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शनिवार, 14 अगस्त 2021

परमेश्वर का वचन – बाइबल – और विज्ञान – 2

 

            पिछले लेख में हमने देखा था कि सृष्टि अपने सृष्टिकर्ता के विरुद्ध गवाही नहीं देगी, उसका इनकार नहीं करेगी। परमेश्वर के वचन बाइबल में लिखा है: 

·        भजन 19:1-3 — “आकाश ईश्वर की महिमा वर्णन कर रहा है; और आकाशमण्डल उसकी हस्तकला को प्रगट कर रहा है। दिन से दिन बातें करता है, और रात को रात ज्ञान सिखाती है। न तो कोई बोली है और न कोई भाषा जहां उनका शब्द सुनाई नहीं देता है।”

·        यिर्मयाह 10:12 — “उसी [परमेश्वर] ने पृथ्वी को अपनी सामर्थ्य से बनाया, उसने जगत को अपनी बुद्धि से स्थिर किया, और आकाश को अपनी प्रवीणता से तान दिया है।”

·        रोमियों 1:20 "क्योंकि उस [परमेश्वर] के अनदेखे गुण, अर्थात उस की सनातन सामर्थ्य, और परमेश्वरत्व जगत की सृष्टि के समय से उसके कामों के द्वारा देखने में आते है, यहां तक कि वे निरुत्तर हैं।"

साथ ही हमने इस पर भी ध्यान किया था कि बाइबल वैज्ञानिक दृष्टिकोण से लिखी गई पुस्तक नहीं है, और इसकी विभिन्न पुस्तकें, जब अपने-अपने समय में लिखी गई थीं, तो साधारण सामान्य लोगों के पढ़ने, सुनने और समझने के लिए लिखी गई थीं, जिनमें से अधिकांश अशिक्षित या बहुत कम शिक्षा-प्राप्त होते थे; तथा विज्ञान जैसा आज है, वैसा उस समय नहीं था। इसलिए, बाइबल में विज्ञान की बातें, न तो वैज्ञानिक शब्दावली में दी गई हैं, और न ही किसी वैज्ञानिक व्याख्या अथवा चर्चा के समान दी गई हैं। वरन उन शिक्षाओं और चर्चाओं में जो उन पुस्तकों में है, ये बातें सामान्य साधारण भाषा में सम्मिलित की गई हैं। आज हम सृष्टि से संबंधित कुछ बातों को देखेंगे, जो बाइबल की पुस्तकों में तो हजारों वर्षों से विद्यमान हैं, किन्तु विज्ञान और वैज्ञानिकों ने उन्हें कुछ सदियों अथवा दशकों पहले जाना है। सृष्टि से संबंधित कुछ वैज्ञानिक तथ्यों को देखते हैं जो बाइबल की पुस्तकों में पहले से विद्यमान हैं:

·        सृष्टि की हर चीज अति-सूक्ष्म कणों से बनी है जो आँखों से नहीं देखे जा सकते हैं, अनदेखे हैं:  - इब्रानियों 11:3 "विश्वास ही से हम जान जाते हैं, कि सारी सृष्टि की रचना परमेश्वर के वचन के द्वारा हुई है। यह नहीं, कि जो कुछ देखने में आता है, वह देखी हुई वस्तुओं से बना हो।"

·        सृष्टि का एक समय पर आरंभ हुआ है: बीसवीं सदी के आरंभ में सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक एल्बर्ट आईनस्टाईन के कार्यों के बाद से विज्ञान ने यह स्वीकार करना आरंभ किया कि सृष्टि का किसी समय पर आरंभ हुआ था; जबकि उससे पहले अधिकांश लोग यही मानते थे कि सृष्टि अनन्त काल से चली आ रही है। जबकि बाइबल के पहले ही पद में इस 'आरंभ' को बताया गया है: उत्पत्ति 1:1 "आदि में परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी की सृष्टि की।" और , इब्रानियों 1:10 "और यह कि, हे प्रभु, आदि में तू ने पृथ्वी की नेव डाली, और स्वर्ग तेरे हाथों की कारीगरी है।"

·        विज्ञान इस सृष्टि को चार बातों के अंतर्गत व्यक्त करता है – समय (Time), स्थान (Space), पदार्थ (Matter), और ऊर्जा (Energy)। सारी सृष्टि इन्हीं चार बातों से संबंधित नियमों तथा कार्यों और इनके परस्पर सामंजस्य तथा व्यवहार के द्वारा कार्य कर रही है। बाइबल के पहले तीन पद, सृष्टि के साथ इन चारों बातों को बताते हैं: उत्पत्ति 1:1-3 “आदि [समय/Time] में परमेश्वर ने आकाश [स्थान/Space] और पृथ्वी [पदार्थ/Matter] की सृष्टि की। और पृथ्वी बेडौल और सुनसान पड़ी थी; और गहरे जल के ऊपर अन्धियारा था: तथा परमेश्वर का आत्मा जल के ऊपर मण्डलाता था। तब परमेश्वर ने कहा, उजियाला [रौश्नी – ऊर्जा/Energy] हो: तो उजियाला हो गया।”

·        थर्मोडायनमिक्स का प्रथम नियम स्थापित किया गया: समस्त सृष्टि में विद्यमान ऊर्जा और पदार्थ के व्यवहार की व्याख्या करने वाले थर्मोडायनमिक्स के तीन सिद्धांत हैं। इनमें से प्रथम सिद्धांत कहता है कि समस्त सृष्टि में विद्यमान कुल ऊर्जा और पदार्थ के मात्रा स्थाई है – ऊर्जा और मात्र परस्पर परिवर्तित हो सकते हैं, किन्तु उनका कुल योग बढ़ या घट नहीं सकता है। बाइबल की पहली पुस्तक में ही लिख दिया गया था कि परमेश्वर ने सृष्टि की रचना की समाप्ति भी की; और उस समाप्ति के बाद उसमें फिर कभी और कुछ बढ़ाया या घटाया नहीं गया है: उत्पत्ति 2:1-2 “यों आकाश और पृथ्वी और उनकी सारी सेना का बनाना समाप्त हो गया। और परमेश्वर ने अपना काम जिसे वह करता था सातवें दिन समाप्त किया। और उसने अपने किए हुए सारे काम से सातवें दिन विश्राम किया­ इसके बाद से सृष्टि का सारा कार्य उसी प्रथम रचना के समय में सृजे गए पदार्थ (Matter) और ऊर्जा (Energy) के माध्यम से ही हो रहा है।

·        थर्मोडायनमिक्स का द्वितीय नियम स्थापित किया गया: थर्मोडायनमिक्स का द्वितीय नियम है कि सृष्टि की हर वस्तु क्षय होती जा रही है, नष्ट हो रही है, निरंतर घटती, और अव्यवस्थित होती जा रही है (Entropy – deteriorating or running down)। पहले लोगों का मानना था कि सृष्टि अपरिवर्तनीय है। किन्तु अब विज्ञान ने पहचाना है कि ऐसा नहीं है, सारी सृष्टि की हर वस्तु इस दूसरे नियम के अनुसार क्षय होती चली जा रही है (Evolution या क्रमिक विकासवाद इस दूसरे नियम के विरुद्ध है, क्योंकि उसके अनुसार विकासवाद में जीव-जन्तु सुधरते और उन्नत होते चले गए, और अभी भी यही हो रहा है)। किन्तु बाइबल में इस क्षय होने को पहले ही लिख दिया गया था: भजन 102:25-26 “आदि में तू ने पृथ्वी की नेव डाली, और आकाश तेरे हाथों का बनाया हुआ है। वह तो नाश होगा, परन्तु तू बना रहेगा; और वह सब कपड़े के समान पुराना हो जाएगा। तू उसको वस्त्र के समान बदलेगा, और वह तो बदल जाएगा;”; तथा इब्रानियों 1:11-12 “वे तो नाश हो जाएंगे; परन्तु तू बना रहेगा: और वे सब वस्त्र के समान पुराने हो जाएंगेऔर तू उन्हें चादर के समान लपेटेगा, और वे वस्त्र के समान बदल जाएंगे: पर तू वही है और तेरे वर्षों का अन्त न होगा।”

       साथ ही बाइबल यह भी बताती है कि यह क्षय होना सृष्टि में पाप के प्रवेश के द्वारा हुआ: उत्पत्ति 3:17 “और आदम से उसने कहा, तू ने जो अपनी पत्नी की बात सुनी, और जिस वृक्ष के फल के विषय मैं ने तुझे आज्ञा दी थी कि तू उसे न खाना उसको तू ने खाया है, इसलिये भूमि तेरे कारण शापित है: तू उसकी उपज जीवन भर दु:ख के साथ खाया करेगा” तथा “रोमियों 8:20-22 क्योंकि सृष्टि अपनी इच्छा से नहीं पर आधीन करने वाले की ओर से व्यर्थता के आधीन इस आशा से की गई। कि सृष्टि भी आप ही विनाश के दासत्व से छुटकारा पाकर, परमेश्वर की सन्तानों की महिमा की स्वतंत्रता प्राप्त करेगी। क्योंकि हम जानते हैं, कि सारी सृष्टि अब तक मिलकर कराहती और पीड़ाओं में पड़ी तड़पती है।”

 

बाइबल पाठ: भजन 89:11-18

भजन 89:11 आकाश तेरा है, पृथ्वी भी तेरी है; जगत और जो कुछ उस में है, उसे तू ही ने स्थिर किया है।

भजन 89:12 उत्तर और दक्खिन को तू ही ने सिरजा; ताबोर और हर्मोन तेरे नाम का जयजयकार करते हैं।

भजन 89:13 तेरी भुजा बलवन्त है; तेरा हाथ शक्तिमान और तेरा दाहिना हाथ प्रबल है।

भजन 89:14 तेरे सिंहासन का मूल, धर्म और न्याय है; करुणा और सच्चाई तेरे आगे आगे चलती है।

भजन 89:15 क्या ही धन्य है वह समाज जो आनन्द के ललकार को पहचानता है; हे यहोवा, वे लोग तेरे मुख के प्रकाश में चलते हैं,

भजन 89:16 वे तेरे नाम के हेतु दिन भर मगन रहते हैं, और तेरे धर्म के कारण महान हो जाते हैं।

भजन 89:17 क्योंकि तू उनके बल की शोभा है, और अपनी प्रसन्नता से हमारे सींग को ऊंचा करेगा।

भजन 89:18 क्योंकि हमारी ढाल यहोवा की ओर से है हमारा राजा इस्राएल के पवित्र की ओर से है।।

 

 

एक साल में बाइबल: 

  • भजन 89-90
  • रोमियों 14

शुक्रवार, 13 अगस्त 2021

परमेश्वर का वचन – बाइबल – और विज्ञान – 1

 

            एक आम धारणा है कि बाइबल और विज्ञान परस्पर सहमत नहीं हैं, और बाइबल की बातें विज्ञान के समक्ष ठहर नहीं पाती हैं, क्योंकि वे सभी काल्पनिक किस्से-कहानियाँ हैं; निराधार बातें हैं। यदि थोड़ा थम कर सोचा जाए, कि विज्ञान क्या  है, तो एक भिन्न ही चित्र हमारे सामने उभर कर आता है। विज्ञान हमारे संसार और सृष्टि की रचना और संचालन, सृष्टि के सभी कार्यों तथा कार्यविधियों का अध्ययन है। जैसे-जैसे नई बातें सामने आती जाती हैं, उन नई बातों के संदर्भ में पुरानी बातों और धारणाओं की समीक्षा, विश्लेषण, और पुनः अवलोकन भी होता रहता है। इस कारण विज्ञान सदा परिवर्तनशील रहता है। आज जो सत्य है, कल किसी अन्य बात की खोज या किसी अन्य तथ्य के सामने आने के कारण वही असत्य भी हो सकता है, बदला भी जा सकता है। विज्ञान के कितने ही सिद्धांत जो पहले तथ्य के रूप में बताए और सिखाए जाते थे, वे बदले जा चुके हैं।

            परन्तु  एक अन्य, सत्य किन्तु काम ही जानी तथा मानी जाने वाली बात यह भी है कि विज्ञान की बातों की आधार पर तर्क देने वाले सभी जन अब यथार्थ और सत्यवादी नहीं रह हैं। अब सामान्य धारणा जैसे भी हो सके परमेश्वर के अस्तित्व का इनकार करने और बाइबल को गलत प्रमाणित करने की है। इसलिए विज्ञान के बहुत से तथ्य, खोज, जानकारियाँ, जो प्रचलित धारणाओं के विरुद्ध हैं, उन्हें दबा दिया जाता है, उनकी चर्चा नहीं की जाती है, उन्हें प्रमुखता प्रदान नहीं की जाती है, और उनकी उपेक्षा की जाती है। उदाहरण के लिए “Evolution Hoaxes” अर्थात, क्रमिक विकसवाद में छल को लेकर इंटरनेट पर ढूंढ लीजिए, और आप विस्मित रह जाएँगे कि कितनी बातें छिपाई गई हैं कितने तथ्य दबाए गए हैं, और किस प्रकार से सही को दबा कर गलत को प्रमुख करने के द्वारा इस अस्वीकार्य धारणा को स्वीकार्य बनाने के प्रयास किए जाते रहे हैं, और अभी भी हो रहे हैं।

            कुछ दशक पहले अणु को पदार्थ का सबसे सूक्ष्म कण समझा जाता था; कुछ ही समय में अणु के स्थान पर परमाणु को सबसे सूक्ष्म कण कहा जाने लगा; फिर पता चला कि परमाणु तीन अति-सूक्ष्म कणों से मिलकर बना है; और अब परमाणु की रचना करने वाले सूक्ष्म कणों की संख्या और अधिक हो गई है। साथ ही यह भी समझा जा रहा है कि ये कण अपने आप में कोई ठोस पदार्थ नहीं हैं वरन ऊर्जा का एक स्वरूप हैं। अब यह दिमाग को चकरा देने वाली बात है कि हम और हमारे चारों के ओर के सभी पदार्थ, चाहे वे ठोस हों, या द्रव्य हों, अथवा गैस हों, किसी ठोस पदार्थ से नहीं वरन ऊर्जा के विशिष्ट रीति से एकत्रित होकर एक विशेष रीति से व्यवहार और कार्य करने के द्वारा अस्तित्व में आए हैं। कैसे, वह जो पदार्थ नहीं है, उसने पदार्थ का स्वरूप और गुण प्राप्त कर लिया और सृष्टि की हर वस्तु, बात, और रूप में आ गया? और वह भी स्वतः ही, क्योंकि विज्ञान तो परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास नहीं रखता है! क्योंकि यह बात विज्ञान और वैज्ञानिक कहते हैं, इसलिए संसार के लोग इसे स्वीकार करते हैं, मानते हैं, और इसमें कोई त्रुटि होने की कल्पना भी नहीं कर सकते हैं। किन्तु यही असंभव प्रतीत होने वाले बात यदि बाइबल में लिखी होती, तो इसका उपहास होता, आलोचना होती, और इसपर विश्वास करने में लोगों को बहुत समस्या होती। अब क्या विज्ञान भी व्यक्तिगत विश्वास की बात नहीं है?

            यह भी माना जाता था कि रौश्नी की गति एक ही रहती है, बदलती नहीं है; और यह भी  माना जाता था कि अंतरिक्ष वैक्यूम या शून्य है जिसमें रौश्नी निर्बाद्ध जाती है। किन्तु अब यह पता चल चुका है कि रौश्नी की गति हर स्थिति में एक ही नहीं रहती है, बदल सकती है; और अंतरिक्ष वैक्यूम या शून्य नहीं है, वरन अति-सूक्ष्म कण विद्यमान हैं जो रौश्नी की गति को प्रभावित कर सकते हैं। तो फिर अब उन धारणाओं और सिद्धांतों का क्या जो इस आधार पर बनाए गए थे कि रौश्नी की गति अपरिवर्तनीय है तथा अंतरिक्ष वैक्यूम या शून्य है, जिसके आधार पर सितारों और नक्षत्रों की पृथ्वी से दूरी और उनकी गति आदि का आँकलन किया गया है ?

            चिकित्सा विज्ञान में आए दिन परिवर्तन होते रहते हैं, और जो कभी इलाज के स्थापित तरीके माने जाते थे, उनमें कितने ही परिवर्तन आ चुके हैं, और उन पुराने इलाजों को अब कोई स्वीकार नहीं करता है। इसी प्रकार जीव-विज्ञान, भौतिक शास्त्र और रसायन शास्त्र आदि में भी बहुत सी बातों में परिवर्तन आए हैं। इसलिए यह मान लेना कि विज्ञान की बातें सदा ही दृढ़ और स्थिर तथा अपरिवर्तनीय रहती हैं, सदा सत्य ही होती हैं, सत्य नहीं है। विज्ञान की बातें भी बदलती रहती हैं। केवल एक ही सदा स्थिर, दृढ़ और अपरिवर्तनीय है - परमेश्वर और उसका शाश्वत वचन।

            बाइबल के अनुसार, यह समस्त सृष्टि, जिसे अभी तक वैज्ञानिक ठीक से देख और समझ नहीं पाए हैं, और जिसकी जटिलता तथा बारीकियों को लेकर आए दिन अचरज में पड़ते रहते हैं, परमेश्वर द्वारा बनाई गई है। अब यह कैसे संभव है कि परमेश्वर की रची गई सृष्टि उसके ही विरुद्ध गवाही देगी? सृष्टि का अध्ययन सृष्टिकर्ता परमेश्वर के अस्तित्व को ही नकार देगा? वरन, इसके विपरीत, सृष्टि तो अपने सृष्टिकर्ता के पक्ष में बताएगी; उसकी अद्भुत बुद्धिमता और कारीगरी की पुष्टि करेगी – यदि उसे ठीक से देखा, परखा, पहचान, और समझा जाए तो। यह बात बाइबल के साथ भी पूर्णतः लागू होती है। बाइबल अवैज्ञानिक नहीं है; और न ही सभी वैज्ञानिक बाइबल को गलत समझते हैं। तथ्य तो ये है कि संसार के महानतमवैज्ञानिकों में से अधिकांश, जैसे के न्यूटन, फैराडे, रॉबर्ट बॉयल, जेम्स मैक्सवेल,बाइबल पर विश्वास करते थे; वर्तमान सदी के भी अनेकों वैज्ञानिक मसीही हैं विज्ञान की बातें बाइबल की बातों को गलत नहीं प्रमाणित करती हैं। परमेश्वर ने अपने वचन बाइबल में हजारों और सैकड़ों वर्ष पहले अनेकों बातें लिखवा दी थीं, जिन्हें विज्ञान ने बहुत बाद में, या कुछ समय पहले ही पहचाना है।

            बाइबल में लिखी इन बातों को पहचानने में सहायक होने के लिए एक आधारभूत बात का ध्यान रखना होगा - जिस समय और जिन परिस्थितियों में बाइबल की पुस्तकें, अपने-अपने समय में लिखी गईं थीं, तब विज्ञान इस स्वरूप में नहीं था जैसा आज है, और न ही वैज्ञानिक शब्दावली, जो वर्तमान में होती है, प्रयोग हुआ करती थी। बाइबल की बातें सामान्य, साधारण लोगों के लिए लिखी गई थीं; ऐसे लोगों के लिए, जिनमें से बहुत ही कम शिक्षित होते थे, या कुछ गूढ़ समझने की क्षमता रखते थे। बाइबल की बातें उनके दिन-प्रतिदिन के जीवन और व्यवहार के संदर्भ में लिखी गई थीं, इसलिए उन बातों को लिखने के लिए उसी प्रकार की भाषा का प्रयोग किया गया है, जो उन लोगों के लिए सहज और समझ में आने वाली हो। बाइबल वैज्ञानिक सिद्धांत बताने या समझाने के दृष्टिकोण से लिखी गई विज्ञान की पुस्तक नहीं है। किन्तु फिर भी इन सीमाओं में भी परमेश्वर ने अपने वचन में ऐसी बहुत सी बातें लिखवाई हैं, जो जनसाधारण के लिए भी उपयोगी हैं, किन्तु उन में विज्ञान के रहस्य भी सांकेतिक अथवा प्रत्यक्ष रीति से लिखे गए हैं, और जिन्हें वर्तमान समय में पहचाना गया है, तथा बाइबल के ज्ञाताओं ने दिखाया है कि ये बाइबल में पहले से लिखा था। हम अगले लेख में ऐसी ही कुछ बातों को देखेंगे।

 

बाइबल पाठ: भजन 86:11-17

भजन 86:11 हे यहोवा अपना मार्ग मुझे दिखा, तब मैं तेरे सत्य मार्ग पर चलूंगा, मुझ को एक चित्त कर कि मैं तेरे नाम का भय मानूं।

भजन 86:12 हे प्रभु हे मेरे परमेश्वर मैं अपने सम्पूर्ण मन से तेरा धन्यवाद करूंगा, और तेरे नाम की महिमा सदा करता रहूंगा।

भजन 86:13 क्योंकि तेरी करुणा मेरे ऊपर बड़ी है; और तू ने मुझ को अधोलोक की तह में जाने से बचा लिया है।।

भजन  86:14 हे परमेश्वर अभिमानी लोग तो मेरे विरुद्ध उठे हैं, और बलात्कारियों का समाज मेरे प्राण का खोजी हुआ है, और वे तेरा कुछ विचार नहीं रखते।

भजन 86:15 परन्तु प्रभु तू दयालु और अनुग्रहकारी ईश्वर है, तू विलम्ब से कोप करने वाला और अति करुणामय है।

भजन 86:16 मेरी ओर फिर कर मुझ पर अनुग्रह कर; अपने दास को तू शक्ति दे, और अपनी दासी के पुत्र का उद्धार कर।।

भजन 86:17 मुझे भलाई का कोई लक्षण दिखा, जिसे देख कर मेरे बैरी निराश हों, क्योंकि हे यहोवा तू ने आप मेरी सहायता की और मुझे शान्ति दी है।

 

एक साल में बाइबल: 

  • भजन 87-88
  • रोमियों 1

गुरुवार, 12 अगस्त 2021

परमेश्वर का वचन – बाइबल – अनुपम एवं विशिष्ट – 8


8. जीवन, साहित्य, कला, और सभ्यताओं पर प्रभाव में अनुपम

            बाइबल के द्वारा जिस प्रकार से लोगों के जीवन परिवर्तित हुए और हो रहे हैं, वह विलक्षण है। संसार भर में अनगिनत लोग हैं, जिन्होंने बाइबल को पढ़ा, परमेश्वर को पहचाना, और उसे अपना जीवन समर्पित कर दिया। यह परिवर्तन संसार के हर स्थान, हर धर्म, हर विचारधारा के लोगों में देखा जाता है, नास्तिकों में भी। बाइबल के वचन लोगों को उनके पापों के लिए कायल करते हैं, बेचैन करते हैं। जो संवेदनशील होकर अपने विवेक की आवाज़ को सुनते हैं, अपने कायल होने के अनुसार, विचार-विमर्श करते हैं, सच्चाई को पहचानने का प्रयास करते हैं, परमेश्वर का वचन उनसे बात करता है, उन्हें सही मार्ग दिखाता है, और उन्हें उनके पापों के लिए पश्चाताप में लेकर आता है। यह सिलसिला लगभग दो हज़ार वर्ष पूर्व, प्रभु यीशु के शिष्य पतरस द्वारा यरूशलेम में धार्मिक पर्व मनाने के लिए एकत्रित हुए धर्मी यहूदियों के मध्य किए गए प्रचार से आरंभ हुआ था; जिसके विषय लिखा है: "तब सुनने वालों के हृदय छिद गए, और वे पतरस और शेष प्रेरितों से पूछने लगे, कि हे भाइयों, हम क्या करें? पतरस ने उन से कहा, मन फिराओ, और तुम में से हर एक अपने अपने पापों की क्षमा के लिये यीशु मसीह के नाम से बपतिस्मा ले; तो तुम पवित्र आत्मा का दान पाओगे" (प्रेरितों 2:37-38), और परमेश्वर के वचन के उस एक प्रचार परिणामस्वरूप "सो जिन्होंने उसका वचन ग्रहण किया उन्होंने बपतिस्मा लिया; और उसी दिन तीन हजार मनुष्यों के लगभग उन में मिल गए" (प्रेरितों 2:41)। और तब से लेकर आज दिन तक, तब यरूशलेम से लेकर आज संसार के हर स्थान में, यह सिलसिला अविरल, नियमित चलता चला आ रहा है,

            प्रतिदिन, प्रतिपल, संसार भर में लोगों के जीवन बदले जा रहे हैं। जिन्होंने परमेश्वर के वचन के सत्य को पहचाना, वो फिर उसके लिए अपने घर-बार, जमीन-जायदाद तथा नौकरी-व्यवसाय छोड़ने, यहाँ तक कि प्राणों की भी आहुति देने के लिए तैयार हो गए, किन्तु बाइबल द्वारा उनके जीवनों में आए परिवर्तन से फिर मुंह नहीं मोड़ा। जो बाइबल के आज्ञाकारी हो गए, उनके जीवन की दिशा और प्राथमिकताएं  बदल गईं; जिन बुरी आदतों और व्यवहारों को वो छोड़ नहीं पा रहे थे, या जो बातें पहले उन्हें बुरी लगती भी नहीं थीं, वे बाइबल की आज्ञाकारिता में आ जाने के बाद स्वतः ही उनके जीवनों से जाती रहीं। उन्हें बहुधा अपने इस विश्वास और निर्णय की एक बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ी, समाज और परिवार का बहुत विरोध सहन करना पड़ा, किन्तु सत्य की पहचान हो जाने के बाद, फिर वे उस सत्य पर बने ही रहे, सहते रहे, निभाते रहे, और परमेश्वर की शांति तथा आशीषों का अनुभव करने वाले, तथा औरों को उसके बारे में बताने वाले बन गए।

            संसार भर के साहित्य और कला पर बाइबल की बातों, घटनाओं, शिक्षाओं, और पात्रों ने बहुत गहरी छाप छोड़ी है। बाइबल से संबंधित बातों को लेकर जितनी पुस्तकें, लेख, कहानियाँ, उपन्यास, गीत, कविताएं, नाटक आदि लिखे गए हैं उतने किसी भी अन्य पुस्तक के द्वारा कभी भी प्रेरित होकर नहीं रचे या लिखे गए हैं। साहित्य में अनेकों मुहावरे बाइबल की शिक्षाओं और बातों से निकले हैं। कला के क्षेत्र में भी जितनी कलाकृतियाँ बाइबल की बातों के आधार पर बनाई गई हैं, उतनी संसार की किसे भी अन्य पुस्तक की बातों के आधार पर नहीं बनी हैं - वे चाहे शिल्प कला और मूर्तियाँ हों, विभिन्न प्रकार के चित्र हों, या संगीत कला में स्तुति गीत और भजन आदि हों। इस प्रकार की प्रेरणा पाई हुई कृतियाँ अन्य हर धर्म और विश्वास और स्थान में भी पाई जाती हैं, किन्तु वे अधिकांशतः किसी एक विशेष स्थान या क्षेत्र, और भाषा, संस्कृति आदि तक ही सीमित रहती हैं। किन्तु जितनी संख्या और विविधता में बाइबल की प्रेरणा से संसार भर में हर प्रकार के साहित्य और कला पर प्रभाव निरंतर चलता चला आ रहा है, वह अभूतपूर्व है, अनुपम है, विलक्षण है; उसका कोई सानी नहीं है।

            बाइबल में दी गई परमेश्वर की दस आज्ञाएँ अपने आप में अनुपम और अनूठी हैं। पुराने नियम में निर्गमन 20:1-17 में दी गई इन दस आज्ञाओं में परमेश्वर के स्वरूप और चरित्र, मनुष्य और परमेश्वर के संबंध, तथा मनुष्य के साथ मनुष्य के पारिवारिक एवं सामाजिक संबंधों के विषय परमेश्वर की आज्ञाएँ दी गई हैं। और अद्भुत, विलक्षण बात यह है कि संसार के किसी भी देश के किसी भी संविधान में, वह चाहे कितना भी वृहत क्यों न हो, ऐसा कुछ नहीं है, जो इन दस आज्ञाओं की परिधि में न पाया जाता हो, या इनके अन्तर्गत न देखा जा सकता हो।

            प्रभु यीशु मसीह के प्रभाव के बारे में कहा गया है, "वे संसार के इतिहास के महानतम व्यक्ति हैं। उन्होंने कोई सेवक नहीं रखे, लेकिन लोगों ने उन्हें 'स्वामी' कहकर संबोधित किया। उनके पास कोई शैक्षिक योग्यता नहीं थी, किन्तु उनके समय के विद्वानों, धर्म-गुरुओं, और आम लोगों ने उन्हें 'हे गुरु' कहा। उनके पास कोई औषधि नहीं थी, किन्तु वे इतिहास के सबसे महान चंगाई देने वाले हुए। उनकी कोई सेना नहीं थी, किन्तु राजा उनसे थर्राते थे। उन्होंने कोई सैनिक अभियान अथवा युद्ध नहीं लड़े, फिर भी वे सारे विश्व पर जयवंत हैं। उन्होंने कोई पाप, कोई अपराध नहीं किया, फिर भी उन्हें क्रूस पर चढ़ाकर मार डाल गया। उन्हें कब्र में गाड़ कर उसे भारी पत्थर से मुहरबंद कर दिया गया और सैनिकों का पहरा बैठा दिया गया, किन्तु वे तीसरे दिन जीवित होकर कब्र से बाहर आ गए और आज भी जीवित हैं, तथा हर उस हृदय में रहते हैं जो उन्हें स्वेच्छा से समर्पित होकर आमंत्रित करता है।"

            बाइबल की शिक्षाओं ने सभ्यताओं और समाजों के व्यवहारों को बदल डाला है - हजारों वर्ष पुरानी और प्राचीनतम सभ्यताओं की भी अनुचित तथा अनुपयुक्त बातों को सुधार दिया है, जिन्हें वे सभ्यताएं और उनके लोग स्वयं नहीं पहचान और सुधार पाए। बाइबल की शिक्षाओं के आधार पर संसार भर के अनेकों स्थानों में व्याप्त कुरीतियाँ, जैसे कि मनुष्यों में परस्पर भेद-भाव का व्यवहार और मनुष्यों को ऊंचा-नीचा देखना, बाल-विवाह, रंग-भेद, दास प्रथा, स्त्रियों का दमन और उनके साथ दुर्व्यवहार, नर-भक्षी प्रथाएं, शिक्षा को केवल कुछ विशेष लोगों तक ही सीमित रखना, आदि को बुराई के रूप में पहचाना तथा मिटाया गया है; यह करने के लिए संविधान बनाए अथवा बदले गए हैं या संशोधित किए गए हैं। संसार भर में जहाँ-जहाँ भी बाइबल के प्रचारक गए हैं, वहाँ उनके साथ समाज के सभी लोगों के लिए समान शिक्षा, सभी लोगों को हर प्रकार की शिक्षा उपलब्ध करवाने के लिए शिक्षा-संस्थान और विद्यालय, सभी को समाज में आदर का स्थान तथा समाज सुधार, सभी के लिए चिकित्सा सुविधाएं, महिलाओं का उत्थान आदि भी साथ ही होता चला गया है।

            क्या यह सब किसी मनुष्य की कल्पना या विचारों के द्वारा लिखी गई बातों से संभव है वास्तविकता तो यह कि बाइबल की बातों और शिक्षाओं ने ही मनुष्यों के विचारों और कल्पनाओं से लिखी गई बातों में पलने और बनी रहने वाली सामाजिक कुरीतियों को सुधार कर लोगों के जीवनों को एक नई दिशा, एक नया मार्गदर्शन प्रदान किया है।

 

बाइबल पाठ: भजन 119:97-105

भजन 119:97 अहा! मैं तेरी व्यवस्था में कैसी प्रीति रखता हूं! दिन भर मेरा ध्यान उसी पर लगा रहता है।

भजन 119:98 तू अपनी आज्ञाओं के द्वारा मुझे अपने शत्रुओं से अधिक बुद्धिमान करता है, क्योंकि वे सदा मेरे मन में रहती हैं।

भजन 119:99 मैं अपने सब शिक्षकों से भी अधिक समझ रखता हूं, क्योंकि मेरा ध्यान तेरी चितौनियों पर लगा है।

भजन 119:100 मैं पुरनियों से भी समझदार हूं, क्योंकि मैं तेरे उपदेशों को पकड़े हुए हूं।

भजन 119:101 मैं ने अपने पांवों को हर एक बुरे रास्ते से रोक रखा है, जिस से मैं तेरे वचन के अनुसार चलूं।

भजन 119:102 मैं तेरे नियमों से नहीं हटा, क्योंकि तू ही ने मुझे शिक्षा दी है।

भजन 119:103 तेरे वचन मुझ को कैसे मीठे लगते हैं, वे मेरे मुंह में मधु से भी मीठे हैं!

भजन 119:104 तेरे उपदेशों के कारण मैं समझदार हो जाता हूं, इसलिये मैं सब मिथ्या मार्गों से बैर रखता हूं।

भजन 119:105 तेरा वचन मेरे पांव के लिये दीपक, और मेरे मार्ग के लिये उजियाला है।

 

एक साल में बाइबल: 

  • भजन 84 -86
  • रोमियों 1

बुधवार, 11 अगस्त 2021

परमेश्वर का वचन – बाइबल – अनुपम एवं विशिष्ट – 7


7. बचे रहने में अनुपम और विशिष्ट

            संसार के इतिहास में जितना प्रयास बाइबल को नष्ट करने के लिए किया गया है, उतना किसी भी अन्य पुस्तक या ग्रंथ के लिए नहीं किया गया, किन्तु इन सभी प्रयासों के बावजूद, बाइबल सुरक्षित बनी रही, और संसार के इतिहास में सर्वाधिक बिकने तथा वितरित होने वाली पुस्तक है।

            बाइबल की आरंभिक पुस्तकें papyrus (पेपिरस या भोजपत्रों) पर हाथ से लिखी गई थीं। पेपिरस मिस्र और सीरिया की नदियों और छिछले पानी के तालाबों में उगाने वाला एक प्रकार का नरकट या सरकंडा होता है, जिसे पतला काट और छील कर, उसकी परतों को आपस में दबा कर, सुखा कर कागज के समान लिखने के योग्य बनाया जाता था। अंग्रेजी शब्द paper इसी पेपिरस से बने लिखने की सामग्री से आया है। बाद में चर्मपत्रों पर, जो पशुओं की खाल से बनाए जाते थे, लिखना आरंभ हुआ। यह बहुत अचरज की बात है कि नाजुक और नाशमान, शीघ्र गल या खराब हो जाने वाले पेपिरस पर लिखे हुए उपलब्ध सबसे प्राचीन लेख लगभग 2400 ईस्वी पूर्व के हैं।

            बाइबल की लेखों की सत्यता और सही होने पर भी प्रश्न उठाए गए हैं। बाइबल के पुराने नियम की पुस्तकों को हाथ से लिखने के लिए यहूदियों में विशेष प्रशिक्षण पाए हुए लोग प्रयोग किए जाते थे। उन लेखों के हर अक्षर, मात्रा, शब्द, और परिच्छेद की गिनती की हुई थी, और प्रत्येक हस्तलिपि का प्रत्येक पृष्ठ बारीकी से उस संख्या के अनुसार सही होने के लिए लिखें वाले से भिन्न अन्य प्रशिक्षित लोगों के द्वारा जाँचा जाता था, और बिना त्रुटि के पाए जाने पर ही उसे संकलित करने के लिए स्वीकार किया जाता था, अन्यथा उसे नष्ट कर दिया जाता था, जिससे त्रुटिपूर्ण लेख की संकलित पुस्तक में सम्मिलित होने के कोई संभावना शेष न रहे। इस प्रकार से यहूदियों ने यह सुनिश्चित किया हुआ था कि उन्हें मिले परमेश्वर के वचन का हर अक्षर, मात्रा, शब्द, और अनुच्छेद ठीक वैसा ही रहे जैसे वह मूल स्वरूप में था। बाइबल की पुस्तकों से संबंधित जितने भी पुराने लेख  या उनके जो भी अंश मिले हैं, उनका अवलोकन करने से यह बात स्पष्ट है कि जैसा उन पुराने लेखों में था, लेख वैसे ही आज भी विद्यमान है।

            इन नाशमान सामग्रियों पर हाथ से इतने परिश्रम से लिखे जाने के बावजूद, बाइबल की अनेकों पुस्तकों के प्राचीन लेख या उनके अंश की प्रतिलिपियाँ आज भी विद्यमान हैं, समय और वातावरण के प्रभाव के कारण सभी नष्ट नहीं हुईं, और प्रमाणित करती हैं कि उन लेखों में लिखी बात सदियों और हजारों वर्षों से अपरिवर्तित चली आ रही है।

            संसार भर में, बाइबल के संकलित होकर एक पुस्तक बनने के आरंभ से ही, बाइबल के शत्रुओं ने उसे नष्ट करके समाप्त करने के अनगिनत प्रयास किए हैं। बाइबल के प्रसारण पर प्रतिबंध लगे गए, उसकी प्रतियों को खोज-खोज कर एकत्रित किया गया और जला दिया गया। रोमी शासन से लेकर वर्तमान समय में कम्युनिस्ट देशों में उसे कानून द्वारा वर्जित कर दिया गया, उसकी प्रतियों को अपने साथ रखना दण्डनीय अपराध घोषित किया गया। किन्तु बाइबल की प्रतियाँ फिर भी बची रहीं, और बढ़ती रहीं; लोगों ने जान पर खेलकर या जान तक देकर, बेघर होकर, बंदीगृहों में कठोर दंड सहने के लिए डाल दिए जाने के बावजूद बाइबल को बचा कर रखा, और उसे प्रकाशित तथा प्रसारित करते रहे।

            वोल्टेयर नामक विख्यात फ्रांसीसी नास्तिक और परमेश्वर का घोर विरोध एवं निन्दा करने वाले व्यक्ति ने, जिसका देहांत 1778 में हुआ था, भविष्यवाणी की थी कि उसके समय से 100 वर्ष के अंदर ही, मसीही विश्वास और बाइबल दोनों समाप्त हो जाएंगे, इतिहास में दब कर रह जाएंगे। वोल्टेयर जाता रहा, उसकी भविष्यवाणी भी बिना पूरी हुए जाती रही; किन्तु एक बहुत रोचक बात भी हुई। वोल्टेयर की मृत्यु के पचास वर्ष बाद, जेनेवा बाइबल सोसायटी ने वोल्टेयर के घर को खरीद लिया, और फिर उसके घर में लगी छापने की मशीन से बाइबल की छपाई होने लगी, छपी हुई बाइबल का प्रसार और वितरण उसी के घर से होना आरंभ हो गया। प्रभु यीशु मसीह ने कहा था, "आकाश और पृथ्वी टल जाएंगे, परन्तु मेरी बातें कभी न टलेंगी" (मरकुस 13:31), और आज तक उनकी कही यह बात सही प्रमाणित होती रही है; कोई परमेश्वर के वचन को नाश अथवा झूठा प्रमाणित करने नहीं करने पाया है।

            आलोचकों ने कई धारणाएं बनाई, कि बाइबल को झूठा या गलत प्रमाणित कर दें। एक प्रयास यह तर्क देने के द्वारा किया गए कि मूसा द्वारा लिखी बाइबल की पहली पाँच पुस्तकें उसके द्वारा लिखी हुई हो ही नहीं सकती थीं क्योंकि मूसा के समय (1500-1400 ईस्वी पूर्व) तक लिखना इतना विकसित ही नहीं होने पाया था; इसलिए वे पुस्तकें बाद में कभी लिखी गई होंगे, और उन्हें मूसा के नाम रख दिया गया है। किन्तु इस तर्क और धारणा के दिए जाने के कुछ समय बाद "हममूराबी की लाठ" खोज निकाली गई; पत्थर की इस लाठ पर उसके द्वारा उसके राज्य में लागू किए गए नियम लिखे हैं, और यह लाठ मूसा से सैकड़ों वर्ष पुरानी है - अर्थात, यह प्रमाणित हो गया कि मूसा के समय से भी बहुत पहले से लोग लिखना जानते थे, और लिखित नियम विद्यमान थे। बाद में हुई अन्य पुरातत्व खोजों ने भी यह प्रमाणित कर दिया है कि मूसा के समय से पहले भी लिखित सामग्री विद्यमान थी, भाषा विकसित हो चुकी थी। इसी प्रकार का एक अन्य तर्क यह दिया गया था कि अब्राहम के साथ उत्पत्ति की पुस्तक में जिन हित्ती लोगों का उल्लेख आया है, उनका बाइबल के बाहर कोई प्रमाण नहीं है। किन्तु पुरातत्व खोजों ने इस दावे को भी झूठा दिखा दिया और हित्तियों की प्राचीन सभ्यता को उजागर कर दिया।

            आज तक भी, सारे संसार भर में, और सारे इतिहास में, बाइबल को गलत या झूठा प्रमाणित करने, उसे नष्ट करने के सभी प्रयास असफल ही रहे हैं। बाइबल को नष्ट करने का प्रयास करने वाले नाश हो गए, किन्तु परमेश्वर का वचन बाइबल आज भी स्थिर और दृढ़ स्थापित है, अटल है, अचूक है।

 

बाइबल पाठ: यशायाह 40:1-8

यशायाह 40:1 तुम्हारा परमेश्वर यह कहता है, मेरी प्रजा को शान्ति दो, शान्ति!

यशायाह 40:2 यरूशलेम से शान्ति की बातें कहो; और उस से पुकार कर कहो कि तेरी कठिन सेवा पूरी हुई है, तेरे अधर्म का दण्ड अंगीकार किया गया है: यहोवा के हाथ से तू अपने सब पापों का दूना दण्ड पा चुका है।

यशायाह 40:3 किसी की पुकार सुनाई देती है, जंगल में यहोवा का मार्ग सुधारो, हमारे परमेश्वर के लिये अराबा में एक राजमार्ग चौरस करो।

यशायाह 40:4 हर एक तराई भर दी जाए और हर एक पहाड़ और पहाड़ी गिरा दी जाए; जो टेढ़ा है वह सीधा और जो ऊंचा नीचा है वह चौरस किया जाए।

यशायाह 40:5 तब यहोवा का तेज प्रगट होगा और सब प्राणी उसको एक संग देखेंगे; क्योंकि यहोवा ने आप ही ऐसा कहा है।

यशायाह 40:6 बोलने वाले का वचन सुनाई दिया, प्रचार कर! मैं ने कहा, मैं क्या प्रचार करूं? सब प्राणी घास हैं, उनकी शोभा मैदान के फूल के समान है।

यशायाह 40:7 जब यहोवा की सांस उस पर चलती है, तब घास सूख जाती है, और फूल मुर्झा जाता है; नि:सन्देह प्रजा घास है।

यशायाह 40:8 घास तो सूख जाती, और फूल मुर्झा जाता है; परन्तु हमारे परमेश्वर का वचन सदैव अटल रहेगा।

 

एक साल में बाइबल: 

  • भजन 81 -83
  • रोमियों 11:19-36

मंगलवार, 10 अगस्त 2021

परमेश्वर का वचन – बाइबल – अनुपम एवं विशिष्ट – 6

 

6. प्रसार और अनुवाद में अनुपम

            प्रसार: किसी पुस्तक के बारे में यह सुनना कोई असामान्य बात नहीं है कि उसकी कुछ हज़ार या दसियों हज़ार प्रतियां बिक गई हैं, और वह सर्वाधिक बिकने वाली पुस्तकों के सूची में सम्मिलित हो गई है। ऐसी पुस्तकों की संख्या बहुत कम है जिनकी लाखों या दसियों लाख प्रतियों की बिक्री हुई है; ऐसी पुस्तकें तो और भी कम हैं जिनकी बिक्री या वितरित हुई प्रतियों की संख्या करोड़ या करोड़ों में हो। ऐसे में यह भौंचक्का कर देने वाली बात है कि संसार के इतिहास में बाइबल ही एकमात्र ऐसी पुस्तक है जिसकी संसार भर में विभिन्न भाषाओं में बिक्री अथवा वितरित हुई प्रतियों की संख्या अरबों में है। छपाई के इतिहास के आरंभ होने से लेकर आज तक, बाइबल ही एकमात्र ऐसी पुस्तक है जो लगातार, बिना कभी भी किसी अन्य पुस्तक को स्थान दिए, संसार की सर्वाधिक बिकने तथा वितरित होने वाली पुस्तक रही है।

            संसार भर में बाइबल को प्रकाशित करने वाली अनेकों संस्थाएं हैं; हर देश में बाइबल को प्रकाशित करने वाली अपनी संस्थाएं हैं। यूनाइटिड बाइबल सोसायटी, एक ऐसी संस्था है जो संसार भर में बाइबल प्रकाशन और वितरण का कार्य करती है; सारे संसार में उसकी शाखाएं और दफ्तर हैं। उनके सभी शाखाओं और दफ्तरों द्वारा 1998 में  वितरित की गई बाइबलों की रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने तब संसार भर में 208 लाख सम्पूर्ण बाइबल, तथा इसके अतिरिक्त 201 लाख नए या पुराने नियम की प्रतियाँ वितरित की थीं। यदि बाइबल के सभी स्वरूपों – सम्पूर्ण बाइबल, पुराना या नए नियम की प्रतियाँ, बाइबल के कुछ भाग जैसे कि बाइबल की कोई पुस्तक, बाइबल के कुछ अंश, या किसी विषय पर बाइबल के संकलित अंशों के लेख आदि की कुल गणना देखी जाए तो यह संख्या 5850 लाख पहुँच जाती है – और यह केवल यूनाइटिड बाइबल सोसायटीस द्वारा प्रकाशित तथा वितरित की गई बाइबल या उसके भाग अथवा अंश की संख्या है। यदि संसार भर में अन्य संस्थाओं द्वारा किए गए ऐसे ही वितरण के आँकड़े एकत्रित किए जाएं, और आज के समय तक के किए गए कार्य को देखा जाए, तो अनुमान लगाइए कि संख्या कहाँ पहुँचेगी। संसार के इतिहास में कोई अन्य पुस्तक नहीं है जो बाइबल के प्रकाशन अथवा वितरण के आँकड़ों के कहीं निकट भी आती है। यदि बाइबल और उसके भागों की संसार भर में इतनी माँग न होती, तो यह कार्य कैसे संभव होता; वह भी सारे संसार में, और छपाई के आरंभ से लेकर आज दिन तक, निरंतर? संसार भर में बाइबल, या बाइबल के भाग, या बाइबल के अंश ही सर्वाधिक पढ़े जाने वाले लेख हैं। विचार करने वाली बात है, बाइबल और उसके संदेश में कुछ तो विलक्षण तथा अनुपम होगा, कि उनकी इतनी माँग संसार भर में बनी हुई है।

            अनुवाद: जैसे प्रभावशाली और विस्मित करने वाले बाइबल के प्रकाशन और वितरण के आँकड़े हैं, उसी के समान प्रभावशाली और विस्मित करने वाले बाइबल के अनुवादों से संबंधित आँकड़े भी हैं।  

            संसार भर में छपने वाली अधिकांश पुस्तकें अपनी मूल भाषा के अतिरिक्त किसी अन्य भाषा में अनुवाद ही नहीं होती हैं। जो अनुवाद भी होती हैं, वो अधिकांशतः दो या तीन भाषाओं में अनुवाद होती हैं। बहुत ही कम पुस्तकें हैं जो अपनी संपूर्णता या भागों में भी 10 से लेकर 20 विभिन्न भाषाओं में अनुवाद हुई हैं। आज संसार की ज्ञात 6500 भाषाओं और बोलियों में से अधिकांश भाषाओं या बोलियों में बाइबल, या बाइबल का कोई भाग, अथवा अंश अनुवाद किया जा चुका है, और उसे प्रसारित किया गया है – छापे हुए स्वरूप में, अथवा औडियो रिकॉर्डिंग के रूप में; उन भाषाओं में भी जो केवल मौखिक हैं, जिनके लिखने के लिए कोई वर्णमाला तथा अक्षर नहीं हैं। जिन भाषाओं में केवल बाइबल के अंश हैं, उनमें बाइबल के भागों का अनुवाद ज़ारी है; और जिनमें अंश तथा भाग उपलब्ध हैं, उनमें सम्पूर्ण बाइबल का अनुवाद होना ज़ारी है। जैसे जैसे माँग बढ़ती जाती है, कार्य भी बढ़ता जाता है, और उपलब्ध हो जाने वाले अंश अथवा भाग या बाइबल वितरण के लिए उपयोग होते जाते हैं, वितरित होने लगते हैं। यदि यह कार्य औडियो रिकॉर्डिंग के रूप में है, तो उसे उसी स्वरूप में विभिन्न माध्यमों के द्वारा वितरित किया जाता है। कठिन प्रयासों और बाधाओं के बावजूद, संसार के सभी भू-भाग के लोगों के पास परमेश्वर का वचन, उनकी अपनी भाषा अथवा बोली में, उपलब्ध करवाया जा रहा है। अनेकों संस्थाएं संसार भर में इस कार्य में लगी हुई हैं; कुछ स्थानीय है, कुछ अंतर्राष्ट्रीय हैं; किन्तु सभी का यही प्रयास है कि संसार का कोई भू-भाग, कोई भाषा या बोली का समुदाय, उनकी अपनी भाषा में परमेश्वर के वचन से वंचित न रह जाए।

            अब यह बाइबल के आलोचकों और विरोधियों के लिए विचार करने और उत्तर ढूँढने की बात है कि बाइबल और उसके संदेश में आखिर ऐसा क्या है जो सारे संसार के सभी इलाकों में लोगों को प्रेरित कर रहा है कि अनेकों बाधाओं, विरोध, और समस्याओं का सामना करते हुए भी, बाइबल में विश्वास करने वाले, उसे संसार के हर व्यक्ति, हर समुदाय तक पहुंचाने में लगे हुए हैं। संसार के इतिहास में क्या कोई अन्य ऐसा ग्रंथ अथवा पुस्तक है जिसका इतना व्यापक प्रसार एवं अनुवाद किया गया हो? बाइबल में कुछ तो होगा जो लोगों में उसके संदेश के लिए एक भूख, एक लालसा उत्पन्न कर रहा है; और जिनके पास बाइबल और उसका संदेश है, उन्हें किसी भी कीमत पर उस संदेश को सारे संसार के सभी लोगों तक पहुंचाने के लिए प्रेरित कर रहा है, और करवाता जा रहा है!

            प्रभु यीशु मसीह ने जगत के अंत और सभी लोगों के न्याय के लिए जो चिह्न दिए थे (मत्ती 24 अध्याय), वे सभी पूरे होते जा रहे हैं; आज के विषय से संबंधित एक महत्वपूर्ण चिह्न है: “और राज्य का यह सुसमाचार सारे जगत में प्रचार किया जाएगा, कि सब जातियों पर गवाही हो, तब अन्त आ जाएगा” (मत्ती 24:14)। अब आप स्वयं देख लीजिए कि जगत अपने अंत और न्याय के कितना निकट खड़ा है। क्या आप अपने जीवन का हिसाब प्रभु परमेश्वर को देने के लिए तैयार हैं? यदि नहीं तो आज, अभी, जब अवसर है, और प्रभु का अनुग्रह उपलब्ध है, तो स्वेच्छा तथा सत्यनिष्ठा से, अपने पापों को स्वीकार करके, उन से पश्चाताप करके, प्रभु यीशु से उनके लिए क्षमा माँगकर, प्रभु यीशु को अपना जीवन समर्पित कीजिए और उसके वचन बाइबल के अध्ययन एवं पालन में समय लगाइए। सच्चे और समर्पित मन से की गई एक प्रार्थना, “हे प्रभु यीशु मेरे पाप क्षमा कर; मुझे अपनी शरण में ले, और मेरा जीवन बदल दे” आपको अनन्तकाल के लिए परमेश्वर की संतान और स्वर्गीय आशीषों का वारिस बना देगी – विलंब न करें, निर्णय अभी लें और उसका पालन करें।

 

बाइबल पाठ: 2 पतरस 3:8-18

2 पतरस 3:8 हे प्रियो, यह एक बात तुम से छिपी न रहे, कि प्रभु के यहां एक दिन हजार वर्ष के बराबर है, और हजार वर्ष एक दिन के बराबर हैं।

2 पतरस 3:9 प्रभु अपनी प्रतिज्ञा के विषय में देर नहीं करता, जैसी देर कितने लोग समझते हैं; पर तुम्हारे विषय में धीरज धरता है, और नहीं चाहता, कि कोई नाश हो; वरन यह कि सब को मन फिराव का अवसर मिले।

2 पतरस 3:10 परन्तु प्रभु का दिन चोर के समान आ जाएगा, उस दिन आकाश बड़ी हड़हड़ाहट के शब्द से जाता रहेगा, और तत्व बहुत ही तप्त हो कर पिघल जाएंगे, और पृथ्वी और उस पर के काम जल जाएंगे।

2 पतरस 3:11 तो जब कि ये सब वस्तुएं, इस रीति से पिघलने वाली हैं, तो तुम्हें पवित्र चाल चलन और भक्ति में कैसे मनुष्य होना चाहिए।

2 पतरस 3:12 और परमेश्वर के उस दिन की बाट किस रीति से जोहना चाहिए और उसके जल्द आने के लिये कैसा यत्न करना चाहिए; जिस के कारण आकाश आग से पिघल जाएंगे, और आकाश के गण बहुत ही तप्त हो कर गल जाएंगे।

2 पतरस 3:13 पर उस की प्रतिज्ञा के अनुसार हम एक नए आकाश और नई पृथ्वी की आस देखते हैं जिन में धामिर्कता वास करेगी।

2 पतरस 3:14 इसलिये, हे प्रियो, जब कि तुम इन बातों की आस देखते हो तो यत्न करो कि तुम शान्ति से उसके सामने निष्कलंक और निर्दोष ठहरो।

2 पतरस 3:15 और हमारे प्रभु के धीरज को उद्धार समझो, जैसे हमारे प्रिय भाई पौलुस न भी उस ज्ञान के अनुसार जो उसे मिला, तुम्हें लिखा है।

2 पतरस 3:16 वैसे ही उसने अपनी सब पत्रियों में भी इन बातों की चर्चा की है जिन में कितनी बातें ऐसी है, जिनका समझना कठिन है, और अनपढ़ और चंचल लोग उन के अर्थों को भी पवित्र शास्त्र की और बातों के समान खींच-तान कर अपने ही नाश का कारण बनाते हैं।

2 पतरस 3:17 इसलिये हे प्रियो तुम लोग पहिले ही से इन बातों को जान कर चौकस रहो, ताकि अधर्मियों के भ्रम में फंस कर अपनी स्थिरता को हाथ से कहीं खो न दो।

2 पतरस 3:18 पर हमारे प्रभु, और उद्धारकर्ता यीशु मसीह के अनुग्रह और पहचान में बढ़ते जाओ। उसी की महिमा अब भी हो, और युगानुयुग होती रहे। आमीन।

 

एक साल में बाइबल: 

  • भजन 79 -80
  • रोमियों 11:1-18