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सोमवार, 16 दिसंबर 2013

परिणाम


   आहा, सुअर का जीवन! हर दिन का बस एक ही काम - कीचड़ और गन्दगी में लोटते रहना, भोजन भी गन्दगी से ही निकालना और फिर मस्त होकर आवाज़ें निकालना; वाह, क्या जीवन है!

   क्या आपको ऐसा जीवन अच्छा लगेगा? नहीं, कदापि नहीं। और उस उड़ाऊ पुत्र को भी अच्छा नहीं लगा, इसीलिए ऐसे जीवन में आते ही उसे अपना पिछला समय स्मरण हो आया, जब अपने पिता के घर में उसके पास अच्छा स्थान, साफ बिस्तर, पिता का प्रेम, अच्छा भोजन और एक सुरक्षित सुखद भविष्य था। लेकिन तब उस के लिए यह सब पर्याप्त नहीं था, उसे तो मौज-मस्ती करने की स्वतंत्रता चाहिए थी; वह मनमानी करना चाहता था, अपना जीवन को स्वयं निर्धारित करना चाहता था, और उसने ऐसा किया, लेकिन थोड़े समय की मौज मस्ती के बाद अन्ततः परिणाम क्या निकला - सूअरों के साथ रहना और उनके भोजन को भी तरसना। तब उसे अपने पिता और अपने घर की याद आई, वहाँ की बातों की कीमत पता चली।

   जब भी कोई जवान परमेश्वर के भय में चलने वाले माता-पिता के मार्गदर्शन और परमेश्वर के वचन बाइबल के निर्देशों की अवहेलना करता है, तो परिणामस्वरूप कुछ ऐसे ही नतीजे उसे भोगने पड़ते हैं। मुझे सदा ही आश्चर्य होता है जब कोई प्रभु यीशु को जानने का दावा तो करता है लेकिन जीवन शैली ऐसी रखता है जो परमेश्वर के वचन की शिक्षाओं के विपरीत है। चाहे उसके चुनाव यौन संबंधों के अथवा नशीले पदर्थों के सेवन से संबंधित पाप हों; चाहे वह बिना मेहनत किए निठले बैठे बैठे ही दूसरों के सहारे जीवन बिताना चाहता हो या फिर अन्य किसी रीति से बाइबल के निर्देशों की अवहेलना करे - जो भी निर्णय परमेश्वर और उसके वचन के प्रतिकूल होगा, अन्ततः उसका परिणाम बुरा और दुखद ही होगा।

   यदि हम बाइबल की स्पष्ट नैतिक शिक्षाओं तथा परमेश्वर के साथ अपने संबंध को नज़रन्दाज़ करेंगे, तो अपने लिए परेशानी ही उत्पन्न करेंगे। जिस जवान व्यक्ति की बात से हमने आरंभ किया था, जब वह पश्चाताप के साथ अपने पिता के पास लौट आया, तो उसे ना केवल क्षमा मिली वरन उसे वह सब कुछ भी वापस मिल गया जिसे छोड़ कर वह संसार में चला गया था।

   ज़रा अपने बारे में विचार कीजिए - संसार की लालसाओं और अभिलाषाओं की प्राप्ति के लिए कहीं आप भी परमेश्वर की अवाज्ञाकारिता तो नहीं कर रहे हैं? क्या परमेश्वर के साथ आपके संबंध ठीक बने हुए हैं? यदि नहीं, तो अब अवसर है, पश्चाताप के साथ लौट आईए और प्रभु यीशु से पापों की क्षमा माँग लीजिए तथा अपने जीवन की कमान उसे सौंप दीजिए, अन्यथा परिणाम अति कष्टदायक और भयानक होगा। - डेव ब्रैनन


यदि पाप इतना छली ना होता तो इतना लुभावना भी नहीं होता।

क्योंकि यदि तुम शरीर के अनुसार दिन काटोगे, तो मरोगे, यदि आत्मा से देह की क्रीयाओं को मारोगे, तो जीवित रहोगे। - रोमियों 8:13

बाइबल पाठ: लूका 15:11-24
Luke 15:11 फिर उसने कहा, किसी मनुष्य के दो पुत्र थे। 
Luke 15:12 उन में से छुटके ने पिता से कहा कि हे पिता संपत्ति में से जो भाग मेरा हो, वह मुझे दे दीजिए। उसने उन को अपनी संपत्ति बांट दी। 
Luke 15:13 और बहुत दिन न बीते थे कि छुटका पुत्र सब कुछ इकट्ठा कर के एक दूर देश को चला गया और वहां कुकर्म में अपनी संपत्ति उड़ा दी। 
Luke 15:14 जब वह सब कुछ खर्च कर चुका, तो उस देश में बड़ा अकाल पड़ा, और वह कंगाल हो गया। 
Luke 15:15 और वह उस देश के निवासियों में से एक के यहां जा पड़ा: उसने उसे अपने खेतों में सूअर चराने के लिये भेजा। 
Luke 15:16 और वह चाहता था, कि उन फलियों से जिन्हें सूअर खाते थे अपना पेट भरे; और उसे कोई कुछ नहीं देता था। 
Luke 15:17 जब वह अपने आपे में आया, तब कहने लगा, कि मेरे पिता के कितने ही मजदूरों को भोजन से अधिक रोटी मिलती है, और मैं यहां भूखा मर रहा हूं। 
Luke 15:18 मैं अब उठ कर अपने पिता के पास जाऊंगा और उस से कहूंगा कि पिता जी मैं ने स्वर्ग के विरोध में और तेरी दृष्टि में पाप किया है। 
Luke 15:19 अब इस योग्य नहीं रहा कि तेरा पुत्र कहलाऊं, मुझे अपने एक मजदूर की नाईं रख ले। 
Luke 15:20 तब वह उठ कर, अपने पिता के पास चला: वह अभी दूर ही था, कि उसके पिता ने उसे देखकर तरस खाया, और दौड़कर उसे गले लगाया, और बहुत चूमा। 
Luke 15:21 पुत्र ने उस से कहा; पिता जी, मैं ने स्वर्ग के विरोध में और तेरी दृष्टि में पाप किया है; और अब इस योग्य नहीं रहा, कि तेरा पुत्र कहलाऊं। 
Luke 15:22 परन्तु पिता ने अपने दासों से कहा; फट अच्‍छे से अच्छा वस्‍त्र निकाल कर उसे पहिनाओ, और उसके हाथ में अंगूठी, और पांवों में जूतियां पहिनाओ। 
Luke 15:23 और पला हुआ बछड़ा लाकर मारो ताकि हम खांए और आनन्द मनावें। 
Luke 15:24 क्योंकि मेरा यह पुत्र मर गया था, फिर जी गया है: खो गया था, अब मिल गया है: और वे आनन्द करने लगे।

एक साल में बाइबल: 
  • अमोस 4-6 
  • प्रकाशितवाक्य 7


रविवार, 15 दिसंबर 2013

सहायक भूमिका


   अमेरिका के टी.वी. कलाकार एड मैकमोहन की सन 2009 में हुई मृत्योप्रांत एक समाचार पत्र में उनके प्रति व्यक्त श्रद्धांजलि में लिखा गया, एक सहायक के रूप में कार्य करने में वह नायक से भी उत्तम थे। एड मैकमोहन की ख्याति उनके 30 वर्ष के कार्यकाल में देर रात्रि प्रसारित होने वाले जॉनी कार्सन के कार्यक्रम में जॉनी के सहायक के रूप में सबसे अधिक थी। एड जॉनी के सहायक के रूप में जॉनी को सफलता की सीढ़ीयां चढ़ाने में सदा उनके उत्तम सहयोगी रहे थे। जबकि अधिकांश कलाकार अपने लिए महत्वपूर्ण भूमिकाएं पाने की चेष्टा में लगे रहते हैं, एड सहायक भूमिका में ही संतुष्ट थे।

   जब प्रेरित पौलुस ने निर्देश दिए कि प्रभु यीशु की मण्डली में मण्डली के सदस्यों को परमेश्वर से मिले आत्मिक वरदानों को किस प्रकार उपयोग करना है, तो उसने सब को एक दूसरे का सहायक और पूरक होने को कहा (रोमियों 12:3-8)। उसने अपने इस निर्देश के आरंभ में समझाया कि हम सबको अपनी वस्तविक स्थिति की पहचान रखनी चाहिए (पद 3), और निर्देश का अन्त यह कहते हुए किया: "भाईचारे के प्रेम से एक दूसरे पर दया रखो; परस्पर आदर करने में एक दूसरे से बढ़ चलो" (रोमियों 12:10); या, जैसे बाइबल शिक्षक और अनुवादक जे.बी. फिलिप ने अन्तिम वाक्यांश का अनुवाद किया, "...दूसरों को श्रेय देने को तत्पर रहो"।

   हमारे आत्मिक वरदान हमें परमेश्वर से मिले उपहार हैं जो उसने हमारी किसी योग्यता या सामर्थ के अनुसार नहीं वरन अपने बड़े अनुग्रह में होकर अपनी इच्छा के अनुसार हमें दिए हैं, और हमें इन्हें अपनी इच्छा के अनुसार या अपने स्वार्थ के लिए नहीं वरन प्रेम और विश्वास के साथ मसीह यीशु की सेवा के लिए प्रयोग करना है।

   परमेश्वर हम पर अनुग्रह करे कि हम उससे मिलने वाली सभी सहायक भूमिकाओं को भी उत्साह और समर्पण के साथ उसकी महिमा और उसके गौरव के लिए निभाने वाले बन सकें और तब परमेश्वर हमें अपने समय और रीति से स्वतः ही आदर का पात्र बना देगा (1 पतरस 5:6)। - डेविड मैक्कैसलैंड


मसीह की मण्डली सर्वोत्तम रीति से तब ही कार्य सकती है जब सब उसके सदस्य दर्श्क नहीं वरन परस्पर सहयोगी हो कर कार्य करने वाले बनें।

इसलिये परमेश्वर के बलवन्‍त हाथ के नीचे दीनता से रहो, जिस से वह तुम्हें उचित समय पर बढ़ाए। - 1 पतरस 5:6 

बाइबल पाठ: रोमियों 12:9-21
Romans 12:9 प्रेम निष्कपट हो; बुराई से घृणा करो; भलाई मे लगे रहो। 
Romans 12:10 भाईचारे के प्रेम से एक दूसरे पर दया रखो; परस्पर आदर करने में एक दूसरे से बढ़ चलो। 
Romans 12:11 प्रयत्न करने में आलसी न हो; आत्मिक उन्माद में भरो रहो; प्रभु की सेवा करते रहो। 
Romans 12:12 आशा मे आनन्दित रहो; क्लेश मे स्थिर रहो; प्रार्थना में नित्य लगे रहो। 
Romans 12:13 पवित्र लोगों को जो कुछ अवश्य हो, उस में उन की सहायता करो; पहुनाई करने में लगे रहो। 
Romans 12:14 अपने सताने वालों को आशीष दो; आशीष दो श्राप न दो। 
Romans 12:15 आनन्द करने वालों के साथ आनन्द करो; और रोने वालों के साथ रोओ। 
Romans 12:16 आपस में एक सा मन रखो; अभिमानी न हो; परन्तु दीनों के साथ संगति रखो; अपनी दृष्टि में बुद्धिमान न हो। 
Romans 12:17 बुराई के बदले किसी से बुराई न करो; जो बातें सब लोगों के निकट भली हैं, उन की चिन्ता किया करो। 
Romans 12:18 जहां तक हो सके, तुम अपने भरसक सब मनुष्यों के साथ मेल मिलाप रखो। 
Romans 12:19 हे प्रियो अपना पलटा न लेना; परन्तु क्रोध को अवसर दो, क्योंकि लिखा है, पलटा लेना मेरा काम है, प्रभु कहता है मैं ही बदला दूंगा। 
Romans 12:20 परन्तु यदि तेरा बैरी भूखा हो तो उसे खाना खिला; यदि प्यासा हो, तो उसे पानी पिला; क्योंकि ऐसा करने से तू उसके सिर पर आग के अंगारों का ढेर लगाएगा। 
Romans 12:21 बुराई से न हारो परन्तु भलाई से बुराई का जीत लो।

एक साल में बाइबल: 
  • अमोस 1-3 
  • प्रकाशितवाक्य 6


शनिवार, 14 दिसंबर 2013

परमेश्वर का महान कार्य


   जब मैं 5 वर्ष का हुआ तो मेरे पिता ने मेरे लिए एक बूढ़ी लाल घोड़ी खरीद कर दी, जिसकी देखभाल करना मेरी ज़िम्मेदारी हो गई। मैंने उसका नाम डिक्सी रख दिया। मेरे छोटे कद और छोटी उम्र के कारण डिक्सी मेरे लिए एक बड़ी समस्या थी। डिक्सी मोटी थी और मैं छोटा। कोई काठी या रकाब या जीन ऐसी नहीं थी जिसे डिक्सी पर लगाने के बाद मैं उस पर आराम से बैठ सकूँ क्योंकि मेरे पाँव उन तक पहुँचते ही नहीं थे, वरन डिक्सी के मोटापे के कारण मेरे पाँव बाहर की ओर निकले रहते थे। इस कारण मुझे डिक्सी की सवारी बिना जीन-काठी बांधे ही करनी पड़ती थी, जिससे मैं अकसर फिसल कर गिर जाता था। लेकिन डिक्सी में एक बहुत अच्छा गुण था, जब भी मैं गिर जाता डिक्सी वहीं ठहर जाती और मुझे देखने लगती और बड़े धीरज के साथ प्रतीक्षा करती रहती जब तक कि मैं किसी प्रकार वापस उस की पीठ पर चढ़कर बैठ नहीं जाता।

   लेकिन मैं डिक्सी के प्रति वैसा ही धीरजवन्त नहीं रह पाता था, लेकिन फिर भी वो मेरी बचकाना हरकतों को बड़े धीरज से सहती रहती और कभी पलट कर मुझे परेशान नहीं करती थी। मैं सोचता हूँ, क्या ही अच्छा होता यदि मैं डिक्सी के समान धीरजवन्त हो कर अनेक प्रकार के प्रतिकूल व्यवहार को शान्ति से झेलने वाली बन सकता। डिक्सी का व्यवहार मुझे अपने आप से पूछने पर मजबूर करता है कि जब लोग मुझे क्रोधित करते हैं तो मैं उनके प्रति कैसी प्रतिक्रिया देता हूँ? क्या मेरी प्रतिक्रिया परमेश्वर के वचन बाइबल की शिक्षानुसार दीनता, नम्रता और धीरज के साथ (कुलुस्सियों 3:12) या फिर असहिशुणता तथा क्रोध के साथ होती है?

   प्रभु यीशु से मिली पापों की क्षमा और उद्धार के द्वारा ही मुझे परमेश्वर से सामर्थ मिली है कि मैं प्रभु यीशु की शिक्षानुसार मेरे प्रति किए गए अपराधों के लिए सहिशुण और उन अपराध करने वालों को 7 के 70 गुणा बार क्षमा कर सकूँ; मानवीय कमज़ोरियाँ एवं असफलताओं को बर्दाशत कर सकूँ; मुझे भड़काने तथा क्रोधित करने वालों के प्रति दया और करुणा दिखा सकूँ। यह सब कर सकने की सामर्थ मेरी अपनी कभी नहीं थी और ना हो सकती थी; यह सारी सामर्थ तो मुझे प्रभु यीशु में हो कर परमेश्वर से मिली है; यह मेरे जीवन हुआ परमेश्वर ही का महान कार्य है।

   क्या आप ने अपने जीवन में परमेश्वर के इस महान कार्य को हो लेने दिया है? - डेविड रोपर


जो प्रेम कलवरी के क्रूस से निकलता है वह सब सहन करता है, सब क्षमा करता है।

और उस की महिमा की शक्ति के अनुसार सब प्रकार की सामर्थ से बलवन्‍त होते जाओ, यहां तक कि आनन्द के साथ हर प्रकार से धीरज और सहनशीलता दिखा सको। - कुलुस्सियों 1:11

बाइबल पाठ: कुलुस्सियों 3:12-17
Colossians 3:12 इसलिये परमेश्वर के चुने हुओं की नाईं जो पवित्र और प्रिय हैं, बड़ी करूणा, और भलाई, और दीनता, और नम्रता, और सहनशीलता धारण करो। 
Colossians 3:13 और यदि किसी को किसी पर दोष देने को कोई कारण हो, तो एक दूसरे की सह लो, और एक दूसरे के अपराध क्षमा करो: जैसे प्रभु ने तुम्हारे अपराध क्षमा किए, वैसे ही तुम भी करो। 
Colossians 3:14 और इन सब के ऊपर प्रेम को जो सिद्धता का कटिबन्‍ध है बान्‍ध लो। 
Colossians 3:15 और मसीह की शान्‍ति जिस के लिये तुम एक देह हो कर बुलाए भी गए हो, तुम्हारे हृदय में राज्य करे, और तुम धन्यवादी बने रहो। 
Colossians 3:16 मसीह के वचन को अपने हृदय में अधिकाई से बसने दो; और सिद्ध ज्ञान सहित एक दूसरे को सिखाओ, और चिताओ, और अपने अपने मन में अनुग्रह के साथ परमेश्वर के लिये भजन और स्‍तुतिगान और आत्मिक गीत गाओ। 
Colossians 3:17 और वचन से या काम से जो कुछ भी करो सब प्रभु यीशु के नाम से करो, और उसके द्वारा परमेश्वर पिता का धन्यवाद करो।

एक साल में बाइबल: 
  • योएल 1-3 
  • प्रकाशितवाक्य 5


शुक्रवार, 13 दिसंबर 2013

मुफ्त भोजन


   कॉलेज के छात्रों के पास पैसे की कमी अकसर होती है, इसलिए वे पैसा बचाने के प्रत्येक अवसर का भरपूरी से उपयोग करते हैं; तभी यदि किसी सभा में मुफ्त भोजन विज्ञापित किया गया हो तो छात्र वहाँ अवश्य आ जाते हैं। यदि किसी कम्पनी को नए कर्मचारी नियुक्त करने होते हैं तो वह कॉलेज में आयोजित अपनी कंपनी तथा वहाँ उपलब्ध नियुक्तियों की जानकारी देने वाली सभा के अन्त में मुफ्त पीट्ज़ा का प्रचार अवश्य करती है, जिससे छात्र सभा में उपस्थित रहने के लिए आकर्षित हों। कुछ छात्र तो इस मुफ्त मिलने वाले पीट्ज़ा के कारण एक के बाद एक, अनेक ऐसी सभाओं मे पहुँच जाते हैं; उनके लिए वर्तमान में मिलने वाला मुफ्त भोजन भविष्य के लिए उपयोगी नौकरी से अधिक महत्वपूर्ण होता है।

   प्रभु यीशु ने 5000 से अधिक की भीड़ को चम्तकारी रीति से भोजन खिलाया, और उसके अगले दिन बहुत से लोग प्रभु यीशु को ढूंढने निकल पड़े (यूहन्ना 6:10-11, 24-25)। प्रभु उनकी मनशा जानता था और उसने उनसे स्पष्ट कहा: "यीशु ने उन्हें उत्तर दिया, कि मैं तुम से सच सच कहता हूं, तुम मुझे इसलिये नहीं ढूंढ़ते हो कि तुम ने अचम्भित काम देखे, परन्तु इसलिये कि तुम रोटियां खाकर तृप्‍त हुए" (यूहन्ना 6:26)। उन लोगों के लिए प्रभु यीशु से मिलने वाली पापों की क्षमा, उद्धार और अनन्त आशीष के जीवन से अधिक महत्वपूर्ण था वह मुफ्त का भोजन जिसकी लालसा वे प्रभु यीशु से रखते थे। प्रभु यीशु ने उनसे कहा कि, "...जीवन की रोटी मैं हूं: जो मेरे पास आएगा वह कभी भूखा न होगा और जो मुझ पर विश्वास करेगा, वह कभी प्यासा न होगा" (यूहन्ना 6:35)। कुछ ने तो उसपर इस बात के लिए विश्वास किया परन्तु बहुतेरों ने नहीं किया और उससे विवाद करने लगे, फिर अन्ततः उसे छोड़ कर चले गए (पद 66), क्योंकि वे प्रभु यीशु से मुफ्त भोजन तो चाहते थे परन्तु प्रभु को नहीं चाहते थे और ना ही उसके अनुयायी होना चाहते थे।

   प्रभु यीशु आज भी संसार के सभी लोगों को अपने पास बुला रहा है, नाशमान मुफ्त भोजन देने के लिए नहीं वरन प्रभु यीशु में मिलने वाली पापों की क्षमा से प्राप्त होने वाला अनन्त काल की स्वर्गीय आशीष से परिपूर्ण उद्धार पाया हुआ जीवन। आप प्रभु यीशु से क्या चाहते हैं - नाशमान पार्थिव आवश्यकताओं की पूर्ति या अनन्त अविनाशी आशीषें और बेबयान शान्ति? - ऐनी सेटास


केवल जीवन की रोटी प्रभु यीशु ही आत्मा की भूख को मिटा सकता है।

नाशमान भोजन के लिये परिश्रम न करो, परन्तु उस भोजन के लिये जो अनन्त जीवन तक ठहरता है, जिसे मनुष्य का पुत्र तुम्हें देगा, क्योंकि पिता, अर्थात परमेश्वर ने उसी पर छाप कर दी है। - यूहन्ना 6:27 

बाइबल पाठ: यूहन्ना 6:26-41
John 6:26 यीशु ने उन्हें उत्तर दिया, कि मैं तुम से सच सच कहता हूं, तुम मुझे इसलिये नहीं ढूंढ़ते हो कि तुम ने अचम्भित काम देखे, परन्तु इसलिये कि तुम रोटियां खाकर तृप्‍त हुए। 
John 6:27 नाशमान भोजन के लिये परिश्रम न करो, परन्तु उस भोजन के लिये जो अनन्त जीवन तक ठहरता है, जिसे मनुष्य का पुत्र तुम्हें देगा, क्योंकि पिता, अर्थात परमेश्वर ने उसी पर छाप कर दी है। 
John 6:28 उन्होंने उस से कहा, परमेश्वर के कार्य करने के लिये हम क्या करें? 
John 6:29 यीशु ने उन्हें उत्तर दिया; परमेश्वर का कार्य यह है, कि तुम उस पर, जिसे उसने भेजा है, विश्वास करो। 
John 6:30 तब उन्होंने उस से कहा, फिर तू कौन का चिन्ह दिखाता है कि हम उसे देखकर तेरी प्रतीति करें, तू कौन सा काम दिखाता है? 
John 6:31 हमारे बाप दादों ने जंगल में मन्ना खाया; जैसा लिखा है; कि उसने उन्हें खाने के लिये स्वर्ग से रोटी दी। 
John 6:32 यीशु ने उन से कहा, मैं तुम से सच सच कहता हूं कि मूसा ने तुम्हें वह रोटी स्वर्ग से न दी, परन्तु मेरा पिता तुम्हें सच्ची रोटी स्वर्ग से देता है। 
John 6:33 क्योंकि परमेश्वर की रोटी वही है, जो स्वर्ग से उतरकर जगत को जीवन देती है। 
John 6:34 तब उन्होंने उस से कहा, हे प्रभु, यह रोटी हमें सर्वदा दिया कर। 
John 6:35 यीशु ने उन से कहा, जीवन की रोटी मैं हूं: जो मेरे पास आएगा वह कभी भूखा न होगा और जो मुझ पर विश्वास करेगा, वह कभी प्यासा न होगा। 
John 6:36 परन्तु मैं ने तुम से कहा, कि तुम ने मुझे देख भी लिया है, तोभी विश्वास नहीं करते। 
John 6:37 जो कुछ पिता मुझे देता है वह सब मेरे पास आएगा, उसे मैं कभी न निकालूंगा। 
John 6:38 क्योंकि मैं अपनी इच्छा नहीं, वरन अपने भेजने वाले की इच्छा पूरी करने के लिये स्वर्ग से उतरा हूं।
John 6:39 और मेरे भेजने वाले की इच्छा यह है कि जो कुछ उसने मुझे दिया है, उस में से मैं कुछ न खोऊं परन्तु उसे अंतिम दिन फिर जिला उठाऊं। 
John 6:40 क्योंकि मेरे पिता की इच्छा यह है, कि जो कोई पुत्र को देखे, और उस पर विश्वास करे, वह अनन्त जीवन पाए; और मैं उसे अंतिम दिन फिर जिला उठाऊंगा। 
John 6:41 सो यहूदी उस पर कुड़कुड़ाने लगे, इसलिये कि उसने कहा था; कि जो रोटी स्वर्ग से उतरी, वह मैं हूं।

एक साल में बाइबल: 
  • होशे 12-14 
  • प्रकाशितवाक्य 4


गुरुवार, 12 दिसंबर 2013

प्रत्यक्ष परिवर्तन


   हाल ही एक हवाई यात्रा के दौरान एक विमान परिचारक ने मुझ से पूछा कि क्या मैं अकसर हवाई यात्रा करता हूँ; और मैंने उत्तर दिया हाँ। तब उसने फिर मुझ से पूछा, क्या आपने पिछले कुछ महीनों में ध्यान किया है कि हवाई यात्रा करने वाले कुछ अधिक आक्रमक और ज़बर्दस्ती करने वाले होते जा रहे हैं? मैंने थोड़ा सा विचार कर के उस से इस बात में सहमति जताई, और हम उन बातों के बारे में बात करने लगे जिन के कारण लोग ऐसा करने लगे हैं - जैसे कि हवाई अड्डों पर बढ़ी हुई सुरक्षा और उससे होने वाली परेशानी, हवाई यात्रा का महंगा और यात्रा में मिलने वाली सुविधाओं का कम होते चले जाना, यात्रा करने में सामान्यता होने वाली असंतुष्टता आदि। हम यह बातें कर ही रहे थे कि, मानो हमारे वार्तालाप की सच्चाई को प्रमाणित करने के लिए, एक यात्री ने बहस आरंभ कर दी क्योंकि वह अपनी निर्धारित सीट पर नहीं वरन किसी दूसरे की सीट पर बैठना चाहता था क्योंकि वह दूसरी सीट उसे अधिक अच्छी लग रही थी।

   जब कभी हमारा सामना क्रोध और आवेश में उत्तेजित किसी जन से होता है तो हम मसीही विश्वासियों के पास अवसर होता है कि हम, अपने प्रभु के समान, शांति लाने वाले बन सकें। प्रेरित पौलुस ने रोम की मसीही मण्डली को लिखी अपनी पत्री में उन्हें लिखा: "जहां तक हो सके, तुम अपने भरसक सब मनुष्यों के साथ मेल मिलाप रखो" (रोमियों 12:18)। इस का क्या अर्थ है? इसका एक अर्थ तो यह हो सकता है कि जो कुछ हम नियंत्रित कर सकते हैं उसे नियंत्रित कर के रखें। हम दूसरों के व्यवहार को निर्धारित नहीं कर सकते, लेकिन अपने प्रत्युत्तर को अवश्य निर्धारित कर सकते हैं।

   जब कभी हम क्रोधपूर्ण और आक्रमक व्यवहार अपने आस-पास प्रदर्शित होते हुए देखते हैं, तो उसके प्रति अनुग्रह और शान्ति के व्यवहार द्वारा अपने तथा समस्त संसार के उद्धारकर्ता तथा शान्ति के राजकुमार प्रभु यीशु के चरित्र एवं व्यवहार को अपने जीवन से प्रदर्शित कर सकते हैं। यही वे अवसर होते हैं जब पाप के प्रभाव के कारण आक्रोश और असंतोष से भरा यह संसार उद्धारकर्ता प्रभु यीशु के बारे में व्यावाहरिक रीति से जान सकता है और प्रभु से प्राप्त होने वाले उद्धार द्वारा जीवन में आए परिवर्तन को प्रत्यक्ष देख सकता है। - बिल क्राउडर


आज संसार को वह शान्ति चाहिए जो प्रत्येक गलतफहमी के दुष्प्रभाव पर जयवन्त है।

सब से मेल मिलाप रखने, और उस पवित्रता के खोजी हो जिस के बिना कोई प्रभु को कदापि न देखेगा। - इब्रानियों 12:14

बाइबल पाठ: फिलिप्पियों 4:4-9
Philippians 4:4 प्रभु में सदा आनन्‍दित रहो; मैं फिर कहता हूं, आनन्‍दित रहो। 
Philippians 4:5 तुम्हारी कोमलता सब मनुष्यों पर प्रगट हो: प्रभु निकट है। 
Philippians 4:6 किसी भी बात की चिन्‍ता मत करो: परन्तु हर एक बात में तुम्हारे निवेदन, प्रार्थना और बिनती के द्वारा धन्यवाद के साथ परमेश्वर के सम्मुख अपस्थित किए जाएं। 
Philippians 4:7 तब परमेश्वर की शान्‍ति, जो समझ से बिलकुल परे है, तुम्हारे हृदय और तुम्हारे विचारों को मसीह यीशु में सुरिक्षत रखेगी।
Philippians 4:8 निदान, हे भाइयों, जो जो बातें सत्य हैं, और जो जो बातें आदरणीय हैं, और जो जो बातें उचित हैं, और जो जो बातें पवित्र हैं, और जो जो बातें सुहावनी हैं, और जो जो बातें मनभावनी हैं, निदान, जो जो सदगुण और प्रशंसा की बातें हैं, उन्‍हीं पर ध्यान लगाया करो। 
Philippians 4:9 जो बातें तुम ने मुझ से सीखीं, और ग्रहण की, और सुनी, और मुझ में देखीं, उन्‍हीं का पालन किया करो, तब परमेश्वर जो शान्‍ति का सोता है तुम्हारे साथ रहेगा।

एक साल में बाइबल: 
  • होशे 9-11 
  • प्रकाशितवाक्य 3


बुधवार, 11 दिसंबर 2013

अर्थपूर्ण


   एक लोकप्रीय वाक्य है जिसे मैं अकसर टी-शर्ट्स पर छपा हुआ तथा कला एवं सजावट की वस्तुओं पर लिखा हुआ देखती हूँ; वह वाक्य है: "हमारे जीवन का मूल्याँकन हमारी साँसों की गिनती से नहीं वरन उन बातों से है जो हमें विस्मय से साँस रोक लेने पर बाध्य कर देती हैं।" यह वाक्य आकर्षक तो है लेकिन मेरा मानना है कि यह सत्य नहीं है।

   यदि हम जीवन का मूल्याँकन केवल उन ही बातों के आधार पर करेंगे जो हमारे लिए विस्मयकारी हैं तो फिर हम सामान्य और साधारण पलों के महत्व को खो देंगे। सामान्य बातें जैसे खाना, सोना, साँस लेना आदि ऐसी हैं जिन्हें हम बिना विचार किए लगातार करते रहते हैं; लेकिन वे "सामान्य" या महत्वहीन नहीं है। हमारा हर साँस लेना, भोजन का प्रत्येक कौर लेना आदि सब बहुत विशेष और अद्भुत कार्य हैं - यह हमें तब समझ आता है जब हम या तो इनकी बारीकियों का अध्ययन करें या फिर तब, जब किसी कारणवश अचानक ही इनमें से कोई बाधित होने लगे अथवा रुक जाए। वास्त्व में प्रत्येक साँस लेना, विस्मय में आकर साँस रोक लेने से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।

   राजा सुलेमान के पास विस्मय करने के बहुत ढेर अवसर रहे होंगे, क्योंकि उसने अपने लिए लिखा: "और जितनी वस्तुओं के देखने की मैं ने लालसा की, उन सभों को देखने से मैं न रूका; मैं ने अपना मन किसी प्रकार का आनन्द भोगने से न रोका क्योंकि मेरा मन मेरे सब परिश्रम के कारण आनन्दित हुआ; और मेरे सब परिश्रम से मुझे यही भाग मिला" (सभोपदेशक 2:10)। लेकिन अन्ततः उसका निष्कर्ष इन सब के बारे में था कि "...सब कुछ व्यर्थ और वायु को पकड़ना है" (सभोपदेशक 2:17)।

   सुलेमान का अनुभव हमें स्मरण दिलाता है कि "सामान्य" बातों में आनन्द ढूंढना और आनन्दित होना महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे वास्तव में अद्भुत होती हैं। बड़ा सदा ही बेहतर नहीं होता; अधिक हमेशा उन्नत नहीं होता और हमारा व्यस्त रहना हमें अधिक महत्वपूर्ण नहीं बना देता। बजाए विस्मयकारी क्षणों को ढूंढने में समय बिताने के, हमें हर क्षण और हर साँस को परमेश्वर से मिले उपहार के रूप में स्वीकार करके उसका परमेश्वर की महिमा और आदर के लिए भरपूर उपयोग करना चाहिए, उसे अर्थपूर्ण बना लेना चाहिए; और यह हमारे जीवन को भी अर्थपूर्ण कर देगा। - जूली ऐकैरमैन लिंक


प्रत्येक साँस का सुचारू रीति से लेना विस्मय में साँस रोक लेने से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।

जिस परमेश्वर ने पृथ्वी और उस की सब वस्‍तुओं को बनाया, वह स्वर्ग और पृथ्वी का स्‍वामी हो कर हाथ के बनाए हुए मन्‍दिरों में नहीं रहता। न किसी वस्तु का प्रयोजन रखकर मनुष्यों के हाथों की सेवा लेता है, क्योंकि वह तो आप ही सब को जीवन और स्‍वास और सब कुछ देता है। - प्रेरितों 17:24-25

बाइबल पाठ: सभोपदेशक 1:1-18
Ecclesiastes 1:1 यरूशलेम के राजा, दाऊद के पुत्र और उपदेशक के वचन। 
Ecclesiastes 1:2 उपदेशक का यह वचन है, कि व्यर्थ ही व्यर्थ, व्यर्थ ही व्यर्थ! सब कुछ व्यर्थ है। 
Ecclesiastes 1:3 उस सब परिश्रम से जिसे मनुष्य धरती पर करता है, उसको क्या लाभ प्राप्त होता है? 
Ecclesiastes 1:4 एक पीढ़ी जाती है, और दूसरी पीढ़ी आती है, परन्तु पृथ्वी सर्वदा बनी रहती है। 
Ecclesiastes 1:5 सूर्य उदय हो कर अस्त भी होता है, और अपने उदय की दिशा को वेग से चला जाता है। 
Ecclesiastes 1:6 वायु दक्खिन की ओर बहती है, और उत्तर की ओर घूमती जाती है; वह घूमती और बहती रहती है, और अपने चक्करों में लौट आती है। 
Ecclesiastes 1:7 सब नदियां समुद्र में जा मिलती हैं, तौभी समुद्र भर नहीं जाता; जिस स्थान से नदियां निकलती हैं; उधर ही को वे फिर जाती हैं। 
Ecclesiastes 1:8 सब बातें परिश्रम से भरी हैं; मनुष्य इसका वर्णन नहीं कर सकता; न तो आंखें देखने से तृप्त होती हैं, और न कान सुनने से भरते हैं। 
Ecclesiastes 1:9 जो कुछ हुआ था, वही फिर होगा, और जो कुछ बन चुका है वही फिर बनाया जाएगा; और सूर्य के नीचे कोई बात नई नहीं है। 
Ecclesiastes 1:10 क्या ऐसी कोई बात है जिसके विषय में लोग कह सकें कि देख यह नई है? यह तो प्राचीन युगों में वर्तमान थी। 
Ecclesiastes 1:11 प्राचीन बातों का कुछ स्मरण नहीं रहा, और होने वाली बातों का भी स्मरण उनके बाद होने वालों को न रहेगा।
Ecclesiastes 1:12 मैं उपदेशक यरूशलेम में इस्राएल का राजा था। 
Ecclesiastes 1:13 और मैं ने अपना मन लगाया कि जो कुछ सूर्य के नीचे किया जाता है, उसका भेद बुद्धि से सोच सोचकर मालूम करूं; यह बड़े दु:ख का काम है जो परमेश्वर ने मनुष्यों के लिये ठहराया है कि वे उस में लगें। 
Ecclesiastes 1:14 मैं ने उन सब कामों को देखा जो सूर्य के नीचे किए जाते हैं; देखो वे सब व्यर्थ और मानो वायु को पकड़ना है। 
Ecclesiastes 1:15 जो टेढ़ा है, वह सीधा नहीं हो सकता, और जितनी वस्तुओं में घटी है, वे गिनी नहीं जातीं।
Ecclesiastes 1:16 मैं ने मन में कहा, देख, जितने यरूशलेम में मुझ से पहिले थे, उन सभों से मैं ने बहुत अधिक बुद्धि प्राप्त की है; और मुझ को बहुत बुद्धि और ज्ञान मिल गया है। 
Ecclesiastes 1:17 और मैं ने अपना मन लगाया कि बुद्धि का भेद लूं और बावलेपन और मूर्खता को भी जान लूं। मुझे जान पड़ा कि यह भी वायु को पकड़ना है।
Ecclesiastes 1:18 क्योंकि बहुत बुद्धि के साथ बहुत खेद भी होता है, और जो अपना ज्ञान बढ़ाता है वह अपना दु:ख भी बढ़ाता है।

एक साल में बाइबल: 
  • होशे 5-8 
  • प्रकाशितवाक्य 2


मंगलवार, 10 दिसंबर 2013

जोखिम


   प्रभु यीशु के जन्म के वृतांत में उनके सांसारिक पिता यूसुफ का भी उल्लेख आता है, लेकिन उनके जन्म से संबंधित घटनाओं के पश्चात यूसुफ के बारे फिर बहुत कम ही मिलता है। हम इससे यह निषकर्ष निकाल सकते हैं कि प्रभु यीशु के मानवीय जीवन के संदर्भ में युसुफ कोई महत्वपूर्ण पात्र नहीं था; उसकी आवश्यकता केवल प्रभु यीशु के दाऊद के घराने से होने को प्रमाणित करने के लिए थी। लेकिन यह धारणा रखना सही नहीं है।

   युसुफ की भूमिका प्रभु यीशु के जन्म के वृतांत में सामरिक रीति से बहुत महत्वपूर्ण है। यूसुफ की मंगेतर, मरियम, के गर्भवती होने की बात पता चलने के बाद से ही यूसुफ चिंतित था और मरियम को चुपचाप छोड़ देने पर गंभीरता से विचार कर रहा था। ऐसे में जब परमेश्वर की ओर से भेजे गए स्वर्गदूत ने उससे मरियम को अपने घर ले आने को कहा (मत्ती 1:20), तो यह युसुफ के लिए एक बहुत महत्वपूर्ण फैसला था। यदि यूसुफ स्वर्ग्दूत की बात को मानने से इंकार कर देता, तो मानवीय दृष्टिकोण से, प्रभु यीशु के जन्म का पूरा घटनाक्रम बड़े जोखिम में पड़ जाता। लेकिन मरियम को अपनी पत्नि स्वीकार कर के घरअ ले आना भी जोखिम से बाहर नहीं था। यदि वह यीशु का पिता होना स्वीकार करता तो वह एक झूठ के साथ समझौता करता और यहूदी व्यवस्था को तोड़ने वाला ठहरता; यदि वह पिता होने से इन्कार करता तो समाज से बहुत बदनामी मिलना स्वाभाविक था। आज हम सब को यूसुफ का आभारी और धन्यवादी होना चाहिए कि उसने अपनी बदनामी और अपने विचारों की परवाह किए बैगैर परमेश्वर की योजना का एक भाग बनना स्वीकार किया और परमेश्वर का आज्ञाकारी रहा। परिणामस्वरूप उसे अब अनन्त काल के लिए परमेश्वर के वचन में उसे प्रभु यीशु का सांसारिक पिता होने का आदर प्राप्त है और उसकी इस आज्ञाकारिता कि चर्चा और प्रशंसा सदा होती रहती है।

   संसार के प्रनुख लोगों की तुलना में, संसार के घटनाक्रम में, हम में से अधिकांशतः की भूमिका बहुत छोटी या फिर नगण्य है। लेकिन हम में से प्रत्येक से परमेश्वर अपने प्रति आज्ञाकारी रहने की आशा रखता है। अनेक बार परमेश्वर की यह आज्ञाकारिता हमें बहुत जोखिम भरी या फिर अनावश्यक लग सकती है। लेकिन केवल परमेश्वर ही जानता है उस आज्ञाकारिता में होकर वह हमें किन आशीशों से परिपूर्ण करना चाहता है। परमेश्वर सदा अपने बच्चों के लिए केवल भलाई ही की योजनाएं बनाता है, चाहे वह भलाई अभी दिखाई दे या ना दे; क्या मैं और आप उसकी आज्ञाकारिता में जोखिम उठाने और उन आशीशों को पाने को तैयार हैं? - जो स्टोवैल


परमेश्वर पर भरोसा रखना और उसके आजाकारी रहना कोई छोटी बात नहीं है।

धन्य है वह मनुष्य, जो परीक्षा में स्थिर रहता है; क्योंकि वह खरा निकल कर जीवन का वह मुकुट पाएगा, जिस की प्रतिज्ञा प्रभु ने अपने प्रेम करने वालों को दी है। - याकूब 1:12

बाइबल पाठ: मत्ती 1:18-25
Matthew 1:18 अब यीशु मसीह का जन्म इस प्रकार से हुआ, कि जब उस की माता मरियम की मंगनी यूसुफ के साथ हो गई, तो उन के इकट्ठे होने के पहिले से वह पवित्र आत्मा की ओर से गर्भवती पाई गई। 
Matthew 1:19 सो उसके पति यूसुफ ने जो धर्मी था और उसे बदनाम करना नहीं चाहता था, उसे चुपके से त्याग देने की मनसा की। 
Matthew 1:20 जब वह इन बातों के सोच ही में था तो प्रभु का स्वर्गदूत उसे स्‍वप्‍न में दिखाई देकर कहने लगा; हे यूसुफ दाऊद की सन्तान, तू अपनी पत्‍नी मरियम को अपने यहां ले आने से मत डर; क्योंकि जो उसके गर्भ में है, वह पवित्र आत्मा की ओर से है। 
Matthew 1:21 वह पुत्र जनेगी और तू उसका नाम यीशु रखना; क्योंकि वह अपने लोगों का उन के पापों से उद्धार करेगा। 
Matthew 1:22 यह सब कुछ इसलिये हुआ कि जो वचन प्रभु ने भविष्यद्वक्ता के द्वारा कहा था; वह पूरा हो। 
Matthew 1:23 कि, देखो एक कुंवारी गर्भवती होगी और एक पुत्र जनेगी और उसका नाम इम्मानुएल रखा जाएगा जिस का अर्थ यह है “ परमेश्वर हमारे साथ”। 
Matthew 1:24 सो यूसुफ नींद से जागकर प्रभु के दूत की आज्ञा अनुसार अपनी पत्‍नी को अपने यहां ले आया। 
Matthew 1:25 और जब तक वह पुत्र न जनी तब तक वह उसके पास न गया: और उसने उसका नाम यीशु रखा।

एक साल में बाइबल: 
  • होशे 1-4 
  • प्रकाशितवाक्य 1