ई-मेल संपर्क / E-Mail Contact

इन संदेशों को ई-मेल से प्राप्त करने के लिए अपना ई-मेल पता इस ई-मेल पर भेजें : rozkiroti@gmail.com / To Receive these messages by e-mail, please send your e-mail id to: rozkiroti@gmail.com

गुरुवार, 1 अप्रैल 2010

दूसरा बकरा

डैफने डयु मौरियर का एक उपन्यास - द स्केपगोट (The Scapegoat) दो व्यक्तियों के बारे में है जो अपने एक समान दिखने से चकित हैं। वे एक शाम एक साथ बिताते हैं, लेकिन उनमें से एक वहाँ से दूसरे की पहचान चुराकर भाग जाता है, और दूसरे को सम्स्याओं से भरा जीवन जीने को बाध्य होना पड़ता है; पहले के स्थान पर स्केपगोट (scapegoat) या बलिदान का बकरा बनकर।

इस शब्द का मूल यहूदियों की एक धार्मिक रीति में है, जहाँ ’योम किप्पूर’ या छुटकारे का दिन मनाया जाता है। इस दिन प्रधान याजक दो बकरे लेता है, और एक को पाप बलि के लिये चढ़ाता है तथा दुसरे बकरे के सिर पर अपने लोगों के सारे पाप सांकेतिक रूप से लाद कर, उसे जंगल में छोड़ देता है (लैव्यवस्था १६:७-१०)। यह रीति भविष्य में आने वाले मसीह की सेवकाई का एक प्रतिक थी।

यीशु मसीह के पृथ्वी पर आने के बाद वह हमारा स्केपगोट बना। उसने सारे जगत के पापों का प्रायशचित एक ही बार हमेशा के लिये, क्रूस पर अपना बलिदान देकर किया (१ यूहन्ना २:२, इब्रानियों ७:२७)। पहला बकरा परमेश्वर के लोगों के पापों के प्रायशचित के रूप में चढ़ाया जाता था जो प्रभु यीशु के क्रूस पर दिये गये बलिदान का प्रतीक था। दुसरा बकरा एक पूर्णतया निर्दोष यीशु के दुसरों के पापों को उनपर से हटा कर अपने उपर ले लेने का प्रतीक था।

हममें से कोई भी पापों से रहित नहीं है, लेकिन परमेश्वर पिता ने हम सबके पापों को प्रभु यीशु पर रख दिया "हम सब भटक गये थे...यहोवा ने हम सब के अधर्म का बोझ उसी पर लाद दिया" (यशायाह ५३:६)। यीशु ने हम सबके पाप अपने उपर ले लिये, इसलिये परमेश्वर अपने पुत्र के अनुयायियों को निर्दोष मानता है। - सिंडी हैस कैस्पर


यीशु हमारे पाप ले लेता है और अपना उद्धार हमें दे देता है।


बाइबल पाठ: लैव्यवस्था १६:५-२२


वही हमारे पापों का प्रायशचित है और केवल हमारे ही नहीं वरन सारे जगत के पापों का भी। - १ युहन्ना २:२


एक साल में बाइबल:
  • न्यायियों १३-१५
  • लूका ६:२७-४९

बुधवार, 31 मार्च 2010

क्या परमेश्वर को मेरी चिन्ता है?

एक दुखदायी वर्ष में एक के बाद एक करके मेरे तीन मित्रों की मृत्यु हो गई। पहले दो मित्रों की मृत्यु ने भी मुझे तीसरे मित्र की मृत्यु के आघात को झेलेने के लिये तैयार नहीं किया। मैं रोने के सिवाय कुछ नहीं कर सका।

मुझे एक अजीब सी शांति मिलती है यह जान कर कि जब यीशु ने दुख का सामना किया तो उसकी प्रतिक्रिया भी मेरी प्रतिक्रिया के समान ही थी। मुझे इससे सांत्वना मिलती है कि जब यीशु का मित्र लाज़र मरा तो यीशु रोया (युहन्ना ११:३२-३६)। यह इस बात का भी सूचक है कि जब मेरे मित्रों की मृत्यु हुई तो परमेश्वर ने कैसा अनुभव किया होगा, क्योंकि वह भी उनसे प्रेम करता था।

अपने क्रूस पर चढ़ाये जाने से पहले गत्सम्ने के बाग़ में, यीशु ने यह प्रार्थना नहीं की, "हे प्रभु मैं तेरा बहुत आभारी हूँ कि तू ने मुझे अपने निमित कष्ट उठाने को चुना है।" नहीं, ऐसा नहीं, वरन किसी भी साधारण मनुष्य की तरह उसने ऐसी परिस्थिती में स्वभविक रूप से होने वाले दुख, भय, अकेलेपन और घोर निराशा को अनुभव किया। इब्रानियों का लेखक कहता है, "(यीशु ने) ऊंचे शब्द से पुकार पुकार कर और आंसु बहा बहा कर उससे जो उसे मृत्यु से बचा सकता था, प्रार्थनाएं और विनती की" (इब्रानियों ५:७), परन्तु वह मृत्यु से बचा नहीं।

जब हम उसके क्रूस पर कहे गए भजन के गंभीर पद "हे मेरे परमेश्वर, हे मेरे परमेश्वर, तू ने मुझे क्यों छोड़ दिया?" (भजन २२:१, मरकुस १५:३४) को पढ़ते हैं तो प्रतीत होता है कि यीशु भी शायद उसी प्रश्न का सामना कर रहा था जिसका हम करते हैं - "क्या परमेश्वर को मेरी चिन्ता है?"

लेकिन यीशु का वह भारी दुख एक अलौकिक शांति के साथ झेलना इस बात का प्रमाण है कि उसे अपने पिता पर पूरा भरोसा था कि हालात चाहे जैसे भी हों, परमेश्वर का प्रेम कभी न बदलने वाला और स्थिर प्रेम है। उसने इस विश्वास को प्रमाणित करके दिखाया कि इस प्रश्न "क्या परमेश्वर को मेरी चिन्ता है?" का केवल एक ही उत्तर है "हाँ, अवश्य है।" - फिलिप यैन्सी


जब हम विश्वास करेंगे कि परमेश्वर का हाथ हर बात में है, तब हम हर बात परमेश्वर के हाथ में सौंप सकेंगे।


बाइबल पाठ: मरकुस १४:३२-४२


(यीशु) बहुत अधीर और व्याकुल होने लगा। और उसने कहा: मेरा मन बहुत उदास है, यहाँ तक कि मैं मरने पर हूँ। - मरकुस १४:३३, ३४


एक साल में बाइबल:
  • न्यायियों ११, १२
  • लूका ६:१-२६

मंगलवार, 30 मार्च 2010

अशुद्ध? शुद्ध हो जाइये

जब मैं मरकुस १:४०-४५ पढ़ता हूँ तो मेरी कलपना में एक सम्भावित दृश्य उभरता है: उस भीड़ ने उस व्यक्ति को अपनी ओर आते देखा। वह उन्हें अपने हाथ हिला हिला कर दूर रहने को सावधान कर रह होगा, उसके मुँह और नाक को ढांपने वाले कपड़े से भीड़ ने उसे पहचाना होगा - वह एक कोढ़ी था, उसके कपड़े फटे थे और खाल गल कर उतर रही थी; वह अशुद्ध था।

कोढ़ी के यीशु के पास भागते हुए आने से लोग यीशु के पास से दूर हट गए, उन्हें डर था कि एक कोढ़ी के छुए जाने से वे भी अशुद्ध हो जाएंगे। उस समय में कोढ़ियों को समाज से और धार्मिक जीवन से बहिष्कर्त करके रखा जाता था। वे अपनी मौत का मातम तक सवयं ही मनाने को बाध्य थे।

परन्तु इस कोढ़ी ने यीशु के पैरों पर गिरकर उससे गिड़गिड़ा कर अपनी चंगाई और समाज में लौटाये जाने के लिये विश्वास से प्रार्थना की, "यदि तू चाहे तो मुझे शुद्ध कर सकता है" (पद ४०)। उसपर तरस खाकर यीशु ने उसे छुआ और कहा, "मैं चाहता हूँ, तू शुद्ध हो जा" (पद ४१)। यीशु ने उसे कोढ़ से चंगा किया और मंदिर के याजक को दिखाने के लिये कहा।

यीशु पाप में फंसे सब बेबस और निराश लोगों को शुद्ध, क्षमा और उन्हें पहले सा बहाल कर सकता है। उसपर विश्वास करें कि जब आप उसे पुकारेंगे तो वह आपसे भी कहेगा "मैं चाहता हूँ, तू शुद्ध हो जा।" - मार्विन विलियम्स


यीशु लोगों को बहाल करने का विशेषज्ञ है।


बाइबल पाठ: मरकुस १:४०-४५


यीशु ने उसपर तरस खाकर हाथ बढ़ाया और उसे छूकर कहा, "मैं चाहता हूँ, तू शुद्ध हो जा।" - मरकुस १:४१


एक साल में बाइबल:
  • न्यायियों ९, १०
  • लूका ५:१७-३९

सोमवार, 29 मार्च 2010

निर्णय

एक समय मैंने एक जैसे लगने वाले कुछ शब्दों के अर्थ अपनी कॉपी पर लिखकर रखे, अपने आप को याद दिलाते रहने के लिये कि उन सबका अर्थ एक ही नहीं है। वे शब्द हैं, "आशय, विचार, राय, अभिरुचि, विश्वास, निश्चय।" अपनी राय को एक निश्चय के स्तर तक उठाने का प्रलोभन प्रबल हो सकता है, परन्तु रोमियों १४ हमें सिखाता है कि ऐसा करना गलत है।

पहली शताब्दी में यहूदी व्यवस्था पर आधारित धार्मिक परंपराएं धार्मिक नेताओं की दृष्टि में इतनी महत्वपूर्ण थीं कि वे यीशु को, जो व्यवस्था का जीवित मनवीय प्रतिरूप था, पहचान नहीं सके। उनका ध्यान छोटी छोटी बातों पर इतना केंद्र्ति रहता था कि वे प्रधान बातों की उपेक्षा कर जाते थे (मत्ती २३:२३)।

बाइबल हमें सिखाती है कि हमें अपने विश्वासों और निश्चयों को भी प्रेम के नियम के आधीन करके रखना है (रोमियों १३:८-१०; गलतियों ५:१४; याकूब २:८) क्योंकि प्रेम ही सारी व्यवस्था की पूर्ति है और परस्पर मेल, शांति और एक दूसरे को उभारने का रास्ता बनाता है।

यदि हमारी अपनी राय अथवा पसन्द, हमारे लिये, परमेश्वर द्वारा कही गई और उसकी नज़र में मूल्यवान किसी भी बात से अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है तो समझ लें कि हमने अपने ’विश्वास’ की मूर्तियां अपने हृदय में स्थापित कर लीं हैं। मूर्ति पूजा एक बड़ा पाप है क्योंकि वह प्रथम और सबसे मुख्य आज्ञा को तोड़ता है: "तू मुझे छोड़ किसी दूसरे को ईश्वर करके न मानना" (निर्गमन २०:३)।

हम यह निश्चय करें और ठान लें कि हम अपने निज विचारों को परमेश्वर के विचारों से बढ़कर नहीं रखेंगे, ताकि हमारे विचार दूसरों के लिये ठोकर का कारण न बने और उनसे किसी के लिये यीशु के प्रेम को जानने में अवरोध न हो। - जूली ऐकरमैन लिंक


संसार में सबसे बड़ी शक्ति व्यवस्था कि मजबूरी नहीं, परन्तु प्रेम की करुणा है।


बाइबल पाठ: रोमियों १४:१-१३


तुम यह ठान लो कि कोई अपने भाई के सामने ठेस या ठोकर खाने का कारण न रखे। - रोमियों १४:१३


एक साल में बाइबल:
  • न्यायियों ७, ८
  • लूका ५:१-१६

रविवार, 28 मार्च 2010

दया का नाप

परमेश्वेर के महिमामय सिंहासन की ऊंचाई से कलवरी के क्रूस की गहराई तक की दूरी कितनी है? हमारे प्रति उद्धारकर्ता का प्रेम क्या नापा जा सकता है? फिलिप्पियों को लिखी अपनी पत्री में पौलुस वर्णन करता है यीशु के महिमा की ऊंचाईयों से उतरकर शर्मनाक यातना और मृत्यु की गहराईयों तक जाने की और वहाँ से उसके फिर वापस लौटने की (२:५-११)।

मसीह अनंत, सृष्टीकर्ता और समस्त सृष्टि का प्रभु है; इस पृथ्वी की सड़ाहट और गलाहट से ऊपर असीम ऊंचाई तक महिमित है। वह जीवन का स्त्रोत है, अनगिनित स्वर्गदूत उसकी आराधना करते रहते हैं और उसकी आज्ञा मानने को तत्पर रहते हैं। फिर भी, पाप में खोई हुई मानव जाति के प्रति अपने प्रेम से प्रेरित होकर, "उसने अपने आप को दीन किया और यहाँ तक आज्ञाकारी हुआ कि मृत्यु, हाँ क्रूस की मृत्यु भी सह ली" (पद ८)। वह हमारे इस छोटे से ग्रह पर आया, एक गोशाला की गन्दगी और बदबू में पैदा हुआ और एक असहाय नवजात शिशु के रूप में जानवरों के चारा खाने की चरनी में उसे रखा गया।

जब वह व्यसक हुआ, तो उसे बेघर होने का अनुभव झेलना पड़ा (मत्ती८:२०)। वह प्यासा हुआ, और एक व्यभिचारी स्त्री से पानी मांगना पड़ा (यूहन्ना ४:७-९)। थकान से चूर, तूफान में हिचकोले खाती नाव में ही सो गया (मरकुस ४:३७, ३८)। वह पाप से रहित था, एक दिन उसे बड़ी भीड़ ने सर-आंखों पर बैठाया (मत्ती २१:९) और फिर उसी भीड़ ने उसे एक अपराधी करार देकर रोमी क्रूस की अत्याधिक पीड़ा दायक मृत्यु दे दी।

यह है परमेश्वर के सिंहासन से कलवरी तक की वह दूरी! यह है उसके अनुग्रह, करुणा और दया का नाप! - वेर्नन ग्राउंड्स


परमेश्वर मानवीय इतिहास में अनंत उद्धार की भेंट देने आया।


बाइबल पाठ: फिलिप्पियों २:५-११


तुम्हारा छुटकारा नाशमान वस्तुओं से नहीं...वरन मसीह के बहुमूल्य लहू से हुआ है। - १ पतरस १:१८, १९


एक साल में बाइबल:
  • न्यायियों ४-६
  • लूका ४:३१-४४

शनिवार, 27 मार्च 2010

मैं निर्दोष हूँ

फ्लोरिडा के एक स्कूल के सभी २५५० छात्रों को मुसीबत झेलनी पड़ी। स्कूल के सन्देश देने की प्रणाली द्वारा सभी छात्रों के अभिभावकों को सूचना भेजी गई कि अशिष्ट व्यवाहार करने की सज़ा भुगतने के लिये उस सप्ताहान्त उन्के बच्चे स्कूल में ही रोके जायेंगे। अधिकांश बच्चों ने अपने निर्दोष होने की दुहाई अपने अभिभावकों को दी, लेकिन फिर भी कुछ अभिभावकों ने अपने बच्चों को सज़ा भुगतने को सप्ताहान्त पर स्कूल भेजा। एक माँ, एमी ने यह स्वीकार किया कि अपने बेटे को सज़ा भुगतने को भेजने के लिये उसे काफी ज़ोर से डांटना भी पड़ा।

बाद में २५३४ छात्रों पर से एक बड़ा बोझ उतरा जब मालूम पड़ा कि वह सूचना केवल १६ छात्रों के लिये थी, किंतु स्वचलित सन्देश प्रणाली में हुई गलती के कारण सन्देश पूरे स्कूल के सभी छात्रों के लिये चला गया। अपने बच्चों पर विश्वास न करने के कारण कई अभिभावकों को शर्मिंदा होना पड़ा। एमी को भी बहुत बुरा लगा कि उसने अपने बेटे की बात नहीं मानी और उसपर विश्वास नहीं किया। प्रायश्चित के लिये वह उसे बाहर भोजन कराने ले गई।

हम सबके पास ऐसे अनुभव होंगे जिनमें हमने सीखा होगा कि हमें बोलने से पहले ध्यान से सुन लेना चाहिये। हम स्वाभाविक रूप से तुरन्त निर्णय लेते हैं और क्रोध भरी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं। याकूब की पत्री हमें जीवन की तनावपूर्ण परिस्थितियों का सामना करने के लिये तीन व्यावाहरिक बातें सिखाती है: "हर एक मनुष्य सुनने के लिये तत्पर, बोलने में धीरा और क्रोध में धीमा हो" (याकूब १:१९)।

जीवन के तनावों में, हम "वचन पर चलने वाले" (पद २२) बनें। आज, हम सुनने वाले और अपने शब्दों तथा क्रोध पर नियंत्रण रखने वाले बनें। - ऐनि सेटास


पहले सुनो, फिर समझो उसके बाद ही प्रेम सहित प्रतिक्रिया करो।


बाइबल पाठ: याकूब १:१९-२४


वचन पर चलने वाले बनो। - याकूब १:२२


एक साल में बाइबल:
  • यहोशु १-३
  • लूका ४:१-३०

शुक्रवार, 26 मार्च 2010

हर बात में विश्वासयोग्यता

अगस्त २००७ में अमेरिका के एक शहर मिनियापोलिस का एक बड़ा पुल टूटकर मिसिसिपी नदी में गिर गया। इस हादसे में १३ लोगों की जान गई। इस दुर्घटना के कई हफ्तों बाद तक जब भी मैं किसी पुल पर से गुज़रती थी तो मुझे यह हादसा याद आ जाता था।

कुछ समय बाद मैं डिस्कवरी चैनल पर एक कार्यक्रम ’डर्टी जॉब्स’ (गन्दे कार्य) देख रही थी। इस कार्यक्रम का सन्चालक माइक रो एक औद्यौगिक रंगकार से उसके काम के बारे में बातें कर रहा था। माइक ने उससे पूछा "मुझे नहीं लगता कि तुम्हारे इस काम में तुम्हारे लिये कोई ख्याति है?" उस रंगकार ने सहम्ति जताते हुए कहा, "नहीं, लेकिन फिर भी यह ऐसा कार्य है जिसे करना अनिवार्य है।"

आपकी जानकारी के लिए, वह रंगकार उत्तरी मिचिगन के मैकिनैक पुल के स्तंभों के भीतरी हिस्से के फौलाद को रंगता था कि उस पर ज़ंग न लगे, जो पुल को खतरे में डाल देता और कमज़ोर कर देता। उस पुल को ज़ंग से बचाना उसकी ज़िम्मेदारी थी। प्रतिदिन लगभग १२,००० लोग उस पुल को पार करते थे और इस बात से सर्वथा अनभिज्ञ थे कि उनकी सुरक्षा माईक जैसे काम करने वालों पर निर्भर है, जिन्हें कोई जानता नहीं और न ही कोई उनकी प्रशंसा करता है, लेकिन वे विश्वासयोग्यता से अपनी ज़िम्मेदारी निभा रहे हैं, ताकि दूसरे सुरक्षित रह सकें।

परमेश्वर भी हमारे कामों में हमारी विश्वासयोग्यता को देखता है। भले ही हम सोचें कि हमारे काम, छोटे या बड़े, किसी के द्वारा देखे और सराहे नहीं जाते, परन्तु एक है, जो उन्हें देखता रहता है; और हमारे प्रति उसकी सोच का महत्व ही सबसे महत्वपूर्ण है। हमें जो भी ज़िम्मेदारी आज सौंपी गई है, हम उसे प्रभु यीशु के नाम और उसकी महिमा के लिये करें (कुलुसियों ३:१७)। - सिंडी हैस कैस्पर


प्रतिदिन का साधारण कार्य भी यदि परमेश्वर के लिये किया जाय तो अनन्त मूल्य का हो जाता है।


बाइबल पाठ:कुलुसियों ३:१२-१७


वचन से या काम से जो कुछ भी करो सब प्रभु यीशु के नाम से करो। - कुलुसियों ३:१७


एक साल में बाइबल:
  • यहोशु २२-२४
  • लूका ३