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मंगलवार, 1 फ़रवरी 2022

प्रभु यीशु की कलीसिया के कार्यकर्ता

  वचन की आज्ञाकारिता की अनिवार्यता

पिछले लेख में हमने देखा था कि प्रभु यीशु की कलीसिया अभी निर्माणाधीन है, प्रभु यीशु द्वारा बनाई जा रही है, उसमें अभी प्रभु के प्रति समर्पित लोग, प्रभु द्वारा जोड़े जा रहे हैं, और अभी कलीसिया को अपने वचन के स्नान के द्वारा प्रभु पवित्र, निर्दोष, बेदाग़, बेझुर्री कर रहा है। कलीसिया की इस गतिमान (dynamic) स्थिति में उसके विभिन्न कार्यों और दायित्वों के निर्वाह के लिए, प्रभु ने कलीसिया के सदस्यों में से कुछ लोगों को विशेष ज़िम्मेदारियों के साथ नियुक्त किया है। इफिसियों 4:11 में हम प्रभु द्वारा की गई इन नियुक्तियों और नियुक्त लोगों की सेवकाइयों के बारे में पढ़ते हैं। ये कार्यकर्ता हैं प्रेरित, भविष्यद्वक्ता, सुसमाचार प्रचारक, रखवाले, और उपदेशक। मूल यूनानी भाषा में, ये पाँचों सेवकाइयां परमेश्वर के वचन की सेवकाई से संबंध रखती हैं। अर्थात, किसी भी स्थानीय कलीसिया की उन्नति और स्थिरता के लिए, उसके शैतान द्वारा बिगाड़े जाने से सुरक्षित रहने के लिए इफिसियों 4:11 की, परमेश्वर के वचन से संबंधित पाँच प्रकार की सेवकाइयां, तथा प्रेरितों 2:38-42 की वे सात बातें जिन्हें हम अभी देख कर चुके हैं, अनिवार्य हैं। इन सभी बातों की उपस्थिति, पालन, और निर्वाह ही कलीसिया के प्रभु में दृढ़ और स्थिर बने रहने का आधार है। प्रेरित यूहन्ना के द्वारा, प्रभु यीशु प्रकाशितवाक्य 2 और 3 अध्याय में अपनी सात कलीसियाओं को दिए गए संदेशों में, सात में से पाँच कलीसियाओं को कड़े दण्ड की चेतावनियाँ देता है, क्योंकि वे उसके वचन और आज्ञाकारिता में बने नहीं रहे। ध्यान दीजिए कि प्रभु इन सातों कलीसियाओं को “कलीसिया” कहकर ही संबोधित करता है, कुछ बातों के लिए उनकी प्रशंसा और सराहना भी करता है, किन्तु उनमें से पाँच कलीसियाएं ऐसी थीं जिनमें पाई जाने वाली कुछ बातें और कार्य प्रभु के वचन, उसकी आज्ञाकारिता, और प्रभु की इच्छा के अनुसार नहीं थे। प्रभु ने उन्हें इन बातों और कार्यों के बारे में चिताया, और उसकी इस चेतावनी की बात को न मानने के भारी दण्ड के बारे में भी बताया। और आज हम उन सातों कलीसियाओं को केवल इतिहास की पुस्तकों में या फिर परमेश्वर के वचन में ही पाते हैं, अन्ततः वे कलीसियाएं पृथ्वी के अपने अस्तित्व में, प्रभु में स्थिर और दृढ़ तथा स्थापित नहीं रह सकीं, पृथ्वी से मिट गईं। प्रभु के वचन के साथ समझौता, उसमें सांसारिक बातों की मिलावट, और प्रभु की अनाज्ञाकारिता हमेशा ही व्यक्तिगत तथा कलीसिया के जीवन के लिए हानिकारक एवं विनाशक रहे हैं। 

आरंभिक कलीसिया का इतिहास इस बात का प्रमाण और सूचक है कि मसीही विश्वासियों के व्यक्तिगत जीवन की, तथा कलीसिया की उन्नति, उनके व्यक्तिगत जीवनों में तथा मंडली के जीवन में वचन की सही सेवकाई के साथ जुड़ी रही है। जहाँ प्रभु के वचन को आदर और आज्ञाकारिता मिली है, वहाँ उन्नति भी हुई है, अन्यथा जहाँ भी वचन का निरादर, वचन में मिलावट, वचन की अनाज्ञाकारिता आई, वहीं पतन और विनाश भी शीघ्र ही आ गए। इसलिए इसमें कोई अचरज की बात नहीं है कि प्रेरितों 2:42 में दी गई चार बातों, जिन में उस प्रथम मण्डली के लोग लौलीन रहते थे, उन में से पहली थी “प्रेरितों से शिक्षा पाने”; और प्रभु यीशु द्वारा अपने स्वर्गारोहण से ठीक पहले शिष्यों को दी गई सुसमाचार प्रचार की महान आज्ञा में भी लोगों को प्रभु की बातें सिखाने के लिए कहा गया है। बाइबल में आरंभिक कलीसिया की उन्नति के, प्रभु तथा उसके वचन की आज्ञाकारिता के साथ जुड़े होने से संबंधित प्रेरितों के काम से कुछ पदों को देखिए, और यह बात स्वतः ही प्रकट एवं स्पष्ट हो जाएगी:

  • प्रेरितों 4:4 “परन्तु वचन के सुनने वालों में से बहुतों ने विश्वास किया, और उन की गिनती पांच हजार पुरुषों के लगभग हो गई।”
  • प्रेरितों 5:14 “और विश्वास करने वाले बहुतेरे पुरुष और स्त्रियां प्रभु की कलीसिया में और भी अधिक आकर मिलते रहे।”
  • प्रेरितों 6:7 “और परमेश्वर का वचन फैलता गया और यरूशलेम में चेलों की गिनती बहुत बढ़ती गई; और याजकों का एक बड़ा समाज इस मत के आधीन हो गया।”
  • प्रेरितों 9:31 “सो सारे यहूदिया, और गलील, और सामरिया में कलीसिया को चैन मिला, और उसकी उन्नति होती गई; और वह प्रभु के भय और पवित्र आत्मा की शान्ति में चलती और बढ़ती जाती थी।”
  • प्रेरितों 11:20-21 “परन्तु उन में से कितने कुप्रुसी और कुरेनी थे, जो अन्‍ताकिया में आकर युनानियों को भी प्रभु यीशु का सुसमाचार की बातें सुनाने लगे। और प्रभु का हाथ उन पर था, और बहुत लोग विश्वास कर के प्रभु की ओर फिरे।”
  • प्रेरितों 12:24 “परन्तु परमेश्वर का वचन बढ़ता और फैलता गया।”
  • प्रेरितों 13:48-49 “यह सुनकर अन्यजाति आनन्दित हुए, और परमेश्वर के वचन की बड़ाई करने लगे: और जितने अनन्त जीवन के लिये ठहराए गए थे, उन्होंने विश्वास किया। तब प्रभु का वचन उस सारे देश में फैलने लगा।”
  • प्रेरितों 16:4-5 “और नगर नगर जाते हुए वे उन विधियों को जो यरूशलेम के प्रेरितों और प्राचीनों ने ठहराई थीं, मानने के लिये उन्हें पहुंचाते जाते थे। इस प्रकार कलीसिया विश्वास में स्थिर होती गई और गिनती में प्रति दिन बढ़ती गई।”
  • प्रेरितों 19:20 “यों प्रभु का वचन बल पूर्वक फैलता गया और प्रबल होता गया।”

इनके अतिरिक्त रोमियों 16:25, कुलुस्सियों 2:6, 1 थिस्सलुनीकियों 3:2, 2 तीमुथियुस 3:16-17, इब्रानियों 13:20-21, 2 पतरस 1:12, आदि पद भी इस बात को दिखाते और प्रमाणित करते हैं।

प्रभु यीशु ने अपने शिष्यों को, उन प्रेरितों को जिसने उसने नियुक्त किया था (लूका 6:13) को जगत के छोर तक उसके सुसमाचार के प्रचार का दायित्व सौंपा (प्रेरितों 1:8), और अपनी प्रथम मण्डली को अपने शिष्यों से, प्रेरितों से उसके वचन की शिक्षा पाने के निर्देश दिए (प्रेरितों 2:42)। तब से लेकर आज तक, संसार भर में, मसीही मंडलियों और मसीही विश्वासियों का इतिहास इस बात का गवाह रहा है कि जो मसीही विश्वासी और मण्डली प्रभु के वचन और उसकी आज्ञाकारिता में बनी रहे, बढ़ती रही, वह उन्नत होती गई, और स्थिर बनी रही। जो प्रभु के वचन से हटकर, औपचारिकताओं और रीतियों-रस्मों-परंपराओं के निर्वाह में चले गए, वे प्रभु से भी दूर चले गए, उसके जन नहीं रहे, चाहे बाहरी स्वरूप में वे प्रभु के साथ बने रहने के जितने भी प्रयास करते रहे हों। प्रभु यीशु के संसार में प्रथम आगमन के समय, यरूशलेम में मंदिर भी था, मंदिर में याजक और लेवी भी थे, सारे पर्व मनाए जाते थे और बलिदान चढ़ाए जाते थे, बहुत बड़ी संख्या में भक्त लोग नियमित वहाँ आया करते थे, और व्यवस्था तथा पुराने नियम की बातों का कड़ाई से पालन करने और करवाने वाला फरीसियों, शास्त्रियों, सदूकियों का बड़ा और अति-प्रभावी समुदाय भी वहीं पर था। किन्तु इन सभी ने मिलकर परमेश्वर के वचन को भ्रष्ट कर दिया था, उसे औपचारिकताओं और रीतियों-रस्मों-परंपराओं के निर्वाह में बदल दिया था। इसीलिए, जब वह वचन देहधारी होकर उनके सामने आया, तो उन्होंने उसे नहीं पहचाना, उसका अनादर और निन्दा की, और उसे क्रूस पर मरवा दिया, फिर उसके अनुयायियों को भी सताने और मरवाने पर उतारू हो गए। आज न वह मंदिर बचा, न वे याजक, लेवी, फरीसी, शास्त्री, सदूकी बचे; किन्तु प्रभु का वचन और प्रभु के लोग सारे संसार में फैल गए, स्थापित हो गए, और बढ़ते जा रहे हैं। 

अगले लेख से हम इन पाँचों सेवकाइयों और सेवकों के बारे में देखना आरंभ करेंगे। किन्तु यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं, तो यह आपके लिए अपने आप को जाँचने-परखने का अवसर और समय है कि प्रभु यीशु मसीह और उसके वचन एवं उसकी आज्ञाकारिता के प्रति आपका रवैया क्या है? कहीं आपका “मसीही विश्वास” किसी मत या डिनॉमिनेशन के नियमों, रीतियों, परंपराओं आदि की औपचारिकता के निर्वाह पर आधारित और वहीं तक सीमित तो नहीं है? क्योंकि यदि ऐसा है, तो आप एक बहुत बड़े भ्रम में हैं, और आपको मसीही विश्वास की वास्तविकता को पहचान कर, उसके पालन एवं निर्वाह में आना अनिवार्य है।  

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।


एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • निर्गमन 27-28     
  • मत्ती 21:1-2

सोमवार, 31 जनवरी 2022

प्रभु यीशु की कलीसिया की बढ़ोतरी

प्रभु यीशु द्वारा नियुक्तियों के द्वारा   

प्रभु यीशु मसीह की कलीसिया या मण्डली से संबंधित इस अध्ययन में हम देख चुके हैं कि आम धारणा के विपरीत, कलीसिया, या चर्च, या प्रभु की मण्डली, कोई भौतिक स्थान अथवा भवन नहीं है। वरन, बाइबल के अनुसार, प्रभु की कलीसिया, प्रभु के प्रति पूर्णतः समर्पित और स्वेच्छा से उसे अपना व्यक्तिगत उद्धारकर्ता स्वीकार करने वाले लोगों का समूह या गुट है। हमने यह भी देखा है कि प्रभु यीशु स्वयं ही अपनी कलीसिया बना रहा है, उसने यह कार्य किसी मनुष्य अथवा संस्था को नहीं सौंपा है, तथा वर्तमान में प्रभु की कलीसिया निर्माणाधीन है, इसलिए अपूर्ण है, उसमें विभिन्न कमियाँ और त्रुटियाँ दिखाई देती हैं। प्रभु अभी कलीसिया को उसका अंतिम पूर्ण स्वरूप देने में कार्यरत है, और अन्ततः कलीसिया प्रभु की दुल्हन के रूप में उसके तेजस्वी और जयवंत स्वरूप में प्रभु के साथ होगी। परमेश्वर के वचन से प्राप्त होने वाले, कलीसिया से संबंधित ये आधार-भूत तथ्य, यह प्रकट और स्पष्ट कर देते हैं कि वास्तविक कलीसिया, अर्थात मसीही विश्वासियों का वह समूह, जो प्रभु के पास उठाई जाएगी तथा अनन्तकाल के लिए प्रभु के साथ रहेगी वह किसी मानवीय अथवा संस्थागत रीति-रिवाज़ों, नियमों, परंपराओं, या धारणाओं द्वारा न तो बनी है और न प्रभु को स्वीकार्य है। प्रभु यीशु केवल अपनी बनाई हुई कलीसिया को अपने साथ लेगा और रखेगा, और शेष सभी, जो प्रभु यीशु के साथ उसके द्वारा नहीं जोड़े गए हैं, वे अनन्त विनाश के लिए पीछे रह जाएंगे। उन पीछे रह जाने वाले लोगों की धारणाएं और मान्यताएं चाहे कुछ भी रही हों। 

 प्रभु के द्वारा उसकी कलीसिया में जोड़े जाने वाले लोगों का यह समूह या गुट किसी मत या डिनॉमिनेशन के विधि-विधानों, परंपराओं, और नियमों का पालन नहीं करता है। वरन, परमेश्वर पवित्र आत्मा की अगुवाई में, प्रभु की कलीसिया प्रभु यीशु और उसके वचन की आज्ञाकारिता में जीवन व्यतीत करती है, प्रभु के लिए कार्यकारी रहती है। कलीसिया में विभिन्न दायित्वों और कार्यों के निर्वाह के लिए, प्रत्येक मसीही विश्वासी को परमेश्वर पवित्र आत्मा के द्वारा कुछ आत्मिक वरदान भी दिए गए हैं, जिनके बारे में हम पवित्र आत्मा की भूमिका से संबंधित पहले के लेखों में देख चुके हैं। कलीसिया से संबंधित बाइबल के इन तथ्यों से हम प्रभु की कलीसिया के विषय एक और आधार-भूत बात भी सीखते हैं - अभी, इस पृथ्वी पर प्रभु की कलीसिया अचल (static) नहीं वरन गतिमान (dynamic) है। अभी उसमें लोग जोड़े जा रहे हैं, शैतान द्वारा घुसाए गए लोगों की पहचान दिखाकर उन्हें पृथक किया जा रहा है, प्रभु अपनी कलीसिया को अपने “वचन के जल के स्नान से” पवित्र, निर्दोष, बेदाग़, बेझुर्री बना रहा है (इफिसियों 5:26-27)। प्रभु की कलीसिया में यह कार्य किए जाने के लिए प्रभु ने कुछ लोगों को नियुक्त किया है: “और उसने कुछ को प्रेरित नियुक्त करके, और कुछ को भविष्यद्वक्ता नियुक्त कर के, और कुछ को सुसमाचार सुनाने वाले नियुक्त कर के, और कुछ को रखवाले और उपदेशक नियुक्त कर के दे दिया। जिस से पवित्र लोग सिद्ध हों जाएं, और सेवा का काम किया जाए, और मसीह की देह उन्नति पाए। जब तक कि हम सब के सब विश्वास, और परमेश्वर के पुत्र की पहचान में एक न हो जाएं, और एक सिद्ध मनुष्य न बन जाएं और मसीह के पूरे डील डौल तक न बढ़ जाएं। ताकि हम आगे को बालक न रहें, जो मनुष्यों की ठग-विद्या और चतुराई से उन के भ्रम की युक्तियों की, और उपदेश की, हर एक बयार से उछाले, और इधर-उधर घुमाए जाते हों। वरन प्रेम में सच्चाई से चलते हुए, सब बातों में उस में जो सिर है, अर्थात मसीह में बढ़ते जाएं। जिस से सारी देह हर एक जोड़ की सहायता से एक साथ मिलकर, और एक साथ गठकर उस प्रभाव के अनुसार जो हर एक भाग के परिमाण से उस में होता है, अपने आप को बढ़ाती है, कि वह प्रेम में उन्नति करती जाए” (इफिसियों 4:11-16)।

बाइबल के उपरोक्त खण्ड (इफिसियों 4:11-16) के संदर्भ को यदि उसके पहले के पदों (इफिसियों 4:7-10) के साथ देखें, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि कलीसिया में इन कार्यकर्ताओं को नियुक्त करने वाला प्रभु यीशु ही है (4:7); जो प्रभु के द्वारा मत्ती 16:18 में कही गई बात, “मैं अपनी कलीसिया बनाऊँगा” की पुष्टि है। परमेश्वर पवित्र आत्मा ने इफिसियों 4:11-16 में पाँच भिन्न कार्य और कार्यकर्ताओं का उल्लेख है - प्रेरित, भविष्यद्वक्ता, सुसमाचार प्रचारक, रखवाले, और उपदेशक। अर्थात, प्रभु की प्रत्येक स्थानीय कलीसिया में, जो प्रभु के विश्व-व्यापी कलीसिया का एक अंश है, कलीसिया की उन्नति के लिए प्रभु इन सेवकाइयों को चाहता है, और उनके निर्वाह के लिए उपयुक्त लोगों को खड़ा करता है। ये लोग न तो किसी स्थानीय कलीसिया के सदस्यों द्वारा “चुने” या “नियुक्त” किए जाते हैं; और न ही स्वयं अपनी इच्छा के अनुसार इस दायित्व को उठाते हैं। कलीसिया के निर्माण से संबंधित लेख में, हम ने 1 राजाओं 6:7 में सुलैमान द्वारा बनवाए जा रहे मंदिर से देखा था कि मंदिर का प्रत्येक पत्थर पहले अपने स्थान के लिए काट-तराश कर तैयार किया जाता था, और फिर मंदिर में लाकर उसे उसके निर्धारित स्थान पर लगा दिया जाता था। इसी प्रकार से प्रभु की कलीसिया में कार्य करने के लिए भी प्रभु ही उपयुक्त लोगों को निर्धारित करता है और उन्हें कलीसिया में उनके कार्य के लिए प्रत्यक्ष करता है। यह तथ्य हमें कलीसिया के प्रभु के होने या न होने के विषय पहचान करने का भी एक तरीका देती है - प्रभु की कलीसिया में, प्रभु द्वारा उस की कलीसिया की उन्नति के लिए, ये पाँचों प्रकार की सेवकाइयों को करने वाले लोग मिलेंगे। जो प्रभु की कलीसिया नहीं है, उसमें यह गुण नहीं देखा जाएगा। हम आते कुछ लेखों में इन सेवकाइयों के विषय और इफिसियों 4:11-16 में कलीसिया की उन्नति से संबंधित लिखी बातों को कुछ और विस्तार से देखेंगे। 

यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं, तो गंभीरता से जाँच परख कर देख लें कि आप अपने आप को जिस कलीसिया का अंग या सदस्य मानते हैं वह प्रभु की कलीसिया है भी या नहीं; और यह भी कि आप प्रभु द्वारा उसकी कलीसिया में जोड़े गए हैं कि नहीं, या किसी मत अथवा डिनॉमिनेशन के विधि-विधानों, परंपराओं, और नियमों के पालन के द्वारा अपने आप को प्रभु की कलीसिया का सदस्य समझ रहे हैं। कहीं ऐसा न हो कि जब तक वास्तविकता के प्रति सचेत हों, तब तक बहुत देर हो जाए, और बात को ठीक करने का अवसर हाथ से निकल जाए। 

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।  

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • निर्गमन 25-26     
  • मत्ती 20:17-34  

रविवार, 30 जनवरी 2022

प्रभु यीशु की कलीसिया या मण्डली

प्रभु यीशु में जयवंत   

हमने प्रभु यीशु मसीह की कलीसिया, अर्थात प्रभु यीशु के विश्वासी समर्पित शिष्यों के समूह या समुदाय विषय परमेश्वर के वचन बाइबल से, मत्ती 16:18 के साथ, जहाँ बाइबल में कलीसिया शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग किया गया है, सीखना आरंभ किया था। हमने कलीसिया शब्द के अर्थ को समझा, यह देखा कि आम धारणा के विपरीत प्रभु यीशु ने कलीसिया पतरस पर स्थापित नहीं की; और यह देखा कि क्यों ऐसा समझना इस पद की गलत व्याख्या करना है। हमने देखा कि प्रभु यीशु स्वयं ही अपनी कलीसिया का बनाने वाला और उसकी देख-भाल करने वाला है, उसने यह कार्य किसी अन्य अथवा किसी मनुष्य को नहीं सौंपा है। फिर हमने कलीसिया के लिए बाइबल में प्रयुक्त विभिन्न रूपकों (metaphors) के द्वारा कलीसिया के उद्देश्य और कार्यों को समझा था, और देखा था कि कोई भी मानवीय अथवा संस्थागत रीति अथवा विधि से बनाई गई ‘कलीसिया’ इन रूपकों पर खरी नहीं उतरती है, और केवल प्रभु यीशु मसीह द्वारा बनाई गई उसकी कलीसिया ही इन रूपकों के गुणों का निर्वाह कर सकती है; इसलिए कोई भी मनुष्य किसी भी रीति से प्रभु की कलीसिया को नहीं बना अथवा बनवा सकता है; और न ही स्वयं उसमें जुड़ सकता है न ही किसी अन्य को जोड़ सकता है। 

फिर हमने प्रेरितों 2:38-42 में से उन सात बातों को देखा है, जो कलीसिया के आरंभ से ही सच्ची मसीही कलीसिया तथा उसके सदस्यों के जीवनों का अभिन्न अंग रही हैं। प्रेरितों 2:42 में उन सात में से चार ऐसी बातें दे गई हैं जिन्हें कलीसिया और मसीही जीवन के स्तंभ कहा जाता है, जो कलीसिया और मसीही जीवन की स्थिरता और दृढ़ता के लिए अनिवार्य हैं। किसी भी “कलीसिया” में इन सात बातों की उपस्थिति दिखाती एवं प्रमाणित करती है कि वह “कलीसिया” प्रभु की कलीसिया है। अन्यथा वह “कलीसिया” प्रभु की नहीं, वरन किसी मानवीय अथवा संस्थागत रीतियों के आधार पर मनुष्यों द्वारा बनाई गई ऐसी “कलीसिया” है जिसका प्रभु की सच्ची कलीसिया से कोई संबंध नहीं है; कलीसिया के लिए प्रभु की आशीषों और अनन्तकालीन योजनाओं तथा प्रतिफलों में जिसका कोई भाग नहीं है। वरन वह अनन्त विनाश के लिए रखे गए प्रभु के खेत में उगने वाले उन जंगली पौधों के समान है जो खेत में रहते हुए पलते, बढ़ते और पोषित तो होते रहे, किन्तु कटनी के समय पृथक कर के उन्हें उनके पूर्व-निर्धारित अनन्त विनाश के लिए फेंक दिया गया (मत्ती 13:24-30, 37-42)।

मत्ती 16:18 में प्रभु यीशु ने अपनी कलीसिया के एक और गुण को भी बताया है “... और अधोलोक के फाटक उस पर प्रबल न होंगे”; अर्थात प्रभु की कलीसिया प्रभु में रहने और प्रभु से प्राप्त सुरक्षा के कारण सदा जयवंत बनी रहेगी, शैतान की कोई योजना, कोई षड्यंत्र उसके विरुद्ध सफल नहीं होगा। प्रभु की कही इस बात के अभिप्राय को समझने के लिए प्रभु द्वारा यहाँ पर प्रयुक्त वाक्यांश अधोलोक के फाटक के इन शब्दों को समझना आवश्यक है। शब्द “अधोलोक” यूनानी भाषा के शब्द hades (हेडीस) का अनुवाद है और एक ऐसे पीड़ा के स्थान के लिए प्रयोग किया जाता है जहाँ पर पार्थिव जीवन में परमेश्वर के साथ अपने संबंधों को ठीक नहीं करने वालों की आत्माएं उनके अंतिम न्याय के लिए रखी गई हैं; जैसे कि प्रभु द्वारा लाजरस और धनी व्यक्ति के दृष्टांत (लूका 16:19-31) में दिखाया गया है, उस धनी व्यक्ति की आत्मा अधोलोक डाली गई (लूका 16:23)। अर्थात अधोलोक शैतानी आत्माओं और शक्तियों का स्थान है। बाइबल में, विशेषकर पुराने नियम में, किसी नगर या शहर का फाटक वह स्थान होता था जहाँ पर उस नगर अथवा शहर के मुख्य अधिकारी और न्यायी बैठा करते थे, और लोगों का न्याय करते थे (व्यवस्थाविवरण 16:18; व्यवस्थाविवरण 21:19-20; रूत 4:1-2; अय्यूब 29:7-10)। अर्थात किसी स्थान के फाटक का जन होने से तात्पर्य होता था उस स्थान का प्रमुख न्यायिक या प्रशासनिक अधिकारी। इसलिए मत्ती 16:18 में इन दोनों शब्दों को साथ देखने से अभिप्राय बनता है शैतानी स्थान की प्रमुख शक्तियां। और प्रभु यीशु मसीह ने दावा किया है कि उसकी कलीसिया के विरुद्ध शैतान की कोई शक्ति प्रबल नहीं हो सकेगी, उसे पराजित नहीं कर सकेगी। 

प्रभु के इस दावे को हम आज वास्तविकता में कार्यान्वित होते हुए क्यों नहीं देखते हैं? ध्यान कीजिए कि, जैसा हम पहले देख चुके हैं, प्रभु की कलीसिया अभी निर्माणाधीन है; अभी अपने अंतिम स्वरूप में नहीं आई है। प्रभु अपने लोगों को तैयार कर के कलीसिया में उनके निर्धारित स्थान पर जोड़ता चला जा रहा है। प्रभु अभी अपनी कलीसिया को वचन के जल के स्नान के द्वारा बेदाग और बेझुर्री, पवित्र और निर्दोष बना रहा है (इफिसियों 5:26-27); यह प्रक्रिया चल रही है, पूरी नहीं हुई है। साथ ही एक बार फिर मत्ती 13:24-30 के प्रभु के दृष्टांत पर ध्यान कीजिए - प्रभु की कलीसिया में प्रभु के जनों के अतिरिक्त शैतान के ‘पौधे’ भी हैं - जो उनके अनन्त विनाश के लिए पहचान कर लिए गए हैं और कटनी के समय अलग कर दिए जाएंगे। इन कारणों से कलीसिया अभी इस पृथ्वी पर अपने उस तेजस्वी और जयवंत स्वरूप में देखने को नहीं मिलती है, जिसका वर्णन उसके विषय वचन में किया गया है। किन्तु प्रभु की कलीसिया में प्रभु के अनेकों समर्पित जन व्यक्तिगत रीति से यह जयवंत जीवन जीते हुए देखे जा सकते हैं। प्रभु के दूसरे आगमन पर कलीसिया प्रभु के पास उठाई जाएगी, और फिर प्रभु की दुल्हन, आत्मिक यरूशलेम के रूप में प्रभु के साथ रहेगी (प्रकाशितवाक्य 21:2, 9-10)। प्रभु की इस कलीसिया, उसकी दुल्हन, उस आत्मिक यरूशलेम के लिए लिखा है, “और उस में कोई अपवित्र वस्तु या घृणित काम करने वाला, या झूठ का गढ़ने वाला, किसी रीति से प्रवेश न करेगा; पर केवल वे लोग जिन के नाम मेम्ने के जीवन की पुस्तक में लिखे हैं” (प्रकाशितवाक्य 21:27)।

यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं, तो अभी आपके पास इस बात को जाँचने और परखने का समय है कि क्या आपका नाम वास्तव में मेमने की जीवन की पुस्तक में लिखा गया है कि नहीं? क्या आप प्रभु की कलीसिया के वास्तविक सदस्य हैं, या मत्ती 13:24-30 के प्रभु के दृष्टांत के जंगली बीजों के उस पौधे के समान तो नहीं हैं जो स्वामी की देखभाल, पालन-पोषण, और सुरक्षा के कारण अपने आप को उसके खलिहान में जाने के लिए निश्चिंत समझे हुए है, किन्तु कटनी के समय जो कटु सत्य सामने आएगा, उसके लिए तैयार नहीं है। वह जंगली बीज अपनी नियति नहीं बदल सकता था; किन्तु आपके पास अभी अपनी अनन्तकालीन नियति समझने और सुधारने के लिए समय और अवसर है। प्रभु द्वारा दिए गए इस समय और अवसर को व्यर्थ न जानें दें; उसका सदुपयोग करें और अपने अनन्तकाल को सुरक्षित एवं आशीषित कर लें।

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • निर्गमन 23-24     
  • मत्ती 20:1-16 

शनिवार, 29 जनवरी 2022

प्रभु यीशु की कलीसिया या मण्डली - चौथा स्तंभ; प्रार्थना


प्रभु यीशु में स्थिरता और दृढ़ता का चौथा स्तंभ, प्रार्थना  

प्रभु की कलीसिया में, प्रभु द्वारा जोड़ दिए लोगों के जीवनों में, कलीसिया के आरंभ के समय से ही सात बातें देखी जाती रही हैं, जिन्हें प्रेरितों 2:38-42 में दिया गया है। इनमें से अंतिम चार, एक साथ, प्रेरितों 2:42 में दी गई हैं, और इन्हें मसीही जीवन तथा कलीसिया की स्थिरता के लिए चार स्तंभ भी कहा जाता है; तथा इनके लिए इसी पद में यह भी लिखा है कि उस आरंभिक कलीसिया के लोग इन बातों का पालन करने में “लौलीन रहे”। हमने इन चारों में से पहली तीन, और सातों में से पहली छः बातों को पिछले लेखों में देखा है। आज इन चार में से चौथी तथा सात में से सातवीं बात, प्रार्थना में लौलीन रहने के बारे में देखते हैं। 

यहाँ हम देखते हैं कि प्रभु यीशु के उन आरंभिक अनुयायियों के जीवन में, आरंभ से ही प्रार्थना करने का बहुत महत्व रहा है। सामान्यतः परमेश्वर से प्रार्थना करने को परमेश्वर से कुछ माँगने या उससे प्राप्त करने के प्रयास करने के अभिप्राय से देखा और समझा जाता है। किन्तु परमेश्वर के वचन बाइबल के अनुसार परमेश्वर से प्रार्थना का अभिप्राय होता है परमेश्वर से वार्तालाप करना, जैसा प्रभु यीशु मसीह बहुधा किया करते थे (मरकुस 1:35; मत्ती 14:23; लूका 5:16; 6:12-13)। यह वार्तालाप औपचारिकता का निर्वाह नहीं, अपितु, किसी अंतरंग मित्र के साथ दिल खोल कर बात करने के समान है। अपने मन की बात परमेश्वर से खुल कर कहना, और परमेश्वर के मन की बात को उससे सुनना। अर्थात, प्रार्थना करना, परमेश्वर से संगति करने के समान है, निरंतर हर बात के लिए उसके संपर्क में बने रहना, हर बात के लिए उसकी इच्छा जानकर उसके अनुसार कार्य करना। जब मसीही विश्वासी परमेश्वर के साथ ऐसे निकट संबंध और संपर्क में रहेगा, परमेश्वर की इच्छा के अनुसार अपना हर निर्णय और कार्य करेगा, तो स्वतः ही उसके जीवन में परमेश्वर की सामर्थ्य भी प्रकट रहेगी, उसके कार्य भी सफल होंगे, और वह परिस्थितियों द्वारा विचलित और निराश भी नहीं होगा, क्योंकि उसे विश्वास रहेगा के जो कुछ भी उसके जीवन में हो रहा है, वह परमेश्वर की इच्छा और योजना के अंतर्गत है, और अन्ततः उससे उसकी भलाई ही होगी (रोमियों 8:28)। 

इसीलिए परमेश्वर पवित्र आत्मा ने प्रेरित पौलुस द्वारा लिखवाया, “निरन्तर प्रार्थना में लगे रहो” (1 थिस्स्लुनीकियों 5:17)। इसका यह तात्पर्य नहीं है कि सब कार्य छोड़कर किसी एकांत स्थान में आँख बंद करके और हाथ जोड़कर बैठे रहो और परमेश्वर से कुछ न कुछ कहते रहो। वरन यह कि हर समय, हर बात के लिए, परमेश्वर के साथ मन में एक मूक संवाद, एक वार्तालाप चलते रहना चाहिए, हर बात के लिए उसकी इच्छा जानते रहना चाहिए, उसकी इच्छा के अनुसार करते रहना चाहिए। जो इस प्रकार परमेश्वर के साथ अपना घनिष्ठ संबंध बनाए रखते हैं, वे प्रभु के इस वचन को भी समझ सकते हैं और उसके प्रति आश्वस्त रह सकते हैं कि समय और आवश्यकता के अनुसार उन्हें प्रभु से वचन और सहायता मिलती रहेगी (लूका 12:11-12); तथा इन अंत के दिनों की भयानक घटनाओं से बचने और शांति के साथ रहने वाले भी हो सकते हैं (लूका 21:34-36; प्रकाशितवाक्य 3:10)।

मसीही विश्वासियों के लिए प्रार्थना करना कोई निर्धारित संख्या के अनुसार गिनकर करना नहीं है, जैसा हम पुराने नियम के कुछ संतों और परमेश्वर के भक्तों के साथ देखते हैं (भजन 55:17; भजन 119:164; दानिय्येल 6:10), वरन हर पल, हर समय परमेश्वर के साथ संपर्क में बने रहना, उससे हर बात के लिए वार्तालाप में बने रहना है। जो इस भाव में जीवन व्यतीत करेगा, फिर वह इस एहसास के साथ भी जीवन जीएगा कि मैं परमेश्वर के साथ, और परमेश्वर मेरे साथ निरंतर विद्यमान हैं। और ऐसी स्थिति में फिर उसके लिए किसी लोभ-लालच, बुरे विचार आदि में बहक कर पाप में गिरना कठिन हो जाएगा, वह शैतान के द्वारा सरलता से बहकाया-गिराया नहीं जाएगा। आप स्वयं अनुमान लगा सकते हैं कि जो इस प्रकार से प्रार्थना में “लौलीन” रहेगा, उसके  आत्मिक जीवन का स्तर कैसा होगा। साथ ही, परमेश्वर के साथ इस प्रकार से संगति और संपर्क वही बना कर रख सकता है, जो प्रभु द्वारा अपनाया गया हो, प्रभु की कलीसिया के साथ जोड़ा गया हो। किसी मानवीय या संस्थागत प्रक्रिया के निर्वाह के द्वारा “कलीसिया” से जुड़ने वाले व्यक्ति के लिए परमेश्वर के साथ इस प्रकार प्रार्थना में जुड़े रहना संभव ही नहीं होगा। 

यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं, तो आपका प्रार्थना का जीवन कैसा है? क्या आपके लिए प्रार्थना करना परमेश्वर से कुछ माँगना ही है, या एक अंतरंग मित्र के समान उससे अपने दिल की सभी बातें साझा करना, तथा उसके दिल की बातों को जानकर उनके अनुसार कार्य एवं व्यवहार करना है? आप का प्रार्थना का जीवन और प्रार्थना के प्रति आपका रवैया प्रकट करेगा कि आप वास्तव में प्रभु द्वारा उसकी कलीसिया से जोड़े गए जन हैं कि नहीं। यदि कहीं कोई कमी है, किसी सुधार की आवश्यकता है, तो अभी समय रहते जो भी ठीक करना है, वह कर लीजिए; कहीं बाद में समय और अवसर न मिले और कोई बहुत भारी कीमत चुकानी पड़ जाए। 

       यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • निर्गमन 21-22     
  • मत्ती 19 

शुक्रवार, 28 जनवरी 2022

प्रभु यीशु की कलीसिया या मण्डली - तीसरा स्तंभ; प्रभु की मेज़ में संभागी क्यों?

 प्रभु यीशु में स्थिरता और दृढ़ता का तीसरा स्तंभ, प्रभु की मेज़ का महत्व   

प्रभु की कलीसिया में, प्रभु द्वारा जोड़ दिए लोगों के जीवनों में, कलीसिया के आरंभ के समय से ही सात बातें देखी जाती रही हैं, जिन्हें प्रेरितों 2:38-42 में दिया गया है। इनमें से अंतिम चार, एक साथ, प्रेरितों 2:42 में दी गई हैं, और इन्हें मसीही जीवन तथा कलीसिया की स्थिरता के लिए चार स्तंभ भी कहा जाता है; तथा इनके लिए इसी पद में यह भी लिखा है कि उस आरंभिक कलीसिया के लोग इन बातों का पालन करने में “लौलीन रहे”। हमने इन चारों में से तीसरी, और सातों में से छठी बात, “रोटी तोड़ना” या प्रभु के मेज़ में सम्मिलित होने के बारे में, पिछले लेख से देखना आरंभ किया है। पिछले लेख में हमने अपने शिष्यों के साथ फसह के पर्व का भोज खाने के दौरान प्रभु द्वारा अपनी इस मेज़ की स्थापना किए जाने के बारे में कुछ बातें और मसीही जीवन के लिए उनके अभिप्राय को देखा था। आज इसी विषय को आगे बढ़ाते हुए प्रभु की मेज़ के महत्व के बारे में कुछ बातों को देखते हैं। 

प्रभु की मेज़ में भाग लेने के विषय पवित्र आत्मा द्वारा 1 कुरिन्थियों 11:17-34 में, प्रेरित पौलुस में होकर लिखवाया गया है, क्योंकि उस मण्डली में प्रभु की मेज़ का निरादर हो रहा था, वे लोग उस मेज़ में भाग लेने की गंभीरता और महत्व को अनदेखा करने लग गए थे। इस खंड के 23 पद में पौलुस यह स्पष्ट बता देता है कि प्रभु की मेज़ का यह दर्शन उसे प्रभु से ही प्राप्त हुआ, और उसने उन्हें भी पहुँचा दिया। इस खंड में प्रभु की मेज़ के विषय जो अनुचित बातें उन में देखी जा रही थीं, संक्षिप्त में, वे हैं:

  • अनुचित रीति से भाग लेने के कारण प्रभु की मेज़ उनके लिए हानि का कारण बन गई थी (पद 17, 27-32)
  • उन लोगों में परस्पर फूट और मतभेद थे, और विधर्मी लोग भी थे जो उस मेज़ में सम्मिलित होते थे (पद 18, 19)
  • प्रभु की मेज़ उनके लिए साथ मिलकर बैठने का नहीं, वरन भेद-भाव का और एक दूसरे को ऊँचा-नीचा दिखाने का माध्यम बन गई थी (पद 20-22, 33-34)
  • इस अनुचित व्यवहार के कारण उन्हें प्रभु से ताड़ना का सामना करना पड़ रहा था, यहाँ तक कि कुछ कि मृत्यु भी हो गई थी (पद 9-32)

       प्रभु की मेज़ में उचित रीति से भाग लेते समय उन्हें भी, और आज हमें भी, उपरोक्त गलतियों को हटाना है। साथ ही इस खंड में दी गई मेज़ के उद्देश्य और महत्व की तीन बातों को भी ध्यान रखना है। ये तीन बातें हैं:

  1. प्रभु की मेज़ खाने-पीने का भोज मनाने के लिए नहीं, वरन प्रभु के द्वारा दिए गए अपने बलिदान को स्मरण करने का अवसर है (पद 24-25); प्रभु ने अपनी देह और लहू का बलिदान क्यों और कैसे दिया, क्या कुछ सहा। उचित गंभीरता, आदर, एवं श्रद्धा के साथ यह स्मरण करना प्रभु के दूसरे आगमन तक चलते रहना चाहिए। 
  2. प्रभु के मेज़ में भाग लेना, उसकी मृत्यु को प्रचार करने के लिए है (पद 26); अर्थात प्रभु के बलिदान के बारे में औरों को बताने, उन तक सुसमाचार पहुँचाने के लिए। मेज़ में भाग लेने के द्वारा भाग लेने वाला प्रभु की मृत्यु के प्रचार के प्रति अपने समर्पण और आज्ञाकारिता को स्मरण करता तथा दोहराता है। 
  3. प्रभु की मेज़ में भाग लेने से पहले प्रत्येक व्यक्ति को अपने आप को जाँचना है कि वह उचित रीति से भाग ले रहा है कि नहीं; क्योंकि अनुचित रीति से भाग लेने वाला अपने ऊपर दण्ड को लाता है (पद 27-32)। अपने आप को जाँच कर, अपनी गलतियों और पापों को प्रभु के सामने मान कर, उनके लिए पश्चाताप करने और प्रभु से क्षमा माँगने के बाद ही मेज़ में भाग लेना उचित है।

प्रभु के द्वारा उसकी मेज में भाग लेने के औचित्य, उद्देश्य, और महत्व को समझने के द्वारा हम समझ सकते हैं कि प्रभु ने अपने लोगों को शैतान की चालाकियों और बातों से शुद्ध और पवित्र रखने के लिए, तथा अपने शिष्यों को उसके सुसमाचार प्रचार के प्रति समर्पित एवं आज्ञाकारी बनाए रखने के लिए इस मेज़ की स्थापना की, और उसमें नियमित भाग लेते रहने के लिए कहा। इससे हम यह भी समझ सकते हैं कि क्यों यहूदा इस्करियोती को मेज़ में भाग नहीं मिला - क्योंकि वह मेज़ के उद्देश्यों को पूरा ही नहीं करता था। साथ ही हम यह भी समझने पाते हैं कि क्यों जो लोग एक रस्म के समान इसमें भाग लेते हैं, वे अपने लिए कितना बड़ा दण्ड मोल ले रहे हैं; क्योंकि मेज़ में भाग लेने से कोई प्रभु की दृष्टि में धर्मी नहीं बनता है - प्रभु ने तो जो उसकी दृष्टि में धर्मी हैं, उन्हीं के लिए मेज़ को स्थापित किया था, अधर्मियों को धर्मी बनाने के लिए नहीं। किन्तु अनुचित रीति से भाग लेने, या किसी को भाग दिलवाने के द्वारा व्यक्ति अपने लिए प्रभु से दण्ड और ताड़ना का भागी अवश्य बन जाता है। उचित रीति से भाग लेना आशीष का कारण है, क्योंकि व्यक्ति अपने आप को जाँच और सुधार कर मसीही जीवन में आगे बढ़ सकता है; और अनुचित रीति से या रस्म के समान भाग लेने और देने से व्यक्ति स्वयं ही अपने लिए दण्ड कमा लेता है। 

क्योंकि प्रभु की मेज़ में भाग लेने से पहले, व्यक्ति को अपने आप को जाँचना है, अपने पाप और गलतियों को प्रभु के सामने स्वीकार करना है, इसलिए मेज़ में भाग लेना भी एक उचित समय-अवधि के अनुसार होना चाहिए, जिससे अपने पिछले दिनों के जीवन को सहजता से स्मरण और पुनःअवलोकन किया जा सके। आरंभिक कलीसिया के लोग इसमें लौलीन रहते थे, प्रतिदिन, घर-घर में प्रभु की मेज़ में सम्मिलित होते थे (प्रेरितों 2:46); किन्तु कुछ समय के पश्चात, यह सामूहिक एकत्रित होना, और रोटी तोड़ना या प्रभु के मेज़ में भाग लेना, सप्ताह के पहले दिन की आराधना सभा (1 कुरिन्थियों 16:2) के साथ जुड़ गया (प्रेरितों 20:7)। सप्ताह भर की यह अवधि, मेज़ में भाग लेने से पहले अपने जीवन का पुनः अवलोकन करने और हफते भर में हुई किसी भी गलती, बुराई, या पाप को ध्यान करके प्रभु के सामने मानने के लिए सहज रहती है। महीने में एक बार, या अन्य किसी समय-अवधि के अनुसार मेज़ में भाग लेने का वचन में कोई समर्थन नहीं है। साथ ही यह कोई रस्म भी नहीं है, इसे भी हम देख चुके हैं।

यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं, तो प्रभु की मेज़ में भाग लेने के महत्व के प्रति आपका क्या दृष्टिकोण है? ध्यान कीजिए, 1 कुरिन्थियों 11:17-32 के पदों में प्रभु और पवित्र आत्मा ने मेज़ में भाग लेने को वैकल्पिक, या, इच्छानुसार नहीं लिखा है, वरन अनिवार्य किया है। इन पदों में स्पष्ट आया है कि मण्डली के लोगों को भाग लेना था; किन्तु यह भी उतना ही स्पष्ट है कि उचित रीति से भाग लेना था। प्रभु की मेज़ में भाग न लेना, प्रभु की अनाज्ञाकारिता है, दण्डनीय है; और अनुचित रीति से भाग लेना भी दण्डनीय है। अर्थात, प्रभु ने अपने लोगों के लिए एक बहुत संकरा किन्तु बहुत उत्तम मार्ग दिया है, जिससे हम अपनी पिछली बुराइयों, गलतियों, पापों को लिए हुए मसीही जीवन में आगे न बढ़ें, वरन प्रभु से क्षमा और आशीष के साथ मसीही जीवन में उन्नत होते चले जाएं। 

       यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • निर्गमन 19-20     
  • मत्ती 18:21-35

गुरुवार, 27 जनवरी 2022

प्रभु यीशु की कलीसिया या मण्डली - तीसरा स्तंभ; प्रभु की मेज़ में संभागी


प्रभु यीशु में स्थिरता और दृढ़ता का तीसरा स्तंभ, 

प्रभु की मेज़ की स्थापना से शिक्षाएँ     

    इस श्रृंखला में हम देखते आ रहे हैं कि अपने पापों के लिए पश्चाताप करने और प्रभु यीशु पर लाए गए विश्वास द्वारा पापों की क्षमा तथा उद्धार प्राप्त करने पर प्रभु व्यक्ति को अपनी कलीसिया, अपने लोगों के समूह के साथ जोड़ देता है। प्रभु की कलीसिया के साथ जोड़ दिए जाने वाले व्यक्तियों के जीवनों में, कलीसिया के आरंभ से ही, सात बातें भी देखी जाती रही हैं, जिन्हें प्रेरितों 2:38-42 में बताया गया है। इन सात में से चार बातें, प्रेरितों 2:42 में लिखी गई हैं, और इन चारों के लिए यह भी कहा गया है कि उस आरंभिक कलीसिया के लोग उन में “लौलीन रहे”। इन चार बातों को मसीही जीवन तथा कलीसिया को स्थिर और दृढ़ बनाए रखने वाले चार स्तंभ भी कहा जाता है। पिछले लेखों में हम सात में से पाँच बातें देख चुके हैं। आज हम छठी बात, जो 2:42 की तीसरी बात, और कलीसिया तथा मसीही जीवन का तीसरा स्तंभ है, ‘रोटी तोड़ना’ के बारे में कुछ बातें देखेंगे, और इन्हें अगले लेख में पूरा करने का प्रयास करेंगे।

जब परमेश्वर ने इस्राएलियों को मूसा के द्वारा मिस्र के दासत्व से छुड़ाया था, तो उनके छुटकारे की रात को उन्हें “फसह का पर्व” या “लाँघन पर्व” मनाने की विधि भी दी थी, जिसका वर्णन निर्गमन 12 अध्याय में दिया गया है। इस पर्व को, व्यवस्था के दिए जाने के समय, इस्राएल के वार्षिक पर्वों में सम्मिलित किया गया (लैव्यव्यवस्था 23:5-8)। निर्गमन 12 में दिए गए विवरण के अनुसार, फसह का यह पर्व परिवार जनों के द्वारा साथ मिलकर मनाया जाना था, और यदि परिवार छोटा हो, तो किसी अन्य निकट के छोटे परिवार के साथ सम्मिलित होकर मनाया जाना था (निर्गमन 12:3-4)। यह पर्व पापों से और शैतान के दासत्व से प्रभु यीशु के बलिदान के द्वारा छुटकारे का प्रतीक था। इस प्रतीकात्मक पर्व को वास्तविक करने से ठीक पहले, प्रभु यीशु मसीह ने यह पर्व अपने शिष्यों के साथ मनाया था (मत्ती 26:17-19)। इस पर्व को मनाते समय, पर्व की रीति के अनुसार शिष्यों के साथ भोजन करते समय, प्रभु ने एक और कार्य भी किया - जो पर्व की विधि से कुछ भिन्न था - प्रभु ने रोटी और कटोरे को लेकर उन्हें अपनी देह और लहू का चिह्न बताया और उसे शिष्यों में वितरित किया। इस पर्व के मनाए जाने और प्रभु द्वारा इस प्रकार से रोटी और कटोरे को अपनी देह और लहू का चिह्न बताने का उल्लेख चारों सुसमाचारों में किया गया है।

इस पर्व के मनाए जाने और प्रभु द्वारा रोटी और कटोरा दिए जाने के चारों सुसमाचारों के वर्णनों को साथ मिलाकर ध्यान से तथा क्रमवार देखने से स्पष्ट हो जाता है कि प्रभु ने फसह के पर्व का भोजन बारहों शिष्यों के साथ आरंभ किया, अर्थात फसह के भोज के समय यहूदा इस्करियोती भी उनके साथ था, और जब प्रभु ने शिष्यों के पाँव धोए, तो यहूदा के भी धोए थे (यूहन्ना 13:4-25)। और फसह के भोज का पहला टुकड़ा, प्रभु ने यहूदा इस्करियोती को दिया, जिसने उसके साथ थाली में हाथ डाला था (मत्ती 26:23, मरकुस 14:20; लूका 22:21; यूहन्ना 13:26), और उससे कहा कि जो तुझे करना है सो कर (यूहन्ना 13:27)। फसह के पर्व का वह पहला टुकड़ा दिए जाने के साथ भोज को खाना आरंभ हो गया, प्रभु और शिष्य फसह के भोज को खाने लगे, और प्रभु से वह टुकड़ा लेते ही यहूदा तुरंत बाहर चला गया (यूहन्ना 13:30); किन्तु यह ध्यान देने योग्य बात है कि यह कहीं नहीं लिखा है कि यहूदा ने उस टुकड़े को लेकर खाया भी। यहूदा के चले जाने के बाद, जब वे खा रहे थे, तब प्रभु यीशु ने भोज में से उठकर रोटी और कटोरे को उन्हें अपनी देह और लहू के चिह्न के रूप में दिया, और उनसे यह करते रहने के लिए कहा (मत्ती 26:26-28; मरकुस 14:22-25; लूका 22:19-20)। अर्थात, शैतान का वह जन, यहूदा इस्करियोती फसह के पर्व की आरंभिक प्रक्रियाओं में तो था, और प्रभु ने उसे बदलने का मौका भी दिया, उसके पाँव धोए, उससे प्रेम दिखाया, उसे सब के सामने प्रकट और शर्मिंदा नहीं किया, और भोज का पहला टुकड़ा भी उसे ही दिया, जो पारंपरिक रीति से प्रिय जन को दिया जाता था। किन्तु न तो वह बदला, और न उसने फसह का भोज खाया और न ही प्रभु द्वारा रोटी और लहू का चिह्न स्थापित किए जाने के समय वह उनके मध्य में उपस्थित था। 

प्रभु की मेज़, प्रभु भोज का यह दर्शन कुछ बहुत गंभीर तथ्य हमारे सामने रखता है। न ही प्रभु यीशु ने, और न ही उनके उन शिष्यों ने यह पर्व अपने निज परिवारों के साथ मनाया, वरन एक साथ मिलकर मनाया - प्रभु में लाए गए विश्वास और समर्पण के द्वारा अब प्रभु और उसके अन्य विश्वासी ही उनका “परिवार” थे, जो यूहन्ना 1:12-13 में प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास के द्वारा परमेश्वर की संतान, प्रभु की कलीसिया और परमेश्वर के घराने के लोग (इफिसियों 2:19) होने की पुष्टि करता है। फिर, प्रभु की मेज़, प्रभु के सच्चे समर्पित लोगों के लिए है, सार्वजनिक निर्वाह के लिए कोई प्रथा या परंपरा नहीं है। प्रभु ने इसमें भाग लेने के लिए केवल अपने साथ रहने वाले उन शिष्यों को ही आमंत्रित किया, सर्व-साधारण को नहीं; और फिर शिष्यों में से भी जब शैतान का जन चला गया, तब ही प्रभु ने इसे स्थापित किया। निःसंदेह, इसमें भाग लेने वाले शिष्य सिद्ध नहीं थे - थोड़ी ही देर बाद सब के सब प्रभु को छोड़ कर भाग गए, और पतरस ने तो तीन बार प्रभु का इनकार भी किया। किन्तु पुनरुत्थान के बाद प्रभु ने इन्हीं शिष्यों को फिर से दृढ़ और स्थापित कर के कलीसिया का आरंभ किया, सारे संसार में सुसमाचार को पहुँचाया, और उन्हीं के द्वारा संसार भर में कलीसिया का दर्शन गया, कलीसिया स्थापित हुईं। प्रभु की मेज़ से संबंधित कुछ अन्य तथ्य हम आगे अगले लेख में देखेंगे। 

यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं, तो आपके मसीही जीवन को स्थिर और दृढ़ रखने में, आपको प्रभु के लिए उपयोगी बनाने में, प्रभु की मेज़ में सम्मिलित होने की एक बहुत प्रमुख और महत्वपूर्ण भूमिका है। किन्तु ध्यान रखिए कि यह कोई रस्म या परंपरा नहीं है, जिसमें भाग लेने के द्वारा आप परमेश्वर की दृष्टि में धर्मी हो जाते हैं। वरन, अनुचित रीति से भाग लेने के द्वारा, व्यक्ति दंड के भागी हो जाते हैं। इसलिए प्रभु की मेज़ में, प्रभु भोज में सम्मिलित होने से पहले इसके अर्थ और दर्शन को भली भांति समझकर, तब उचित रीति से इसमें सम्मिलित हों, अन्यथा अनुचित रीति से भाग लेना बहुत भारी पड़ जाएगा। 

यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।



एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • निर्गमन 16-18     
  • मत्ती 18:1-20 

बुधवार, 26 जनवरी 2022

प्रभु यीशु की कलीसिया या मण्डली - दूसरा स्तंभ; संगति रखना


प्रभु यीशु में स्थिरता और दृढ़ता का दूसरा स्तंभ, संगति में साथ      

       अपने पापों के लिए पश्चाताप करने और प्रभु यीशु पर लाए गए विश्वास द्वारा पापों की क्षमा तथा उद्धार प्राप्त करने पर प्रभु व्यक्ति को अपनी कलीसिया, अपने लोगों के समूह के साथ जोड़ देता है। प्रभु की कलीसिया के साथ जोड़ दिए जाने वाले व्यक्तियों के जीवनों में आरंभ से ही सात बातें भी देखी जाती रही हैं, जिन्हें प्रेरितों 2:38-42 में बताया गया है। इन सात में से चार बातें, प्रेरितों 2:42 में लिखी गई हैं, और उनके लिए यह भी कहा गया है कि उस आरंभिक कलीसिया के लोग उन में “लौलीन रहे”। इन चार बातों को मसीही जीवन तथा कलीसिया को स्थिर और दृढ़ बनाए रखने वाले चार स्तंभ भी कहा जाता है। पिछले लेखों में हम सात में से चार बातें देख चुके हैं। आज हम पाँचवीं बात, जो 2:42 की दूसरी बात, और कलीसिया तथा मसीही जीवन का दूसरा स्तंभ है, ‘संगति रखना’ के बारे में देखेंगे। 

       सृष्टि के आरंभ से ही मनुष्य का अकेले रहना परमेश्वर को पसंद नहीं था; वह आदम को एक ऐसा सहायक देना चाहता था जो उससे मेल खाता हो (उत्पत्ति 2:18)। इसलिए परमेश्वर पहले पृथ्वी के सभी जीव-जंतुओं को आदम के पास लाया, आदम ने उन सभी के नाम रखे, किन्तु उनमें से कोई भी आदम से मेल रखने वाला, उसका सहायक बन सकने वाला नहीं मिला (उत्पत्ति 2:19-20)। आदम को यह एहसास दिलाने के बाद कि वह सारी सृष्टि के सभी जीवों से भिन्न है, परमेश्वर ने उसके समान एक सहायक की रचना करके उसे आदम के साथ रख दिया (उत्पत्ति 2:21-22)। अर्थात, सृष्टि के आरंभ से ही न केवल मनुष्य परस्पर संगति में रहते थे, वरन परमेश्वर भी उनके साथ संगति करता था, उनसे मिलने आता था (उत्पत्ति 3:8)। साथ ही, शैतान हव्वा को तब ही बहका कर पाप में गिराने पाया जब वह अकेली थी (उत्पत्ति 3:1-2); अकेली स्त्री पाप में गिरी, फिर उसने आदम को भी पाप गिराया (उत्पत्ति 3:6), और उस पाप के कारण वे दोनों परमेश्वर की संगति से भी दूर हो गए। परस्पर संगति में तथा परमेश्वर के साथ संगति में बने रहने में बहुत सामर्थ्य है; पाप में पतित और पाप के कारण भ्रष्ट बुद्धि वाले हम मनुष्य इसे नहीं समझते हैं, किन्तु शैतान इस जानता और समझता है; इसीलिए वह हमें भी एक-दूसरे से दूर रखने तथा हमें परमेश्वर से दूर रखने के विभिन्न उपाय कार्यान्वित करता रहता है, कि कहीं हम परस्पर और परमेश्वर के साथ संगति की सामर्थ्य को पहचान कर, एक-मनता के साथ रहें और उसके लिए परेशानी का कारण न बन जाएं। 

राजा सुलैमान ने लिखा, “एक से दो अच्छे हैं, क्योंकि उनके परिश्रम का अच्छा फल मिलता है। क्योंकि यदि उन में से एक गिरे, तो दूसरा उसको उठाएगा; परन्तु हाय उस पर जो अकेला हो कर गिरे और उसका कोई उठाने वाला न हो। फिर यदि दो जन एक संग सोए तो वे गर्म रहेंगे, परन्तु कोई अकेला क्योंकर गर्म हो सकता है? यदि कोई अकेले पर प्रबल हो तो हो, परन्तु दो उसका सामना कर सकेंगे। जो डोरी तीन तागे से बटी हो वह जल्दी नहीं टूटती” (सभोपदेशक 4:9-12)। प्रभु यीशु मसीह ने भी अपने शिष्यों से उनकी एक-मनता की सामर्थ्य के विषय में कहा, “फिर मैं तुम से कहता हूं, यदि तुम में से दो जन पृथ्वी पर किसी बात के लिये जिसे वे मांगें, एक मन के हों, तो वह मेरे पिता की ओर से स्वर्ग में है उन के लिये हो जाएगी। क्योंकि जहां दो या तीन मेरे नाम पर इकट्ठे होते हैं वहां मैं उन के बीच में होता हूं” (मत्ती 18:19-20)। अर्थात, जहाँ भी प्रभु के लोग एक मन होकर साथ हैं, सहमत हैं, वहाँ प्रभु परमेश्वर भी उनके साथ उस बात में सहमत है, उनके साथ विद्यमान है; वे चाहे संख्या में दो या तीन ही क्यों न हों! प्रभु यीशु ने हमारे पापों की क्षमा और उद्धार के लिए किए गए कार्य के द्वारा न केवल हमारे बीच के विभाजनों की दीवार को हटा दिया और हम सभी मनुष्यों को एक साथ जोड़ दिया, वरन साथ ही हमें एक साथ मिलाकर परमेश्वर का निवास-स्थान भी बना दिया, और परमेश्वर के साथ संगति में भी बहाल कर दिया (इफिसियों 2:11-22), हमारा मेल-मिलाप पिता परमेश्वर के साथ भी करवा दिया (रोमियों 5:1, 10-11)। 

क्योंकि हमारा यह साथ मिलकर रहना और परमेश्वर की संगति में रहना हमारे व्यक्तिगत मसीही जीवन और कलीसिया की सामर्थ्य के लिए, तथा प्रभु के लिए उपयोगी एवं प्रभावी होने का कारगर उपाय है, इसीलिए शैतान हमें परस्पर एक-मनता में नहीं रहने देता है, और परमेश्वर के साथ भी हमारी संगति को बाधित करता रहता है। उसने विभाजित रखने का यह षड्यंत्र कलीसिया के आरंभ से कार्यान्वित कर दिया था (रोमियों 15:5-6; 1 कुरिन्थियों 1:10-13; 11:18; 2 कुरिन्थियों 12:20; गलातियों 5:15; याकूब 4:1-2; आदि), और आज भी प्रभु के लोगों को एक मन होकर साथ रहने से रोकने के उपाय करता रहता है। यह एक दुख भरा कटु सत्य है कि आज हम प्रभु के लोग, एक ही प्रभु, एक ही कलीसिया के सदस्य होते हुए भी, साथ मिलकर रहने और कार्य करने के उपाय नहीं ढूँढ़ते हैं, वरन एक दूसरे से अलग रहने, अलग-अलग रहकर कार्य करने के कारण और तरीके ढूँढ़ते, और निभाते रहते हैं। जबकि होना इसका विपरीत चाहिए (इफिसियों 4:1-6)। इसीलिए हमारे व्यक्तिगत मसीही जीवन और हमारी कलीसिया के जीवनों और गवाहियों में इतनी दुर्बलता है; शैतान इतनी सरलता से संसार में हमें प्रभु के लिए निष्क्रिय, निष्फल, और जगत में उपहास का विषय बनाए रखता है। आरंभिक कलीसिया के लोग परस्पर संगति रखने में भी लौलीन रहते थे, इसीलिए परमेश्वर की सामर्थ्य उनमें रहती थी, उनके द्वारा कार्य करती थी, “निदान, हे भाइयो, आनन्दित रहो; सिद्ध बनते जाओ; ढाढ़स रखो; एक ही मन रखो; मेल से रहो, और प्रेम और शान्ति का दाता परमेश्वर तुम्हारे साथ होगा” (2 कुरिन्थियों 13:11)।

यदि हम मसीही विश्वासियों को, प्रभु की कलीसिया के सदस्यों को, इन अंत के दिनों में अपने मसीही विश्वास में स्थिर और दृढ़ रहना है, और प्रभु के लिए उपयोगी एवं प्रभावी होना है, तो परमेश्वर पवित्र आत्मा द्वारा पौलुस प्रेरित में होकर फिलिप्पी की कलीसिया को लिखे गए आग्रह को पूरा करना होगा, “सो यदि मसीह में कुछ शान्ति और प्रेम से ढाढ़स और आत्मा की सहभागिता, और कुछ करुणा और दया है। तो मेरा यह आनन्द पूरा करो कि एक मन रहो और एक ही प्रेम, एक ही चित्त, और एक ही मनसा रखो। विरोध या झूठी बड़ाई के लिये कुछ न करो पर दीनता से एक दूसरे को अपने से अच्छा समझो। हर एक अपनी ही हित की नहीं, वरन दूसरों की हित की भी चिन्ता करे। जैसा मसीह यीशु का स्वभाव था वैसा ही तुम्हारा भी स्वभाव हो” (फिलिप्पियों 2:1-5)। इसलिए, यदि आप एक मसीही विश्वासी हैं, तो प्रभु के भय में होकर इस आग्रह के निर्वाह का प्रयास करते रहें; कलीसिया में कभी मतभेद और विभाजनों का नहीं, अपितु प्रेम और मेल-मिलाप का कारण बनें, तब ही आप परमेश्वर की संतान कहलाएंगे (मत्ती 5:9)।  

       यदि आपने प्रभु की शिष्यता को अभी तक स्वीकार नहीं किया है, तो अपने अनन्त जीवन और स्वर्गीय आशीषों को सुनिश्चित करने के लिए अभी प्रभु यीशु के पक्ष में अपना निर्णय कर लीजिए। जहाँ प्रभु की आज्ञाकारिता है, उसके वचन की बातों का आदर और पालन है, वहाँ प्रभु की आशीष और सुरक्षा भी है। प्रभु यीशु से अपने पापों के लिए क्षमा माँगकर, स्वेच्छा से तथा सच्चे मन से अपने आप को उसकी अधीनता में समर्पित कर दीजिए - उद्धार और स्वर्गीय जीवन का यही एकमात्र मार्ग है। आपको स्वेच्छा और सच्चे मन से प्रभु यीशु मसीह से केवल एक छोटी प्रार्थना करनी है, और साथ ही अपना जीवन उसे पूर्णतः समर्पित करना है। आप यह प्रार्थना और समर्पण कुछ इस प्रकार से भी कर सकते हैं, “प्रभु यीशु मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने मेरे पापों की क्षमा और समाधान के लिए उन पापों को अपने ऊपर लिया, उनके कारण मेरे स्थान पर क्रूस की मृत्यु सही, गाड़े गए, और मेरे उद्धार के लिए आप तीसरे दिन जी भी उठे, और आज जीवित प्रभु परमेश्वर हैं। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें, मुझे अपनी शरण में लें, और मुझे अपना शिष्य बना लें। मैं अपना जीवन आप के हाथों में समर्पित करता हूँ।” सच्चे और समर्पित मन से की गई आपकी एक प्रार्थना आपके वर्तमान तथा भविष्य को, इस लोक के और परलोक के जीवन को, अनन्तकाल के लिए स्वर्गीय एवं आशीषित बना देगी।

 

एक साल में बाइबल पढ़ें:

  • निर्गमन 14-15     
  • मत्ती 17