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शुक्रवार, 4 मार्च 2022

कलीसिया में अपरिपक्वता के दुष्प्रभाव (20)


भ्रामक शिक्षाओं के स्वरूप - सुसमाचार संबंधित गलत शिक्षाएं (1) - परिचय

हम पिछले लेखों से देखते आ रहे हैं कि बालकों के समान अपरिपक्व मसीही विश्वासियों की एक पहचान यह भी है कि वे बहुत सरलता से भ्रामक शिक्षाओं द्वारा बहकाए तथा गलत बातों में भटकाए जाते हैं (इफिसियों 4:14)। इन भ्रामक शिक्षाओं को शैतान और उस के दूत झूठे प्रेरित, धर्म के सेवक, और ज्योतिर्मय स्‍वर्गदूतों का रूप धारण कर के बताते और सिखाते हैं (2 कुरिन्थियों 11:13-15)। ये लोग, और उनकी शिक्षाएं, दोनों ही बहुत आकर्षक, रोचक, और ज्ञानवान, यहाँ तक कि भक्तिपूर्ण और श्रद्धापूर्ण भी प्रतीत हो सकती हैं, किन्तु साथ ही उनमें अवश्य ही बाइबल की बातों के अतिरिक्त भी बातें डली हुई होती हैं। जैसा परमेश्वर पवित्र आत्मा ने प्रेरित पौलुस के द्वारा 2 कुरिन्थियों 11:4 में लिखवाया है, “यदि कोई तुम्हारे पास आकर, किसी दूसरे यीशु को प्रचार करे, जिस का प्रचार हम ने नहीं किया: या कोई और आत्मा तुम्हें मिले; जो पहिले न मिला था; या और कोई सुसमाचार जिसे तुम ने पहिले न माना था, तो तुम्हारा सहना ठीक होता”, इन भ्रामक शिक्षाओं और गलत उपदेशों के, मुख्यतः तीन विषय, होते हैं - प्रभु यीशु मसीह, पवित्र आत्मा, और सुसमाचार। साथ ही इस पद में सच्चाई को पहचानने और शैतान के झूठ से बचने के लिए एक बहुत महत्वपूर्ण बात भी दी गई है, कि इन तीनों विषयों के बारे में जो यथार्थ और सत्य हैं, वे सब वचन में पहले से ही बता और लिखवा दिए गए हैं। इसलिए बाइबल से देखने, जाँचने, तथा वचन के आधार पर शिक्षाओं को परखने के द्वारा सही और गलत की पहचान करना कठिन नहीं है। 

पिछले लेखों में हमने इन गलत शिक्षा देने वाले लोगों के द्वारा, पहले तो प्रभु यीशु से संबंधित सिखाई जाने वाली गलत शिक्षाओं को देखा; फिर उसके बाद, परमेश्वर पवित्र आत्मा से संबंधित सामान्यतः बताई और सिखाई जाने वाली गलत शिक्षाओं की वास्तविकता को वचन की बातों से देखा है, जो संक्षिप्त में निम्नलिखित थीं: 

  • किसी को भी पवित्र आत्मा प्राप्त करने के लिए कोई विशेष प्रयास या प्रार्थना करने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि परमेश्वर के वचन के अनुसार, प्रत्येक सच्चे मसीही विश्वासी के नया जन्म या उद्धार पाते ही, तुरंत उसके उद्धार पाने के पल से ही परमेश्वर पवित्र आत्मा अपनी संपूर्णता में आकर उसके अंदर निवास करने लगता है, और उसी में बना रहता है, उसे कभी छोड़ कर नहीं जाता है; इसलिए पवित्र आत्मा प्राप्त करने के लिए अलग से प्रयास करने की शिक्षा गलत है।  
  • और इसी को पवित्र आत्मा से भरना या पवित्र आत्मा से बपतिस्मा पाना भी कहते हैं। वचन स्पष्ट है कि पवित्र आत्मा से भरना या उससे बपतिस्मा पाना कोई दूसरा या अतिरिक्त अनुभव नहीं है, वरन उद्धार के साथ ही सच्चे मसीही विश्वासी में पवित्र आत्मा का आकर निवास करना ही है। 

· प्रेरितों 2 अध्याय में जो अन्य भाषाएं बोली गईं, वे पृथ्वी ही की भाषाएं और उनकी बोलियाँ थीं; कोई अलौकिक भाषा नहीं।

·  उन लोगों के द्वाराअन्य-भाषाओंको अलौकिक भाषाएं बताना, और परमेश्वर के वचन के दुरुपयोग के द्वारा इससे संबंधित कई और गलत शिक्षाओं को सिखाने के बारे में भी हम देख चुके हैं कि यह भी एक ऐसी गलत शिक्षा है जिसका वचन से कोई समर्थन या आधार नहीं है।

  • हमने यह भी देखा था कि वचन में इस शिक्षा का भी कोई आधार या समर्थन नहीं है किअन्य-भाषाएंप्रार्थना की भाषाएं हैं। 
  • हमने यह भी देखा था कि उन लोगों के सभी दावों के विपरीत
    • न तो प्रेरितों 2:3-11 में प्रभु के शिष्यों द्वारा अन्य-भाषाओं में बोलना कोईसुननेका आश्चर्यकर्म था
    • न ही अन्य भाषाएं प्रार्थना करने की गुप्त भाषाएँ हैं
    • और न ही ये पृथ्वी के अन्य स्थानों की भाषाएं किसी को भी यूं ही दे दी जाती हैं, जब तक कि व्यक्ति की उस स्थान पर सेवकाई न हो, जहाँ की भाषा बोलने की सामर्थ्य उसे प्रदान की गई है।  
  • अन्य-भाषाएंबोलना ही पवित्र आत्मा प्राप्त करने का प्रमाण है, के भी झूठ होने और परमेश्वर के वचन के दुरुपयोग पर आधारित होने को हमने देखा है। 
  • व्यक्तिअन्य-भाषाबोलने के द्वारा सीधे परमेश्वर से बात करता है, इसके तथा कुछ संबंधित और बहुत महत्वपूर्ण बातों के बारे में हम देख चुके हैं कि उनका यह दावा भी वचन की कसौटी पर बिलकुल गलत है, अस्वीकार्य है।

सुसमाचार से संबंधित गलत शिक्षाएं 

आज हम 2 कुरिन्थियों 11:4 में गलत शिक्षाओं के तीसरे विषय, सुसमाचार से संबंधित गलत शिक्षाओं पर विचार आरंभ करेंगे। हम पहले इस विषय का परिचय लेंगे, फिर देखेंगे कि सुसमाचार क्या है; क्योंकि जब तक किसी भी बात केअसलीयावास्तविकताकी जानकारी और पहचान नहीं होगी, तब तक उसकेनकलीयाअवास्तविकको जानना और पहचानना कठिन होगा। और फिर देखेंगे कि कैसे शैतान उसे बिगाड़ता है, भ्रष्ट करता है, अप्रभावी करता है, और फिर वचन से सही और गलत सुसमाचार को पहचानने और उनमें भिन्नता करने की बातों को देखेंगे। 

सुसमाचार का परिचय

जैसा कि शब्दसुसमाचारसे ही प्रकट है, इसका शब्दार्थ है भला समाचार या अच्छी खबर, जो मूल यूनानी भाषा में प्रयोग किए गए शब्द के अनुरूप ही है; अर्थात यह एक भला या अच्छा समाचार है, जानकारी है। तात्पर्य यह कि सुसमाचार लोगों के पास किसी बात के बारे में अच्छा समाचार पहुंचाता है। उन तक पहुंचाए गए उस समाचार या जानकारी को स्वीकार अथवा अस्वीकार करना, प्रत्येक सुनने वाले का अपना निर्णय है। इससे प्रश्न उठता है कि यह जानकारी या समाचार किस बात के विषय है और इसे भला क्यों कहते हैं? परमेश्वर के वचन बाइबल मेंसुसमाचार शब्द का किया गया प्रथम प्रयोग इसके विषय हमें बताता है:और यीशु सारे गलील में फिरता हुआ उन की सभाओं में उपदेश करता और राज्य का सुसमाचार प्रचार करता, और लोगों की हर प्रकार की बीमारी और दुर्बलता को दूर करता रहा” (मत्ती 4:23)। यह बात प्रभु यीशु द्वारा उनकी पृथ्वी की सेवकाई आरंभ करने के समय कही गई है; अर्थात प्रभु यीशु ने अपनी पृथ्वी की सेवकाई का आरंभ उपदेश करने, राज्य के सुसमाचार का लोगों की सभाओं में प्रचार करने, तथा लोगों को बीमारियों और दुर्बलताओं से चंगा करने के साथ किया। यहाँ पर प्रभु की इस बात में ध्यान देने योग्य दो महत्वपूर्ण बातें हैं - 

(1) पहली बात, इस पद के अनुसार प्रभु यीशु ने तीन कार्य किए - उपदेश दिया, सुसमाचार का प्रचार किया, और लोगों को उनकी बीमारियों और दुर्बलताओं से चंगा किया। अर्थात, सुसमाचार में, और उपदेश देने में तथा लोगों को बीमारियों से चंगा करने में अन्तर है; तीनों एक ही नहीं हैं; प्रभु यीशु ने अपनी सेवकाई के आरंभ से ही इन तीनों अलग-अलग कार्यों को किया। आज यह गलत धारणा लोगों में फैली हुई है कि इन तीनों में से किसी एक का किया जाना, शेष दोनों को भी किए जाने के बराबर है; जो सही नहीं है। हम पहले भी देख चुके हैं कि इफिसियों 4:11 के अनुसार कलीसिया के कार्यों के लिए उपदेश देना प्रभु द्वारा स्थापित की गई एक पृथक सेवकाई है, और सुसमाचार प्रचार करना एक भिन्न सेवकाई है। साथ ही, 1 कुरिन्थियों 12:9 के अनुसार चंगा करना परमेश्वर पवित्र आत्मा का एक वरदान है, जो अन्य वरदानों के समान पवित्र आत्मा के द्वारा, उसकी इच्छा के अनुसार, किसी किसी को दिया जाता है, सभी को एक ही वरदान नहीं दिए जाते हैं। क्योंकि ये तीनों, उपदेश देना, सुसमाचार प्रचार करना, और चंगा करना अलग-अलग सेवाकाइयाँ हैं, इसलिए इनमें से किसी एक पर अत्यधिक ज़ोर देना, और शेष की अनदेखी करना उचित नहीं है। 

प्रभु यीशु ने जब अपने शिष्यों को उनकी पहली प्रचार सेवकाई के लिए भेजा था, तब भी उन से इन तीनों कार्यों को करने के लिए कहा था:फिर उसने अपने बारह चेलों को पास बुलाकर, उन्हें अशुद्ध आत्माओं पर अधिकार दिया, कि उन्हें निकालें और सब प्रकार की बीमारियों और सब प्रकार की दुर्बलताओं को दूर करें” “और चलते चलते प्रचार कर कहो कि स्वर्ग का राज्य निकट आ गया है। बीमारों को चंगा करो: मरे हुओं को जिलाओ: कोढिय़ों को शुद्ध करो: दुष्टात्माओं को निकालो: तुम ने सेंतमेंत पाया है, सेंतमेंत दो” (मत्ती 10:1,7-8)। और अपनी अंतिम महान आज्ञा में भी इन तीनों कार्यों को करने के लिए ही कहा, “इसलिये तुम जा कर सब जातियों के लोगों को चेला बनाओ और उन्हें पिता और पुत्र और पवित्रआत्मा के नाम से बपतिस्मा दो। और उन्हें सब बातें जो मैं ने तुम्हें आज्ञा दी है, मानना सिखाओ: और देखो, मैं जगत के अन्त तक सदैव तुम्हारे संग हूं” (मत्ती 28:19-20); “और उसने उन से कहा, तुम सारे जगत में जा कर सारी सृष्टि के लोगों को सुसमाचार प्रचार करो। जो विश्वास करे और बपतिस्मा ले उसी का उद्धार होगा, परन्तु जो विश्वास न करेगा वह दोषी ठहराया जाएगा। और विश्वास करने वालों में ये चिन्ह होंगे कि वे मेरे नाम से दुष्टात्माओं को निकालेंगे। नई नई भाषा बोलेंगे, सांपों को उठा लेंगे, और यदि वे नाशक वस्तु भी पी जाएं तौभी उन की कुछ हानि न होगी, वे बीमारों पर हाथ रखेंगे, और वे चंगे हो जाएंगे” (मरकुस 16:15-18)। और फिर प्रेरितों के कार्य में भी, जो पहली कलीसिया के आरंभ और कार्यों का इतिहास है, हम प्रभु के शिष्यों और प्रेरितों को यही तीनों कार्य करते हुए देखते हैं। 

आज की परेशानी यह है कि कुछ लोग केवल चंगाइयों पर ही इतना ज़ोर देते हैं कि वही उनके प्रचार और सेवकाई का मुख्य विषय बना रहता है। वे चंगाई पाने को लालच के समान प्रयोग करके लोगों को आकर्षित करने के प्रयास करते हैं, और इस चंगाई के अतिरिक्त वे लोगों द्वारा पापों से क्षमा और उद्धार पाने, तथा परमेश्वर के वचन की समझ और उसके जीवनों में व्यवहारिक प्रयोग के बारे में या तो सिखाते ही नहीं है, या फिर उस पर बहुत कम बल देते हैं। ये लोग इस बात की अनदेखी कर देते हैं कि शारीरिक चंगाई से कहीं अधिक महत्वपूर्ण आत्मिक चंगाई है, क्योंकि हर चंगाई पाने के बाद भी शरीर ने अन्ततः मर ही जाना है, नाश होना ही है। किन्तु यदि आत्मा की चंगाई नहीं मिली, तो आत्मा नरक में जाएगी, और सारी शारीरिक चंगाई किसी काम की नहीं रहेगी। इसलिए प्राथमिकता आत्मिक चंगाई की या उद्धार पाने की है, शारीरिक चंगाई उसके बाद है, और इस क्रम को बनाए रखना है। इन तीनों सेवकाइयों में वचन की शिक्षा या उपदेश, सुसमाचार प्रचार, और चंगाई में संतुलन और उचित प्राथमिकता को बनाए रखना है। साथ ही कुछ लोगों ने चंगाई देने को अपनी प्रसिद्धि का, कमाई करने की साधन बना लिया है; चंगे के दावों के द्वारा वे सांसारिक लाभ और ख्याति पाने के प्रयासों में रहते हैं।  

 (2) दूसरी बात, सुसमाचार एक राज्य के बारे में है, किसी व्यक्ति, धारणा, धर्म, रीति-रिवाज़, या परंपरा के बारे में नहीं है। प्रभु ने अपनी पृथ्वी की सेवकाई का आरंभ सुसमाचार प्रचार के साथ किया, और अपने उस उदाहरण के द्वारा हमें उस सुसमाचार प्रचार का स्वरूप प्रदान किया:उस समय से यीशु प्रचार करना और यह कहना आरम्भ किया, कि मन फिराओ क्योंकि स्वर्ग का राज्य निकट आया है” (मत्ती 4:17) यहाँ हम देखते हैं कि प्रभु द्वारा किए जाने वाले प्रचार या उपदेश का विषय था “... मन फिराओ क्योंकि स्वर्ग का राज्य निकट आया है”; और यही सुसमाचार का स्वरूप है। और यह इसीलिए सुसमाचार या अच्छी खबर है क्योंकि यह शीघ्र ही नष्ट हो जाने वाली इस नाशमान पृथ्वी और उसकी सभी नाशमान बातों से बचाए जाकर, अविनाशी परमेश्वर के अनन्तकालीन राज्य और उसकी अनन्त आशीषों में प्रवेश प्राप्त करने तथा सदा काल तक उसके साथ रहने के बारे में है (1 यूहन्ना 2:15-17)। सुसमाचार इस पृथ्वी पर किसी राज्य, या किसी शारीरिक उपलब्धि, या भौतिक संपत्ति अथवा संपन्नता के बारे में नहीं है। वह परमेश्वर के राज्य के बारे में है, जो निकट आ गया है, स्थापित होने वाला है; और जो कोई उसमें प्रवेश चाहता है, उसके प्रवेश पाने का पहला कदम पापों से पश्चाताप करना है। किसी भी व्यक्ति द्वारा बिना पापों से पश्चाताप किए सुसमाचार में कोई प्रगति या स्वीकृति नहीं है।

ध्यान करें कि प्रभु यीशु ने यह प्रचार यहूदियों, यानि कि परमेश्वर की चुनी हुई प्रजा के लोगों के, जो पीढ़ियों से परमेश्वर की व्यवस्था, अपने धर्म की रीतियों, पर्वों, भेंटों, बलिदानों, आदि का पालन करते थे, मध्य में करना आरंभ किया। इसी से प्रकट है कि पश्चाताप करना सभी के लिए है, चाहे वेप्रभु परमेश्वर के लोगअर्थात ईसाई या मसीही ही क्यों न हों, जो चाहे कितनी भी पीढ़ियों से अपने धर्म की मान्यताओं, परंपराओं, और रीति-रिवाजों को मानते-मनाते चले आ रहे हों। परमेश्वर के राज्य में प्रवेश उन्हें केवल पश्चाताप से आरंभ करने के द्वारा ही प्राप्त होगा, किसी भी अन्य बात के आधार पर नहीं। साथ ही यह भी साधारण और स्पष्ट बात है कि पश्चाताप हमेशा ही हर व्यक्ति के द्वारा व्यक्तिगत रीति से अपने ही पापों के लिए किया जाता है। माता-पिता या पूर्वजों का किया गया पश्चाताप उनकी संतानों के लिए कार्यकारी नहीं होता है; और न ही परिवार के किसी सदस्य का उद्धार पाना और परमेश्वर की निकटता में बढ़ना, परिवार के अन्य सदस्यों को उद्धार प्रदान करता है।  

यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं, तो आपके लिए यह जानना और समझना अति-आवश्यक है कि आप प्रभु परमेश्वर के सुसमाचार से संबंधित किसी गलत शिक्षाओं में न पड़े हों या पड़ जाएं; न खुद भरमाए जाएं, और न ही आपके द्वारा कोई और भरमाया जाए। लोगों द्वारा कही जाने वाले ही नहीं, वरन वचन में लिखी हुई बातों पर भी ध्यान दें, और लोगों की बातों को वचन की बातों से मिला कर जाँचें और परखें। यदि आप इन गलत शिक्षाओं में पड़ चुके हैं, तो अभी वचन के अध्ययन और बात को जाँच-परख कर, सही शिक्षा को, उसी के पालन को अपना लें।

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • गिनती 31-33         
  • मरकुस 9:1-29

गुरुवार, 3 मार्च 2022

कलीसिया में अपरिपक्वता के दुष्प्रभाव (19)

 


भ्रामक शिक्षाओं के स्वरूप - पवित्र आत्मा के विषय गलत शिक्षाएं (9) - पवित्र आत्मा की निन्दा करने का पाप (3) 

हम पिछले लेखों से देखते आ रहे हैं कि बालकों के समान अपरिपक्व मसीही विश्वासियों की एक पहचान यह भी है कि वे बहुत सरलता से भ्रामक शिक्षाओं द्वारा बहकाए तथा गलत बातों में भटकाए जाते हैं। इन भ्रामक शिक्षाओं को शैतान और उस के दूत झूठे प्रेरित, धर्म के सेवक, और ज्योतिर्मय स्‍वर्गदूतों का रूप धारण कर के बताते और सिखाते हैं (2 कुरिन्थियों 11:13-15)। ये लोग, और उनकी शिक्षाएं, दोनों ही बहुत आकर्षक, रोचक, और ज्ञानवान, यहाँ तक कि भक्तिपूर्ण और श्रद्धापूर्ण भी प्रतीत हो सकती हैं, किन्तु साथ ही उनमें अवश्य ही बाइबल की बातों के अतिरिक्त भी बातें डली हुई होती हैं। जैसा परमेश्वर पवित्र आत्मा ने प्रेरित पौलुस के द्वारा 2 कुरिन्थियों 11:4 में लिखवाया है, “यदि कोई तुम्हारे पास आकर, किसी दूसरे यीशु को प्रचार करे, जिस का प्रचार हम ने नहीं किया: या कोई और आत्मा तुम्हें मिले; जो पहिले न मिला था; या और कोई सुसमाचार जिसे तुम ने पहिले न माना था, तो तुम्हारा सहना ठीक होता”, इन भ्रामक शिक्षाओं और गलत उपदेशों के, मुख्यतः तीन विषय, होते हैं - प्रभु यीशु मसीह, पवित्र आत्मा, और सुसमाचार। साथ ही इस पद में सच्चाई को पहचानने और शैतान के झूठ से बचने के लिए एक बहुत महत्वपूर्ण बात भी दी गई है, कि इन तीनों विषयों के बारे में जो यथार्थ और सत्य हैं, वे सब वचन में पहले से ही बता और लिखवा दिए गए हैं। इसलिए बाइबल से देखने, जाँचने, तथा वचन के आधार पर शिक्षाओं को परखने के द्वारा सही और गलत की पहचान करना कठिन नहीं है। 

पिछले लेखों में हमने इन गलत शिक्षा देने वाले लोगों के द्वारा, प्रभु यीशु से संबंधित सिखाई जाने वाली गलत शिक्षाओं को देखने के बाद, परमेश्वर पवित्र आत्मा से संबंधित सामान्यतः बताई और सिखाई जाने वाली गलत शिक्षाओं की वास्तविकता को वचन की बातों से देखना आरंभ किया है। हम देख चुके हैं कि प्रत्येक सच्चे मसीही विश्वासी के नया जन्म या उद्धार पाते ही, तुरंत उसके उद्धार पाने के पल से ही परमेश्वर पवित्र आत्मा अपनी संपूर्णता में आकर उसके अंदर निवास करने लगता है, और उसी में बना रहता है, उसे कभी छोड़ कर नहीं जाता है; और इसी को पवित्र आत्मा से भरना या पवित्र आत्मा से बपतिस्मा पाना भी कहते हैं। वचन स्पष्ट है कि पवित्र आत्मा से भरना या उससे बपतिस्मा पाना कोई दूसरा या अतिरिक्त अनुभव नहीं है, वरन उद्धार के साथ ही सच्चे मसीही विश्वासी में पवित्र आत्मा का आकर निवास करना ही है। इन गलत शिक्षकों की एक और बहुत प्रचलित और बल पूर्वक कही जाने वाले बात हैअन्य-भाषाओंमें बोलना, और उन लोगों के द्वाराअन्य-भाषाओंको अलौकिक भाषाएं बताना, और परमेश्वर के वचन के दुरुपयोग के द्वारा इससे संबंधित कई और गलत शिक्षाओं को सिखाना। इसके बारे में भी हम देख चुके हैं कि यह भी एक ऐसी गलत शिक्षा है जिसका वचन से कोई समर्थन या आधार नहीं है। प्रेरितों 2 अध्याय में जो अन्य भाषाएं बोली गईं, वे पृथ्वी ही की भाषाएं और उनकी बोलियाँ थीं; कोई अलौकिक भाषा नहीं। हमने यह भी देखा था कि वचन में इस शिक्षा का भी कोई आधार या समर्थन नहीं है किअन्य-भाषाएंप्रार्थना की भाषाएं हैं। इस गलत शिक्षा के साथ जुड़ी हुई इन लोगों की एक और गलत शिक्षा है किअन्य-भाषाएंबोलना ही पवित्र आत्मा प्राप्त करने का प्रमाण है, जिसके भी झूठ होने और परमेश्वर के वचन के दुरुपयोग पर आधारित होने को हमने पिछले लेख में देखा है। पिछले लेख में हमने यह भी देखा था कि उन लोगों के सभी दावों के विपरीत, न तो प्रेरितों 2:3-11 का प्रभु के शिष्यों द्वारा अन्य-भाषाओं में बोलना कोईसुननेका आश्चर्यकर्म था, न ही अन्य भाषाएं प्रार्थना करने की गुप्त भाषाएँ हैं, और न ही ये किसी को भी यूं ही दे दी जाती हैं, जब तक कि व्यक्ति की उस स्थान पर सेवकाई न हो, जहाँ की भाषा बोलने की सामर्थ्य उसे प्रदान की गई है। एक और दावा जो ये पवित्र आत्मा और अन्य-भाषाएँ बोलने से संबंधित गलत शिक्षाएं देने वाले करते हैं, है कि व्यक्ति अन्य-भाषा बोलने के द्वारा सीधे परमेश्वर से बात करता है। इसके तथा कुछ संबंधित और बहुत महत्वपूर्ण बातों के बारे में हम पिछले दो लेखों में देख चुके हैं कि उनका यह दावा भी वचन की कसौटी पर बिलकुल गलत है, अस्वीकार्य है।

   इन गलत शिक्षा फैलाने वालों की एक और प्रमुख शिक्षा, जिसे वे अपने बचाव के लिए प्रयोग करते हैं, हैपवित्र आत्मा की निन्दा कभी क्षमा न होने वाला पाप है।यह समझने के लिए कि यहनिरादरयानिन्दावास्तव में है क्या, और यह क्यों केवल परमेश्वर पवित्र आत्मा ही के विरुद्ध ही क्षमा नहीं हो सकता है, हमने पिछले लेख से परमेश्वर के वचन में से कुछ तथ्यों एवं शिक्षाओं को देखना आरंभ किया है, और पहले त्रिएक परमेश्वर के तीनों स्वरूपों, पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के बारे में अपने इस विषय के संदर्भ से देखा है। फिर हमने देखा कि लूसिफर का पाप क्यों क्षमा नहीं हो सकता था; और यह भी समझा था कि वचन के अनुसार निन्दा (blasphemy) शब्द का वास्तव में क्या अर्थ और अभिप्राय होता है, और वचन के संदर्भ एवं प्रयोग के अनुसार क्यों जन-साधारण का हर संदेह, अविश्वास, अभद्र भाषा का प्रयोग, आदि, पवित्र आत्मा की निन्दा की श्रेणी में नहीं आता है। आज हम देखेंगे कि क्यों प्रभु यीशु नेपवित्र आत्मा की निन्दा कभी क्षमा न होने वाला पाप हैकेवल वचन के ज्ञानियों और शिक्षकों, फरीसियों के लिए ही क्यों कहा है (मरकुस 3:28-30 और लूका 12:10) 

        यह समझने के लिए कि किस प्रकार से फरीसियों के लिए प्रभु यीशु का निरादर करना क्षमा न हो सकने वाले पाप ठहरा, इस संदर्भ में वचन के कुछ हवालों को देखिए:

           यूहन्ना 3:1-3 को देखिए:फरीसियों में से नीकुदेमुस नाम एक मनुष्य था, जो यहूदियों का सरदार था। उसने रात को यीशु के पास आकर उस से कहा, हे रब्बी, हम जानते हैं, कि तू परमेश्वर की ओर से गुरु हो कर आया है; क्योंकि कोई इन चिन्हों को जो तू दिखाता है, यदि परमेश्वर उसके साथ न हो, तो नहीं दिखा सकता। यीशु ने उसको उत्तर दिया; कि मैं तुझ से सच सच कहता हूं, यदि कोई नये सिरे से न जन्मे तो परमेश्वर का राज्य देख नहीं सकतायहाँ, यह बिलकुल स्पष्ट है कि निकुदेमुस ने प्रभु से जो कहा -हम जानते हैं”, उसके अनुसार न केवल वह स्वयं, वरन फरीसी समाज के सभी लोग भली-भांति जानते थे कि प्रभु यीशु परमेश्वर की ओर से गुरु होकर आए हैं। तथा सभी फरीसी यह भी समझते थे कि प्रभु यीशु के कार्य यह प्रमाणित करते थे कि परमेश्वर उनके साथ है, और उन में होकर काम कर रहा है। 

धर्म के ये अगुवे प्रभु यीशु के, उस के सेवकाई से पहले के जीवन के बारे में, न तो अनभिज्ञ थे और न किसी संदेह में थे; वरन, वे उसके विषय सब बातों के बारे में अच्छे से जानते थे! इसीलिए जब प्रभु यीशु ने उन्हें चुनौती दी कितुम में से कौन मुझे पापी ठहराता है? और यदि मैं सच बोलता हूं, तो तुम मेरी प्रतीति क्यों नहीं करते?” (यूहन्ना 8:46), तो उनमें से कोई भी प्रभु के जीवन में कोई पाप या बुराई को नहीं बता सका, कोई भी प्रभु को किसी भी बात में दोषी नहीं ठहरा सका।

 इसी प्रकार से जबतब फरीसियों ने जा कर आपस में विचार किया, कि उसको किस प्रकार बातों में फंसाएं। सो उन्होंने अपने चेलों को हेरोदियों के साथ उसके पास यह कहने को भेजा, कि हे गुरु; हम जानते हैं, कि तू सच्चा है; और परमेश्वर का मार्ग सच्चाई से सिखाता है; और किसी की परवाह नहीं करता, क्योंकि तू मनुष्यों का मुंह देखकर बातें नहीं करता” (मत्ती 22:15-16) तब भी उन्होंने उसेहे गुरुकहकर संबोधित किया, तथा इस तथ्य का अंगीकार किया कि प्रभु यीशु सच्चा है, परमेश्वर का मार्ग सच्चाई से सिखाता है, और निष्पक्ष, निष्कपट व्यवहार करता है।

जब प्रभु यीशु मसीह को पकड़वाने वाले उनके शिष्य यहूदा इस्करियोती ने अपने किए पर दुख जताया और उन धर्म के अगुवों के पास आकर कहा, “जब उसके पकड़वाने वाले यहूदा ने देखा कि वह दोषी ठहराया गया है तो वह पछताया और वे तीस चान्दी के सिक्के महायाजकों और पुरनियों के पास फेर लाया। और कहा, मैं ने निर्दोष को घात के लिये पकड़वाकर पाप किया है? उन्होंने कहा, हमें क्या? तू ही जान” (मत्ती 27:3-4), तब भी, यद्यपि उन्होंने यहूदा की बात को अनसुनी कर दिया, किन्तु उन्होंने प्रभु यीशु के निर्दोष होने की उसकी बात को अस्वीकार नहीं किया, उसके विषय कोई तर्क नहीं किया।    

और न ही प्रभु ने अपने बारे में उन्हें किसी संदेह में छोड़ा था; अनेकों अवसरों पर, यहाँ तक कि उस समय तक भी जब उन्हें झूठे मुकद्दमों में दोषी ठहराने के प्रयास किए जा रहे थे, प्रभु ने यह बारंबार स्पष्ट बता दिया था की वे कौन हैं (यूहन्ना 5:17-43; 8:25; 10:24; 14:11; लूका 22:67-70)। परन्तु प्रभु यीशु के वास्तविकता को भली-भांति जानते हुए भी उन्होंने कभी भी प्रभु पर विश्वास नहीं किया (यूहन्ना 12:37)। उलटे, यह सब जानते हुए भी, बुरे उद्देश्यों एवं स्वार्थी भावनाओं के अंतर्गत, उन्होंने प्रभु को मार डालने का षड्यंत्र रचा (यूहन्ना 11:47-50) 

दूसरे शब्दों में, यद्यपि यहूदियों के धार्मिक अगुवे यह भली-भांति जानते थे कि प्रभु यीशु वास्तव में कौन हैं, और यह भी कि परमेश्वर उनके साथ है, तथा उन में होकर कार्य कर रहा है। फिर भी जानबूझकर, स्वार्थी लाभ के लिए, उन्होंने प्रभु की अवहेलना की, उन पर अविश्वास किया, और सबसे बुरा यह कि जानबूझकर उनके बारे में लोगों का गलत मार्गदर्शन किया। उन्होंने सभी के समक्ष प्रभु के कार्यों और शिक्षाओं में होकर दिखाए जा रहे परमेश्वर पवित्र आत्मा की सामर्थ्य को शैतानों के सरदार की सामर्थ्य कहने के द्वारा न केवल प्रभु और परमेश्वर के विषय झूठ बोला, वरन प्रभु में होकर कार्य करने वाली पवित्र आत्मा की सामर्थ्य को शैतानी शक्ति बताया। अब पिछले लेख में हमने जोनिन्दा” (blasphemy) शब्द का वचन के अनुसार वास्तविक अर्थ को और उसके अभिप्रायों के बारे में सीखा था, उसे स्मरण कीजिए या फिर से देख लीजिए। उन फरीसियों तथा धर्म के अगुवों की यह, प्रभु के विरोध में, और स्वार्थ के अंतर्गत जानबूझकर कही गई बात; प्रभु के बारे में जानकारी रखते हुए भी और यह जानते हुए भी कि प्रभु पर उनके द्वारा लगाए जाने वाले आरोप झूठे हैं, फिर भी झूठ बोलकर प्रभु का निरादर करना, उन्हें अपमानित करना, और उनमें होकर कार्य करने वाली पवित्र आत्मा की सामर्थ्य को शैतानी सामर्थ्य कहना, केवल इसे ही प्रभु ने पवित्र आत्मा के विरुद्ध किया गया कभी क्षमा न हो सकने वाला पाप कहा है; अन्य किसी बात को नहीं।

इसलिए, पवित्र आत्मा के विरुद्ध कभी क्षमा न हो सकने वाले पाप वह नहीं हैं जो बहुधा वर्तमान के अनेकों धार्मिक अगुवों के द्वारा कहे और बताए जाते हैं; और जो वचन, विशेषकर पवित्र आत्मा से संबंधित गलत शिक्षाओं को देने वाले बताते और फैलाते हैं। बाइबल में यह वाक्यांश एक बहुत ही विशिष्ट अपराध के लिए प्रयोग किया गया है, और केवल उस अपराध को ही यह कहा जाना चाहिए। अपनी गलत शिक्षाओं के विषय प्रश्नों से बचने के लिए लोगों को पवित्र आत्मा की निन्दाका भय दिखाना या कहना झूठ है, अनुचित है, वचन का दुरुपयोग है। 

यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं, तो आपके लिए यह जानना और समझना अति-आवश्यक है कि आप परमेश्वर पवित्र आत्मा से संबंधित इन गलत शिक्षाओं में न पड़ जाएं; न खुद भरमाए जाएं, और न ही आपके द्वारा कोई और भरमाया जाए। लोगों द्वारा कही जाने वाले ही नहीं, वरन वचन में लिखी हुई बातों पर भी ध्यान दें, और लोगों की बातों को वचन की बातों से मिला कर जाँचें और परखें। यदि आप इन गलत शिक्षाओं में पड़ चुके हैं, तो अभी वचन के अध्ययन और बात को जाँच-परख कर, सही शिक्षा को, उसी के पालन को अपना लें।

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।



एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • गिनती 28-30         
  • मरकुस 8:22-38

बुधवार, 2 मार्च 2022

कलीसिया में अपरिपक्वता के दुष्प्रभाव (18)


भ्रामक शिक्षाओं के स्वरूप - पवित्र आत्मा के विषय गलत शिक्षाएं (8) - पवित्र आत्मा की निन्दा करने का पाप (2) 

हम पिछले लेखों से देखते आ रहे हैं कि बालकों के समान अपरिपक्व मसीही विश्वासियों की एक पहचान यह भी है कि वे बहुत सरलता से भ्रामक शिक्षाओं द्वारा बहकाए तथा गलत बातों में भटकाए जाते हैं। इन भ्रामक शिक्षाओं को शैतान और उस के दूत झूठे प्रेरित, धर्म के सेवक, और ज्योतिर्मय स्‍वर्गदूतों का रूप धारण कर के बताते और सिखाते हैं (2 कुरिन्थियों 11:13-15)। ये लोग, और उनकी शिक्षाएं, दोनों ही बहुत आकर्षक, रोचक, और ज्ञानवान, यहाँ तक कि भक्तिपूर्ण और श्रद्धापूर्ण भी प्रतीत हो सकती हैं, किन्तु साथ ही उनमें अवश्य ही बाइबल की बातों के अतिरिक्त भी बातें डली हुई होती हैं। जैसा परमेश्वर पवित्र आत्मा ने प्रेरित पौलुस के द्वारा 2 कुरिन्थियों 11:4 में लिखवाया है, “यदि कोई तुम्हारे पास आकर, किसी दूसरे यीशु को प्रचार करे, जिस का प्रचार हम ने नहीं किया: या कोई और आत्मा तुम्हें मिले; जो पहिले न मिला था; या और कोई सुसमाचार जिसे तुम ने पहिले न माना था, तो तुम्हारा सहना ठीक होता”, इन भ्रामक शिक्षाओं और गलत उपदेशों के, मुख्यतः तीन विषय, होते हैं - प्रभु यीशु मसीह, पवित्र आत्मा, और सुसमाचार। साथ ही इस पद में सच्चाई को पहचानने और शैतान के झूठ से बचने के लिए एक बहुत महत्वपूर्ण बात भी दी गई है, कि इन तीनों विषयों के बारे में जो यथार्थ और सत्य हैं, वे सब वचन में पहले से ही बता और लिखवा दिए गए हैं। इसलिए बाइबल से देखने, जाँचने, तथा वचन के आधार पर शिक्षाओं को परखने के द्वारा सही और गलत की पहचान करना कठिन नहीं है। 

पिछले लेखों में हमने इन गलत शिक्षा देने वाले लोगों के द्वारा, प्रभु यीशु से संबंधित सिखाई जाने वाली गलत शिक्षाओं को देखने के बाद, परमेश्वर पवित्र आत्मा से संबंधित सामान्यतः बताई और सिखाई जाने वाली गलत शिक्षाओं की वास्तविकता को वचन की बातों से देखना आरंभ किया है। हम देख चुके हैं कि प्रत्येक सच्चे मसीही विश्वासी के नया जन्म या उद्धार पाते ही, तुरंत उसके उद्धार पाने के पल से ही परमेश्वर पवित्र आत्मा अपनी संपूर्णता में आकर उसके अंदर निवास करने लगता है, और उसी में बना रहता है, उसे कभी छोड़ कर नहीं जाता है; और इसी को पवित्र आत्मा से भरना या पवित्र आत्मा से बपतिस्मा पाना भी कहते हैं। वचन स्पष्ट है कि पवित्र आत्मा से भरना या उससे बपतिस्मा पाना कोई दूसरा या अतिरिक्त अनुभव नहीं है, वरन उद्धार के साथ ही सच्चे मसीही विश्वासी में पवित्र आत्मा का आकर निवास करना ही है। इन गलत शिक्षकों की एक और बहुत प्रचलित और बल पूर्वक कही जाने वाले बात हैअन्य-भाषाओंमें बोलना, और उन लोगों के द्वाराअन्य-भाषाओंको अलौकिक भाषाएं बताना, और परमेश्वर के वचन के दुरुपयोग के द्वारा इससे संबंधित कई और गलत शिक्षाओं को सिखाना। इसके बारे में भी हम देख चुके हैं कि यह भी एक ऐसी गलत शिक्षा है जिसका वचन से कोई समर्थन या आधार नहीं है। प्रेरितों 2 अध्याय में जो अन्य भाषाएं बोली गईं, वे पृथ्वी ही की भाषाएं और उनकी बोलियाँ थीं; कोई अलौकिक भाषा नहीं। हमने यह भी देखा था कि वचन में इस शिक्षा का भी कोई आधार या समर्थन नहीं है किअन्य-भाषाएंप्रार्थना की भाषाएं हैं। इस गलत शिक्षा के साथ जुड़ी हुई इन लोगों की एक और गलत शिक्षा है किअन्य-भाषाएंबोलना ही पवित्र आत्मा प्राप्त करने का प्रमाण है, जिसके भी झूठ होने और परमेश्वर के वचन के दुरुपयोग पर आधारित होने को हमने पिछले लेख में देखा है। पिछले लेख में हमने यह भी देखा था कि उन लोगों के सभी दावों के विपरीत, न तो प्रेरितों 2:3-11 का प्रभु के शिष्यों द्वारा अन्य-भाषाओं में बोलना कोईसुननेका आश्चर्यकर्म था, न ही अन्य भाषाएं प्रार्थना करने की गुप्त भाषाएँ हैं, और न ही ये किसी को भी यूं ही दे दी जाती हैं, जब तक कि व्यक्ति की उस स्थान पर सेवकाई न हो, जहाँ की भाषा बोलने की सामर्थ्य उसे प्रदान की गई है। एक और दावा जो ये पवित्र आत्मा और अन्य-भाषाएँ बोलने से संबंधित गलत शिक्षाएं देने वाले करते हैं, है कि व्यक्ति अन्य-भाषा बोलने के द्वारा सीधे परमेश्वर से बात करता है। इसके तथा कुछ संबंधित और बहुत महत्वपूर्ण बातों के बारे में हम पिछले दो लेखों में देख चुके हैं कि उनका यह दावा भी वचन की कसौटी पर बिलकुल गलत है, अस्वीकार्य है।

   इन गलत शिक्षा फैलाने वालों की एक और प्रमुख शिक्षा, जिसे वे अपने बचाव के लिए प्रयोग करते हैं, हैपवित्र आत्मा की निन्दा कभी क्षमा न होने वाला पाप है।यह समझने के लिए कि यहनिरादरया निन्दावास्तव में है क्या, और यह क्यों केवल परमेश्वर पवित्र आत्मा ही के विरुद्ध ही क्षमा नहीं हो सकता है, हमने पिछले लेख से परमेश्वर के वचन में से कुछ तथ्यों एवं शिक्षाओं को देखना आरंभ किया है, और त्रिएक परमेश्वर के तीनों स्वरूपों, पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के बारे में अपने इस विषय के संदर्भ से देखा है। आज हम देखेंगे कि लूसिफर का पाप क्यों क्षमा नहीं हो सकता था; और यह भी समझेंगे कि वचन के अनुसार निन्दा (blasphemy) शब्द का वास्तव में क्या अर्थ और अभिप्राय होता है। 

लूसिफर का पाप क्यों कभी क्षमा नहीं हो सकता, और हमारे लिए उसके क्या अभिप्राय हैं?

परमेश्वर की पवित्रता, वैभव, और महानता के विरुद्ध मनुष्यों द्वारा किए गए निरादर के पाप को यदि हमारे लिए क्षमा योग्य बना दिया जाता, तो फिर परमेश्वर के उच्च तथा निष्पक्ष न्याय की मांग होगी कि प्रधान स्वर्गदूत, लूसिफर द्वारा परमेश्वर की पवित्रता, वैभव, और महानता के विरुद्ध किए गए निरादर के पाप को भी क्षमा मिलनी चाहिए – और यह परमेश्वर की पवित्रता, वैभव, महानता, और पूर्ण सार्वभौमिकता का उपहास हो जाएगा। लूसिफर का पाप न केवल अत्यंत जघन्य था, वरन क्योंकि उसके पतन के समय, किसी ने भी किसी के पाप की कोई कीमत नहीं चुकाई थी, जैसे कि मसीह यीशु ने हमारे लिए चुका दी है, इसलिए पाप के लिए कोई प्रायश्चित का समाधान उपलब्ध भी नहीं था; इसका निवारण दंड के द्वारा ही संभव था। 

साथ ही, हम वचन से यह भी देखते हैं कि न तो लूसिफर ने और न ही उसके दूतों ने कभी अपने पापों के लिए कोई पश्चाताप किया, उनके लिए सच्चे मन से क्षमा माँगी। वे तो आरंभ से ही परमेश्वर के कार्यों में बाधा और बिगाड़ उत्पन्न करते आ रहे हैं, परमेश्वर के वचन और शिक्षाओं को भ्रष्ट करके उनका दुरुपयोग ही करते चले आ रहे हैं। ऐसी परिस्थिति में, मात्र क्षमा की प्रार्थना कर लेने की औपचारिकता को स्वीकार किए जाने का अर्थ होता स्वर्गीय स्थानों में अनियंत्रित अव्यवस्था एवं अराजकता को निमंत्रण देना। क्योंकि तब, कोई भी सृजा गया प्राणी अपनी इच्छानुसार कुछ भी कर लेता और, बस क्षमा मांग कर उसके परिणामों से बच निकालता –  और यह कदापि स्वीकार नहीं की जा सकने वाली स्थिति हो जाती। 

इसलिए पृथ्वी पर भी पापों की क्षमा के लिए सच्चे और वास्तविक पश्चाताप और समर्पण को ही आधार बनाया गया है, पश्चाताप के बाद ही पाप-क्षमा है (मरकुस 1:15; प्रेरितों 2:38); औपचारिकता में पापों की क्षमा माँग लेना न पर्याप्त है और न स्वीकार्य। इसलिए यह अनिवार्य था कि लूसिफर से उसके द्वारा किए गए परमेश्वर के निरादर के पाप का हिसाब लिया जाए और उसे पाप का उचित एवं उपयुक्त दण्ड भोगने का उदाहरण बना कर प्रस्तुत किया जाए। लूसिफर को उचित दण्ड दिया ही जाना था; ऐसा दण्ड जो उसके पाप के घोर और जघन्य होने के अनुपात में कम से कम उतना ही घोर और जघन्य तो हो। यदि परमेश्वर के निरादर का पाप एक के लिए क्षमा होने योग्य नहीं है, तो फिर परमेश्वर के निष्पक्ष न्याय के अनुसार, यह औरों के लिए भी क्षमा नहीं किया जा सकता है। इसीलिए, पवित्र आत्मा के विरूद्ध निरादर या निन्दा के पाप को भी कभी क्षमा नहीं किया जा सकता है।

बाइबल के अनुसार परमेश्वर पवित्र आत्मा की निन्दा क्या है?

अब हम देखते हैं की शब्दनिंदा या निरादरका, उसके क्षमा न हो सकने वाले पाप के सन्दर्भ में, परमेश्वर के वचन में अभिप्राय क्या है। हम मिकल्संस एन्हांस्ड डिक्शनरी ऑफ़ द ग्रीक एंड हीब्र्यु टेस्टामेंट्स (Mickelson’s Enhanced Dictionary of the Greek and Hebrew Testaments) से देखते हैं कि यह शब्दनिन्दा”, यूनानी शब्दब्लास्फेमियो” (स्ट्रौंग्स/Strongs G987) से आया है, जिसका अर्थ है:

1. धिक्कारना, अपशब्द के साथ विरोध में बोलना, हानि पहुंचाना।

2. कलंकित करना, किसी की प्रतिष्ठा को हानि पहुंचाना, बदनाम करना।

3. (विशेषतः) किसी के प्रति निरादर पूर्वक बोलना।

 

इस शब्द की उपरोक्त परिभाषा से स्पष्ट है कि, यह निरादर का पाप एक ऐच्छिक, जानबूझकर योजनानुसार किया गया कार्य है; जो तथ्यों पर आधारित हो सकता है अथवा नहीं भी हो सकता है, वरन जो तथ्यों का दुरुपयोग करके उन तथ्यों के यथार्थ से बिलकुल भिन्न अभिप्राय देने के द्वारा किया गया भी हो सकता है। और साथ ही यह केवल व्यक्ति को नीचा दिखाने और बदनाम करने के उद्देश्य से किया गया होगा – जो करना चाहे सही हो या गलत। सीधे शब्दों में में अर्थ यह है कि, किसी का निरादर या निन्दा करना, उस व्यक्ति को दुष्ट कहना और इस बात का प्रचार करना है, यह भली-भांति जानते हुए भी कि वह व्यक्ति बुरा नहीं है; और उसके बुरा न होने के प्रमाण होते और जानते हुए भी, केवल उसे बदनाम करने के उद्देश्य से, जानबूझकर ऐसा करना।

इस विषय के संदर्भ में, यह बहुत ध्यान देने और भली-भांति समझने की बात है कि पवित्र आत्मा के विरुद्ध निरादर या निन्दा का पाप, पवित्र आत्मा या उसकी सामर्थ्य अथवा कार्यों के प्रति असमंजस में होना या अनिश्चित होना, या उस पर संदेह करना, या उसके विषय कोई स्पष्टीकरण की अपेक्षा करना, या कुछ और अधिक खुलासा अथवा विवरण माँगना, आदि नहीं है। यह इस बात से भली-भांति प्रकट होता है कि यद्यपि प्रभु के कार्य पवित्र आत्मा के अभिषेक और सामर्थ्य के साथ किए गए थे (प्रेरितों 10:38), किन्तु फिर भी अनेकों को, जिन में नए नियम के कुछ बहुत महत्वपूर्ण व्यक्ति भी सम्मिलित हैं, प्रभु पर, तथा पवित्र आत्मा की अगुवाई और सामर्थ्य द्वारा की गई उसकी सेवकाई के प्रति न केवल संदेह था, यहाँ तक कि अविश्वास भी था:

  • यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले को संदेह हुआ की क्या प्रभु वह प्रतिज्ञा किया हुआ मसीहा था भी की नहीं (मत्ती 11:2-3); 
  • प्रभु के शिष्यों को ही उस पर संदेह था की वह वास्तव में है कौन (मरकुस 4:38-41); 
  • प्रभु यीशु के अपने भाई, जिनमें याकूब और यहूदा भी थे जिनकी पत्रियां नए नियम में विद्यमान हैं, आरंभ में वे भी उस पर विश्वास नहीं रखते थे (यूहन्ना 7:5); 
  • दुष्टात्मा के वश में लड़के के पिता को संदेह था कि वह उसके पुत्र को ठीक कर सकता है कि नहीं (मरकुस 9:24); 
  • मृतक लाज़रस की बहिन मारथा को संदेह था, कि प्रभु लाज़रस को मृतकों में से जिलाने पाएगा (यूहन्ना 11:21-28); 
  • थोमा को प्रभु के पुनरुत्थान पर संदेह था (यूहन्ना 20:25) इत्यादि। 

किन्तु इन में से किसी को भी प्रभु ने उनके प्रश्नों, संदेहों, और अविश्वास के कारण कभी भीक्षमा न हो पाने वाले पापका दोषी न तो कहा और न इसके लिए उन्हें दण्डित किया। 

इसके अतिरिक्त: 

  • वचन में यह भी उदाहरण है कि पवित्र आत्मा का प्रतिरोध करने और उसके अनाज्ञाकारी होने की निंदा अवश्य की गई है (प्रेरितों 7:51-53), परन्तु इस भीकभी क्षमा न होने वाला पापनहीं कहा गया है।
  • यहाँ तक कि प्रभु के विरोध में भद्दी या अपमानजनक भाषा के उपयोग को (पतरस द्वारा प्रभु का तीन बार असभ्य भाषा के प्रयोग के साथ किया गया इनकार – मत्ती 26:69-74), भी बाइबल में अनादर या क्षमा न होने वाला पाप नहीं कहा गया है। 
  • हमें यह स्मरण करना और ध्यान करना आवश्यक है कि केवल फरीसी, सदूकी, और शास्त्री ही नहीं थे जिन्होंने प्रभु यीशु में दुष्टात्मा होने का दोषारोपण किया था, आम लोगों में से भी कई लोगों ने यही कहा था (मत्ती 10:25; मरकुस 3:21; यूहन्ना 7:20; 8:48, 52; 10:20); परन्तु इन में से किसी भी अवसर पर प्रभु यीशु ने न तो उन्हें क्षमा न होने वाले पाप का दोषी कहा और न ही उन्हें इसके विषय सचेत किया। 

उपरोक्त वचन के सभी उदाहरणों के आधार पर, यह बिलकुल स्पष्ट है कि वचन के अनुसार, जन-साधारण द्वारा प्रभु या पवित्र आत्मा पर संदेह करना, किसी असमंजस के लिए स्पष्टीकरण की लालसा रखना या मांगना, अविश्वास रखना, उनके विषय अनुचित या अभद्र भाषा अथवा व्यवहार का प्रयोग करना, आदिकभी न क्षमा होने वाला पापनहीं हैं, क्योंकि उन लोगों ने ये सभी बातें की हैं, और प्रभु ने कभी उसे उनके द्वाराकभी न क्षमा होने वाला पापकिया जाना नहीं कहा है। 

अब प्रश्न यह उठता है कि ऐसे निरादर या निन्दा कोकभी न क्षमा होने वाला पाप,” प्रभु ने केवल वचन के ज्ञानियों और शिक्षकों, फरीसियों से ही क्यों कहा है (मरकुस 3:28-30 और लूका 12:10)? इसे हम अगले लेख में देखेंगे। 

यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं, तो आपके लिए यह जानना और समझना अति-आवश्यक है कि आप परमेश्वर पवित्र आत्मा से संबंधित इन गलत शिक्षाओं में न पड़ जाएं; न खुद भरमाए जाएं, और न ही आपके द्वारा कोई और भरमाया जाए। लोगों द्वारा कही जाने वाले ही नहीं, वरन वचन में लिखी हुई बातों पर भी ध्यान दें, और लोगों की बातों को वचन की बातों से मिला कर जाँचें और परखें। यदि आप इन गलत शिक्षाओं में पड़ चुके हैं, तो अभी वचन के अध्ययन और बात को जाँच-परख कर, सही शिक्षा को, उसी के पालन को अपना लें।

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • गिनती 26-27          
  • मरकुस 8:1-21