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बुधवार, 13 अक्टूबर 2010

प्रभावी जीवन

चीन की राजधानी बीजिंग में अगस्त ८, २००८ को ओलम्पिक्स खेलों का उद्‍घाटन समारोह था। उद्‍घाटन स्थल पर ९०,००० दर्शक बैठे थे, और समस्त विश्व में उस समारोह का टी.वी. पर प्रसारण हो रहा था। मैंने भी उसे टेलीविज़न पर देखा। चीन के ५००० साल के इतिहास, उप्लबधियों और चीन द्वारा संसार को दीये गए अविश्कारों जैसे कागज़ बनाना, कुतुबनुमा, आतिशबाज़ी आदि का विवरण सुनना बहुत उत्साहवर्धक और प्रभावशाली था।

राजा सुलेमान के वैभव की चर्चा सुनकर, शीबा की रानी मिलने उससे आई (१ राजा १०:४, ५)। सुलेमान की राजधानी यरुशलेम की चकाचौंध और सुलेमान की बुद्धिमता को देखकर वह कह उठी कि मैंने जो सुना था वह इसका आधा भी नहीं था (पद ७)। शीबा की रानी इस बात के लिये कायल हुई कि सुलेमान राजा की प्रजा इसलिये सुखी थी क्योंकि वे राजा से बुद्धिमानी की बातें सीखते थे (पद ८)। इन सब बातों का प्रभाव यह हुआ कि रानी ने सुलेमान के परमेश्वर को माना और उसे सुलेमान को राजा बनाने और उसके न्याय और धार्मिकता से राज्य करने के लिये परमेश्वर का धन्यवाद किया (पद ९)।

सुलेमान का अपने लोगों पर हुए प्रभाव को पढ़कर मैं संसार पर अपने प्रभाव के बारे में सोचने लगा। बात अपनी सम्पदा और योग्यता से दूसरों को प्रभावित करने की नहीं है, बात है कि दूसरों के जीवन पर हम कैसा प्रभाव डालते हैं? प्रभु यीशु ने अपने चेलों से कहा "तुम पृथ्वी के नमक हो" (मती ५:१३) ज़रा सा नमक भोजन का स्वाद बना देता है। क्या प्रभु यीशु के चेले होने के नाते हम अपने आस पास के लोगों के जीवन पर भला प्रभाव डालते हैं?

आईये आज हम में से प्रत्येक कुछ ऐसा करे जो लोगों को प्रभु की प्रशंसा करने के लिये उत्साहित करे। - सी.पी. हिया


मसीही विश्वासी वे खिड़कियां हैं जिनमें हो कर लोग मसीह को देखते हैं।

तुम्हारा उजियाला मनुष्यों के साम्हने चमके कि वे तुम्हारे भले कामों को देखकर तुम्हारे पिता की, जो स्‍वर्ग में हैं, बड़ाई करें। - मती ५:१६


बाइबल पाठ: १ राजा १०:४-१०

जब शीबा की रानी ने सुलैमान की सब बुद्धिमानी और उसका बनाया हुआ भवन, और उसकी मेज पर का भोजन देखा,
और उसके कर्मचारी किस रीति बैठते, और उसके टहलुए किस रीति खड़े रहते, और कैसे कैसे कपड़े पहिने रहते हैं, और उसके पिलाने वाले कैसे हैं, और वह कैसी चढ़ाई है, जिस से वह यहोवा के भवन को जाया करता है, यह सब जब उस ने देखा, तब वह चकित हो गई।
तब उस ने राजा से कहा, तेरे कामों और बुद्धिमानी की जो कीर्ति मैं ने अपने देश में सुनी थी वह सच ही है।
परन्तु जब तक मैं ने आप ही आकर अपनी आंखों से यह न देखा, तब तक मैं ने उन बातों की प्रतीत न की, परन्तु इसका आधा भी मुझे न बताया गया था। तेरी बुद्धिमानी और कल्याण उस कीर्ति से भी बढ़कर हैं, जो मैं ने सुनी थी।
धन्य हैं तेरे जन, धन्य हैं तेरे ये सेवक जो नित्य तेरे सम्मुख उपस्थित रहकर तेरी बुद्धि की बातें सुनते हैं।
धन्य है तेरा परमेश्वर यहोवा, जो तुझ से ऐसा प्रसन्न हुआ कि तुझे इस्राएल की राजगद्दी पर विराजमान किया : यहोवा इस्राएल से सदा प्रेम रखता है, इस कारण उस ने तुझे न्याय और धर्म करने को राजा बना दिया है।
और उस ने राजा को एक सौ बीस किक्कार सोना, बहुत सा सुगन्ध द्रव्य, और मणि दिया; जितना सुगन्ध द्रव्य शीबा की रानी ने राजा सुलैमान को दिया, उतना फिर कभी नहीं आया।

एक साल में बाइबल:
  • यशायाह ४१, ४२
  • १ थिसुलिनिकियों १

मंगलवार, 12 अक्टूबर 2010

छोटी बातों के बड़े प्रभाव

किसी बात का विस्तृत विवरण बहुत फर्क ला सकता है। इसका तातपर्य उस जर्मन व्यक्ति से पूछिये जिसने अपनी क्रिसमस की छुट्टियां अपनी मंगेतर के साथ ऑस्ट्रेलिया के सिडनी (Sydney) शहर में बिताने की योजना बनाई, क्योंकि उन दिनों वहां ग्रीष्म काल होता है, किंतु पहुंच गया अमेरिका के मौन्टना प्रदेश के सिडनी (Sidney) शहर में जो तब बर्फ से ढका रहता है। भाषा की वर्तनी (spelling) में छोटी सी चूक ने उसके लिये इतना बड़ा उलट-फेर कर दिया!

शायद व्याकरण के पूर्वसर्ग (Prepositions) हमें भाषा में महत्वपूर्ण न लगें और हम उन्हें नज़रंदाज़ कर देते हों, परन्तु वे बात के अर्थ में बहुत अन्तर ला सकते हैं। उदाहरण के लिये "में" और "के लिये" को ही लीजिये। पौलुस प्रेरित ने लिखा "हर बात में धन्यवाद करो" (१ थिसुलुनीकियों ५:१८), इसका यह अर्थ नहीं है कि हर बात के लिये धन्यवाद करो। किसी दूसरे के गलत निर्णयों या चुनावों से उत्पन्न परिस्थितियों के लिये हमें धन्यवादी होने की आवश्यक्ता नहीं है, परन्तु उन परिस्थितियों में भी हम परमेश्वर के धन्यवादी रह सकते हैं, क्योंकि वह उनसे होने वाली कठिनाइयों को भी हमारे लिये भलाई में बदल सकता है।

पौलुस द्वारा फिलेमौन को लिखे पत्र में यह दिखता है। पौलुस के साथ बन्दीगृह में एक भगोड़ा दास उनेसिमुस था। पौलुस को इस बुरी परिस्थिति के लिये धन्यवादी होने की आवश्यक्ता नहीं थी: किंतु फिर भी उसका पत्र धन्यवाद से भरा हुआ है, क्योंकि वह देख पा रहा था कि परमेश्वर उसके कष्ट को भलाई के लिये उपयोग कर रहा है। पौलुस के साथ रहकर बन्दीगृह के कष्ट झेलते हुए, उनेसिमुस अब केवल एक भगोड़ा दास नहीं रह गया था, वरन उसके और मण्डली के लिये वह प्रभु में प्रीय भाई बन गया था (पद १६)।

इस बात पर भरोसा रखना कि परमेश्वर हर बात को भले के लिये उपयोग कर सकता है, हर परिस्थिति में उसके प्रति धन्यवादी होने के लिये काफी है।

कठिन और कष्टदायक परिस्थितियों में भी परमेश्वर के प्रति धन्यवादी होना एक छोटी सी बात है जिसके बड़े परिणाम होते हैं। - जूली ऐकरमैन लिंक


परमेश्वर ने हमें जीवन की आंधियों से परे रखने का वायदा नहीं किया, वरन उन आंधियों में स्वयं हमारे साथ बने रहकर हमारी रक्षा करने का वायदा अवश्य किया है।

हर बात में धन्यवाद करो - १ थिसुलुनीकियों ५:१८


बाइबल पाठ: फिलेमौन १:४-१६

मैं तेरे उस प्रेम और विश्वास की चर्चा सुनकर, जो सब पवित्र लोगों के साथ और प्रभु यीशु पर है।
सदा परमेश्वर का धन्यवाद करता हूं, और अपनी प्रार्थनाओं में भी तुझे स्मरण करता हूं।
कि तेरा विश्वास में सहभागी होना तुम्हारी सारी भलाई की पहिचान में मसीह के लिये प्रभावशाली हो।
क्‍योंकि हे भाई, मुझे तेरे प्रेम से बहुत आनन्‍द और शान्‍ति मिली, इसलिये, कि तेरे द्वारा पवित्र लोगों के मन हरे भरे हो गए हैं।
इसलिये यद्यपि मुझे मसीह में बड़ा हियाव तो है, कि जो बात ठीक है, उस की आज्ञा तुझे दूं।
तौभी मुझ बूढ़े पौलुस को जो अब मसीह यीशु के लिये कैदी हूं, यह और भी भला जान पड़ा कि प्रेम से बिनती करूं।
मैं अपने बच्‍चे उनेसिमुस के लिये जो मुझ से मेरी कैद में जन्मा है तुझ से बिनती करता हूं।
वह तो पहिले तेरे कुछ काम का न था, पर अब तेरे और मेरे दोनों के बड़े काम का है।
उसी को अर्थात जो मेरे ह्रृदय का टुकड़ा है, मैं ने उसे तेरे पास लौटा दिया है।
उसे मैं अपने ही पास रखना चाहता था कि तेरी ओर से इस कैद में जो सुसमाचार के कारण हैं, मेरी सेवा करे।
पर मैं ने तेरी इच्‍छा बिना कुछ भी करना न चाहा कि तेरी यह कृपा दबाव से नहीं पर आनन्‍द से हो।
क्‍योंकि क्‍या जाने वह तुझ से कुछ दिन तक के लिये इसी कारण अलग हुआ कि सदैव तेरे निकट रहे।
परन्‍तु अब से दास की नाई नहीं, बरन दास से भी उत्तम, अर्थात भाई के समान रहे जो शरीर में भी और विशेष कर प्रभु में भी मेरा प्रिय हो।

एक साल में बाइबल:
  • यशायाह ३९, ४०
  • कुलुस्सियों ४

सोमवार, 11 अक्टूबर 2010

पठनी और करनी

एक चर्च के पास्टर से उसके चर्च के एक सदस्य ने बड़े गुस्से से पूछा "पास्टर, 'Our Daily Bread' पुस्तिकाएं कहां हैं?" मसीही भक्ति और शिक्षाओं की इन छोटी पुस्तकों का नया संसकरण अभी चर्च के बाहर के हॉल में नहीं रखा गया था, जिसके कारण इस व्यक्ति ने पास्टर से यह दुर्व्यवहार किया, यद्यपि यह पास्टर की ज़िम्मेदारी नहीं थी कि वह इन पुस्तिकाओं को रखे और वितरित करे। उसके इस व्यवहार से पास्टर दुखित हुआ।

जब मुझे इस घटना का पता चला तो परिस्थिति के विरोधाभास से मैं खिन्न हुआ। इन पुस्तिकाओं का उद्देश्य मसीही चरित्र और परमेश्वर के अनुग्रह में लोगों को बढ़ाना है। और जो मसीही विश्वासी इन पुस्तिकाओं को पढ़ते हैं, हम आशा रखते हैं कि वे आत्मिक जीवन की परिपक्वता की ओर अग्रसर हैं, जिससे, जैसे पौलुस कहता है, "इसलिये परमेश्वर के चुने हुओं की नाईं जो पवित्र और प्रिय हैं, बड़ी करूणा, और भलाई, और दीनता, और नम्रता, और सहनशीलता धारण करो" (कुलुस्सियों ३:१२)।

हमारे आत्मिक अनुशासन - परमेश्वर के वचन को और उसके साथ दिये गए सन्देश को पढ़ना, प्रार्थना और आराधना करना, अपने आप में बात का अन्त नहीं होने चाहिये, वरन ये वे माध्यम होने चाहियें जिनके द्वारा हम मसीह की समानता, परमेश्वर की निकटता और आत्मिक जीवन की परिपक्वता में बढ़ते जाते हैं। हम केवल वचन पढ़ने वाले न हों वरन " मसीह के वचन को अपके हृदय में अधिकाई से बसने दो" (कुलुस्सियों ३:१६) और यह वचन हमारे जीवन के हर पहलु और हमारे व्यवहार में संसार को दिखाई दे। - डेव ब्रैनन


बाइबल पढ़ना का उद्देश्य केवल ज्ञान अर्जित करना नहीं है, उसका वास्तविक उद्देश्य हमारे मन का परमेश्वर की ओर परिवर्तन है।

इसलिये परमेश्वर के चुने हुओं की नाईं जो पवित्र और प्रिय हैं, बड़ी करूणा, और भलाई, और दीनता, और नम्रता, और सहनशीलता धारण करो। - कुलुस्सियों ३:१२


बाइबल पाठ: कुलुस्सियों ३:१२-१७

इसलिये परमेश्वर के चुने हुओं की नाईं जो पवित्र और प्रिय हैं, बड़ी करूणा, और भलाई, और दीनता, और नम्रता, और सहनशीलता धारण करो।
और यदि किसी को किसी पर दोष देने को कोई कारण हो, तो एक दूसरे की सह लो, और एक दूसरे के अपराध क्षमा करो: जैसे प्रभु ने तुम्हारे अपराध क्षमा किए, वैसे ही तुम भी करो।
और इन सब के ऊपर प्रेम को जो सिद्धता का कटिबन्‍ध है बान्‍ध लो।
और मसीह की शान्‍ति जिस के लिये तुम एक देह होकर बुलाए भी गए हो, तुम्हारे हृदय में राज्य करे, और तुम धन्यवादी बने रहो।
मसीह के वचन को अपने ह्रृदय में अधिकाई से बसने दो; और सिद्ध ज्ञान सहित एक दूसरे को सिखाओ, और चिताओ, और अपने अपने मन में अनुग्रह के साथ परमेश्वर के लिये भजन और स्‍तुतिगान और आत्मिक गीत गाओ।
और वचन से या काम से जो कुछ भी करो सब प्रभु यीशु के नाम से करो, और उसके द्वारा परमेश्वर पिता का धन्यवाद करो।

एक साल में बाइबल:
  • यशायाह ३७, ३८
  • कुलुस्सियों ३

रविवार, 10 अक्टूबर 2010

सत्य पर कायम रहना

अमेरिका में बीसवीं सदी के आरंभ में प्रचलित रंगभेद की पृष्ठभूमि पर लिखित उपन्यास "To Kill a Mockingbird" का एक पात्र, एटिकस फिन्च, १९३० के दशक में दक्षिण अमेरिका के एक छोटे शहर में एक प्रतिष्ठित वकील है। उसे एक मुकद्दमा लड़ना होता है जिसमें एक काले रंगे वाले इमान्दार और सीधे साधे व्यक्ति के विरुद्ध दो कुटिल और बेईमान गोरे खड़े होते हैं। एटिकस जानता है कि उसे पंचों से बहुत पक्षपात का सामना करना पड़ेगा, लेकिन उसका विवेक उसे बाध्य करता है कि कठोर प्रतिरोध के बावजूद वह सत्य को निडरता से साथ प्रस्तुत करे और सत्य पर कायम रहे।

बाइबल के पुराने नियम में भी परमेश्वर ने ढीट और कठोर मन वाली अपनी प्रजा के पास अपने नबी भेजे ताकि वे उन्हें सत्य को बताएं "तौभी उस ने उनके पास नबी भेजे कि उनको यहोवा के पास फेर लाएं, और इन्होंने उन्हें चिता दिया, परन्तु उन्होंने कान न लगाया" (२ इतिहास २४:१९)। सत्य के अपने सन्देश के कारण उन नबीओं को बहुत सताव का सामना करना पड़ा और कई मारे भी गए (इब्रानियों ११:३२-३८)।

प्रभु यीशु की पृथ्वी की सेवकाई के समय भी उसे सत्य पर कायम रहने और सत्य का प्रचार करने के कारण लोगों के क्रोध और बैर का सामना करना पड़ा "ये बातें सुनते ही जितने आराधनालय में थे, सब क्रोध से भर गए। और उठकर उसे नगर से बाहर निकाला, और जिस पहाड़ पर उन का नगर बसा हुआ या, उस की चोटी पर ले चले, कि उसे वहां से नीचे गिरा दें। पर वह उन के बीच में से निकलकर चला गया" (लूका ४:२८-३०)। परन्तु परमेश्वर ने अपनी सार्वभौमिकता में, संसार के हाकिमों द्वारा घोर अन्याय से सत्य पर कायम प्रभु यीशु को क्रूस की मृत्यु दिये जाने को ही समस्त संसार के लिये पापों से मुक्ति पाने और उद्धार का मार्ग बना दिया!

अब, इस संसार में, जीवित प्रभु के प्रतिनिधी होने के कारण उसके अनुयाइयों को यह ज़िम्मेवारी सौंपी गई है कि वे संसार को प्रभु के मार्ग का प्रचार करें तथा न्याय, ईमानदारी और आपसी मेल मिलाप को बढ़ावा दें (मती २८:१८-२०, मीका ६:८, २ कुरिन्थियों ५:१८-२१)। ऐसा करने के लिये उन्हें कई दफा कठोर प्रतिरोध के समक्ष सत्य पर कायम रहना पड़ेगा, और उसकी कीमत चुकानी पड़ेगी (२ तिमुथियुस ३:१२)। सत्य पर कायम रहना और सत्य का प्रचार करना, प्रत्येक मसीही विश्वासी को दी गई ज़िम्मेवारी है, जिसे उन्हें तब तक निभाना है जब तक प्रभु दोबारा आकर सब कुछ ठीक ठाक न कर दे (प्रकाशितवाक्य २०:११-१५)। - डेनिस फिशर


सत्य को दबाकर या छुपाकर संसार में स्थान बनाने की जाने की बजाए, सत्य पर बने रहने के लिये संसार द्वारा तिरिस्कृत होना कहीं बेहतर है।

तौभी उस ने उनके पास नबी भेजे कि उनको यहोवा के पास फेर लाएं, और इन्होंने उन्हें चिता दिया, परन्तु उन्होंने कान न लगाया। - २ इतिहास २४:१९


बाइबल पाठ: २ इतिहास २४:१५-२२

परन्तु यहोयादा बूढ़ा हो गया और दीर्घायु होकर मर गया। जब वह मर गया तब एक सौ तीस वर्ष का था।
और दाऊदपुर में राजाओं के बीच उसको मिट्टी दी गई, क्योंकि उस ने इस्राएल में और परमेश्वर के और उसके भवन के विषय में भला किया था।
यहोयादा के मरने के बाद यहूदा के हाकिमों ने राजा के पास जाकर उसे दणडवत की, और राजा ने उनकी मानी।
तब वे अपने पितरों के परमेश्वर यहोवा का भवन छोड़कर अशेरों और मूरतों की उपासना करने लगे। सो उनके ऐसे दोषी होने के कारण परमेश्वर का क्रोध यहूदा और यरूशलेम पर भड़का।
तौभी उस ने उनके पास नबी भेजे कि उनको यहोवा के पास फेर लाएं, और इन्होंने उन्हें चिता दिया, परन्तु उन्होंने कान न लगाया।
और परमेश्वर का आत्मा यहोयादा याजक के पुत्र जकर्याह में समा गया, और वह ऊंचे स्थान पर खड़ा होकर लोगों से कहने लगा, परमेश्वर यों कहता है, कि तुम यहोवा की आज्ञाओं को क्यों टालते हो? ऐसा करके तुम भाग्यवान नहीं हो सकते, देखो, तुम ने तो यहोवा को त्याग दिया है, इस कारण उस ने भी तुम को त्याग दिया।
तब लोगों ने उस से द्रोह की गोष्ठी करके, राजा की आज्ञा से यहोवा के भवन के आंगन में उसको पत्थरवाह किया।
यों राजा योआश ने वह प्रीति भूलकर जो यहोयादा ने उस से की थी, उसके पुत्र को घात किया। और मरते समय उस ने कहा यहोवा इस पर दृष्टि करके इसका लेखा ले।

एक साल में बाइबल:
  • यशायाह ३४-३६
  • कुलुस्सियों २

शनिवार, 9 अक्टूबर 2010

आँसुओं के लिये खेद?

मेरी एक सहेली अपने जीवन में एक बड़ा परिवर्तन कर रही थी - ५० वर्ष से जिसके लिये वह कार्य करती रही, उसे छोड़कर अब वह एक नए काम के लिये जा रही थी। अपने सहकर्मियों से विदा लेते समय वह रोती भी जा रही थी और अपने आँसुओं के लिये क्षमा भी मांगती जा रही थी।

अपने आँसुओं के लिये हम कभी कभी खेदित क्यों होते हैं? शायद हम आँसुओं को कमज़ोरी की निशानी और हमारे चरित्र में किसी बात के लिये असहाय होने का सूचक मानते हैं और अपनी कमज़ोरी को लोगों के सामने लाना नहीं चाहते। या, हो सकता हो कि हमें लगता है कि हमारे आँसु दूसरों को दुखी कर रहे हैं इसलिये हम उनसे क्षमा मांगते हैं।

हमें स्मरण रखना चाहिये कि हमारी भावनाएं हमें परमेश्वर द्वारा दी गई हैं, हम उसके स्वरूप में सृजे गए हैं (उत्पत्ति १:२७)। परमेश्वर भी खेदित होता है, दुखी होता है - उत्पत्ति ६:६, ७ में बताया है कि वह अपने लोगों के पापों और उनके कारण जो उसमें और लोगों में विच्छेद आया, उससे वह दुखी और क्रोधित हुआ। देहधारी परमेश्वर, प्रभु यीशु, अपने मित्रों मरियम और मार्था के साथ उनके भाई लाज़र की मृत्यु पर शोकित हुआ, उसकी आत्मा दुखी हुई और इस दुख में वह सबके सामने रोया भी (यूहन्ना ११:२८-४४), किंतु अपने दुख के खुले प्रगटिकरण के लिये उसने किसी से क्षमा नहीं मांगी।

जब अन्ततः हम स्वर्ग पहुंचेंगे, तो वहां कोई दुख, वियोग या दर्द नहीं होगा। परमेश्वर हमारी आँखों से सब आँसु पोंछ डालेगा (प्रकाशितवाक्य २१:४); लेकिन तब तक जो आँसु बहते हैं उनके लिये खेदित होने और क्षमा मांगने की आवश्यक्ता नहीं है। - एनी सेटास


जब मन में सन्देह उठे कि क्या प्रभु यीशु मेरी परवाह करता है, तो उसके आँसुओं को स्मरण करना।

जब यीशु ने उस को और उन यहूदियों को जो उसके साथ आए थे रोते हुए देखा, तो आत्मा में बहुत ही उदास हुआ - यूहन्ना ११:३३


बाइबल पाठ: यूहन्ना ११:३२-४४

जब मरियम वहां पहुंची जहां यीशु था, तो उसे देखते ही उसके पांवों पर गिर के कहा, हे प्रभु, यदि तू यहां होता तो मेरा भाई न मरता।
जब यीशु ने उस को और उन यहूदियों को जो उसके साथ आए थे रोते हुए देखा, तो आत्मा में बहुत ही उदास हुआ, और घबरा कर कहा, तुम ने उसे कहां रखा है?
उन्‍होंने उस से कहा, हे प्रभु, चलकर देख ले।
यीशु के आंसू बहने लगे।
तब यहूदी कहने लगे, देखो, वह उस से कैसी प्रीति रखता था।
परन्‍तु उन में से कितनों ने कहा, क्‍या यह जिस ने अन्‍धे की आंखें खोली, यह भी न कर सका कि यह मनुष्य न मरता?
यीशु मन में फिर बहुत ही उदास होकर कब्र पर आया, वह एक गुफा थी, और एक पत्थर उस पर धरा था।
यीशु ने कहा पत्थर को उठाओ: उस मरे हुए की बहिन मार्था उस से कहने लगी, हे प्रभु, उस में से अब तो र्दुगंध आती है क्‍योंकि उसे मरे चार दिन हो गए।
यीशु ने उस से कहा, क्‍या मैं ने तुझ से न कहा कि यदि तू विश्वास करेगी, तो परमेश्वर की महिमा को देखेगी।
तब उन्‍होंने उस पत्थर को हटाया, फिर यीशु ने आंखें उठाकर कहा, हे पिता, मैं तेरा धन्यवाद करता हूं कि तू ने मेरी सुन ली है।
और मै जानता था, कि तू सदा मेरी सुनता है, परन्‍तु जो भीड़ आस पास खड़ी है, उन के कारण मैं ने यह कहा, जिस से कि वे विश्वास करें, कि तू ने मुझे भेजा है।
यह कहकर उस ने बड़े शब्‍द से पुकारा, कि हे लाजर, निकल आ।
जो मर गया या, वह कफन से हाथ पांव बन्‍धे हुए निकल आया और उसका मुंह अंगोछे से लिपटा हुआ था और यीशु ने उन से कहा, उसे खोलकर जाने दो।

एक साल में बाइबल:
  • यशायाह ३२, ३३
  • कुलुस्सियों १

शुक्रवार, 8 अक्टूबर 2010

प्रभु की बुलाहट

मैं सोचता हूँ कि उस प्रातः झील के किनारे, अवश्य प्रभु के चेलों ने प्रभु के साथ अपने प्रथम अनुभव को पुनःअनुभव किया होगा। यूहन्ना अध्याय २१ में प्रभु और चेलों की एक घटना दी गई है। अपनी परिस्थितियों और हाल की घटनाओं से निराश और विचिलित होकर कुछ चेलों ने प्रभु के पीछे चलने की बजाए, वापस अपने पुराने जिविका कमाने के तरीके पर लौटने का निर्णय किया। वे पहले मछुआरे थे, और अब फिर मछलीयां पकड़ने निकल पड़े। वे सारी रात मेहनत करते रहे पर कुछ भी हाथ न लगा।

भोर के समय झील के किनारे से किसी ने उन से कहा "नाव की दाहिनी ओर जाल डालो, तो पाओगे, तब उन्‍होंने जाल डाला, और अब मछिलयों की बहुतायत के कारण उसे खींच न सके" (यूहन्ना २१:६)। तब उन्होंने पहचान लिया कि बात करने वाल प्रभु यीशु ही था। निसन्देह उनका ध्यान प्रभु यीशु से हुई उनकी पहले की एक मुलाकात की ओर गया होगा; तब भी प्रभु ने रात भर की असफल मेहनत के बाद ऐसे ही मछलियां पकड़ने का आशचर्यकर्म उनके जीवन में किया था, और फिर उन्हें आमंत्रण दिया कि वे अपने जाल और नाव छोड़कर उसके पीछे हो लें (लूका ५:१-११)।

उन चेलों के समान, जब हम प्रभु के साथ के अपने सफर में निराशाओं में घिरने लगते हैं और हमें कुछ मार्ग नहीं सूझ पड़ता, तो स्वाभाविक प्रतिक्रीया होती है कि वापस अपनी पुरानी ज़िन्दगी कि ओर लौट चलें और अपने मार्ग खुद तलाश करें। ऐसे में फिर से प्रभु अपना अनुग्रह और क्षमा लिये हमारे समीप आकर हमें बुलाता है, अपनी विश्वासयोग्यता और अपनी सामर्थ को फिर हमारे सम्मुख लाता है, प्रभु के साथ हमारे पिछले अनुभवों को स्मरण दिलाता है और फिर से हमें उस सेवकाई के लिये जिसके लिये उसने हमें बुलाया था तैयार करके खड़ा करता है।

उसकी बुलाहट, सामर्थ और संगति हमारे साथ सदा बनी रहती है। - जो स्टोवैल


प्रभु यीशु हमें अपने साथ चलने के लिये बुलाता है और जब आवश्यक होता है उस बुलाहट को दोहराता है।

इन
बातों के बाद यीशु ने अपने आप को तिबिरियास झील के किनारे चेलों पर प्रगट किया और इस रीति से प्रगट किया। - यूहन्ना २१:१

बाइबल पाठ: यूहन्ना २१:१-१४

इन बातों के बाद यीशु ने अपने आप को तिबिरियास झील के किनारे चेलों पर प्रगट किया और इस रीति से प्रगट किया।
शमौन पतरस और थोमा जो दिदुमुस कहलाता है, और गलील के काना नगर का नतनएल और जब्‍दी के पुत्र, और उसके चेलों में से दो और जन इकट्ठे थे।
शमौन पतरस ने उन से कहा, मैं मछली पकड़ने जाता हूं: उन्‍होंने उस से कहा, हम भी तेरे साथ चलते हैं: सो वे निकलकर नाव पर चढ़े, परन्‍तु उस रात कुछ न पकड़ा।
भोर होते ही यीशु किनारे पर खड़ा हुआ, तौभी चेलों ने न पहचाना कि यह यीशु है।
तब यीशु ने उन से कहा, हे बालको, क्‍या तुम्हारे पास कुछ खाने को है? उन्‍होंने उत्तर दिया कि नहीं।
उस ने उन से कहा, नाव की दाहिनी ओर जाल डालो, तो पाओगे, तब उन्‍होंने जाल डाला, और अब मछिलयों की बहुतायत के कारण उसे खींच न सके।
इसलिये उस चेले ने जिस से यीशु प्रेम रखता था पतरस से कहा, यह तो प्रभु है: शमौन पतरस ने यह सुनकर कि प्रभु है, कमर में अंगरखा कस लिया, क्‍योंकि वह नंगा था, और झील में कूद पड़ा।
परन्‍तु और चेले डोंगी पर मछिलयों से भरा हुआ जाल खींचते हुए आए, क्‍योंकि वे किनारे से अधिक दूर नहीं, कोई दो सौ हाथ पर थे।
जब किनारे पर उतरे, तो उन्‍होंने कोएले की आग, और उस पर मछली रखी हुई, और रोटी देखी।
यीशु ने उन से कहा, जो मछिलयां तुम ने अभी पकड़ी हैं, उन में से कुछ लाओ।
शमौन पतरस ने डोंगी पर चढ़कर एक सौ तिर्पन बड़ी मछिलयों से भरा हुआ जाल किनारे पर खींचा, और इतनी मछिलयां होने पर भी जाल न फटा।
यीशु ने उन से कहा, कि आओ, भोजन करो और चेलों में से किसी को हियाव न हुआ, कि उस से पूछे, कि तू कौन है?
यीशु आया, और रोटी लेकर उन्‍हें दी, और वैसे ही मछली भी।
यह तीसरी बार है, कि यीशु ने मरे हुओं में से जी उठने के बाद चेलों को दर्शन दिए।

एक साल में बाइबल:
  • यशायाह ३०, ३१
  • फिलिप्पियों ४

गुरुवार, 7 अक्टूबर 2010

आपसी समझ

किसी भी आदमी के लिये अपनी पत्नि से प्रेम रखने का सर्वोत्तम तरीका है उसे समझना। पतरस ने कहा, अनिवार्य है कि "...हे पतियों, तुम भी बुद्धिमानी से पत्‍नियों के साथ जीवन निर्वाह करो..." (१ पतरस ३:७)।

यह सिद्धांत दोनो पक्षों पर लागू होता है। पति भी चाहते हैं कि पत्नियां उन्हें समझें। वास्तव में हम सब ऐसा चाहते हैं, चाहे हम शादीशुदा हों या नहीं। प्रत्येक व्यक्ति चाहता है कि उससे संबंधित लोग उसे भली भांति समझ सकें। हम इस इच्छा के साथ पैदा होते हैं और यह जीवन भर हमारे साथ बनी रहती है।

किसी के लिये हमारा यह कहना कि मैं उसे नहीं समझ पा रहा हूँ, बात टालने का सूचक है। अगर चाहें तो हम दूसरे को समझ सकते हैं और हमें समझना भी है। इसके लिये आवश्यक है उस व्यक्ति के प्रति धैर्य और उसके लिये समय निकालना। जब हम समय लगाकर, धैर्य के साथ दूसरे की सुनने को तैयार हों, बातों को स्पष्ट करने के लिये उससे विनम्रता के साथ बात करने और उसकी बातों को महत्व देने को तैयार हों, तो यह संभव हो सकता है - यह बस इतना ही सरल अथवा कठिन है! कोई भी व्यक्ति किसी दूसरे के हृदय की गहराईयों को पूरी तरह चाहे नहीं समझ पाए, परन्तु उसके बारे में प्रतिदिन कुछ नया ज़रूर सीख सकता है। नीतिवचन के ज्ञानी लेखक ने कहा "जिसके पास बुद्धि है, उसके लिये वह जीवन का सोता है..." (नीतिवचन १६:२२)।

आज ही परमेश्वर से प्रार्थना में मांगें कि वह आपको यह अनुग्रह दे कि आप अपने जीवन से संबंधित लोगों के लिये समय निकल सकें, उनको समझ सकें। - डेविड रोपर


सुनना, समझने के लिये खुला द्वार है।

मनुष्य के मन की युक्ति अथाह तो है, तौभी समझ वाला मनुष्य उसको निकाल लेता है। - नीतिवचन २०:५


बाइबल पाठ: नीतिवचन १६:१६-२२

बुद्धि की प्राप्ति चोखे सोने से क्या ही उत्तम है! और समझ की प्राप्ति चान्दी से अति योग्य है।
बुराई से हटना सीधे लोगों के लिये राजमार्ग है, जो अपने चालचलन की चौकसी करता, वह अपने प्राण की भी रक्षा करता है।
विनाश से पहिले गर्व, और ठोकर खाने से पहले घमण्ड होता है।
घमण्डियों के संग लूट बांट लेने से, दीन लोगों के संग नम्र भाव से रहना उत्तम है।
जो वचन पर मन लगाता, वह कल्याण पाता है, और जो यहोवा पर भरोसा रखता, वह धन्य होता है।
जिसके हृदय में बुद्धि है, वह समझ वाला कहलाता है, और मधुर वाणी के द्वारा ज्ञान बढ़ता है।
जिसके पास बुद्धि है, उसके लिये वह जीवन का सोता है, परन्तु मूढ़ों को शिक्षा देना मूढ़ता ही होती है।

एक साल में बाइबल:
  • यशायाह २८, २९
  • फिलिप्पियों ३