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बुधवार, 5 जनवरी 2022

मसीह यीशु की कलीसिया या मण्डली - डांवांडोल नहीं, दृढ़ आधार पर बनाई गई


क्या पतरस मण्डली का डांवांडोल नहीं वरन दृढ़ आधार बन सकता था?

पिछले लेखों में प्रभु यीशु की मण्डली या कलीसिया के बारे में देखते आ रहे हैं। हमने देखा है कि मूल यूनानी भाषा में, प्रभु यीशु द्वारा मत्ती 16:18 में प्रयुक्त शब्द का अर्थ बुलाए गए या एकत्रित किए गए लोगों का समूह है, न कि कोई भवन अथवा संस्था। साथ ही हमने देखा है कि इस पद को लेकर यह गलत शिक्षा दी जाती है कि प्रभु ने अपनी मण्डली या कलीसिया को पतरस पर बनाने की बात कही है। हमने देखा है कि मत्ती 16:18 में प्रभु की कही गई बात की वास्तविकता को तीन बातों:

  • क्या मत्ती 16:18 में प्रभु की कलीसिया बनाने की बात पतरस के लिए थी?
  • क्या वचन में किसी अन्य स्थान पर पतरस पर कलीसिया बनाने की, उसे कलीसिया का आधार रखने की पुष्टि है?
  • क्या पतरस इस आदर और आधार के योग्य था?

के आधार पर जाँच और समझ सकते हैं। पिछले लेखों में हमने इनमें से पहली दो बातों के विश्लेषण को देखा था, और समझा था कि प्रभु यीशु ने आलंकारिक भाषा का प्रयोग तो किया, किन्तु मत्ती 16:18 में यह बात पतरस के विषय नहीं कही थी। आज हम तीसरी बात, “क्या पतरस इस आदर और आधार के योग्य था?” को देखेंगे।

प्रभु यीशु मसीह ने अपने पहाड़ी उपदेश (मत्ती 5-7 अध्याय) के अंत की ओर आकार एक दृष्टांत दिया था - दो घर बनाने वालों का (मत्ती 7:24-27)। घर बनाने वाला एक व्यक्ति मूर्ख ठहरा क्योंकि उसने स्थिर और दृढ़ नींव पर घर नहीं बनाया, और वह घर परिस्थितियों का सामना नहीं कर सका, शीघ्र ही गिर गया। दूसरा घर बनाने वाला बुद्धिमान ठहरा, क्योंकि उसने घर की नींव चट्टान पर डाली थी, इसलिए उसका घर स्थिर बना रहा, सभी परिस्थितियों को झेल सका। फिर निष्कर्ष में प्रभु ने कहा है कि वह दृढ़ चट्टान जिस पर स्थिर और अडिग घर या जीवन स्थापित होता है, उसकी शिक्षाएं हैं। जो प्रभु की बातें मानता है, वह चट्टान पर बने घर के समान स्थिर और दृढ़ बना रहेगा; किन्तु जो प्रभु की बातों को सुनता तो है, परंतु उनका पालन नहीं करता है वह उस मूर्ख मनुष्य के समान होगा जिसका घर या जीवन परिस्थितियों को झेल नहीं सकेगा, स्थिर बना नहीं रहेगा। अपनी सेवकाई के आरंभ में ही यह शिक्षा देने के बाद, क्या यह संभव है कि प्रभु अपनी ही दी हुई शिक्षा से पलट कर, अपनी विश्व-व्यापी कलीसिया को किसी अस्थिर, डांवांडोल रहने वाले मनुष्य पर स्थापित करेगा? साथ ही ध्यान करें, मत्ती 28:18-20 में - जो स्वर्गारोहण से पहले प्रभु यीशु द्वारा अपने शिष्यों को दी गई उनकी सेवकाई के विषय महान आज्ञा है, प्रभु ने शिष्यों से जाकर लोगों को उसका शिष्य बनाने, और जो शिष्य बन जाएं उन्हें उसकी सिखाई हुई बातों को सिखाने का निर्देश दिया है। वहाँ प्रभु ने यह नहीं कहा कि जैसा पतरस बताए या सिखाए, वही करना, वैसा ही सिखाना। एक बार फिर प्रभु ने स्वयं इस बात को दिखा दिया कि उसकी कलीसिया पतरस की बातों पर नहीं, प्रभु की शिक्षाओं पर स्थापित होगी; जैसा हम पिछले लेख में विस्तार से देख चुके हैं।

आज हम वचन में दी गई बातों के आधार पर देखेंगे कि क्या पतरस कलीसिया या मण्डली के लिए अत्यावश्यक यह स्थिर, दृढ़, और अडिग आधार हो सकता था? क्या विभिन्न परिस्थितियों और अवसरों पर, वचन में दिया गया पतरस का व्यवहार, इस बात की पुष्टि करता है कि वह डांवांडोल नहीं, वरन प्रभु की शिक्षाओं और निर्देशों पर सदा स्थिर और अडिग रहने वाला व्यक्ति था? इस विश्लेषण के लिए हम प्रभु के पुनरुत्थान से पहले की बातों को नहीं देखेंगे; क्योंकि यह प्रकट है कि प्रभु के मारे जाने, गाड़े जाने, और मृतकों में से जी उठने और शिष्यों को दर्शन देने के बाद, प्रभु के उनसे मिलते रहने और उन्हें सेवकाई के लिए तैयार करने के द्वारा शिष्यों तथा पतरस में बहुत परिवर्तन आया था। किन्तु इस परिवर्तन के बावजूद, क्या पतरस प्रभु में अपने विश्वास और मण्डली में अपने मसीही व्यवहार में ऐसा स्थिर, दृढ़, और स्थापित हो गया था कि उसे कलीसिया का आधार बनाया जा सके?

प्रभु के पुनरुत्थान और स्वर्गारोहण के बाद की बातों को देखने से हमें पतरस के व्यवहार में कुछ खामियाँ दिखाई देती हैं, जो उसे अस्थिर और डांवांडोल तथा उस पर कलीसिया के स्थापित किए जाने के लिए अनुपयुक्त प्रकट करती हैं। ये बातें हैं:

  • पतरस उतावली से कार्य कर देता था, अधीर था; जिससे उसके साथ रहने वाले भी उसकी बातों में आकर बहक जाते थे। इसके दो उदाहरण हैं, पहला, यूहन्ना 21:2-3 पद में, जब वह वापस अपने पुराने काम, मछली पकड़ने की ओर लौट गया, और उसके साथ छः और लोग भी चले गए, किन्तु सभी असफल रहे। दूसरा, प्रेरितों 1:15-26 में, बिना प्रभु की आज्ञा के, या प्रभु से पूछे, उसने यह निर्णय लिया कि यहूदा इस्करियोती के स्थान पर किसी और को नियुक्त किया जाए; और सभी लोग उसकी बातों में भी आ गए, यह कर दिया। किन्तु ऐसा कोई प्रमाण नहीं है कि उनके द्वारा नियुक्त व्यक्ति को वचन में कोई स्वीकृति मिली हो। बारहवें प्रेरित का यह पद बाद में प्रभु ने पौलुस को दिया। यह विश्लेषण एक पृथक विषय है, जिसे हम यहाँ पर नहीं देख पाएंगे। 
  • पतरस का ध्यान, कम से कम उस आरंभिक समय में, प्रभु द्वारा दिए जा रहे निर्देशों पर कम, औरों के साथ अपनी तुलना करने में अधिक रहता था; जो आरंभिक कलीसिया के लिए अत्यावश्यक स्थिरता और निष्पक्षता के व्यवहार के अनुरूप नहीं था। इसका उदाहरण भी हम यूहन्ना 21:18-22 में देखते हैं; प्रभु पतरस को उसकी आने वाली सेवकाई और जिम्मेदारियों के विषय सिखाना चाह रहा है, और पतरस का ध्यान प्रभु की बात पर नहीं वरन अपने साथी यूहन्ना के भविष्य पर लगा है। जिसके विषय फिर प्रभु को उसे एक डाँट लगानी पड़ती है (पद 22) 
  • पतरस अभी स्वर्गीय दर्शनों को समझने और उनके अनुसार कार्य करने के लिए अपरिपक्व था। प्रेरितों 10:10-16 में प्रभु उसे दर्शन के द्वारा संसार के सभी लोगों के पास जाकर सुसमाचार प्रचार करने की बात दिखा और बता रहा है, और वह उसे केवल अपनी शारीरिक स्थिति के अनुसार समझ कर प्रभु की बात को मानने से इनकार कर रहा है। और प्रेरितों 10:17 में लिखा है कि जब कुरनेलियुस के घर से लोग उसके पास पहुँचे, तब वह असमंजस में ही पड़ा हुआ था। यदि उसकी आत्मिक परिपक्वता उचित स्तर की होती तो समझ जाता कि जो दर्शन उसने देखा और जहाँ जाने के लिए प्रभु ने बुलावा भेजा है, वे एक ही बात हैं, जिसके लिए प्रभु उसे उस दर्शन के द्वारा आगाह कर रहा था (प्रेरितों 10:19-20)
  • पतरस में प्रभु की विश्वव्यापी कलीसिया की स्थापना की समझ नहीं थी; इसी अपरिपक्वता और दर्शनों की नासमझी के कारण, वह यह नहीं समझ सका था कि प्रभु अन्यजातियों से भी उतना ही प्रेम करता है जितना यहूदियों से, जैसा उसने प्रेरितों 1:8 में शिष्यों तथा पतरस से सामरिया और संसार के छोर तक जाकर प्रचार करने के दायित्व देने के द्वारा प्रकट किया था। वह कुरनेलियुस के घर जाकर अपनी इसी अपरिपक्वता और नासमझी को प्रकट करता है (प्रेरितों 10:28-29)। जो व्यक्ति प्रभु के सुसमाचार के विश्वव्यापी उद्देश्य को नहीं समझता था, वह प्रभु की विश्वव्यापी कलीसिया के दर्शन को क्या जानेगा, और उसका आधार कैसे होगा?
  • पतरस लोगों को दिखाने के लिए अपने मसीही व्यवहार को बदलने और कपट करने वाला व्यक्ति था, और उसके इस व्यवहार के कारण उसके साथ रहने वाले और भी लोग बहक जाते थे। गलातियों 2:11-21 में, घटना लिखी गई है जब पतरस ने पौलुस के मसीही हो जाने के चौदह वर्षों (गलातियों 2:1) से भी अधिक के बाद, अर्थात लगभग दो दशकों तक कलीसिया में कार्य करते रहने के बाद भी, लोगों को दिखाने के लिए अपने आप को यहूदियों को स्वीकार्य दिखाने का प्रयास किया था, और उसके साथ बरनबास जैसे लोग भी इस बात में गिर गए। यह इतनी गंभीर गलती थी, कि पतरस के इस व्यवहार और उसकी भर्त्सना के लिए पवित्र आत्मा ने पौलुस के द्वारा इस व्यवहार और उससे संबंधित बातों के लिएकपट” (पद 13 ), “सुसमाचार की सच्चाई पर सीधी चाल नहीं चलना” (पद 14), “विश्वास की नहीं वरन कर्मों की धार्मिकता को दिखाने वाला” (पद 16), “पापी” (पद 17), “अपराधी” (पद 18), “परमेश्वर के अनुग्रह को व्यर्थ ठहराने वाला” (पद 21) जैसे कठोर और कटु शब्दों का प्रयोग किया, और इस घटना को तथा उससे संबंधित भर्त्सना के उन शब्दों को अनन्तकाल के लिए अपने वचन में लिखवा भी दिया, जिससे आज हम पतरस के समान ही मनुष्यों को प्रसन्न करने के लिए परमेश्वर की शिक्षाओं से विमुख होने की इस गलती में न पड़ जाएं।

अब विचार कीजिए, क्या प्रभु जो आदि से लेकर अन्त तक की हर बात को जानता है, जिससे कोई बात छुपी नहीं है, जिसके लिए भविष्य भी वर्तमान के समान ही है, क्या वह ऐसे अस्थिर और डांवांडोल व्यवहार और प्रवृत्ति रखने वाले मनुष्य पर कलीसिया स्थापित करेगा? वह भी अपनी स्वयं की शिक्षा (मत्ती 7:24-27) के विरुद्ध?

यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं, तो परमेश्वर पवित्र आत्मा की आज्ञाकारिता एवं अधीनता में वचन की सच्चाइयों को उससे समझें। किसी के भी द्वारा कही गई कोई भी बात को तुरंत ही पूर्ण सत्य के रूप में स्वीकार न करें, विशेषकर तब, जब वह बात बाइबल की अन्य बातों के साथ ठीक मेल नहीं रखती हो। सदा इस बात का ध्यान रखें कि वचन के हर शब्द, हर बात को न केवल उसके तात्कालिक संदर्भ में देखें, समझें, तथा व्याख्या करें, वरन यह भी सुनिश्चित करें कि आपकी वह समझ और व्याख्या वचन में अन्य स्थानों पर दी गई संबंधित बातों एवं शिक्षाओं के अनुरूप भी है, उनके साथ किसी प्रकार का कोई विरोधाभास नहीं है। कभी भी किसी भी गलत शिक्षा को न तो स्वीकार करें और न ही उसका प्रचार और प्रसार करें; परमेश्वर अपने वचन की सच्चाइयों की अवहेलना करने वालों को फिर उन्हीं की मनसा के अनुसार भयानक भ्रम और विनाश में डाल देता है (यहेजकेल 14:7-8; 2 थिस्सलुनीकियों 2:10-12) 

 यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • उत्पत्ति 13-15     
  • मत्ती 5:1-26         

मंगलवार, 4 जनवरी 2022

मसीह यीशु की कलीसिया या मण्डली - प्रभु एवं उसकी शिक्षाओं पर आधारित


बाइबल में दिए गए कलीसिया के आधार को समझें।   

प्रभु परमेश्वर द्वारा लोगों को उद्धार देने, अपने साथी (मत्ती 28:20; यूहन्ना 14:3, 18), परमेश्वर की संतान (यूहन्ना 1:12-13), और अपने साथ स्वर्ग के वारिस (रोमियों 8:17) बनाने; उन्हें संसार भर में जाकर अपने सुसमाचार के प्रचार की सेवकाई सौंपने और सेवकाई के अनुसार आत्मिक वरदान प्रदान करने के उद्देश्य को समझने के लिए हमें प्रभु की कलीसिया या मण्डली और उससे संबंधित बातों को समझना होगा। इस संदर्भ में प्रचलित कुछ भ्रांतियों और गलत शिक्षाओं की वास्तविकता को हम परमेश्वर के वचन बाइबल से देख रहे हैं। पहले हमने देखा कि आम धारणा के विपरीत, बाइबल के अनुसार कलीसिया कोई भौतिक वस्तुओं से बना हुए भवन, अथवा कोई संस्था नहीं है, वरन प्रभु यीशु द्वारा बुलाए गए, और उसके प्रति समर्पित लोगों का समूह है। हमने पहले देखा था कि शब्द कलीसिया या मण्डली मूल यूनानी भाषा के जिस शब्द का अनुवाद है, वह है “ekklesia, एक्कलेसियाजिसका शब्दार्थ होता है, “व्यक्तियों का एकत्रित होना”, याव्यक्तियों का समूहयाव्यक्तियों की सभा। कलीसिया को एक विशिष्ट भवन एवं आराधना-स्थल के साथ जोड़ने से संबंधित बातों को हम आगे देखेंगे। दूसरी बहुत आम भ्रांति और गलत शिक्षा है कि प्रभु ने कलीसिया को अपने शिष्य पतरस पर स्थापित किया है, और इस भ्रांति के समर्थन में मत्ती 16:18 में प्रभु की कही बात का हवाला दिया जाता है, जोकलीसियाशब्द का बाइबल में सर्वप्रथम प्रयोग का पद भी है।

पिछले लेख में हमने देखा था कि मत्ती 16:18 में प्रभु की कही गई बात की वास्तविकता को तीन बातों:

  • क्या मत्ती 16:18 में प्रभु की कलीसिया बनाने की बात पतरस के लिए थी?
  • क्या वचन में किसी अन्य स्थान पर पतरस पर कलीसिया बनाने की, उसे कलीसिया का आधार रखने की पुष्टि है?
  • क्या पतरस इस आदर और आधार के योग्य था?

के आधार पर जाँच और समझ सकते हैं। पिछले लेख में हमने इनमें से पहली बात के विश्लेषण को देखा था, और समझा था कि प्रभु यीशु ने आलंकारिक भाषा का प्रयोग तो किया, किन्तु मत्ती 16:18 में यह बात पतरस के विषय नहीं कही थी। आज हम दूसरी बात, “वचन में दी गई अन्य बातों के द्वारा क्या कलीसिया के पतरस पर आधारित होने की पुष्टि होती है?” को देखेंगे।

कलीसिया, या मण्डली, अर्थात प्रभु के बुलाए हुए लोगों का समूह किसी भी व्यक्ति पर कदापि आधारित नहीं है, इसकी एक पुष्टि हम प्रेरित पौलुस द्वारा पवित्र आत्मा की अगुवाई में कुरिन्थुस की मण्डली को लिखी गई पहले पत्री के आरंभिक भाग में ही देखते हैं। पौलुस ने कुरिन्थुस की मण्डली ले लोगों के, प्रभु के सेवकों के प्रति उनकी निष्ठा के अनुसार विभाजित होने और फिर परस्पर मतभेद रखने की प्रवृत्ति की भर्त्सना करते हुए लिखा, “हे भाइयो, मैं तुम से यीशु मसीह जो हमारा प्रभु है उसके नाम के द्वारा बिनती करता हूं, कि तुम सब एक ही बात कहो; और तुम में फूट न हो, परन्तु एक ही मन और एक ही मत हो कर मिले रहो। क्योंकि हे मेरे भाइयों, खलोए के घराने के लोगों ने मुझे तुम्हारे विषय में बताया है, कि तुम में झगड़े हो रहे हैं। मेरा कहना यह है, कि तुम में से कोई तो अपने आप को पौलुस का, कोई अपुल्लोस का, कोई कैफा का, कोई मसीह का कहता है। क्या मसीह बँट गया? क्या पौलुस तुम्हारे लिये क्रूस पर चढ़ाया गया? या तुम्हें पौलुस के नाम पर बपतिस्मा मिला?” (1 कुरिन्थियों 1:10-13)। इस खंड से स्पष्ट है कि प्रभु के सेवकों के नाम पर, जिनमें से एक नाम पतरस का भी दिया गया है, निष्ठा रखने, और फिर उस आधार पर विभाजित होने, आपस में झगड़ने की यह प्रवृत्ति अनुचित थी। प्रभु के सभी लोगों को, उस एक ही नाम, प्रभु यीशु, पर निष्ठा रखनी थी, और प्रभु के प्रति समर्पण के अनुसार ही साथ मिलकर एक मनता के साथ रहना था। पतरस के नाम को कोई भी और कैसा भी विशेष महत्व प्रदान नहीं किया गया, अपितु यह विशेष महत्व देने के प्रयास की निन्दा की गई, इस से निकलने और हटने के लिए कहा गया। साथ ही यह एक और शिक्षा को हमारे सामने लाता है, जब भी उद्धारकर्ता प्रभु यीशु के नाम को छोड़ किसी भी अन्य व्यक्ति या प्रभु के सेवक के नाम अथवा किसी भी मनुष्य को महत्व देने के प्रयास होते हैं, तो परिणाम परस्पर मतभेद, झगड़े, और प्रभु के नाम की निन्दा होता है; क्योंकि यह परमेश्वर की ओर से नहीं वरन शैतान की ओर से है, और शैतान कभी भी प्रेम को नहीं वरन बैर, फूट, मतभेदों, और झगड़ों को ही लेकर आता है।

इसी बात को 1 कुरिन्थियों 3:1-7 में समझाया और दोहराया गया है, जहाँ पर साथ ही यह भी लिखा गया है कि मसीही विश्वासियों का इस प्रकार से मनुष्यों और मनुष्यों के नामों को महत्व देना: 

  • आत्मिक अपरिपक्वता का चिह्न है, (3:1)
  • उन्नत और गहन आत्मिक शिक्षाओं को प्राप्त करने, समझने, और जीवन में लागू एवं प्रयोग करने में बाधा डालता है, (3:2)
  • शारीरिक - अर्थात उद्धार से पहले की प्रवृत्तियों और व्यवहार के अभी भी मसीही चरित्र पर हावी होने और उसे दबाए रखने का प्रमाण है, (3:3-4)
  • तथा मसीही विश्वासी के जीवन में परमेश्वर की प्राथमिकता के न होने को दिखाता है। (3:5-7)

फिर इससे थोड़ा आगे चलकर, परमेश्वर पवित्र आत्मा एक बहुत महत्वपूर्ण बात लिखवाता है, जिसकी, तथा उससे संबंधित एक अन्य पद की, अनदेखी और अवहेलना वे सभी लोग, जाने या अनजाने में करते हैं, जो यह मानते हैं कि पतरस ही प्रथम मण्डली का आधार था, मण्डली उसी पर बनाई गई थी। पौलुस ने पवित्र आत्मा के अगुवाई में लिखा, “क्योंकि उस नेव को छोड़ जो पड़ी है, और वह यीशु मसीह है कोई दूसरी नेव नहीं डाल सकता” (1 कुरिन्थियों 3:11)। इस पद के पहले भाग से यह बिलकुल स्पष्ट है कि कलीसिया की नींव या आधार पहले से तैयार और स्थापित है; मध्य भाग बताता है कि वह पहले से तैयार और डाली गई नींव स्वयं प्रभु यीशु मसीह है, और अंतिम भाग बताता है कि कोई भी इस नींव को बदल नहीं सकता है, इसके स्थान पर कोई और नींव नहीं डाल सकता है। 

इस संदर्भ में इस पद से संबंधित जिस दूसरे पद की अनदेखी और अवहेलना की जाती है, वह हैऔर प्रेरितों और भविष्यद्वक्ताओं की नेव पर जिसके कोने का पत्थर मसीह यीशु आप ही है, बनाए गए हो। जिस में सारी रचना एक साथ मिलकर प्रभु में एक पवित्र मन्दिर बनती जाती है” (इफिसियों 2:20-21)। पद 20 भी यही बताता है कि कलीसिया की नींव, उसका आधार प्रेरितों और भविष्यद्वक्ताओं द्वारा जो बातें और शिक्षाएं प्रभु ने प्रदान की हैं, अर्थात परमेश्वर का वचन है - जो आदि से था, परमेश्वर का स्वरूप है, और जिसने प्रभु यीशु के रूप में देहधारी होकर हमारे साथ निवास किया (यूहन्ना 1:1, 2, 14)। साथ ही, इस 20 पद मेंप्रेरितों और भविष्यद्वक्ताओंके बहुवचन में प्रयोग पर ध्यान कीजिए। तात्पर्य यह है कि यह नींव, यह आधार, कोई एक व्यक्ति कदापि नहीं था; वरन प्रभु के वे अनेक प्रेरित और भविष्यद्वक्ता थे जिनमें होकर प्रभु का वचन लोगों तक पहुँचा; और पतरस निःसंदेह उनमें से एक था, किन्तु वही एकमात्र कदापि नहीं था। एक बार फिर यह पतरस के एकमात्र आधार होने की धारणा को गलत ठहराता है। साथ ही 20 पद यह भी दिखाता है कि इन सभी प्रेरितों और भविष्यद्वक्ताओं की शिक्षाओं को साथ और संगत रखने वाला वहकोने का पत्थर”, जिससे सारी नींव एवं भवन-निर्माण की सिधाई और दिशा जाँची जाती है, स्थापित की जाती है, स्वयं प्रभु यीशु मसीह है। फिर 21 पद में लिखा है कि कलीसिया की यह सारी रचना साथ मिलकरप्रभु में एक पवित्र मन्दिर बनती जाती है” - पतरस में नहीं, प्रभु में!

स्वयं पतरस भी उसके द्वारा लिखी गई पत्रियों में उसके कलीसिया का आधार होने की बात की पुष्टि करना तो दूर, ऐसा कोई संकेत भी नहीं देता है कि प्रभु ने उसे कलीसिया का आधार नियुक्त किया है, जिसके अनुसार वह इस दायित्व का निर्वाह कर रहा है। दोनों पत्रियों के आरंभ में उसने अपने आप को केवल प्रभु का प्रेरित कहा है, और दूसरी पत्री के आरंभ में प्रभु का दास भी कहा है, किन्तु कलीसिया का आधार होने को न तो कहीं कहा है और न ही इसका कोई संकेत दिया है।

प्रेरितों के काम के 15 अध्याय में भी जब यरूशलेम में मण्डलियों में फैलाई जा रही कुछ गलत शिक्षाओं के विषय चर्चा एवं निर्णय करने के लिए उस प्रारंभिक मण्डली के अगुवे एकत्रित हुए (प्रेरितों 15:6), और फिर प्रेरितों 15:7 में पतरस का नामबहुत वाद-विवाद के बादआया, और उसने किसी अधिकार के साथ नहीं वरन अन्य लोगों के समान एक सदस्य के रूप में अपना तर्क रखा। तथा फिर 12 पद से आगे लिखा है कि अन्य लोग भी अपने विचार रखने लगे, फिर अन्ततः 22 पद में जाकरप्रेरितों और प्राचीनोंके द्वारा सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया। कहीं पर भी पतरस के किसी विशेष स्तर अथवा स्थान, या सभा को संचालित करने, अंतिम निर्णय लेने, आदि जैसी बातों का कोई उल्लेख नहीं है; जबकि यह व्यवहार कलीसिया केआधारयामुख्य संचालकसे अपेक्षित है। 

अर्थात परमेश्वर के वचन में कहीं पर भी इस बात का समर्थन नहीं है कि प्रभु ने कलीसिया को पतरस पर आधारित कर के बनाने की बात कही, जिसे फिर निभाया गया। अगले लेख में हम देखेंगे और विश्लेषण करेंगे कि क्या प्रभुकलीसिया को पतरस पर बनानेके योग्य समझ कर उसे यह दायित्व दे सकता था।

यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं, तो परमेश्वर पवित्र आत्मा की आज्ञाकारिता एवं अधीनता में वचन की सच्चाइयों को उससे समझें; किसी के भी द्वारा कही गई कोई भी बात को तुरंत ही पूर्ण सत्य के रूप में स्वीकार न करें, विशेषकर तब, जब वह बात बाइबल की अन्य बातों के साथ ठीक मेल नहीं रखती हो।

 यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • उत्पत्ति 10-12      
  • मत्ती 4

सोमवार, 3 जनवरी 2022

मसीह यीशु की कलीसिया या मण्डली - पतरस पर?


क्या प्रभु ने कलीसिया कंकर/छोटे पत्थर पर बनाई है अथवा चट्टान पर

ईसाई या मसीही समाज में एक बहुत आम धारणा पाई जाती है कि प्रभु यीशु ने पतरस पर अपने कलीसिया बनाने की बात कही है; और इस धारणा का आधार मत्ती 16:18 में प्रभु द्वारा कही गई बात -और मैं भी तुझ से कहता हूं, कि तू पतरस है; और मैं इस पत्थर पर अपनी कलीसिया बनाऊंगा: और अधोलोक के फाटक उस पर प्रबल न होंगेको बनाया जाता है। किन्तु यह धारणा सही नहीं है, वचन के अनुसार नहीं है।

बाइबल की बातों को गलत समझने का सबसे बड़ा कारण है किसी एक शब्द, या वाक्यांश, या वाक्य, अथवा पद को उसके संदर्भ के बाहर लेकर उसकी ऐसी व्याख्या करना, जो संदर्भ के अनुसार देखे जाने में सही नहीं निकलती है। इसलिए बाइबल की हर बात को न केवल उसके तात्कालिक संदर्भ में देखना और समझना आवश्यक है, किन्तु बाइबल में शेष स्थानों पर उस विषय से संबंधित भागों में और क्या कहा गया है, उसे भी देखना और उन बातों के साथ अपनी व्याख्या के सामंजस्य को जाँचना भी अनिवार्य है। साथ ही, हमेशा यह ध्यान भी रखना चाहिए कि बाइबल की पुस्तकें उनके मूल स्वरूप में कभी भी अध्यायों और पदों में नहीं लिखी गई थीं वरन सामान्य लेख, कविताओं, और पत्रों के समान ही लिखी गई थीं। वर्तमान में पाया जाने वाला यह अध्यायों और पदों में विभाजन बहुत बाद में, हवाले देने और स्मरण रखने में सहायता करने के लिए किया गया। इसलिए यह विभाजन कृत्रिम है, और कई बार किसी परिच्छेद या खंड या वाक्य के विचार को पूरा हुए बिना ही बीच में काट या रोक देता है। इसलिए सही व्याख्या के लिए, संदर्भ में देखते समय, हमेशा, अपने मन में इस पदों और अध्यायों के विभाजन को हटाकर, उस संबंधित लेख को एक पूर्ण बात या विचार के अनुसार देखना, समझना, और फिर समझाना चाहिए। यदि हमारी व्याख्या तात्कालिक संदर्भ तथा उस विषय पर बाइबल के अन्य बातों के साथ मेल नहीं खाती है, तो व्याख्या गलत है, और उसे सुधारे जाने की आवश्यकता है। 

संपूर्ण बाइबल परमेश्वर का वचन है; संपूर्ण बाइबल परमेश्वर पवित्र आत्मा की प्रेरणा द्वारा लिखवाया गया है, अर्थात मूल और वास्तविक लेखक पवित्र आत्मा ही है, चाहे कलम चलाने वाले मनुष्य भिन्न हों; और यही वचन आदि में था, परमेश्वर के साथ था, परमेश्वर था, और देहधारी होकर हमारे मध्य में डेरा किया (यूहन्ना 1:1-2, 14)। इसलिए संपूर्ण बाइबल की बातों में कोई त्रुटि या परस्पर विरोधाभास संभव ही नहीं है, अन्यथा परमेश्वर में त्रुटि है, विरोधाभास है। इसलिए हर ऐसी व्याख्या जो तात्कालिक संदर्भ तथा संबंधित बातों एवं शिक्षाओं के साथ संगत नहीं है, वह गलत है, स्वीकार्य नहीं है; उसे मान और लेकर नहीं चला जा सकता है। यही बात इस धारणा को जाँचने की कसौटी भी है कि क्या वास्तव में प्रभु ने अपनी कलीसिया पतरस पर बनाने के लिए कहा है? और जाँचे जाने पर यह प्रकट हो जाता है कि प्रभु ने ऐसी कोई बात नहीं कही, ऐसा कोई आश्वासन नहीं दिया; और यह धारणा बिलकुल गलत, अनुचित और पूर्णतः अस्वीकार्य है।

हम इस धारणा का विश्लेषण तीन बातों के अंतर्गत करेंगे:

  • क्या मत्ती 16:18 में प्रभु की कलीसिया बनाने की बात पतरस के लिए थी?
  • क्या वचन में किसी अन्य स्थान पर पतरस पर कलीसिया बनाने की, उसे कलीसिया का आधार रखने की पुष्टि है?
  • क्या पतरस इस आदर और आधार के योग्य था?

आज हम इन तीन में से पहली बात को देखेंगे। इस पद और इसमें प्रभु द्वारा कही गई बात को लेकर पतरस और कलीसिया के बारे में इस बड़े असमंजस और गलत धारणा का कारण इस पद की दो बातें हैं - (i) प्रभु द्वारा कहे गएइस पत्थरको पतरस के लिए किया गया संबोधन मान लेना; और (ii) यूनानी भाषा मेंपतरसशब्द के शब्दार्थ कापत्थरअर्थ होना। मत्ती 16:18 का संदर्भ उससे पहले के पदों में कही गई प्रभु की बातों के द्वारा है। यह संदर्भ प्रभु द्वारा कहे गएइसशब्द को परिभाषित करता है, और शब्दपत्थरके वास्तविक अर्थ को प्रकट करता है। इसलिए इस पद को मत्ती 16:13 से आरंभ कर के देखना चाहिए। मत्ती 16:13-14 में प्रभु ने शिष्यों से पूछा कि लोग उसके विषय में क्या कहते हैं, और पद 15 में शिष्यों ने प्रभु के विषय लोगों के दृष्टिकोण को उसे बता दिया। फिर पद 15 में प्रभु शिष्यों से उसके लिए उन शिष्यों के दृष्टिकोण को पूछता है। इसके लिएशमौन पतरस ने उत्तर दिया, कि तू जीवते परमेश्वर का पुत्र मसीह है” (मत्ती 16:16); और पद 17 में इस उत्तर एवं दृष्टिकोण के लिए प्रभु पतरस की सराहना करता है, और उससे कहता है “...क्योंकि मांस और लहू ने नहीं, परन्तु मेरे पिता ने जो स्वर्ग में है, यह बात तुझ पर प्रगट की है। ध्यान कीजिए, प्रभु के इस वाक्य के अंतिम भाग मेंयह बातशब्द आए हैं इसके अनुसार यदि प्रभु ने पद 18 में यह पतरस के लिए कहा होता तो उचित शब्द होतेतुझ पर”, न किइस पत्थर पर। अब यदि पदों के इस कृत्रिम विभाजन को हटा कर, पद 17-19 को एक निरंतर विचार के रूप में देखें, जैसा वह मूल भाषा में लिखा गया था, तो यह समझने में कोई असमंजस नहीं होता है कि पद 18 काइस”, पद 17 केयह बातसे संबंधित है। अर्थात पद 18 काइसपद 17 में परमेश्वर पिता द्वारा पतरस को दिए गए दर्शन या भेद के प्रकटीकरण के विषय है। 

अब यहाँ पर असमंजस उत्पन्न करने वाली दूसरी बात को समझते हैं। मूल यूनानी भाषा में, इस वाक्य में, प्रभु द्वारा शब्दों का आलंकारिक प्रयोग किया गया है। ध्यान कीजिए, प्रभु के साथ पतरस की पहली भेंट में प्रभु ने उस से कहा था “...तू यूहन्ना का पुत्र शमौन है, तू कैफा, अर्थात पतरस कहलाएगा” (यूहन्ना 1:42); यहाँ प्रयुक्त शब्दकैफा, Cephas” सिरियक भाषा का शब्द है, जिसका यूनानी अनुवाद पेत्रोस है, जिससे पतरस शब्द आया है, और जैसा इस पद में लिखा गया है, सिरियककैफा, Cephas” तथा यूनानी “पेत्रोस”, दोनों ही शब्दों का अर्थ पत्थर या कंकर, अर्थात एक छोटा पत्थर होता है। मत्ती 16:18 के आरंभिक वाक्य में भी प्रभु इसी बात को उसे स्मरण करवा रहा है कि तूपेत्रोस”, अर्थातकैफा, Cephas” है। किन्तु मत्ती 16:18 में, अगले वाक्य में,इस पत्थरमें प्रभु ने “पेत्रोस” शब्द का नहीं, वरनपेत्राशब्द का प्रयोग किया, जिसका अर्थ होता हैचट्टान। इन दोनों शब्दों को अपने-अपने स्थानों पर रखने से मत्ती 16:18 इस प्रकार पढ़ा जाएगा:और मैं भी तुझ से कहता हूं, कि तू पतरस [पेत्रोस - कंकर, या छोटा पत्थर] है; और मैं इस पत्थर [पेत्रा - चट्टान, जो विशाल दृढ़, अटल होती है] पर अपनी कलीसिया बनाऊंगा: और अधोलोक के फाटक उस पर प्रबल न होंगे” 

अब, इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए, हम प्रभु द्वारा शब्दों के आलंकारिक प्रयोग, और इस वाक्य के वास्तविक अर्थ को समझ सकते हैं, जिसकी पुष्टि फिर वचन की अन्य संबंधित बातों से, तथा पतरस के बारे में विश्लेषण से भी हो जाती है। इन स्पष्टीकरणों के समावेश के साथ, प्रभु की कही बात का अभिप्राय कुछ इस प्रकार का होता -तू एक कंकर/छोटा पत्थर है। और मैं इस चट्टान पर, अर्थात पिता परमेश्वर द्वारा तुझ पर प्रकट किए गए इस अटल, दृढ़, अडिग, सत्य पर कि मैं जीवते परमेश्वर का पुत्र यीशु हूँ, अपनी कलीसिया बनाऊँगा: और अधोलोक के फाटक उस पर प्रबल न होंगे।प्रभु की यह बात वचन की अन्य बातों के साथ भी संगत है, तथा पतरस के जीवन का विश्लेषण भी यही दिखाता है कि वह प्रभु की कलीसिया का आधार कभी नहीं हो सकता था, कलीसिया उस पर नहीं बनाई जा सकती थी; और ऐसा करना वचन में त्रुटि एवं विरोधाभास ले आता है। 

यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं, तो परमेश्वर पवित्र आत्मा की आज्ञाकारिता एवं अधीनता में वचन की सच्चाइयों को उससे समझें; किसी के भी द्वारा कही गई कोई भी बात को तुरंत ही पूर्ण सत्य के रूप में स्वीकार न करें, विशेषकर तब, जब वह बात बाइबल की अन्य बातों के साथ ठीक मेल नहीं रखती हो। 

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • उत्पत्ति 7-9      
  • मत्ती 3     

रविवार, 2 जनवरी 2022

मसीह यीशु की कलीसिया या मण्डली - कलीसिया


शब्दकलीसियाको समझना

मसीही जीवन और सेवकाई को तब ही उचित रीति से समझा और किया जा सकता है, जबमसीहीहोने के तात्पर्य और उद्देश्य को ठीक से समझ लिया जाए। अन्यथा, शैतान हमें अनेकों गलत धारणाओं, शिक्षाओं, और मन-गढ़न्त बातों में फंसा कर परमेश्वर के मार्गों से भटका देगा, और हम इसी भ्रम में पड़े रह जाएंगे कि हम परमेश्वर को स्वीकार्य, परमेश्वर की इच्छा के अनुसार कार्य कर रहे हैं, और जीवन जी रहे हैं, जब कि वास्तविकता में हम शैतान के बताए और सिखाए अनुसार कर रहे होंगे। हम पहले के लेखों में देख चुके हैं कि बाइबल के अनुसारमसीहीहोने का अर्थ है प्रभु यीशु मसीह का शिष्य होना (प्रेरितों 11:26)। शब्दार्थ एवं पहचान के रूप मेंमसीही” होने की यही सही परिभाषा है, और इसी के अनुसार मसीही या प्रभु यीशु के शिष्य होने को समझा जाना चाहिए, शिष्यता के कर्तव्यों का निर्वाह किया जाना चाहिए। किन्तु इसके साथ ही यह भी जानना और समझना आवश्यक है कि प्रभु यीशु ने संसार में से लोगों कोमसीहीया अपने शिष्य होने के लिए क्यों बुलाया; क्यों उन्हें यह आदर और ज़िम्मेदारी प्रदान की? मसीही जीवन और सेवकाई में परमेश्वर पवित्र आत्मा तथा आत्मिक वरदानों की भूमिका के अध्ययन में हम देख चुके हैं कि परमेश्वर ने अपने प्रत्येक जन के लिए कोई न कोई भला कार्य पहले से निर्धारित कर रखा है (इफिसियों 2:10), और परमेश्वर द्वारा सौंपे गए इस कार्य को करने में सहायता के लिए, उसे सुचारु रीति से करवाने के लिए परमेश्वर पवित्र आत्मा प्रत्येक मसीही विश्वासी को उस की सेवकाई के लिए उपयुक्त आत्मिक वरदान निर्धारित करता एवं प्रदान करता है। मण्डली, या मसीही विश्वासियों के समूह में सब की भिन्न सेवाकाइयाँ और वरदान हैं, किन्तु सभी फिर भी एक ही नाममसीहीके द्वारा जाने, पहचाने, और संबोधित किए जाते हैं। अर्थात, मसीही होना, मसीहियों के अपने समूह में सेवकाई एवं वरदानों के प्रयोग के उन दायित्वों और कार्यों के निर्वाह से बढ़कर या ऊपर के स्तर के बात है; और जो मसीही है, वही परमेश्वर द्वारा सेवकाई और वरदानों के सौंपे जाने का हकदार है। सेवकाई और वरदान उसे मसीही नहीं बनाते हैं, वरन, उसके मसीही होने के द्वारा उस पर आई ज़िम्मेदारियाँ, उससे परमेश्वर की अपेक्षाएं और उद्देश्य, उसे वह सेवकाई और संबंधित वरदान दिए जाने के लिए योग्य ठहराते हैं। मसीहियों से परमेश्वर की अपेक्षाएं और उद्देश्य जानने और समझने के लिए यहकलीसियायामण्डलीके दर्शन को समझना बहुत आवश्यक है। 

जैसा हमने पिछले लेख में देखा है, “कलीसियाशब्द का परमेश्वर के वचन बाइबल में सर्वप्रथम प्रयोग, प्रभु यीशु मसीह द्वारा मत्ती 16:18 में हुआ है -और मैं भी तुझ से कहता हूं, कि तू पतरस है; और मैं इस पत्थर पर अपनी कलीसिया बनाऊंगा: और अधोलोक के फाटक उस पर प्रबल न होंगेआज सामान्यतःकलीसियाशब्द से लोग एक विशेष भवन या इमारत या बिल्डिंग की कल्पना करते हैं, जहाँ पर ईसाई या मसीही धर्म को मानने वाले अपनी पूजा-अर्चना, आराधना, रीति-रिवाजों के पालन, आदि के लिए एकत्रित होते हैं। और साथ ही इस सामान्य धारणा के अनुसार उनके ध्यान में उस विशेष भवन या इमारत या बिल्डिंग का एक विशिष्ट स्वरूप भी आ जाता है। किन्तु मूल यूनानी भाषा के जिस शब्द का अनुवादकलीसियाया मण्डली किया गया है, वह है “ekklesia, एक्कलेसियाजिसका शब्दार्थ होता है, “व्यक्तियों का एकत्रित होना”, याव्यक्तियों का समूहयाव्यक्तियों की सभा”; और प्रेरितों 19:32, 39 में “ekklesia, एक्कलेसियाशब्द का अनुवादसभाकिया गया है। 

मसीही विश्वास के प्रारंभिक दिनों में लोग घरों में (रोमियों 16:5; 1 कुरिन्थियों 16:19; कुलुस्सियों 4:15; फिलेमोन 1:2), खुले स्थानों पर, जैसे कि नदी के किनारे (प्रेरितों 16:13), आदि स्थानों पर आराधना के लिए एकत्रित हुआ करते थे। घरों में आराधना, उपासना के लिए एकत्रित होने की सभा के लिए उपरोक्त सभी  हवालों में “ekklesia, एक्कलेसियाप्रयोग किया गया है।  इसमें किसी भी विशिष्ट प्रयोग के लिए किसी वस्तु के द्वारा बनाए गए किसी विशेष भवन या इमारत का कोई अभिप्राय ही नहीं है। इसलिए, जब प्रभु यीशु ने पतरस से उपरोक्त वाक्य कहा, तो उसने तथा उसके साथ के अन्य शिष्यों ने भी इसी शब्दार्थ के साथ प्रभु के इस वाक्य को कुछ इस प्रकार से समझा होगा, “...और मैं [इस पत्थर पर] अपने लोगों को एकत्रित करूंगा...। जैसे ही हमकलीसियाशब्द के मूल अर्थ के साथ प्रभु के इस वाक्य और अन्य स्थानों पर इस शब्द के प्रयोग को देखते हैं, तो स्वतः हीकलीसियाशब्द के साथ जुड़ी अनेकों भ्रांतियों और गलत समझ एवं अनुचित शिक्षाओं का आधार समाप्त हो जाता है; उन बातों के मिथ्या एवं व्यर्थ होने की बात प्रकट हो जाती है, जैसे हम आने वाले दिनों के लेखों में देखेंगे। 

इसकी तुलना में, अंग्रेज़ी शब्द Church यूनानी भाषा के शब्दकुरियाकॉनसे आया है, जिसका अर्थ होता हैउपासना या आराधना का स्थान”; किन्तु नए नियम की मूल यूनानी भाषा का यह शब्द पूरे नए नियम में कहीं पर भी प्रयोग नहीं किया गया है। तो फिर “ekklesia, एक्कलेसियासे “Church, चर्चकैसे आ गया? इसे हम प्रभु यीशु के शिष्यों के समूह को बाइबल में जिन विभिन्न रूपकों या उपनामों से संबोधित किया गया है उसे देखते समय समझेंगे। अभी के लिए हम यही ध्यान रखते हैं कि नए नियम में मसीही विश्वास एवं शिक्षाओं के संदर्भ में, मूल यूनानी भाषा में “ekklesia, एक्कलेसियाशब्द न तो किसी भौतिक भवन या आराधना स्थल के लिए, और न ही ईसाई लोगों की किसी संस्था के लिए प्रयोग किया गया है। वरन, नए नियम में मसीही विश्वास एवं शिक्षाओं के संदर्भ में, यह शब्द प्रभु यीशु मसीह के शिष्यों के समूह या समुदाय के लिए ही विभिन्न अभिप्रायों के साथ प्रयोग किया गया है, जिन्हें हम आगे के लेखों में देखेंगे।

यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं, तो ध्यान कीजिए कि किसी भी शिक्षा या शब्द को उसके मूल और वास्तविक प्रयोग के अनुसार समझना कितना आवश्यक है। जब इस बात का ध्यान नहीं किया जाता है, तो शैतान को कैसे अपनी गलत शिक्षाएं ले आने और फैलाने का खुला अवसर मिल जाता है। इसलिए बाइबल में दिए गए बेरिया एवं थिस्सलुनीकिया के विश्वासियों के उदाहरणों (प्रेरितों 17:11; 1 थिस्सलुनीकियों 5:21) के समान, गलत शिक्षाओं को सीखने और सिखाने से बचे रहने के लिए, हर बात को परमेश्वर के वचन से परखने और जाँचने के बाद ही स्वीकार करने की आदत बना लें। इसे कठिन या सामान्य लोगों के लिए न मानी जा सकने वाली बात न समझें -  बेरिया एवं थिस्सलुनीकिया के ये विश्वासी न तो कोई वचन के ज्ञानी और विद्वान थे, और न ही किसी बाइबल कॉलेज या सेमनरी के छात्र। ये सभी मेरे और आपके समान साधारण लोग थे, अधिक पढ़े लिखे भी नहीं थे - शिक्षा उन दिनों दुर्लभ हुआ करती थी, इनके हाथों में केवल पुराना नियम ही था, इनके पास पुराने नियम की व्याख्या करने वाली कोई पुस्तकें नहीं थीं, मसीही विश्वासी होने के कारण ये उस समय के वचन के विद्वानों - फरीसियों, सदूकियों, और शास्त्रियों, द्वारा तिरस्कार किए हुए थे, उन से पूछ और सीख नहीं सकते थे - यदि उन्हें यह सुविधा उपलब्ध भी होती, तो केवल उन प्रभु यीशु के विरोधियों की गलतियों को ही सीखते परमेश्वर के वचन की सच्चाइयों को नहीं। ये केवल परमेश्वर पवित्र आत्मा के द्वारा सिखाए जाने पर निर्भर थे। और जब उन्होंने सच्चे मन और विश्वास से पवित्र आत्मा से सीखने के लिए अपने हाथ फैलाए, तो पवित्र आत्मा ने उन्हें सिखाया भी, जैसा आज मुझे सिखा रहा है, और वह आपको भी सिखाने के लिए तत्पर और तैयार है; और उनका उल्लेख सदा काल के लिए परमेश्वर के वचन में भले उदाहरण के रूप में आदर के साथ लिखवा दिया।

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • उत्पत्ति 4-6     
  • मत्ती 2

शनिवार, 1 जनवरी 2022

मसीह यीशु की कलीसिया या मण्डली - परिचय


परिचय 

आज ईसाई या मसीही होना, एक धर्म का निर्वाह करने वाला होना मान लिया जाता है, जो परमेश्वर के वचन बाइबल के अनुसार सही समझ नहीं है। इस ईसाई धर्म में भी ईसाई या मसीही कहलाने वाले लोग एक साथ और एक जुट रहकर एक उद्देश्य के लिए कार्य करने वाले नहीं, वरन अनेकों डिनॉमिनेशंस, अर्थात, गुटों और समुदायों में बंटे हुए और विभिन्न उद्देश्यों के लिए कार्य करने वाले दिखाई देते हैं। उन डिनॉमिनेशंस, अर्थात, गुट या समुदायों के अनुसार, उनके ईसाई या मसीही होने के विषय उनकी मान्यताओं में बहुत भिन्नताएं देखी जाती हैं, इन भिन्न मान्यताओं को लेकर उनमें बहुत से मतभेद देखे जाते हैं, तथा इस भिन्नता के कारण कभी-कभी परस्पर कटुता, बैर, एवं एक-दूसरे का विरोध भी देखा जाता है। इन बातों के कारण यह मानना कठिन हो जाता है कि वे सभी एक ही प्रभु - यीशु मसीह, को मानने वाले लोग हैं। जो लोग प्रभु यीशु मसीह के नाम में संसार को प्रेम, बलिदान, सहनशीलता, सहयोग, नम्रता, औरों की सहायता करने, आदि बातों की शिक्षाएं देते हैं, उनके अपने जीवनों में, तथा परस्पर व्यवहार में, विशेषकर किसी दूसरे डिनॉमिनेशन, अर्थात, गुट या समुदाय के लोगों के प्रति इन्हीं बातों के पालन की बहुत कमी देखी जाती है। इस विरोधाभास के दो मुख्य कारण हैं; दोनों ही प्रभु यीशु द्वारा अपने आरंभिक शिष्यों को जाकर संसार के लोगों को शिष्य बनाने की सौंपी गई ज़िम्मेदारी (मत्ती 28:18-1-20) के पालन न करने के कारण हैं। पहला कारण है कि हर कोई जो अपने आप को मसीही अर्थात मसीह यीशु का अनुयायी कहता है, वह वास्तव में मसीही अर्थात मसीह यीशु का सच्चा और समर्पित शिष्य नहीं होता है। और इस कारण जो वास्तविक और सच्चे समर्पित शिष्य नहीं होते हैं, वे मसीह यीशु की नहीं अपने मन की, या अपने डिनॉमिनेशन के अगुवों की, यानि कि किसी-न-किसी मनुष्य की इच्छा के अनुसार चलते हैं, और उस इच्छा को पूरा करना ही अपना कर्तव्य समझते हैं। दूसरा कारण है कि जो अपने आप को मसीही या मसीह यीशु के अनुयायी कहते हैं, जिन्होंने मसीह यीशु की शिष्यता स्वेच्छा से निर्णय लेकर स्वीकार की है, उन्हें भी उनके मसीही होने, मसीह यीशु द्वारा उसका अनुयायी होने के लिए उन्हें बुलाए जाने के उद्देश्य का या तो पता नहीं है, अथवा उसका ध्यान नहीं है। वे भी प्रभु और उसके वचन की आज्ञाकारिता में चलने को वह महत्व नहीं देते हैं, जो उन्हें देना चाहिए। इसलिए प्रभु और उसके वचन की अधूरी आज्ञाकारिता के कारण उनके जीवन भी मसीह यीशु में लाए गए विश्वास की वास्तविकता को व्यावहारिक जीवन में पूर्णतः प्रकट नहीं करते हैं। 

पहले कारण, वास्तव में मसीही न होने के बारे में विस्तार से पहले के लेखों में देख चुके हैं। संक्षेप में, प्रेरितों 11:26 में दी गई बाइबल की परिभाषा के अनुसार, मसीही वह है जो प्रभु यीशु मसीह का शिष्य है। किसी का शिष्य होने का अर्थ है अपने आप को उसके प्रति समर्पित कर देना और उसके कहे, उसकी शिक्षाओं के अनुसार अपना जीवन व्यतीत करना। यह एक स्वाभाविक और सर्वमान्य तथ्य है कि किसी की भी शिष्यता प्रत्येक व्यक्ति के द्वारा स्वेच्छा से धारण की जाती है। व्यक्ति किसी का आदर कर सकता है, उसकी शिक्षाओं और जीवन को भला और अनुसरणीय मान सकता है, किन्तु यह करने से वह उसका शिष्य नहीं हो जाता है। शिष्य बनने के लिए स्वेच्छा से और समझते-बूझते हुए निर्णय लेना पड़ता है। न तो कोई वंशागत रीति से शिष्यता प्राप्त करता है, और न ही किसी को बलपूर्वक, या किसी लोभ-लालच में एक वास्तविक, सच्चा और समर्पित शिष्य बनाया जा सकता है। और यदि कोई इस प्रकार अनुचित रीति से मसीह यीशु का शिष्य बन भी जाए, तो भी उसके जीवन से मसीही विश्वास की बातें और व्यवहार दिखाई नहीं देगा। वह मसीही होने के प्रभु यीशु के उद्देश्यों को कभी निभा नहीं सकेगा, कभी पूरा नहीं कर सकेगा। वह केवल नाम ही का मसीही होगा, किसी काम का या वास्तविक मसीही नहीं। 

दूसरा कारण, मसीह यीशु के प्रति अपूर्ण समर्पण और अधूरी आज्ञाकारिता, के बारे में समझने के लिए प्रभु यीशु द्वारा अपनी कलीसिया या मण्डली या “Church” बनाने की बात को देखना, जानना, और समझना होगा। जो प्रभु के साथ वास्तविकता में जुड़ गए हैं, वे स्वतः ही प्रभु की मण्डली या कलीसिया के साथ भी जुड़ गए हैं। इस मण्डली या कलीसिया के लिए प्रभु की एक योजना है, प्रयोजन है, और अन्ततः मनुष्य की कल्पना से भी बढ़कर प्रतिफल भी हैं। जो मसीही विश्वासी अपने आप को प्रभु की मण्डली या कलीसिया का एक अभिन्न एवं महत्वपूर्ण अंग होने, और उसमें अपनी ज़िम्मेदारी को ठीक से समझ लेगा, फिर वह अपने मसीही जीवन को प्रभु की इच्छा के अनुसार और प्रभु की महिमा के लिए व्यतीत करेगा। आज से आरंभ होने वाली इस श्रृंखला में हम प्रभु की इस कलीसिया या मण्डली के बारे में अध्ययन आरंभ करेंगे। कलीसिया के विषय जानकारी और समझ-बूझ लेने के लिए हम बाइबल मेंकलीसियाया “Church” शब्द के प्रथम प्रयोग के पद, प्रभु यीशु द्वारा अपने शिष्य पतरस से कही गई बात, “और मैं भी तुझ से कहता हूं, कि तू पतरस है; और मैं इस पत्थर पर अपनी कलीसिया बनाऊंगा: और अधोलोक के फाटक उस पर प्रबल न होंगे” (मत्ती 16:18) से आरंभ करेंगे। इस पद में निहित कलीसिया के विभिन्न पहलुओं को देखने के बाद, फिर हम बाइबल में अन्य स्थानों से प्रभु की कलीसिया के विषय और बातों को देखेंगे, सीखेंगे। 

 यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी। 

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • उत्पत्ति 1-3     
  • मत्ती 1

शुक्रवार, 31 दिसंबर 2021

मसीही सेवकाई और पवित्र आत्मा के वरदान - 29


उपसंहार  

पिछले लगभग एक महीने से हम मसीही विश्वासी के जीवन और सेवकाई में परमेश्वर पवित्र आत्मा की भूमिका, उनके द्वारा दिए गए वरदानों के, और उन वरदानों के उपयोग, तथा पवित्र आत्मा तथा आत्मिक वरदानों के साथ जुड़ी अनेकों भ्रांतियों के बारे में परमेश्वर के वचन बाइबल से देखते आ रहे हैं, और सीखते आ रहे हैं कि उन गलत शिक्षाओं की तुलना में वचन में दी गई सही बातें क्या हैं, वचन की उन बातों के अभिप्राय क्या हैं, और कैसे उन बातों को उनके संदर्भ, तात्कालिक पाठक या श्रोताओं के लिए अर्थ, प्रयोग किए गए शब्दों के मूल भाषा के शब्दार्थ, और वचन में उन से संबंधित अन्य शिक्षाओं एवं बातों के साथ मिलाकर, परमेश्वर पवित्र आत्मा के अगुवाई में किए गए अध्ययन से ये गलत शिक्षाएं पहचानी जा सकती हैं, और इनसे बचा जा सकता है, बाहर निकला जा सकता है। प्रभु यीशु ने अपने शिष्यों को, उनके जीवन और सेवकाई में परमेश्वर पवित्र आत्मा की भूमिका और कार्य के बारे में कुछ बहुत महत्वपूर्ण शिक्षाएं यूहन्ना 14 और 16 अध्याय में दी हैं। मसीही विश्वासी के जीवन और सेवकाई में पवित्र आत्मा और आत्मिक वरदानों के संदर्भ में प्रत्येक मसीही विश्वासी के लिए इन शिक्षाओं को जानना और समझना, और फिर इनके अनुसार लोगों द्वारा दी जा रही शिक्षाओं का आँकलन करना बहुत आवश्यक है, क्योंकि ये शिक्षाएं प्रभु ने इसी उद्देश्य से अपने शिष्यों को दी थीं।

प्रभु यीशु ने शिष्यों से कहा, “मैं अब से तुम्हारे साथ और बहुत बातें न करूंगा, क्योंकि इस संसार का सरदार आता है, और मुझ में उसका कुछ नहीं” (यूहन्ना 14:30)। प्रभु जानता था कि उनके स्वर्गारोहण के पश्चात, शैतान उनके कार्य को बिगाड़ने और शिष्यों द्वारा सुसमाचार की सेवकाई को बाधित या निष्फल करने के लिए उन शिष्यों पर और उनकी सेवकाई पर हमला करेगा। क्योंकि शैतान एक बहुत प्रबल शत्रु है, और अनेकों युक्तियों तथा धार्मिक और सही प्रतीत होने वाली बातों एवं व्यवहार के द्वारा प्रभु के शिष्यों और सेवकाई के कार्यों में बाधा डालेगा (2 कुरिन्थियों 11:3, 13-15, इसी लिए शिष्यों की सहायता के लिए प्रभु ने अपने पवित्र आत्मा को उनमें और उनके साथ रहने के लिए भेजा। हम देख चुके हैं कि जैसे ही कोई व्यक्ति पापों से पश्चाताप करके, उनके लिए प्रभु यीशु से क्षमा माँगता है, प्रभु को अपना उद्धारकर्ता स्वीकार करता है और अपना जीवन उसे समर्पित कर देता है, उसी पल से तुरंत ही परमेश्वर पवित्र आत्मा उसके जीवन में आकर, उसके मसीही जीवन और सेवकाई में उसका सहायक और मार्गदर्शक होने के लिए, उसके अन्दर सर्वदा के लिए निवास करने लगता है (यूहन्ना 14:16-17; 1 कुरिन्थियों 3:16; 6:19)। साथ ही परमेश्वर पिता ने जो भी सेवकाई उस व्यक्ति के लिए निर्धारित की है (इफिसियों 2:10) उसे भली-भांति निभाने के लिए उस व्यक्ति को उपयुक्त आत्मिक वरदान भी प्रदान करता है, तथा उन वरदानों का प्रयोग करना सिखाता है। प्रभु यीशु के विश्वासी की आशीष और आत्मिक जीवन में उन्नति, उसके द्वारा उसे सौंपी गई सेवकाई को ठीक से करने में ही है; इसी उद्देश्य से परमेश्वर पवित्र आत्मा उसके अन्दर रहता है।

परमेश्वर पवित्र आत्मा अपनी सम्पूर्ण सामर्थ्य के साथ प्रत्येक मसीही विश्वासी में उसके उद्धार पाने के क्षण से ही विद्यमान है; किन्तु जब तक वह विश्वासी पवित्र आत्मा के कहे के अनुसार न करे, उसके चलाए न चले (गलातियों 5:16, 18, 26), तो फिर उसके जीवन में पवित्र आत्मा की उपस्थिति और सामर्थ्य कैसे प्रकट होगी? अदन की वाटिका में पहला पाप करवाने के लिए शैतान ने अपनी जिस युक्ति का प्रयोग किया था, उसे ही आज भी वह उतनी ही कारगर रीति से प्रयोग करता है। उसकी यह युक्ति है परमेश्वर के वचन पर संदेह उत्पन्न करके, उसके विरुद्ध मन में प्रश्न उठाकर, मनुष्य द्वारा अपनी दृष्टि और समझ के अनुसार अच्छी, लुभावनी, और मन-भावनी प्रतीत होने वाली बात को ही सही मानना, और परमेश्वर के वचन के विरुद्ध, अपनी दृष्टि और समझ में सही बात का पालन करना। इसी युक्ति के अन्तर्गत शैतान ने परमेश्वर पवित्र आत्मा, उनके कार्य, और उनके द्वारा दिए जाने वाले आत्मिक वरदानों के बारे में बहुत सी गलत शिक्षाएं बहुत धार्मिक और लुभावनी लगने वाली बातों के रूप में मसीही या ईसाई कहलाए जाने वाले लोगों में फैला रखी हैं, यहाँ तक कि अनेकों वास्तविक मसीही विश्वासियों को भी उन बातों के भ्रम में फंसा रखा है। 

जब तक मसीही विश्वासी उन गलत शिक्षाओं से बाहर आकर वचन की सच्चाई और खराई को समझकर, उसका पालन करना आरंभ नहीं करेगा, वह शैतान द्वारा खड़े किए गए एक काल्पनिकमसीहीविश्वास तथा धार्मिकता की चकाचौंध, आकर्षण, शारीरिक उन्माद और लुभावने अनुभव उत्पन्न करने वाली बातों में, तथा उसके अनुसार किए गए कार्यों के धोखे में फंसा रहेगा। अन्ततः जब ऐसेमसीही विश्वासियोंकी आँख खुलेगी, और वे सच्चाई को जानेंगे, पहचानेंगे, तब तक बहुत देर हो चुकी होगी, और उन पाँच मूर्ख कुँवारियों के समान उनके वापस परमेश्वर के पास लौटने के द्वारा हमेशा के लिए बंद हो चुके होंगे। एक बहुत साधारण और सीधी सी बात है, जो कुछ वचन में दिया गया नहीं है, वचन के अनुसार नहीं है, जो कुछ भी वचन के बाहर से है, जो कुछ भी वचन में जोड़ कर या उसमें से घटा कर बताया और सिखाया जा रहा है, वह सत्य नहीं है, शैतान की ओर से है, और कदापि उसका पालन नहीं करना है - वह चाहे मानवीय बुद्धि और तर्क के अनुसार कितना भी ठीक, आकर्षक, धार्मिक, और उचित क्यों न लगे; चाहे कितने भी और कैसे भी लोग उसके पक्ष में क्यों न बोलें। 

यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं तो अभी समय रहते 2 कुरिन्थियों 13:5 के अनुसार अपने आप को जाँच कर देख लें कि आप सही विश्वास में हैं कि नहीं। परमेश्वर पवित्र आत्मा के द्वारा, परमेश्वर के वचन बाइबल के अनुसार चलाए ही चलें, अन्य हर बात से बाहर हो जाएं। चाहे ऐसा करने के लिए कैसी भी कीमत क्यों न चुकानी पड़े, क्योंकि आज की थोड़ी सी हानि, कल की अनन्त आशीष और भलाई बन जाएगी। किन्तु यदि आप सच्चाई के लिए आज यह थोड़ी सी हानि उठाने, यह कीमत चुकाने के लिए तैयार नहीं होंगे, तो कल यह आपके लिए अनन्त हानि और पीड़ा का कारण बन जाएगी। इसलिए सही निर्णय लेकर, और उसके अनुसार उचित कार्य कर लें।  

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।   

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • मलाकी 1-4     
  • प्रकाशितवाक्य 22