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शुक्रवार, 1 नवंबर 2019

यह कौन है?



      मैं जब विद्यार्थी था, तो जब भी कक्षा में आकर अध्यापक ये भयभीत करने वाले शब्द कहते कि, “अपने डेस्क पर से सब कुछ हटा लो, और एक कोरा कागज़ तथा पेन्सिल निकाल कर रख लो” तो हम समझ जाते थे कि परिक्षा देने का समय आ गया था।

      परमेश्वर के वचन बाइबल में मरकुस 4 अध्याय में हम पढ़ते हैं कि प्रभु यीशु के दिन का आरंभ झील के किनारे प्रचार करने से हुआ था (पद 1), और उस दिन का अन्त झील में परिक्षा के साथ हुआ ( 35)। जिस नाव पर चढ़कर प्रभु ने भीड़ को प्रचार किया था, अब उसी नाव में प्रभु यीशु और उनके चेले झील के पार जा रहे थे। उस यात्रा के दौरान (जब प्रभु थक कर नाव कि पिछले भाग में सो रहे थे), उन लोगों को एक भयानक तूफ़ान का सामना करना पड़ा (पद 37)। तूफ़ान की तीव्रता से घबरा कर चेलों ने प्रभु यीशु को यह कहकर जगाया, “...हे गुरू, क्या तुझे चिन्‍ता नहीं, कि हम नाश हुए जाते हैं?” (पद 38)। फिर कुछ अप्रत्याशित और अविश्वसनीय हुआ; जिस प्रभु ने भीड़ को संबोधित करते हुए उनसे उसकी सुनने के लिए कहा था (पद 3), उसी ने प्रकृति के इस प्रबल स्वरूप को एक सहज और बलवंत आज्ञा दी – “शान्त रह, और थम जा!” (पद 39)।

      तूफ़ान ने प्रभु की आज्ञा का पालन किया, और विस्मित तथा भयभीत चेले पूछने लगे “यह कौन है?” ( 41) प्रश्न तो अच्छा था, परन्तु इसके उत्तर को वास्तव में समझने और उसके महत्व को पहचानने में, कि प्रभु यीशु परमेश्वर का पुत्र है, उन्हें कुछ समय लगा। निष्ठापूर्ण, सच्चे, खुले-दिल से किए गए प्रश्न और अनुभव आज भी लोगों को उसी निष्कर्ष पर लेकर आते हैं जिस पर तब वे अचम्भित चेले आए थे – यीशु ही प्रभु है।

      प्रभु यीशु सुनने भर के लिए एक अच्छा शिक्षक मात्र नहीं है; वह आराध्य प्रभु परमेश्वर है! – आर्थर जैक्सन

“...हे गुरू, जहां कहीं तू जाएगा, मैं तेरे पीछे पीछे हो लूंगा।” – मत्ती 8:19

रूत बोली, तू मुझ से यह बिनती न कर, कि मुझे त्याग वा छोड़कर लौट जा; क्योंकि जिधर तू जाए उधर मैं भी जाऊंगी; जहां तू टिके वहां मैं भी टिकूंगी; तेरे लोग मेरे लोग होंगे, और तेरा परमेश्वर मेरा परमेश्वर होगा - रूत 1:16

बाइबल पाठ: मरकुस 4:35-41
Mark 4:35 उसी दिन जब सांझ हुई, तो उसने उन से कहा; आओ, हम पार चलें,।
Mark 4:36 और वे भीड़ को छोड़कर जैसा वह था, वैसा ही उसे नाव पर साथ ले चले; और उसके साथ, और भी नावें थीं।
Mark 4:37 तब बड़ी आन्‍धी आई, और लहरें नाव पर यहां तक लगीं, कि वह अब पानी से भरी जाती थी।
Mark 4:38 और वह आप पिछले भाग में गद्दी पर सो रहा था; तब उन्होंने उसे जगाकर उस से कहा; हे गुरू, क्या तुझे चिन्‍ता नहीं, कि हम नाश हुए जाते हैं?
Mark 4:39 तब उसने उठ कर आन्‍धी को डांटा, और पानी से कहा; “शान्‍त रह, थम जा”: और आन्‍धी थम गई और बड़ा चैन हो गया।
Mark 4:40 और उन से कहा; तुम क्यों डरते हो? क्या तुम्हें अब तक विश्वास नहीं?
Mark 4:41 और वे बहुत ही डर गए और आपस में बोले; यह कौन है, कि आन्‍धी और पानी भी उस की आज्ञा मानते हैं?

एक साल में बाइबल: 
  • यिर्मयाह 24-26
  • तीतुस 2



बुधवार, 11 दिसंबर 2013

अर्थपूर्ण


   एक लोकप्रीय वाक्य है जिसे मैं अकसर टी-शर्ट्स पर छपा हुआ तथा कला एवं सजावट की वस्तुओं पर लिखा हुआ देखती हूँ; वह वाक्य है: "हमारे जीवन का मूल्याँकन हमारी साँसों की गिनती से नहीं वरन उन बातों से है जो हमें विस्मय से साँस रोक लेने पर बाध्य कर देती हैं।" यह वाक्य आकर्षक तो है लेकिन मेरा मानना है कि यह सत्य नहीं है।

   यदि हम जीवन का मूल्याँकन केवल उन ही बातों के आधार पर करेंगे जो हमारे लिए विस्मयकारी हैं तो फिर हम सामान्य और साधारण पलों के महत्व को खो देंगे। सामान्य बातें जैसे खाना, सोना, साँस लेना आदि ऐसी हैं जिन्हें हम बिना विचार किए लगातार करते रहते हैं; लेकिन वे "सामान्य" या महत्वहीन नहीं है। हमारा हर साँस लेना, भोजन का प्रत्येक कौर लेना आदि सब बहुत विशेष और अद्भुत कार्य हैं - यह हमें तब समझ आता है जब हम या तो इनकी बारीकियों का अध्ययन करें या फिर तब, जब किसी कारणवश अचानक ही इनमें से कोई बाधित होने लगे अथवा रुक जाए। वास्त्व में प्रत्येक साँस लेना, विस्मय में आकर साँस रोक लेने से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।

   राजा सुलेमान के पास विस्मय करने के बहुत ढेर अवसर रहे होंगे, क्योंकि उसने अपने लिए लिखा: "और जितनी वस्तुओं के देखने की मैं ने लालसा की, उन सभों को देखने से मैं न रूका; मैं ने अपना मन किसी प्रकार का आनन्द भोगने से न रोका क्योंकि मेरा मन मेरे सब परिश्रम के कारण आनन्दित हुआ; और मेरे सब परिश्रम से मुझे यही भाग मिला" (सभोपदेशक 2:10)। लेकिन अन्ततः उसका निष्कर्ष इन सब के बारे में था कि "...सब कुछ व्यर्थ और वायु को पकड़ना है" (सभोपदेशक 2:17)।

   सुलेमान का अनुभव हमें स्मरण दिलाता है कि "सामान्य" बातों में आनन्द ढूंढना और आनन्दित होना महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे वास्तव में अद्भुत होती हैं। बड़ा सदा ही बेहतर नहीं होता; अधिक हमेशा उन्नत नहीं होता और हमारा व्यस्त रहना हमें अधिक महत्वपूर्ण नहीं बना देता। बजाए विस्मयकारी क्षणों को ढूंढने में समय बिताने के, हमें हर क्षण और हर साँस को परमेश्वर से मिले उपहार के रूप में स्वीकार करके उसका परमेश्वर की महिमा और आदर के लिए भरपूर उपयोग करना चाहिए, उसे अर्थपूर्ण बना लेना चाहिए; और यह हमारे जीवन को भी अर्थपूर्ण कर देगा। - जूली ऐकैरमैन लिंक


प्रत्येक साँस का सुचारू रीति से लेना विस्मय में साँस रोक लेने से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।

जिस परमेश्वर ने पृथ्वी और उस की सब वस्‍तुओं को बनाया, वह स्वर्ग और पृथ्वी का स्‍वामी हो कर हाथ के बनाए हुए मन्‍दिरों में नहीं रहता। न किसी वस्तु का प्रयोजन रखकर मनुष्यों के हाथों की सेवा लेता है, क्योंकि वह तो आप ही सब को जीवन और स्‍वास और सब कुछ देता है। - प्रेरितों 17:24-25

बाइबल पाठ: सभोपदेशक 1:1-18
Ecclesiastes 1:1 यरूशलेम के राजा, दाऊद के पुत्र और उपदेशक के वचन। 
Ecclesiastes 1:2 उपदेशक का यह वचन है, कि व्यर्थ ही व्यर्थ, व्यर्थ ही व्यर्थ! सब कुछ व्यर्थ है। 
Ecclesiastes 1:3 उस सब परिश्रम से जिसे मनुष्य धरती पर करता है, उसको क्या लाभ प्राप्त होता है? 
Ecclesiastes 1:4 एक पीढ़ी जाती है, और दूसरी पीढ़ी आती है, परन्तु पृथ्वी सर्वदा बनी रहती है। 
Ecclesiastes 1:5 सूर्य उदय हो कर अस्त भी होता है, और अपने उदय की दिशा को वेग से चला जाता है। 
Ecclesiastes 1:6 वायु दक्खिन की ओर बहती है, और उत्तर की ओर घूमती जाती है; वह घूमती और बहती रहती है, और अपने चक्करों में लौट आती है। 
Ecclesiastes 1:7 सब नदियां समुद्र में जा मिलती हैं, तौभी समुद्र भर नहीं जाता; जिस स्थान से नदियां निकलती हैं; उधर ही को वे फिर जाती हैं। 
Ecclesiastes 1:8 सब बातें परिश्रम से भरी हैं; मनुष्य इसका वर्णन नहीं कर सकता; न तो आंखें देखने से तृप्त होती हैं, और न कान सुनने से भरते हैं। 
Ecclesiastes 1:9 जो कुछ हुआ था, वही फिर होगा, और जो कुछ बन चुका है वही फिर बनाया जाएगा; और सूर्य के नीचे कोई बात नई नहीं है। 
Ecclesiastes 1:10 क्या ऐसी कोई बात है जिसके विषय में लोग कह सकें कि देख यह नई है? यह तो प्राचीन युगों में वर्तमान थी। 
Ecclesiastes 1:11 प्राचीन बातों का कुछ स्मरण नहीं रहा, और होने वाली बातों का भी स्मरण उनके बाद होने वालों को न रहेगा।
Ecclesiastes 1:12 मैं उपदेशक यरूशलेम में इस्राएल का राजा था। 
Ecclesiastes 1:13 और मैं ने अपना मन लगाया कि जो कुछ सूर्य के नीचे किया जाता है, उसका भेद बुद्धि से सोच सोचकर मालूम करूं; यह बड़े दु:ख का काम है जो परमेश्वर ने मनुष्यों के लिये ठहराया है कि वे उस में लगें। 
Ecclesiastes 1:14 मैं ने उन सब कामों को देखा जो सूर्य के नीचे किए जाते हैं; देखो वे सब व्यर्थ और मानो वायु को पकड़ना है। 
Ecclesiastes 1:15 जो टेढ़ा है, वह सीधा नहीं हो सकता, और जितनी वस्तुओं में घटी है, वे गिनी नहीं जातीं।
Ecclesiastes 1:16 मैं ने मन में कहा, देख, जितने यरूशलेम में मुझ से पहिले थे, उन सभों से मैं ने बहुत अधिक बुद्धि प्राप्त की है; और मुझ को बहुत बुद्धि और ज्ञान मिल गया है। 
Ecclesiastes 1:17 और मैं ने अपना मन लगाया कि बुद्धि का भेद लूं और बावलेपन और मूर्खता को भी जान लूं। मुझे जान पड़ा कि यह भी वायु को पकड़ना है।
Ecclesiastes 1:18 क्योंकि बहुत बुद्धि के साथ बहुत खेद भी होता है, और जो अपना ज्ञान बढ़ाता है वह अपना दु:ख भी बढ़ाता है।

एक साल में बाइबल: 
  • होशे 5-8 
  • प्रकाशितवाक्य 2