वह हमें भी हमारे हृदय की दशा कि अनुसार ही आँकेगा, संसार के स्तर अथवा मापदण्ड के अनुसार नहीं। उसका प्रतिफल उसके अपने मापदण्ड के अनुसार होगा, हमारे या संसार के मापदण्ड अथवा सिफारिश के अनुसार नहीं।

यदि हम अपने जीवन में परमेश्वर के पवित्र आत्मा की शिक्षाओं के प्रति संवेदनशील रहेंगे, और उसी पर निर्भर होकर, उसी के मार्ग दर्शन में होकर चलेंगे, तो वह हमारे अन्दर एक ऐसा जीवन उत्पन्न करेगा जो परमेश्वर के मापदण्ड पर खरा होगा और अनन्त काल के लिए भले प्रतिफलों से भरा होगा।

यदि हमारे जीवनों में मसीही जीवन का बिगड़ा हुआ स्वरूप है, तो हम ने संसार को अपना जीवन प्रभावित करने दिया है।

...यहोवा का देखना मनुष्य का सा नहीं है? मनुष्य तो बाहर का रूप देखता है, परन्तु यहोवा की दृष्टि मन पर रहती है। - १ शमूएल १६:७


बाइबल पाठ: लूका २०:४५-२१:४

Luk 20:45 जब सब लोग सुन रहे थे, तो उस ने अपके चेलों से कहा।
Luk 20:46 शास्‍त्रियों से चौकस रहो, जिन को लम्बे लम्बे वस्‍त्र पहिने हुए फिरना भाता है, और जिन्‍हें बाजारों में नमस्‍कार, और सभाओं में मुख्य आसन और जेवनारों में मुख्य स्थान प्रिय लगते हैं।
Luk 20:47 वे विधवाओं के घर खा जाते हैं, और दिखाने के लिये बड़ी देर तक प्रार्थना करते रहते हैं: वे बहुत ही दण्‍ड पाएंगे।
Luk 21:1 फिर उस ने आंख उठा कर धनवानों को अपना अपना दान भण्‍डार में डालते देखा।
Luk 21:2 और उस ने एक कंगाल विधवा को भी उस में दो दमडिय़ां डालते देखा।
Luk 21:3 तब उस ने कहा मैं तुम से सच कहता हूं कि इस कंगाल विधवा ने सब से बढ़ कर डाला है।
Luk 21:4 क्‍योंकि उन सब ने अपनी बढ़ती में से दान में कुछ डाला है, परन्‍तु इस ने अपनी घटी में से अपनी सारी जीविका डाल दी है।

एक साल में बाइबल:
  • भजन ३५-३६
  • प्रेरितों २५