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शनिवार, 2 अक्टूबर 2021

मसीही विश्वास एवं शिष्यता - 2

 

आरंभिक मसीही विश्वासी 

मसीही विश्वास और शिष्यता पर इस नई शृंखला के पहले लेख में हमने कल परमेश्वर के वचन बाइबल में दिए गए इस विषय से संबंधित कुछ मूल तथ्यों को देखा था। हमने देखा था कि प्रभु यीशु मसीह ने न तो कोई धर्म बनाया, न अपने शिष्यों से बनवाया, न किसी धर्म के प्रचार के लिए कहा, और न ही किसी का कोई धर्म-परिवर्तन करने के निर्देश दिए। उन्होंने अपने शिष्यों से संसार भर में जाकर लोगों को प्रभु का चेला बनाने, और जो स्वेच्छा से चेला बनना स्वीकार करता है, उसे प्रभु की बातें सिखाने और केवल उसे ही बपतिस्मा देने के लिए कहा (मत्ती 28:18-20)। नए नियम की पाँचवीं पुस्तक, ‘प्रेरितों के काम’ प्रभु यीशु के मसीह के आरंभिक शिष्यों और उनके समूह - मसीही मण्डलियों का इतिहास है; अर्थात, कैसे सुसमाचार प्रचार आरंभ हुआ, कैसे लोगों में फैला, उसके क्या प्रभाव तथा प्रतिक्रियाएं हुईं - अनुकूल भी और प्रतिकूल भी, आदि। आरंभिक मसीही मण्डलियों के स्थापित होने, बढ़ने और फैलने का यह विवरण कई रोचक तथ्यों को प्रकट करता है; इनमें से कुछ तथ्य हैं:

  • सुसमाचार प्रचार और मण्डलियों की स्थापना परमेश्वर पवित्र आत्मा के शिष्यों पर उतर आने और उन्हें सामर्थ्य प्रदान करने के बाद ही होना था (प्रेरितों 1:8)। अर्थात, यह किसी मनुष्य द्वारा, या मनुष्यों के ज्ञान, बुद्धि और सामर्थ्य द्वारा किए जाने वाला कार्य नहीं था; यह केवल परमेश्वर की सामर्थ्य से और उसकी अगुवाई में होकर हो सकने वाला कार्य था। 
  • सबसे पहला प्रचार ‘भक्त यहूदियों’ (प्रेरितों 2:5) के मध्य किया गया जो धार्मिक अनुष्ठानों का निर्वाह करने के लिए संसार भर से यरूशलेम में एकत्रित हुए थे। उन यहूदियों ने जब प्रभु यीशु मसीह द्वारा पापों की क्षमा और उद्धार के सुसमाचार को सुना, तो उन भक्त यहूदियों के ‘हृदय छिद गए’ और वे प्रभु के शिष्यों से अपनी स्थिति के समाधान का मार्ग पूछने लगे। तब पतरस ने उन्हें पश्चाताप करने और प्रभु यीशु की शिष्यता में आने, और बपतिस्मे के द्वारा अपने इस निर्णय की गवाही देने के लिए कहा (प्रेरितों 2:37-38)। अर्थात, उद्धार और परमेश्वर को स्वीकार्य होना मनुष्यों के भले या धार्मिक कार्यों से नहीं है, वरन प्रभु यीशु मसीह को उद्धारकर्ता स्वीकार करने के द्वारा है। जब सुसमाचार ने उनके मन की वास्तविक स्थिति उन पर प्रकट कर दी, तो सुनने वालों को अपनी रीति-रिवाजों को मानने और मनाने की भक्ति की व्यर्थता, तथा पापों की क्षमा और उद्धार के लिए किसी अन्य वास्तव में कारगर उपाय की आवश्यकता का एहसास हो गया। 
  • आरंभ से ही मसीही विश्वासियों में चार गुण पाए जाते थे, जो आज भी व्यक्तिगत रीति से प्रत्येक सच्चे मसीही विश्वासी के जीवन के अभिन्न अंग हैं “और वे प्रेरितों से शिक्षा पाने, और संगति रखने में और रोटी तोड़ने में और प्रार्थना करने में लौलीन रहे” (प्रेरितों 2:42)। आज भी मसीही विश्वासियों की मण्डली की स्थिरता और उन्नति का आधार यही चार बातें हैं – मण्डली के लोगों द्वारा परमेश्वर के वचन का अध्ययन और शिक्षा, परस्पर संगति रखना, प्रभु-भोज में नियमित सम्मिलित होते रहना, और प्रार्थना करते रहना। 
  • प्रभु ही अपनी मण्डली में उद्धार पाए हुए लोगों को जोड़ता जाता था, और लोग उन मसीही विश्वासियों से प्रसन्न रहते थे “और परमेश्वर की स्तुति करते थे, और सब लोग उन से प्रसन्न थे: और जो उद्धार पाते थे, उन को प्रभु प्रति दिन उन में मिला देता था” (प्रेरितों 2:47)। 
  • मसीही विश्वासियों के कार्यों और सुसमाचार प्रचार से धर्म के अगुवे और सरदार बहुत अप्रसन्न हुए, जिससे प्रभु की मण्डलियों की स्थापना के साथ ही उन मण्डलियों और मण्डलियों के लोगों का विरोध एवं उन पर सताव भी आरंभ हो गया (प्रेरितों 3:1-3), किन्तु इससे मसीही विश्वासियों की संख्या में बढ़ोतरी ही हुई। 
  • मसीही विश्वासियों के समूहों, मसीही मण्डलियों के आरंभ के समय से ही हम कहीं पर भी किसी ‘ईसाई धर्म’ या ‘मसीही धर्म’ या ‘धर्म’ का कहीं कोई उल्लेख नहीं पाते हैं। प्रेरितों 2:42 की उपरोक्त चार आधारभूत शिक्षाओं के पालन के अतिरिक्त, मसीही विश्वासियों में और कोई प्रथा, अनुष्ठान, या रीति-रिवाज़ के पालन, अथवा किसी भी त्यौहार या दिन को मनाने का कोई उल्लेख नहीं है। 
  • गैर-मसीही लोगों ने मसीही विश्वासियों को एक नाम दिया था “पंथ के लोग” (प्रेरितों 9:2), और यही संज्ञा उनके साथ इस सारी पुस्तक में जुड़ी हुई है। अर्थात, लोगे देखते, जानते और मानते थे कि मसीही विश्वासी एक विशिष्ट लोगों का समुदाय है, जो सामान्य सांसारिकता और धार्मिक मार्गों से बिलकुल पृथक, एक अन्य ही विशिष्ट मार्ग पर चलते हैं; किन्तु इस ‘मार्ग’ या ‘पंथ’ का कोई अलग से नामकरण नहीं किया गया है, और न ही उस ‘पंथ’ या मार्ग को कोई ‘धर्म’ कहा गया है – न मसीहियों और न ही गैर-मसीहियों के द्वारा। 
  • कुछ समय के बाद में मसीह यीशु के इन्हीं विश्वासियों, इन्हीं शिष्यों को एक अन्य स्थान पर समाज के अन्य लोगों द्वारा “मसीही” कहा गया “...और ऐसा हुआ कि वे एक वर्ष तक कलीसिया के साथ मिलते और बहुत लोगों को उपदेश देते रहे, और चेले सब से पहिले अन्‍ताकिया ही में मसीही कहलाए” (प्रेरितों 11:26)। ध्यान कीजिए, एक बार फिर यह प्रकट है कि मसीही विश्वासियों को किसी धर्म को मानने वाले नहीं कहा गया, और न ही किसी धर्म के साथ उन्हें जोड़ा गया; साथ ही जो मसीह यीशु के शिष्य थे, वे ही मसीही कहलाए।  

 

            तो इस आरंभिक इतिहास से मसीही मण्डलियों और मसीही विश्वासियों के विषय में हम क्या शिक्षा लेते हैं? सर्वप्रथम - जो सच्चा मसीही विश्वासी होगा, उसमें प्रेरितों 2:42 की चारों आधारभूत बातें विद्यमान होंगी; वह उनके महत्व को समझेगा और मानेगा। दूसरे, मसीह यीशु का शिष्य होना, जीवनपर्यंत और हर परिस्थिति में एक ऐसी गवाही का जीवन जीना है कि समाज के लोग स्वतः ही पहचान जाएं कि प्रभु यीशु के ये अनुयायी अन्य सभी इसे भिन्न हैं, एक विशिष्ट ‘मार्ग’ या जीवन शैली के अनुसार रहते और चलते हैं। तीसरे, बाइबल में दी गई परिभाषा के अनुसार मसीही वही है जो प्रभु यीशु मसीह का शिष्य है, न कि किसी धर्म का पालन करने वाला या किन्हीं धार्मिक विधि-विधानों का निर्वाह करने वाला। और यह सामान्य समझ एवं जानकारी की बात है कि कोई भी व्यक्ति किसी का शिष्य बनकर जन्म नहीं लेता है, वरन वयस्क होकर, स्वेच्छा से, जाँच-परख कर, किसी की शिष्यता को ग्रहण करता है, उसकी आज्ञाकारिता  में अपने आप को समर्पित करता है। यही बात मसीही विश्वासी होने पर भी ऐसे ही लागू होती है। जैसा हम पहले के लेखों में विस्तार से देख चुके हैं, बाइबल के अनुसार, कोई भी व्यक्ति, कभी भी किसी परिवार विशेष में जन्म लेने से, या किसी धर्म विशेष के पालन करने से प्रभु यीशु का शिष्य नहीं हो जाता है। प्रत्येक व्यक्ति को अपने पापों के लिए पश्चाताप करके, प्रभु यीशु को अपना व्यक्तिगत उद्धारकर्ता स्वीकार करके, और उसकी शिष्यता में अपने आप को स्वेच्छा तथा सच्चे मन से समर्पित करने के द्वारा ही यह संभव होने पाता है; और इसी को ‘नया जन्म’ पाना, अर्थात नश्वर सांसारिक स्थिति से निकलकर अविनाशी आत्मिक जीवन में परमेश्वर की संतान बनकर जन्म लेना और प्रवेश करना कहते हैं। 

            कल हम मसीह यीशु में विश्वास करने के अर्थ को समझेंगे, उसका विश्लेषण करेंगे; और फिर उसके पश्चात बाइबल में दिए गए मसीही विश्वासी, या प्रभु यीशु मसीह के शिष्य के गुणों को कुछ विस्तार से देखना आरंभ करेंगे। यदि आपने अभी तक अपने आप को प्रभु यीशु मसीह की शिष्यता में समर्पित नहीं किया है, और आप अभी भी अपने जन्म अथवा संबंधित धर्म तथा उसकी रीतियों के पालन के आधार पर अपने आप को प्रभु का जन समझ रहे हैं, तो उन ‘भक्त यहूदियों’ के समान आपको भी अपनी इस गलतफहमी से बाहर निकलकर सच्चाई को स्वीकार करने और उसका पालन करने की आवश्यकता है। आज और अभी आपके पास अपनी अनन्तकाल की स्थिति को सुधारने का अवसर है; प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।  

           

बाइबल पाठ: प्रेरितों 2:21-24, 36-40  

प्रेरितों के काम 2:21 और जो कोई प्रभु का नाम लेगा, वही उद्धार पाएगा।

प्रेरितों के काम 2:22 हे इस्राएलियों, ये बातें सुनो: कि यीशु नासरी एक मनुष्य था जिस का परमेश्वर की ओर से होने का प्रमाण उन सामर्थ्य के कामों और आश्चर्य के कामों और चिन्हों से प्रगट है, जो परमेश्वर ने तुम्हारे बीच उसके द्वारा कर दिखलाए जिसे तुम आप ही जानते हो।

प्रेरितों के काम 2:23 उसी को, जब वह परमेश्वर की ठहराई हुई मनसा और होनहार के ज्ञान के अनुसार पकड़वाया गया, तो तुम ने अधर्मियों के हाथ से उसे क्रूस पर चढ़वा कर मार डाला।

प्रेरितों के काम 2:24 परन्तु उसी को परमेश्वर ने मृत्यु के बन्धनों से छुड़ाकर जिलाया: क्योंकि यह अनहोना था कि वह उसके वश में रहता।

प्रेरितों के काम 2:36 सो अब इस्राएल का सारा घराना निश्चय जान ले कि परमेश्वर ने उसी यीशु को जिसे तुम ने क्रूस पर चढ़ाया, प्रभु भी ठहराया और मसीह भी।

प्रेरितों के काम 2:37 तब सुनने वालों के हृदय छिद गए, और वे पतरस और शेष प्रेरितों से पूछने लगे, कि हे भाइयो, हम क्या करें?

प्रेरितों के काम 2:38 पतरस ने उन से कहा, मन फिराओ, और तुम में से हर एक अपने अपने पापों की क्षमा के लिये यीशु मसीह के नाम से बपतिस्मा ले; तो तुम पवित्र आत्मा का दान पाओगे।

प्रेरितों के काम 2:39 क्योंकि यह प्रतिज्ञा तुम, और तुम्हारी सन्तानों, और उन सब दूर दूर के लोगों के लिये भी है जिन को प्रभु हमारा परमेश्वर अपने पास बुलाएगा।

प्रेरितों के काम 2:40 उसने बहुत ओर बातों में भी गवाही दे देकर समझाया कि अपने आप को इस टेढ़ी जाति से बचाओ।

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • यशायाह 14-16  
  • इफिसियों 5:1-16  

शुक्रवार, 1 अक्टूबर 2021

मसीही विश्वास एवं शिष्यता - 1 - कुछ मूल तथ्य


मसीही विश्वास से संबंधित कुछ मूल तथ्य 

 

  पिछले लेखों में हम दो महत्वपूर्ण विषयों को देख चुके हैं कि (i) बाइबल को क्यों परमेश्वर का वचन कहा जाता है, तथा (ii) बाइबल के अनुसार पाप और उद्धार तथा इनमें निहित अभिप्राय क्या हैं, और इनसे जुड़ी हुई महत्वपूर्ण बातें क्या हैं। आज से हम इससे आगे का विषय “मसीही विश्वास एवं शिष्यता” को देखना आरंभ करेंगे, जो इन पिछले विषयों पर आधारित होगा तथा उनसे और आगे की बातों को प्रकट करेगा। इस शृंखला में विचार के लिए हम आज बाइबल के अनुसार उद्धार और नया जन्म पाने के लिए मसीही विश्वास से संबंधित कुछ मूल बातों को देखेंगे। 

  जैसा हम पहले के लेखों में देख चुके हैं, न तो परमेश्वर का कोई धर्म है, न परमेश्वर ने कभी कोई धर्म बनाया, और न ही प्रभु यीशु मसीह ने कभी अपने शिष्यों से उनके नाम पर कोई धर्म प्रतिपादित एवं स्थापित करने, किसी धर्म का प्रचार करने, या लोगों का धर्म परिवर्तन करवाने की कभी कोई शिक्षा अथवा निर्देश दिया। प्रभु यीशु ने अपने शिष्यों को संसार में इसी निर्देश के साथ भेजा कि वे सारे संसार में जाकर लोगों को इस उद्धार के सुसमाचार के बारे में बताएं, और उन्हें प्रभु यीशु मसीह के शिष्य बनाएं “यीशु ने उन के पास आकर कहा, कि स्वर्ग और पृथ्वी का सारा अधिकार मुझे दिया गया है। इसलिये तुम जा कर सब जातियों के लोगों को चेला बनाओ और उन्हें पिता और पुत्र और पवित्रआत्मा के नाम से बपतिस्मा दो। और उन्हें सब बातें जो मैं ने तुम्हें आज्ञा दी है, मानना सिखाओ: और देखो, मैं जगत के अन्त तक सदैव तुम्हारे संग हूं” (मत्ती 28:18-20)। साथ ही हम यह भी देख चुके हैं कि परमेश्वर ने संसार के सभी मनुष्यों के लिए जो पापों की क्षमा, उद्धार, और नया जन्म प्राप्त करने का प्रावधान किया है, वह न तो किसी धर्म के अंतर्गत किया, न उसे किसी धर्म विशेष से जोड़ा, और न ही उस समाधान में किसी धार्मिक रीति-रिवाज़ अथवा अनुष्ठान के निर्वाह की कोई भी भूमिका अथवा महत्व है, और न ही यह किन्हीं कार्यों अथवा कर्मों के द्वारा संपन्न अथवा लागू होता है। परमेश्वर द्वारा उपलब्ध करवाया गया यह निवारण पूर्णतः परमेश्वर प्रभु यीशु मसीह पर स्वेच्छा तथा पूरे मन से किए गए विश्वास ही पर आधारित है, और बिना किसी भी अन्य मनुष्य के इसमें सम्मिलित हुए अथवा मध्यस्थ हुए, केवल अपने पापों से पश्चाताप करने वाले मनुष्य और प्रभु यीशु मसीह के मध्य संबंध से है। यह सभी के लिए समान रीति से मुफ़्त में उपलब्ध है, वे चाहे किसी भी देश, धर्म, जाति, सामाजिक स्थान और स्तर, समृद्धि, शिक्षा, रंग, लिंग, आदि के क्यों न हो। साथ ही, परमेश्वर का यह प्रावधान वंशागत नहीं है; प्रत्येक मनुष्य को समझ-बूझकर अपने जीवन में इसे कार्यान्वित करने के लिए आप ही इसके विषय निर्णय लेना होता है, तब ही यह उसके जीवन में लागू हो सकता है। इस प्रावधान को उपलब्ध परमेश्वर ने करवाया है, स्वीकार करना अथवा अस्वीकार करना, यह प्रत्येक मनुष्य का अपना निर्णय है।

इसीलिए, परमेश्वर के वचन बाइबल के अनुसार, प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास करना, और उसके साथ संबंध स्थापित कर के उस संबंध का निर्वाह करना, मसीही विश्वास कहलाता है, कोई धर्म नहीं। इस मसीही विश्वास को बिगाड़ कर इसे ‘ईसाई धर्म’ का नाम और रूप देना न तो परमेश्वर की ओर से है, न परमेश्वर ने करवाया, और न परमेश्वर को स्वीकार्य है। बाइबल के अनुसार व्यक्ति चाहे ईसाई धर्म को माने, या किसी अन्य धर्म को, किन्तु जब तक वह नया जन्म लेकर मसीही विश्वासी नहीं बन जाता है, प्रभु यीशु के साथ एक व्यक्तिगत संबंध स्थापित करके प्रभु यीशु का शिष्य नहीं हो जाता है, तब तक वह अपने पापों में ही रहता है; और जो बिना पापों की क्षमा प्राप्त किए मरेगा, उसे फिर उन पापों के दण्ड को भोगना होगा, परमेश्वर से दूर नरक में जाना होगा, चाहे वह ईसाई धर्म का मानने वाला और ईसाई धर्म के रीति-रिवाजों, त्यौहारों, अनुष्ठानों का कितनी भी निष्ठा के साथ पालन क्यों न करता रहा हो।  

हम कल बाइबल में प्रथम चर्च या कलीसिया, अर्थात आरंभिक मसीही विश्वासियों के समूह या मंडली की गतिविधियों के लेख - नए नियम में प्रेरितों के काम नामक पुस्तक में से मसीही विश्वास को कुछ और विस्तार से देखेंगे और समझेंगे। आप यदि अभी भी अपने धर्म, धार्मिकता, भले कार्यों और नेक कर्मों, आदि के द्वारा परमेश्वर प्रभु यीशु मसीह से उद्धार और पापों की क्षमा के भ्रम में पड़े हुए हैं, तो मेरा आप से विनम्र निवेदन है कि परमेश्वर के वचन से इन बातों से संबंधित तथ्यों का अध्ययन कीजिए, और सही निर्णय कर लीजिए। आप पाप और उद्धार से संबंधित पहले के लेखों का अवलोकन करने के द्वारा भी इस विषय का अध्ययन कर सकते हैं। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपनी ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी। 

 

बाइबल पाठ: इफिसियों 2:1-9 

इफिसियों 2:1 और उसने तुम्हें भी जिलाया, जो अपने अपराधों और पापों के कारण मरे हुए थे।

इफिसियों 2:2 जिन में तुम पहिले इस संसार की रीति पर, और आकाश के अधिकार के हाकिम अर्थात उस आत्मा के अनुसार चलते थे, जो अब भी आज्ञा न मानने वालों में कार्य करता है।

इफिसियों 2:3 इन में हम भी सब के सब पहिले अपने शरीर की लालसाओं में दिन बिताते थे, और शरीर, और मन की मनसाएं पूरी करते थे, और और लोगों के समान स्वभाव ही से क्रोध की सन्तान थे।

इफिसियों 2:4 परन्तु परमेश्वर ने जो दया का धनी है; अपने उस बड़े प्रेम के कारण, जिस से उसने हम से प्रेम किया।

इफिसियों 2:5 जब हम अपराधों के कारण मरे हुए थे, तो हमें मसीह के साथ जिलाया; (अनुग्रह ही से तुम्हारा उद्धार हुआ है।)

इफिसियों 2:6 और मसीह यीशु में उसके साथ उठाया, और स्वर्गीय स्थानों में उसके साथ बैठाया।

इफिसियों 2:7 कि वह अपनी उस कृपा से जो मसीह यीशु में हम पर है, आने वाले समयों में अपने अनुग्रह का असीम धन दिखाए।

इफिसियों 2:8 क्योंकि विश्वास के द्वारा अनुग्रह ही से तुम्हारा उद्धार हुआ है, और यह तुम्हारी ओर से नहीं, वरन परमेश्वर का दान है।

इफिसियों 2:9 और न कर्मों के कारण, ऐसा न हो कि कोई घमण्ड करे।

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

·        यशायाह 11-13 

·        इफिसियों 4 

गुरुवार, 30 सितंबर 2021

परमेश्वर का वचन, बाइबल – पाप और उद्धार - 36


पाप का समाधान - उद्धार - 32 - कुछ संबंधित प्रश्न और उनके उत्तर (5)

       पिछले 4 लेखों में हम प्रभु यीशु मसीह में विश्वास द्वारा मिलने वाली पापों की क्षमा, उद्धार, और नया जन्म पाने से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण और सामान्यतः पूछे जाने वाले प्रश्नों को देखते आ रहे हैं। पिछले लेख में हमने देखा था कि एक मसीही विश्वासी भी, उद्धार पाने के बावजूद, पाप कर सकता है, और करता भी है। किन्तु साथ ही उसे उस पाप से निकालने और आगे बढ़ने के लिए परमेश्वर की सहायता भी उपलब्ध रहती है; और यदि कोई व्यक्ति लापरवाही से जीने और पाप करते चले जाने के लिए परमेश्वर की इस सहायता एवं उदारता का दुरुपयोग करने का प्रयास करता है, तो फिर उसे परमेश्वर की ताड़ना का भी सामना करना पड़ता है, और साथ ही स्वर्ग में उसे मिलने वाले प्रतिफलों की भी हानि होती है। अर्थात, न तो पाप को और न ही उद्धार के अनन्तकालीन होने को लापरवाही से लिया जा सकता है; क्योंकि चाहे उद्धार न भी जाए किन्तु देर-सवेर पाप करते रहने वाले व्यक्ति को पाप के दुष्परिणामों को भुगतना ही पड़ेगा, इस संसार में भी और परलोक में भी। आज इसी शृंखला में हम एक और महत्वपूर्ण प्रश्न को देखेंगे:

प्रश्न: क्या उद्धार पा लेने, प्रभु यीशु मसीह का शिष्य बन जाने से व्यक्ति संसार के दुख-तकलीफों, बीमारियों, समस्याओं, आदि से मुक्त हो जाता है, और सांसारिक समस्याओं से निश्चिंत होकर जीवन जीने लगता है?

उत्तर: यद्यपि बहुत से लोग अपने सुसमाचार प्रचार में इस बात का आश्वासन देते हैं, किन्तु, परमेश्वर के वचन बाइबल में ऐसा कोई आश्वासन नहीं दिया गया है; और न ही प्रभु यीशु ने कभी अपने शिष्यों से यह कहा कि उनपर विश्वास लाने वाले को सांसारिक समस्याओं से छुटकारा मिल जाएगा, और उनका जीवन सुख एवं समृद्धि से भर जाएगा। जो भी इस प्रकार की शिक्षा या प्रचार के साथ उद्धार का सुसमाचार सुनाते हैं, वे गलत प्रचार करते हैं, लोगों को ऐसा आश्वासन देते हैं जिसका बाइबल में कोई समर्थन नहीं है, और पापों के परिणामों की गंभीरता तथा प्रभु यीशु द्वारा उपलब्ध करवाए गए पापों के समाधान की महानता के आधार पर नहीं, वरन सांसारिक बातों के लालच में लाकर लोगों को प्रभु यीशु मसीह की ओर आकर्षित करने और उनका अनुसरण करवाने के प्रयास करते हैं। 

       जब प्रभु यीशु ने अपने शिष्यों को उनकी पहली प्रचार सेवकाई के लिए भेजा था (मत्ती 10 अध्याय), तब ही उन्हें उन कठिन और दुखदायी परिस्थितियों के लिए आगाह कर दिया था जिनका उन्हें इस सेवकाई के निर्वाह में सामना करना होगा:

  • वे पकड़े जाएंगे और दण्ड के लिए अधिकारियों के सामने खड़े किए जाएंगे (10:16-20)
  • उनके अपने घर के लोग और निकट संबंधी उनके शत्रु हो जाएंगे (10:21)
  • उन्हें लोगों के बैर का सामना करना पड़ेगा (10:22)
  • उन्हें इस बैर और सताव से बचने के लिए एक से दूसरे स्थान पर भागना पड़ेगा (10:23)

       प्रभु ने यह भी कहा कि जो उनका शिष्य बनना चाहता है उसे प्रतिदिन अपना क्रूस उठाकर उसके पीछे चलने को तैयार रहना चाहिए “उसने सब से कहा, यदि कोई मेरे पीछे आना चाहे, तो अपने आप से इनकार करे और प्रति दिन अपना क्रूस उठाए हुए मेरे पीछे हो ले” (लूका 9:23)। उन दिनों में क्रूस उठाकर वह व्यक्ति जाता था जिसे मृत्यु-दण्ड दिया गया है, और देखने वाले उसे देख कर समझ जाते थे कि यह अपराधी है, और अब यह नहीं, इसकी लाश ही लौटेगी। प्रभु का शिष्यों से प्रतिदिन क्रूस उठकर उसके पीछे चलने का निर्णय लेने से अभिप्राय था, प्रतिदिन उसके शिष्य होने के कारण सताए जाने और मारे जाने के लिए तैयार रहना। अपने पकड़वाए जाने से पहले भी प्रभु यीशु ने शिष्यों को सचेत किया, “वे तुम्हें आराधनालयों में से निकाल देंगे, वरन वह समय आता है, कि जो कोई तुम्हें मार डालेगा वह समझेगा कि मैं परमेश्वर की सेवा करता हूं” (यूहन्ना 16:2)। तो फिर प्रभु की इन शिक्षाओं के समक्ष कोई यह कैसे दावा कर सकता है कि प्रभु यीशु की शिष्यता का जीवन समस्याओं तथा परेशानियों से मुक्त एक आराम और सुरक्षा का जीवन होगा?

       बाद में प्रभु के शिष्यों ने भी मसीही विश्वास के जीवन के विषय इन्हीं बातों को दोहराया:

  • प्रेरितों 14:22 और चेलों के मन को स्थिर करते रहे और यह उपदेश देते थे, कि हमें बड़े क्लेश उठा कर परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करना होगा।
  • 2 तीमुथियुस 3:12 पर जितने मसीह यीशु में भक्ति के साथ जीवन बिताना चाहते हैं वे सब सताए जाएंगे।
  • 1 यूहन्ना 2:18 हे लड़कों, यह अन्तिम समय है, और जैसा तुम ने सुना है, कि मसीह का विरोधी आने वाला है, उसके अनुसार अब भी बहुत से मसीह के विरोधी उठे हैं; इस से हम जानते हैं, कि यह अन्तिम समय है।
  • 1 यूहन्ना 3:13 हे भाइयों, यदि संसार तुम से बैर करता है तो अचम्भा न करना।
  • 1 पतरस 4:12 हे प्रियो, जो दुख रूपी अग्नि तुम्हारे परखने के लिये तुम में भड़की है, इस से यह समझ कर अचम्भा न करो कि कोई अनोखी बात तुम पर बीत रही है।
  • याकूब 1:2-3 हे मेरे भाइयों, जब तुम नाना प्रकार की परीक्षाओं में पड़ो तो इसको पूरे आनन्द की बात समझो, यह जान कर, कि तुम्हारे विश्वास के परखे जाने से धीरज उत्पन्न होता है।

       और भी अनेकों पद हैं जो यह दिखाते हैं कि मसीही जीवन संघर्ष का और संसार के लोगों के बैर और विरोध का निरंतर सामना करते रहने का जीवन है; और जो भी प्रभु यीशु के पीछे चलना चाहता है, उसे यह सब सहने के लिए तैयार रहना चाहिए। किन्तु साथ ही प्रत्येक मसीही विश्वासी को यह परमेश्वर से आश्वासन भी है कि उसकी प्रत्येक परिस्थिति में प्रभु उसके साथ होगा, उसे समझ, शक्ति, और शांति देगा कि वह उन परिस्थितियों का सामना कर सके “मैं ने ये बातें तुम से इसलिये कही हैं, कि तुम्हें मुझ में शान्ति मिले; संसार में तुम्हें क्लेश होता है, परन्तु ढाढ़स बांधो, मैं ने संसार को जीत लिया है” (यूहन्ना 16:33), और उसे उन सब में से भी सुरक्षित निकाल कर लाएगा, और अंततः सब बातें मिलकर प्रभु के जन के लिए भलाई ही को उत्पन्न करेंगी “और हम जानते हैं, कि जो लोग परमेश्वर से प्रेम रखते हैं, उन के लिये सब बातें मिलकर भलाई ही को उत्पन्न करती है; अर्थात उन्हीं के लिये जो उस की इच्छा के अनुसार बुलाए हुए हैं” (रोमियों 8:28)। 

       पूरा नया नियम इस बात का गवाह है कि प्रभु यीशु मसीह के शिष्यों को हर स्थान पर, अपनी सारी सेवकाई के दिनों में बहुत से दुखों, क्लेशों, और सताव का सामना करना पड़ा है। जीवन कभी भी उनके लिए सहज और सरल नहीं रहा; वरन जिनके मध्य में होकर उन्होंने प्रभु की सेवकाई की और जिन लोगों की भलाई की, उन्हीं में से उनके बैरियों-विरोधियों ने निकलकर उनके लिए बहुत परेशानियाँ उत्पन्न कीं। किन्तु फिर भी जिसने एक बार प्रभु के प्रेम, कृपा, अनुग्रह, और उद्धार के स्वाद को चख लिया, एक बार जिसने प्रभु की शान्ति और आशीष को अपने जीवन में तमाम कठिनाइयों और मुसीबतों के मध्य में अनुभव कर लिया, जिसने एक बार प्रभु यीशु मसीह की वास्तविकता और खराई को पहचान लिया, फिर संसार के ये क्लेश उसके लिए निराश का नहीं, वरन उस अद्भुत, उत्तम स्वर्गीय आशा का प्रमाण बन गए, जो परमेश्वर ने उसके लिए रखी हुई है, और उस उत्तम आशीष की लालसा रखते हुए वे इन सभी बातों को सहर्ष सहन कर लेते हैं “क्योंकि हमारा पल भर का हल्का सा क्लेश हमारे लिये बहुत ही महत्वपूर्ण और अनन्त महिमा उत्पन्न करता जाता है। और हम तो देखी हुई वस्तुओं को नहीं परन्तु अनदेखी वस्तुओं को देखते रहते हैं, क्योंकि देखी हुई वस्तुएं थोड़े ही दिन की हैं, परन्तु अनदेखी वस्तुएं सदा बनी रहती हैं” (2 कुरिन्थियों 4:17-18)। फिर शारीरिक चंगाई का उसके लिए कोई विशेष महत्व नहीं है, क्योंकि वह व्यक्ति जानता है कि एक दिन तो शरीर ने मिटना ही है; और जो भी रोग या अस्वस्थता उसमें है, प्रभु उसमें भी उसकी सहायता करेगा, उसे आशीष देगा “और उसने मुझ से कहा, मेरा अनुग्रह तेरे लिये बहुत है; क्योंकि मेरी सामर्थ्य निर्बलता में सिद्ध होती है; इसलिये मैं बड़े आनन्द से अपनी निर्बलताओं पर घमण्ड करूंगा, कि मसीह की सामर्थ्य मुझ पर छाया करती रहे। इस कारण मैं मसीह के लिये निर्बलताओं, और निन्‍दाओं में, और दरिद्रता में, और उपद्रवों में, और संकटों में, प्रसन्न हूं; क्योंकि जब मैं निर्बल होता हूं, तभी बलवन्‍त होता हूं” (2 कुरिन्थियों 12:9-10)।

       किसी भी मसीही विश्वासी को इन परिस्थितियों से घबराने की आवश्यकता नहीं है, “...क्योंकि उसने आप ही कहा है, कि मैं तुझे कभी न छोडूंगा, और न कभी तुझे त्यागूंगा। इसलिये हम बेधड़क हो कर कहते हैं, कि प्रभु, मेरा सहायक है; मैं न डरूंगा; मनुष्य मेरा क्या कर सकता है” (इब्रानियों 13:5-6), और साथ ही प्रभु का अपने विश्वासियों, अपने शिष्यों के लिए यह भी आश्वासन है कि उन्हें उनके सहने की सीमा से बाहर कभी किसी परीक्षा का सामना नहीं करना पड़ेगा “तुम किसी ऐसी परीक्षा में नहीं पड़े, जो मनुष्य के सहने से बाहर है: और परमेश्वर सच्चा है: वह तुम्हें सामर्थ्य से बाहर परीक्षा में न पड़ने देगा, वरन परीक्षा के साथ निकास भी करेगा; कि तुम सह सको” (1 कुरिन्थियों 10:13)। शैतान और उसके लोग तो हमें निराश करने और गिराने, विश्वास से भटकाने, प्रभु पर संदेह करने के लिए बहुत से प्रयास करेंगे। इसलिए शैतान के द्वारा फैलाई जा रही इन बातों पर ध्यान मत दीजिए। प्रभु के आपके प्रति प्रमाणित किए गए प्रेम, कृपा, और अनुग्रह, तथा उसके द्वारा आपको प्रदान किए जा रहे पाप-क्षमा प्राप्त करने के अवसर के मूल्य को समझिए, और अभी इस अवसर का लाभ उठा लीजिए। आपके द्वारा स्वेच्छा से, सच्चे और पूर्णतः समर्पित मन से, अपने पापों के प्रति सच्चे पश्चाताप के साथ आपके द्वारा की गई एक छोटी प्रार्थना, “हे प्रभु यीशु मैं मान लेता हूँ कि मैंने जाने-अनजाने में, मन-ध्यान-विचार और व्यवहार में आपकी अनाज्ञाकारिता की है, पाप किए हैं। मैं मान लेता हूँ कि आपने क्रूस पर दिए गए अपने बलिदान के द्वारा मेरे पापों के दण्ड को अपने ऊपर लेकर पूर्णतः सह लिया, उन पापों की पूरी-पूरी कीमत सदा काल के लिए चुका दी है। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मेरे मन को अपनी ओर परिवर्तित करें, और मुझे अपना शिष्य बना लें, अपने साथ कर लें” आपका सच्चे मन से लिया गया मन परिवर्तन का यह निर्णय आपके इस जीवन तथा परलोक के जीवन को आशीषित तथा स्वर्गीय जीवन बना देगा। अभी अवसर है, अभी प्रभु का निमंत्रण आपके लिए है - उसे स्वीकार कर लीजिए।  

 

बाइबल पाठ: इब्रानियों 11:32-40 

इब्रानियों 11:32 अब और क्या कहूँ क्योंकि समय नहीं रहा, कि गिदोन का, और बाराक और समसून का, और यिफतह का, और दाऊद का और शामुएल का, और भविष्यद्वक्ताओं का वर्णन करूं।

इब्रानियों 11:33 इन्होंने विश्वास ही के द्वारा राज्य जीते; धर्म के काम किए; प्रतिज्ञा की हुई वस्तुएं प्राप्त की, सिंहों के मुंह बन्द किए।

इब्रानियों 11:34 आग की ज्वाला को ठंडा किया; तलवार की धार से बच निकले, निर्बलता में बलवन्‍त हुए; लड़ाई में वीर निकले; विदेशियों की फौजों को मार भगाया।

इब्रानियों 11:35 स्त्रियों ने अपने मरे हुओं को फिर जीवते पाया; कितने तो मार खाते खाते मर गए; और छुटकारा न चाहा; इसलिये कि उत्तम पुनरुत्थान के भागी हों।

इब्रानियों 11:36 कई एक ठट्ठों में उड़ाए जाने; और कोड़े खाने; वरन बान्धे जाने; और कैद में पड़ने के द्वारा परखे गए।

इब्रानियों 11:37 पत्थरवाह किए गए; आरे से चीरे गए; उन की परीक्षा की गई; तलवार से मारे गए; वे कंगाली में और क्लेश में और दुख भोगते हुए भेड़ों और बकिरयों की खालें ओढ़े हुए, इधर उधर मारे मारे फिरे।

इब्रानियों 11:38 और जंगलों, और पहाड़ों, और गुफाओं में, और पृथ्वी की दरारों में भटकते फिरे।

इब्रानियों 11:39 संसार उन के योग्य न था: और विश्वास ही के द्वारा इन सब के विषय में अच्छी गवाही दी गई, तौभी उन्हें प्रतिज्ञा की हुई वस्तु न मिली।

इब्रानियों 11:40 क्योंकि परमेश्वर ने हमारे लिये पहिले से एक उत्तम बात ठहराई, कि वे हमारे बिना सिद्धता को न पहुंचे।

 

एक साल में बाइबल:

· यशायाह 9-10  

· इफिसियों 3