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रविवार, 22 अगस्त 2021

परमेश्वर का वचन – बाइबल – और विज्ञान – 10


बाइबल और जीव-विज्ञान -

       इस शीर्षक के अंतर्गत पिछले दो लेखों में हम देख चुके हैं कि किस प्रकार से सारे संसार भर के ऊंचे पर्वतों की ऊंचाइयों पर पाए जाने वाले जल-जंतुओं के जीवाश्म (fossils) विद्यमान हैं, किन्तु थल के जंतुओं के जीवाश्म वहाँ विद्यमान नहीं हैं। यह तथा कुछ अन्य प्रश्न कि कब और कैसे रासायनिक एवं भौतिक क्रियाओं (chemical and physical reactions) द्वारा बने पदार्थों मेंजीवनआया; जीवन क्या है; और मृत्यु के समय शरीर से ऐसा क्या चला जाता है जिससे शरीर मृत कहा जाता है जबकि उसी मृत शरीर से लिए गए अंग, किसी अन्य में प्रत्यारोपित करके उस दूसरे शरीर के जीवन को बचाया जा सकता है, आदि - क्रमिक विकासवाद (evolution) के मानने वालों के लिए बड़ा और बिना समाधान का सिरदर्द बने हुए हैं, और उनके पास इनका कोई संतोषजनक उत्तर, वास्तव में कोई उत्तर ही नहीं है।

       क्रमिक विकासवाद का दावा है कि समय के साथ, जीव-जंतुओं में होनी वाली आकस्मिक क्रियाएं उन्हें धीरे-धीरे विकसित करती चली गईं; कुछ आकस्मिक रीति से बने विशिष्ट रासायनिक पदार्थों के स्वतः ही आकस्मिक रीति से एकत्रित होने से उन्होंने आरंभिक अपक्क (crude) जीवों का रूप लिया, और फिर इसी आकस्मिक, अनियोजित, अनियंत्रित (sudden, unorganised, uncontrolled) क्रियाओं के होते चले जाने से वे अपक्क जीव उन्नत होते चले गए और अन्ततः इस वर्तमान स्वरूप में आ गए जैसे हम आज उन्हें देखते हैं। हम पिछले लेख में देख चुके हैं कि किसी भी उत्पाद के बनाए जाने में प्रयोग की जाने वाली रासायनिक क्रियाओं को कितनी बारीकी और ध्यान से नियोजित, नियंत्रित, और संचालित (plan and control) करना पड़ता है, अन्यथा कभी भी कोई भी दुर्घटना हो सकती है, सारी प्रक्रिया खराब हो सकती है। असमंजस की बात तो यह है कि कितने ही वैज्ञानिक और बुद्धिजीवी जो जीव-जंतुओं में होने वाली क्रियाओं से बहुत कम जटिल पदार्थों का उत्पादन करने वाली इन क्रियाओं को स्वयं योजनाबद्ध तरीकों से नियंत्रित और संचालित करते हैं, उन्हें यह स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं होता है कि जीव-जंतुओं में होने और उन्हें उन्नत करने वाली ये क्रियाएं स्वतः ही अनियोजित और बिना नियंत्रण अथवा संचालन के संभव होती चली गईं!

साथ ही क्रमिक विकासवाद का यह भी दावा है कि यह उन्नत होते चले जाने की प्रक्रिया आज भी ज़ारी है, किन्तु क्योंकि यह बहुत धीमी और अप्रत्यक्ष है, इसलिए हमें दिखाई नहीं देती है।बहुतसमय के बाद मनुष्यों तथा अन्य जीव-जंतुओं में होने वाली यहउन्नतिदिखाई देगी। चलिए एक बार को, केवल तर्क के लिए, उनके इस स्पष्टीकरण को मान लेते हैं। यह एक साधारण समझ और सामान्य-ज्ञान की बात है कि किसी भी स्वतः ही होने वाली अनियोजित, अनियंत्रित, असंचालित क्रिया द्वारा, तुलनात्मक रीति से, चल रही प्रक्रिया को बाधित करने वाले या उसमें हानि उत्पन्न करने वाले कार्य अधिक, किन्तु लाभ उत्पन्न करने वाले कार्य कम ही मात्रा में होंगे। इसलिए संसार भर में सभी स्थानों पर ऐसे अविकसित और अपक्क जीव-जंतुओं के जीवाश्म बहुतायत से बिखरे हुए होने चाहिएं जिन में ये स्वतः होने वाली आकस्मिक, अनियोजित, अनियंत्रित, असंचालित क्रियाएं कुछ ऐसे परिवर्तन ले आईं जो उन्हें फिर जीवित नहीं रख सके या जिनसे उनकी आयु घट गई और वे बिना और उन्नत हुए शीघ्र ही समाप्त हो गए। यदि क्रमिक विकासवाद का यह सिद्धांत सही है, तो एक से दूसरी प्रजाति की ओर विकसित होते जाने वाले अपूर्ण जंतुओं के जीवाश्म भी बहुतायत से, पूर्ण जंतुओं के जीवाश्मों से अधिक, होने चाहिएँ, क्योंकि धीरे-धीरे एक पूर्णतः विकसित से दूसरी पूर्णतः विकसित प्रजाति में परिवर्तित होने में उन जंतुओं को अनेकों अपूर्ण, अपक्क स्वरूपों से होकर निकालना पड़ेगा। 

     किन्तु, इसके विपरीत, न केवल संसार भर में बहुत कम स्थानों में जीवाश्म पाए जाते हैं, और उन स्थानों पर पाए जाने वाले जीवाश्मों की संख्या भी अधिक नहीं होती है; वरन जो जीवाश्म पाए भी जाते हैं, वे पूर्णतः विकसित और सटीक जीवित रह सकने वाले जंतुओं के होते हैं। आज तक कभी कोई पूर्णतः अविकसित या अपक्क जन्तु का जीवाश्म नहीं मिला है, और न ही एक से दूसरी प्रजाति में परिवर्तित होते जा रहे किसी जन्तु का जीवाश्म मिला है। अपनी इस हताशा और कुंठा को छुपाने के लिए कुछ तथाकथितवैज्ञानिकोंने ऐसे अपूर्ण और अपक्क जीवाश्म स्वयं बनाकर संसार के सामने उनकी खोज का दावा करा है, जिनमें बंदरों और मनुष्यों के मध्य की कड़ी माने जाने वाले पिल्टडाउन मैन (Piltdown Man) के मानव निर्मित होने की बात जानी-मानी है (https://en.wikipedia.org/wiki/Piltdown_Man)। ऐसा ही एक प्रसिद्ध जीवाश्म है रेंगने वाले सरीसृप (reptiles) और पक्षियों के मध्य के जीव आर्कियोपटेरिक्स का जीवाश्म, जिसे पहले एकमध्य-कड़ीका जीवाश्म माना जाता था, किन्तु अब उसे, तथा अन्य स्थानों पर उसके समान जंतुओं के जीवाश्मों को अपने आप में पूर्णतः विकसित एक प्रकार के थोड़ा सा उड़ पाने वाले डायनोसौर की प्रजाति स्वीकार किया गया है (https://www.nationalgeographic.com/science/article/archaeopteryx-flight-dinosaurs-birds-paleontology-science)। 

      आज लोगविज्ञानके नाम पर ऐसी असंभव और काल्पनिक बातों को तो सहज स्वीकार करने को तैयार हैं किन्तु हजारों वर्ष पूर्व लिखी गई परमेश्वर के वचन बाइबल की बात, “फिर परमेश्वर ने कहा, पृथ्वी से एक एक जाति के जीवित प्राणी, अर्थात घरेलू पशु, और रेंगने वाले जन्तु, और पृथ्वी के वन-पशु, जाति जाति के अनुसार उत्पन्न हों; और वैसा ही हो गया” (उत्पत्ति 1:24) को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं; यद्यपि वे प्रत्यक्ष अपने सामने देखते हैं कि हर एक जाति अपनी ही जाति के जीव-जंतुओं को उत्पन्न करती है। उस जाति के अन्तर्गत स्वरूप की भिन्नताएँ हो सकती हैं, किन्तु मुख्य जाति नहीं बदलती है। संसार भर में अनेकों स्वरूपों के कुत्ते, बिल्ली, घोड़े, बंदर आदि हैं; कोई भी जन उन्हें देखकर पहचान लेता है कि वे किस जाति के हैं, चाहे उनका स्वरूप कैसा भी हो। उनमें से उत्पन्न होने वाली अगली पीढ़ी भी अपनी ही जाति के अनुसार ही रहती है, बदलती नहीं है; एक से दूसरी जाति उत्पन्न नहीं होती है। मनुष्य ने कृत्रिम तरीकों से जातियों को मिश्रित करके नई जातियों को बनाने के प्रयास किए हैं, किन्तु सभी असफल रहे हैं। मूल जाति कभी नहीं बदलती है। परमेश्वर के नियम स्थापित, अपरिवर्तनीय और अकाट्य हैं। प्रमाण प्रत्यक्ष हैं, सर्व-विदित हैं, सहज स्वीकार्य हैं; किन्तु मनुष्य का दंभ उसे अपने ऊपर परमेश्वर की सार्वभौमिकता को स्वीकार नहीं करने देता है। 

      विज्ञान आज भी यह निर्णीत नहीं करने पाया है पहले मुर्गी आई या अंडा? किन्तु बाइबल के पहले ही अध्याय में, जो सृष्टि की रचना का संक्षिप्त इतिहास है, परमेश्वर ने बता दिया है कि पहले जीव-जन्तु बनाए गए, और फिर उन्हें अपनी जाति के अनुसार अगली पीढ़ी उत्पन्न करने की आशीष, क्षमता, और गुण दिया गयाफिर परमेश्वर ने कहा, जल जीवित प्राणियों से बहुत ही भर जाए, और पक्षी पृथ्वी के ऊपर आकाश के अन्तर में उड़ें। इसलिये परमेश्वर ने जाति जाति के बड़े बड़े जल-जन्तुओं की, और उन सब जीवित प्राणियों की भी सृष्टि की जो चलते फिरते हैं जिन से जल बहुत ही भर गया और एक एक जाति के उड़ने वाले पक्षियों की भी सृष्टि की: और परमेश्वर ने देखा कि अच्छा है। और परमेश्वर ने यह कह के उनको आशीष दी, कि फूलो-फलो, और समुद्र के जल में भर जाओ, और पक्षी पृथ्वी पर बढ़ें” (उत्पत्ति 1:20-22)। किन्तु फिर भी मनुष्य इस सीधी-सच्ची बात को स्वीकार करने के स्थान पर अपनी समझ का सहारा लेकर उलझन में फंसा पड़ा है, लेकिन परमेश्वर और उसके वचन बाइबल की सच्चाई को स्वीकार करने को तैयार नहीं है। 

     बाइबल में हजारों वर्ष पहले लिखे गए सृष्टि के इसी इतिहास में परमेश्वर ने यह भी बता दिया कि उसने मनुष्य की रचना मिट्टी से कीऔर यहोवा परमेश्वर ने आदम को भूमि की मिट्टी से रचा और उसके नथनों में जीवन का श्वास फूंक दिया; और आदम जीवता प्राणी बन गया” (उत्पत्ति 2:7), तथा यह भी निर्धारित कर दिया कि मनुष्य परिश्रम की रोटी खाएगा तथा मृत्यु के बाद वापस मिट्टी में मिल जाएगाऔर अपने माथे के पसीने की रोटी खाया करेगा, और अन्त में मिट्टी में मिल जाएगा; क्योंकि तू उसी में से निकाला गया है, तू मिट्टी तो है और मिट्टी ही में फिर मिल जाएगा” (उत्पत्ति 3:19)। आज विज्ञान भी यह जानता और मानता है कि मनुष्य के शरीर की रचना करने वाले मूल तत्व (elements) सभी मिट्टी में ही पाए जाते हैं; और यह सभी का सामान्य प्रत्यक्ष अनुभव है कि मृत्यु के बाद, यदि उसके शव को स्वतः ही समाप्त होने दिया जाए तो शरीर गल कर मिट्टी ही बन जाता है; किन्तु फिर भी मनुष्य को परमेश्वर के वचन बाइबल की बातों पर विश्वास करना कठिन होता है। 

      परमेश्वर और उसके वचन के प्रति इस अविश्वास का मूल कारण है मनुष्य के स्वभाव और व्यवहार में बसा हुआ पाप - परमेश्वर और उसकी आज्ञाओं के प्रति विद्रोह और अनाज्ञाकारिता की भावना। पाप वह नहीं है जिसे हम सामान्यतः पाप समझते हैं, जैसे झूठ बोलना, चोरी करना, धोखा देना, व्यभिचार, कुदृष्टि, लालच, हत्या, आदि - ये और ऐसे सभी कार्य तो पाप के फल, उसके परिणाम हैं, जो प्रवृत्ति, समय, मनसा, और अवसर के अनुसार प्रकट होते रहते हैं। इन बातों को दबाने और हटाने के प्रयास करना झाड़ियों के पत्तों और डालियों के छँटाई करने किन्तु जड़ को वहीं छोड़ देने के समान है; उस जड़ में से फिर से उपयुक्त समय और परिस्थितियों में से वही झाड़ी फिर से बाहर आ जाएगी और फिर से वही दुष्कर्म करवाएगी।

      किन्तु प्रभु यीशु पर लाया गया विश्वास, उसे स्वेच्छा और सच्चे मन से समर्पित किया गया जीवन, प्रभु को उस व्यक्ति के जीवन से इस पाप की झाड़ी की जड़ उखाड़ने की अनुमति दे देता है, और फिर प्रभु उस व्यक्ति के जीवन में से पाप करने की प्रवृत्ति को नाश करके, उस को अंश-अंश करके अपने स्वरूप में बदलने लग जाता है, उसके जीवन को अपनी अनन्तकालीन आशीषों से परिपूर्ण करने लग जाता है। यह एक जीवन भर चलती रहने वाली प्रक्रिया है, किन्तु प्रभु को समर्पित जन पाप को पाप मानने लगता है, उसके लिए बहाने नहीं बनाता है, और न ही किसी और को दोषी ठहराता है, वरन पाप होने पर उसे प्रभु के सामने मान लेता है, प्रभु से उसकी क्षमा भी माँग लेता है, उस पाप में बना नहीं रहता है।

     क्या आप आज, अभी, स्वेच्छा और सच्चे मन से एक छोटी प्रार्थनाहे प्रभु यीशु मैं आप पर तथा मेरे पापों की कीमत चुकाने के लिए क्रूस पर आपके द्वारा दिए गए बलिदान पर विश्वास करता हूँ। कृपया मेरे पाप क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और अपना आज्ञाकारी, समर्पित जन बनाएंकरने के द्वारा प्रभु को अपने जीवन में से पाप की जड़ को उखाड़ने और उसके स्वरूप में ढालने की अनुमति देंगे; उसकी आशीषों के पात्र बनना स्वीकार करेंगे?

 

बाइबल पाठ: गलातियों 5:13-26 

गलतियों 5:13 हे भाइयों, तुम स्वतंत्र होने के लिये बुलाए गए हो परन्तु ऐसा न हो, कि यह स्वतंत्रता शारीरिक कामों के लिये अवसर बने, वरन प्रेम से एक दूसरे के दास बनो।

गलतियों 5:14 क्योंकि सारी व्यवस्था इस एक ही बात में पूरी हो जाती है, कि तू अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रख।

गलतियों 5:15 पर यदि तुम एक दूसरे को दांत से काटते और फाड़ खाते हो, तो चौकस रहो, कि एक दूसरे का सत्यानाश न कर दो।

गलतियों 5:16 पर मैं कहता हूं, आत्मा के अनुसार चलो, तो तुम शरीर की लालसा किसी रीति से पूरी न करोगे।

गलतियों 5:17 क्योंकि शरीर आत्मा के विरोध में, और आत्मा शरीर के विरोध में लालसा करती है, और ये एक दूसरे के विरोधी हैं; इसलिये कि जो तुम करना चाहते हो वह न करने पाओ।

गलतियों 5:18 और यदि तुम आत्मा के चलाए चलते हो तो व्यवस्था के आधीन न रहे।

गलतियों 5:19 शरीर के काम तो प्रगट हैं, अर्थात व्यभिचार, गन्‍दे काम, लुचपन।

गलतियों 5:20 मूर्ति पूजा, टोना, बैर, झगड़ा, ईर्ष्या, क्रोध, विरोध, फूट, विधर्म।

गलतियों 5:21 डाह, मतवालापन, लीलाक्रीड़ा, और इन के जैसे और और काम हैं, इन के विषय में मैं तुम को पहिले से कह देता हूं जैसा पहिले कह भी चुका हूं, कि ऐसे ऐसे काम करने वाले परमेश्वर के राज्य के वारिस न होंगे।

गलतियों 5:22 पर आत्मा का फल प्रेम, आनन्द, मेल, धीरज,

गलतियों 5:23 और कृपा, भलाई, विश्वास, नम्रता, और संयम हैं; ऐसे ऐसे कामों के विरोध में कोई भी व्यवस्था नहीं।

गलतियों 5:24 और जो मसीह यीशु के हैं, उन्होंने शरीर को उस की लालसाओं और अभिलाषाओं समेत क्रूस पर चढ़ा दिया है।

गलतियों 5:25 यदि हम आत्मा के द्वारा जीवित हैं, तो आत्मा के अनुसार चलें भी।

गलतियों 5:26 हम घमण्डी हो कर न एक दूसरे को छेड़ें, और न एक दूसरे से डाह करें।

 

एक साल में बाइबल:

·       भजन 110-112

·       1 कुरिन्थियों 5

शनिवार, 21 अगस्त 2021

परमेश्वर का वचन – बाइबल – और विज्ञान – 9

  

बाइबल और जीव-विज्ञान -

       क्रमिक विकासवाद (Evolution) के मानने वालों के सामने अनेकों ऐसे प्रश्न हैं जिनका उनके पास कोई उत्तर नहीं है; कुछ ऐसे प्रश्नों को हम पहले के लेखों में देख चुके हैं। कुछ बहुत मूलभूत प्रश्न हैं: यदि पृथ्वी पर जीवन कुछ रासायनिक और भौतिक क्रियाओं (chemical and physical reactions) के कारण आरंभ हुआ था, और विकसित होते-होते जीव-जंतुओं और वनस्पति की वर्तमान उन्नत दशा में आ गया है, तो जीवन क्या है? यह जीवन इन रासायनिक और भौतिक क्रियाओं में कब और कैसे आया? क्या यह जीवन भी विकसित होता चला गया?

       आज तक इतनी विकसित, उन्नत, जटिल रासायनिक क्रियाएं मनुष्य ने बहुत ही नियंत्रित और योजनाबद्ध रीति से विभिन्न उत्पाद के बनाने के लिए संभव कर ली हैं, किन्तु इनमेंजीवनडालना तो बहुत दूर की बात है, किसी भी क्रिया को अपने आप में स्वचालित तथा स्वतः ही उन्नत (self-sustaining, self-improving) करते जाने वाला नहीं बना सका। इन सभी क्रियाओं पर नियंत्रण, निरीक्षण, सुधार करते रहना पड़ता है, अन्यथा ये कभी भी बिगड़ कर भारी नुकसान कर डालती हैं। जब तक ये क्रियाएं निरीक्षण में नियंत्रित रहती हैं, लाभदायक  रहती हैं, किन्तु थोड़ी सी चूक, कुछ समय के निरीक्षण और नियंत्रण में अनदेखी, बहुत हानि कर देने की संभावना उत्पन्न कर देती है। 

       ऐसा ही एक अन्य मूलभूत प्रश्न है कि क्रमिक विकास तथा विज्ञान के अनुसार अरबों वर्ष पहले पृथ्वी पर विद्यमान उच्च ताप, विभिन्न प्रकार के रासायनिक गैस और पदार्थ, तथा आकाशीय बिजली के कड़कने, आदि से कुछ ऐसे रासायनिक पदार्थ बन गए और फिर एक साथ आ गए, जिनके परस्पर क्रिया करने से फिर जीवित प्राणियों का उत्पन्न होना संभव हो पाया। कितनी विचित्र बात है, यदि आज उच्च ताप, उस प्रकार के रासायनिक पदार्थों, आकाशीय बिजली के समान बिजली के झटकों के संपर्क में कोई भी प्राणी आता है, तो उसमें विद्यमान हर पदार्थ बिगड़ और बिखर जाता है, जीवन समाप्त हो जाता है; किन्तु विज्ञान हमें सिखाता है कि आज जो जीवन को नष्ट करते हैं, उन्हीं बातों ने जीवित प्राणियों को उत्पन्न करने वाले पदार्थों की रचना की - जो आज उन्हीं क्रियाओं को झेल नहीं पाते हैं।

       इन से संबंधित एक अन्य प्रश्न है, मृत्यु क्या है? क्यों और कैसे एक जीवित प्राणीमृतकदशा में आ जाता है? वर्तमान चिकित्सा-विज्ञान की यह एक बहुत बड़ी उपलब्धि है कि मानव-अंगों का एक से दूसरे शरीर में प्रत्यारोपण और उसके द्वारा दूसरे के शरीर को जीवित रखना संभव है। किन्तु विडंबना यह है कि जिसमृतकशरीर में से वे अंग लिए गए हैं, उसमें से ऐसा क्या निकल गया, कि ये अंग “जीवित” होते हुए भी, दूसरे शरीर में प्रत्यारोपण के बाद ठीक से कार्यकारी होते हुए भी, अपने मूल शरीर कोजीवितनहीं रखने पाए? मृतक शरीर को कितनी भी ऑक्सीजन, पोषक तत्व, दवाइयाँ, मशीनी सहायता से हृदय गति और श्वास क्रिया को चालू रखा जाए, किन्तु वह मृतक ही रहता है; किन्तु उसी शरीर से निकाले हुए अंग, दूसरे के शरीर को जीवित रखते हैं!

       विज्ञान और वैज्ञानिक जानते हैं, किन्तु मानते नहीं हैं कि शरीर से यदिआत्माचला जाता है, तो वह शरीर मृतक हो जाता है। यदि वेआत्माकी उपस्थिति और अनिवार्यता को मान लेंगे, तो उन्हें उस आत्मा को बनाने और देने वालेपरमात्माके अस्तित्व को भी स्वीकार करना पड़ेगा; जिसके आगे फिर क्रमिक विकासवाद और अन्य कई संबंधित धारणाएं टिक नहीं पाएंगी, और उन्हें यह भी स्वीकार करना पड़ेगा कि अंततः उन्हें उस परमात्मा के समक्ष खड़ा होना ही पड़ेगा। जो मनुष्य इस तथ्य को गंभीरता से विचार करके स्वीकार कर लेता है, उसके जीवन का दृष्टिकोण और दिशा ही बदल जाते हैं। 

       जिसे विज्ञान जानते हुए भी स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है, उसे बाइबल ने हजारों वर्ष पहले बता दिया था। इस संदर्भ में परमेश्वर के वचन बाइबल के कुछ पद देखिए: 

  • और यहोवा परमेश्वर ने आदम को भूमि की मिट्टी से रचा और उसके नथनों में जीवन का श्वास फूंक दिया; और आदम जीवता प्राणी बन गया” (उत्पत्ति 2:7); 
  • क्योंकि अब तक मेरी सांस बराबर आती है, और ईश्वर का आत्मा मेरे नथुनों में बना है” (अय्यूब 27:3); 
  • मुझे ईश्वर की आत्मा ने बनाया है, और सर्वशक्तिमान की सांस से मुझे जीवन मिलता है” (अय्यूब 33:4); 
  • उसके हाथ में एक एक जीवधारी का प्राण, और एक एक देहधारी मनुष्य की आत्मा भी रहती है” (अय्यूब 12:10); 
  • ईश्वर जो आकाश का सृजने और तानने वाला है, जो उपज सहित पृथ्वी का फैलाने वाला और उस पर के लोगों को सांस और उस पर के चलने वालों को आत्मा देने वाला यहोवा है, वह यों कहता है” (यशायाह 42:5); 
  • न किसी वस्तु का प्रयोजन रखकर मनुष्यों के हाथों की सेवा लेता है, क्योंकि वह तो आप ही सब को जीवन और श्वास और सब कुछ देता है” (प्रेरितों 17:25); 
  • क्या मनुष्य का प्राण ऊपर की ओर चढ़ता है और पशुओं का प्राण नीचे की ओर जा कर मिट्टी में मिल जाता है? कौन जानता है?” (सभोपदेशक 3:21)

 

उपरोक्त पदों से यह स्पष्ट है कि जिस आत्मा या प्राण के अस्तित्व को स्वीकार करने का साहस विज्ञान और नास्तिक वैज्ञानिकों में नहीं है, मनुष्यों तथा सभी जीव-जंतुओं में उसके अस्तित्व के बारे में बाइबल को कोई संकोच नहीं है। जो तथ्य है, वो है। अस्वीकार करने या अवहेलना करने से वह तथ्य न तो लुप्त हो जाएगा, और न ही परिवर्तित होकर कोई भिन्न स्वरूप ले लेगा। 

जो विज्ञान यह आधारभूत बात सिखाता है कि जीवन से ही जीवन आ सकता है, वह जीवन और मृत्यु को परिभाषित करने तथा समझा पाने में, अपने ही द्वारा बनाए गए बंधनों के कारण अक्षम है, दुविधा में है; और अपनी ही बात का खण्डन करते हुए यह मनवाना चाहता है कि उन्हीं रासायनिक और भौतिक क्रियाओं ने, जिन्हें आज यदि किसी जीवित प्राणी पर लागू किया जाए तो वह मर जाएगा, “जीवनउत्पन्न कर दिया।

विज्ञान जो भी कहे या स्वीकार-अस्वीकार करे, सामान्य ज्ञान और बाइबल का तथ्य यही है कि हमारी आत्माओं का दाता परमात्मा है, जिसके सामने हम सभी को अपने जीवनों का हिसाब देने एक दिन खड़ा होना ही है। उसके द्वारा दिया आत्मा, उसी के पास जाकर पृथ्वी पर बिताए अपने जीवन के प्रतिफल प्राप्त करता है। जो पाप के साथ जाता है, वह परमेश्वर से अनन्तकाल की दूरी, अनन्त मृत्यु, या नरक की अनन्त पीड़ा में जाएगा। जो पृथ्वी पर रहते अपने पापों को स्वीकार करके, उन के लिए अपने सृजनहार परमेश्वर से क्षमा मांगकर उद्धार पाएगा, वह परमेश्वर के साथ स्वर्ग में रहने जाएगा। स्वेच्छा और सच्चे मन से, पापों के लिए पश्चाताप के साथ की गई एक छोटी प्रार्थनाहे प्रभु यीशु मेरे पाप क्षमा करें, मुझे स्वीकार करें अपनी शरण में लें, और पाप के दोष से स्वच्छ करके अपना समर्पित, आज्ञाकारी जन बना लेंआपके जीवन की नियति और दिशा अनन्तकाल के लिए बदल देगी। परमेश्वर के इस आह्वान, इस निमंत्रण को ऐसे ही जाने न दें; अभी अवसर है, इसका सदुपयोग कर लीजिए, अपना शेष जीवन तथा परलोक का अनन्तकाल का जीवन सुरक्षित और सुखी कर लीजिए। 

 

बाइबल पाठ: भजन 103:8-18

भजन संहिता 103:8 यहोवा दयालु और अनुग्रहकारी, विलम्ब से कोप करने वाला और अति करुणामय है।

भजन संहिता 103:9 वह सर्वदा वाद-विवाद करता न रहेगा, न उसका क्रोध सदा के लिये भड़का रहेगा।

भजन संहिता 103:10 उसने हमारे पापों के अनुसार हम से व्यवहार नहीं किया, और न हमारे अधर्म के कामों के अनुसार हम को बदला दिया है।

भजन संहिता 103:11 जैसे आकाश पृथ्वी के ऊपर ऊंचा है, वैसे ही उसकी करुणा उसके डरवैयों के ऊपर प्रबल है।

भजन संहिता 103:12 उदयाचल अस्ताचल से जितनी दूर है, उसने हमारे अपराधों को हम से उतनी ही दूर कर दिया है।

भजन संहिता 103:13 जैसे पिता अपने बालकों पर दया करता है, वैसे ही यहोवा अपने डरवैयों पर दया करता है।

भजन संहिता 103:14 क्योंकि वह हमारी सृष्टि जानता है; और उसको स्मरण रहता है कि मनुष्य मिट्टी ही है।

भजन संहिता 103:15 मनुष्य की आयु घास के समान होती है, वह मैदान के फूल के समान फूलता है,

भजन संहिता 103:16 जो पवन लगते ही ठहर नहीं सकता, और न वह अपने स्थान में फिर मिलता है।

भजन संहिता 103:17 परन्तु यहोवा की करुणा उसके डरवैयों पर युग युग, और उसका धर्म उनके नाती- पोतों पर भी प्रगट होता रहता है,

भजन संहिता 103:18 अर्थात उन पर जो उसकी वाचा का पालन करते और उसके उपदेशों को स्मरण कर के उन पर चलते हैं।

 

एक साल में बाइबल: 

  • भजन 107-109
  • 1 कुरिन्थियों 4

शुक्रवार, 20 अगस्त 2021

परमेश्वर का वचन – बाइबल – और विज्ञान – 8


विज्ञान, विश्व-व्यापी जल-प्रलय तथा जीवाश्म

परमेश्वर के वचन बाइबल की पुस्तकों में परमेश्वर ने हजारों वर्ष पहले अनेकों प्रकार का वैज्ञानिक ज्ञान लिखवा दिया था; और वर्तमान में विज्ञान उन्हीं बातों को अपनी ही खोज और आविष्कारों के द्वारा उजागर कर रहा है, और बाइबल के ज्ञाता दिखाते रहते हैं कि ये बातें परमेश्वर ने पहले से ही साधारण, अशिक्षित, तथा अवैज्ञानिक मनुष्यों की समझ में आने वाली भाषा में लिखवा दी थीं। 


साथ ही परमेश्वर ने यह भी लिखवा दिया था कि लोग बाइबल की बातों को अस्वीकार करेंगे, उनपर अविश्वास करेंगे; इस संदर्भ में बाइबल के कुछ पद देखिए:

2 पतरस 3:3-4 और यह पहिले जान लो, कि अन्‍तिम दिनों में हंसी ठट्ठा करने वाले आएंगे, जो अपनी ही अभिलाषाओं के अनुसार चलेंगे। और कहेंगे, उसके आने की प्रतिज्ञा कहां गई? क्योंकि जब से बाप-दादे सो गए हैं, सब कुछ वैसा ही है, जैसा सृष्‍टि के आरम्भ से था?

यहूदा 1:17-19 पर हे प्रियो, तुम उन बातों को स्मरण रखो; जो हमारे प्रभु यीशु मसीह के प्रेरित पहिले कह चुके हैं। वे तुम से कहा करते थे, कि पिछले दिनों में ऐसे ठट्ठा करने वाले होंगे, जो अपनी अभक्ति के अभिलाषाओं के अनुसार चलेंगे। ये तो वे हैं, जो फूट डालते हैं; ये शारीरिक लोग हैं, जिन में आत्मा नहीं।


न केवल परमेश्वर ने इस उपेक्षा किए जाने के बारे में लिखवाया, वरन ऐसे उदाहरण भी लिखवा दिए जिनको लेकर अविश्वासी लोग उपहास करेंगे। इन उदाहरणों में से एक ऊपर पतरस वाले पदों में दिया गया है प्रभु यीशु मसीह का दूसरा आगमन - जिसके विषय मसीही विश्वासियों में बहुत प्रत्याशा है, किन्तु अविश्वासियों में बहुत संशय और उपहास किया जाता है। इसी प्रकार दो अन्य उदाहरण है बाइबल में दिया गया पृथ्वी की रचना का वर्णन और नूह के समय में मनुष्यों में पाप के अत्यधिक बढ़ जाने से आए विश्व-व्यापी जल प्रलय और पापी मनुष्यों के विनाश का वृतांत। पतरस ने अपनी पत्री में लिखा: “वे तो जान बूझ कर यह भूल गए, कि परमेश्वर के वचन के द्वारा से आकाश प्राचीन काल से वर्तमान है और पृथ्वी भी जल में से बनी और जल में स्थिर है। इन्‍हीं के द्वारा उस युग का जगत जल में डूब कर नाश हो गया” (2 पतरस 3:5-6); और फिर सचेत किया कि जैसे नूह के समय में अविश्वासी और पापी जन जल के द्वारा नाश की गए थे, वैसे ही इस युग में पापी संसार और पापी मनुष्य आग के द्वारा भस्म किए जाएंगे “पर वर्तमान काल के आकाश और पृथ्वी उसी वचन के द्वारा इसलिये रखे हैं, कि जलाए जाएं; और वह भक्तिहीन मनुष्यों के न्याय और नाश होने के दिन तक ऐसे ही रखे रहेंगे” (2 पतरस 3:7)। 


ऐसा नहीं है कि इस विश्व-व्यापी जल प्रलय के प्रमाण नहीं हैं; सारे संसार की सभी सभ्यताओं में इस विश्व-व्यापी जल प्रलय की पौराणिक कथाएं विद्यमान हैं; क्योंकि सारे संसार के लोग नूह के वंशज हैं, जो उस जल प्रलय में से परमेश्वर द्वारा सुरक्षित निकाले गए, और जैसे-जैसे संसार में फैलते चले गए, उस जल प्रलय की घटना की मौखिक स्मृतियाँ भी अपने साथ लेकर गए, जिन में समय के साथ कुछ-कुछ परिवर्तन आए, किन्तु मूल स्वरूप वही है कि जल प्रलय हुआ था, और सारी पृथ्वी पर से कुछ को छोड़ शेष मनुष्य नाश हो गए थे। 


यह केवल पौराणिक बातों में ही नहीं है, किन्तु सारे संसार भर में इस जल प्रलय के प्रमाण जलचर जीव-जंतुओं के जीवाश्मों के रूप में विद्यमान हैं, उन ऊंचे हिमालय और ऐन्डीस जैसी ऊंची पर्वत-श्रंखलाओं पर भी, जिनके जल मगन होने की बात वैज्ञानिक न तो कल्पना करते हैं और न ही स्वीकार करते हैं। इसलिए इन जीवाश्मों के विद्यमान होने प्रमाणों को उजागर नहीं किया जाता है, प्रमुखता नहीं दी जाती है। किन्तु इंटरनेट पर “marine fossils, sea-shells, whale fossils on mountains” खोज करने से इसके विषय में बहुत सी जानकारी मिल सकती है। यद्यपि वैज्ञानिक इन्हें समझाने के भिन्न स्पष्टीकरण देते हैं, जो वास्तविकता से मेल नहीं खाती हैं।   


इसलिए परमेश्वर ने अपने लोगों से यह भी कहा है कि उन्हें सांसारिक बातों को लेकर अधिक वाद-विवाद करने, या उन परमेश्वर विरोधी सांसारिक बातों को अपने जीवनों में अनावश्यक महत्व अथवा वरीयता देने की आवश्यकता नहीं है, “पर मूर्खता के विवादों, और वंशावलियों, और बैर विरोध, और उन झगड़ों से, जो व्यवस्था के विषय में हों बचा रह; क्योंकि वे निष्‍फल और व्यर्थ हैं। किसी पाखंडी को एक दो बार समझा बुझाकर उस से अलग रह। यह जानकर कि ऐसा मनुष्य भटक गया है, और अपने आप को दोषी ठहराकर पाप करता रहता है” (तीतुस 3:9-11)। 


क्योंकि उस ज्ञान के पीछे भागने वाले फिर विश्वास से भटकाए जा सकते हैं “हे तीमुथियुस इस थाती की रखवाली कर और जिस ज्ञान को ज्ञान कहना ही भूल है, उसके अशुद्ध बकवाद और विरोध की बातों से परे रह। कितने इस ज्ञान का अंगीकार कर के, विश्वास से भटक गए हैं।। तुम पर अनुग्रह होता रहे” (1 तीमुथियुस 6:20-21)।  


ऐसा इसलिए है क्योंकि प्रभु यीशु मसीह में संसार के सभी लोगों के लिए सेंत-मेंत में उपलब्ध पापों की क्षमा और उद्धार का सुसमाचार मनुष्यों के ज्ञान और समझ पर नहीं, वरन उनके द्वारा उनमें बसे हुए पापों के एहसास और सच्चे विश्वास द्वारा इस सुसमाचार को स्वीकार करने पर आधारित है, जैसा कि पौलुस प्रेरित ने लगभग दो हज़ार वर्ष पहले लिखा था: “और हे भाइयों, जब मैं परमेश्वर का भेद सुनाता हुआ तुम्हारे पास आया, तो वचन या ज्ञान की उत्तमता के साथ नहीं आया। क्योंकि मैं ने यह ठान लिया था, कि तुम्हारे बीच यीशु मसीह, वरन क्रूस पर चढ़ाए हुए मसीह को छोड़ और किसी बात को न जानूं। और मैं निर्बलता और भय के साथ, और बहुत थरथराता हुआ तुम्हारे साथ रहा। और मेरे वचन, और मेरे प्रचार में ज्ञान की लुभाने वाली बातें नहीं; परन्तु आत्मा और सामर्थ का प्रमाण था। इसलिये कि तुम्हारा विश्वास मनुष्यों के ज्ञान पर नहीं, परन्तु परमेश्वर की सामर्थ पर निर्भर हो” (1 कुरिन्थियों 2:1-5)।


पिछले तीन सप्ताह से हम देखते चले आ रहे हैं कि परमेश्वर के वचन बाइबल को बदनाम करने और झूठा प्रमाणित करने के प्रयास तो बहुत किए गए, किन्तु बाइबल को गलत या झूठा कोई नहीं प्रमाणित कर सका; वरन बाइबल में ही उसके परमेश्वर का अटल और शाश्वत सत्य वचन होने के प्रमाण विद्यमान हैं। आगे भी हम कई और प्रकार के वैज्ञानिक तथ्यों की बाइबल में उपस्थिति, उनके मनुष्यों को ज्ञात होने से भी हजारों वर्ष पहले वहाँ लिखे जाने के संदर्भ में देखेंगे।


उस महान, प्रेमी सृष्टिकर्ता परमेश्वर के प्रति आज आपका विचार और निर्णय क्या है? क्या आप स्वेच्छा और सच्चे मन से, अपने पापों के प्रति सच्चे पश्चाताप के साथ की गई एक छोटी प्रार्थना, “हे प्रभु यीशु, मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लेकर पापी संसार और पापी मनुष्यों पर आने वाले न्याय और भयानक विनाश से बचा लें” के द्वारा अपने पृथ्वी के शेष जीवन तथा अनन्तकाल को सुरक्षित करेंगे? साधारण विश्वास की इस प्रार्थना और समर्पण को अवसर देकर देखिए - आप निराश नहीं होंगे। 


बाइबल पाठ: भजन 103:1-7 

भजन 103:1 हे मेरे मन, यहोवा को धन्य कह; और जो कुछ मुझ में है, वह उसके पवित्र नाम को धन्य कहे!

भजन 103:2 हे मेरे मन, यहोवा को धन्य कह, और उसके किसी उपकार को न भूलना।

भजन 103:3 वही तो तेरे सब अधर्म को क्षमा करता, और तेरे सब रोगों को चंगा करता है,

भजन 103:4 वही तो तेरे प्राण को नाश होने से बचा लेता है, और तेरे सिर पर करूणा और दया का मुकुट बान्धता है,

भजन 103:5 वही तो तेरी लालसा को उत्तम पदार्थों से तृप्त करता है, जिस से तेरी जवानी उकाब के समान नई हो जाती है।।

भजन 103:6 यहोवा सब पिसे हुओं के लिये धर्म और न्याय के काम करता है।

भजन 103:7 उसने मूसा को अपनी गति, और इस्राएलियों पर अपने काम प्रगट किए।


एक साल में बाइबल:

  • भजन 105-106
  • 1 कुरिन्थियों 3


गुरुवार, 19 अगस्त 2021

परमेश्वर का वचन – बाइबल – और विज्ञान – 7

 

मनुष्य का स्वास्थ्य - 2  

परमेश्वर ने न केवल मनुष्य के शरीर की रचना में उसे स्वस्थ बनाए रखने के लिए प्रावधान प्रदान किए हैं, किन्तु साथ ही अपने वचन बाइबल की पुस्तकों में अनेकों ऐसे उपाय भी लिखवाए हैं, जिनके पालन के द्वारा मनुष्य स्वस्थ बन रह सकता है। परमेश्वर ने ये निर्देश हज़ारों वर्ष पहले मनुष्यों को दे दिए थे; वर्तमान में चिकित्सा-विज्ञान इनके महत्व और उपयोगिता को पहचान रहा है, तथा पालन करने के लिए कह रहा है। 

परमेश्वर द्वारा स्वास्थ्य संबंधी दिए गए कुछ निर्देश हैं:

परमेश्वर ने लगभग 3500 वर्ष पहले, अपने लोगों से कहा था कि वे शौच के लिए अपनी छावनी के क्षेत्र से बाहर जाएँ, और सपने साथ मल को ढांपने के लिए उपकरण भी ले जाएंछावनी के बाहर तेरे दिशा फिरने का एक स्थान हुआ करे, और वहीं दिशा फिरने को जाया करना; और तेरे पास के हथियारों में एक खनती भी रहे; और जब तू दिशा फिरने को बैठे, तब उस से खोदकर अपने मल को ढांप देना” (व्यवस्थाविवरण 23:12-13)। हम आज जानते हैं कि मल के प्रदूषित पानी या भोजन सामग्री के खाने से, या उससे दूषित मिट्टी के संपर्क में रहने से कितने ही रोग होते हैं। रोगों की रोक-थाम की योजनाओं में पानी और मिट्टी को मल से दूषित होने से रोके रखने के उपाय सबसे प्राथमिक और महत्वपूर्ण होते हैं। कहा जाता है कि प्रथम विश्व-युद्ध होने के समय तक उतने सैनिक युद्ध से नहीं मरे थे, जितने छावनियों में फैलने वाली बीमारियों से मरे, क्योंकि उन्होंने स्वच्छता के इस सिद्धांत का पालन नहीं किया था।

 

परमेश्वर ने अपने वचन में बताया है कि यौन-संबंध पति-पत्नी के मध्य ही उचित और स्वीकार्य हैं। व्यभिचार, अनेकों के साथ यौन-संबंध रखना, समलैंगिक संबंध, आदि सभी शरीर में रोगों और अस्वस्थता उत्पन्न करते हैं (रोमियों 1:27; 1 कुरिन्थियों 6:18)

 

परमेश्वर ने लगभग 3000 वर्ष पहले अपने लोगों को शुद्ध और अशुद्ध जीव-जन्तुओं की सूची दी थी, अशुद्ध पशुओं को भोजन के लिए निषेध किया था (लैव्यव्यवस्था 11; तथा व्यवस्थाविवरण 14 अध्याय)। जिन पशुओं को भोजन के लिए निषिद्ध किया गया था उनमें सूअर सहित कुछ और जानवरफिर सूअर, जो चिरे खुर का होता है परन्तु पागुर नहीं करता, इस कारण वह तुम्हारे लिये अशुद्ध है। तुम न तो इनका मांस खाना, और न इनकी लोथ छूना” (व्यवस्थाविवरण 14:8), और जलाशयों के तले में रहने वाले जल-जंतु, जिनके चोंयेटे और पंख (scales & fins) नहीं होते, सम्मिलित हैं:फिर जितने जल जन्तु हैं उन में से तुम इन्हें खा सकते हों, अर्थात समुद्र वा नदियों के जल जन्तुओं में से जितनों के पंख और चोंयेटे होते हैं उन्हें खा सकते हो। और जलचरी प्राणियों में से जितने जीवधारी बिना पंख और चोंयेटे के समुद्र वा नदियों में रहते हैं वे सब तुम्हारे लिये घृणित हैं। वे तुम्हारे लिये घृणित ठहरें; तुम उनके मांस में से कुछ न खाना, और उनकी लोथों को अशुद्ध जानना। जल में जिस किसी जन्तु के पंख और चोंयेटे नहीं होते वह तुम्हारे लिये अशुद्ध है” (लैव्यव्यवस्था 11:9-12)। ये जीव-जंतु बहुधा तले पर पड़ी गंदगी खाने वाले होते हैं, जिससे मनुष्यों में बीमारियों के प्रवेश करने का खतरा रहता है। आज कई बीमारियाँ जो पहले जंतुओं में ही होती थीं मनुष्यों में घातक बनकर दिखने लगी हैं, क्योंकि परमेश्वर द्वारा दिए गए शुद्ध-अशुद्ध के नियमों का पालन नहीं किया गया।

परमेश्वर ने निर्देश दिए थे कि पीने के लिए स्वच्छ जल का ही प्रयोग करना है, और किसी भी मृतक जन्तु से दूषित बर्तन के भोजन अथवा उसके जल को प्रयोग नहीं करना हैऔर यदि मिट्टी का कोई पात्र हो जिस में इन जन्तुओं में से कोई पड़े, तो उस पात्र में जो कुछ हो वह अशुद्ध ठहरे, और पात्र को तुम तोड़ डालना। उस में जो खाने के योग्य भोजन हो, जिस में पानी का छुआव हों वह सब अशुद्ध ठहरे; फिर यदि ऐसे पात्र में पीने के लिये कुछ हो तो वह भी अशुद्ध ठहरे। और यदि इनकी लोथ में का कुछ तंदूर वा चूल्हे पर पड़े तो वह भी अशुद्ध ठहरे, और तोड़ डाला जाए; क्योंकि वह अशुद्ध हो जाएगा, वह तुम्हारे लिये भी अशुद्ध ठहरे। परन्तु सोता वा तालाब जिस में जल इकट्ठा हो वह तो शुद्ध ही रहे; परन्तु जो कोई इनकी लोथ को छूए वह अशुद्ध ठहरे” (लैव्यव्यवस्था 11:33-36)। वर्तमान में चिकित्सा विज्ञान को मनुष्यों में रोग उत्पन्न करने वाले कीटाणुओं की जानकारी होने के बाद परमेश्वर द्वारा 3000 वर्ष पहले कहे गई इस बात का महत्व समझ में आता है। 

परमेश्वर ने रोगों के इलाज के लिए वनस्पति में भी प्रावधान रखे, और मनुष्यों को उसके विषय बताया (यशायाह 38:21; यहेजकेल 47:12; प्रकाशितवाक्य 22:2): “यशायाह ने कहा था, अंजीरों की एक टिकिया बना कर हिजकिय्याह के फोड़े पर बान्‍धी जाए, तब वह बचेगा” (यशायाह 38:21); “और नदी के दोनों तीरों पर भांति भांति के खाने योग्य फलदाई वृक्ष उपजेंगे, जिनके पत्ते न मुरझाएंगे और उनका फलना भी कभी बन्द न होगा, क्योंकि नदी का जल पवित्र स्थान से निकला है। उन में महीने महीने, नये नये फल लगेंगे। उनके फल तो खाने के, ओर पत्ते औषधि के काम आएंगे” (यहेजकेल 47:12)। इसी प्रकार से जैतून का तेल और दाखरस भी घावों के इलाज में प्रयोग किया जाता था (लूका 10:34)। जैतून का तेल त्वचा को स्वस्थ रखता है, और दाखरस में विद्यमान इथाइल अल्कोहल कीटाणुओं को मारता है। 

परमेश्वर ने 3000 वर्ष पूर्व राजा सुलैमान द्वारा लिखे नीतिवचनों में लिखवा दिया था किमन का आनन्द अच्छी औषधि है, परन्तु मन के टूटने से हड्डियां सूख जाती हैं” (नीतिवचन 17:22); तथामन आनन्दित होने से मुख पर भी प्रसन्नता छा जाती है, परन्तु मन के दु:ख से आत्मा निराश होती है” (नीतिवचन 15:13)। परमेश्वर के वचन में 3000 वर्ष पहले लिखे गए इस तथ्य को चिकित्सा विज्ञान आज समझ और मान रहा है; वर्तमान समय की लोगों को सर्वाधिक ग्रसित करने वाली घातक बीमारियाँ, जैसे बढ़ा हुआ ब्लडप्रेशर, हृदय रोग, डायबटीस, निराशा या डिप्रेशन, आदि अशांत और अस्वस्थ मन के कारण ही शरीर पर प्रभाव डालते हैं; और इनके इलाज के लिए मन के प्रसन्न और संतुष्ट होने से बहुत सहायता मिलती है।

 

जिस परमेश्वर ने हमारे नश्वर शरीरों को, जो एक न एक दिन मर ही जाएंगे, स्वस्थ रखने के लिए इतने प्रावधान किए, निर्देश दिए, उसी ने हमारी कभी न मरने वाली आत्मा को सबसे विनाशकारी और अनन्तकाल के लिए परेशानी उत्पन्न करने वाले पाप के रोग से भी बचाव और स्वस्थ रहने का उपाय दिया है। परमेश्वर ने कहा, “यदि हम अपने पापों को मान लें, तो वह हमारे पापों को क्षमा करने, और हमें सब अधर्म से शुद्ध करने में विश्वासयोग्य और धर्मी है” (1 यूहन्ना 1:9)। वह हमसे केवल इतना चाहता है कि हम अपने पाप मान लें और उन पापों से उसके सम्मुख सच्चे मन से पश्चाताप कर लें। उसके आगे हमें उन पापों से शुद्ध करने और हमें परमेश्वर की दृष्टि और मापदंड के अनुसार धर्मी बनाने की ज़िम्मेदारी और कार्य उसका है। स्वेच्छा और सच्चे मन से की गई केवल एक प्रार्थना, “हे प्रभु यीशु, मैं स्वीकार करता हूँ कि मैंने मन, ध्यान, विचार, और व्यवहार में पाप किया है, और आपने मेरे पापों के निवारण के लिए क्रूस पर अपने आप को बलिदान किया और फिर जीवित हो गए। कृपया मेरे पाप क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना आज्ञाकारी, समर्पित जन बना लें। मेरे जीवन को अपनी इच्छानुसार परिवर्तित कर दें” - आपको पाप के रोग से मुक्त और स्वस्थ कर के परमेश्वर के राज्य में अनन्तकाल के लिए प्रवेश प्रदान कर देगी। चाहे अविश्वसनीय लगे, किन्तु करके देखिए - सच्चे, समर्पित, आज्ञाकारी, मन से, शांत होकर अपने ही अंदर यह प्रार्थना करने से आपका कुछ नहीं बिगड़ेगा, कोई हानि नहीं होगी; यदि कुछ हुआ तो आपका भला ही होगा - पाप से मुक्ति, उद्धार और आशीषों से भरपूर अनन्त जीवन मिलेगा; फिर क्यों डरना? विश्वास के साथ कदम बढ़ाइए, भला ही मिलेगा, कोई हानि नहीं। 

 

बाइबल पाठ: यशायाह 55:1-13 

यशायाह 55:1 अहो सब प्यासे लोगों, पानी के पास आओ; और जिनके पास रुपया न हो, तुम भी आकर मोल लो और खाओ! दाखमधु और दूध बिन रुपए और बिना दाम ही आकर ले लो।

यशायाह 55:2 जो भोजन वस्तु नहीं है, उसके लिये तुम क्यों रुपया लगाते हो, और, जिस से पेट नहीं भरता उसके लिये क्यों परिश्रम करते हो? मेरी ओर मन लगाकर सुनो, तब उत्तम वस्तुएं खाने पाओगे और चिकनी चिकनी वस्तुएं खाकर सन्तुष्ट हो जाओगे।

यशायाह 55:3 कान लगाओ, और मेरे पास आओ; सुनो, तब तुम जीवित रहोगे; और मैं तुम्हारे साथ सदा की वाचा बान्धूंगा अर्थात दाऊद पर की अटल करुणा की वाचा।

यशायाह 55:4 सुनो, मैं ने उसको राज्य राज्य के लोगों के लिये साक्षी और प्रधान और आज्ञा देने वाला ठहराया है।

यशायाह 55:5 सुन, तू ऐसी जाति को जिसे तू नहीं जानता बुलाएगा, और ऐसी जातियां जो तुझे नहीं जानतीं तेरे पास दौड़ी आएंगी, वे तेरे परमेश्वर यहोवा और इस्राएल के पवित्र के निमित्त यह करेंगी, क्योंकि उसने तुझे शोभायमान किया है।

यशायाह 55:6 जब तक यहोवा मिल सकता है तब तक उसकी खोज में रहो, जब तक वह निकट है तब तक उसे पुकारो;

यशायाह 55:7 दुष्ट अपनी चालचलन और अनर्थकारी अपने सोच विचार छोड़कर यहोवा ही की ओर फिरे, वह उस पर दया करेगा, वह हमारे परमेश्वर की ओर फिरे और वह पूरी रीति से उसको क्षमा करेगा।

यशायाह 55:8 क्योंकि यहोवा कहता है, मेरे विचार और तुम्हारे विचार एक समान नहीं है, न तुम्हारी गति और मेरी गति एक सी है।

यशायाह 55:9 क्योंकि मेरी और तुम्हारी गति में और मेरे और तुम्हारे सोच विचारों में, आकाश और पृथ्वी का अन्तर है।

यशायाह 55:10 जिस प्रकार से वर्षा और हिम आकाश से गिरते हैं और वहां यों ही लौट नहीं जाते, वरन भूमि पर पड़कर उपज उपजाते हैं जिस से बोने वाले को बीज और खाने वाले को रोटी मिलती है,

यशायाह 55:11 उसी प्रकार से मेरा वचन भी होगा जो मेरे मुख से निकलता है; वह व्यर्थ ठहरकर मेरे पास न लौटेगा, परन्तु, जो मेरी इच्छा है उसे वह पूरा करेगा, और जिस काम के लिये मैं ने उसको भेजा है उसे वह सफल करेगा।

यशायाह 55:12 क्योंकि तुम आनन्द के साथ निकलोगे, और शान्ति के साथ पहुंचाए जाओगे; तुम्हारे आगे आगे पहाड़ और पहाडिय़ां गला खोल कर जयजयकार करेंगी, और मैदान के सब वृक्ष आनन्द के मारे ताली बजाएंगे।

यशायाह 55:13 तब भटकटैयों के स्थान पर सनौवर उगेंगे; और बिच्छु पेड़ों के स्थान पर मेंहदी उगेगी; और इस से यहोवा का नाम होगा, जो सदा का चिन्ह होगा और कभी न मिटेगा।

 

एक साल में बाइबल: 

  • भजन 103-104
  • 1 कुरिन्थियों

बुधवार, 18 अगस्त 2021

परमेश्वर का वचन – बाइबल – और विज्ञान – 6

 

मनुष्य का स्वास्थ्य - 1  

       पिछले लेख में हमने देखा था कि मनुष्य परमेश्वर की उत्कृष्ट रचना है, और मनुष्य की रचना के विषय जिन बातों को विज्ञान ने वर्तमान में जानना आरंभ किया है, वे परमेश्वर ने अपने वचन बाइबल में हजारों वर्ष पहले से लिखवा रखी हैं। आज हम मनुष्य के स्वास्थ्य से संबंधित कुछ बातों को देखेंगे, जिन्हें विज्ञान और चिकित्सा-शास्त्र ने वर्तमान में जानना और मानना आरंभ किया है, किन्तु बाइबल की पुस्तकों में उनके बारे में परमेश्वर ने हजारों वर्ष पहले लिखवा दिया था।       

       लगभग 1.5 से 2 सदी पहले चिकित्सा की एक विधि थी बीमार व्यक्ति के शरीर में सेगंदा रक्तनिकाला जाता था, जिसके परिणामस्वरूप बहुत से लोग मर गए, जिनमें से एक अमेरिका के सुप्रसिद्ध राष्ट्रपति जॉर्ज वाशिंगटन भी थे, जिनके इलाज के लिए यह पद्धति अपनाई गई थी। विज्ञान को यह वर्तमान में पता चला कि शरीर में रक्त से ही जीवन है। रक्त ही सारे शरीर में ऑक्सीजन तथा पोशाक तत्वों को पहुंचाता है, बीमारियों से लड़ने वाली और संक्रमण को रोकने और मारने वाली कोशिकाओं का स्त्रोत है, तथा उसका शरीर में उपयुक्त मात्रा में होना कितना आवश्यक है। किन्तु परमेश्वर ने अपने वचन बाइबल में यह आज से लगभग 3400 वर्ष पूर्व ही लिखवा दिया था कि रक्त से ही जीवन है, “क्योंकि शरीर का प्राण लहू में रहता है; और उसको मैं ने तुम लोगों को वेदी पर चढ़ाने के लिये दिया है, कि तुम्हारे प्राणों के लिये प्रायश्चित्त किया जाए; क्योंकि प्राण के कारण लहू ही से प्रायश्चित्त होता है” “क्योंकि शरीर का प्राण जो है वह उसका लहू ही है जो उसके प्राण के साथ एक है; इसी लिये मैं इस्राएलियों से कहता हूं, कि किसी प्रकार के प्राणी के लहू को तुम न खाना, क्योंकि सब प्राणियों का प्राण उनका लहू ही है; जो कोई उसको खाए वह नाश किया जाएगा” (लैव्यव्यवस्था 17:11, 14) 

       परमेश्वर ने अपने चुने हुए लोगों, अब्राहम के वंशजों - यहूदियों के लिए खतने की विधि ठहराई थी, “और आठवें दिन लड़के का खतना किया जाए” (लैव्यव्यवस्था 12:3; साथ ही देखें उत्पत्ति 17:12; लूका 1:59)। यह आज से लगभग 4000 वर्ष पूर्व की बात है। विज्ञान की वर्तमान खोजों से पहले यह कोई नहीं जानता था कि रक्त को बहने से रोकने और रक्त का थक्का जमाने के लिए रक्त में जिस रासायनिक पदार्थ, प्रोथ्रोमबिन की आवश्यकता होती है, वह शिशु के जन्म के आठवें दिन सबसे अधिक मात्रा में रक्त में विद्यमान होता है, और फिर उसके बाद रक्त में उसकी मात्रा कम होने लग जाती है। यह तथ्य चिकित्सा विज्ञान को वर्तमान में पता चला है। किन्तु परमेश्वर जो मनुष्य का रचयिता है, उसने अपनी निर्धारित रचना के अनुसार पहले ही कह दिया था कि खतना आठवें दिन हो, जिससे शिशु का रक्त बहना तुरंत ही रुक सके, कोई हानि न हो।

       चिकित्सा-विज्ञान संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए रोगी को अन्य सभी से अलग रखने की जिस पद्धति पर आज जोर दे रहा है, रोगी से दूरी बनाए रखने की बात कर रहा है, बार-बार निरीक्षण करके यह सुनिश्चित करने की बात कर रहा है कि संक्रमण समाप्त हो गया तथा रोगी निरोग हो गया है, वह बाइबल में लगभग 3400 वर्ष पहले ही लिख दिया गया था कि संभावित संक्रमण वाले व्यक्ति को भी अन्य लोगों से पृथक रखा जाएफिर यहोवा ने मूसा से कहा, इस्राएलियों को आज्ञा दे, कि वे सब कोढिय़ों को, और जितनों के प्रमेह हो, और जितने लोथ के कारण अशुद्ध हों, उन सभों को छावनी से निकाल दें; ऐसों को चाहे पुरुष हों चाहे स्त्री छावनी से निकाल कर बाहर कर दें; कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारी छावनी, जिसके बीच मैं निवास करता हूं, उनके कारण अशुद्ध हो जाए। और इस्राएलियों ने वैसा ही किया, अर्थात ऐसे लोगों को छावनी से निकाल कर बाहर कर दिया; जैसा यहोवा ने मूसा से कहा था इस्राएलियों ने वैसा ही किया” (गिनती 5:1-5; देखें लैव्यव्यवस्था 13:45-46) 

 

       जो परमेश्वर मुझे और आपको शारीरिक रीति से स्वस्थ रखना चाहता है, और इसके लिए जिसने पहले से ही अपने वचन में विधि और निर्देश दे रखे हैं, वही प्रेमी परमेश्वर पिता आपके आत्मिक स्वास्थ्य की भी चिंता करता है, और आपको आत्मिक रीति से स्वस्थ देखना चाहता है। संसार के हर व्यक्ति के अंदर पाप का रोग है - व्यक्ति चाहे माने या न माने; इसका एहसास करे अथवा न करे। हर व्यक्ति मन, विचार, व्यवहार से किसी न किसी रूप में परमेश्वर की आज्ञाओं का उल्लंघन करता है, और परमेश्वर की आज्ञा का उल्लंघन ही पाप है। यह पाप का रोग सभी को परमेश्वर से दूर रखता है, इस लोक में भी और परलोक में भी। किन्तु जो इस लोक में परमेश्वर के सामने अपने पापों को मान लेता है, परमेश्वर से उनके लिए क्षमा माँग लेता है, वह इस पाप के संक्रमण से मुक्त हो जाता है, वापस परमेश्वर के साथ संगति में बहाल हो जाता है; इस लोक में भी और परलोक में भी। 

       परमेश्वर प्रभु यीशु से, सच्चे मन, स्वेच्छा, और पाप के बोध के साथ की गई एक छोटी समर्पण की प्रार्थना, “हे प्रभु यीशु मेरे पापों को क्षमा करें, मुझ पापी को ग्रहण करें, और मुझे अपने प्रति समर्पित तथा आज्ञाकारी व्यक्ति बनाएँआपको पाप के रोग से हमेशा के लिए मुक्ति दिला देगा - जो कोई धर्म-कर्म, विधि-विधान-अनुष्ठान कभी नहीं कर सकते हैं। 

       आज प्रभु परमेश्वर आपको पाप के रोग से स्वस्थ होने का निमंत्रण दे रहा है; समय और अवसर रहते उसके इस निमंत्रण को स्वीकार कर लीजिए, और अनन्तकाल के लिए इस घातक रोग से स्वस्थ एवं निरोग हो जाइए। 

 

बाइबल पाठ: इफिसियों 2:1-10

इफिसियों 2:1 और उसने तुम्हें भी जिलाया, जो अपने अपराधों और पापों के कारण मरे हुए थे।

इफिसियों 2:2 जिन में तुम पहिले इस संसार की रीति पर, और आकाश के अधिकार के हाकिम अर्थात उस आत्मा के अनुसार चलते थे, जो अब भी आज्ञा न मानने वालों में कार्य करता है।

इफिसियों 2:3 इन में हम भी सब के सब पहिले अपने शरीर की लालसाओं में दिन बिताते थे, और शरीर, और मन की मनसाएं पूरी करते थे, और और लोगों के समान स्वभाव ही से क्रोध की सन्तान थे।

इफिसियों 2:4 परन्तु परमेश्वर ने जो दया का धनी है; अपने उस बड़े प्रेम के कारण, जिस से उसने हम से प्रेम किया।

इफिसियों 2:5 जब हम अपराधों के कारण मरे हुए थे, तो हमें मसीह के साथ जिलाया; (अनुग्रह ही से तुम्हारा उद्धार हुआ है।)

इफिसियों 2:6 और मसीह यीशु में उसके साथ उठाया, और स्वर्गीय स्थानों में उसके साथ बैठाया।

इफिसियों 2:7 कि वह अपनी उस कृपा से जो मसीह यीशु में हम पर है, आने वाले समयों में अपने अनुग्रह का असीम धन दिखाए।

इफिसियों 2:8 क्योंकि विश्वास के द्वारा अनुग्रह ही से तुम्हारा उद्धार हुआ है, और यह तुम्हारी ओर से नहीं, वरन परमेश्वर का दान है।

इफिसियों 2:9 और न कर्मों के कारण, ऐसा न हो कि कोई घमण्ड करे।

इफिसियों 2:10 क्योंकि हम उसके बनाए हुए हैं; और मसीह यीशु में उन भले कामों के लिये सृजे गए जिन्हें परमेश्वर ने पहिले से हमारे करने के लिये तैयार किया।

 

एक साल में बाइबल: 

  • भजन 100-102
  • 1 कुरिन्थियों 1